कुल पेज दृश्य

शनिवार, 25 अप्रैल 2026

45-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-45

(सदमा - उपन्यास)

धर बम्बई में नेहा लता के माता पिता ऊटी आने के लिए बैचेन थे। लेकिन न तो पेंटल को छुट्टियाँ मिल रही थी। और दूसरा नेहा लता भी यही चाहती की कम से कम इस बात को दो-चार महीने और टाल दिया जाये। क्योंकि उसके मन में जो चल रहा था। उसे अभी वह अपने माता पिता के सामने नहीं रखना चाहती थी। ये बात वह फोन कर के अपने माता-पिता को बतला कर वह किसी नये बवाल में नहीं उलझना चाहती थी। उसका पूरी ध्यान केवल इस बात पर था, कि किस तरह से सोम प्रकाश जल्दी से जल्दी स्वस्थ लाभ प्राप्त कर सके। दूसरी बात को उठाने से अभी कोई हल होने वाला नहीं है। इसलिए इन बातों को सून कर सोम प्रकाश की बीमारी पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। सो इस बात को कम से कम दो-तीन महीने टाल दिया जाये तो बेहतर होगा।

इधर सोनी के बच्चे को आज तीन महीने हो गए। बच्चा सुंदर और स्वास्थ्य था। और अब उसके आने से सोनी के घर में ही नहीं जो भी उसके आसपास था, वहां भी खुशियों के फूल खिल रहे थे। दूसरा अब सोम प्रकाश लगातार स्कूल जा रहा था। अब तो नेहा लता को भी साथ जाने की जरूरत नहीं पड़ती थी। उसे वहां जाने में भय कम महसूस हो रहा था। धीरे-धीरे उसे इस काम में रस पैदा हो रहा था। एक खुशी उसके मन में फेल रही थी। इस बीच जब नेहा लता और नानी सोम प्रकाश को महात्मा जी के पास ले कर गए तो वह बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने सोम प्रकाश से कई प्रश्न सब के समाने ही बिठा कर पूछे की तुम्हें भय क्यों लगता है। तब वह नेहा लता की और देख कर चुप हो गया। आज उसकी वाणी भी खुल कर आ रही थी। आप अगर नशे में या आप का मन बीमार है, तब आपकी वाणी आपके मन के आधार पर बदल जाती है। वैद्य जी ने सोम प्रकाश को लिटा कर उसका पेट, हाथ की हथेलियां उसके पैर के तलवे उन पर उँगली से चोट मार कर पूछा की कहां दर्द हो रहा है।

कुल मिला कर अब सोम प्रकाश का शरीर और मन दोनों ही बहुत ही स्वस्थ थे। लगभग वैद्य जी कह रहे थे, अब आप को घबराने की जरूरत नहीं है। सब एक दम से ठीक चल रहा है। तब नेहा लता ने कहा की अब आप के कहने के अनुसार यह स्कूल भी जाने लगे। सबसे अच्छी बात है यह सब काम अब मन लगाकर खुशी से करते है। जैसे पहले मैं साथ ले जाती थी। तब वहां जाने के लिए लाख बहाने या आना कानी करते थे। परंतु लगातार जाने से मन को एक विश्वास हो रहा है। जिससे की इनके अंदर का भय निकल कर बाहर आ रहा है।

उसके बाद सोम प्रकाश के सर पर एक प्रकार का गाढ़ा लेप लगाया गया। और उसे उस कमरे में लिटा दिया जहां हवा भी नहीं जाती थी। वह पर एक भट्टी जलती रही थी। उस में किसी खास प्रकार की सुगंध का तेल डाल दिया जाता था। और सोम प्रकाश को एक मोटे कपड़े से ढक कर लिटा दिया जाता था। ये बस कार्य करने के बाद महात्मा जी ने नेहा लता को कहां की आप मेरे साथ आयेंगी। तब नानी ने कहां की हां-हां बेटा जाओ महात्मा से बात कर लो वह सोम प्रकाश के बारे में ही कुछ खास बात आप से करना चाहते होंगे। नानी और हरि प्रसाद बाहर शिला पर ही लेट गये। नानी अब इतनी दूर आने के कारण थक भी जाती थी। परंतु इस बात को वह नेहालता को कभी नहीं कहती थी। की पराये घर की लड़की जो हमारे लिये इतना कर रही है। तो क्या हम इतना भी कष्ट नहीं उठा सकते। फिर अगर नेहा लता नहीं आती तो मुझे तो आना ही था। तब नानी ने एक बार हरि प्रसाद की और मुड कर कहां की मैं ठीक कह रही हूं ने हरि प्रसाद।

मानो हरी प्रसाद नानी की सब बात समझता है। और वह उठ कर आया और पूंछ हिलाते हुए नानी का मुख चाट लिया। तब नानी ने कहां बड़ा ही पाजी हो गया है। वह खड़ा-खड़ा मानो नानी के इस व्यवहार पर हंस रहा हो। उधर वैद्य जी नेहा को अपनी कुटिया में ले गए। और सामने बैठने के लिए कहां नेहा लता तो बड़ा अचरज लग रहा था। हां उसे डर तो नहीं कह सकते क्योंकि वह एक सुलझी हुई लड़की थी। वह आदमी के चाल से ही उसके चरित्र को पहचान सकती थी। देखा नहीं आपने एक शब्द बना है चाल चलन। आपकी चाल ही आपका चरित्र बतला सकती है। उस चाल से सब झरता सा दिखता है, कि क्या आपका चरित्र है। इस बात को देखने के लिए आपके पास होश चाहिए। नहीं तो लोग साथ-साथ जीकर भी एक दूसरे को कहां जान पाते है।

बेटी देखों मैं आप को एक बात बतला सकता हूं। मैंने आपके और सोम प्रकाश के जीवन की कुंडली पहले भी देखी थी। जब आप आई थी। सो मैंने आपके माता पिता से भी पूछा था की वह लड़का कौन था जो आप को यहाँ पर छोड़ कर गया। तब शायद वो उसे नहीं जानते। अब भी पता नहीं वह उसे जानते है या नहीं परंतु तुम्हारा जानना अति जरूरी है। प्रकृति के गोद में क्या छुपा है, इसे हम जान तो नहीं सकते परंतु एक मध्य सी आहट को सुन और समझ सकने की कोशिश कर सकते है। ये वैद्य का काम और ज्योतिष या ध्यान साधना मेरे जीवन का लक्ष्य है। इस में पूर्णता के साथ समझना और जानना चाहता हूं। जैसे हम संगीत या किसी कला का उपयोग कर सकते है। इसलिए एक बात को ध्यान से सून लो तुम दोनो इस जन्म में ही नहीं मिले पहले भी कई जन्म तक तुम्हारा साथ रहा है। इस समय पृथ्वी पर अधिक जनसंख्या होने के कारण जन्म की कोई सीमा नहीं रही। अब एक बार यहां जन्म के साथ अगले जन्म में कही विदेश में भी जन्म ले सकती हो। केवल उस माता पिता के संस्कार आप जैसे होने चाहिए। कई बार अनजाने में इसके विरोधी भी नजर आते है। परंतु वह जन्म के बाद हमारा मन विकृत हो उठता है, प्रकृति कोई अवरोध या विरोध नहीं करती।

इस बार आप दोनो का मिलना प्रकृति ने इसी प्रकार से निर्धारित किया था। शायद प्रकृति को कोई मार्ग नहीं दिखलाई दे रहा होगा। दूसरा आप एक बात को गहरे से समझ ले। आप ठीक या स्वस्थ नहीं रह सकती है बिना सोम प्रकाश के और न वह खुद ही आपके बिना। आप सोच रही है कि या सब दूसरे लोग सोच रहे है, कि सोम प्रकाश हमारी दवा काम कर रही है। वह एक प्रकार से बैसाखी का कार्य कर रही है। बाकी सारा कार्य तो आपकी प्रेम चेतना का, संग साथ की उर्जा का ही खेल है। आप आज छोड़ कर देखो सोम प्रकाश को, और फिर उससे भी गहरे में जाकर गिर जायेगा। यह इस तरह के बीमारी में सब लोगों के साथ होता है। जो लोग इनके आस पास होते है। वह थक जाते है, हार जाते है। इस सब का बहुत बुरी प्रभाव मरीज पर पड़ा है। धीरे-धीरे वह अपने को असुरक्षित, बेकार समझते-समझते एक दिन मौत की गोद में चला जाता है। इस तरह की एक ही बीमारी में अनेक तरह लक्षण पाये जाते है। कोई मरीज तो अधिक क्रोधी हो जाता है, कोई भय भीत, कोई एक दम से शांत, किसी-किसी की तो वाणी ही खो जाती है। परंतु इन सब में जो सबसे जरूरी बात है, वह है आत्म हत्या की। आप ने देखा जब आप आई थी तो सोम प्रकाश अधिक से अधिक देर तक सोना चाहता होगा। मैं थक गया हूं। थोड़ा और लेट लूं। यहीं से उसे मृत्यु में रस शुरू हो जाता है। इसलिए इस तरह के मरीजों को प्रत्येक डा. या वैद्य यही उपाय बतलाता है की उसे अधिक मेहनत करने के लिए उत्साहित करो। उसे अधिक से अधिक घुमाओ। प्रकृति के पास ले जाओ। जितना ये बाहर अधिक चलेगा उतना ही अधिक इनका मन जीवंत रहेगा। इनके अंदर मृत्युवेषणा अधिक गहराई मैं जन्म लेने लग जाती है। जीवेषणा से ये लोग थक जाते है। एक उमंग एक उत्साह सब इनका खत्म हो जाता है।

बाकी आप समझदार है। आप अगर सोम प्रकाश के साथ ही रहे तो तुम दोनों का जीवन अभूतपूर्व सौंदर्य से लवरेज होगा। आपके जीवन में हजारों लाखों खुशियों के फूल खिलेंगे। क्यों? क्योंकि प्रकृति यही चाहती है। आप बस इतना समझना की मुझे माध्यम बनाया गया है। मेरे मुख से ये शब्द बुलवाये गए है। ज्योतिष कुछ भी नहीं मात्र प्रकृति के पदचाप को पहचानना। अब आप के उपर है, आप उसे किस तरह से चिंहित करते है। किस तरह से उसकी उसकी व्याख्या करते है। किस मार्ग को दिखते है या चलते है या केवल लालच में किसे मार्ग से भटक और भटका जाते है। बेटा मेरी तो राय यही है कि आप जब इतनी दूर से सोम प्रकाश की बीमारी के लिए यहां तक आई है। ये सब मैं देख रहा हूं, समझ रहा हूं। की आप कई महीनों से यहां पर रूकी हुई दिन रात उसकी सेवा कर रही है। तब ये आपका प्रेम है, एक पूजा है। भक्ति है, साधना है, ये आपके लिए तप है। जो कल सोम प्रकाश ने आपके लिए किया। आज आप कर रही है। आपकी बीमारी में और सोम प्रकाश की बीमारी में एक सी समानता नहीं है। अगर आप दोनों एक दूसरे के लिए बने हो।

इस तरह की बात सून कर नेहा लता की आंखों से झर-झर आंसू गिर रहे है। वह जो कर रही थी, केवल एक अंजानी शक्ति के सहारे। उस सब करने में बस उसका कोई स्वार्थ नहीं था। यहीं तो प्रेम में भक्ति की पवित्रता प्रवेश कर जाती है। अचानक नेहा लता ने खडी हो कर उसने महात्मा के पैर छू कर कहां की आप मुझे शक्ति और आदर्शवादी दे की में इस मार्ग से न डिगूँ। नेहा लता को आज महात्मा से बात कर बहुत सुखद अहसास हो रहा था। वह जीवन के इस मोड़ पर खडी थी की निर्णय नहीं कर पा रही थी। की कहीं ये उसके मन की चाल बाजी तो नहीं। फिर माता पिता के दबाव उनकी चाहत के बारे में भी जानती थी। की वह इस बात को कभी नहीं मानेंगे। की उन की इकलौती लड़की किसी अंजान आदमी से हजारों मील दूर शादी करें। और वह किसी तरह अगर मान भी गए तो वह शायद यह चाहेंगे की सोम प्रकाश बम्बई आकर उनके साथ रहे। उनके साथ रहने की लिए वह उन्हें मना सकती है। क्योंकि जो आज मेरा है वह सब उसका ही तो होगा। परंतु नानी का क्या? नानी के रहते वह कभी सोच भी नहीं सकती की सोम प्रकाश ऐसा करें।

परंतु वह इतने दिनों से अपने मन को तैयार कर रही थी। की कही मेरे कारण सोम प्रकाश या नानी का जीवन तो खराब नहीं होगा। जीवन की पगडंडी जब दूसरे मार्ग पर जाकर मिलती है तो वहां पर कांटे पत्थर नहीं होने चाहिए। वरना तो आप अपने कारण उस मार्ग को भी दूषित कर रहे है। परंतु आज महात्मा जी ने जिस सरलता और सहजता से उसे मार्ग दर्शन किया है। उन बातों ने उसकी आंखें खोल दी है। इस सब के बाद उसके लिए आगे का निर्णय लेना सरल और सहज हो गया है। अब उसके अंदर एक साहास एक हिम्मत आ गई है। सच्चाई का सामना करने के लिए। परंतु माता पिता से इतनी सरलता से कहना अभद्रता होगी। पहले सोम प्रकाश को ठीक होने दो समय पाकर सब ठीक हो जायेगा। ऐसी उम्मीद अब नेहा लता को लग रही थी। वह सोच रही थी क्या मैं वही नेहा लता थी, जिसके जीवन को कोई लक्ष्य नहीं था? हम शिक्षा संस्थानों में क्या सिखाते है। जो शिक्षा संस्कार तक नहीं दे सकती उस शिक्षा का जीवन में क्या महत्व हो सकता है।

अब उसके मन में कहीं उस दुर्घटना के प्रति धन्यवाद का भाव बार-बार उभर कर आ रहा था। की वह उसके लिए एक सीढ़ी बन गई। नहीं तो कल तक वह जो जीवन जी रही थी वह भी कोई जीवन था। इस जीवन की उसके मन में कोई धारण या सम्मान था। बस एक तिनके की तरह जहां लहर ले जा रही है। बहते रहो और एक दिन और उसने प्रकृति को धन्यवाद दिया की आप ने मेरे लिए जो किया मैं उसकी आभारी हूं। मुझ से अगर कोई भूल हो गई तो मुझे माफ कर देना। क्योंकि मैं उस समय ना समझ थी। मेरा मन केवल एक स्वार्थी की तरह जी रहा था। क्या उन यार दोस्तों के साथ वह उस तरह का जीवन आज जी सकती है। और वह मन में एक उमंग एक खुशी ले कर बहार आई। बाहर नानी उसका इंतजार कर रही थी। नानी ने उसकी और देख कर कहा बेटा सब ठीक है न। महात्मा जी क्या कह रहे थे। और हरि प्रसाद भी ये सब जानने के लिए उसके कंधों पर पैर रख कर पूछना चाह रहे थे की मुझे भी पता लगना चाहिए। और नेहा लता ने हंसते हुए कहा की दादा जी आप को तो सब पहले से ही पता है। हमें बतलाने की जरूरत नहीं है। आप अपना काम करें और मेरी आँख सूंध कर ज्ञान प्राप्त करें। तब हरी प्रसाद जोर से भोंका की हमारा मजाक उड़ान गलत है। और उसके इस भोंकने से वहाँ का वातावरण हल्का हो गया।

नेहा लता ने नानी का हाथ पकड़ते हुए कहां की महात्मा जी कह रहे है, कि सोम प्रकाश एक दम से ठीक है। आप को घबराने की जरूरत नहीं है। परंतु......। परंतु वह कह रहे थे की मैं अगर उसे छोड़ कर चली गई तो वह दोबारा उस हालत में चले जायेगे। अगर ऐसा हो गया तो उन्हें फिर कोई भी दोबारा ठीक नहीं कर सकेगा। नानी ने नेहा लता को अपने सीने से लगा लिया। और नेहा लता फूट पड़ी मैं आप दोनों को छोड़ कर नहीं जाना चाहती। नानीजी अब मैं आप लोगों के बिना नहीं जी सकती। तब नानी ने कहां की ये तो हमार सौभाग्य है। तुम जैसी सुशील, सुंदर, सरल, हमारे घर आँगन की देवी बने। बेटा तुम तो अपने मुख से कह भी सकती हो। हमारे पास तो ऐसी जबान भी नहीं है की इन शब्दों को अपनी जबान पर लाये। परंतु इतना कहती हूं की तुम्हें जीवन में इतना प्यार और अपना पन इस घर पर मिलेगा वह और कहीं नहीं। परंतु सुख सुविधा की मैं बात कर नहीं सकती।

नानी अगर मुझे सुख सुविधा से ही लगवा होता तो आप के पास क्यों आती। तब नानी ने कहां हां बेटी ये तो मैं जानती हूं। परंतु इतना विश्वास नहीं हो रहा की मेरा सोम प्रकाश इतना सौभाग्य शाली है। पिछले जन्म में उसने जरूर मोती बांटे होंगे या गंगा जी में जो बोए होगा। वह पुण्य आज उसके काम आ रहा है। ये नया जीवन जो उसे मिला है, आप की ही देन है। बातों में पता ही नहीं चला की श्याम ढलने वाली है। सोम प्रकाश स्नान आदि कर के नये कपड़े पहने कर एक साधक के साथ सामने आ खड़ा हुआ। हरि प्रसाद तो जाकर उसके ऐसे गले मिला मानो सदियों बाद मिल रहा है। पशु का ह्रदय भी कितना सरल होता है। वह अपने प्रेम को किस पूर्णता से विस्तरित करता है। ये सब देखते ही बनता है। सोम प्रकाश ने उसके सर पर उसकी पीठ पर हाथ फेरा और उसके साथ खेलने लग गए। हरि प्रसाद तो पहले से ही तैयार था सारा दिन बैठे-बैठे बोर हो रहा था। परंतु वहां अधिक भाग दौड़ करने की जगह नहीं थी। इसलिए नानी ने कहां की सोम प्रकाश रहने दो इस पागल को चोट लग जायेगी ये तुम्हें देखकर अपना आपा खो कर पागल हो जाता है। और कितनी मुश्किल से हरि प्रसाद को सोम प्रकाश ने शांत किया । वह जीभ निकाल का अपनी थकान मिटा रहा था। अंदर नेहा लता दवा आदि लेने और समझने के लिए गई थी। अब अधिक दवा नहीं दी थी बस एक पूड़ियां जो रोज सुबह घूमने के बाद गर्म पानी के साथ लेनी है। और एक रात को सोत हुए। बस घूमने के लिए जरूर हिदायत दी है, उसे लगा तार जारी रखे। जितना ज्यादा चलेगे। तो उतना ही अधिक दवा खून में मिल कर आक्सीजन के साथ मस्तिष्क को प्रभावित करेगी।

और फिर वह तीनों घर की और चल दिये। कुछ दूर तक एक साधक उन्हें छोड़ने के लिए आया। क्यों एक तो इस समय पानी अधिक था। फिर वह लकड़ी का पुल भी जरा अधिक मजबूत नहीं था। इसलिए बड़ी ही सरलता से सहजता से उसे पार करना होता था।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें