(सदमा - उपन्यास)
नेहा
लता के माता पिता को ऊटी तक पहुंचे-पहुंचे दिन के चार बज गए। तब उन्होंने शहर के
होटल में कमरा ले लिया। पेंटल ने श्री जे. के. मल्होत्रा जी को कहा अगर आप कहे तो
मैं तो अब सोम प्रकाश के पास चला जाता हूं, उन्हें हमारे
आने खबर भी हो जायेगी। तब श्री जे. के. मल्होत्रा ने कहां की नहीं रहने दो इतना तो
थक कर आये हो हजारों मील चलकर अब नाहक परेशान होगे। आप हमारे साथ वाले कमरे में ही
रहो। तब उन्होंने दो कमरे बूक कर लिए। पेंटल ने कहां की एक काम तो कर लेते है। सोम
प्रकाश को तो सूचना नहीं दे सकते परंतु सोनी को तो दी ही जा सकता है। तब श्री जे.
के. मल्होत्रा ने रिसेप्शन को एक नम्बर दिया की आप उन्हें एक फोन करना है। रिसेप्शन
पर बैठ बाय ने फोन मिला वहाँ से किसी पुरूष की आवाज आई और बाय ने कहां की बम्बई से
कोई आप से बात करना चाहता है। ये सोनी के पति थे श्री
देवधर करकरे जी। नमस्कार आदि होने पर श्री जे. के. मल्होत्रा ने कहां की मैं
नेहा लता का पिता बोल रहा हूं। हम यहां ऊटी पहुंच गए है। और एक होटल ब्लू रोज में
कमरा भी ले लिया है। आप कृपा कर सुबह सोम प्रकाश और नेहा लता को संदेश पहुंचा
देंगे। तब श्री देवधर करकरे ने नाराजगी के अंदाज में कहां की आप भी कमाल करते है।
इतना बड़ा घर पड़ा है और आप होटल में कमरा ले कर रह रहे है।
मैं आप से नाराज हूं, आप ने ये ठीक नहीं किया। तब माफी के अंदाज में श्री जे. के. मल्होत्रा जी ने कहां की मेरे साथ मेरी पत्नी और एक और व्यक्ति भी है जिनको शायद आप जानते होगे वह पेंटल जी भी। तब श्री देवधर करकरे ने कहां की वह तो सोम प्रकाश का मित्र है। वह तो घर का ही आदमी है उस से क्या पर्दा करना। कल आप होटल का कमरा खाली कर के यहां आ जाना। तब हां हूं कर के किसी तरह से जे. के. मल्होत्रा जी ने अपनी जान छुड़ाई।
और वह अपनी पत्नी को कह रहे थे, की वह नाराज हो रहे थे की आप हमारे यहां क्यों नहीं रूके। अब भला बिना किसी परिचय के किसी के घर में ऐसे तो कोई जाकर घूस जाता है। अरे भले मानस कम से कम कोई मुंह मुलाहजा या बात चित हो तो फिर भी। परंतु जे. के. मल्होत्रा जी जानते थे की नेहा लता की मम्मी इस बात के लिए कभी राज़ी नहीं होगी।और तीनों ने कमरे
में जाकर पहले स्नान किया और फिर नीचे खान खाने के आ गए। सुबह से किसी ने कुछ खास
नहीं खाया था। नहाने से मन को कुछ अच्छा लग रहा था और भूख भी लगती थी। सो तीनों ने
भोजन किया और कमरे में चले गए। सुबह तीनों की कुछ देर से ही आँख खुली,
श्री जे. के. मल्होत्रा जी ने देखा तो पत्नी अभी तक सो रही थी। उठाने
से पता चला की उनका सारा बदन दर्द से चूर-चूर हो गया है। गाड़ी के हिचकोले
खाते-खाते शरीर में बट पड़ गए थे। तब उन्होंने चाय का आर्डर दिया दो सेट चाय के
मंगवाए सोचा पेंटल भी यहीं हमारे साथ बैठ कर पी लेंगे फिर आगे का प्रोग्राम बनाते
है। पेंटल जी भी उठ गए थे, सोच रहे थे की न जाने जे. के.
मल्होत्रा जी उठे है या नहीं। और जब जे. के. मल्होत्रा जी ने उनकी घंटी बजाई तो वह
एक दम से तैयार थे। ये देख कर जे. के. मल्होत्रा जी को अचरज हुआ की आप कहां जा रहे
है। सोचा आप पता नहीं उठे है या नहीं। इतनी देर में वेटर चाय ले कर आ गया। श्री मति राजेश्वरी मल्होत्रा भी जल्दी से उठ कर तैयार
हो रही थी। तब सब बैठ कर चाय पीने लग गये। इतनी देर में होटल की रिसेप्शन से फोन
आया की साहब आपके लिए गाड़ी आ गई है। और ड्राइवर आप का इंतजार कर रहा है। इस बात
से जे. के. मल्होत्रा जी का बहुत आश्चर्य हुआ और अंदर से खुशी भी हुई। की उनका कोई
इतना ख्याल रख रहा है। तीनों चाय पीने के बाद नीचे आ गये। पेंटल सोनी के ड्राइवर
राम दास को जानता था। उसने आगे बढ़ कर सब को नमस्ते की और आगे-आगे चल दिया।
नानी का घर शहर से
कोई खास दूर नहीं था मुश्किल से चार पाँच किलो मीटर रहा होगा। अच्छा हुआ की
ड्राइवर आ गया नहीं तो टैक्सी वाला न जाने कितनी नखरे दिखता। दस-पंद्रह मिनट में
ही तीनों सोम प्रकाश के घर पहुंच गए। एक बार पहले भी यहां जे. के. मल्होत्रा जी आ
चूके थे, परंतु तब का आना और अब के आने में दिन रात का भेद है। आज उनकी बेटी उस घर
में रह रही है, अपनी खुशी से। और तब उसे खोजते हुए डरे सहमें
से आये थे। की पता नहीं वहां है या नहीं। परंतु गाड़ी से उतर कर श्री मति
राजेश्वरी मल्होत्रा को कुछ अजीब सा लग रहा था। ये बात श्री जे. के. मल्होत्रा जी
अपनी बीबी का स्वभाव जानते थे। तब उसका हाथ दबा कर कुछ इशारा किया की तुम ज्यादा
बात मत करना।
सोम प्रकाश जी तो
तैयार हो कर स्कूल चले गए थे। वैसे भी वह उन लोगों से मुलाकात नहीं करना चाहता था।
उसके अंदर रात से ही एक भय भर गया था। की न जाने वे लोग उसके बारे में क्या
सोचेगें। फिर ये बात नेहा लता को ठीक ही लगी की ये स्कूल चले जाये तो अच्छा होगा।
मम्मी पता नहीं क्या बात कर दे और इनका मन अभी कच्ची मिट्टी के समान है उसे फिर
ठेस न लग जाये। कहीं ये भयभीत न हो जाये। लॉन में कुर्सियां बिछा रखी थी, सब जाकर वहां बैठ गए। इतनी देर में जंगल की और से श्री हरि प्रसाद जी अपनी
डुयुटी निभाते भौंकते हुए घर में प्रवेश किया की न जाने इतने अंजान आदमी कौन घर
में घूस आये है। अब बेचारे हरि प्रसाद की अपनी सोच है। उसकी तो ये डुयुटी है। तब
उसने पेंटल को देखा तो वह कुछ शांत हुआ परंतु श्री मति राजेश्वरी मल्होत्रा उस से
बहुत डर रही थी। की इस दूर करो। परंतु वह तो अपना पूरा लाड़ प्यार सब पर उडेल रहा
था। चाहे आप लो या डरो इस से हरि प्रसाद को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। नेहा लता और
नानी जी एक साथ अंदर से बाहर आई। नेहा लता अपनी मम्मी को देख कर उसके गले लग गई और
रोने लगी। ये रोना दूख का नहीं था परंतु ये एक खुशी थी, जो
अपने को सामने देख की अपने बाँध तोड़ कर बह जाना चाहती थी।
श्री मति राजेश्वरी
मल्होत्रा बेटी का ये हाल देख कर घबरा गई। परंतु श्री जे. के. मल्होत्रा जी उसके
चेहरे पर उसकी आंखों से बहते आंसुओं में एक खुशी को देख रहे थे। अचानक श्री मति
मल्होत्रा बोल उठी की बेटी तू यहां कैसे रहती होगी मैं तो एक दिन भी यहां नहीं रह
सकती। इस बार नेहा लता ने नानी की और देखा। और वह एक शब्द भी नहीं बोल पाई वह इस बात
को आगे बढ़ाना नहीं चाहती थी। क्या अच्छा लग रहा है या क्या गलत लग रहा है। ये
नेहा लता को लग रहा है। ये उनकी मम्मी की सोच है,
उसे बदलने में नाहक मन मुटाव ही पैदा होगा। नानी ने सब को प्रणाम किया और पास ही
एक खाली कुर्सी पर बैठ गई। वह बेचारी क्या बोल सकती थी। इतने बड़े लोग और ये तो उनकी
बेटी ही अपना निर्णय बतला सकती थी। वह तो कभी सोच भी नहीं सकती थी।
तब श्री जे. के.
मल्होत्रा जी ने कहां की सोम प्रकाश कहां है। तब नेहा लता ने कहां की वह अब स्कूल
में पढ़ाने के लिए जाने लगे है। ये बात पेंटल को सून कर अचरज हो रहा था। और अंदर
एक खुशी भी कि उसके दोस्त की ऐसी हालत हो गई है की वह अकेला स्कूल जा कर कक्षा में
बच्चों को पढ़ा सकता है। कुछ महीने पहले जब वह यहां पर था तो इस बात की कल्पना तक
नहीं की जा सकती थी। बस इतनी उम्मीद थी की ये किसी तरह से अपना काम खूद कर ले।
परंतु ये तो चमत्कार है। पेंटल ने नेहा लता की और देखते हुए कहां की ये सब आपका
चमत्कार है। आप के संग रहने के कारण सोम प्रकाश की इस हालत में इस तेजी से ये सुधार
हो रहा है। तब तो नेहा लता की मम्मी श्री मति राजेश्वरी मल्होत्रा ने नानी को कहां
की ये तो अच्छी बात है। नेहा ने जो बीड़ा उठाया था उसे पूरा कर दिया है। अब हम इसे
घर ले जा सकते है। नानी बेचारी क्या बोल सकती थी। कि तुम मत ले कर जाओ ये निर्णय
तो उन मां बेटियों के बीच का उस का तो कोई अधिकार भी नहीं है।
नेहा लता ने अपनी
मम्मी की बात को काटते हुए कहां की अब ये समय इन बातों का नहीं है। आराम से बैठ कर
दूसरी बाते कर सकते है। फिर मुझे यहां कोई दूख असुविधा तो है नहीं। देख रही हो
मेरा चेहरा मेरा शरीर या मन यहां रह कर कितना तरो ताजा हो गया है। मैं तो कहती हूं
आप भी मम्मी यहां रह लो नाहक धुएं के चैंबर में बम्बई में घूट रही हो। तब श्री मति
राजेश्वरी मल्होत्रा ने कहां की ऐसी जगह एक दो दिन मात्र सेर सपाटे के लिए रहा जा
सकता है। हमेशा तो मैं यहां बीमार हो जाऊंगी। क्योंकि यहां की ठंड और नमी मेरी लिए
ठीक नहीं है। तब नेहा लता ने कहां की आप क्या पीएंगे चाय या काफी। तब श्री जे. के.
मल्होत्रा जी ने कहां की अभी चाय पीकर ही तो होटल से चले थे।
अब कैसी हालत है सोम
प्रकाश की वैद्य जी ने क्या कहां है। सुधार तो बहुत है परंतु इस तरह की बीमारी में
एक तो समय लगता है। दूसरा ये बीमारी इस तरह से होती है जैसे आप पहाड़ पर चढ़ रहे
हो। और आप चाहे पहुंचने वाले हो अगर आप का पैर वहां से फिसल गया तो आप का बीच में
रूक जाना एक चमत्कार ही समझो वरना तो नीचे आपको खाई में ही पहुंच कर दम मिलेगा। बस
आप जब तक उपर पूर्ण रूप से पहुंच कर ये मान या जान नहीं लेते की हम समतल धरा पर आ गए
है। तब तक आप ठीक नहीं है चाहे आप कितनी ही ठीक हो।
श्री जे. के. मल्होत्रा—तब
तो ये बीमारी काफी लम्बी चलने वाली है। एक बार इस विषय में वैद्य जी से भी बात कि
जा सकती है। परंतु बेटा जब यह दवा से आराम हो रहा है। और एक बार मरीज ठीक हो रहा
है। तो अब आप के यहां रहने की क्या जरूरत है। जब गाड़ी को एक बार धक्का लगा कर
स्टार्ट कर दिया तो फिर बार-बार हमेशा धक्के की जरूरत नहीं होती।
नेहा लता—पापा जी
आप जितना आसान इस काम समझ रहे है उतना आसान है नहीं। मैं आप लोगों को दूखी करना
नहीं चाहती थी, इसी लिए कुछ और समय चाहती थी। परंतु
क्या करूं आप लोगों ने बात ही ऐसे उठा दी मैं अब चुप नहीं रह सकती। और वह कुछ देर
चुप रह कर अंदर से अपने को तैयार करने लगी। मैं नजदीक से सोम प्रकाश को जानती हूं,
इतने दिनों से सब देखा भी है। आप ये तो मानते है की मेरे अंदर अपना
भला बुरा समझने की अक्ल है। और मैं कुछ अपने भविष्य का चिंतन भी कर सकती हूं। यहां
आने से पहले जो मेरा जीवन था और उस दुर्घटना के बाद जो मेरा जीवन हुआ है उस
परिवर्तन को मैं उस अहसास को महसूस कर रही हूं।
श्री
मति राजेश्वरी मल्होत्रा— ने कुछ नाराजगी के अंदाज
में कहां की तू किस तरह की बाते कर रही है। ये बाते तो किताबों में और फिल्मों में
ही अच्छी लगती है। भला जीवन में इस तरह कोई जी सकता है। पता है तेरा लालन पालन
कैसे हुआ है। क्या तुम इस जंगल में बिना सुविधा के जी सकेगी। और फिर तुने अपना
कार्य किया हमने तो तुझे मना नहीं किया फिर अब ये कैसा राग गा रही है। हम इस बात
के लिए कभी तैयार नहीं होंगे।
नेहा लता ने सोचा
की चलों सबसे अच्छी बात है सोम प्रकाश की वह हमारे बीच में नहीं है। फिर बात को
तुल देने से क्या लाभ। जो कहना सुनना है। हम सब परिवार के ही तो आदमी है। न तो
पेंटल जी से कोई बात छुपी है। और नानी तो बेचारी बोल भी क्या सकती है। तभी नेहा
लता ने पेंटल की और देख कर कहां पेंटल भैया आप जाकर ड्राइवर राम लाल को कह दो की
आप चले जाये यहां मम्मी-पापा अभी रूकने वाले है। दोपहर का खाना खाकर ही इधर से जायेगे।
तब राम लाल ने पेंटल को कहा की सोनी दीदी तो कह रही आज आप सब का खाना उनके यहां
है। तब पेंटल ने कहां की आप उन्हें मना कर देना।
नेहा लता—मम्मी यहां पर कोई भी गैर नहीं है। इसलिए आज सारी बात जब आप ने उठा ही दी
है तो उसे खुल कर लेते हे। मैंने इतने दिनों में महसूस किया है की बिना सोम प्रकाश
के मेरा जीवन अधूरा है। इसके कारण अकारण को में न तो खूद समझती हूं और न ही आप को
समझा सकती हूं। पहले जब मैं यहां आई थी तो एक बोझ लेकर आई थी की मेरे कारण किसी का
जीवन नर्क हो गया है। एक मात्र भूल सुधारने के लिए। परंतु यहां आने पर मुझे जीवन
का दूसरा ही पहलू नजर आने लगा। आप के सामने हूं मुझे आप देख रहे है वो सब। मुझे
कोई बहका नहीं रहा है। आपके सामने नानी चुप बैठी है। उन्होंने एक शब्द भी नहीं
बोला। और अगर मैं यहां न रहने का फैसला करती हूं तो ये कभी मुझे मनाने की कोशिश
नहीं करेगी। इन्होंने अपने जीवन को गहरे से जाना है। अपने जीवन के उतार चढ़ाव को
देखा है। पापा जी आप तो समझ सकते हे। मैं आप लोगों से हाथ जोड़ कर निवेदन करती हूं
आप मुझे समझे मैं आपको अपना ह्रदय चीर कर दिखा नहीं सकती। अब बेचारे जे. के.
मल्होत्रा जी तो क्या बोलते।
परंतु श्री मति
राजेश्वरी मल्होत्रा को बहुत क्रोध आ रहा था। इसका कारण मनुष्य के साथ ये भी होता
है कि वह जो सोचकर आया होता है, वह एक दम से विपरीत
मिलता है। तब वह केवल क्रोध कर सकता है। उसके समझने की ताकत क्रोध में बदल जाती
है।
श्री मति राजेश्वरी
मल्होत्रा—देखो बेटी तुम हमारी अकेली औलाद हो हमने
तेरे लिए क्या-क्या सपने सजोए थे। क्या-क्या अरमान पाले थे। और तु हो की एक दम से
जौगन की तरह से बात कर रही है। ये हमारी गलती थी, तुझे यहां
आने ही नहीं देना चाहिए था। ये हमारी सबसे बड़ी भूल हो गई। मैं तो इन्हें पहले ही
मना कर रही थी, की इसे मत भेजो एक बीमार आदमी के संग ये भी बीमार
हो जायेगी। और देखो इस का दिमाग खराब हो गया है। तू क्या सोच रही है हजारों मील चल
कर हम तेरे पास तेरी ये बकवास सुनने के लिए आये है। एक बात को कान खोल कर सून ले
की अगर तू हमारी बात नहीं मानती तो हमेशा के लिए......और जे. के. मल्होत्रा ने
उनकी बात को बीच में काट दिया।
जे. के. मल्होत्रा—बेटी तेरी मम्मी को स्वभाव तो तु जानती है। उसे जरा सी बात
पर गुस्सा आ जाता है। हम आराम से बैठ कर इस पर बात कर लेंगे। लेकिन श्री मति
मल्होत्रा जी कहां किसी की बात सुनने वाली थी।
श्री मति मल्होत्रा
जी— ने कहां की आप इसे समझाते क्यों नहीं और उसकी बात में बात मिला रहे है। मुझे
नहीं करनी और कोई बात ये तो पागल हो गई। इस जो करना है करने दो। बाद में फिर मुझे
आकर मत दोष देना। इश्क का भूत सर पर चढ़ा है। आगे पीछे का पता नहीं है। चार दिन
में दल रोटी का भाव याद आ जायेगा। बेटी जीवन इतना आसान नहीं है,
अभी तू ने जीवन संघर्ष को देखा नहीं है।
नेहा लता—मम्मी मैं आप से बहस करना नहीं चाहती, आप मेरी माता
है। आपने मेरे को जन्म दिया है, आपके और पापा के बिना जन्म
तो मुझे मिल जाता परंतु ये तन तो आप दोनों की देन है। ये आप दोनों का ऋण तन और मन
जिस आप संस्कार भी कह सकते है। अगर मनुष्य चाह कर भी उस ऋण को वह इसे उतर नहीं
सकता। परंतु आप इतनी कठोर मत बनो एक बार ठंडे दिमाग से भी सोचो की ये बाते जो में
कह रही हूं की भाव ये दबाव या किसी वासना में लिप्त हो कर कहा रही हूं। नहीं मम्मी
मैं आप से हाथ जोड़ कर आपके पैर पकड़ कर भीख मांगती हूं, की
आप मेरी बात को कुछ ठंडे दिमाग से सोचो। इस जीवन से पहले भी कुछ था और इस जीवन के
बाद भी कुछ रहेगा। जब एक धूल का कण तक इस ब्रह्मांड में मिट नहीं सकता तो कर्म का
भी तो एक सिद्धांत है। आप मम्मी-पापा जरा मेरी बात को समझे। और इतना कहते-कहते
नेहा लता फफक कर रो पड़ी।
तब नानी ने उठ कर
उसे कहां न बेटी इतना दूख महसूस मत कर ये तुम्हारे माता पिता है। तेरी हर बात को
समझ सकते है। तुझे इन पर भरोसा करना चाहिए। ये सब देख कर श्रीमति मल्होत्रा जी का
क्रोध भी कम हुआ। और इसी बीच पेंटल जी ने कहां की अब काफी देर हो गई एक-एक कप चाय
पीते है। मैं अपने हाथ से बना कर लाता हूं, तब तक आप
बात करें। और नेहा लता को एक गिलास पानी पीने के को दिया। जिसे पी लेने के बाद
उसकी सुबकिया कुछ कम हुई।
तब मल्होत्रा जी ने
कहां की इस बात को आराम से बैठ कर सोच सकते है। ये क्या आपने तो आते ही अपनी लड़की
पर मार लट्ठ बाजी शुरू कर दी। और वह खड़े हो कर अपनी बेटी को गले लगाया। जो उनके अंदर
दर्द जमा था वह पिता के सीने से लग कर फूट पड़ा। और वह जौर-जौर से रोने लगी। नानी
ने भी सोचा की पिता-बेटी का प्रेम है, इन के बीच
में आना या बोलना गलत ही होगा। फिर भी नानी को अच्छा लग रहा था की नेहा लता को
उसके पिता समझते है। वरना तो अकसर उलटा ही होता है। मां बेटी को अधिक समझती है और
पिता क्रोधी होते है।
नानी ने श्री मति
मल्होत्रा का हाथ पकड़ कर कहां की नेहा लता आपकी ही नहीं मेरी भी बेटी है। इतने से
दिनों में इसने मुझे जो प्रेम और अपना पन दिया है वह तो पेट से जाई अपनी बेटी भी
नहीं दे सकती। आपने जो बेटी पैदा ही की है वह कोई साधारण नहीं है। करोड़ों में
किसी को ऐसी सन्तान मिलती है। आप इसके कार्य को देखो क्या कोई इस कार्य के विषय
में सोच भी सकता था। जो ये अपने ह्रदय से कर रही है। तब श्री मति मल्होत्रा को
अपनी गलती का अहसास हुआ। और उन का गुस्सा कुछ कम हुआ। और नानी के सामने उन्होंने
अपनी आंखें नीची कर ली।
तब यहीं निर्णय
लिया गया की अब तो आराम से सब यही रूखा सूखा जो बना है उसे खा लेंगे। और कल सब लोग
आराम से बैठ कर बात करेंगे। एक बात नानी ने और कही की बात करने से पहले आप अगर एक
बार उन महात्मा जी से मिल लेते तो बहुत अच्छा होता। सो निर्णय लिया गया की कल उन
महात्मा जी के पास जाकर ही इस विषय पर इस बात पर चर्चा करेंगे। आज यहां का माहोल
बहुत भारी हो गया है। इसे हल्का करने की श्री मति मल्होत्रा और मल्होत्रा जी को मन
मार कर खाना खोने के लिए राज़ी होना ही पड़ा। नहीं तो बात और अधिक खराब हो जाती।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें