क्या तेरा क्या मेरा-पांचवां प्रवचन
सूत्र :
रे यामै क्या मेरा क्या तेरा।
लाज न मरहिं कहत घर मेरा।।
चारि पहर निसि भोरा, जैसे तरवर
पंखि बसेरा।
जैसे बनिए हाट पसारा, सब जग कासो
सिरजनहारा।।
ये ले जारे वे ले गाड़े, इन दुखिइनि
दोेऊ घर छाड़े।
कहत कबीर सुनहु रे लोई, हम तुम्ह
विनसि रहेगा सोई।।
मन तू पार उतर कहं जैहौं।
आगे पंथी पंथ न कोई, कूच-मुकाम न
पैहों।।
नहिं तहं नीर नाव नहिं खेवट, ना
गुन खैंचनहारा।
धरती-गगन-कल्प कछु नाहीं, ना कुछ वार न
पारा।।
नहिं तन नहिं मन, नहीं अपनपौं,
सुन्न में सुद्ध न पैहौ।
बलीवान होय पैठो घट में, वाहीं ठौंरें
होइहौ।।
बार हि बार विचार देख मन, अन्त कहूं मत
जैहो।
कहै कबीर सब छाड़ि कल्पना, ज्यों के
त्यों ठहरैहौ।।








