कुल पेज दृश्य

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2014

अध्‍यात्‍म--उपनिषद--(ओशो) प्रवचन--5

वासना का नाश ही मोक्ष है—पांचवां प्रवचन


सूत्र :

अहंकारग्रहान्मुक्त: स्वरूपमुपपद्यते।
चंद्रवत्विमल: पूर्ण सदानन्द: स्वक्यंभ:।। 11।।
क्रियानाशाद्वेच्‍चिन्‍तानाशी तस्मद्धासनाक्षय:।
वासनाध्पक्षयोमोक्षः स जीवन्मुक्तिरिष्यते।। 12।।
सर्वत्र सर्वत: सर्व ब्रह्ममान्नावलोकनम्।
सद्भावभावनादाढद्वासनात्नश्यमनुते।। 13।।
प्रमादो च्छनिष्ठायां न कर्तव्य: कदाचन।
प्रमादो कृत्युरित्याहुर्विद्यायां ब्रह्मवादिनः।। 14।।
यथाsपकृष्ठं शैवालं क्षणमात्र न तिष्ठति।
आवृणोति तथा माया प्राज्ञा वाsपि परांगमुखम्।। 15।।

अहंकार को पकड़ने से मुक्त हुआ मनुष्य ही आत्म—स्वरूप को प्राप्त करता है, और फिर चंद्रमा जैसा निर्मल होकर, सदा आनंदरूप और स्वयं—प्रकाश बनता है।
क्रिया का नाश होने से चिंता का नाश होता है, और चिंता का नाश होने से वासना का नाश होता है। वासना—नाश ही मोक्ष है, और यही जीवमुक्ति कहलाती है।

सर्वत्र, सब तरफ, सबको केवल ब्रह्मरूप देखना—ऐसी सदभावना दृढ होने से वासना का नाश होता है।
ब्रह्मनिष्ठा में कभी प्रमाद न करना, क्योंकि यही मृत्यु है, ऐसा ब्रह्मवादी कहते हैं।
जिस प्रकार शैवाल को पानी से कुछ हटा भी दिया जाए तो भी वह पानी को बिना ढंके नहीं रहता, इसी प्रकार समझदार व्यक्ति भी ब्रह्मनिष्ठा से थोड़ा भी विमुख हो जाए तो माया फिर उसे लिप्त कर देती है।


स सूत्र में बहुत सी मूल्यवान बातें कही गई हैं। मूल्यवान ही न नहीं, मौलिक भी।
'अहंकार को पकडने से मुक्त हुआ मनुष्य ही आत्म—स्वरूप को प्राप्त होता है। '
बडी गहरी बात इसमें है।
अहंकार ने आपको नहीं पकडा हुआ है, आपने अहंकार को पकड़ा हुआ है। संसार ने आपको नहीं पकड़ा हुआ है, आपने संसार को पकडा हुआ है। दुख नहीं आपको जकड़े हैं, आपकी ही कृपा का फल है। दुख आपका पीछा नहीं कर रहे हैं, दुखों ने कुछ ठान नहीं रखी है आपको दुख देने की, आपके निमंत्रण पर ही आते हैं।
साधारणत: हम ऐसा सोचते नहीं। साधारणत: हम सोचते हैं, क्यों है दुख? क्यों है यह संसार का कष्ट? क्यों है यह आवागमन? क्यों यह अहंकार सताता है? कैसे इससे छुटकारा हो? निरंतर हमारे मन में यह बात चलती है, कैसे इससे छुटकारा हो? आप सबके मन में कभी न कभी यह प्रश्न उठता ही रहा होगा—अन्यथा यहौ आना असंभव था—कैसे इससे छुटकारा हो?
लेकिन यह सूत्र आपको बड़ा निराश करेगा। क्योंकि यह सूत्र कहता है, छुटकारे का सवाल ही नहीं है। क्योंकि अहंकार ने आपको पकडा नहीं है, संसार ने आपको रोका नहीं है, जन्मों ने आपको बुलाया नहीं है, यह आपकी मर्जी है।
इसलिए यह पूछना गलत है कि कैसे छुटकारा हो, यही पूछना उचित है कि किस भाति, किस तरकीब से हमने इस सब दुख, उपद्रव को पकड रखा है। छुटकारे का सवाल ही नहीं उठाना चाहिए। सवाल यही होना चाहिए कि कौन सी है हमारी व्यवस्था, कौन सा है हमारा ढंग, कि हम दुख को पकड़ लेते हैं, कि हम दुख को पकड़ते ही चले जाते हैं, कि अपने ही हाथ से हम आरोपित करते चले जाते हैं—और नए संसार, और नए जन्म, और नए जीवन। वासना के नए—नए विस्तार, नए आकाश हम कैसे निर्मित करते चले जाते हैं—इसे ही समझना जरूरी है।


इसके बहुत अंतर्निहित अर्थ होंगे। इसका एक अर्थ तो यह होगा कि मोक्ष कोई ऐसी उपलब्धि नहीं है जो पाने को है। संसार जरूर खोने को है, लेकिन मोक्ष पाने को नहीं है। अगर आप संसार को छोड़ने में राजी हो जाएं, तो मोक्ष पाया ही हुआ है। इसका यह अर्थ हुआ कि मुक्त तो आप हैं ही, बड़ी तरकीब से आप बंधन में पड़े हैं।
कभी अगर देखा हो, तोतों को पकड़ते हैं जंगलों में, रस्सी बाध देते हैं। तोता रस्सी पर बैठता है, वजन से उलटा लटक जाता है, रस्सी घूम जाती है। फिर तोता समझता है कि पकड़े गए। उलटा लटका तोता समझता है कि पकड़े गए, बुरी तरह फंसे! पैर फंस गया, अब निकलना मुश्किल है।
जोर से रस्सी को तोता ही पकड़े होता है, रस्सी बिलकुल पकड़े नहीं होती। लेकिन तोते का मानना भी ठीक है कि जिस रस्सी ने उलटा दिया, लटका दिया, जरूर पकड़े गए होंगे! वह लटका रहता है! वह हर तरह की कोशिश करता है कि सीधा हो जांऊ तो उड़ जाऊं, लेकिन सीधा वह हो नहीं सकता। सीधा होने का कोई उपाय नहीं है। रस्सी पर वह सीधा नहीं बैठ सकता। रस्सी है पतली और तोता है वजनी। वह कितने ही उपाय करे, बार—बार चक्कर खाकर नीचे लटक जाएगा। जितने उपाय करेगा, उतना भरोसा मजबूत होता जाएगा कि अब छूटना मुश्किल है।
अगर वह चाहे तो उसी क्षण छोड़ कर उड़ सकता है, लेकिन पहले वह सीधे होने की कोशिश करता है। उलटा ही अगर छोड़ दे तो अभी उड़ सकता है, क्योंकि रस्सी ने उसे पकड़ा नहीं है। लेकिन तोता कभी उलटा उडा नहीं है, जब भी उड़ा है सीधा बैठा है, तब उड़ा है। उड़ने की उसे एक ही तरकीब पता है कि पहले दो पैर पर सीधे बैठ जाओ, फिर उड़ जाओ। वह सोचता है कि उड़ने का कोई अनिवार्य संबंध दो पैर पर सीधे बैठने से है।
उलटा लटका हुआ तोता कैसे समझे कि मैं भी उड़ सकता हूं र अभी और यहीं! और कहीं भी मैं पकडा नहीं गया हूं। लेकिन उलटा लटके होने की वजह से यह भी उसे डर लगता है कि अगर छूट जाऊं, तो जमीन पर गिरूं, हड्डी—पसली चकनाचूर हो जाए! तो जोर से उस रस्सी को पकड़ता है। कितनी ही देर बाद उसको पकड़ने वाला आए, उसे पाएगा वहीं, वह वहीं लटका हुआ मिलेगा।
करीबकरीब आदमी की चेतना की स्थिति ऐसी है। किसी ने भी आपको पकड़ा नहीं है। किसको इसमें रस आएगा, आपको पकड़ने में! और इस जगत को कोई उत्सुकता नहीं है कि आपको पकड़े रखे। प्रयोजन भी क्या है? आपको पकड़ रखने से जगत को मिलता भी क्या है?
नहीं, किसी की कोई उत्सुकता आपको पकड़ रखने में नहीं है। आप पकड़े गए हैं, अपने ही द्वारा। कुछ भ्रांतियां हैं, जो आपको खयाल देती हैं कि मैं पकड़ा गया हूं। और बड़ी भांति तो यही है कि आप अपने को इतना मूल्‍यवान समझते है कि सारा जगत आपको पकड़ने को उत्सुक है। यह भी अहंकार है कि सारे दुख आपकी तरफ ही चले आ रहे हैं। इतने दुख! इतना ध्यान देते हैं आप पर! सारे नर्क आपके लिए निर्मित किए गए हैं! आपके लिए! आप केंद्र में बैठे हैं! जैसे यह सारे जगत की व्यवस्था आपके लिए चल रही है। और आप केवल रस्सी में लटके हुए एक तोते हैं!
पर यह भ्रांति होने के ठीक वैसे ही कारण हैं, जैसे तोते को हो जाते हैं।
आदमी का जैसे ही जन्म होता है, कई दुर्घटनाएं घट जाती हैं। अनिवार्य हैं, इसलिए घट जाती हैं। छोटा बच्चा पैदा होता है, तो आदमी का बच्चा बिलकुल असहाय पैदा होता है। ऐसा किसी पशु का बच्चा असहाय पैदा नहीं होता। जानवरों के बच्चे पैदा होते हैं और पैदा होते ही दौड़ने लगते हैं। पशुओं के बच्चे, पक्षियों के बच्चे पैदा होते हैं, पैदा होते ही अपने भोजन की तलाश में निकल जाते हैं। आपका बच्चा पैदा होगा, पच्चीस साल लगेंगे, तब भोजन की तलाश पर निकल पाएगा! पच्चीस साल!
आदमी का बच्चा सबसे कमजोर है। बायोलाजिस्ट कहते हैं कि कुछ भूल हो गई है। जीवशास्त्री कहते हैं कि आदमी के बच्चे को अगर पूरा पैदा करना हो तो इक्कीस महीने गर्भ में रहना चाहिए। मगर आदमी की मादा कमजोर है, इक्कीस महीने बच्चे को गर्भ में रख नहीं सकती। इसलिए कुछ जीवशास्त्रियों के हिसाब से पूरी मनुष्य—जाति गर्भपात है। कोई बच्चा पूरा पैदा नहीं होता, सभी बच्चे अधूरे पैदा होते हैं। जानवरों के बच्चे पूरे पैदा होते हैं। मगर यह सौभाग्य भी है—दुर्भाग्य भी और सौभाग्य भी।
इस जगत में किसी भी चीज का एक पहलू नहीं होता, हर चीज के दोहरे पहलू होते हैं। यह दुर्भाग्य है कि आदमी का बच्चा कमजोर है और यही सौभाग्य है, क्योंकि इसी कमजोरी के कारण आदमी सारे पशुओं से श्रेष्ठ हो गया है। उसके कारण हैं गहरे। क्योंकि बच्चा आदमी का बिलकुल ही कमजोर पैदा होता है, उसको बड़े सहारे की जरूरत होती है, नहीं तो बच्चा बचेगा ही नहीं। उसी सहारे के लिए परिवार का जन्म हो गया, नहीं तो परिवार की कोई जरूरत नहीं है।
पशुओं में परिवार नहीं है, क्योंकि उसकी कोई आवश्यकता नहीं है। आदमी का बच्चा तो मर ही जाएगा बिना परिवार के। इसलिए मां है, पिता है, परिवार है, परिवार की पवित्र संस्था है। वह सब की सब बच्चे की कमजोरी से पैदा हुई है। न केवल परिवार, फिर परिवार के आधार पर समाज और देश और सारी सभ्यता का जाल निर्मित हुआ। और चूंकि बच्चा असहाय पैदा होता है, उसके पास मूल वृत्तियां नहीं होतीं। सब जानवरों के बच्चे पैदा होते हैं, उनके पास बुद्धि होती है —पैदा होते ही। उतनी बुद्धि होती है, जितने से उनका जीवन चल जाएगा। आदमी के बच्चे के पास कोई बुद्धि नहीं होती। जीवन चलने का सवाल ही नहीं है, वह सास भी नहीं ले पाएगा। उसे हम वैसे ही छोड़ दें तो वह मरेगा। कोई उपाय उसके बचने का नहीं है।
इसलिए इस बच्चे को शिक्षित करना पड़ता है। किसी जानवर के बच्चे को शिक्षा की कोई भी जरूरत नहीं है। आदमी के बच्चे को सिखाना पड़ता है। वह खुद कुछ लेकर आता ही नहीं, सब सिखाना पड़ता है। इसलिए कालेज है, अइनवर्सिटी है, ये आदमी की कमजोरी से पैदा हुई संस्थाएं हैं। सारी शिक्षा हमें देनी पड़ती है, सब सिखाना पड़ता है एक—एक बात। तब भी कोई पक्का भरोसा नहीं है कि बच्चा मान ही जाएगा और सीख ही लेगा! बड़ी चेष्टा करनी पड़ती है। इसलिए सारी शिक्षा और सारे संस्कार का आयोजन आदमी की कमजोरी से हुआ है। लेकिन इस सूत्र से उसका कुछ संबंध है।
बच्चा असहाय है, इसलिए बच्चे के प्रति बहुत ध्यान देना पड़ता है मां —बाप को। उस ध्यान के कारण बच्चे को लगता है : मैं जगत का केंद्र हूं; सारी दुनिया मेरे आस—पास घूम रही है। जरा सा रोता है कि मां भागी आती है! जरा बीमार पड़ता है कि बाप डाक्टर को लिए खड़ा है! छोटा बच्चा जानता है कि मेरे इशारे पर सब चलता है। जरा सी आवाज, जरा सा रोना, जरा सा दुख, और सारा घर उसके आस—पास इकट्ठा हो जाता है! और बच्चे के लिए घर ही सारी दुनिया है, उसे और दुनिया का कोई पता नहीं। तो बच्चे के मन में एक सहज भ्रम पैदा हो जाता है कि मैं केंद्र हूं जगत का; और मेरे लिए ही सब आयोजन है; सब कुछ मेरे लिए हो रहा है; सब की नजरें मुझ पर टिकी हैं। यह भांति गहरी बैठ जाती है।
और फिर हम जीवन भर अपने को केंद्र मान कर ही चलते रहते हैं! इससे बड़ी पीड़ा होती है। इसलिए अहंकार दुख देता है, क्योंकि यह सच नहीं है। आप केंद्र नहीं हैं जगत के। आपके बिना जगत बड़े मजे से चलता है। आपके न होने से कोई भी बाधा नहीं पड़ती है। पर आपके मन में कहीं लगता रहता है कि मैं केंद्र हूं। और आप इसी तलाश में रहते हैं कि यह सारा जगत भी इस बात को स्वीकार कर ले कि मैं केंद्र हूं। यही अहंकार की खोज है।
यह सूत्र कहता है ' अहंकार को पकड़ने से मुक्त हुआ मनुष्य'—वह जो बचपन से अहंकार की धारणा गहरी हो गई है, उसे जो छोड़ने को राजी हो जाता है—'वही आत्मज्ञान को उपलब्ध होता है।'
अनिवार्य है यह। बच्चे के जन्म के साथ. इस अहंकार का पैदा हो जाना अनिवार्य है। यह अनिवार्य बुराई है। लेकिन इस पर ही अटक जाना, इस पर ही रुक जाना, सारे जीवन का विनाश हो जाता है। क्योंकि तब हम उस तत्व को जानने से वंचित ही रह जाते हैं, जो हमारे भीतर छिपा था। उसको हम जान ही तब पाएंगे जब हम अहंकार को छोड़ दें। क्यों? क्यों इतना जोर है अहंकार को छोड़ देने पर धर्म का?
अहंकार को छोड़ देने पर इसलिए जोर है कि जिस आदमी को यह खयाल है कि मैं जगत का केंद्र हूं वह अपने भीतर अपने केंद्र को जानने से वंचित रह जाता है। वह एक झूठे केंद्र को अपना केंद्र मान कर जीता है जो कि केंद्र नहीं है। जो आदमी सोचता है कि मैं दूसरों की आ़ंखों का केंद्र हूं र वह अपने केंद्र को खोजता ही नहीं कि वस्तुत: मेरा कोई केंद्र है या नहीं। और एक सूडो सेंटर, एक मिथ्या केंद्र निर्मित हो जाता है। यह मिथ्या केंद्र दूसरों पर निर्भर होता है, इसीलिए अहंकार से दुख मिलता है।
आप कहते हैं कि मैं अच्छा आदमी हूं तो आप मेरे अहंकार को बल देते हैं। कल आपने मुझसे कह दिया कि नहीं, वह हमारी भूल थी, आप अच्छे आदमी हैं नहीं—आपने अहंकार को जो ईंट दी थी मेरे जिससे मैंने भवन बनाया था, वह आपने वापस ले ली, मेरा मकान गिरने की हालत में हो जाता है।
अहंकार का निर्माण है दूसरों की नजरों से, दूसरों के विचारों से। दूसरों पर निर्भर है अहंकार। और ध्यान रखिए, जो दूसरों पर निर्भर है, वह आपका केंद्र नहीं हो सकता। जिसका होना ही दूसरों पर निर्भर है, वह आपका केंद्र नहीं हो सकता। तो कौन क्या कहता है, इसकी हम बड़ी चिंता करते हैं; कौन अच्छा कहता है, कौन बुरा कहता है।
एक मित्र मेरे पास आए थे। उन्होंने कहा, मेरी तकलीफ ही यही है। वे मौजूद हैं। उनकी तकलीफ उन्होंने कहा, मेरी तकलीफ ही यही है कि कोई छोटी—छोटी बातें लोग कह देते हैं, जिनका कोई मूल्य नहीं है, लेकिन मुझे इतनी पीड़ा हो जाती है कि मैं रात भर नहीं सो पाता! उदाहरण के लिए, उन्होंने कहा, एक दुकान पर मैं कपड़ा लेने गया, कपड़ा मुझे लेना था, लेकिन पसंद नहीं पड़ा। दुकानदार ने कहा कि जाइए भी, पहले से ही पता था आपकी शकल देख कर, कि आप कपड़ा खरीदेंगे नहीं! रात भर नींद नहीं आई कि इस आदमी ने ऐसा कहा क्यों?
हमारा अहंकार दूसरों की बातों पर निर्भर है। चारों तरफ जो लोग हैं हमारे, वे हमें अहंकार देते हैं या छीनते हैं। 'इसलिए हम पूरे वक्त खयाल रखते हैं कि हमारे बाबत कौन क्या कह रहा है, कौन क्या सोच रहा है। वही तो हमारी पूंजी है! दूसरों का मत, उसका ही संग्रह हमारी अस्मिता है। और निश्चित ही, दूसरों के मत का क्या भरोसा है! दूसरों का मत दूसरों के हाथ में है। आज देते हैं, कल न दें! आज अच्छा कहते हैं, कल बुरा कहें! और उनके भी अपने प्रयोजन हैं।
उस दुकानदार का भी अपना प्रयोजन है। उसने अहंकार को चोट की। दोनों बातें हो सकती थीं। यह भी हो सकता था कि यह सज्जन कपड़ा खरीद ही लेते, क्योंकि अपनी शकल को बचाने का सवाल था। और खरीद लेते तो बेहतर होता, कम से कम रात भर रात भर की चिंता बच जाती!
लेकिन तब दूसरी चिंता पकड़ती कि जो कपड़ा नहीं खरीदना था वह मैंने खरीद क्यों लिया! और आप सब ऐसे बहुत से कपड़े खरीद कर बैठे हैं जो आपको नहीं खरीदने थे। लेकिन कहीं—कहीं अहंकार कहता है कि खरीद ही लो!
पश्चिम में दुकानों पर से पुरुष हटा लिए गए हैं, स्त्रियां दुकानों पर बैठ गई हैं सेल्समैन की जगह। सेल्समैन अब कहीं हैं ही नहीं, सेल्सबूमैन! अब सेल्समैन कहने का कोई अर्थ नहीं है। और समझदार लोगों ने सलाह दी है। जब एक पुरुष जूता खरीदने आता है एक दुकान पर, और एक स्त्री—सुंदर स्त्री—उसके पैर में जूता पहना देती है, बंद बंद कर देती है, और फिर मुस्कुरा कर कहती है कि पैर बहुत सुंदर मालूम पड़ रहा है! अब वह जूता भीतर कितना ही काट रहा हो, अब उसे खरीदना मजबूरी है! अब उसे खरीदना ही होगा! अब यह मामला जूते का है ही नहीं, अब आप कुछ और खरीद रहे हैं, जूता केवल बहाना है!
हम सब ऐसी चीजें खरीदे बैठे हैं। हमारी पूरी जिंदगी इसी तरह का जोड़ है। अहंकार इस सबका संग्रह है। जो हमने दूसरों की आखों से चमक चुरा ली है, उसको जोड़ लिया है, वही हमारा टिमटिमाता दीया है। लेकिन दूसरे हमेशा मालिक हैं। वे जिस दिन चाहें खींच लें। बड़े से बडा नेता हो, अनुयायी से बड़ा नहीं होता। हो नहीं सकता, क्योंकि सारी नेतागिरी अनुयायी के हाथ में होती है। आज दी है, कल वापस ले ले!
इसलिए कितना ही बडा नेता हो, अनुयायी का भी अनुयायी होता है; उसके पीछे उसे चलना पड़ता है। उसे देखना पडता है कि अनुयायी किस तरफ जा रहा है? दौड कर उसके आगे हो जाता है। देखना पड़ता है, अनुयायी किस तरफ जा रहा है? कहा है रुख हवा का? बस इतनी कुशलता करता है कि दौड़ कर उसके आगे हो जाता है। और पूरे वक्त इसीलिए नेता रोज अपने वक्तव्य को बदलता रहता है। उसको बदलना पड़ता है। वह अनुयायी को खयाल में रखना है। उससे मिला हुआ अहंकार है। पद है, प्रतिष्ठा है, सब मिली हुई है, सब उधार है। और जो उधार है, वह आप नहीं हैं। यह सब नहीं मिला था, तब भी आप थे। मौत इस सबको छीन लेगी, तब भी आप होंगे।
आपने एक झूठा केंद्र निर्मित कर लिया है। और इस केंद्र से अगर आप अपने को एक समझ बैठे हैं, तो फिर आप असली केंद्र को खोजेंगे क्यों। आप तो मान कर ही चल रहे हैं, यही है असली केंद्र। क्या है आपकी तस्वीर अपनी आखों में? दूसरों के हाथों से बनाई हुई तस्वीर है। दूसरों ने लकीरें खींची हैं कैनवस पर। किसी ने रंग भर दिया है, किसी ने आख बना दी है, किसी ने पैर बना दिए हैं, वही आप हैं। यह तस्वीर कागजी है। वर्षा का एक झोंका इसके रंगों को उड़ा देता है। लेकिन जीवन की अनिवार्यता में से निकल आती है यह बात।
मनसविद कहते हैं कि बच्चे को पहले बोध होता है दूसरे का, खुद का नहीं होता। स्वाभाविक है। बच्चा जब आख खोलता है, तो देखता है अपनी मां को; खुद को तो कैसे देखेगा! दूसरा दिखाई पड़ता है—तू दिखाई पडता है। फिर धीरे—धीरे उसकी पहचान बढ़ती है, पिता दिखाई पडता है; भाई, बहन, परिवार दिखाई पड़ता है। धीरे — धीरे उसे तू का अनुभव होता है, दूसरे का। और इस तू के विपरीत ही वह अपने मैं को अनुभव करना शुरू करता है।
मैं का अनुभव पहला नहीं है, यह बड़े मजे की बात है। मैं पैदा होता हूं र लेकिन मुझे मेरा अनुभव पहले नहीं होता, मुझे दूसरों का अनुभव पहले होता है। स्वभावत:, जब दूसरों का अनुभव मुझे पहला होता है, तो जिस मैं को मैं निर्मित करूंगा, वह इन दूसरों के मत पर आधारित होगा।
इसलिए मनसविद कहते हैं कि अगर मां का प्रेम मिला हो बेटे को, पिता का प्रेम मिला हो, घर का सम्मान मिला हो, तो उस बेटे की अकड़ दूसरे ढंग की होती है। मां का प्रेम न मिला हो, घर में कोई सम्मान न मिला हो, तो उस बेटे में एक दीनता पैदा हो जाती है। क्योंकि जिनसे मैं का पहला बोध मिला, अगर उन्होंने खुशी जाहिर न की हो और आनंद जाहिर न किया हो, तो वह मैं सदा के लिए गरीब, दीन—दुखी हो जाता है। भोजन ही नहीं मिला उसे।
इसलिए जो बच्चा मां के बिना पलता है, उसमें एक कमी सदा के लिए रह जाती है, जिसको मनोवैज्ञानिक कहते हैं, पूरा किया ही नहीं जा सकता। क्योंकि उसके पहले मैं का बोध ही पंगु हो जाता है। जिससे मिलनी थी यह समझ कि मैं कौन हूं र जिस तू से पहली झलक मिलनी थी मैं की, उसने कोई झलक ही न दी। उसने कोई गौरव, सम्मान, आदर, प्रेम, कुछ भी न दिया, कोई गरिमा न दी।
मां अगर नाच न उठी हो बच्चे के जन्म से, अगर मां आह्रादित न हो उठी हो, अगर उसका रोआं—रोआं प्रसन्न न हो उठा हो, तो इस बच्चे का मैं जो है, वह सदा के लिए लंगड़ा—लूला रह जाएगा। बड़ी तकलीफ होगी। उसे बैसाखियां लगानी पड़ेगी। बड़ी कठिनाई आएगी।
दूसरों से मिलता है हमें मैं का पहला अनुभव, और दूसरों से ही मिलता चला जाता है। धीरे — धीरे, सर्टिफिकेट, मत, लोगों के विचार, समाज में प्रतिष्ठा, मान, उसको हम इकट्ठा कर लेते हैं। और इसी केंद्र पर हम लटके रह जाते हैं। केंद्र इसके भीतर छिपा है हमारा।
तू पहले नहीं हो सकता, मैं पहले हूं —चाहे उसका पता हमें बाद में चलता हो। बच्चा पैदा होता है तो अपने मैं को, अपनी आत्मा को लेकर पैदा होता है। लेकिन वह केंद्र छिपा रह जाता है और एक नया केंद्र निर्मित हो जाता है। फिर इस केंद्र को हम पकड़ते हैं। पकड़ते इसलिए हैं कि हम दूसरा कोई केंद्र जानते भी नहीं। और इसे छोड़ दें तो अधर में लटक जाएं। और इसका खयाल न करें तो बिखर जाएं। डर लगता है कि कहीं सब अस्तव्यस्त न हो जाए, अराजक न हो जाए। इसलिए इसे जोर से पकड़े रहते हैं।
वह जो तोता रस्सी को पकड़े है, इसी डर से कि अगर छोड़ दूं तो गिर पडूं, हड्डी—पसली चकनाचूर हो जाए। हम भी इस मैं को पकड़े रहते हैं, क्योंकि और कुछ पकड़ने को दिखाई भी नहीं पड़ता। इसी के सहारे चलते हैं। और जोर से पकड़े रहते हैं कि कहीं छूट न जाए। फिर इससे दुख मिलता है; क्योंकि यह वास्तविक केंद्र नहीं है। यह हमारी हालत ऐसी है कि हम एक खजाना लेकर पैदा हुए हों, और फिर एक झूठे गड्डे को, जो खजाना नहीं है, हमने खजाना समझ रखा हो, फिर उसी को खोदते चले जाते हों और उसमें से कभी कोई संपत्ति न मिलती हो।
जो हमारा केंद्र है, वह तो सम्राट है, जो हमारी आत्मा है, वह तो आनंद है, वह तो एक खजाना है; लेकिन यह जो मैं है, यह बिलकुल उधार गड्डा है। इसमें हम कितने ही खोदें, कोई खजाना हमें कभी मिलने वाला नहीं। इसको खोद—खोद कर हम अपने स्वभाव तक कभी पहुंच नहीं सकते हैं।
इसलिए सूत्र कहता है : 'अहंकार को पकड़ने से मुक्त हुआ मनुष्य ही आत्म—स्वरूप को प्राप्त करता है। 'तो क्या करें? क्या करें?
गुरजिएफ एक बहुत अदभुत फकीर हुआ। उसकी दादी मरणशथ्या पर पड़ी थी। और गुरजिएफ ने अपनी दादी से पूछा कि तेरे जीवन के अनुभव और निष्कर्षों से अगर कोई बात मुझे देने योग्य हो और मेरी कोई पात्रता हो, तो मुझे दे दे।
बड़ी अजीब बात उसकी की दादी ने दी। उसकी की दादी ने कहा, एक बात का अगर तू खयाल रख सके जीवन भर, कि जैसा दूसरे करते हों वैसा कभी मत करना। कोई भी काम, जैसा दूसरे करते हों वैसा कभी मत करना, सदा कोशिश करना कुछ अन्यथा करने की।
गुरजिएफ ने तो इसके ऊपर बाद में एक पूरा का पूरा फलसफा, एक पूरा दर्शन खड़ा किया। और उसने एक नियम बनाया, दि ली ऑफ अदरवाइज; हमेशा और ढंग से करना।
गुरजिएफ ने इसकी चेष्टा की, और एक अनूठा आदमी पैदा हुआ। क्योंकि जैसा दूसरे करते हों वैसा मत करना, बड़े परिणाम हुए इसके। पहला परिणाम तो यह हुआ कि जैसा दूसरे करते हैं अगर आप वैसा ही करें, तो ही आपके अहंकार को पुष्टि मिलती है। तो आपके अहंकार को पुष्टि देने वाला कोई भी नहीं मिलेगा। लोग आप पर हंसेंगे।
गुरजिएफ ने कहा है कि मेरी दादी ने मुझसे कहा कि मैं मरने के करीब हूं र मुझे पता भी नहीं चलेगा कि तूने मेरी बात मानी कि नहीं मानी! तो मरने के पहले मुझे तू उदाहरण एक करके दिखा दे। पास ही पड़ा था एक सेव, उसकी बूढ़ी दादी ने उसे दिया और कहा, इसे खाकर बता! लेकिन याद रख, जैसा दूसरे करते हैं, वैसा मत करना।
बड़ी मुश्किल में पड़ गया होगा वह बच्चा, क्या करे? लेकिन बच्चे इन्वेंटिव होते हैं, काफी आविष्कारक होते हैं। अगर मां—बाप उनके आविष्कार की बिलकुल हत्या न कर दें तो इस दुनिया में बहुत आविष्कारक लोग हों। लेकिन आविष्कार खतरा मालूम पड़ता है, क्योंकि नया कुछ उपद्रव लाता है।
गुरजिएफ ने पहले कान से लगा कर उस सेव को सुना, आख के पास लाकर देखा, चूमा, हाथ से स्पर्श किया आख बंद करके; उस सेव को लेकर नाचा, उछला, कूदा, दौड़ा; फिर उस सेव को खाया। उसकी दादी ने कहा, मैं आश्वस्त हूं!
फिर गुरजिएफ ने कहा, यह मेरी जिंदगी का नियम हो गया कि कुछ भी काम करो, दूसरे जैसा न करना; कुछ न कुछ अपने जैसा करना। लोग उस पर हंसते थे। लोग कहते, पागल है! लोग कहते, यह किस तरह का आदमी है! यह क्या कर रहा है ?' सेव को कान से सुन रहा है!
गुरजिएफ ने कहा कि मुझे पता भी नहीं था, लेकिन इसका एक परिणाम हुआ कि मुझे दूसरों की चिंता न रही। दूसरे क्या कहते हैं, दूसरों का क्या मंतव्य है, दूसरे मेरे संबंध में क्या धारणा बनाते हैं, यह बात ही छूट गई; मैं अकेला ही हो गया; मैं निपट अकेला हो गया इस पूरी पृथ्वी पर। और गुरजिएफ ने लिखा है, इस कारण मुझे वह मुसीबत कभी नहीं झेलनी पडी जो सभी को झेलनी पड़ती है। एक झूठा केंद्र मेरा निर्मित ही नहीं हुआ। और मुझे अहंकार मिटाने के लिए कभी कोई चेष्टा नहीं करनी पड़ी। वह बना ही नहीं।
क्‍या करें? दूसरों का खयाल छोड दें। सुबह मैं देखता हूं, आप ध्यान कर रहे हैं। करते भी हैं, खयाल इरी बना रहता है कि कोई देख तो नहीं रहा! कोई क्या कहेगा!
एक मित्र आज ही आए थे। वे कहते थे, आप जो भी बताएं, अकेले में कर लूंगा। यहा इतने लोगों के सामने!
अकेले में कोई लाभ न होगा। कोई लाभ न होगा, क्योंकि ध्यान के लाभ तो बहुआयामी हैं। इतने लोगों के सामने आपके पागल होने की हिम्मत आपके अहंकार को बिखरा जाती है। इतने लोगों के सामने आपका बच्चे जैसा व्यवहार आपको अचानक आपके अहंकार से हटा कर केंद्र पर फेंक देता है। अकेले में — अकेले में यह बात न होगी। अकेले में तो अपने बाथरूम में सभी गुनगुना लेते हैं! और अपने बाथरूम के आईने में सभी मुंह बिचका लेते हैं! बच्चे ही नहीं, के भी! वह तो आईने कहते नहीं कथाएं! मगर उसका कोई परिणाम नहीं है। उससे कोई हल नहीं है। उससे कोई भी हल नहीं है।
दूसरे की चिंता छोड़ दें; दूसरे के मत का विचार छोड दें; और दूसरे का ध्यान मुझे मिले, इसको धीरे— धीरे क्षीण करते जाएं। यह भोजन है अहंकार का : दूसरे का ध्यान मुझे मिले। दूसरे का ध्यान भोजन है; उससे अहंकार परिपुष्ट होता है। इसलिए जितने लोग आपको ज्यादा ध्यान दें, उतना रस मालूम पड़े; उतना लगे कि मैं कुछ हूं। अगर कोई ध्यान न दे, आप एक घर में हों और कोई आपको देखे भी नहीं.।
गुरजिएफ प्रयोग कर रहा था अपने शिष्यों को लेकर। उसने तीस शिष्यों को एक भवन में रखा हुआ था। और उनसे कहा था, तुम इस तरह रहना यहां कि बाकी उनतीस यहां नहीं हैं। न तो बोलना, न किसी तरह का इशारा करना, न किसी तरह की मुद्रा बनाना जिससे कि कोई संवाद हो सके, अगर तुम किसी के पास से गुजरो तो यही ध्यान रख कर गुजरना कि यहां कोई भी नहीं है, अकेला हू। जान कर, अनजाने में, कोई भी ऐसी बात मत करना जिससे तुम्हारे द्वारा पता चले कि दूसरा मौजूद है। गुरजिएफ ने कहा कि अगर तुम्हारा पैर किसी के पैर पर पड़ जाए, तो माफी मत मांगना, क्योंकि वहां कोई है नहीं। अगर अंगारा भी तुम्हारे हाथ से किसी के ऊपर छूट जाए, तो तुम यह मत कहना, भूल हो गई। आख से भी मत बताना, भूल हो गई; वहां कोई है ही नहीं।
इन तीस लोगों को तीन महीने तक गुरजिएफ ने कहा कि तुम ऐसे रहो। सत्ताइस लोग भाग गए, तीन लोग बचे। लेकिन वे तीन लोग दूसरे आदमी हो गए।
क्या, इसका उपयोग क्या है?
इसका उपयोग क्या है, इसे थोडा समझें। यह सवाल नहीं है महत्वपूर्ण, यह तो बहुत आसान है कि हम दूसरे की तरफ ध्यान न दें और उसको लात लग जाए तो हम माफी न मांगें! यह तो बहुत आसान है। इसमें क्या अड़चन है? यह तो हम चाहते ही हैं! लेकिन क्या, अर्थ क्या है?
ध्यान रखना, इसमें अर्थ गहरा है और छिपा है। गुरजिएफ ने कहा कि तुम ध्यान ही मत देना कि कोई दूसरा है, लेकिन तब एक बात समझ लेना कि दूसरे भी ध्यान नहीं देंगे कि तुम हो। वही है मूल। तुम ध्यान न दोगे दूसरों को, तुम एक हो, दूसरे तुम्हें ध्यान न देंगे, वे उनतीस हैं। उनतीस लोगों का ध्यान तुम्हें तीन महीने तक नहीं मिलेगा बिलकुल।
पारस्परिक है लेन—देन। मैं आपको ध्यान देता हूं, आप मुझे ध्यान दे देते हैं! लेन—देन है। मैं आपके अहंकार को भर देता हूं,  आप मेरे को भर देते हैं! लेकिन दोनों तरफ आवागमन बंद हो जाएगा।
वे सत्ताइस लोग जो भाग गए, उनका कारण क्या था? उनमें से अनेक लोगों ने कहा कि हमें ऐसा लगने लगा कि हम सफोकेट हो रहे हैं, हम मर जाएंगे, हमारी गर्दन घुट रही है।
वह उनकी गर्दन नहीं घुट रही थी, उनके अहंकार की गर्दन घुट रही थी। उन्हें लग रहा था कि तीन महीना! और कोई भोजन न मिलेगा अहंकार को, लौटेंगे बाहर तो खाली हो जाएंगे। वे जो तीन रुक गए हिम्मत करके, वे तीन महीने बाद दूसरे आदमी होकर लौटे। उनमें क्या फर्क पड़ गया था?
आसपेंस्की उन तीन आदमियों में एक था जो रुक गया। उसने पीछे कहा कि अदभुत था यह आदमी गुरजिएफ! क्योंकि तीन महीने में, हमें खयाल ही न था कि हमारे अहंकार को मिटाने का उपाय किया जा रहा है, हम तो समझे थे कि यह प्रयोग हमारी शांति, हमारे मौन के लिए करवाया जा रहा है। हमें बताया भी नहीं गया था कि तुम्हारा अहंकार मर जाएगा। तीन महीने के बाद हम ऐसे हो गए, जैसे हों ही न। होना भर रह गया। कहीं कोई मैं का स्वर नहीं उठता था।
जिस दिन भीतर कोई मैं का स्वर नहीं उठता, उस दिन आप अपने वास्तविक मैं पर खड़े हो जाते हैं। उस वास्तविक मैं का नाम है आत्मा। और तब स्वभावत: चंद्रमा जैसा निर्मल हो जाता है व्यक्तित्व, सदा आनंदमय और स्वयं —प्रकाश। वहा प्रकाश है ही, वहा आनंद है ही, बस जरा सा मैं से एक छलांग लगानी है उस आत्मा पर। वहा निर्मलता है ही, वहा की निर्मलता कभी खंडित नहीं हुई है।
दूसरा महत्वपूर्ण सूत्र। वह भी बहुत अदभुत और मौलिक। शब्द कभी —कभी छिपा लेते हैं और दिखाई नहीं पडता। और शब्द परिचित होते हैं इसलिए शब्दों के भीतर उतरना मुश्किल हो जाता है। ये शब्द सब आपने सुने होंगे, इनमें कोई अपरिचित नहीं है। लेकिन इनका संयोजन बिलकुल अपरिचित है।  'क्रिया का नाश होने से चिंता का नाश होता है, और चिंता का नाश होने से वासना का नाश होता है। वासना—नाश मोक्ष है, और यही जीवन्यूक्ति है। '
'किया का नाश होने से चिंता का नाश होता है। '
चिंता को तो हम सभी नष्ट करना चाहते हैं। कौन है आदमी जो चिंता से मुक्त न हो जाना चाहता हो? लेकिन कर्ता से हम मुक्त नहीं होना चाहते। चिंता से मुक्त होना चाहते हैं, कर्ता से मुक्त नहीं होना चाहते। और कर्ता की छाया है चिंता। जो आदमी सोचता है मैं कर रहा हूं यह, वह चिंता से नहीं बच सकता। उस पर चिंता बढ़ती चली जाएगी। और जितना ही वह आदमी सोचेगा मैं कर रहा हूं उतनी ही चिंता बढ़ती चली जाएगी।
पूरब के लोगों ने बड़ी तरकीबें खोजी थीं, उसमें एक तरकीब यह थी कि मैं नहीं कर रहा हूं परमात्मा कर रहा है। यह एक ध्यान की व्यवस्था थी। यह व्यवस्था थी कि उसकी आज्ञा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता। ऐसा है नहीं कुछ। एक—एक पत्ते के लिए आशा देनी पड़े उसको, तो अभी तक परमात्मा पागल हो जाता! कि एक—एक पत्ते को कहना पड़े हिलो! बंद हो जाओ!
नहीं, कोई परमात्मा एक—एक पत्ते को हिलाने —रोकने के लिए नहीं बैठा हुआ है। लेकिन इसका उससे कोई संबंध भी नहीं है। उसकी आज्ञा के बिना पत्ता नहीं हिलता, यह तो ध्यान की एक व्यवस्था थी, एक उपाय था। क्योंकि जो आदमी ऐसा मान लेता है, उसकी आज्ञा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता, वह धीरे—धीरे मैं कर्ता हूं, यह भाव छोड़ने लगता है। कर्ता वह है, मैं कुछ भी नहीं हूं, उपकरण हूं। वह हिलाता है तो हिलता हूं, वह चलाता है तो चलता हूं, वह उठाता है तो उठता हूं।
जब लोग ऐसा सोचते थे कि उसके द्वारा सब हो रहा है और हम केवल कठपुतलियां हैं, तो एक बड़ी घटना घटी थी इस दुनिया में, पूरब के मुल्क एकदम चिंतामुक्त हो गए थे। पूरब ने जितना निश्चित समय जाना है, जमीन पर और कहीं नहीं जाना गया। और अभी पश्चिम जितना चिंता से भरा हुआ समय जान रहा है, उतना चिंता से भरा समय भी कभी नहीं जाना गया। पर उसका कारण वही है, क्योंकि पश्चिम में ईश्वर संदिग्ध हो गया, भाग्य की धारणा व्यर्थ हो गई।
मैं नहीं कहता कि भाग्य की धारणा सही है। लेकिन भाग्य की जो उपाय—व्यवस्था थी, कि भाग्य सब कर रहा है तो फिर हम कर्ता नहीं रह जाते, वह समाप्त हो गया। पश्चिम में न कोई ईश्वर बचा, न कोई भाग्य बचा, न कोई नियति बची—सारा जिम्मा आदमी पर पड़ गया। मैं कर रहा हूं! जो भी कर रहा हूं मैं कर रहा हूं! क्योंकि इसको हटाने के लिए कोई जगह न रही।
ईश्वर हो या न हो, इससे अंतर नहीं पड़ता, लेकिन अगर आप अपने कर्तृत्व को ईश्वर पर छोड़ सकें—न हो तो भी—तो भी आप पर तो परिणाम शुरू हो जाता है कि आप निश्चित हो जाते हैं।
पश्चिम में चिंता घनी हो गई है। अमरीका के मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि चार आदमियों में तीन आदमी मानसिक रूप से रुग्ण हैं। चार आदमियों में तीन आदमी! यह चौथा आदमी भी कितनी देर तक इन तीन के बीच बचेगा! ये तीन सब उपाय कर रहे हैं उसको भी डुबा देने के। बड़ी संख्या हो गई, चार में से तीन आदमी अगर मानसिक रूप से अस्तव्यस्त और गा हो गए हैं। क्या कारण होगा? पूरब ने इतने पागल कभी पैदा नहीं किए! पश्चिम ने इतने पागल पैदा किए!
पश्चिम में पागलपन बढ़ता जाता है, और धीरे—धीरे स्वीकृत होता जाता है। फ्रायड ने तो अंत में यह स्वीकार कर लिया जीवन भर के अनुसंधान के बाद कि आदमी को सुधारने का वस्तुत: कोई उपाय नहीं है, आदमी थोड़ा न बहुत पागल रहेगा ही। असमर्थता स्वीकार कर ली। और फ्रायड स्वीकार करे असमर्थता, तो बड़ी कीमत की है। क्योंकि यह आदमी पचास साल जिंदगी के आदमी के मन के अनुसंधान में ही लगाया है, गहरी से गहरी खोज की है। उसका कहना है, कोई उपाय नहीं है कि आदमी बिलकुल स्वस्थ किया जा सके।
पर फ्रायड को पता नहीं कि स्वस्थ आदमी जमीन पर रहे हैं; स्वस्थ समाज भी रहे हैं। पर उन समाजों की धारणाएं दूसरी थीं। उसमें बड़ी से बड़ी गहरी धारणा थी यह कि कर्ता मैं नहीं हूं। इसका उन्होंने उपाय कर लिया था कर्ता परमात्मा है, भाग्य है, विधि है, नियति है—कोई और है। मैं हूं केवल एक उपकरण मात्र, एक पत्ते की तरह। हिलाता है हिलता हूं, नहीं हिलाता नहीं हिलता हूं; जिताता है जीत जाता हूं, हराता है हार जाता हूं; मेरा कुछ भी नहीं है।
इसके दोहरे परिणाम हुए। एक परिणाम तो यह हुआ कि जब मे कर्ता नहीं हूं तो चिंता के पैदा होने का कोई कारण नहीं उठता। हार भी स्वीकृत हो जाती है, जीत भी स्वीकृत हो जाती है। तो जीत भी मेरी नहीं है तो जीत से भी अहंकार निर्मित नहीं होता। और हार भी मेरी नहीं है, तो रात की नींद भी नष्ट नहीं होती; चिंता भी नहीं पकड़ती; मन में व्यथा भी नहीं आती। और भी बड़े मजे की बात है, कोई दूसरा आदमी जीत जाए तो ईर्ष्या भी नहीं पकड़ती। क्योंकि वह आदमी जीत गया, इससे कुछ बड़ा नहीं हो गया है; परमात्मा की मर्जी। उस आदमी का बड़प्पन नहीं है कुछ कि जीत गया है, और हम हार गए तो हम कुछ छोटे हैं; परमात्मा की मर्जी।
एक बड़ी शांत मानसिक अवस्था पैदा हो सकती है अगर कर्ता का भाव छूट जाए। जरूरी नहीं है कि आप परमात्मा को मानें तो ही छूटे। बुद्ध ने बिना परमात्मा को माने छोड़ दिया, थोड़ा कठिन है। महावीर ने बिना परमात्मा को माने छोड दिया, थोड़ा कठिन है।
अगर बिना परमात्मा को माने छोड़ना हो तो फिर आपको साक्षी— भाव को गहरा करना पड़े। सिर्फ देखने वाले रह जाएं; जो भी हो रहा है, देखने वाले रह जाएं। हार हो, तो देखें कि मैं देख रहा हूं हार हो गई, और जीत हो तो देखें कि देख रहा हूँ कि जीत हो गई। न तो मैं हारता हूं और न मैं जीतता हूं मैं केवल देखता हूं। सुबह आती है तो देख लेता हूं सुबह आ गई, सांझ होती है तो देख लेता हूं सांझ हो गई। रात का अंधेरा घिरता है तो मान लेता हूं कि अंधेरा घिर गया, सूरज निकलता है, प्रकाश हो जाता है तो जान लेता हूं कि प्रकाश हो गया। मैं अपनी ही जगह देखने वाला बना रहता हूं—चाहे रात हो और चाहे दिन, चाहे सुख हो चाहे दुख, चाहे हार चाहे जीत। तब फिर साक्षी में कोई ठहर जाए तो कर्ता विलीन हो जाता है; क्रिया आपकी नहीं रह जाती, किया के केंद्र आप नहीं रह जाते, आप दृष्टि, दर्शन, शान के केंद्र हो जाते हैं। क्रिया आस—पास प्रकृति में होती रहती है।
महावीर कहते हैं, पेट को भूख लगती है, मैं देखता हूं। पैर में काटा चुभता है, पीड़ा होती है पैर को, मैं देखता हूं। शरीर रुग्ण होता है, बीमारी आती है, मैं देखता हू। मरते वक्त भी महावीर देखते रहेंगे कि शरीर मर रहा है। आप नहीं देख पाएंगे कि शरीर मर रहा है, आपको लगेगा मैं मर रहा हूं। जीवन भर का अभ्यास! जब सब क्रियाएं आपने कीं, तो मौत भी आपको ही करनी पडेगी। जब सभी कुछ आपने किया, तो फिर मृत्यु आप किस पर छोडेंगे! जिसने जीवन को छोड़ दिया, वह मृत्यु को भी छोड़ देता है। और जो जीवन को देखता रहा कि मैं साक्षी हू र वह मृत्यु को भी देख लेता है कि मैं साक्षी हूं।
क्रिया का नाश हो जाए, अर्थात कर्ता खो जाए, तो चिंता का नाश हो जाता है।
इससे भी गहरी बात दूसरी है
'और चिंता का नाश होने से वासना का नाश होता है।'
यह सूत्र, लगता है कि जैसे कुछ भूल हो गई। निरंतर शास्त्रों ने कहा है, वासना का नाश हो तो चिंता का नाश होता है। और यही आपने सुना भी होगा कि अगर वासना न रहे तो चिंता नहीं रह जाती। यह सूत्र बिलकुल उलटी बात कह रहा है। यह सूत्र कहता है, चिंता का नाश हो जाए तो वासना का नाश होता है। क्रिया का नाश हो तो चिंता का नाश होता है, और चिंता का नाश हो तो वासना का नाश होता है। क्यों? कभी आपने खयाल किया कि जब आप ज्यादा चिंतित होते हैं तो ज्यादा वासनाग्रस्त होते हैं? जब मन में ज्यादा परेशानी होती है, तो कामवासना ज्यादा पकडती है, क्योंकि मन की परेशानी भी कामवासना के साथ बाहर निकल जाती है, हलका हो जाता है। जब चित्त क्रोध में होता है तब भी कामवासना ज्यादा पकड़ती है। चित्त प्रफुल्लित हो, आनंदित हो, कामवासना कम पकडेगी। अगर चित्त बिलकुल आनंद में रहे, कामवासना पकड़ेगी ही नहीं।
इसके कारण हैं। जब चित्त में कोई भी चीज तनाव की एक सीमा के बाहर पहुंच जाती है, तो जो काम—केंद्र है, वह सेफ्टी वाल्व की तरह काम करता है। वह है ही सेफ्टी वाल्व। जब आपकी चिंता बहुत हो जाती है, उसको सहना मुश्किल हो जाता है, और इतनी शक्ति आपमें दौडने लगती है कि उतनी शक्ति आपको बेचैन करने लगती है, तो शरीर उस शक्ति को बाहर फेंकने का उपाय खोज लेता है।
काम—केंद्र सेफ्टी वाल्व है। तो जहा भी शक्ति का काम करना हो वहां सेफ्टी वाल्व लगाने पड़ते हैं। प्रकृति ने भी लगाया हुआ है।
अगर आप स्टोव गर्म कर रहे हैं तो उसमें भी इंतजाम करना पड़ता है कि अगर आप ज्यादा हवा भर दें तो कहीं सेफ्टी वाल्व होना चाहिए जो निकल जाए। घर में बिजली आप लगाते हैं तो फ्यूज लगाने पड़ते हैं। तो कहीं ऐसा हो कि आपके हाथ में बिजली पकड़ जाए, तो फिर आप मरेंगे। तो खूज पूरे वक्त ज्यादा शक्ति को प्रवाहित नहीं होने देगा। जैसे ही ज्यादा शक्ति खींचने की स्थिति बनेगी, फ्यूज टूट जाएगा और शक्ति निष्कासित हो जाएगी, आप बच जाएंगे।
शरीर में भी सेफ्टी वाल्व है, वह बायोलाजिकल है। सेक्स सेंटर, काम—केंद्र सेफ्टी वाल्व है। जब भी आपके भीतर ज्यादा शक्ति भर जाती है, और बेचैनी बढ़ जाती है, और चिंता पकड़ लेती है, और भीतर द्वंद्व चलने लगता है, तब जरूरत है : या तो आप साक्षी हो जाएं, तो यह सब उपद्रव शांत हो जाए। और या फिर यह सारा उपद्रव, दूसरा उपाय है कि आपकी शक्ति शरीर के बाहर चली जाए, आप कमजोर हो जाएं, नो उस कमजोरी में यह उपद्रव शांत हो जाए। क्योंकि उपद्रव के लिए शक्ति चाहिए।
इसलिए अक्सर यह होता है, कमजोर आदमी भले आदमी होते हैं। उसका मतलब यह नहीं है कि वे भले होते हैं। उसका कुल मतलब इतना होता है कि बुरा करने के लिए जितनी शक्ति चाहिए वह उनके पास नहीं है। कभी खयाल किया आपने कि मोटे आदमी सदा प्रसन्न मालूम होते हैं! और आमतौर से मिलनसार होते हैं! और आमतौर से झगड़ेलू नहीं होते! क्यों?
अगर आप पूछें फिजियोलाजिस्ट से, शरीरशास्त्री से, तो वह कहता है, मोटा आदमी लड़ नहीं सकता, लडे तो पिटेगा, तो मिलनसार हो जाता है! क्योंकि वह झंझट वह लड़ने का काम हो ही नहीं सकता उनसे! करेंगे तो उसमें पिटेंगे! इसलिए वे मुस्कुराते रहते हैं! मुस्कुराहट का मतलब यह है कि कोई झगडा नहीं करना है किसी से। बस सब ठीक है, झगड़े में नहीं उतरना है।
मोटा आदमी भाग नहीं सकता। और झगडा हो तो दो ही उपाय हैं या तो लड़ो, या भागो। वह दोनों नहीं कर सकता! झगड़ेलू नहीं रह जाता। मगर इसका यह मतलब नहीं है कि झगड़ा समाप्त हो जाता है। आदमी की सारी व्यवस्थाएं हैं भीतर, उनके प्रति होश से भरना उपयोगी है।
तो जब भी आप चिंता से भरते हैं—दुख से, पीड़ा से—तो आपके चित्त में वासना का उदय होगा। या तो साक्षी बन जाइए। अगर साक्षी बन जाएंगे तो जो शक्ति आपकी चिंता में उलझ रही है, वह शक्ति चिंता से मुक्त हो जाएगी और उसी शक्ति के सहारे आप ऊपर की यात्रा पर निकल जाएंगे। अगर आप साक्षी नहीं हो सकते तो जो शक्ति आपको बेचैन किए दे रही है, तूफान, झंझावात कर दिया है, वह फिर सेफ्टी वाल्व से, वासना के केंद्र से बाहर निष्कासित हो जाएगी, आप कमजोर हो जाएंगे, आपको लगेगा हलके हो गए; लगेगा रिलीफ, विश्राम मिला।
फ्रायड ने तो सेक्स को, कामवासना को, नैसर्गिक ट्रैक्येलाइजर कहा है, कि वह विश्राम देने वाली दवा है। पुरुष दिन भर का थका—मादा, जमाने भर के उपद्रव, चिंताओं से घिरा हुआ लौटता है। अगर उसे कामवासना से शक्ति को बहाने का मौका मिल जाए, तो वह रात शाति से सो जाता है।
और इसी वजह से स्त्रियां काम में इतना रस नहीं लेती हैं, क्योंकि उनको बहुत जल्दी समझ में आना शुरू हो जाता है कि पुरुष के लिए वे केवल सेफ्टी वाल्व का काम कर रही हैं। उनको तत्काल यह पता चल जाता है कि प्रेम वगैरह कुछ भी इसमें है नहीं मामला, इंस्टभूमेंटल है। उनको समझ में आ जाता है कि इस पुरुष के लिए धीरे—धीरे, धीरे—धीरे वे केवल एक उपकरण बन गई हैं, जिसके माध्यम से वह अपनी शक्ति को फेंक देता है और सो जाता है।
और अक्सर यह होता है कि पुरुष संभोग के बाद करवट लेकर सो जाता है और स्त्री रोती रहती है। उसके कारण हैं, क्योंकि स्त्री का इससे ज्यादा और गहन अपमान नहीं हो सकता कि उसका उपयोग वस्तु की तरह कर लिया जाए।
मेरे पास न मालूम कितनी स्त्रियां आकर कहती हैं कि उन्हें कामवासना में जरा भी रस नहीं है!
उसका कारण यह नहीं है कि उन्हें रस नहीं है, उसका कुल कारण यह है कि पुरुष ने उनका उपयोग केवल एक वस्तु की तरह किया है; इससे रस विरस हो गया है। अन्यथा ऐसा नहीं है कि रस नहीं है। असलियत उलटी है, स्त्रियां ज्यादा कामातुर हैं पुरुषों से, उनके पास ज्यादा ऊर्जा है काम की। लेकिन दिखाई नहीं पड़ती वे कामातुर, बल्कि बिलकुल ही रसहीन मालूम पड़ती हैं। पुरुष को भी वे ऐसा मान कर चलती हैं कि ठीक है! निपटारा हो जाता है! झंझट मिटी! बाकी कोई रस स्त्रियां लेती नहीं मालूम पड़ती। उसका कारण यह नहीं कि उनके भीतर कोई वासना नहीं है। उसका कुल कारण इतना है कि वासना में उन्हें लगता है कि वह केवल वस्तु की तरह उनका उपयोग किया जा रहा है, व्यक्तित्व उनका वस्तु जैसा समझा जा रहा है। इससे पीड़ा होती है।
पर इसके दूसरे परिणाम होते हैं। पुरुष तो कामवासना से निकाल लेता है अपनी ऊर्जा को, स्त्रियां क्या करें? इसलिए स्त्रियां झगडैल, उपद्रवी, कर्कशा—वें दूसरे रास्तों से चौबीस घंटे निकालती हैं। क्योंकि उनके लिए सेफ्टी वाल्व बंद हो गया; उनके लिए तो यह सिर्फ एक बात रह गई कि ठीक है, पुरुष का उपाय है! लेकिन फिर स्त्रियां कर्कशा हो जाती हैं।
यह बड़ी उलटी बात है। स्त्रियों को होना चाहिए ज्यादा मधुर, पर यह होता नहीं, होना चाहिए ज्यादा सौम्य, लेकिन यह होता नहीं; होना चाहिए संगीत जैसा, लेकिन यह होता नहीं। क्या बात है?
कहीं कुछ नैसर्गिक भूल—चूक व्यवस्था में हो रही है। और वह व्यवस्था में यह हो रही है कि जो निकास का सहज मार्ग उनके लिए हो सकता था, वह अवरुद्ध हो गया; उसके प्रति उन्होंने रस—त्याग कर दिया। और साक्षी बनना तो मुश्किल है! इसलिए अब वे सारी शक्तियां घूमती हैं और अलग — अलग मार्गों से निकलती हैं। हाथ से बर्तन छूट जाएगा स्त्री के। चीनी का होना चाहिए, तब छूटेगा! टूट जाएगा! उसके टूटने से निकास हो रहा है। इसलिए आप बिलकुल चार्ट बना सकते हैं कि किन दिनों में आपके घर बर्तन ज्यादा टूटते हैं! और आप अनिवार्य रूप से यह पाएंगे कि जब भी स्त्री की ऊर्जा निष्कासित नहीं हो पाती तब, तब वे टूटेंगे। तब पच्चीस उपाय से स्त्री—अपने क्रोध से, अपने तनाव से—अपनी शक्ति को बाहर फेंकना चाहेगी।
जब चिंता होती है चित्त पर भारी, तो चित्त वासना की तरफ दौडता है।
इसलिए यह सूत्र कहता है, 'चिंता के नाश होने से वासना का नाश होता है। '
यह सूत्र बहुत अनूठा है, और यह बहुत प्राचीन है, और मनसविद तो अब इसका पता लगा पा रहे हैं। अगर आप निश्चित हो जाएं तो वासना क्षीण हो जाएगी। अगर आप बिलकुल निश्चित हो जाएं तो वासना की तरफ चित्त दौड़ेगा ही नहीं। क्योंकि वासना केवल एक अनिवार्यता है, जब आपके भीतर सीमा के बाहर तूफान उठ जाता है, उस तूफान को निष्कासित करने का। अगर उतना तूफान उठता ही नहीं है, तो वासना क्षीण हो जाती है। लेकिन ऊर्जा क्षीण नहीं हो जाती; वासना क्षीण हो जाती है, ऊर्जा तो इकट्ठी होती चली जाती है। और हर चीज एक सीमा के बाद रूपांतरित होती है।
जैसे हम गरम करें पानी को तो सौ डिग्री पर भाप बन जाता है। सौ डिग्री गर्मी जब इकट्ठी होती है तो पानी भाप बन जाता है। जब आपका वीर्य, आपकी ऊर्जा, आपकी शक्ति एक सीमा तक भीतर इकट्ठी हो जाती है, और कोई तूफान नहीं उठता, और उसको फेंकने की व्यर्थ कोई जरूरत नहीं आती, तो अचानक, एक सौ डिग्री का प्याइंट है, एक बिंदु है, जहां आपकी ऊर्जा जब इकट्ठी हो जाती है, तब अचानक वही ऊर्जा, जो नीचे बहती थी, ऊपर की तरफ बहने लगती है।
खयाल किया आपने, पानी नीचे की तरफ बहता है, भाप ऊपर की तरफ उठती है! सौ डिग्री पर, जो नीचे की तरफ बहना जिसका स्वभाव था—पानी, वह अचानक उत्तप्त होकर भाप बन जाता है, ऊपर की तरफ उठने लगता है; बादलों की तरफ जाने लगता है।
आपके भीतर भी यही घटना घटती है एक जगह है, एक बिंदु है, एक इवैपोरेटिंग प्याइंट है, जहां वाष्पीकरण होता है। वहां जब ऊर्जा इकट्ठी हो जाती है, अचानक आप पाते हैं, जो नीचे जाता था, वही व्यक्तित्व, वही ऊपर जाने लगा। जो बाहर की तरफ दौड़ता था, वही भीतर की तरफ दौड़ने लगा। कल तक जो पाप था, वही पुण्य हो गया। और कल तक जिसे समझा था शत्रु, उससे बड़ा कोई मित्र नहीं है—यह अनुभव में आता है।
'वासना—नाश मोक्ष है। '
जब कोई वासना नहीं है तो आप मुक्त हैं। और जीवन में ही मुक्त हुआ जा सकता है, कोई मर कर मुक्त होने की जरूरत नहीं है। और जो जीवन में नहीं हो पाता, वह भरोसा न रखे कि मर कर हो जाएगा। क्योंकि मरते आप वही हैं जो आप जीते थे। जैसे जीते थे वैसे ही मरेंगे, मरने से कोई और घटना घटने वाली नहीं है।
जीवन की ही अंतिम परिणति है मृत्यु। जीवन्यूक्त! जीवन में ही अभी और यहीं जो मुक्ति को जान लेता है, मोक्ष को जान लेता है, उसकी ही मृत्यु भी मोक्ष बनती है।
'सर्वत्र, सब तरफ, सबको एक ब्रह्मरूप देखना—ऐसी सदभावना से वासना का नाश होता है।'
'ब्रह्मनिष्ठा में कभी प्रमाद न करना, क्योंकि वही मृत्यु है, ऐसा ब्रह्मवादी कहते हैं।'
'जिस प्रकार शैवाल को पानी से कुछ हटा भी दिया जाए तो भी वह पानी को बिना ढंके नहीं रहता, (बार—बार ढंक लेता है।) इसी प्रकार समझदार व्यक्ति भी ब्रह्मनिष्ठा से थोड़ा भी विमुख हो जाए, तो माया उसे ढंक लेती है।'
इसलिए सतत होश रखने की जरूरत है। एक क्षण को भी होश खोने से काम नहीं चलेगा। उस समय तक होश रखने की जरूरत है, जब तक कि जरा सा भी शैवाल, जरा सा भी घास—पात भीतर मौजूद रह गया है। जब समस्त घास—पात बीजरूप से दग्ध हो जाए, तब होश रखने की कोई भी जरूरत नहीं क्योंकि तब होश स्वभाव बन जाता है।
आज इतना ही।