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सोमवार, 14 सितंबर 2026

61 - तुम बन स्मृति ढक लेते हो—(कविता) - ओशो की मधुशाला

 61 - तुम बन स्मृति ढक लेते हो—(कविता) - मनसा-मोहनी 

तुम बन स्मृति ढक लेते हो,

मेरे होने के एक कुहासे को।

एक अपरिचित से अस्पृश्यता सी, रह-रह कर जब छू जाती है।

एक स्‍फटिक,प्रतिबिम्‍ब श्वेत पटल, दर्पण में आ कुछ कहती है।

हम ढूंढे तुम्‍हें उन छवियों मेंनित बनती और  बिगड़ती है ।

धुँधली राहे, अपरिचित-अंजान डगर, वो मूक खड़ी रह जीती है ।

वो रचे बसे मन के सपने भी, क्यों अब धुंधले होते जाते है।

तुम बन स्मृति ढक लेते हो

मेरे होने के एक कुहासे को।

 

मेरा होना कहां साथ  रहा,  न अहंकार भी पास रहा।

सुरमई चाँदनी  बैल में, कर अंधकार  उपहास   रहा।

जो अपना-अपना कहते थे, कोसों न उनका साथ रहा।

भय मुझे कहां सताता है, जब तेरा सर पर हाथ रहा।

तूम छू कर एक रहस्‍य को, क्‍यों जीवित कर जाते हो।

तुम बन स्मृति ढक लेते हो

मेरे होने के एक कुहासे को।

 

थमता न सांसों  का स्पंदन, हम घुट-घुट कर के पीते हे।

संकुचित रिश्तों की परिधि में,हम जड़वत हो कर जीते है।

जग कहता है जिसको  अमृत, वो विष के प्याले होते है।

टूटे बिखरे टुकड़ों से क्‍यों, पैबन्‍द  जीवन  का  सीते है।

था जीवन जिन प्यालों में भरा, अब वो भी रिसते दिखते है।

पलकों पे सोते  सपनों  को, तुम कब जीवित कर पाते हो।

तुम बन स्मृति ढक लेते हो

मेरे होने के एक कुहासे को।

 

जब तुम होते हो पास मेरे, कोई आकर मुझे जगाता है।

कितने तारों की छाती पर यूँ चाँद  दमकता  पाता है।

इक आस  पूछती रहती  है, क्‍यों  बैठ पपीहा गाता है।

उन्माद फैलता तृप्ति का, आलोकित करता  जाता है।

सुरमई चांदनी बेला में, तुम मधुरस बन छा जाते हो।

तुम बन स्मृति ढक लेते हो।

मेरे होने के एक कुहासे को।


(नोट- ये कविता मेरी प्रिय कविताओं में से एक है...इसे में कुछ सालों पहले एक प्रतियोगिता में भी भेजा था जिस में इसे तीसरा स्थान मिला था। सच जब भी इस कविता को पढ़ता हूं ये मेरे लिखे शब्द है ही नहीं न जाने कहां से उस पल उतर आये और मैंने इन्हें कलमवद कर दिया।)

मनसा-मोहनी दसघरा


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