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गुरुवार, 13 अप्रैल 2017

एस धम्मो सनंतनो-(प्रवचन-067)

अंतस-केंद्र पर अमृत है—(प्रवचन-सढसठवां) 

सूत्र:


            दुल्‍लभो पुरिसाजन्‍नो न सो सबत्थ: जायति ।
            यत्थ सो धीरो तं कुलं सुखमेधति ।।169।।

            सुखो बुद्धाने उप्पादो सुखा सद्धम्मदेसना ।
            सुखा संघस्स सामग्री समग्गानं तपो सुखो ।।170।।

            पूजारहे पूजयतो बुद्धे यदि व सावको ।
            पपज्वसमूतिक्कंते तिण्‍णसोकपरिद्दवे ।।171।।

            ते तादिसे पूजयतो निब्‍बुते अकुतोभये ।
            न सक्का पुज्‍जं संखातुं इमेतंपि केतचि ।।172।।

एस धम्मो सनंतनो-(प्रवचन-066)

शून्य है आवास पूर्ण का—(प्रवचन-छियासठवां) 

पहला प्रश्न:


कोई व्यक्ति आपके पास किस तरह आए, किस तरह बैठे, सांस की गति कैसी रखे, आंखें खुली रखे या बंद? कभी लगता है कि आपकी ओर से आने वाली अदृश्य तरंगों को ग्रहण करने में कोई बाधा आ जाती है और वे तरंगें बाहर ही रह जाती हैं। उन्हें ग्रहण करने के योग्य कोई स्वयं को कैसे बनाए? कृपापूर्वक इस संबंध में हमें उपदेश दें।

पूछा है समाधि ने। प्रश्न महत्वपूर्ण है। सभी के काम का है।
पहली बात, जो व्यक्ति कुछ लेने की भावना से आएगा वह चूक जाएगा। वहीं सबसे बड़ी कठिनाई है। लोभ बाधा बन जाता है। तो पहली तो आधारभूत बात यह है कि यहां मेरे पास कुछ लेने की भावना से मत आना। लेने की भावना का तनाव भीतर रहा तो वही तनाव तरंगों को प्रविष्ट नहीं होने देता। तब तुम सुनने में कम उत्सुक हो, लेने में ज्यादा उत्सुक हो। तब तुम यहां नहीं हो, तुम्हारा मन भविष्य में चला गया, परिणाम में, कि कितना इकट्ठा कर लूं, कितना पा लूं, कितनी इन तरंगों को समेट लूं, कितना इस प्रसाद को अपने हृदय में भर लूं, चूक जाओगे।

बुधवार, 12 अप्रैल 2017

साक्षी की साधना-(साधना-शिविर)-प्रवचन-13

साक्षी की साधना-(साधना-शिविर)
ओशो
तेरहवां प्रवचन

...परमात्मा के दर्शन शुरू हो जाएंगे। वह एक पक्षी का गीत सुनेगा, तो पक्षी के गीत में उसे परमात्मा की वाणी सुनाई पड़ेगी। वह एक फूल को खिलते देखेगा, तो उस फूल के खिलने में भी परमात्मा की सुवास की सुगंध उसे मिलेगी। उसे चारों तरफ एक अपूर्व शक्ति का बोध होना शुरू हो जाता है। लेकिन यह होगा तभी जब मन हमारा इतना निर्मल और स्वच्छ हो कि उसमें प्रतिबिंब बन सके, उसमें रिफ्लेक्शन बन सके। तुमने देखा होगा झील पर कभी जाकर, अगर झील पर बहुत लहरें उठती हों, आकाश में चांद हो, तो फिर झील पर कोई चांद का प्रतिबिंब नहीं बनता। और अगर झील बिलकुल शांत हो, उसमें कोई लहर न उठती हो, दर्पण की तरह चुप और मौन हो, तो फिर चांद उसमें दिखाई पड़ता है। और जो चांद झील में दिखाई पड़ता है, वह उससे भी सुंदर होता जो ऊपर आकाश में होता है।

साक्षी की साधना-(साधना-शिविर)-प्रवचन-12

साक्षी की साधना-(साधना-शिविर)

ओशो
बारहवां प्रवचन
पूछा है: सत्य के खोजने की आवश्यकता ही क्या है? साधना की जरूरत क्या है? ध्यान को करने से क्या प्रयोजन? जो-जो हमारी वासनाएं हैं, इच्छाएं हैं, उनको पूरा करें, वही जीवन है, सत्य को खोजने इत्यादि की क्या आवश्यकता है?

बहुत महत्वपूर्ण है। पहले दिन मैंने यह कहा: सामान्यतया हमारा मन सुख चाहता है, लेकिन जो भी हम उपलब्ध करते हैं उससे सुख मिलता नहीं। सामान्यतया हमारा मन पद चाहता है, लेकिन जिस पद पर भी हम पहुंच जाएं, चाह का अंत नहीं आता, चाह आगे बढ़ जाती है। सामान्यतया हमारा मन जो भी चाहता है वह मिल जाए, तो भी चाह समाप्त नहीं होती, चाह आगे बढ़ जाती है।
सत्य को खोजने की कोई जरूरत नहीं है। यदि चाहें पूरी हो जातीं, तो सत्य को कोई भी नहीं खोजता। अगर संतुष्टि मिल जाती, सुख मिल जाता, सत्य को कोई भी नहीं खोजता। लेकिन जो हमारी सहज चाह है वह कितनी ही पूरी हो, तो भी जीवन को अर्थ और संतोष नहीं मिलता। इसी पीड़ा, इसी दर्द, इसी परेशानी से ऊब कर मनुष्य संतुष्टि से हटता है और सत्य की खोज में लगता है। किसी के कहने से कोई सत्य की खोज में नहीं लगता, उसके जीवन का अनुभव ही उसे उस तरफ ले जाता है।

साक्षी की साधना-(साधना-शिविर)-प्रवचन-11

साक्षी की साधना-(साधना-शिविर)
ओशो
ग्यारहवां प्रवचन

वह शांति का अनुभव आपके भीतर सत्य की प्यास बन जाए, तो ठीक, अगर आप समझ लें कि वही सत्य है, तो आप भूल में पड़ गए हैं और भ्रांति में पड़ गए हैं। वह सत्य नहीं है। उससे केवल प्यास पैदा होनी चाहिए कि जो इस व्यक्ति के भीतर उपलब्ध हुआ है, वह मेरे भीतर कैसे पैदा हो जाए? वह व्यक्ति जो आपके भीतर इस भांति की प्यास, असंतोष पैदा कर देता है, ठीक अर्थों में आपका सहयोगी है। और जो व्यक्ति इस भ्रांति को पैदा करता है कि आपको मैं सत्य दे दूंगा। उससे बड़ा शत्रु इस जमीन पर आपका दूसरा नहीं हो सकता है।
मेरी दृष्टि में जो दिखाई पड़ता है, सीखने का मूल्य है। डिसाइपलशीप का, शिष्य होने का मूल्य है। लेकिन गुरु बनाने का कोई मूल्य नहीं है। और गुरु होना तो बहुत मूर्खतापूर्ण बात है। बहुत ईडियाटिक है।

साक्षी की साधना-(साधना-शिविर)-प्रवचन-10

साक्षी की साधना-(साधना-शिविर)
ओशो
दसवां प्रवचन

सुबह जो हमने साधना की साक्षीभाव की, हम जगाना चाहते हैं, क्या वह भी चित्त का एक अंश नहीं होगा या कि चित्त से परे होगा?

बहुत महत्वपूर्ण है और ठीक से समझने योग्य है। साधारणतः हम जो भी जानते हैं, जो भी करते हैं, जो भी प्रयत्न होगा, वह सब चित्त से होगा, वह मन से होगा, माइंड से होगा। अगर आप राम-राम जपते हैं, तो जपने की क्रिया मन से होगी। अगर आप मंदिर में पूजा करते हैं, तो पूजा करने की क्रिया मन का भाव होगी। और अगर आप कोई ग्रंथ पढ़ते हैं, तो पढ़ने की क्रिया मन की होगी। और आत्मा को जानना हो, तो मन के ऊपर जाना होगा। मन की कोई क्रिया मन के ऊपर नहीं ले जा सकती। मन की कोई भी क्रिया मन के भीतर ही रखेगी। स्वाभाविक है कि मन की किसी भी क्रिया से, जो मन के पीछे है, उससे परिचय नहीं हो सकता।
यह पूछा है कि यह जो साक्षीभाव है, क्या यह भी मन की क्रिया होगी?

साक्षी की साधना-(साधना-शिविर)-प्रवचन-09

साक्षी की साधना-(साधना-शिविर)
ओशो
नौवां प्रवचन

मैं बंद किए हुए हूं, उनकी मैं चर्चा करूंगा। क्योंकि दिखाई पड़ना शुरू हो जाए, पहला तो यह जरूरी है कि दीवाल दिखाई पड़े भीतर, दिखाई पड़े तो फिर टूट सकती है। अब जिस कैदी को यही भूल गया हो कि मैं कैदी हूं, फिर तो मुश्किल हो गया, फिर कैद से छुटकारे का कोई रास्ता न रहा। पहली तो बात यह कि यह दिखाई पड़े, अनुभव में आए कि हम भीतर कैद में घिर गए हैं, एक बिलकुल एक कारागृह में बंद हैं। और खुद ही उसे सम्हाले हुए हैं, खुद ही उसके ईंटें रखते हैं, खुद ही उसकी दीवालों पर जहां-जहां द्वार है वहां-वहां बंद कर देते हैं, रोशनी भीतर न पहुंचे इसके सब उपाय करते हैं और फिर चिल्लाते हैं कि हे परमात्मा! हम अंधकार में खड़े हुए हैं, हम क्या करें?
यानी हमारी स्थिति ऐसी है कि हम चारों तरफ से दरवाजे बंद करके अंधकार में खड़े हो जाते हैं और फिर चिल्लाते हैं, हे परमात्मा! हम क्या करें? बहुत अंधकार है। परमात्मा से चिल्लाने की कोई जरूरत नहीं है, उसकी रोशनी हमेशा चारों तरफ मौजूद है।

साक्षी की साधना-(साधना-शिविर)-प्रवचन-08

साक्षी की साधना-(साधना-शिविर)
ओशो
आठवां प्रवचन

...उसके बिना समाधि को उपलब्ध करना संभव नहीं है। आज के तीसरे चरण में समाधि का आगमन कैसे हो, उस संबंध में हम विचार करेंगे।
समाधि साधी नहीं जा सकती, लेकिन उसका आगमन हो सकता है। यह तो पहली बात है, जो जान लेनी जरूरी है। समाधि साधी नहीं जा सकती, उसका आगमन हो सकता है। जैसे हम घर के भीतर सूर्य के प्रकाश को गठरियों में बांध कर नहीं ला सकते, लेकिन अगर द्वार खुला छोड़ दें, तो प्रकाश आ सकता है। लाया नहीं जा सकता, आ सकता है। तो समाधि के आगमन में हमें जो करना है, वह द्वार खोलने जैसा काम है। अत्यंत नकारात्मक है, निगेटिव है। सिर्फ बाधाएं हटा देने की जरूरत है, समाधि आएगी।
एक छोटी सी घटना से इस बात को मैं समझाने की कोशिश करूं।

साक्षी की साधना-(साधना-शिविर)-प्रवचन-07

साक्षी की साधना-(साधाना-शिविर)
ओशो
सातवां प्रवचन

बहुत से प्रश्न मेरे समक्ष हैं। सबसे पहले तो यह पूछा गया है कि मेरी बातें अव्यावहारिक मालूम होती हैं। ठीक प्रतीत होती हैं, लेकिन अव्यावहारिक मालूम होती हैं।

यह ठीक से समझ लेना जरूरी है--मनुष्य के इतिहास में जो-जो हमें अव्यावहारिक मालूम पड़ा है, वही कल्याणप्रद सिद्ध हुआ है। और जिसे हम व्यावहारिक समझते हैं, उसने ही हमें आश्चर्यजनक रूप से दुख में, हिंसा में और पीड़ा में डाला है। निश्चित ही जो आप कर रहे हैं वह आपको व्यावहारिक मालूम होता होगा, प्रेक्टिकल मालूम होता होगा, लेकिन उसका परिणाम क्या है आपके जीवन में? व्यावहारिक जो आपको मालूम पड़ता है, आप कर रहे हैं, लेकिन उसका परिणाम क्या है? उसका परिणाम तो सिवाय दुख और चिंता के कुछ भी नहीं। निश्चित ही उससे भिन्न कोई भी बात एकदम से अव्यावहारिक मालूम होगी। इसलिए नहीं कि वह अव्यावहारिक है, बल्कि इसलिए कि जिसे आप व्यावहारिक समझते रहे हैं, वह उससे भिन्न और विपरीत है, अपरिचित है।

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--5) प्रवचन--88

समलैंगिकता के बारे में सब कुछ—(प्रवचन—आठवां)

दिनांक 28 अप्रेेेल  1976 ओशो आश्रम पूूूूना। 

प्रश्‍नसार:



1—यदि मृत्यु ही आनी है, तो जीने में क्या सार है?



2—प्यारे ओशो, क्या आप वास्तव में बस एक मनुष्य हैं, जो सबुद्ध हो गया?



3—दिव्यता के भीतर कैसे प्रवेश हो?



4—क्या लोगों को अपनी समलैंगिक प्रवृत्तियों का दमन करना चाहिए?

एस धम्मो सनंतनो-(प्रवचन-065)

अमृत से परिचय : मौत के क्षण निस्तरंग चित्त पर

(प्रवचन-पैैैैसठवाां)—65


 सूत्र:

      न कहापणवस्‍सेन तित्‍ति कामेसु विज्‍जति।
      अप्‍पस्‍सादा दुखाकामा इति विज्‍जाय पंडितो ।।162।।


      अपि दिब्‍बेसु कामेसु रतिं सो नाधिगच्‍छति।
      तण्‍हक्‍खयरतो होति सम्‍मासंबुद्धसावको ।।163।।

      वहुं वे सरणं यंति पब्‍बतानि वनानि च।
      आरामरूक्‍खचेत्‍यानि मनुस्‍सा भयतज्‍जिता ।।164।।

      नेतं खो सरणं खेमं नेतं सरणमुत्‍तमं।
      नेतं सरणमागम्‍म सब्‍बदुक्‍खा पमुच्‍चति ।।165।।

      यो च बुद्धज्‍च धम्‍मज्‍च संधज्‍च सरणं गत्‍तो।
      चत्‍तारि अरियसच्‍चानि सम्‍मप्‍पज्‍जाय पस्‍सति ।।166।।

      दुक्‍खं दुक्‍खसमुप्‍पादं दुक्‍खस्‍स च अतिक्‍कमं।
      अरियज्‍चट्ठंगिके मग्‍गं दुक्‍खूपसमगामिनं ।।167।।

      एतं खो सरणं खेमं एतं सरणमुतमं ।
      एतं सरणमागम्म सब्‍बदुक्खा पमुच्चति ।।168।।

एस धम्मो सनंतनो-(प्रवचन-064)

अहंकार की हर जीत हार है-(प्रवचन-चौसठवां )

पहला प्रश्न


बुद्ध ने संघं शरणं गच्छामि क्यों कहा? कृपाकर हमें इसका अभिप्राय समझाएं।

मर्पण अनिवार्य है। फिर चाहे मार्ग भक्ति का हो,चाहे ध्यान का। फर्क ही पड़ेगा कि भक्ति के मार्ग पर समर्पण पहले है, पहले चरण में, और ध्यान के मार्ग पर समर्पण है अंतिम चरण में।
भक्ति कहती है, अहंकार को छोड्कर ही मंदिर में प्रवेश करो। क्योंकि जिसे छोड़ना ही है, उसे इतने दूर भी क्यों साथ ढोना? छोड़ ही दो। भक्ति पहले ही क्षण में अहंकार को गिरा देती है। भक्ति को सुविधा है, क्योंकि भगवान की धारणा है। ध्यानी को वैसी सुविधा नहीं है। ध्यानी चलता है बिना किसी धारणा के। तो अहंकार बचा रहेगा। किसके चरणों में रखें अहंकार को? ध्यानी तो अनुभव के बाद ही, गहरे अनुभव में उतरकर ही, आखिरी घड़ी में, जब कुछ और शेष न रह जाएगा, सिर्फ सूक्ष्म अहंकार मात्र शेष रह जाएगा, वही पर्दा रहेगा। बहुत झीना पर्दा, इतना झीना, इतना पारदर्शी कि बहुतो को तो लगेगा कि यह पर्दा है ही नहीं। जैसे शुद्ध कांच।

एस धम्मो सनंतनो-(प्रवचन-063)

सारे अस्तित्व का चौराहा : मनुष्य-(प्रवचन-त्रेसठवां)

सूत्र--

यस्‍स जित नावजीयति जितमस्‍स नौ याति कोचि लोके।

तं बुद्धमनंतगोचरं अपदं केन पदेन नेस्‍सथ ।।155।।

यस्‍स जालिनी विसत्‍तिका तन्‍हा नत्‍थि कुहिज्‍चि नेतवे।
तं बुद्धमनंतगोचरं अपद्रं केन पदेन नेस्‍सथ ।।156।।

ये ज्ञानपसुत्‍ता धीरा नेक्‍खम्‍मूपसमें रता।
देवापि तेसं पिह्मंति संबुद्धानं सतीमतं ।।157।।

किच्‍छोमनुस्‍सपटिलाभो किच्‍छ मच्‍चान जीवितं।
किच्‍छं सद्धम्‍मसवणं किच्‍छो बुद्धानं उप्‍पादो ।।158।।

सब्‍बापापस्‍स अकरणं कुसलस्‍स उपसंपदा।
सच्‍चित्‍तपदरियोदपनं एतं बुद्धान सासनं ।।159।।

खंती परमं तपो तितिक्‍खा निब्‍बानं परमं बदंति बुद्धा।
नहि पब्‍बजितो परूपधाती समणो होति परं विहेठयंतो ।।160।।

अनूपादो अनपधातो पातिमोक्‍खे च संवरो।
मत्‍तज्‍जुता च भत्‍तस्‍मिं पंतज्‍च सयनासनं।
अधिचित्‍ते च आयोगो एतं बुद्धान सासनं ।।161।।

एस धम्मो सनंतनो-(प्रवचन-062)

ससार: सीढ़ी परमात्मा तक जाने की--(प्रवचन-बासठवां) 

पहला प्रश्न :


आपने कल ऐसा आदेश क्यों दिया कि संबोधि—दिवस के नृत्य में केवल संन्यासी ही भाग लेंगे? औरों को भाग लेने से क्यों रोक दिया?

जो मुझमें भाग लेने को तैयार नहीं, उसमें मैं भी भाग लेने को तैयार नहीं। धीरे— धीरे हिम्मत करो। तुम अपने हृदय का द्वार मेरे लिए खोलोगे, तो ही मेरा हृदय का द्वारा तुम्हारे लिए खुल सकता है। नहीं कि तुम्हारे लिए बंद है, लेकिन खुल न सकेगा। मेरे हृदय के खुलने की कुंजी भी तुम्हारे हृदय के खुलने में छिपी है।
तो धीरे— धीरे तो मैं उनके लिए ही रहूंगा, जो डूबे हैं। डूबोगे तो ही मेरे साथ चल सकोगे। भीड़— भाड़ में मुझे रस नहीं है। मैं कोई राजनेता नहीं हूं कि भीड़— भाड़ में मेरी उत्सुकता हो। मेरी उत्सुकता उन थोड़े से लोगों में है जो सच में ही खोजने को तत्पर हैं। और कुछ दाव पर लगाने की भी हिम्मत रखते हैं।

एस धम्मो सनंतनो-(प्रवचन-061)

ध्यान आँख है-(प्रवचन-इक्कसठवां)

सूत्र—

यो व पुब्‍बे पमज्जित्वा पच्छा सो नप्पमज्जति।
 

सो ' मं लोकं पभासेति अब्‍भा मुत्‍तो व चंदिमा।।150।।
यस्स पापं कतं कम्मं कुसलेन पिथीयती।
सो ' मै लोकं पभासेति अब्भा व चंदिमा?।।151।।
अधं भूतो अयं लोको विपस्सति।
सकुंतो जालमुत्‍तो' व अप्पो सग्गाय गच्छति?।।152।।
हंसादिच्चपथे यंति आकासे यंति इद्धिया।
नीयंति धीरा लोकम्हा जेत्वा मारं सवाहिनिं।।153।।
पथव्या एकरज्‍जेन सग्गस्स गमनेन वा।
सब्‍बलोकाधिपच्चेन सोतापत्तिफलं वरं।।154।।

साक्षी की साधना-(साधना-शिविर)-प्रवचन-06

साक्षी की साधना-(साधना-शिविर)
ओशो

छठवां-प्रवचन
चित्त मुक्त हो, इस संबंध में कल सुबह हमने बात की है। वह पहला चरण है स्वयं का विवेक जग सके इस दिशा में। दूसरे चरण में स्वयं का विवेक कैसे जाग्रत हो, किन विधियों, किन मार्गों से भीतर सोई हुई विवेक की शक्ति जाग जाए, इस संबंध में हम आज बात करेंगे।
इसके पहले कि हम इस संबंध में विचार करना शुरू करें, एक अत्यंत प्राथमिक बात समझ लेनी जरूरी है। और वह यह कि मनुष्य के भीतर केवल वे ही शक्तियां जाग्रत होती हैं और सक्रिय, जिन शक्तियों के लिए जीवन में चुनौती खड़ी हो जाती है, चैलेंज खड़ा हो जाता है। वे शक्तियां सोई हुई ही रह जाती हैं, जिनके लिए जीवन में चुनौती नहीं होती।

साक्षी की साधना-(साधना-शिविर)-प्रवचन-05

साक्षी की साधना-(साधना-शिविर)

ओशो
पांचवां-प्रवचन
सबसे पहले एक प्रश्न पूछा है। और उससे संबंधित एक-दो प्रश्न और भी पूछे हैं।
पूछा है: मन चंचल है और बिना अभ्यास और वैराग्य के वह कैसे थिर होगा?

यह बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है। और जिस ध्यान की साधना के लिए हम यहां इकट्ठे हुए हैं, उस साधना को समझने में भी बहुत सहयोगी होगा। इसलिए मैं थोड़ी सूक्ष्मता से इस संबंध में बात करना चाहूंगा।
पहली बात तो यह कि हजारों वर्ष से मनुष्य को समझाया गया है कि मन चंचल है और मन की चंचलता बहुत बुरी बात है। मैं आपको निवेदन करना चाहता हूं, मन निश्चित ही चंचल है, लेकिन मन की चंचलता बुरी बात नहीं है। मन की चंचलता उसके जीवंत होने का प्रमाण है।
जहां जीवन है वहां गति है, जहां जीवन नहीं है जड़ता है, वहां कोई गति नहीं है। मन की चंचलता आपके जीवित होने का लक्षण है, जड़ होने का नहीं।

साक्षी की साधना-(साधना-शिविर)-प्रवचन-04

साक्षी की साधना-(साधना-शिविर)

ओशो
चौथा-प्रवचन
मनुष्य के जीवन में...और जीवन के आनंद का कोई अनुभव नहीं होता, उस संबंध में थोड़ी सी बात मैंने आपसे कही थी। आज सुबह अंधेपन का कौन सा मौलिक आधार है, उस पर हम बात करेंगे।
कई सौ वर्ष पहले, यूनान की सड़कों पर एक आदमी देखा गया था। भरी दोपहरी में सूरज के प्रकाश में भी वह हाथ में एक कंदील लिए हुए था। लोगों ने उससे पूछा कि यह क्या पागलपन है, इस कंदील को लेकर इस भरी दोपहरी में किसे खोज रहे हो? उस आदमी ने कहा: एक ऐसे आदमी की खोज करता हूं, जिसके पास आंखें हों। वह आदमी था उस समय का एक बहुत अदभुत फकीर डायोजनीज। डायोजनीज को मरे हुए बहुत वर्ष हो गए और डायोजनीज जीवन भर वह लालटेन लिए हुए खोजता रहा उस आदमी को, जिसके पास आंखें हों। लेकिन उसे वह आदमी नहीं मिला।

साक्षी की साधना-(साधना-शिविर)-प्रवचन-03

साक्षी की साधना-(साधना-शिविर)

ओशो
तीसरा-प्रवचन
जो दिखाई पड़ जाए उसका जीवन में प्रविष्ट हो जाना, वह भी उतना महत्वपूर्ण नहीं है, उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है, जो जीवन में प्रविष्ट हो। वह आरोपित, जबरदस्ती, चेष्टा और प्रयास से न हो, बल्कि ऐसे ही सहज हो जाए--जैसे वृक्षों में फूल खिलते हैं, या सूखे पत्ते हवाओं में उड़ जाते हैं, या छोटे-छोटे तिनके और लकड़ी के टुकड़े नदी के प्रवाह में बह जाते हैं। उतना ही सहज जीवन में उसका आगमन हो जाए।
वह तो तीन दिनों में मैं चर्चा करूंगा, उसे आप समझने और सोचने की दिशा में सहयोगी बनेंगे। अभी आज की रात तो कुछ बहुत थोड़ी सी प्राथमिक बातें मुझे कहनी हैं। लेकिन इसके पहले कि मैं वे बातें कहूं, यह भी आपसे निवेदन कर दूं, साधारणतः जो लोग भी धर्म और साधना में उत्सुक होते हैं, वे सोचते हैं कि बहुत बड़ी-बड़ी बातें महत्वपूर्ण हैं।

साक्षी की साधना-(साधना-शिविर)-प्रवचन-01

साक्षी की साधना-(साधना-शिविर)
ओशो
पहला-प्रवचन

हम ध्यान के लिए बैठे थे। ध्यान से मेरा प्रयोजन है एक चित्त की ऐसी स्थिति जहां कोई संताप, जहां कोई प्रश्न, जहां कोई जिज्ञासा शेष न रह जाए। हम निरंतर जीवन-सत्य के संबंध में कुछ न कुछ पूछ रहे हैं। ऐसा मनुष्य खोजना कठिन है जो जीवन के सत्य के संबंध में किसी जिज्ञासा को न लिए हो। न तो हमें इस बात का कोई ज्ञान है कि हम कौन हैं, न हमें इस बात का कोई ज्ञान है कि हमारे चारों ओर जो जगत फैला है, वह क्या है। हम जीवन के बीच में अपने को पाते हैं बिना किसी उत्तर के, बिना किसी समाधान के। चारों तरफ प्रश्न हैं और उनके बीच में मनुष्य अपने को घिरा हुआ पाता है।

मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

रोम रोम रस पीजिए-(साधाना-शिविर)-प्रवचन-09

रोम रोम रस पीजिए-(साधना-शिविर)

ओशो
नौवां प्रवचन
मन के मंदिर में ध्यान का दीया

आज अंतिम चर्चा है। बहुत से प्रश्न मेरे पास इकट्ठे रह गए हैं। बहुत से आज व्यक्तिगत मिलन में पूछे गए हैं। उन सभी प्रश्नों के उत्तर देना संभव नहीं होगा और जरूरी भी नहीं है। जरूरी इसलिए नहीं है कि मैंने इन तीन दिनों में जो थोड़ी सी बातें आपसे की हैं, जिसको वे बातें समझ में पड़ी होंगी, उसे मेरा जीवन को देखने का कोण, जीवन को देखने की दृष्टि समझ में आ गई होगी। जो प्रश्न नहीं मैं उत्तर दे पाऊंगा समय के अभाव के कारण, अगर मेरी दृष्टि खयाल में आ गई है, तो उन प्रश्नों के उत्तर खुद भी समझे जा सकते हैं। इसलिए जरूरी नहीं है। और इसलिए भी सभी प्रश्नों के उत्तर देना जरूरी नहीं है कि प्रश्न है आपका, मेरे उत्तर क्या करेंगे? मेरे उत्तर चिंतन की एक दिशा की ओर इंगित कर सकते हैं। लेकिन मेरे उत्तर आपके प्रश्नों के उत्तर नहीं बन सकते। अपना उत्तर तो आपको खोजना पड़ेगा। इसलिए जरूरी नहीं है। किस दिशा में चिंतन करें? चिंतन की प्रक्रिया क्या हो?

रोम रोम रस पीजिए-(साधाना-शिविर)-प्रवचन-08

रोम रोम रस पीजिए-(साधना-शिविर)

ओशो
आठवां-प्रवचन
आदमी की एकमात्र कमजोरी--अहंकार

सत्य की खोज या स्वयं की खोज या परमात्मा की खोज न तो ज्ञान से होती है, न भक्ति से; क्योंकि ज्ञान भी हमारे अहंकार के केंद्र पर इकट्ठा हो जाता है और भक्ति भी। मनुष्य का अहंकार जहां है, वहां कोई संभावना सत्य के द्वार खुलने की नहीं है। और मनुष्य जो कुछ भी करेगा, वह सभी उसके अहंकार का पोषण बन जाता है। मनुष्य जो कुछ भी करेगा उस सबके पीछे, मैं कर रहा हूं, इस भावना को छोड़ना असंभव है। वह चाहे समर्पण कर दे, तो भी मैंने किया है समर्पण, यह बोध पीछे खड़ा रह जाएगा। वह चाहे सेवा करे, वह चाहे प्रेम करे, वह चाहे प्रार्थना करे, वह चाहे शास्त्रों से ज्ञान को अर्जित करे, लेकिन मैं का भाव, ईगो, अहंकार पीछे खड़ा रहेगा। और जो कुछ भी किया जाएगा उस सबसे वह अहंकार और भी बलिष्ठ हो जाता है।

रोम रोम रस पीजिए-(साधाना-शिविर)-प्रवचन-07

रोम रोम रस पीजिए-(साधना-शिविर)
ओशो
सातवां-प्रवचन
दूसरे पर श्रद्धा आत्म-अश्रद्धा की घोषणा है

एक मित्र ने पूछा है: सत्संग क्या है? कैसे किया जाए?

अब तक सत्संग के केंद्र में सदगुरु, कोई संत, कोई महात्मा रहा है; सत्संग के केंद्र में गुरु रहा है; कहीं जहां सत्य मिल सके वहां जाना चाहिए, ऐसा भाव रहा है। लेकिन मेरी दृष्टि में, सत्संग के केंद्र में गुरु नहीं, वरन शिष्य ही है। यह सवाल नहीं है कि किससे आप सीखने जाएं, सवाल यही है कि क्या आपमें सीखने की क्षमता विकसित हुई? यह बहुत महत्वपूर्ण नहीं है कि आप कहां जाएं, यह महत्वपूर्ण है कि आपके भीतर सीखने का दृष्टिकोण, एटिटयूड ऑफ लघनग है या नहीं?

रोम रोम रस पीजिए-(साधाना-शिविर)-प्रवचन-06

रोम-रोम रस पीजिए-(साधना-शिविर)
ओशो
छठवां-प्रवचन
धर्म है आत्म-स्मरण

ज्ञान मार्ग नहीं है। ज्ञान ही रोक लेता है, अटका लेता है। ज्ञान का बोझ मन को इतना भारी कर देता है कि फिर सत्य तक की यात्रा करनी कठिन हो जाती है। ज्ञान के तट से जिनकी नाव बंधी है, वे सत्य के सागर में यात्रा नहीं कर सकेंगे। इस संबंध में थोड़ी सी बातें कल सुबह मैंने आपसे कही थीं।
स्वभावतः, यदि ज्ञान मार्ग नहीं है, तो एक दूसरा विकल्प है जो सदियों से प्रस्तुत किया गया है। वह दूसरा विकल्प है: भक्ति का, कल्पना का। यदि ज्ञान नहीं है द्वार सत्य के लिए, तो फिर भक्ति है, समर्पण है, भावना है, कल्पना है। दूसरा विकल्प, दूसरा ऑल्टरनेटिव, ज्ञान के विरोध में मनुष्य के सामने प्रस्तुत किया गया है, वह है भक्ति का।

रोम रोम रस पीजिए-(साधाना-शिविर)-प्रवचन-05

रोम रोम रस पीजिए-(साधना-शिविर)
ओशो
पांचवां प्रवचन
आध्यात्मिक विकास में चरित्र का स्थान

किसी मित्र ने पूछा है: वैयक्तिक आध्यात्मिक विकास में चरित्र का कोई स्थान है या नहीं?
किसी और ने भी पूछा है कि ज्ञान छोड़ देना पड़ेगा, भक्ति छोड़ देनी पड़ेगी, तब भी नैतिकता को तो पकड़ना होगा, आचरण को तो पकड़ना होगा!

एक और मित्र ने भी, नीति और धर्म का क्या संबंध है, इस संबंध में पूछा है।

सबसे पहले इसी प्रश्न को मैं ले लेता हूं। अब तक ऐसी ही धारणा रही है कि नैतिक हुए बिना धार्मिक नहीं हुआ जा सकता है। नैतिक जीवन को साधा जाए, मॉरेलिटी को, तो ही कोई धार्मिक हो सकता है। नीति धर्म की पहली सीढ़ी है, ऐसी धारणा रही है।
मेरे देखे, बात बिलकुल उलटी है। नैतिक होने से तो कोई धार्मिक नहीं होता, लेकिन जो धार्मिक हो जाता है वह जरूर नैतिक हो जाता है। आचरण केंद्र नहीं है जीवन का, केंद्र तो है अंतरात्मा, अंतस। तो जिसका अंतःकरण परिवर्तित हो जाता है, उसका आचरण तो निश्चित ही बदल जाता है। लेकिन आचरण कोई बदल ले और सोचे कि इससे अंतःकरण बदल जाएगा, तो भूल हो जाती है।