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रविवार, 16 अगस्त 2026

44 - एक प्रेम प्रीत कि पाती -- (कविता) - ओशो की मधुशाला

44 -एक प्रेम प्रीत कि पाती - (कविता) - मनसा-मोहनी 

बहता जीवन पल-पल उत्‍सव

कल-कल बहता झरना बन।

कुछ मधुर राग किन्‍हीं छंदों में

कानों में आकर कर गुन-गुन।

 

देखो मेरे तुम उत्‍सव को

नित खेल खेलता अठखेली।

वह नहीं पकड़ता दीवारें

बह नहीं बाँधता बंधन बेड़ी।

 

नित रूप बदलता जाता है

जीवन के काल चक्र पर वो।

वह नहीं देखता मुड़कर कल

वह कहां सिमटना चाहता है।

 

किसी तट बंध की दीवारों में

जो उसको अविरल रोक सके।

वह मुक्‍त हास सा खिलता है

जीवन की पल-पल धारो में।

 

जो छवि बाँधती है हमको

बन परिचित के आकारों में।

वो बंधन कितना मधुर सही

फिर भी तो वो इक बंधन है।

 

है लगा पंख उड़ना मुझको

किन्‍हीं अतल भरी गहराइयों में।

एक रूप छवि के पार कहीं

नित बनते बिगड़ते देखा है।

 

हम किसको अपना माने अब

ये रुकना मृत्यु तुल्य है।

नित बहना जीवन जीवित है

मिटने दो रूप की छवियों को।

 

बस काल-गर्ल के ग्रभों में

वहां अविरल सा कुछ बहता है।

मैं रोक नहीं पाता उसको

नित वह तो छिटकता जाता है।

 

तुम देखो आँखों में मेरी।

कोई आस बंधी है सांस मेरी।

इस साध भरे इस जीवन का

कोई छू लू मूक रहस्य एक।

 

प्राणों का स्पन्दन बन कर वो

इन दूर भटकते सपनों को।

एक प्रेम प्रीत की बाती बन

एक स्‍वेत धवल बादल कर दो

 

कानों में मूक कोई शब्‍द दे दो

सूखे प्राणों में जीवन भर दो।

एक प्रीत प्‍यार की सरिता तुम

कल-कल कलरव का बन विहंगम।

 

उस शब्‍द गान का मौन करो

जो आकर मुझे जगा जाये

स्वयं अपने पर हम आ जाये

वो खुद अपना ही हो जाये।

 

रटते-रटते रैन गुजर गई

भौर का तारा चमक उठा

ये पागल नित तड़पता रहता

और कहता है मुझको झूठा

 

रात की नीरव बेला में

हम तेरी छवि ही पाते है

याद तुम्हारी आती है

पर तुम कहां आ पाते हो।

 

बहता जीवन पल-पल उत्‍सव

कल-कल बहता झरना बन।

कुछ मधुर राग किन्‍हीं छंदों में

कानों में आकर कर गुन-गुन।


 

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