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बुधवार, 12 अप्रैल 2017

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-065

अमृत से परिचय : मौत के क्षण निस्तरंग चित्त पर—प्रवचन—65


 सूत्र:

      न कहापणवस्‍सेन तित्‍ति कामेसु विज्‍जति।
      अप्‍पस्‍सादा दुखाकामा इति विज्‍जाय पंडितो ।।162।।


      अपि दिब्‍बेसु कामेसु रतिं सो नाधिगच्‍छति।
      तण्‍हक्‍खयरतो होति सम्‍मासंबुद्धसावको ।।163।।

      वहुं वे सरणं यंति पब्‍बतानि वनानि च।
      आरामरूक्‍खचेत्‍यानि मनुस्‍सा भयतज्‍जिता ।।164।।

      नेतं खो सरणं खेमं नेतं सरणमुत्‍तमं।
      नेतं सरणमागम्‍म सब्‍बदुक्‍खा पमुच्‍चति ।।165।।

      यो च बुद्धज्‍च धम्‍मज्‍च संधज्‍च सरणं गत्‍तो।
      चत्‍तारि अरियसच्‍चानि सम्‍मप्‍पज्‍जाय पस्‍सति ।।166।।

      दुक्‍खं दुक्‍खसमुप्‍पादं दुक्‍खस्‍स च अतिक्‍कमं।
      अरियज्‍चट्ठंगिके मग्‍गं दुक्‍खूपसमगामिनं ।।167।।

      एतं खो सरणं खेमं एतं सरणमुतमं ।
      एतं सरणमागम्म सब्‍बदुक्खा पमुच्चति ।।168।।


     काफी के प्यालों में कब तक डुबाओगे
            अंतरंग कडुवापन
            मुझसे यह पूछा है उकतायी शाम ने
            और मैं निरुत्तर हूं
            उन्हीं—उन्हीं सड्कों पर रोज—रोज घूमना
            बेगाने दृश्यों को आंखों से चूमना
            व्यर्थ है, निरर्थक है, कब तक बहलाएंगी
            सजी हुई दुकानें
            भड़कीले विज्ञापन
            मुझसे यह पूछा है घबरायी शाम ने
            और मैं निरुत्तर हूं
            थकी हुई आंखों में चुभती है रोशनी
            ठंडा अधियार नहीं
            डरे हुए बच्चे की चुप्पी का
            कोलाहल कोई उपचार नहीं
            ऊबी तन्हाई के वास्ते क्या मतलब रखता है
            भीड़ों का सम्मोहन
            मुझसे यह पूछा है धुंधलायी शाम ने
            और मैं निरुत्तर हूं
            केवल कोहरा नहीं भटकाता पांवों को
            क्षितिज स्वयं
            और भी निरीह बना देता है व्यक्ति को
            क्षुद्र अहं
            आरोपित गीतो से कब तक झुठलाओगे स
            हजन्मा सूनापन
            मुझसे यह पूछा है सवलायी शाम ने
            और मैं निरुत्तर हूं
आदमी के पास जब तक जीवन का उत्तर न हो, तब  , सभी व्यर्थ हो जाता है।
सुकरात का प्रसिद्ध वचन है कि जो जीवन ठीक से नहीं गया, वह जीवन जीना व्यर्थ है। जिसको जागकर नहीं जीआ गया, उसे जीआ ही नहीं गया।
सोए—सोए जीते हैं हम। चलते भी, उठते भी, काम भी करते, जन्म से लेकर मौत तक की लंबी यात्रा पूरी भी करते, लेकिन पहुंचते कहां  हैं? पहुंचते कहीं भी नहीं। यात्रा पूरी हो जाती, हम चुक जाते और मंजिल तो कभी आती नहीं। ऐसे जीवन को, ऐसे उत्तरहीन जीवन को, ऐसे अर्थहीन जीवन को कब तक जीवन मानकर बैठे रहोगे?
और फिर इस जीवन को अगर जीवन मान लिया, तो अपने को झुठलाने के हजार उपाय करने पड़ते हैं। क्योंकि लाख कोशिश करो तो भी कहीं भीतर किसी तल पर तुम्हें लगता रहता है, कुछ व्यर्थ हो रहा है, कुछ नाहक किए जा रहे हैं। तो उसे झुठलाने को शराब पीओ, संगीत सुनो, वेश्यागामी बनो। उसे झुठलाने को और नए झूठ गढो। उसे भुलाने को विस्मरण के नए उपाय खोजो। उन उपायों को लोग मनोरंजन कहते हैं। मनोरंजन के सभी उपाय आत्म—विस्मरण के उपाय हैं।
बुद्धपुरुष कहे जाते, भीतर देखो, हम भीतर देखते नहीं, क्योंकि भीतर तो अंधियारा है। बुद्धपुरुष कहते, भीतर उजियारा है, हम भीतर देखने में डरते हैं, क्योंकि भीतर तो अंधियारे के सिवाय कुछ दिखायी नहीं पड़ता।
इस अंधियारी रात से जो गुजरेगा, वही भीतर की सुबह को उपलब्ध होता है। जो इस अंधियारी रात से डरकर बाहर —लौट गया, उसकी तो सुबह कभी भी नहीं आती। फिर बिना प्रकाश के तृप्ति नहीं है।
बिना जीवन का सम्यक बोध पाए तुम जो भी करोगे, सब व्यर्थ जाएगा। सम्यक बोध के बाद तुम जो भी करोगे, सार्थक होने लगेगा। फिर तुम्हारे हाथ में पारस पत्थर है, तुम जो छुओगे, सोना हो जाएगा। मूर्च्छा ऐसी है कि तुम जो छुओगे, सोना भी तो मिट्टी हो जाएगी।
देखते नहीं, धनी हैं लोग और कैसी निर्धनता भीतर घिरी है। पद पर हैं और भीतर कैसे दीन हैं। सब है और बिलकुल खाली हैं। इसी दौड़ में तुम पड़े हो। इसी दौड़ में प्रत्येक पड़ा है। क्यों? क्योंकि जन्म के साथ तुम्हें जिनका सत्संग मिलता है—अगर उसको सत्संग कहें—तो वे सभी दौड़ रहे हैं। उनके दौड़ने की संक्रामक बीमारी हर बच्चे को लग जाती है। हम पागलों की भीड़ में पैदा होते हैं, तो पागलों का रोग हमें लग जाता है।
स्वभावत: बच्चा वही सीखता है जो दूसरे कर रहे हैं। बाप कर रहा, भाई कर रहा, परिवार कर रहा, समाज कर रहा, दुनिया कर रही, बच्चा वही करने लगता है जो सारी दुनिया कर रही है। होश आते —आते आदतें मजबूत हो जाती हैं। होश आते— आते गलत करने में आदमी बहुत कुशल हो जाता है। इतना कुशल हो जाता है कि अब उससे लौटना भी मुश्किल हो जाता है। उस कुशलता में प्रतिष्ठा मिल जाती है।
एक कवि बड़ा उदास था। किसी मित्र ने उससे पूछा कि इतने उदास क्यों हो? उसने कहा, मैं उदास इसलिए हूं कि कवि मुझे होना ही नहीं था। और कविता मेरे भीतर से सहज आती भी नहीं। तुकबंद हूं मैं, जबरदस्ती तुके बांधता रहता हूं। तो उसके मित्र ने कहा, तो फिर छोड़ क्यों नहीं देते? दुनिया में लाख काम हैं, कोई कविता ही एक काम है! मुझे देखो, मैं तो कोई कवि नहीं हूं, मैं भी जी रहा हूं। उस कवि ने कहा, अब बहुत मुश्किल है, अब मैं प्रसिद्ध हो चुका हूं। अब लोग मुझे कवि की तरह सम्मान देते हैं। अब मैं प्रतिष्ठित हो चुका हूं अब लौटना मुश्किल है। अब यह प्रतिष्ठा नहीं गंवा सकता हूं। और भीतर रस भी नहीं आता है।
तब तुम एक दुविधा में पड़ गए। तब तुम्हारे गले में फांसी लगी। जो कर रहे हो, उसमें रस नहीं है। जो हो, उसमें रस नहीं है। जिसमें रस हो सकता था, उसके करने की भाषा भूल गए। जिसमें रस होता, वह कभी किया नहीं, उस दिशा में कभी जीवन को बहाया नहीं, इसलिए लोग इतने उदास हैं। इतने थके—मांदे हैं, इतने टूटे—फूटे हैं, इतना भीतर मरुस्थल जैसा सन्नाटा है। कहीं कोई भीतर संगीत नहीं बजता, सुर नहीं फूटते, रस नहीं बहता।
धर्म की खोज पुन: उस रस की खोज है, जिससे हम वंचित हो गए हैं, जो हमारी निजी संपदा है, जो होना ही चाहिए। उपनिषद कहते हैं. रसो वै सः। उस परमात्मा का स्वभाव रसरूप है। उसी रस की खोज है धर्म।
बुद्ध ने आज के सूत्रों में उस रस की खोज के लिए कुछ बड़ी बहुमूल्य बातें कही हैं।

पहले सूत्र—

            क कहापणवस्सेन तिति कामेसु विज्जति ।
            अप्पस्सादा दुखाकामा इति विज्जाय पंडितो ।।
            अपि दिब्बेसु कामेसु रति सो नाधिगच्छति।
            तण्हक्सयरतो होति सम्मासंबुद्धसावको ।।

'यदि रुपयों की वर्षा भी हो तो भी मनुष्य की कामों से तृप्ति नहीं होती। सभी काम अल्पस्वाद और दुखदायी हैं, ऐसा जानकर पंडित देवलोक के भोगों में भी रति नहीं करता है। और सम्यक संबुद्ध का श्रावक तृष्णा का क्षय करने में लगता है। ' इसके पहले कि हम सूत्र समझें, सूत्र की पृष्ठभूमि समझ लेनी चाहिए—कब बुद्ध ने यह सूत्र कहा, कब यह गाथा कही?

क भिक्षु था बुद्ध का उसका नाम था, दहर। उस भिक्षु का पिता मरते समय अपने बेटे को देखना चाहता था लेकिन दहर गांव के बाहर गया था। तो देखना चाहते हुए भी पिता देख नहीं पाया। मरते— मरते इस बेटे का नाम ही उसकी जबान पर उसके मन उसके चित्त में था। नाम लेकर रोते— रोते ही वह मरा। मरने के पहले उसने अपने छोटे बेटे को सौ स्वर्णमुद्राएं दीं और कहा कि जब दहर आए तो मेरी तरफ से उसे भेट कर देना।
पीछे कुछ दिनों बाद दहर गांव वापस लौटा। उसके छोटे भाई ने रोकर सारा समाचार कहा और उन स्वर्णमुद्राओं को दिया। लेकिन दहर ने स्वर्णमुद्राएं फेंक दीं। भिक्षु कहीं स्वर्णमुद्राएं छूता! और उसने कहा कि तू भी किस तरह की बात कर रहा है मुझे भ्रष्ट करना चाहता है? कामिनी और कांचन तो त्याज्य हैं। यह मिट्टी है तू इनको सोना समझता है?
इस इनकार में बोध कम था अहंकार ज्यादा था। वह कुछ दिनों तक अन्य भिक्षुओं से अपने इस त्याग की घमंडपूर्वक चर्चा भी करता रहा। लेकिन कुछ दिनों बाद वह उदास रहने लगा। वे स्वर्णमुद्राएं उसका पीछा करने लगीं। रात उनके सपने भी आते। दिन में विचार भी बार— बार आता। सोचने लगा क्यों छोड़ दीं स्वर्णमुद्राएं? किसको पता चलता ले ही लेता! सम्हालकर रख लेता वक्त— बेवक्त काम पड़ जातीं। फिर रोज— रोज यह भिक्षा मांगना दीन की भांति घर— घर से भिक्षा मांगना इससे तो बेहतर था कि उन स्वर्णमुद्राओं के सहारे सुख— सुविधा से जीता। रखा भी क्या है इस भिक्षु होने में! मुझसे बडी भूल हो गयी और एक रात यह विचार इतनी तीव्रता से उसे पकड़ा कि उसने सोच ही लिया कि कल सुबह बुद्ध से क्षमा मां गकर भिक्षु का भेष त्यागकर गृहस्थ हो जाऊंगा।
भिक्षुओं ने जाकर बुद्ध को खबर दी। उन्होंने कहा यह होगा ऐसा निश्चित ही था। धन के त्याग में जो प्रशंसा लेना चाहता है वह धन में अपने रस की घोषणा करता है। भोगी और त्यागी में बहुत भेद नहीं है, भोगी धन को पकडता त्यागी धन को छोड़ता लेकिन दोनों के मन में धन का मूल्य है। दोनों मानते हैं कि धन कुछ है धन धन है। भोगी लोलुप होकर दौड़ता है धन की तरफ त्यागी भयभीत होकर भागता है धन की तरफ से। दोनों की दिशाएं अलग— अलग लेकिन दोनों का राग— रंग एक ही है। धन अभी सार्थक है व्यर्थ नहीं हुआ। इसलिए मैं सोचता था कि यह घड़ी आएगी। असली बोध तो त्याग और भोग दोनों से मुक्ति है। असली बोध न तो धन को पकड़ता है न धन को छोड़ता है; धन में न पकड़ने योग्य कुछ है न छोड़ने योग्य कुछ है।
फिर उन्होंने दहर को बुलाकर कहा पागल इतनी सी स्वर्णमुद्राओं से होगा भी क्या! सौ स्वर्णमुद्राएं कितने दिन चलेंगी? इससे तेरी तृष्णा तृप्त होगी? तृष्णा दुष्‍पुर है। ये थोड़ी सी स्वर्णमुद्राएं तो और भी अग्नि में घी का काम करेगी।
और तब उन्होंने यह गाथा कही। ये भिक्षु दहर को कहे गए वचन हैं।
तो पहले तो इस घटना को ठीक से समझ लें, आत्मसात कर लें। पहली बात, पिता मर रहा है, लेकिन अपना स्मरण नहीं है उसे। मरते वक्त भी आदमी और का ही स्मरण करता रहता है। यह भी कैसा पागलपन है! जीवन गंवाते हम, मौत का अपूर्व क्षण भी गंवा देते हैं—दूसरे का ही स्मरण चल रहा है मरते क्षण भी, रो रहा है बेटे के लिए। अपने लिए कब रोओगे? मरते क्षण भी बेटे की याद कर रहा है, अपनी याद कब करोगे? जीवन भी गंवाया दूसरों की याद में, मरने की घड़ी भी होश नहीं आता! मौत जैसी पीड़ादायी घड़ी में भी तुम जागते नहीं! मौत का त्रिशल तुम्हारे प्राणों में छिदा जाता है, फिर भी तुम जागते नहीं, तुम्हारी नींद अदभुत है।
मरते समय आदमी अक्सर ही वही—वही याद करता—करता मरता है, जो जीवनभर किया, जो 'जीवनभर का सार—निचोड़ है। अनेक लोग सोचते हैं कि मरते समय प्रभु का स्मरण कर लेंगे। इतना आसान नहीं। अगर जीवन भर प्रभु का स्मरण किया हो, तो ही मरते समय स्मरण प्रभु का होगा। क्योंकि मृत्यु में तो वही सिकुड़कर बीज बन जाता है जो जीवनभर बोया है। मृत्यु तो तुम्हारे सारे जीवन की परीक्षा है, परीक्षा की घड़ी है। ऐसा थोड़े ही कि जीवनभर कुछ भी किया और मृत्यु के क्षण में प्रभु को स्मरण कर लिया। किसको धोखा दे रहे हो! मृत्यु तो सील—मोहर बंद कर देगी, तुमने जीवनभर जो किया है, उस पर पूरी सील—मोहर लगा देगी कि यह तुम्हारी कथा है। मृत्यु तो संक्षिप्त में, एक वक्तव्य में तुम्हारे जीवन को निचोड़ लेगी।
लेकिन लोभी आदमी सोचता है, कल। प्रभु का स्मरण करेंगे, जरूर करेंगे, कल। अभी तो घर है, द्वार है, बच्चे हैं, बेटे हैं, पत्नी है, दुकान है, बाजार है, अभी तो और हजार काम हैं। प्रभु को देख लेंगे आखिर में। तुम्हारी जीवन की फेहरिश्त में प्रभु का नाम अंत में लिखा है।
और जिसकी जीवन—फेहरिश्त पर प्रभु का नाम अंत में लिखा है, वह कभी स्मरण न कर सकेगा। वह जीवन की फेहरिश्त कभी पूरी ही नहीं होती। वह फेहरिश्त बढ़ती चली जाती है। वह बड़ी होती चली जाती है। एक में से दो चीजें, दो में से चार, चार में से दस, दस में से हजार निकलती आती हैं। हर रास्ते से दो नए रास्ते निकल आते हैं और हर शाखा दो शाखाओं में टूट जाती है और तुम दौड़ते चले जाते हो, दौड़ते चले जाते हो। जाल बड़ा होता चला जाता है। और जीवन की संपदा और शक्ति और ऊर्जा कम होती चली जाती है। और तुम सोचते हो, अंत में प्रभु का स्मरण कर लेंगे। या अपना स्मरण कर लेंगे। या अंत में कर लेंगे ध्यान।
मेरे पास लोग आते हैं, वे कहते हैं कि संन्यास तो लेना है, लेकिन अभी नहीं—। अभी तो बहुत कुछ जीवन में करने को पड़ा है। जैसे कि संन्यास तब लेना है जब जीवन में कुछ करने को न रह जाएगा। कभी ऐसा हुआ है? कभी किसी के जीवन में ऐसा हुआ है कि ऐसी घड़ी आ गयी हो कि अब करने को जीवन में कुछ भी नहीं रह गया? कभी ऐसा नहीं हुआ। जीवन ऐसा मौका ही नहीं देता। जीवन तो एक काम पूरा नहीं हुआ कि दस नए काम शुरू करवा देता है। एक वासना चुकने के करीब आती नहीं कि दस वासनाएं पैदा हो जाती हैं।
वासना बड़ी जन्मदात्री है। दस बच्चे पैदा कर जाती है। ध्यान बांझ है। विचार बांझ नहीं है। समाधि बांझ है, उसमें से फिर कुछ पैदा नहीं होता। लेकिन वासना बांझ नहीं है। वासना तो खूब पैदा करती है—एक वासना से दूसरी, दूसरी से तीसरी, चलता जाता है। श्रृंखला का कोई अंत नहीं।
ऐसा ही समझो कि तुमने एक कंकड़ झील में फेंका, शात झील, एक कंकड़ फेंका। जरा सी लहर उठती है, लेकिन एक लहर दूसरी लहर को उठाती है, दूसरी तीसरी को उठाती है—एक छोटा सा कंकड़ मीलों लंबी झील पर लहरें उठा देता है। ऐसी वासना है। एक छोटा सा भाव वासना का और लहर ही लहर तुम्हारी चेतना की झील पर फैल जाती है। वासना उठानी तो बहुत आसान, हटानी बहुत कठिन। क्योंकि जब तुम उठाते हो तब छोटा सा कंकड़ काम दे देता है, लेकिन जब बिठाने चलोगे तो सारी झील! झील बडी है, सारी लहरों को बिठाना बहुत मुश्किल हो जाता है। और लोग सोचते हैं कि अंत में याद कर लेंगे। और इन्हीं लोगों ने इस तरह की कहानियां भी गढ रखी हैं कि अंत में याद करने से सब हो जाता है।
तुमने कहानी सुनी है न अजामिल की, कि अजामिल मरा। उसने कभी जीवन में परमात्मा का नाम न लिया, लेकिन उसके बेटे का नाम नारायण था। मरते वक्त उसने बुलाया, नारायण! नारायण तू कहां  है? और ऊपर के नारायण समझे कि मुझे बुला रहा है। वह अपने बेटे को बुला रहा था, उसको ऊपर के नारायण से कुछ लेना—देना न था। मर गया नारायण को पुकारते और ऊपर के नारायण धोखे में आ गए और वह स्वर्ग गया।
यह जिन ने कहानी गढ़ी है, इनसे सावधान रहना! इस तरह के लोगों से सावधान रहना! किसको तुम धोखा दे रहे हो? और अगर तुम्हारा परमात्मा इस तरह धोखे में आता है तो दो कौड़ी का परमात्मा है। इस तरह के परमात्मा का कोई मूल्य नहीं है। तुम्हारी आत्मा जिस दशा में होगी, वही अंकित होगा अस्तित्व पर, उससे अन्यथा कुछ भी अंकित नहीं हो सकता।
तो यह दहर का बाप मर रहा था। बेटा भिक्षु हो गया है, तो भी इसे याद नहीं आती कि कुछ अपनी सोचे, कुछ अपनी सुध ले। बल्कि मरते वक्त आदमी और— और तीव्रता से दूसरी बातें— सोचने लगता है। यह भी एक तरकीब है, ताकि मौत दिखायी न पड़े। जैसे—जैसे मौत करीब आने लगती है आदमी की, वैसे—वैसे आदमी सब तरह से अपने को उलझा लेता है विचारों में, ताकि मौत दिखायी न पड़े। यह भी सांत्वना की तरकीब है। यह अपने को दूसरी दिशा में लगा लेने का उपाय है।
तो मरता था, बेटे को देखना चाहता था। मौत भी तुम्हें नहीं बताती कि सब संबंध टूट जाने वाले हैं, सब संबंध मनगढ़ंत हैं। कौन बेटा, कौन बाप! मौत आ गयी, तुम चलने को तैयार हो गए हो, फिर भी इस संसार में पैर रोपे रखना चाहते हो। मरता था बाप, बेटे को देखना चाहता था, लेकिन भिक्षु गया था गांव के बाहर, तो बाप रोता हुआ, अपने बेटे का नाम ले—लेकर मर गया। और सौ स्वर्णमुद्राएँ छोड़ गया। खुद भी जीवनभर धन इकट्ठा किया होगा और अब सब धन छूटा जा रहा है तो भी अभी उसे समझ में नहीं आया कि धन निर्मूल्य है। अभी वह धन छोड़ जाता है अपने बेटे के लिए।
अगर बाप में थोड़ी समझ हो तो बेटे के लिए बोध छोड़ जाएगा, धन क्या छोड़ जाना! धन में खुद अपना जीवन गंवाया और अब बेटे के लिए भी उपाय किए जा रहे हो! अगर बाप में थोडा बोध हो तो अपने जीवन की पूरी असली संपदा—असली संपदा यानी अनुभव की संपदा—कि धन व्यर्थ है, कि भोग व्यर्थ है, कि दौड व्यर्थ है, कि दौड़ा— धापी, आपाधापी, सब कुछ काम नहीं आती, मौत सब छीन लेती है, ऐसा सूत्र अपने बेटे को छोड़ जाएगा। मरते वक्त अगर बाप में थोड़ी भी समझ हो तो वह कह जाएगा कि मेरे बेटे को इतनी बात कह देना कि जो —जो मैंने किया, सब व्यर्थ गया, तू समय मत गंवाना, इसमें मत उलझना।
लेकिन कब बाप ऐसी समझ की बात कह पाते हैं! हालांकि हर बाप समझता है कि वह समझदार है। उम्र बढ़ने से कोई समझदार नहीं होता, का होने से कोई समझदार नहीं होता, समझदारी का बुढ़ापे से कुछ लेना—देना नहीं है। समझदारी कुछ और ही बात है। अनुभवों की बहुत बड़ी श्रृंखला से कोई समझदार नहीं होता, लेकिन अनुभवों के बीच में से सारसूत्र खोज लेने से कोई समझदार होता है।
तुमने एक बार क्रोध किया, तुमने दो बार क्रोध किया, तुमने हजार बार क्रोध किया, इससे थोड़े ही समझ बढ़ेगी। सच तो यह है कि तुमने हजार बार क्रोध किया, यह यही बताता है कि तुम्हारी समझ घटी, बढ़ी नहीं। समझदार होते तो एक बार क्रोध कर लेते और समझ जाते कि बात व्यर्थ है। दुबारा करने की क्या जरूरत पड़ती! दुबारा करना पड़ा, क्योंकि पहली बार समझ न आयी। तीसरी बार करना पड़ा, क्योंकि दूसरी बार समझ न आयी। लाख बार करना पड़ा। और जैसे—जैसे समझ न आयी वैसे —वैसे तुम्हारा क्रोध करने का अभ्यास बढ़तो गया। आखिर में तुम पाते हो, क्रोध तो बहुत किया, लेकिन समझे कुछ भी नहीं। लोभ तो बहुत किया, समझे कुछ भी नहीं। काम में बहुत तडूफे, लेकिन समझे कुछ भी नहीं।
तो उम्र को तुम समझदारी मत समझ लेना। उस भूल में मत पड़ना। इस संसार में लोग उस भूल में पड़ जाते हैं। लोग सोचते हैं कि उम्र बडी हो गयी तो समझदार हो गए। समझदारी अनुभव के प्रति जागने से पैदा होती है, मात्र अनुभव की राशि बड़ी होती चली जाए, इससे पैदा नहीं होती। जो तुम कर रहे हो, जो तुम्हारे जीवन में हो रहा है, उसे खूब बोधपूर्वक करो, उसे खूब समझकर करो, सब तरफ से परख करके करो। एक बार जो किया है, फिर उसका खूब विश्लेषण करो, निदान करो कि क्या मिला, क्या पाया, क्या हुआ? अगर कुछ न पाया हो, तो दुबारा थोड़ी सावधानी रखो। नहीं तो जाल अंधी आदत का बड़ा हो जाएगा।
मर रहा है बाप, सब संपत्ति छूटी जा रही है, मरते वक्त भी इस व्यर्थ की संपदा को बेटे के लिए छोड़ जाता है। तुमसे मैं कहूंगा, ऐसा मत करना। तुम्हारे भी बेटे होंगे, उनके लिए कुछ और बहुमूल्य छोड़ जाना, कोई और बड़ी वसीयत छोड़ जाना। कुछ दिनों बाद बेटा वापस लौटा—भिक्षु दहर गांव आया। तो उसके छोटे भाई ने रोकर समाचार कहा, उन स्वर्णमुद्राओं को दिया, लेकिन भिक्षु ने स्वर्णमुद्राएं फेंक दीं।
यह बात भी अज्ञान की है। अगर स्वर्णमुद्राओं में कुछ भी नहीं है, तो फेंकने का इतना उत्साह क्या। इसलिए मैं कहता हूं कि घर छोड्कर भागना मत, क्योंकि घर छोड़ने का उत्साह यही बताता है कि तुम्हें अब भी घर में कुछ दिखायी पड़ता है। मैं तो कहता हूं घर में कुछ है ही नहीं, भागकर जाना कहा है? है ही नहीं वहां कुछ, हिमालय पर तुम हो ही, घर में सूना है, कुछ भी नहीं है वहां।
इसलिए मैं कहता हूं पत्नी को छोड्कर मत भाग जाना। पत्नी की मान्यता गिर जाए, बस काफी है। पत्नी के प्रति पत्नी— भाव गिर जाए, बस काफी है। पत्नी में भी परमात्मा दिखायी पड़ने लगे, बस काफी है। मेरा—तेरा गिर जाए, वही झूठ है। लेकिन वह झूठ तो नहीं छोड़ते। अगर तुम हिमालय भी भाग गए, तो भी तुम्हारी पत्नी तुम्हारी है, यह झूठ तो तुम्हारे साथ जाता है, पत्नी छोड़ जाते हो।
स्वामी राम के जीवन में एक उल्लेख है, वह अमरीका से लौटे हैं। सरदार पूर्णसिंह उनके शिष्य थे और उनके पास हिमालय में रहते थे। एक दिन उनकी पत्नी दूर पंजाब से मिलने आयी। पत्नी बड़ी गरीब हालत में थी। स्वामी राम छोड्कर घर भाग गए, पत्नी किसी तरह पाल रही थी बच्चों को, किसी तरह अपना जीवन चला रही थी। किसी तरह थोड़े पैसे इकट्ठे करके कि स्वामी राम वापस आए हैं, उनके दर्शन कर आए, वह हिमालय गयी।
स्वामी राम को पता चला तो उन्होंने सरदार पूर्णसिंह को कहा कि यह झंझट कहां से आ गयी। मैं इससे मिलना नहीं चाहता। तुम किसी तरह इसको टालो। सरदार पूर्णसिंह तो बहुत हैरान हुए, क्योंकि स्वामी राम ने कभी किसी से मिलने से इनकार नहीं किया। कोई भी आया, पुरुष हो कि स्त्री। इस स्त्री से मिलने के इनकार का तो मतलब ही यही होता है कि इसके प्रति अभी भी पत्नी— भाव है। और तो क्या अर्थ होता है! अगर पत्नी— भाव गिर गया तो यह भी वैसी स्त्री है जैसी और स्त्रियां हैं। जब किसी और से मिलने में कोई रुकावट नहीं, तो इससे मिलने में क्या रुकावट है? इस बिचारी का क्या कसूर है?
तो सरदार पूर्णसिंह ने कहा कि अगर आप इस स्त्री से नहीं मिलेंगे, तो मैं आपको छोड्कर जाता हूं। मेरी श्रद्धा डावाडोल हो गयी। क्योंकि आप तो कहते हैं कि सब छोड़ चुके, अगर छोड़ चुके तो यह भाव अब तक मन में क्यों है कि यह झंझट कहां से आ गयी? तो झंझट जरूर कहीं भीतर है।
स्वामी राम को भी समझ में आया—वह बड़े समझदार, बोधवान व्यक्ति थे। उनकी आंख से आंसू गिर गए और उन्होंने कहा, तुम ठीक कहते हो, थोड़ी झंझट मेरे भीतर थी। तुमने मुझे खूब ठीक समय पर चेताया। तुमने मुझे चेता दिया। उसे बुलाओ। वह आयी तो उसके पैर छुए। और उसी दिन उन्होंने संन्यासी का जो पुराना रूप—ढंग था, वह छोड़ दिया। क्योंकि उन्होंने कहा कि उसमें वह जो त्याग की अकड़ है, वही भ्रांत है।
तुम जानकर यह हैरान होओगे कि स्वामी राम गैरिक वस्त्रों में नहीं मरे। जब वह मरे तो वह साधारण वस्त्र पहने हुए थे। पर मैं तुमसे कहता हूं कि वह परम संन्यासी होकर मरे। उनको एक बात समझ में आ गयी कि यह भी अकड़ है मेरी कि मैं त्यागी, कि मैंने सब छोड़ दिया, इसमें भी भ्रांति है। छोड़ने को क्या है, पकड़ने को क्या है!
तो यह जो भिक्षु दहर ने स्वर्णमुद्राएं फेंक दीं, यह तो लक्षण है इस बात का कि इसे स्वर्णमुद्राओं में अभी भी रस है। छिपा हुआ रस है, दबाया हुआ रस है, दमन किया हुआ रस है, अचेतन में दबा पड़ा है, ऊपर तो छोड़ दिया है, मगर भीतर है। तुम इस बात को जरा जांचना अपने जीवन में, तुम जिन चीजों से भागते हो, उनमें तुम्हारा रस होगा। अगर एक सुंदर स्त्री राह से गुजरती है, और तुम आंखें बचा लेते हो, आंख बचाने से क्या होगा? तुम्हारा आंख बचाना बता रहा है कि तुम्हारा सुंदर स्त्री में रसहै। अगर रस खतम हो गया है, तो आंख बचाने की झंझट भी क्या है? किससे आंख बचानी, क्यों बचानी! तुम ऐसे ही चलते रहोगे जैसे तुम चल रहे थे, एक सुंदर स्त्री निकली कि कुरूप स्त्री निकली, स्त्री निकली कि पुरुष निकला, कौन निकला, कौन नहीं निकला, तुम क्या हिसाब रखोगे!
लेकिन सुंदर स्त्री देखकर तुम आंख बचा लेते हो। क्यों? किससे आंख बचा रहे हो? सुंदर स्त्री से या अपनी अचेतन कामना से? अचेतन कामन: से अगर आंख बचा रहे हो, तो कब तक बचाओगे? वह अचेतन कामना बार —बार आएगी, बार—बार आएगी, इकट्ठी होकर और मजबूत होगी, और बलशाली हो जाएगी। नहीं, आंखें मत बचाओ। यह धोखा महंगा पड़ेगा। अगर स्त्री में रस है, तो समझने की कोशिश करो। फिर से समझने की कोशिश करो कि रस क्यों है? इस रस पर ध्यान को लगाओ, पहचानो कि रस क्यों हैं? और तुम्हारे ध्यान की गहराई बढ़ते —बढ़ते एक दिन तुम पाओगे—रस जा चुका। क्योंकि रस भ्रांति है। इसलिए जाएगा ही। रस तो अंधेरा जैसा है, रोशनी ले आओगे तो अंधेरा चला जाएगा। और जब रस चला जाएगा, तब तुम्हारे जीवन में एक क्रांति घटित होती है, तब तुम बाहर— भीतर एक जैसे होते हो, तब चेतन—अचेतन की सीमा टूट जाती है, तब तुम्हारा अंतःकरण एक होता है। और उस एकता में ही आनंद है। उस एकता में ही तुम्हारे सब खंड, तुम्हारी सब विक्षिप्तताएं गिर जाती हैं, तुम अखंड हो जाते हो। तुम अद्वैत को उपलब्ध हो जाते हो। उस स्थिति का नाम ही ब्रह्मभाव है।
इसने फेंक दीं स्वर्णमुद्राएं, नाराज हुआ और कहा कि तूने मुझे समझा क्या है? मैं त्यागी हूं स्वर्णमुद्राएं मुझे देता है, नासमझ! इनमें रखा क्या है, यह तो मिट्टी है।
मगर मिट्टी को तो इस भांति कोई फेंकता नहीं। या कि फेंकते हो? अगर मिट्टी मैं तुम्हारे हाथ में दे दूं तो तुम फेंकोगे? तुम शायद रख दोगे, तुम कहोगे, मिट्टी है। बात खतम हो गयी। फेंकने में तो जोश—खरोश है, फेंकने में तो उत्साह है, फेंकने में तो मजा है, फेंकना तो खबर दे रहा है कि तुम डर गए हो। जल्दी छूट जाओ, कहीं ज्यादा देर हाथ में रह गयीं स्वर्णमुद्राएं, तो कहीं ऐसा न हो कि मुट्ठी बंध जाए। इसके पहले कि मुट्ठी बंधे, फेंक दो। लेकिन मुट्ठी तो बंध ही गयी। तुम्हारे फेंकने में ही बंध गयी। इस भ्रांति को अपने जीवन में खयाल में रखना, यह सबकी भ्रांति है, इसलिए इस कहानी को मैं विश्लिष्ट कर रहा हूं ताकि तुम्हें समझ में आ जाए।
स्वाभाविक था कि वह भिक्षुओं से अपने त्याग की घमंडपूर्वक चर्चा करने लगा। वह कहने लगा, देखा, यूं फेंक दीं सौ स्वर्णमुद्राएं! जानते हो सौ स्वर्णमुद्राएं कितनी होती हैं? उस जमाने में सौ स्वर्णमुद्राएं बहुत थीं। पूरा जीवन आदमी मजे से रह सकता था। काफी थीं। तो वह चर्चा करने लगा। शायद धीरे — धीरे वह सौ की दो सौ बताने लगा हो, पांच सौ बताने लगा हो, हजार बताने लगा हो, कि देखा! क्योंकि ऐसे ही तो बढ़ता है आदमी। धीरे — धीरे झूठ बड़ा होता जाता है। अब तो फेंक ही चुका था, सौ थीं कि हजार, हिसाब भी भूल गया होगा, कहने लगा होगा—हजारों स्वर्णमुद्राएं फेंक दीं।
मैं एक सज्जन को जानता हूं जिन्होंने घर—द्वार छोड़ दिया। होमियोपैथी के डाक्टर थे। अब आप समझते हैं कि होमियोपैथी के डाक्टर की कोई खास कमाई तो होती नहीं। होमियोपैथी के डाक्टर की कमाई एलोपैथी के कंपाउंडर से कम होती है। कुछ चलती—वलती भी दुकान नहीं थी, उनको मैं भलीभांति जानता था। कोई दुकान चलती भी नहीं थी, ऐसे ही मक्खियां उड़ाया करते थे और अखबार पढ़ा करते थे। फिर पत्नी मर गयी, सो उन्होंने संन्यास ले लिया।
जब दो साल बाद मेरा उनसे मिलना हुआ तो वह किसी को कह रहे थे—वह तो मैं संयोग से पहुंच गया—किसी को कह रहे थे, कि देखा, मैंने लाखों पर लात मार दी। मैंने उनसे कहा कि महाराज, मैं आपको भलीभांति जानता था। उन्होंने न सोचा था कि मैं ऐसी बात बीच में उठा दूंगा। उनके शिष्य वगैरह बैठे थे और उन्होंने सोचा कि यह तो शिष्टाचारवश भी कोई नहीं कहेगा, इसलिए वे कह गए थे। अब कोई हिसाब से थोड़े ही कहा था, लाखों यानी कोई ऐसा थोड़े ही कि लाखों, थोड़े झिझके। मैंने कहा कि आप जरा ठीक से कहें, कितने रुपए पोस्ट आफिस में थे जब आपने छोड़े? क्योंकि मुझे पक्का पता है। अगर रुपए होते तो आप छोड़ते ही नहीं, यह भी मुझे पता है। कुछ था ही नहीं, छोड़ने का मजा ले लिया है। लाखों छोड़ दिए आप कहते हैं! लाखों होते तो आप बैठकर होमियोपैथी की प्रैक्टिस करते? किसको दे आए लाखों? कहां हैं वह लाखों?
बहुत नाराज हो गए। गुस्से में आ गए। मैंने कहा कि गुस्से की कोई बात नहीं है, लेकिन कैसे आपने बढ़ा लिया यह? क्योंकि जहा तक मुझे खयाल है, तीन सौ चौदह रुपए आपके पोस्ट आफिस में जमा थे। क्योंकि मुझसे आपकी रोज बात होती रहती थी। और जब आपने देखा कि यह भी खतम होने के करीब आ रहे हैं, तो आपने यह त्याग ले लिया। और जहां तक मैं जानता हूं वह पोस्ट आफिस की किताब अब भी आप अपने साथ रखे होंगे, छोड़े कहां  हैं? वक्त—बेवक्त कब काम पड़ जाए!
और फिर मैंने कहा, समझ लो कि लाखों भी थे, तो आप कह रहे हैं कि लाखों पर लात मार दी, तो दो साल हो गए, अब तक इसकी बात क्यों कर रहे हैं? जब लात मार ही दी तो मार ही दी, बात खतम हो गयी। अब कोई लात मार दी तो वह दो साल तक गुणगान थोड़े ही करता रहता है। छोड़ो! लग गयी लात, बात खतम हो गयी। लगी कि नहीं लगी? लग नहीं पायी। एक तो थे ही नहीं, दूसरे लात भी नहीं लग पायी, किस झूठ में अपने को रचाए बैठे हो!
उस समय तो नाराज हो गए, लेकिन फिर सोचा होगा। ऐसे आदमी सरल हैं। रात मुझे फिर बुलाया, कहा, क्षमा करना। ठीक मुझे याद दिला दी, सच में कहां के लाख। और तीन सौ चौदह, तुमने भी हइ कर दी कि याद रखा! और कापी भी मेरे पास है, वह भी सच है। छोड़ा भी कुछ नहीं। पर मैं पहले हजारों कहता था, फिर कब लाखों हो गए, मुझे पता नहीं है।
ऐसा आदमी चलता है।
तो हो सकता है, वह दहर धीरे— धीरे कहने लगा हो, लाखों पर लात मार दी, हजारों पर लात मार दी। मगर भीतर जो रस था, वह पीछा तो छोड़ नहीं देगा। वासनाएं इतनी आसानी से तो छूटती नहीं। इतना सुगम और सस्ता अगर होता तो दुनिया में सभी लोग वासनामुक्त हो जाते।
तो धीरे — धीरे कुछ दिनों बाद वह उदास रहने लगा, क्योंकि बार—बार उन्हीं रुपयों की बात करता था। शायद चर्चा करता था जब दूसरों से, तब भी तो याद ही करने का एक ढंग था, वह भी तो एक याद करने का ढंग था। कहते—कहते कि कितना बड़ा त्याग किया, खुद को भी लगने लगा होगा कि काहे को किया इतना बड़ा त्याग! गांव—गांव जाकर भिक्षा मांगनी पड़ती है!
बुद्ध ने अपने संन्यासी को भिक्षु बना दिया था। कारण से। हिंदू अमने संन्यासी को स्वामी कहते हैं। उसका भी कारण है। क्योंकि हिंदू कहते हैं, जो अपना मालिक हो गया, वह स्वामी। और बुद्ध ने अपने संन्यासी को भिक्षु कहा, वह भी कारण से। दूसरी तरफ से। जो संसार में है, जिसकी कोई पकड़ न रह गयी, जो संसार के सामने बिलकुल भिखारी हो गया, जिसका संसार में कुछ भी न रहा। और ये दोनों बातें एक साथ घटती हैं—जिसका संसार में कुछ भी नहीं रह गया, जो संसार की दृष्टि से भिखारी हो गया, वही भीतर की दृष्टि से मालिक होता है।
तो हिंदुओं ने भीतर से पकड़ी बात, स्वामी कहा। बुद्ध ने बाहर से पकड़ी बात और भिक्षु कहा! लेकिन बुद्ध की बात ज्यादा उपयोगी है। पहले तो वही याद रखनी चाहिए, तभी भीतर का स्वामित्व पैदा होगा। पहले तो आदमी को संसार की दृष्टि में बिलकुल दीन हो जाना है। कुछ है ही नहीं, ऐसे दीन हो जाना है। त्याग' भी नहीं, कुछ भी नहीं, एक खाली, कोरी स्लेट जिस पर कुछ नहीं लिखा हुआ है। ऐसा भिक्षु का अर्थ है कि जिसने सब मान लिया कि यहां कुछ भी नहीं है, अपना क्या, अपनी मालकियत का उपाय कहां है?
तो सोचने लगा होगा कभी राह पर भीख मांगते। किसी द्वार पर भीख मांगता होगा, कोई कह देता होगा, आगे जाओ, तो याद आती होगी सौ स्वर्णमुद्राओं की। वह घाव बन गया। दो—दो पैसे मांगने पड़ते हैं, रोज रोटी मांगनी पड़ती है, तो सोचने लगा होगा—स्वाभाविक, तुम भी होते तो सोचने लगते—कि क्या रखा है इसमें! इससे तो बेहतर हुआ होता कि वे सौ स्वर्णमुद्राएं ले ली होतीं, मजा करते, अपने घर चांदर तानकर, ओढ़कर सोते, कुछ करने की जरूरत नहीं थी जिंदगीभर। अब यह रोज—रोज मांगना—बुढ़ापा भी करीब आ रहा होगा—फिर बुढ़ापे में भी मांगना पड़ेगा। कभी बीमार भी हो जाता है भिक्षु, मांगने नहीं भी जा सकता, तो भूखा भी रह जाना पड़ता है।
और बुद्ध कहते थे, कल के लिए इकट्ठा भी मत करना। आज जो मिल गया, भोजन कर लिया, अगर कुछ बच गया तो बांट देना। कल फिर माग लेना। रोज—रोज जीना, क्षण— क्षण जीना, कल का हिसाब मत रखना, भविष्य है कहां? भविष्य में तो सिर्फ मौत है। मौत तुम्हें खाली पाए। मौत जब आए तो तुम्हारे हाथ में कुछ भी न पाए, तो मौत तुमसे कुछ भी न छीन सकेगी। मौत जब आए, तुम्हें शन्यभाव में पाए, तो तुम अचानक हैरान हो जाओगे कि मौत आयी भी और तुम मरे भी नहीं और तुम्हारे भीतर कुछ अमृत स्वर बजने लगा।
अक्सर यही होता है कि मौत जब आती है तब हम चिंतित हो जाते हैं—मेरे मकान का क्या होगा? मेरे बेटे का क्या होगा? मेरी दुकान का क्या होगा? इसलिए हम चूक जाते हैं भीतर के अमृत को देखने में। हम उन्हीं चीजों में उलझ जाते हैं जो मौत हमसे छीन लेगी। यह पत्नी, ये बेटे, यह धन, यह दौलत, ये सब जा रहे हैं, हम इसी में उलझ जाते हैं। हम हिसाब लगाने लगते हैं कि जीवनभर गंवाया, इतना कमाया; मौत यूं लिए जा रही है!
वह जो क्षणभर का मौका मिलता है, जब मौत हमसे सब छीनती है, अगर उस वक्त हमारे पास कुछ भी न हो—मैं यह नहीं कह रहा हूं कि तुम मकान में न रहो, दुकान में न रहो—अगर सिर्फ तुम्हारे पास यह साफ बोध हो कि अपना यहां कुछ भी नहीं है, खाली हाथ आए थे, खाली हाथ जाना है, मौत क्या खाक छीन लेगी! हमने कभी अपना कुछ बनाया ही नहीं तो मौत क्या छीन लेगी! हम अकेले आए, अकेले जाते, ऐसी भावदशा हो, तो जब मौत तुमसे छीनने की कोशिश करेगी, तब तुम्हारी सारी दृष्टि अपने भीतर के अमृत पर पड़ेगी।
मौत शरीर छीन लेगी, मौत और क्या छीन सकती है! लेकिन तुम शरीर तो नहीं हो। उस घड़ी अगर संसार का प्रपंच तुम्हारे मन में न रहा, मन शात रहा, तो तुम अमृत के दर्शन को उपलब्ध हो जाओगे। तो मौत फिर मोक्ष बन जाती है। जीने की भी एक कला है और मरने की भी एक कला है। न तो लोग जीते ठीक से, न लोग मरते ठीक से।
तो वह सोचने लगा कि दीन की भांति जीने से तो अच्छा था कि स्वर्णमुद्राएं ले लेता। फिर एक रात तो बात बहुत हो गयी, सो ही न सका होगा, सोचते—सोचते उसने तय ही कर लिया, सुबह अपने मित्रों को कहा कि आज तो जाकर भगवान के चरणों में निवेदन कर दूंगा कि सम्हालो अपना यह संन्यास, अब मैं तो चला, वे स्वर्णमुद्राएं मेरी प्रतीक्षा कर रही हैं। मैं सुख से जीयूंगा, हो गया अब बहुत। यह झंझट अपने से नहीं होती! फिर सार भी क्या है? पाया भी क्या?
मेरे पास लोग आ जाते हैं, कि संन्यास लिया था सालभर हो गया, अभी तक कुछ मिला नहीं। तो छोड दें संन्यास? मैं उनसे पूछता हू संसार में रहते जन्म—जन्म हो गए, कुछ न मिला, और संन्यास सालभर हुआ और कुछ न मिला और छोड़ने की तैयारी है, तो शायद लिया ही न होगा।
छोड़ते वही हैं जिन्होंने कभी लिया ही नहीं। जिसने लिया है, छोडने को है भी क्या! संसार में पकड़ने को बाकी क्या है? जिसने समझकर लिया कि संसार में कुछ भी नहीं है—अब संन्यास का और क्या मतलब होता है—संन्यास का इतना ही अर्थ होता है, संसार में कुछ भी नहीं है। अगर तुम कहते हो कि संन्यास छोड़ना है, तो इसका अर्थ हुआ कि संन्यास छोड़ना है अर्थात संसार में कुछ है, वापस जाते हैं। यह दहर भिक्षु वस्तुत: संन्यासी नहीं था। होता तो यह बात ही न उठती। होता तो दीनता पता ही न चलती। लेकिन ये सौ स्वर्णमुद्राओं ने सब डावाडोल कर दिया। छोटी—छोटी बातें दिक्कत में डाल देती हैं।
मेरे एक मित्र सामने बैठे हैं। संन्यासी थे, फिर कुछ छोटी सी बात के लिए छोड़ दिया। छोटी सी बात, सौ स्वर्णमुद्राओं की ही बात! अड़चन थी। संन्यासी रहकर शायद समाज में जो मिल सकता था, वह नहीं मिल रहा था। किसी कालेज के प्रिंसिपल हो सकते थे, वह नहीं हो पा रहे थे, असुविधा आ रही थी, छोड़ दिया। लेकिन प्रिंसिपल होकर क्या हो जाएगा? धन पा लोगे थोड़ा ज्यादा तो क्या हो जाएगा? ऐसे आदमी अपने को गंवाता है। और ध्यान रखना कि संन्यास कोई साल, दो साल, तीन साल का संबंध नहीं है, यह तो बोध है कि संसार में कुछ भी नहीं है। तो एक दफा जो संन्यास में उतरा सो उतरा, लौटने की कोई जगह नहीं है। पीछे जाएगा कहा? लौटने को कोई स्थान नहीं बचता।
तो उसकी तकलीफ तुम समझना, वह तकलीफ तुम्हारी भी है, बहुतो की है। आज तुमने संन्यास ले लिया है, कल तुम जिस दफ्तर में काम करते हो, अगर उन्होंने कहा कि देखो, अगर संन्यासी रहे तो पदोन्नति नहीं होगी। रहे आओ! क्लर्क हो तो क्लर्क ही रहोगे, हेडक्लर्क न हो पाओगे। शिक्षक हो तो शिक्षक रहोगे, हेडमास्टर न हो पाओगे। बाधा डालेंगे, अड़चन डालेंगे। मन कई बार होगा कि यह कहां  की झंझट में पड़ गए, छोड्कर हेडमास्टर ही हो जाते। लेकिन हेडमास्टर हो जाओगे, कि हेडक्लर्क हो जाओगे, पाओगे क्या? थोड़ी स्वर्णमुद्राएं और। मौत सब छीन लेगी, थोड़ी कि ज्यादा। कोई अंतर नहीं करेगी मौत।
तो उस आदमी की तकलीफ समझना, वह तुम्हारी भी तकलीफ है। भिक्षुओं ने बुद्ध को खबर दी। बुद्ध ने कहा, ऐसा होगा, यह निश्चित था। क्योंकि धन के त्याग में जो प्रशंसा लेना चाहता है, वह धन में अपने रस की घोषणा करता है। धन छोड़ने में प्रशंसा क्या है? तो जब इसने धन फेंका और कहा कि हटाओ, यह मिट्टी है और जब यह लोगों से कहने लगा कि देखो मैंने कैसा धन छोड़ दिया, कैसा महात्यागी हूं तभी से मैं सोच रहा हूं कि आज नहीं कल, यह भिक्षु संन्यास छोडने की तैयारी करेगा। भोगी और त्यागी में बहुत भेद नहीं। असली बात तो तब घटती है जब बोधपूर्वक तुम्हें दिखायी पड़ता है कि संसार खाली है, यहां कुछ भी नहीं है। तब न तो छोड़ना है, न पकड़ना है। तब एक नया ढंग है जीवन का, होने की एक नयी शैली है।
फिर उन्होंने दहर को बुलाकर कहा, पागल, इतनी सी स्वर्णमुद्राओं से क्या होगा? सौ स्वर्णमुद्राएं, चलो, ठीक, लेकिन इससे क्या होगा! इससे तेरी तृष्णा तृप्त होगी? सौ मिल जाने पर तू और न मांगेगा? जब एक—एक स्वर्णमुद्रा खतम होने लगेगी खर्च से, तो तेरे मन में पीड़ा न आएगी कि अब थोड़ा कमाकर सौ तो कम से कम पूरी रखूं र नहीं तो ऐसे तो धीरे — धीरे सब खतम हो जाएगा, एक दिन फिर तू भिखारी का भिखारी हो जाएगा। और वह भिखारी भिखारीपन होगा, और यह भिक्षुपन भिक्षुपन है। इन दोनों में फर्क है। भिखारी और भिक्षु में फर्क है। भिखारी वह है, जिससे धन छिन गया। और भिक्षु वह है, जिसने धन की व्यर्थता जानकर छोड़ दिया। तो भिखारी दीन है, भिक्षु दीन नहीं है। भिखारी रो रहा है, भिक्षु प्रसन्न है। भिखारी अपमानजनक शब्द है, भिक्षु सम्मानजनक शब्द है।
इसलिए हमने बुद्ध को भिक्षु कहा, महावीर को भिक्षु कहा, हमने बड़ा सम्मान दिया। सम्राटों से ज्यादा सम्मान हमने भिक्षुओं को दिया।
दुनिया की और किसी भाषा में भिखारी के लिए दो शब्द नहीं हैं, सिर्फ भारत की भाषा में हैं। क्योंकि दुनिया ने कभी बुद्ध जैसा भिक्षु जाना ही नहीं। दूसरे मुल्कों ने ऐसा भिक्षु जाना ही नहीं। उन्होंने तो भिखारी जाने हैं। बड़ी कठिनाई होती है। पश्चिम की भाषाओं में जब अनुवाद करते हैं लोग बुद्ध का साहित्य, तो उनको बड़ी कठिनाई होती है कि भिक्षु को क्या कहें, कौर कहें? यह बात जंचती नहीं। भिखारी कहें! यह बात तो जंचती नहीं। यह तो बात, यह भिखारी है ही नहीं आदमी, यह तो मालिक है। इससे बड़ा मालिक और कौन होगा? यह तो सम्राट है। यह तो शहंशाहों का शहंशाह है। चक्रवर्ती इसके पैरों में सिर झुकाते हैं, इसको भिखारी कहें? नहीं, भिखारी—तो नहीं कह सकते हैं। फिर इसको कहें— क्‍या? कोई दूसरा शब्द नहीं है। भिक्षु बड़ा अदभुत शब्द है।
दोनों का शाब्दिक अर्थ तो एक ही है, लेकिन अस्तित्वगत अर्थ बड़ा भिन्न है। कहा भिखारी, कहां भिक्षु! भिखारी वह है, जिसका सब खो गया, रो रहा है, उदास, खिन्नमना। भिक्षु वह है, जिसने देखकर कि सब व्यर्थ है, अपने हाथ हटा लिए। आनंदित है कि झंझट, व्यर्थ का उपद्रव, व्यर्थ का प्रपंच—जाग गया, प्रभु की अनुकंपा।
तो कहा, इन सौ स्वर्णमुद्राओं से तेरी तृष्णा मिट जाएगी? तृष्णा तृप्त होगी? तृष्णा तो कभी तृप्त होती नहीं। तृष्णा दुष्‍पुर है। उसे कभी कोई भर नहीं पाया। सौ स्वर्णमुद्राओं से तू सोचता है भर जाएगी? तो मेरी तरफ देख, बुद्ध ने कहा होगा, मेरे पास तो अरबों—खरबों स्वर्णमुद्राएं थीं। तो मैंने गलती की छोड्कर? मेरे पास तो बहुत था, पर दिखा कि उतने से भी भरेगा नहीं मन। तो तू सौ स्वर्णमुद्राओं से भर लेगा! यह तेरे मन की प्यास इतनी बड़ी है और यह तू सौ बूंदों से भर लेगा! सागर छोड्कर मैं आ रहा हूं, मैं तुझसे कहता हूं कि सागर से भी नहीं भरती। यह भरती ही नहीं, यह दुयूर है। क्योंकि मन में कोई पेंदी नहीं है। कितना ही डालते चले जाओ, सब गिरता चला जाता है। मन खाली का खाली रहता है। ही, इतना हो सकता है कि ये थोड़ी सी स्वर्णमुद्राएं तेरी अग्नि में और घी का काम कर दें, और उसे प्रज्वलित कर दें। फिर तेरी मर्जी।
तब उन्होंने ये गाथाएं कहीं—
'यदि स्वर्ण की वर्षा हो तो भी मनुष्य की कामों से तृप्ति नहीं होती।'

            न कहापणवस्सेन तित्ति कामेसु विज्जति।

सौ से तो क्या होगा, अगर वर्षा भी हो जाए, वर्षा ही होती रहे स्वर्णमुद्राओं की तेरे घर पर, तो भी तेरी तृप्ति नहीं होगी। क्योंकि मैं ऐसे ही घर से आता हूं जहा स्वर्ण की वर्षा ही हो रही थी। मेरी तरफ देख, बुद्ध ने कहा।
'सभी काम अल्पस्वाद और दुखदायी हैं। '
स्वाद है काम में, कामना में, वासना में, लेकिन अल्पस्वाद है। जब जीभ पर रखते हो तभी क्षणभर को लगता है, मीठा, और फिर तत्सण कडुवा हो जाता है। वह मीठा बहाना है।
तुमने देखा न, डाक्टर गोलियां देता है, कड्वी गोलियां, उनके ऊपर शक्कर की थोड़ी सी पर्त चढ़ी होती है, शक्कर का कोट चढ़ा होता है। उस शक्कर के कोट की वजह से तुम गटक जाते हो। जरा मुंह में रखकर देखना, थोड़ी देर रखे रहना, शक्कर का कोट गल जाने देना, तब तुम्हारा मुंह एकदम कडुवेपन से भर जाएगा। ऐसा ही है, जिसको तुम सुख कहते हो, वह शक्कर की पर्त है। जहर पी रहे हो सुख के नाम से। अल्पस्वाद!

            अप्पस्सादा दुखाकामा इति विज्जाय पंडितो।

और पंडित, बुद्ध कहते हैं, वही है—वह नहीं जिसको बहुत शास्त्रों का ज्ञान है—पंडित वही है, जो इस बात को जानता है कि सभी काम अल्पस्वाद हैं और दुखदायी हैं, अंततः दुखदायी हैं।
क्या तुमने भी ऐसा जीवन में नहीं पाया? जहां —जहां सुख पाया, वहीं—वहीं दुख नहीं पाया? जिस—जिस से सुख की आशा बांधी, उसी—उसी से दुख नहीं मिला? जहा सुख की आशा ने पैर जमाए, वहीं तुमने दुख का नर्क नहीं पाया? अपने भीतर ही तलाशो, क्योंकि ये जो बुद्ध के वचन हैं, ये कोई तर्क, सिद्धात और शास्त्र की बात नहीं है, यह तो जीवन का शुद्ध अनुभव है। बुद्ध तो बड़े वैज्ञानिक हैं, वह तो उतना ही कहते हैं जितना जीवन का अनुभव है। तुम भी पाओगे, तुम भी अपने अनुभव से गवाही दे सकोगे कि बुद्ध ठीक कहते हैं।
'ऐसा जानकर पंडित देवलोकों के भोगों में भी रति नहीं करता है।'
इस संसार का सुख तो व्यर्थ है ही, बुद्ध कहते हैं, स्वर्ग का सुख भी व्यर्थ है। क्योंकि वह बहुत काल तक चलता है, लेकिन फिर एक दिन चुक ही जाता है। और जब सुख चुकता है तो आदमी पुन: दुख में गिर जाता है। कुछ ऐसा सुख खोज, जो फिर कभी चुके न। कुछ ऐसा सुख खोज कि जो सिर्फ शक्कर की पर्त न हो। कुछ ऐसा सुख खोज जिसमें जहर हो ही न, अमृत हो, कुछ ऐसा सुख खोज। उसी सुख की खोज धर्म है।
'और सम्यक संबुद्ध का श्रावक तृष्णा का क्षय करने में लगता है।'
इसलिए जो बुद्धपुरुषों के सत्संग में पड़ा है, सम्यक संबुद्ध का श्रावक, जिसने बुद्धपुरुष की वाणी सुनी है, जिसके कानों में बुद्ध की वाणी का अमृत पड़ा है, वह तृष्णा का क्षय करने में लगता है, पागल! सौ स्वर्णमुद्राओं से कुछ भी न होगा।

            न कहापणवस्सेन तित्ति कामेसु विज्जति।

हो जाए वर्षा स्वर्ण की तो भी कुछ नहीं।

            अप्पस्सादा दुखाकामा इति विज्जाय पंडितो।

पंडित यहां की तो बात ही छोड़, स्वर्ग का सुख भी नहीं मांगता है। तू मूढ़ मत बन। पंडित शब्द आता है प्रज्ञा से। जिसकी प्रज्ञा जाग्रत हो गयी, वही पंडित।

            अपि दिबेसु कामेसु रति सो नाधिगच्छति।
            तण्हक्सयरतो होति सम्मासंबुद्धसावको ।।

और तू तो बुद्ध का श्रावक, बुद्ध को सुनने वाला, बुद्ध को छोड्कर सौ स्वर्णमुद्राओं को चुनने जा रहा है, पागल! अमृत को छोड्कर जहर की तरफ लुभा रहा है, पागल!
            एक स्‍वर पास आता रहा रात भर
            दूर मन—प्राण जाता रहा रात भर
            गीत कोई कहीं गुनगुनाता रहा
            मैं घरौंदे बनाता रहा रात भर
            माधवी की मधुर गंध आती रही
            उस सनातन तृषा को जगाती रही
            चांदनी शौक सांकल हिला देह की
            क्षण यहां क्षण वहां मुस्कुराती रही
            और रूठी हुई फूल की स्वामिनी को
            बियाबा मनाता रहा रात भर
            गीत कोई कहीं गुनगुनाता रहा
            मैं घरौंदे बनाता रहा रात भर
            चांद की हाट सजती—सवरती रही
            एक तस्वीर बनती—बिगड़ती रही
            कुछ उमडता—घुमड़ता रहा प्राण में
            लोचनों में सुई एक गड़ती रही
            एक अंधे कुएं में पडा चंद्रमा
            राह अपनी न पाता रहा रात भर
            गीत कोई कहीं गुनगुनाता रहा
            मैं घरौंदे बनाता रहा रात भर
            कुछ कहे— अनकहे एक वचन के लिए
            कुछ गढ़े— अनगढ़े एक सपन के लिए
            स्नेह के सिर्फ दो —चार कण के लिए
            सिर्फ अपनत्व की एक छुअन के लिए
            एक संभावना की किरण देखकर
            कश्तियां मैं बहाता रहा रात भर
            गीत कोई कहीं गुनगुनाता रहा
            मैं घरौंदे बनाता रहा रात भर
            बारजे पर खड़ी उमर ढलती रही
            हर घड़ी सामने से निकलती रही
            आंख फाड़े निहारा करी कामना
            जंगलों में कहीं रेल चलती रही
            बस हवा चीखती जंगलों में रही
            बस दीया टिमटिमाता रहा रात भर
            एक संभावना की किरण देखकर
            कश्तियां मैं बहाता रहा रात भर
            गीत कोई कहीं गुनगुनाता रहा
            मैं घरौंदे बनाता रहा रात भर
ऐसा ही है हमारा जीवन। मिट्टी के घर, बालू के घर। ऐसा ही है हमारा जीवन, कागज की कश्तिया तैराते, सपनों के जाल बुनते। और अपने ही बुने जालों में भटक जाते।

दूसरा सूत्र—
'मनुष्य भय के मारे पर्वत, वन, उद्यान, वृक्ष और चैत्य आदि की शरण में जाता है। लेकिन यह शरण मंगलदायी नहीं है, यह शरण उत्तम नहीं है, क्योंकि इन शरणों में जाकर सब दुखों से मुक्ति नहीं मिलती।'

            वहुं के सरण यति पब्बतानि वनानि च ।
            आरामरुक्सचेत्यानि मनुस्सा भयतज्जिता ।।

आदमी भय के कारण ही भगवानों की पूजा कर रहा है। भय के कारण उसने मंदिर बनाए, भय के कारण प्रार्थनाएं खोजीं।

            वहुं के सरण यति पब्बतानि वनानि च।

कभी वृक्ष की पूजा करता है, कभी पत्थर की पूजा करता है, लेकिन गौर से देखना! कभी मंदिर में मुर्ति रखकर पूजा करता है, कभी मस्जिद में बिना मूर्ति के पूजा करता है, लेकिन गौर से देखना! मंदिर में, कि मस्जिद में, कि गुरुद्वारे में, कि चैत्यालय में, कि शिवालय में, कि गिरजे में, आदमी भय के कारण ही घुटने टेके खड़ा है। और बुद्ध कहते हैं, जो भय के कारण घुटने टेके खड़ा है, वह सत्य को कभी भी न जान पाएगा।

            नेत खो सरण खेम नेत सरणमुत्तमं ।
            नेतं सरणमागम्म सबदुक्खा पमुच्चति ।। 

'यह उत्तम शरण नहीं है, यह मंगलदायी शरण नहीं है, क्योंकि इन शरणों में जाकर सब दुखों से मुक्ति नहीं मिलती है।'
यह सूत्र एक विशिष्ट परिस्थिति में बुद्ध ने कहा। कब गाथा कही, उसे समझ लें—

कौशल— नरेश प्रसेनजित के पिता का अभिदत्त नामक ब्राह्मण पुरोहित था। जब कौशल— नरेश के पिता का देहांत हो गया तब वह कौशल— नरेश के सत्कार— सम्मान करने पर भी घर— द्वार छोड्कर परिव्राजक बन गया। वह पंडित अग्निदत्‍त। उसके पांडित्य की कीर्ति तो चारों ओर फैली ही थी अब इस महात्याग ने तो सोने में सुगंध का काम किया। अत: वह थोड़े ही दिनों में हजारों शिष्यों से घिर गया। वह घूम— घूम कर उपदेश देता— तीर्थों की शरण जाओ पवित्र नद— नदियों की शरण जाओ मूर्ति— मंदिरों की शरण जाओ, मुर्ति— स्मृतियों की शरण जाओ, यज्ञ विधि— विधानों की शरण जाओ, ऐसे परम आनंद को उपलब्ध होओगे। ऐसी उसकी शिक्षा थी।

न तो स्वयं आनंद को उपलब्ध हुआ था, न उसे पता था कि आनंद को उपलब्ध होने का क्या मार्ग है। पंडित था बड़ा, शास्त्र पढ़े थे, विधि—विधान, यश का बोध था उसे, क्रियाकांडी था, शास्त्रों का उल्लेख कर सकता था, शास्त्रों के उद्धरण दे सकता था। स्मृति उसकी बड़ी प्रखर थी। सम्राट का पुरोहित था, तो वैसे ही प्रतिष्ठित था, और जब सब त्याग कर दिया उसने, तब तो उसकी प्रतिष्ठा का क्या कहना! हजारों लोग उसके शिष्य होने लगे। न केवल वह यह कहता कि नदी, पहाड़ों, मंदिरों, मूर्तियों, श्रुति—स्मृतियों—शास्त्रों की शरण जाओ, वह बुद्ध के विपरीत भी कहता।
बुद्ध के विपरीत कहने का कारण बिलकुल साफ था। क्योंकि एक तो बुद्ध कहते, न कोई ब्राह्मण है, न कोई शूद्र है, न कोई क्षत्रिय, न कोई वैश्य, आदमी बस आदमी है। तो अग्निदत्त को यह बात तो पसंद न पड़ती—किसी ब्राह्मण को पसंद नहीं पड़ती, जब तक कि ब्राह्मण में थोड़ी समझ न हो। क्योंकि उसका तो मजा ही यही है कि और कोई ब्राह्मण नहीं है, मैं ब्राह्मण हूं। और बुद्ध ने तो बड़ी अनूठी बात कही, बुद्ध ने तो कहा कि सब पैदा होते से शूद्र ही होते हैं। सब शूद्र ही की तरह पैदा होते हैं, ब्राह्मण तो कोई कभी बन पाता है जब ब्रह्म को जानता है। जो ब्रह्म को जान ले, वह ब्राह्मण। ब्राह्मण कोई जन्म से नहीं होता, बोध से होता है। तो ब्राह्मणों को तो बहुत बात अखर रही थी।
फिर बुद्ध कहते थे, शास्त्रों में कुछ भी नहीं है। वेदों में कुछ भी नहीं है। जो है तुम्हारे चैतन्य में है। जो है तुममें है। यह बात भी बड़ी अखरने वाली थी। अगर तुम मुसलमान से कहो कि कुरान में कुछ भी नहीं है, वह नाराज हो जाएगा। अगर हिंदू से कहो, वेद में कुछ नहीं है, वह नाराज हो जाएगा। और की तो छोड़ो, अगर तुम बौद्ध से कहो, धम्मपद में कुछ भी नहीं, तो वह नाराज हो जाएगा। यद्यपि शास्त्र में कुछ भी नहीं है। जो है तुम्हारे चैतन्य में है। और जब तुम्हारे चैतन्य में जगता है, तो शास्त्र में भी दिखायी पड़ने लगता है। और जब तक चैतन्य में न जगे, कोई शास्त्र तुम्हें जगा नहीं सकता है।
तो बुद्ध शास्त्र—विरोधी हैं; वर्ण—विरोधी, आश्रम —विरोधी। क्योंकि बुद्ध ने कहा कि जिसको भी संन्यास लेना है, तब वह एक क्षण की देर न करे। हिंदू तो कहते थे, बुढ़ापे में लेना संन्यास। उन्होंने तो आश्रम बांट रखे थे—पच्चीस साल तक ब्रह्मचारी रहो, फिर पच्चीस साल तक गृहस्थ रहो, फिर पच्चीस साल तक वानप्रस्थ रहो, फिर अगर बच रहे, पचहत्तर साल के बाद अगर बच रहे, तो संन्यासी हो जाओ।
ऐसा लगता है कि यह तो बहुत मुश्किल था। क्योंकि वैज्ञानिक खोजों से पता चलता है कि पुराने जमाने में, आज से पांच हजार साल पहले, अधिक से अधिक उम्र तक आदमी चालीस साल तक पहुंचता था। कभी—कभी कोई इसके पार जाता था। बहुत मुश्किल से इसके पार जाता था। हड्डियां मिली हैं जो अब तक खोजों से, उनमें कभी भी चालीस साल से पुरानी हड्डी नहीं मिली।
तो यह तो बात बड़ी उलझन की थी। कभी—कभी होता था, कोई आदमी अस्सी जीता था, कोई सौ भी जीता था। वह अब भी होता है। अब भी कोई आदमी अस्सी जीता है, कोई सौ जीता है, लेकिन औसत उम्र तो अब भी वहीं अटकी हुई है। हिंदुस्तान में औसत उम्र चौंतीस साल है, अभी भी। इतनी वैज्ञानिक औषधियों की खोज के बाद भी।
तो औसत उम्र चालीस साल से ज्यादा नहीं थी। तो सौ साल का होना तो बड़ी देर की बात थी, बड़ी मुश्किल बात थी। पहले तो पचहत्तर के जब तुम हो जाओगे तब संन्यास की आज्ञा थी, तो संन्यासी कौन हो पाता! कोई बिलकुल बूढ़े—ठूढे, बच गए अगर, अगर जिंदगी ने न मार डाला, तो। और वह भी अनिवार्य तो नहीं। क्योंकि मैं पचहत्तर साल के लोगों को भी देखता हूं वे भी अभी सोच नहीं रहे संन्यास की। बुद्ध ने यह धारा तोड़ दी।
बुद्ध ने कहा, यह सब तो आदमियों को वंचित रखना है। जिसको जब संन्यासी होना हो। अगर दस साल का बच्चा संन्यासी होना चाहता है, तो बुद्ध ने कहा, मैं संन्यास दूंगा। क्योंकि कौन तय कर सकता है कि कल वह बचेगा कि नहीं?
मेरे से लोग आकर पूछते हैं कि आप छोटे बच्चे को संन्यास दे देते हैं! मैं कहता हूं सवाल यह है कि अगर वह कल बचेगा इसका पक्का हो, तो कल दे देंगे, लेकिन कल का कुछ भी पक्का नहीं है। परसों का कुछ भी पक्का नहीं है। समय तो यूं बहा जा रहा है और कभी भी मौत आ सकती है। और मौत कोई आश्रम को मानती नहीं कि हम सौ साल के बाद आएंगे। क्योंकि मौत कोई हिंदू थोड़े ही है!
तो बुद्ध ने कहा, जिसको जब संन्यास लेना है, जिस घड़ी, वह उसी घड़ी संन्यास ले ले। यह बड़ी उपद्रव की बात थी। इससे पूरा हिंदू ढांचा अस्तव्यस्त हो गया। वर्ण तुड़वा दिए, आश्रम तुड़वा दिए। वर्णाश्रम तो हिंदू— धर्म का आधार है।
तो नाराज थे पंडित, नाराज थे ब्राह्मण, नाराज थे पुरोहित। और उनका सब व्यवसाय ही छीन लिया। क्योंकि पुरोहित जीता ही इस बात पर है, ब्राह्मण जीता ही इस बात पर है कि शास्त्र सुनो, सत्यनारायण की कथा करवाओ—इससे सब हो जाएगा—कि गंगा जाओ, त्रिवेणी पर नहाओ, कुंभ मेले में जाओ—सब हो जाएगा, पाप धुल जाएंगे—कि पत्थर की पूजा करो, कि मंदिर की पूजा करो, ऐसे ब्राह्मण जीता रहा है। यह उसका व्यवसाय है।
तो बुद्ध ने तो जड़ काट दी, सारा व्यवसाय उखाड़ दिया। बुद्ध कहते हैं, अपने भीतर जाओ! अपने भीतर जाने के लिए किसी पुरोहित की कोई जरूरत नहीं है। बुद्ध कहते हैं, तुम्हारा भगवान तुम्हारे भीतर। किसी को बीच में लेने की आवश्यकता नहीं है। इशारा समझ लो और अंदर चले जाओ।
तो नाराज था वह। और जैसा बुद्ध कहते थे, बुद्धत्व की शरण जाओ। ऐसा वह कहता था, बुद्धत्व की शरण से क्या होगा, तुम शास्त्र की शरण जाओ, परंपरा की शरण जाओ।

क बार यह अग्निदत्त अपने शिष्यों सहित श्रावस्ती के पास विहार कर रहा था और भगवान बुद्ध भी श्रावस्ती में विराजमान थे। तो भगवान ने अपने एक प्रमुख शिष्य मौद्गलायन को बुलाकर कहा— मौद्गलायन भगवान के जीते जी संबोधि को उपलब्ध हो गया था; वह परमज्ञान को उपलब्ध हो गया था— तो उन्होंने मौद्गलायन को बुलाकर कहा कि जाओ इस बेचारे अग्निदत्त को भी जगाओ! फिर अगर जरूरत पड़ी तो मैं भी आऊंगा। तो मौद्गलायन गए।
लेकिन सोयों को जगाना इतना आसान तो नहीं। फिर सोए हुए पंडित हों तो और भी मुश्किल है। और फिर उनके पास शिष्यों की भीड़ हो तब तो फिर करीब— करीब असंभव है। लेकिन भगवान ने कहा तो मौद्गलायन गए। अग्निदत्त ने तो उनमें जरा भी रुचि न ली। उसने तो उनसे बैठने को भी न कहा। वह तो विवाद पर तैयार हो गया। वह तो विवाद करने न आए थे। वह तो कोई संदेश देने आए थे लेकिन वह संदेश सुनने को भी राजी न था। ऐसे बातचीत में रात हो गयी तो मौद्गलायन ने कहा कि मुझे कम से कम रात तो आपके आश्रम में रुक जाने दें। लेकिन अग्निदत्त ने कहा इस आश्रम में इस तरह के लोगों के रुकने की कोई संभावना नहीं। तुम भ्रष्ट हो और तुम दूसरों को भ्रष्ट करना चाहते हो।
एक बुद्धपुरुष को भी देखकर पंडित पहचान न सका, पंडित की आंखें ऐसी अंधी होती हैं। शास्त्रों से इतनी भरी होती हैं कि सामने ज्योति खड़ी हो तो भी दिखायी नहीं पड़ती।
मजबूरी थी तो मौद्गलायन पास में ही बालुका की एक राशि पर नदी के किनारे जाकर सो रहे। ठंडी रात थी। और अग्निदल और उसके शिष्य बड़े प्रसन्न हुए क्योकि उस बालुका राशि पर कोई जाता नहीं था वहां एक नागराज का निवास था। और वह नागराज बड़ा खतरनाक था। और आदमी वहां पहुंच जाए तो खतम ही जिंदा वहां से कोई लौटता नहीं था। तो उन्होंने सोचा चलो झंझट टली! और यह भी कैसे आदमी को बुद्ध ने भेजा जिसको इतना भी बोध नहीं है कि कहां सोने जा रहा है! यहां मौत आएगी।
सुबह तो जल्दी— जल्दी शिष्य उठे अग्निदल के और देखने गए कि देखें मरा हुआ पड़ा होगा बेचारा! वहां जाकर देखे तो चकित हो गए। वह तो ध्यान लगाए बैठे हैं और नागराज अपना फन उनके ऊपर किए रक्षा कर रहा है। चकित! भागे सभी शिष्य। अग्निदत्त अकेला रह गया अपने आसन पर बैठा। उसे बड़ा बुरा भी लगा बड़ी ग्लानि भी हुई और उत्सुकता भी जगी वह भी देखना चाहता था— था तो वैसा ही जैसे बच्चे होते हैं कोई बोध तो उसे था नहीं। उत्सुकता कुतूहल वह भी पीछे से आया। चुपचाप आकर देखा हुआ चमत्कृत! मौद्गलायन को देखकर जो जरा भी प्रभावित न हुआ था वह भी इस चमत्कार को देखकर प्रभावित हुआ। मूढ़ों के प्रभावित होने के अपने ढंग होते हैं। सारे शिष्य मौद्गलायन के चरणों में गिर पड़े। खैर अग्निदत्त इतनी हिम्मत तो नहीं किया लेकिन दुखी बहुत हुआ। नाराज भी बहुत मन में हुआ कि ये शिष्य उसके चरण में हक रहे हैं।
तभी बुद्ध का आगमन हुआ। जब बुद्ध आकर खड़े हो गए मौद्गलायन ने आंखें खोली वह उनके चरणों में गिरा— मौद्गलायन अपने गुरु के चरणों में गिरा। तब तो शिष्य बडे हैरान हुए। उन्होंने कहा कि जब यह शिष्य इतना चमत्कारी तो इसके गुरु का क्या कहना! वे सब बुद्ध के चरणों में गिरे।
अग्निदत्त ने डरते— डरते बुद्ध से पूछा कि यह चमत्कार क्या है? बुद्ध ने कहा कि यह चमत्कार दूसरी तरफ से सोचो इससे भी बड़ा चमत्कार हुआ कि तुम मनुष्य हो और न पहचान सके और सर्प ने पहचान लिया।

इधर सोचो। आदमी कैसा गया—बीता हो सकता है! पशु पहचान लेता है कभी—कभी, क्योंकि पशु निर्मल होता है, निर्दोष होता है। पशु को न तो वेद मालूम हैं, न पुराण मालूम हैं; न पशु हिंदू है, न मुसलमान है, न ईसाई है, पशु सरल है। यह नाग भी पहचान सका। यह तरंग जो मौद्गलायन के आसपास है, यह नाग भी पहचान सका।
और अक्सर नाग पहचान लेते हैं। इस बात को तुम चमत्कार ही मत समझना, यह कोई पहली दफे घटी घटना नहीं है, यह भारत में बहुत दफे घटी है। बहुत से जैन तीर्थंकरों के साथ घटी है। यह बहुत बार घटी है। नाग में कुछ खूबियां हैं!
तुम चकित होओगे यह बात जानकर कि वैज्ञानिक कहते हैं कि नाग के पास कान नहीं होता। इसलिए पहले तो वैज्ञानिक बहुत हैरान हुए थे यह बात जानकर कि जब मदारी अपनी तूंबी बजाता है, तो नाग फन क्यों हिलाने लगता है? क्योंकि उसके पास कान तो है ही नहीं, तो ध्वनि तो सुन ही नहीं सकता नाग। नाग तो बिलकुल बहरा है, बज बहरा, ध्वनि तो उसके भीतर पहुंच ही नहीं सकती, तो वैज्ञानिक तो बड़े हैरान थे कि मामला क्या है! तो पहले तो उन्होंने सोचा कि शायद वह मदारी जो अपना सिर हिलाता है, उसको देखकर नाग भी सिर हिलाने लगता है—क्योंकि सुन तो सकता ही नहीं है।
तो फिर उन्होंने मदारियों से तूंबी बजवायी और कहा कि सिर मत हिलाना और तूंबी मत हिलाना, लेकिन नाग ने तब भी फन हिलाए। तब खोजबीन और आगे बढ़ी। अब तथ्य समझ में आ गया है। नाग के पास कान तो नहीं हैं, लेकिन उसका पूरा शरीर इतना संवेदनशील है कि ध्वनि को पकड़ता है—पूरा शरीर। ऐसा कहो कि उसका पूरा शरीर कान का काम करता है। कान भी है तो चमड़ी ही, हड्डी और चमड़ी। तुम्हारा छोटा सा कान सुनता है, उसका पूरा शरीर सुनता है—अलग से कान की उसे जरूरत नहीं है। यह नवीनतम खोज है।
और भारत में यह अनुभव बहुत बार हुआ है कि बुद्धपुरुषों के पास, जहां आदमी नहीं पहचान पाए, वहां नाग पहचान गए। क्योंकि बुद्धपुरुषों की जो तरंग है, उनके आसपास जो विद्युत है, वह जो सूक्ष्म लहर है, वह लहर नाग का पूरा शरीर पकड़ लेता है। वह मस्त हो जाता है। वह डूब जाता है।
हिंदुओं ने इसलिए नाग की पूजा शुरू की, क्योंकि नाग अनूठा है। ऐसा कोई दूसरा पशु—पक्षी या जानवर नहीं, जैसा नाग है। उसमें कुछ खूबियां हैं। और सबसे बड़ी खूबी यह है कि बुद्धपुरुषों के पहचान की क्षमता है उसमें। जो बुद्धपुरुषों को पहचान लेता हो, उसमें कुछ न कुछ बुद्धत्व की किरण होनी चाहिए।
बुद्ध ने कहा:  
पागल तू इससे प्रभावित हो रहा है लेकिन यह नहीं सोचता कि मौद्गलायन तेरे पास आया मैने उसे भेजा और तू अंधे की तरह रहा तूने देखा नहीं। ऐसी अवस्था में अग्निदत्त किंकर्तव्यविमूड बुद्ध के सामने खड़ा रह गया। एक मन झुकने का होने लगा एक मन अकड़ने का। ब्राह्मण कैसे हक जाए क्षत्रिय के पैर में? पंडित ज्ञानी अपने को मानता शु इतने शिष्य कैसे हक जाए? लेकिन भीतर  अमृत से परिचय मौत के क्षरा निस्तरंग चित्त पर कोई चीज झुकने को भी होने लगी।
तब बुद्ध ने पूछा कि अग्निदत्त तेरी शिक्षा का सार क्या है? तू लोगों को क्या समझाता है? तो उसने अपना सूत्र दोहराया— तीर्थों की शरण जाओ पवित्र नद— नदियों की शरण जाओ मूर्ति— मंदिरों की शरण जाओ मुर्ति— स्मृतियों की शरण जाओ यश— विधि— विधानों की शरण जाओ ऐसे परम आनंद को उपलब्ध होओगे। बुद्ध ने कहा पागल इन शरणों से कोई कभी दुख से छुटकारा पाया है। तूने पाया? तू अपनी कह तुझे दुख से छुटकारा मिला है? तेरे जीवन में आनंद की किरण उतरी है? और कम से कम एक बार बेईमानी मत कर। मैं तेरा साक्षी तेरे सामने खड़ा हूं तूने सुख पाया है? अपने भीतर देख! और जो तुझे नहीं मिला तो तेरी शिक्षा से दूसरों को कैसे मिल जाएगा?

काश, दुनिया के बहुत से गुरु इस बात को थोड़ा देख लें अपने भीतर, तो बहुत लोगों की भटकन बच जाए।
तब बुद्ध ने यह गाथा कही—

            वहुं के सरणं यति पब्बतानि वनानि च ।

'मनुष्य भय के मारे पर्वत, वन, उद्यान, वृक्ष और चैत्य आदि की शरण में जाता है।'

            आरामरुक्सचेत्यानि मनुस्सा भयतज्जिता ।।

यह सब भय के कारण हो रहा है, यह किसी समझ के कारण नहीं।
'लेकिन यह शरण मंगलदायी नहीं है।'
मनुष्य वृक्ष के सामने झुके, कि पहाड़ के सामने झुके, कि नदी के सामने झुके, इससे क्या होगा? मनुष्य बुद्धत्व के आगे झुके तो कुछ हो सकता है।

            नेत खो सरण खेम नेत सरणमुतमं ।
            नेत सरणमागम्म सबदुक्‍खा पमुच्चति ।। 

'ऐसे दुखों से मुक्ति नहीं मिलती। '
'जो जागे हुओं की शरण में गया, जो जागे हुओं के समूह की शरण में गया और जो जागने के परमसूत्र धर्म की शरण में गया, जिसने आर्य—सत्यों को सम्यक प्रज्ञा से देख लिया, जिसने दुख, दुख की उत्पत्ति, दुख से मुक्ति और मुक्तिगामी आर्य अष्टांगिक मार्ग को देख लिया, वही सच्ची शरण गया। यही मंगलदायी शरण है, यही

उत्तम शरण है। इसी शरण को प्राप्त कर सभी दुखों से मुक्त हुआ जा सकता है।'

            यो व बुद्धन्च धम्मज्च संघन्च सरण गतो ।
            चत्तारि अरियसच्चानि सम्मप्पज्जाय पस्सति ।।

जो बुद्ध, संघ, धर्म की शरण गया, जिसने चार आर्य —सत्यों को प्रज्ञा से पहचाना, बोध से पहचाना।

            दुक्खं दुक्यसमुप्पादं दुक्सस्स च अतिक्कमं ।

कि दुख है, कि दुख से मुक्ति है, कि दुख की उत्पत्ति का कारण है, कि दुख से उत्पन्न हुई अवस्था से पार जाने के लिए अष्टांगिक मार्ग है।

            दुक्खं दुक्ससमुप्पादं दुक्सस्स व अतिक्कमं
            अरियज्वद्वगिके मग्न दुश्वपसमगामिनं ।।
            एतं खो सरणं खेमं एतं सरणमुत्तमं ।।

यह है ऊंची शरण। यह है झुकने योग्य झुकना। यह है समर्पण का द्वार।

            एतं सरणमागम्मं सबदुक्सा पमुच्चति ।।

और तुझसे मैं कहता, अग्निदत्त, कि ऐसा करके कोई सब दुखों के पार हो जाता है, आनंद को उपलब्ध होता है।
जो आठ, बुद्ध ने आर्य — अष्टांगिक मार्ग कहा है, उस संबंध में थोड़ी सी बात समझ लेनी चाहिए।
पहला सूत्र है:
आठ अंगों में—सम्यक दृष्टि। जो है, वही देखना। जैसा है वैसा ही देखना। अन्यथा न करना। कोई धारणा बीच में न लानी। कामना, वासना धारणा को बीच में न लाना। जो है, जैसा है, वैसा ही देखना। अब यह अग्निदत्त बुद्ध के सामने खड़ा है, लेकिन जो है, जैसा है, वैसा नहीं देख रहा है। सोचता है यह क्षत्रिय है, सोचता है यह वेद—विरोधी है, ये धारणाएं हैं। नागराज पहचान सके मौद्गलायन को और अग्निदत्त चूक गया! कैसे चूका होगा? धारणाओं के कारण। काश, धारणाओं को हटाकर, धारणाओं के मेघों को हटाकर देखता, तो जो था वह उसे भी दिखायी पड़ जाता। इसको कहते हैं—सम्यक दृष्टि।     दूसरा है—सम्यक संकल्प। हठ मत करना। अक्सर लोग हठ को संकल्प मान लेते हैं और हठी आदमी को कहते हैं, यह संकल्पवान है। जिद्दी को संकल्पवान कहते हैं। जिद्द को, हठ को संकल्प मत मान लेना। जिद्द तो अहंकार है। संकल्प में कोई अहंकार नहीं होता। हठ और संकल्प में यही फर्क है। हठ में असली मुद्दा अहंकार का है। आदमी कहता है, ऐसा करके दिखाऊंगा, ऐसा करके रहूंगा। क्या कर रहा है, इसकी बहुत फिकर नहीं है, लेकिन यह अहंकार का दावा है कि यह करके रहूंगा, नहीं कर पाया तो बड़ी ग्लानि हो जाएगी। धन में रस नहीं है, लेकिन धनी होकर दिखाना है। पद में रस नहीं है, लेकिन पदवान होकर दिखाना है। कुछ करके दिखाना है। यह जो बात है, यह असम्यक संकल्प है।
बुद्ध कहते हैं, सम्यक संकल्प का अर्थ होता है जो करने योग्य है, वह करना है। और जो करने योग्य है, उस पर पूरा जीवन दाव पर लगा देना है। लेकिन किसी अहंकार के कारण नहीं, वह करने योग्य है, इसलिए।
तीसरा है—सम्यक वाणी। जो है वही कहना। जैसा है, वैसा ही कहना। अन्यथा नहीं, बदलकर नहीं, ऊपर कुछ, भीतर कुछ, ऐसा नहीं। क्योंकि अगर तुम सत्य की खोज में चले हो, तो पहली तो शर्त पूरी करनी पडेगी कि तुम सच्चे हो जाओ। जो सच्चा हो गया है, सत्य का उसी से संबंध जुड़ेगा। जो झूठा है, उससे सत्य का संबंध न जुड़ सकेगा।
मैंने सुना है, एक छोटा बच्चा घर में आए मेहमानों से बोला, आप सब यहां मरने के लिए आए हैं क्या अंकल? चार वर्षीय राजू की यह बात सुनकर सब मेहमान हैरान रह गए। दादी ने तो बहुत डाटा राजू को और कहा कि यह क्या बोल रहा है? राजू ने कहा, मुझे क्या मालूम, मां ही कह रही थीं मुझे सुबह कि अगर मुझे पता होता कि ये सब यहां आकर मरेंगे तो मैं छुट्टियों में कहीं और चली जाती।
मेहमान घर में आता है, तो भाव कुछ, कहते कुछ, बताते कुछ। सुबह किसी को मिल जाते हो तो मन तो यह होता है—कहां  से इस दुष्ट की शकल दिखायी पड़ गयी, मगर ऊपर से कहते हो कि दर्शन हुए बड़े दुर्लभ, बड़े दिनों में दिखायी पड़े, बड़ी कृपा हुई! और भीतर यह कि यह दुष्ट न दिखायी पड़ता तो अच्छा, पता नहीं मुकदमा जीतेंगे कि हारेंगे, यह सुबह से कहां दर्शन हो गए!
सम्यक वाणी का अर्थ होता है, जैसा है—चाहे जो भी कीमत चुकानी पड़े—पाखंड नहीं। अगर कोई बात पसंद नहीं पड़ती तो निवेदन कर देना कि पसंद नहीं पड़ती। अगर कोई बात पसंद पड़ती है तो निवेदन कर देना कि पसंद पड़ती है। झुठलाना मत। झूठे पाखंड अपने आसपास खड़े मत करना।
मुल्ला नसरुद्दीन का एक बहुत पुराना मित्र उसके घर आया। तपाक से मुल्ला उठा, पहले हाथ से हाथ मिलाया और फिर गले से गले मिला, फिर प्रसन्नता के अतिरेक में उसे गोद में उठाकर ड्राइंगरूम तक लाया। अंदर आया तो पत्नी ने कुढूकर पूछा कि मुल्ला, जब मेरी कोई सहेली आती तो तुम्हें जैसे सांप सूंघ जाता है। तब भी कभी प्रसन्न हुए हो इतना? मुल्ला ने कहा, भाग्यवान, कुछ मत पूछ! प्रसन्न तो इससे भी ज्यादा होता हूं, मगर प्रगट नहीं कर सकता। अगर तू कह दे कि प्रगट करने की छूट है, तो अगली दफा देखना। तेरी सहेली को जो पकडूगा, गोद में बिठाऊंगा तो छोडूंगा ही नहीं। मन तो यही होता है कि खूब प्रसन्न होए, लेकिन तेरे डर के कारण नहीं हो पाते।
तुम अपने जीवन में थोड़ा देखना, तुम कुछ हो भीतर, बाहर कुछ बताए चले जाते हो। धीरे— धीरे यह बाहर की पर्त इतनी मजबूत हो जाती है कि तुम भूल ही जाते हो कि तुम भीतर क्या हो। सम्यक वाणी का अर्थ होता है, धीरे — धीरे सभी अर्थों में, दृष्टि में, संकल्प में, वाणी में हृदय की अंतरतम अवस्था को झलकने देना।
चौथा है—सम्यक कर्मांत। वही करना जो वस्तुत: तुम्हारा हृदय करने को कहता है। व्यर्थ की बातें मत किए चले जाना। किसी ने कह दिया, तो कर लिया। अक्सर तुम करते हो ऐसा। पड़ोसी एक मोटर खरीद लाया, कार खरीद लाया, अब तुमको भी खरीदनी है। तुम्हें एक दिन पहले तक कोई कार नहीं खरीदनी थी, तुम बिलकुल मजे में जी रहे थे। अब एक झंझट आ गयी। पड़ोसी का अनुकरण करना है। अधिक लोग अनुकरण में ही मारे जाते हैं। सम्यक कर्मांत का अर्थ होता है, वही करना है जो तुम्हें करने योग्य लगता है। ऐसे हर किसी की बात में मत पड़ जाना, नहीं तो तुम्हारी छीछालेदर हो जाएगी। हजारों लोग हजारों ढंग के काम कर रहे हैं, अगर तुम हर दिशा में दौड़ने लगे, तो तुम्हारा कर्म धीरे — धीरे बिखर जाएगा। तुम्हारी धारा हजार खंडों में टूट जाएगी, तुम सागर तक न पहुंच पाओगे। सम्यक कर्मांत का अर्थ है, एक दिशा पर नजर रखना, जो तुम्हें करना है, वही करना। और— और दिशाओं में अपने जीवन— श्रम को मत बंट जाने देना। तब तुम्हारे भीतर एक समंजन, एक समरसता पैदा होगी।
अभी तो ऐसा है कि बहुत खंड हैं, कुछ कहते, कुछ सोचते, कुछ करते। आज कुछ करते, कल कुछ करते, परसों कुछ करने लगते। इधर एक मकान उठाना शुरू किया, फिर आधा छोड़ दिया, फिर दूसरा मकान बनाने लगे। इधर एक कुआ खोदा दो हाथ, फिर छोड़ दिया, फिर दूसरा कुआ खोदने लगे। ऐसे करते तो तुम बहुत हो, लेकिन फल हाथ नहीं आता। फल आने के लिए सातत्य चाहिए। मेरे पास लोग आते हैं, वे कहते हैं, ध्यान करना कई दफे शुरू करते हैं, फिर बंद हो जाता है। एक दिन करते, दो दिन करते, फिर टूट जाता है। फिर लौटते, फिर करते, फिर टूट जाता। तो फिर नहीं होगा। जीवन में एक सातत्य, एक संकल्प, जो चुना है करने के लिए उसे करते रहने का धीरज, प्रतीक्षा, सहिष्णुता। आज ही फल तो नहीं आ जाएगा। बीज बोए हैं तो वक्त लगेगा, प्रतीक्षा करनी पड़ेगी, मौसम आएगा ठीक, अनुकूल, तब बीज अंकुरित होंगे, फिर वृक्ष बड़े होंगे, वर्षों लगेंगे तब कहीं फल होंगे—प्रतीक्षा करनी होगी।
पांचवां है—सम्यक आजीव। बुद्ध कहते हैं, हर किसी चीज को आजीविका मत बना लेना। अब कोई आदमी कसाई बनकर अपनी रोटी कमा रहा है। यह भी कोई कमाना हुआ! रोटी ही कमानी थी, हजार ढंग से कमा सकते थे, कसाई होने की क्या जरूरत थी? यह बड़ी असम्यक आजीविका है। कि कोई स्त्री वेश्या होकर रोटी कमा रही है! कोई सम्यक आजीविका खोजना। रोटी तो कमानी ही है, यह बात सच है, लेकिन सम्यक खोजना।
और ध्यान रखना, अगर तुम्हारी आजीविका सम्यक हो, तो तुम्हारे जीवन में शांति होगी। अगर तुम्हारी आजीविका सम्यक हो, तो सत्य और तुम्हारे बीच अनेक बाधाएं कम हो जाएंगी। अब अगर कोई आदमी झूठ का ही धंधा कर रहा है—समझो कि वकील है—अब बड़ा मुश्किल होगा इसको जीवन में सत्य को लाना। इसका धंधा ही झूठ है। झूठ इसकी आजीविका है। झूठ में जितना पारंगत होगा, उतनी ही सफलता मिलने वाली है। अब सत्य से तो यह डरेगा। सत्य का तो कोई संबंध ही नहीं इसकी आजीविका से। इसको तो झूठ को ही सत्य सिद्ध करना है। और ध्यान रखना, वही वकील सफल होता है, जो अदालत में झूठ को सत्य सिद्ध ही नहीं करता, बल्कि इस तरह सिद्ध करता है कि लगे कि सत्य है ही। खुद भी आदोलित दिखायी पड़ता है, कि उसे पक्का भरोसा है कि यह सच है। झूठ को बोलते वक्त ऐसे बोलता है कि जैसे वह खुद आंखों से देखा है, सामने मौजूद था। क्योंकि अगर वकील खुद ही आश्वस्त नहीं है तो अदालत को आश्वस्त नहीं कर पाएगा। अगर भीतर खुद ही जान रहा है कि यह झूठ है, तो झूठ की खबर मिलती रहेगी उसके चेहरे से, ढंग से, जानेगा कि यह मामला तो हारे ही हैं, जीतना मुश्किल है। तो उदास होगा, प्रफुल्लता न होगी, बल न होगा, वाणी में प्रभाव न होगा।
सम्यक आजीव का अर्थ है, सृजनात्मक आजीविका। ऐसी कुछ आजीविका चुनना, जो तुम्हारे जीवन को परमात्मा की तरफ ले जाने में सृजनात्मक हो, विध्वंसात्मक न हो।
छठवां है—सम्यक व्यायाम। अति न करना, बुद्ध कहते हैं। कुछ लोग हैं आलसी और कुछ लोग हैं अति कर्मठ। दोनों ही नुकसान में पड़ जाते हैं। आलसी उठता ही नहीं, तो पहुंचे कैसे! कर्मठ मंजिल के सामने से भी निकल जाता है दौड़ता हुआ, रुके कैसे, वह रुक ही नहीं सकता। रुकने की उन्हें आदत नहीं है।
मैं दोनों तरह के लोगों को जानता हूं, दोनों ध्यान में नहीं पहुंच पाते। आलसी कुछ करता ही नही, कर्मठ ज्यादा कर जाता है! तुम अगर तीर लेकर निशाना लगाने गए हो, तो निशाना सम्यक होना चाहिए। अगर थोड़ा नीचे पड़ा तो भी चूक जाएगा तीर, अगर थोड़ा ऊपर पड़ गया तो भी चूक जाएगा तीर। और जब तुम तीर को चलाओ तब प्रत्यंचा सम्यक खिंचनी चाहिए। अगर थोड़ी कम खिंची, तो पहले ही गिर जाएगा तीर। अगर थोड़ी ज्यादा खिंच गयी, तो आगे निकल जाएगा तीर। 
इसलिए बुद्ध का जोर अति वर्जित करने पर है। बुद्ध कहते हैं, सम्यकत्व, मध्य, मज्‍झिम निकाय। सम्यक व्यायाम।
और सातवां है—सम्यक स्मृति। व्यर्थ को भूलना और सार्थक को सम्हालना। तुम अक्सर उलटा करते हो, सार्थक तो भूल जाते हो, व्यर्थ को याद रखते हो। कुछ ऐसा है कि हीरे —हीरे तो छोड़ देते हो, कूड़ा—कचरा सब इकट्ठा कर लेते हो। जीवन में जो भी बहुमूल्य है, उसको तो बिसार देते हो। सबसे ज्यादा बहुमूल्य तो तुम्हारी चेतना है, उसको तो तुम बिलकुल बिसारकर बैठ गए हो और ठीकरे इकट्ठे कर रहे हो और उनका हिसाब लगा रहे हो। तिजोड़ी में कितने रुपए हैं, तुम्हें पता है, लेकिन तुम्हारे भीतर कौन बैठा है, यह तुम्हें पता नहीं है। इसको बुद्ध ने कहा, सम्यक स्मृति। बुद्ध के स्मृति शब्द से ही संतो का सुरति शब्द आया। सुरति स्मृति का ही अपभ्रंश है। जिसको कबीर सुरति कहते हैं, वह बुद्ध की स्मृति ही है। उसको ही थोड़ा मीठा कर लिया—सुरति, अपनी याद, अपनी पहचान।
और आठवा है—सम्यक समाधि। बुद्ध समाधि में भी कहते हैं सम्यक, खयाल रखना। क्यों? क्योंकि ऐसी भी समाधियां हैं जो सम्यक नहीं हैं—जड़ समाधि। एक आदमी मूच्‍छित पड़ जाता है, इसको बुद्ध सम्यक समाधि नहीं कहते। ऐसा आदमी गहरी निद्रा में पड़ गया, बेहोशी। मन के तो पार चला गया है, लेकिन ऊपर नहीं गया, नीचे चला गया। मन तो बंद हो गया, क्योंकि गहरी मूर्च्छा में मन तो बंद हो जाएगा, लेकिन यह बंद होना कुछ काम का न हुआ। मन बंद हो जाए और होश भी बना रहे। मन तो चुप हो जाए, विचार तो बंद हो जाएं, लेकिन बोध न खो जाए।
तीन स्थितियां हैं मन की। स्वप्न, जागृति, सुषुप्ति। स्वप्न तो बंद होना चाहिए—चाहे सम्यक समाधि हो, चाहे असम्यक समाधि हो, स्वप्‍न तो दोनों में बंद हो जाएगा, विचार की तरंगें बंद हो जाएंगी। लेकिन जड़ समाधि में आदमी गहरी मूर्च्छा में पड़ गया, सुषुप्ति में डूब गया, उसे होश ही नहीं है। जब वापस लौटेगा तो निश्चित ही शात लौटेगा, बड़ा प्रसन्न लौटेगा, क्योंकि इतना विश्राम मिल गया। लेकिन यह कोई बात न हुई! यह तो नींद का ही प्रयोग हुआ। यह तो योगतंद्रा हुई। असली बात तो तब घटेगी जब तुम भीतर जाओ और होशपूर्वक जाओ। तब तुम प्रसन्न भी लौटोगे, आनंदित भी लौटोगे और प्रज्ञावान होकर भी लौटोगे। तुम बाहर आओगे, तुम्हारी ज्योति और होगी। तुम्हारी प्रभा और होगी। तुम्हारे चारों तरफ रोशनी होगी। तुम्हारे चारों तरफ जीवन में सुगंध होगी।
ऐसा समझो कि एक आदमी को हम स्ट्रेचर पर लिटा लें, क्लोरोफॉर्म दे दें और फिर बगीचे में घुमा दें। तो निश्चित ही उसकी नाक तो काम कर ही रही है, फूलों की गंध भी उसके भीतर जाएगी—उसे पता नहीं चलेगा। और वृक्षों की ताजी हवा भी उसको लगेगी, शीतल भी होगा—उसे पता नहीं चलेगा। फिर जैसे —जैसे वह होश में आने लगे, हम जल्दी उसे बगीचे के बाहर ले जाएं। आंख खोलकर वह कहेगा, अच्छा लगा। कुछ—कुछ भनक याद आएगी—ताजा था, सुगंध थी, मगर ज्यादा कुछ पकड़ में न आएगी। और किस रास्ते गया और किस रास्ते लौटा, यह भी पता नहीं होगा। फिर खुद न जा सकेगा। अगर उसको तुम छोड़ दो जाने को तो खुद न जा सकेगा, रास्ते का पता नहीं है।
दो तरह की समाधियां हैं। जड़ समाधि, आदमी गांजा पीकर जड़ समाधि में चला जाता है, अफीम खाकर जड़ समाधि में चला जाता है; मारीजुआना, एल. एस. डी, मेस्कलीन, इनको लेकर जड़ समाधि में चला जाता है। अभी पश्चिम में जड़ समाधि का खूब प्रभाव चल रहा है। भारत में तो रहा ही बहुत दिनों से —गंजेड़ी, भंगेड़ी, सब तरह के साधु —संन्यासी तुम्हें मिल जाएंगे। वह जड़ समाधियां हैं।
बुद्ध ने उनका बड़ा विरोध किया। बुद्ध ने कहा, यह भी कोई बात है, माना कि सुख मिलता है, इसमें कोई शक नहीं है —तुम भी अगर भंग खाकर डूब गए मस्ती में तो सुख मिलता है। गाजे की दम लगा ली तो डूब गए, एक तरह का सुख मिलता है। शराब भी इसी तरह के सुख को देती है— भूल गए सब, डूब गए अपने में, मगर यह डुबकी नींद की है। यह कोई डुबकी हुई! यह कुछ मनुष्य योग्य हुआ! ऊपर उठो, जागते हुए भीतर जाओ। दीया लेकर भीतर जाओ। मशाल लेकर भीतर जाओ। ताकि सब रास्ता भी उजाला हो जाए और तुम्हें पता भी हो जाए, तो जब जाना हो तब चले जाओ। और तुम फिर किसी चीज पर निर्भर भी न रहोगे।
तो तुमने देखा, हिंदू साधु —संन्यासी तुम्हें मिल जाएंगे कुंभ के मेले में—दम लग रही, सत्संग हो रहा। दम मारो दम! सत्संग हो रहा है, ब्रह्मचर्चा चल रही है! यह कुछ नयी बात नहीं है, इस मुल्क में पांच हजार साल से चल रही है। ये सब समझते हैं कि ये सब शंकर जी के शिष्य हैं। बम भोले!
इसका बुद्ध ने बहुत विरोध किया। क्योंकि बुद्ध ने कहा कि असली ही बात चूंकी जा रही है। असली बात है, जाग्रत होकर आनंद को उपलब्ध हो जाना। उसको उन्होंने सम्यक समाधि कहा।
यह आर्य —अष्टांगिक मार्ग। बुद्ध कहते हैं, चार आर्य—सत्य हैं—दुख है, दुख की उत्पत्ति है, दुख से मुक्ति है और मुक्तिगामी आर्य— अष्टांगिक मार्ग है। ये आठ अंग हैं उस दुख—मुक्ति के लिए। ऐसी ये दो गाथाएं। ये महत्वपूर्ण हैं। इन पर खूब ध्यान करना।
            अब न गहरी नींद में तुम सो सकोगे
            गीत गाकर मैं जगाने आ रहा हूं
            अतल अस्ताचल तुम्हें जाने न दूंगा
            अरुण उदयाचल सजाने आ रहा हूं
ऐसा बुद्ध का संदेश—
            अब न गहरी नींद में तुम सो सकोगे
            गीत गाकर मैं जगाने आ रहा हूं
            अतल अस्ताचल तुम्हें जाने न दूंगा
            अरुण उदयाचल सजाने आ रहा हूं
            कल्पना में आज तक उड़ते रहे तुम
            साधना से सिहरकर मुड़ते रहे तुम
            अब तुम्हें आकाश में उडने न दूंगा
            आज धरती पर बसाने आ रहा हूं
            सुख नहीं यह नींद में सपने संजोना
            दुख नहीं यह सीस पर गुरुभार ढोना
            शूल तुम जिसको समझते थे अभी तक
            फूल मैं उसको बनाने आ रहा हूं
            देखकर मझधार को घबड़ा न जाना
            हाथ ले पतवार को घबड़ा न जाना
            मैं किनारे पर तुम्हें थकने न दूंगा
            पार मैं तुमको लगाने आ रहा हूं
            तोड़ दो मन में कसी सब श्रृंखलाएं
            तोड़ दो मन में बसी सब संकीर्णताएं
            बिंदु बनकर मैं तुम्हें ढलने न दूंगा
            सिंधु बन तुमको उठाने आ रहा हूं
            तुम उठो धरती उठे नभ सिर उठाए
            तुम चलो गति में नयी गति झनझनाए
            विपथ होकर मैं तुम्हें मुड़ने न दूंगा
            प्रगति के पथ पर बढ़ाने आ रहा हूं
            अब न गहरी नींद में तुम सो सकोगे
            गीत गाकर मैं जगाने आ रहा हूं
            अतल अस्ताचल तुम्हें जाने न दूंगा
            अरुण उदयाचल सजाने आ रहा हूं
     
इतना ही।