मनुष्य के लिए संगीत भी उतना ही महत्व पूर्ण
है जीतना की भोजन। भोजन शरीर के लिए आवश्यक है परंतु संगीत तन और मन दोनों के लिए ही
उतना महत्वपूर्ण है। पूरी प्रकृति एक संगीत लय में बह रही है। चाहे हवा की छम-छम या
झरनों का कलरव गान या पक्षियों का गायन। वो हर सुबह श्याम केवल गाते रहते है। मैं देखता
हूं कितनी ही कम प्राणियों को प्रकृति ने अनेक सूर दिये है। बहुत ही कम अधिकतर तो एक
या दो ही स्वर। परंतु लगाता उन्हीं से वह प्रकृति का गीत गाते चलते है।
संगीत से लगाव बचपन से ही था। परंतु बचपन में वो प्यास एक तड़प बन गई। परंतु ओशो से जूड़ने के बाद उस आयाम में एक तूफान आ गया। फिर साधन सुविधा भी थी। सो मैंने करीब 1992 में बांसुरी सीखनी शुरू की। समय कम मिलता था। दूसरा उस समय में सिखाने वाले भी नहीं मिलते थे। आज तो यू ट्यूब पर जहां देखो जो चाहो आप सीख सकते है।
अब इस उम्र में जब मैं बाँसुरी लगभग बजा लेता हूं। की बोर्ड बजाने की इच्छा को पूर्ण करना चहा। अब करीब 10 दिन से रोज दोनों हाथों से कीबोर्ड बजाने का अभ्यास करता हूं। साथ में अपने गाने भी बजाता रहता हूँ। क्योंकि बांसुरी पर तो अभ्यास है। इस लिए Roland GO:KEYS 3 – 61 कुंजी (संगीत किबोड़) खरीद कर उसके साथ स्पीकर आदि का सेट अप तैयार किया है। अब रोज एक घंटा इस के लिए जरूर निकालने की कोशिश करता हूं। एक अलग ही आनंद है। बाँसुरी पर बजाना और फिर उसे बंधे हुए सूरों पर परखना एक नया आयाम है। अब उस में बारीक तकनीक भी समझ में आ जाती है। की बांसुरी में कहां गलती हो रही है। या कि बोर्ड में कहां। इस लिए दोनों का मिलन एक मधुरता भर रहा है।समय कभी नहीं रूकता करने की उमंग होनी चाहिए।
लगन ही मनुष्य को तरो ताजा एक उल्लास भरती है।
मनसा आनंद दसघरा

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