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शनिवार, 8 अप्रैल 2017

जो घर बारे आपना-(साधना-शिविर)-प्रवचन-05

जो घर बारे आपना-(साधना-शिविर)--ओशो
प्रवचन-पांचवां-(ध्यान का अनिवार्य तत्व: होश)


बहुत से प्रश्न मित्रों ने पूछे हैं।
एक मित्र ने पूछा है कि रात्रि का ध्यान का प्रयोग क्या एकाग्रता का ही प्रयोग नहीं है? और इस प्रयोग के क्या परिणाम होंगे और क्या आधार हैं?

एकटक आंख को खुली रखना, पहले तो संकल्प का प्रयोग है, आंख को बंद नहीं होने देना। आंख को बंद नहीं होने देना, यह संकल्प का प्रयोग है, विल-पावर का प्रयोग है। और अगर चालीस मिनट तक आंख खुली रख सकते हैं, तो इसके बड़े व्यापक परिणाम होंगे। चालीस मिनट मनुष्य के मन की क्षमता का समय है। इसलिए हम स्कूल में, कालेज में चालीस मिनट का पीरिएड रखते हैं। चालीस मिनट जो काम हो सकता है पूरा, फिर वह कितना ही आगे किया जा सकता है। अगर आप चालीस मिनट तक आंख खुली रख सकते हैं, यह छोटा सा संकल्प पूरा हो सकता है, तो इसके बहुत परिणाम होंगे।

शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017

एस धम्मो सनंतनो-(प्रवचन-055)

मुझे शास्त्र नहीं, अनुभव बनाओ—प्रवचन—पच्चपनवां  

पहला प्रश्न


भगवान श्री, अर्थ तो कमाया, पर शुरूआत ही गलत हो गयी। कोई छह—सात साल का ही था जब कामवासना सक्रिय हो गयी। और दस से छत्तीस की उस तक इस कदर वीर्य स्‍खलितत किया कि कोई हिसाब नहीं! और यह भी बता दूं कि केवल सात महीने ही मां के गर्भ में रहकर मैं बाहर आ गया था। आपका स्वभाव कल से बेचैन है। जब वह वीर्य न बचा सका, तब प्रज्ञा कैसे पैदा हो? तभी तो मूड़ हूं और बिना जाने जानने का दावा करता हूं। संन्यास लेकर भी पलायन ही कर रहा हूं। क्रोध और अहंकार से बुरी तरह ग्रसित हूं। बस चमड़ी—मास ही बढ़ा है। स्वभाव खुद कर—करके हार गया, प्रभु! अब आप ही कछ करें।

हली बात, जो बीता सो बीता। जो हुआ उसे न तो अनहुआ किया जा सकता है, न करने की चेष्टा में व्यर्थ समय गंवाने की कोई जरूरत है। अतीत के लिए रोओ मत, भविष्य के लिए प्रार्थना करो।

एस धम्मो सनंतनो--(प्रवचन-054)

समष्टि से आलिंगन है धर्म—प्रवचन—54


सूत्र:

अप्‍पस्‍सुतायं पुरिसो बलिवद्दो व जीरति।
मंसनि तस्‍स बड्ढन्‍ति पज्‍जा तस्‍स न बड्ढ़ति ।।131।।

अनेक जाति संसार संधविस्‍सं अनिब्‍बिसं।
गहकारकं गवेसंतो दुक्‍खा जाति पुनप्‍पुनं ।।132।।

गहकारक! दिट्ठोसि पुन गेहं न काहसि।
सब्‍बा ते फासुका भग्‍गा गहकूटं विसंखिति।
विसंखारंगतं चितं तण्‍हानं खयमज्‍झगा ।।133।।

अचरित्‍वा ब्रह्मचरियं यलद्धा योब्‍बने धनं।
जण्‍णकोज्‍चा व झायन्‍ति खीनमच्‍छे व पल्‍लल ।।134।।

अचरित्‍वा ब्रह्मचरियं यलद्धा योब्‍बने धनं।
सेन्‍ति चापातिखित्‍ता व पुण्णानि अनुत्‍थनं ।।135।।

एस धम्मो सनंतनो-(प्रवचन-053)

साक्षीभाव : परम सूत्र—(प्रवचन-तरैपनवां)


पहला प्रश्न :


भगवान, आखिर आप कहते वही हैं जो आपको कहना है। फिर इतर बुद्धों की खूंटी का सहारा क्यों लेते हैं? अपनी बात सीधी ही हमसे क्यों नहीं कहते? हमें उलझाते क्यों हैं?

पूछा है स्‍वभाव ने।
बहुत सी बातें समझनी होंगी। पहली बात तो यह है—हजरत प्यार है, प्यार को प्रश्न मत बनाओ!
बुद्धों से लगाव है। लगाव के लिए कोई उत्तर नहीं। जैसे तुम्हें कोई स्त्री पसंद आ जाए, मन भा जाए, कहो कि सुंदर है, बहुत सुंदर है, सिद्ध न कर सकोगे।
प्रेम तर्क से गहरा है। कोई पूछेगा, क्यों प्रेम करते हो, उत्तर न दे सकोगे। जहां तक प्रश्न और उत्तर जाते हैं, उससे आगे की बात है।

बुद्धों से मुझे लगाव है। जब संसार से लगाव हट जाता है, तो लगाव मिट थोड़े ही जाता है। लगाव मिटेगा कैसे? लगाव तो जीवन की ऊर्जा है। संसार से हटता है तो बुद्धों पर लग जाता है। बाजार से हटता है तो मंदिर में खिल जाता है। कामवासना से मुक्त होता है, करुणा बन जाता है।

एस धम्मो सनंतनो-(प्रवचन-052)

सूरज ढलने से पहले दीए को सम्हाल लेना!—(प्रवचन—बावनवां) 


सूत्र:

कोनु हासो किमानंदो निच्‍चं पज्‍जलिते सति।


अंधकारेन ओनद्धा पदीपं न गवेस्‍सथ।।125।।

पस्‍स चित्‍त कतं अरूकायं समुस्‍सितं।
आतुरं बहुसंकप्‍पं यस्‍स नत्‍थि धुवं ठिति।।126।।

पिरजिण्‍णमिदं रूपं रोगनिड्डं पभंगुरं।
भिज्‍जति पूतिसंदेहो मरणन्‍तं हि जीवितं।।127।।

यानि मानि अपत्‍थानि अलाबूनेव सारदे।
कपोतकानिअट्ठीनि तानि दिस्‍वान का रति।।128।।

अट्ठीनं नगरं कतं मंसलोहित लेपनं।
यत्‍थ जरा च मच्‍चूच मानो मक्‍खो च ओहितो।।129।।

जीरंति वे राजस्‍था सुचित्‍ता अथो सरीरम्‍पि जरं उपेति।
सतं च धम्‍मो न जरं उपेति सन्‍तो हवे सब्‍भि पवेदयन्‍ति।।130।।

एस धम्मो सनंतनो-(भाग-06) ओशो


एस धम्मो सनंतनो (भाग—6) ओशो

 (ओशो द्वारा भगवान बुद्ध की सुललित वाणी धम्मपद पर दिए गए नौ अमृत प्रवचनों का संकलन)

 मैं तुम्हें अपने पर नहीं रोकना चाहता। मैं तुम्हारे लिए द्वार बनूं र दीवार न बनूं। तुम मुझसे प्रवेश करो, मुझ पर रुको मत। तुम मुझसे छलांग लो, तुम उड़ो आकाश में। मैं तुम्हें पंख देना चाहता हूं, तुम्हें बाध नहीं लेना चाहता। इसीलिए तुम्हें सारे बुद्धों का आकाश देता हूं। मैं तुम्हारे सारे बंधन तोड़ रहा हूं। इसलिए मेरे साथ तो अगर बहुत हिम्मत हो, तो ही चल पाओगे। अगर कमजोर हो, तो किसी कारागृह को पकड़ो, मेरे पास मत आओ।

वस्तुत: मैं तुम्हें कहीं ले जाना नहीं चाहता, उड़ना सिखाना चाहता हूं। ले जाने की बात ही ओछी है। मैं तुमसे कहता हूं? तुम पहुंचे हुए हो। जरा परों को तौलो, जरा तूफानों में उठो, जरा आंधियों के साथ खेलो, जरा खुले आकाश का आनंद लो। मैं तुमसे यह नहीं कहता कि सिद्धि कहीं भविष्य में है। अगर तुम उड़ सको तो अभी है, यहीं है।

जो घर बारे आपना-(साधना-शिविर)-प्रवचन-04

जो घर बारे आपना-(साधना-शिविर)--ओशो
प्रवचन-चौथा-(अमृत का सागर)


मनुष्य का जीवन बाहर अंधेरे से भरा हुआ है, लेकिन भीतर प्रकाश की कोई सीमा नहीं है। मनुष्य के जीवन की बाहर की परिधि पर मृत्यु है, लेकिन भीतर अमृत का सागर है। मनुष्य के जीवन के बाहर बंधन हैं, लेकिन भीतर मुक्ति है। और जो एक बार भीतर के आनंद को, आलोक को, अमृत को, मुक्ति को जान लेता है, उसके बाहर भी फिर बंधन, अंधकार नहीं रह जाते हैं। हम भीतर से अपरिचित हैं तभी तक जीवन एक अज्ञान है।
ध्यान भीतर से परिचित होने की प्रक्रिया है।
ध्यान मार्ग है स्वयं के भीतर उतरने का। ध्यान सीढ़ी है स्वयं के भीतर उतरने की।

जो घर बारे आपना-(साधना-शिविर)-प्रवचन-03

जो घर बारे आपना-(साधना-शिविर)ओशो
प्रवचन-तीसरा-(संकल्प : संघर्ष का विसर्जन)


मेरे प्रिय आत्मन्!
थोड़े से प्रश्न साधकों ने पूछे हैं, उस संबंध में हम बात करेंगे।

एक मित्र ने पूछा है कि संकल्प की साधना में क्या थोड़ा सा दमन, सप्रेशन नहीं आ जाता है? संकल्प की साधना में क्या थोड़ा काय-क्लेश नहीं आ जाता है?

इस संबंध में दो बातें समझ लेनी जरूरी हैं। एक, कि यदि किसी वृत्ति को दबाने के लिए संकल्प किया है, तब बात दूसरी है। जैसे किसी आदमी को ज्यादा भोजन की आदत है। इस आदत से छुटकारे के लिए अगर उसने उपवास का संकल्प किया है, तब दमन होगा। लेकिन ज्यादा भोजन की न कोई आदत है, न ज्यादा भोजन से लड़ने का कोई खयाल है। तब यदि उपवास का संकल्प किया है तो वह सिर्फ संकल्प है, उसमें दमन नहीं है।

जो घर बारे आपना-(साधना-शिविर)-प्रवचन-02

जो घर बारे आपना-(साधना-शिविर)--ओशो
प्रवचन-दूसरा-(ध्यान के संबंध में)


मेरे प्रिय आत्मन्!
ध्यान के संबंध में दोत्तीन बातें हम समझ लें, और फिर प्रयोग के लिए बैठेंगे।
एक बात तो यह समझ लेनी जरूरी है, ध्यान में हम सिर्फ तैयारी करते हैं, परिणाम सदा ही हमारे हाथ के बाहर है। लेकिन यदि तैयारी पूरी है, तो परिणाम भी सुनिश्चित रूप से घटित होता है। परिणाम की चिंता छोड़ कर श्रम की ही हम चिंता करें। और परिणाम की चिंता छोड़ कर पूरी चिंता हम अपने श्रम की कर सकें, तो परिणाम भी सुनिश्चित है। लेकिन परिणाम की चिंता में श्रम भी पूरा नहीं हो पाता और परिणाम भी अनिश्चित हो जाते हैं।

जो घर बारे आपना-(साधना-शिविर)-प्रवचन-01

जो घर बारे आपना-(साधना-शिविर)--ओशो
प्रवचन-पहला–(जीवन के रहस्य की कुंजी)


मेरे प्रिय आत्मन्!
जीवन एक रहस्य है। जिसे हम जीवन जानते हैं, जैसा जानते हैं, वैसा ही सब कुछ नहीं है। बहुत कुछ है जो अनजाना ही रह जाता है। शायद सब कुछ ही अनजाना रह जाता है। जो हम जान पाते हैं वह ऐसा ही है जैसे कोई लहरों को देख कर समझ ले कि सागर को जान लिया। लहरें भी सागर की हैं, लेकिन लहरों को देख कर सागर को नहीं समझा जा सकता। और जो लहरों में उलझ जाएगा वह सागर तक पहुंचने का शायद मार्ग भी न खोज सके। असल में जिसने लहरों को ही सागर समझ लिया, उसके लिए सागर की खोज का सवाल भी नहीं उठता।

गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

जीवन संगीत-(साधना-शिविर)-प्रवचन-09

जीवन संगीत-(साधना-शिविर)--ओशो
नौवां-प्रवचन


मेरे प्रिय आत्मन्!
तीन दिनों की चर्चाओं के संबंध में बहुत से प्रश्न मित्रों ने भेजे हैं। जितने प्रश्नों के उत्तर संभव हो सकेंगे, मैं देने की कोशिश करूंगा।

एक मित्र ने पूछा है कि आप नये विचारों की क्रांति की बात कहते हैं। क्या अब भी कभी हो सकता है जो पहले नहीं हुआ है? इस पृथ्वी पर सभी कुछ पुराना है, नया क्या है?

इस संबंध में जो पहली बात आपसे कहना चाहता हूं, वह यह कि इस पृथ्वी पर सभी कुछ नया है, पुराना क्या है? पुराना एक क्षण नहीं बचता, नया प्रतिक्षण जन्म लेता है। पुराने का जो भ्रम पैदा होता है, इसलिए पैदा होता है, कि हम दो के बीच जो अंतर है, उसे नहीं देख पाते।
कल सुबह भी सूरज ऊगा था, कल सुबह भी आकाश में बादल छाए थे, कल सुबह भी हवाएं चली थीं। और आज भी सूरज ऊगा और बादल छाए और हवाएं चली थीं। और हम कहते हैं, वही है! लेकिन जरा भी वही नहीं है।

जीवन संगीत-(साधना-शिविर)-प्रवचन-08

जीवन संगीत-(साधना-शिविर)--ओशो
आठवां-प्रवचन


मैंने कहा है कि क्रांति तो एक विस्फोट है। सडन एक्सप्लोजन है। और फिर मैं ध्यान की प्रक्रिया और अभ्यास के लिए कहता हूं कि इन दोनों में विरोध नहीं है? नहीं, इन दोनों में विरोध नहीं है।
यदि मैं कहूं कि पानी जब भाप बनता है, तो एक विस्फोट है, सौ डिग्री पर पानी भाप बन जाता है। और फिर मैं किसी से कहूं कि पानी को धीरे-धीरे गरम करो, ताकी वह भाप बन जाए। वह आदमी मुझसे कहे कि आप तो कहते हैं, पानी एकदम से भाप बन जाता है। फिर हम धीरे-धीरे गरम करने का अभ्यास क्यों करें?
इन दोनों में विरोध नहीं है? तो उस समय कहूंगा विरोध नहीं है। पानी को जब हम गरम करते हैं तो एक डिग्री गरम पानी भी भाप नहीं है। और निन्यानबे डिग्री पानी भी भाप नहीं है।

जीवन संगीत-(साधना-शिविर)-प्रवचन-07

जीवन संगीत-(साधना-शिविर)--ओशो
सातवां--प्रवचन

तीन दिन की चर्चाओं के संबंध में बहुत से प्रश्न मित्रों ने पूछे हैं।


एक मित्र ने पूछा है कि यदि आत्मा सब सुख-दुख के बाहर है, तो दूसरों की आत्माओं की शांति के लिए जो प्रार्थनाएं की जाती है, उनका क्या उपयोग है?

यह बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है और समझना उपयोगी होगा। पहली तो बात यह है कि आत्मा निश्चय ही सब सुख-दुखों सब शांतियों, अशांतियों, सब राग द्वेषों मूलतः सभी तरह के द्वंद्व और द्वैत के अतीत है।
न तो आत्मा अशांत होती है और न अशांत। क्योंकि शांत वही हो सकता है, जो अशांत हो सकता हो। मन ही शांत होता है, मन ही अशांत होता है।
और ठीक से समझें तो मन का होना ही अशांति है।
मन का न हो जाना शांति है। लेकिन आत्मा अपने में न कभी शांत है, न कभी अशांत है। न सुख में है, न दुख में है। आत्मा एक तीसरी ही अवस्था में है जिसका नाम आनंद है।

जीवन संगीत-(साधना-शिविर)-प्रवचन-06

जीवन संगीत-(साधना-शिविर)--ओशो
छठवां--प्रवचन


सत्य की खोज में, उसे जानने की दिशा में, जिसे जान कर फिर कुछ और जानने को शेष नहीं रह जाता है। और उसे पाने के लिए; जिसे पाए बिना हम ऐसे तड़फते हैं, जैसे कोई मछली पानी के बाहर, रेत पर फेंक दी गई हो। और जिसे पा लेने के बाद हम वैसे ही शांत और आनंदित हो जाएं, जैसे मछली सागर में वापस पहुंच गई हो। उस आनंद, उस अमृत की खोज में, एक और दिशा और द्वार की चर्चा आज की संध्या में करूंगा।
सत्य को खोजने का उपकरण क्या है? रास्ता क्या है? साधन क्या है? मनुष्य के पास एक ही साधन मालूम पड़ता है विचार। एक ही शक्ति मालूम पड़ती है कि मनुष्य सोचे और खोजे।
लेकिन सोचने और विचारने से कभी किसी को सत्य उपलब्ध नहीं हुआ है।

जीवन संगीत-(साधना-शिविर)-प्रवचन-05

जीवन संगीत-(साधना-शिविर)--ओशो
पांचवां-प्रवचन


...ताकि पूरे प्रश्नों के उत्तर हो सकें। सबसे पहले तो एक मित्र ने पूछा है कि कल मैंने कहा कि खोज छोड़ देनी है। और अगर खोज हम छोड़ दें, फिर तो विज्ञान का जन्म नहीं हो सकेगा।
मैंने जो कहा है, खोज छोड़ देनी है, वह कहा है उस सत्य को पाने के लिए जो हमारे भीतर है। खोज करनी व्यर्थ है, बाधा है। लेकिन हमारे बाहर भी सत्य है। और हम से बाहर जो सत्य है, उसे बिना तो खोज के कभी नहीं पाया जा सकता।
दुनिया में दो दिशाएं हैं। एक जो हम से बाहर जाती है। हम से बाहर जाने वाला जो जगत है, अगर उसके सत्य की खोज करनी हो, जो विज्ञान करता है, तो खोज करनी ही पड़ेगी। खोज के बिना बाहर के जगत का कोई सत्य उपलब्ध नहीं हो सकता।

जीवन संगीत-(साधना-शिविर)-प्रवचन-04

जीवन संगीत-(साधना-शिविर)--ओशो
चौथा-प्रवचन


प्रिय आत्मन्!
मनुष्य दुख में है और सुख की केवल कल्पना करता है। मनुष्य अज्ञान में है और ज्ञान की केवल कल्पना करता है। मनुष्य ठीक अर्थों में जीवित नहीं है। जीवन की केवल कल्पना करता है।
आज की सुबह की इस बैठक में इस संबंध में मैं कुछ कहना चाहूंगा कि हम जो कल्पना करते हैं, उसके कारण ही हम जो हो सकते हैं, वह नहीं हो पाते हैं।
जैसे कोई बीमार आदमी कल्पना कर ले कि वह स्वस्थ है, तो फिर स्वास्थ्य की दिशा में कदम उठाना बंद कर देगा। जब वह स्वस्थ है, तो स्वस्थ होने का कोई सवाल नहीं है। अगर कोई अंधा आदमी कल्पना करने लगे कि उसे प्रकाश का पता है--कि प्रकाश कैसा होता है, तो फिर वह अंधा आदमी आंख की खोज बंद कर देगा।

जीवन संगीत-(साधना-शिविर)-प्रवचन-03

जीवन संगीत-(साधना-शिविर)
ओशो
तीसरा-प्रवचन


एक अदभुत व्यक्ति हुआ, नाम था च्वांगत्सु। रात सोया, एक स्वप्न देखा। स्वप्न देखा कि एक तितली हो गया हूं, फूल-फूल उड़ रहा हूं। सुबह उठा तो बहुत उदास था। मित्र उसके पूछने लगे, कभी उदास नहीं देखा, इतने उदास क्यों हो? दूसरे उदास होते थे, तो पूछते थे राह च्वांगत्सु से, मार्ग पाते थे। और उसे तो कभी किसी ने उदास नहीं देखा था।
च्वांगत्सु ने कहा, क्या बताऊं, क्या फायदा है, एक बहुत उलझन में पड़ गया हूं। रात एक सपना देखा कि मैं तितली हो गया हूं!
मित्र कहने लगे, पागल हो गए हो, इसमें चिंता की क्या बात है?
च्वांगत्सु ने कहा, सपना देखा इसमें चिंता नहीं है, लेकिन सुबह उठ कर मुझे एक खयाल घेर लिया है और वह यह कि रात आदमी सपना देखता है कि तितली हो गया, तो कहीं ऐसा तो नहीं है कि अब तितली सो गई हो और सपना देखती हो कि आदमी हो गई है?

जीवन संगीत-(साधना-शिविर)-प्रवचन-02

जीवन संगीत-(साधना-शिविर)
ओशो
दूसरा-प्रवचन


उसे अनबंधा किया जा सकता है, जो कारागृह में हो, उसे मुक्त किया जा सकता है। जो सोया हो, उसे जगाया जा सकता है। लेकिन जो जागा हो और इस भ्रम में हो कि सो गया हूं, उसे जगाना बहुत मुश्किल है। और जो मुक्त हो और सोचता हो कि बंध गया हूं, उसे खोलना बहुत मुश्किल है। और जिसके आस-पास कोई जंजीरें न हों, और आंख बंद करके सपना देखता हो कि मैं जंजीरों में बंधा हूं और पूछता हो कैसे तोडूं इन जंजीरों को? कैसे मुक्त हो जाऊं? कैसे छुटूं? तो बहुत कठिनाई है।
रात्रि इस संबंध में पहले सूत्र पर मैंने आपसे कुछ कहा। मनुष्य की आत्मा परतंत्र नहीं है और हम उसे परतंत्र माने हुए बैठे हैं। मनुष्य की आत्मा को स्वतंत्र नहीं बनाना है। बस यही जानना है कि आत्मा स्वतंत्र है।

जीवन संगीत-(साधना-शिविर)-प्रवचन-01

जीवन संगीत-(साधना-शिविर)  ओशो
पहला-प्रवचन


मेरे प्रिय आत्मन्!
अंधकार का अपना आनंद है, लेकिन प्रकाश की हमारी चाह क्यों? प्रकाश के लिए हम इतने पीड़ित क्यों? यह शायद ही आपने सोचा हो कि प्रकाश के लिए हमारी चाह हमारे भीतर बैठे हुए भय का प्रतीक है। फियर का प्रतीक है।
हम प्रकाश इसलिए चाहते हैं, ताकि हम निर्भय हो सकें। अंधकार में मन भयभीत हो जाता है। प्रकाश की चाह कोई बहुत बड़ा गुण नहीं। सिर्फ अंतरात्मा में छाए हुए भय का सबूत है। भयभीत आदमी प्रकाश चाहता है। और जो अभय है, उसे अंधकार भी अंधकार नहीं रह जाता। अंधकार की जो पीड़ा है, जो द्वंद्व है, वह भय के कारण है। और जिस दिन मनुष्य निर्भय हो जाएगा, उस दिन प्रकाश की यह चाह भी विलीन हो जाएगी।

बुधवार, 5 अप्रैल 2017

जीवन ही है प्रभु-(साधना-शिविर) प्रवचन-05

जीवन ही है प्रभु-(साधना-शिविर)--ओशो
साधना-शिविर, जूनागढ़; दिनांक 12 दिसंबर, 1969; रात्रि.
प्रवचन-पांचवां  
मेरे प्रिय आत्मन् ,

जीवन ही है प्रभु, इस संबंध में और बहुत से प्रश्न मित्रों ने पूछे हैं।


एक मित्र ने पूछा है--बुराई को मिटाने के लिए, अशुभ को मिटाने के लिए, पाप को मिटाने के लिए विधायक मार्ग क्या है? पाजिटिव रास्ता क्या है? क्या ध्यान और आत्मलीनता में जाने से बुराई मिट सकेगी?
ध्यान और आत्मलीनता तो एक तरह का पलायन, एस्केप है, जिंदगी से भागना है। ऐसा कोई मार्ग, विधायक, सृजनात्मक, जो भागना न सिखाता हो, जीना सिखाता हो, उस संबंध में कुछ कहें?

पहली तो बात यह है कि ध्यान पलायन नहीं है और आत्मलीनता पलायन नहीं है। बल्कि, जो आत्मा से बचकर और सब तरफ भाग रहे हैं वे पलायन में हैं।