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सोमवार, 17 अगस्त 2026

45 - दूज का चाँद — ( कविता ) - ओशो की मधुशाला

45 - दूज का चाँद—  ( कविता ) - मनसा-मोहनी दसघरा 

बैठा है दूज का चाँद

आसमान पर सुबह-सुबह

घुटने मोड़ कर

एक छुई मुई प्रेमिका की तरह

शायद वो कर रह है इंतजार

किसी पूर्णिमा के आने का

परन्तु वो कितना पूर्ण लगता है

एक अधूरा मुख ले कर भी

उस मुखौटे के पीछे से दिखता है

उसका वह श्यामल रंग

जो झलकाता है उसके होने के भाव को

और हम है कि चढ़ाये बैठे है

अपने मुख पर रंगदार मुखौटे

कोई सोने का, कोई चाँदी का

कोई पद का, कोई नाम का

ये सब है अहं के ही रूप

देखने में चाहे वो लगे सुंदर 

फिर भी वे है बहुत कुरूप

क्योंकि वह थोथे है

और दंभ भरे है

अहं और मद और पद की शराब में डूबे है

जिन्‍हें हमें रोज सजाना-रँगना पड़ता है

कही उनका असली रूप न झांक उठे।

और दिख जाये हमें हमारा होना.....

ओशो की मधुशाला 

(मनसा-मोहनी दसघरा )

 

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