अचौर्य—(प्रवचन—नौवां)
दिनांक 13 नवंबर 1970, क्रास मैदान, बंबई
प्रश्नोत्तर :
आचार्य श्री, अचौर्य पर आपने कहा
है कि शरीर, भाव या मन के तल पर किसी दूसरे की नकल या किसी
दूसरे का अनुगमन चोरी है। लेकिन जीवन अंतर्संबंधों का एक जाल है; यहां सब जुड़े हुए हैं। तब व्यक्ति अपनी शुद्धतम मौलिकता तथा बाहर से आने
वाली सूक्ष्म तरंगों के प्रभाव अथवा आरोपण को किस प्रकार पृथक करे? और वह उससे कैसे बचे?
जीवन
अंतर-संबंधों का जाल है, लेकिन जीवन सिर्फ
अंतर-संबंध ही नहीं है। अंतर संबंधित होने के लिए भी व्यक्ति चाहिए, अंतर-संबंध भी दो व्यक्तियों के बीच संबंध है; लेकिन
दो व्यक्ति भी चाहिए, जिनके बीच संबंध हो सके। तो जीवन,
जो हमें बाहर दिखायी पड़ता है वह तो अंतर-संबंध है, लेकिन एक और भी जीवन है भीतर, जो अंतर-संबंधित होता
है। वह व्यक्ति अगर न हो, तो अंतर-संबंध सब झूठ हो जाते हैं।
जुड़ेगा कौन?











