कुल पेज दृश्य

रविवार, 2 मार्च 2014

आत्म पूजा उपनिषद--प्रवचन-02

प्रवचन—दूसरा (प्रश्‍न एवं उत्तर)


बंबईदिनांक 16 फरवरी, 1972, रात्रि

पहला प्रश्‍न--
     
      भगवान श्री रजनीश, कल रात्रि आपने कहा कि जो कोई शून्य हो जाते हैं वे घाटी की तरह जो जाते हैं। वे प्रतिक्रिया नहीं करते, वरन संवेदनशील करते हैं, और ऐसे जो ज्योतिर्मय लोग हैं उनके प्रतिसंवेदन अलग-अलग होते हैं। घाटी अपनी-अपनी महान निजता व व्यक्तिगत रूप में प्रतिध्वनि करेगी। अब यह प्रश्‍न उठता है कि जो लोग पूर्ण शून्य को प्राप्त हो गए हैं--मिट गए हैं--उनकी अभी भी निजता और व्यक्तित्व बना रहता है। यदि ऐसा है तो कृपया समझाए कि ऐसा कैसे संभव हो पाता है?
     
      यह अध्यात्म जीवन के विरोधाभासों में से एक है। जितना ही कोई परमात्मा में लीन हो जाता है, उतना ही विशिष्ट वह हो जाता है। यह उसके व्यक्तित्व का विलय नहीं है, वरन उसके अहं का विलय है। यह विलय उसकी निजता का नहीं, वरन उसके अहंकार का विलय है। जितने आप अहंकार-जन्य होते हैं, उतने ही आप दूसरे के जैसे होते हैं, क्योंकि प्रत्येक अहंकारी है।
अहंकार संसार में सबसे अधिक साधारण चीज है। हर एक अहं जन्य है, यहां तक कि एक नवजात शिशु भी अहं जन्य होता है, पूरा अहं जन्य। इसलिए यह कोई उपलब्धि नहीं है यह कोई विशेषता नहीं है। वास्तव में, यह कहा जा सकता है कि सामान्य होना एक सर्वाधिक विशेषता की बात है, क्योंकि कोई भी सामान्य अनुभव नहीं करता। इसलिए किसी का अपने को विशिष्ट अनुभव करना एक बहुत ही सामान्य बात है प्रत्येक वैसा समझता है। अतएव अहंकार कोई शिखर की बात
नहीं है।
     
      यदि आप में अहंकार है, तो वह कोई बड़ी बात नहीं है। वास्तव, में अहं शून्यता ही सर्वोपरि चीज है, सर्वाधिक असाधारण व न्यूनतम। ऐसा कभी-कभी ही हो पाता है। सदिया बीत जाती हैं और बहुत मुश्‍किल से ऐसी कोई घटना हो पाती है कि कोई अहं शून्य हो गया हो--कोई बुद्ध, कोई जीसस। परन्तु जब हम कहते हैं कि कोई अहं शून्य हो गया है, तो इसका अर्थ यह नहीं होता कि वह नहीं है। वास्तव में, प्रथम बार अब वह है--प्रामाणिक ढंग से अपने में स्थित। वह अहं जन्य नहीं है। इसे दूसरे मार्ग से समझे।

      अहं एक असत्य घटना है, मात्र उपरी दिखावा, न कि वास्तविकता। वह कोई ऐसी बात नहीं जो स्वयं में जमी हुई हो। वह मात्र एक स्वप्न है, एक विचार है--बस एक मानसिक संरचना। इसलिए जितना आप अहं से जुडे हैं, उतना ही कम आप अस्तित्व से संबंधित हैं। जितना ही अधिक आप अपने अहंकार पर ध्यान के केंद्रित करते हैं, उतने ही कम आप प्रामाणिक होते हैं। आप असत्य हो जाते हैं, एक अस्तित्वगत असत्य। जब हम रिक्त होने की, कुछ नहीं कहो ने की, घाटी की तरह होने की बात करते हैं, तब हमारा अर्थ होता है कि कोई अहं नहीं है। परन्तु आप तो हैं। मुझे इस तरह कहने दें: मैं कहता हूं कि मैं हूं, परन्तु जब अहं का विलय हो जाता है, तो पीछे मात्र हूं बच जाता है। मैं फिर वहां नहीं होता, होता है मात्र हूं--पहली बार
शुद्ध, समग्र, बिना दूषित किया हुआ अहं उसे दूषित कर देता है।
     
      व्यक्तित्व ;पर्सनैलिटी और निजता; इन्डिवीजअलिटि इन दो शब्दों को एक नहीं समझना चाहिए। ये दोनों बिलकुल ही भिन्‍न हैं। इन दोनों का एक अर्थ नहीं होता। ये दोनों एक नहीं हैं। व्यक्तित्व अहंकार से संबंधित है, और निजता स्वरूप से, बीइंग से। व्यक्तित्व मात्र एक बाह्य हिस्सा है। अहंकार केंद्र है और व्यक्तित्व है उसकी बाहरी परिधि। वह इंण्डिविजुअलिटी या ने उसकी निजता बिलकुल भी नहीं। यह शब्द पर्सनैलिटी बहुत अर्थपूर्ण है। यह ग्रीक शब्द परसोना से निकला है और परसोना का अर्थ होता है मास्क--बनावटी चेहरा। ग्रीक नाटक में पात्र बनावटी मुखौटों में अपने चेहरे छिपा लेते थे। इस तरह उनका असली चेहरा तो छिपा रहता था और बनावटी चेहरा ही असली लगता था। पर्सनैलिटी का अर्थ होता है नकली चेहरा--मास्क, जो कि आप नहीं हैं परन्तु दिखलाई पड़ते हैं।
     
      हमारे बहुत सारे चेहरे हैं और इसलिए वस्तुतः किसी का भी एक व्यक्तित्व नहीं है। हमारे बहु-व्यक्तित्व हैं। प्रत्येक को सारे दिन में कितने ही चेहरे बदलने पड़ते हैं। आप एक चेहरे के साथ नहीं रह सकते। वह बहुत कठिन होगा, क्योंकि सारे समय आप अलग-अलग लोगों के साथ होते हैं और आपको चेहरों बदलना पड़ता है। आप अपने नौकर के सामने वही चेहरा लिए हुए नहीं हो सकते जो कि आप अपने मालिक के सामने लिए होते हैं। आप अपनी पत्नी के समक्ष वही चेहरा नहीं रख सकते जो कि अपनी प्रेमिका के सामने रखते हैं। इसलिए लगातार हमें अपने पास निरंतर बदलते हुए चेहरों का इंतजाम रखना पड़ता है। सारे दिन व सारी जिंदगी हम निरंतर चेहरे बदलते रहते हैं। आप इसके प्रति सजग हो सकते हैं। आप जान सकते हैं कि कब
आप एक चेहरों बदलते हैं और क्यों बदलते हैं और आपके कितने चेहरे हैं।

      इसलिए व्यक्तित्व का अर्थ होता हैः एक बदलते हुए चेहरे का प्रबंध। और जब आप कहते हैं कि किसी आदमी का महान व्यक्तित्व है, उसका इतना ही अर्थ होता है कि उसके पास और अधिक चेहरे बदलने का प्रबंध है। वह कोई थिर व्यक्ति नहीं, उसके पास प्रबंध और अधिक लचीला है। वह सरलता से परिवर्तन कर
सकता है। वह एक बड़ा अभिनेता है।
     
      आपको व्यक्तित्व हर क्षण निर्मित करना पड़ता है, इसलिए कोई भी अपने व्यक्तित्व के साथ आराम से नहीं है। वह एक लगातार प्रयत्न है, इसलिए यदि आप थक गए हैं, तो आपकी चमक खो जाएगी। सबेरे आपके व्यक्तित्व की एक चमक होती है, शाम को वह खो जाती है। सारे दिन भर वह लगातार चेहरे बदलता रहा। इसलिए जब मैं व्यक्तित्व शब्द का प्रयोग करता हूं, तो मेरा तात्पर्य है, एक झूठा दिखलावा, जो कि आपने
चारों और निर्मित किया है।
     
      निजता दूसरी ही बात है। निजता का अर्थ वह नहीं, जो कि आपके द्वारा बनाई व खड़ी की जाती है,बल्कि उसका अर्थ होता है आपके सच्चे स्वरूप का असली स्वभाव। यह शब्द इंडीवीजुअलटी भी बहुत अर्थपूर्ण है। इसका अर्थ होता है वह जो कि विभाजित नहीं किया जा सके, अविभाज्य हो--इंडिविजिवल। हमारा एक आंतरिक जन्मजात, स्वभाव है जो कि विभाजित नहीं किया जा सकता, जो कि अविभाज्य है। इसलिए कार्ल गुस्ताव जुंग इंडीवीजुअलटी को एक बहुत गहरी घटना बतलाता है। वह कहता है कि यह अविभाज्यता सत्य की ओर गया मार्ग है--परमात्मा की ओर अविभाज्यता--अर्थात निजता में, अखंड होना।

      भारतीय शब्द योग का वही अर्थ होता है--अविभाज्य, अखंड। योग का अर्थ होता है उस सबको फिर से जोड़ना जो कि विभाजित हो गया है, उस सबको फिर से संयुक्त करना जो कि बंट गया है फिर से अविभाज्य को लौटा लाना। इसलिए योग का अंग्रेजी में अनुवाद करना हो, तो यह ज्यादा ठीक होगा यदि हम उसे अविभाज्यता की ओर जाना कहें।
     
      यह निजता रहती है और अधिक गहरी हो जाती है, और अधिक तेज हो जाती है। जिस क्षण भी आप अपने अहंकार को खोते हैं, जिस क्षण भी आप अपने व्यक्तित्व को छोड़ते हैं,  आप एक व्यक्ति हो जाते हैं--इंडीवीजुअल। यह एक व्यक्ति हो जाना एक अनूठी घटना है, यह फिर से दोहराई जाने वाली नहीं है। एक बुद्ध फिर से नहीं दोहराए जा सकते। गौतम सिद्धार्थ फिर से दोहराए जा सकते हैं। एक जीसस फिर से पुनरुक्त हो सकते हैं, परन्तु एक जीसस क्राइस्ट नहीं। जीसस का अर्थ होता है व्यक्तित्व: जीसस क्राइस्ट का अर्थ होता है अविभाज्यता, अखंडता, निजता। गौतम-सिद्धार्थ एक साधारण बात है वे पुनरुक्त हो सकते हैं। कोई गौतम सिद्धार्थ हो सकता है। जिस क्षण गौतम सिद्धार्थ ज्ञान की उपलब्धि कर लेते हैं और बुद्ध होते हैं, तो फिर वह घटना पुनरुक्त नहीं हो सकती। वह अपूर्व है। वह पहले कभी नहीं हुई और वह आगे भी कभी नहीं होगी। यह बुद्धत्व, यह आत्मानुभव का शिखर इतना अनूठा व अपूर्व है कि वह पुनरुक्त नहीं हो सकता। अतएव जब मैंने घाटी की भांति होने की बात कही और जब यह कहा कि हर एक घाटी अपनी ही तरह से अनुगूँज करेगी तो मेरा तात्पर्य है फिर हर एक घाटी की अपनी इंडीवीजुअलटी है, निजता है। बुद्ध की अपनी जितना है, जीसस की अपनी है, कृष्ण की अपनी है। इसलिए इसे समझना जरा अच्छा होगा।

      फिर बुद्ध, जीसस या कृष्ण इतने भिन्‍न क्यों होते हैं? वे भिन्‍न होते हैं, जितनी भी भिन्‍न होने की संभावना है, परन्तु फिर भी वे हैं एक ही, किसी गहरे अर्थों में। जहां तक अविभाज्यता का संबंध है, वे एक हैं जहां तक निजता का संबंध हैं, वे भिन्‍न हैं। वे अविभाज्य तक आ गए हैं। जो कि अस्तित्व की आधारभूत कहता है, उन्होंने उसे जान लिया है। परन्तु इस आधारभूत एकता व उसके पा लेने का तात्पर्य यह नहीं है कि वे यूनीक--अपूर्व नहीं हैं। सच में अब वे बहुत ही अपूर्व हैं। इसलिए मैं कहता हूं, यह विरोधाभासी में से एक है।
     
      दो साधारण आदमी भिन्‍न हो सकते हैं, परन्तु उनकी भिन्‍नता पूर्ण और समग्र कभी नहीं हो सकती। यहां तक कि उनकी भिन्‍नताओं में भी समानताएं होंगी। वस्तुतः उनकी भिन्‍नता सदैव मात्रा की होगी। यद्यपि वे दोनों परंपरा बिलकुल ही विपरीत हैं, उनका भेद मात्र मात्रा का होता है। एक मनुष्य जो कम्युनिस्ट है और दूसरा मनुष्य जो कि एण्टीकम्युनिस्ट है--विरोधी हैं--वे भी मात्रा में ही भिन्‍न हैं। एंटी-कम्युनिस्ट जरा कम कम्युनिस्ट है मात्रा में, और जो कम्युनिस्ट है वह जरा कम पूंजीवादी है मात्रा में। वह भेद सदा ही मात्रा का है और वह कभी भी बदल सकता है। वे अपना डेरा कभी भी बदल सकते हैं आसानी से--उसमें कोई अड़चन नहीं है।
साधारणतः वे बदलते रहते हैं। भेद सिर्फ ठंडे-गर्म का है--केवल मात्राओं का। परन्तु एक बुद्ध और कृष्ण, एक क्राइस्ट और मोहम्मद, और एक लाओत्सु वे महावीर--उनका भेद कभी भी मात्राओं का नहीं है वे कभी भी नहीं मिल सकते। और सब से बड़ा विरोधाभास है कि वे सब उस ऐक्य को पहुंच गए हैं और फिर भी कभी नहीं मिल सकते! वह भेद मात्राओं का नहीं है, यह भेद उनकी यूनिकनेस का है--अपूर्वता का है।

      क्या अर्थ है मरो इस अपूर्वता से? हम ऐक्य को बड़ी सरलता से समझ सकते हैं। एक बूंद पानी में गिरा जाता है। और उसके साथ एक हो जाती है, परन्तु वैसा एक होना मृत सदृश है, एक मृत ऐक्य। बूंद बिलकुल खो गई, अब वह कहीं भी नहीं है। बुद्ध इस तरह नहीं गिर रहे हैं वे एक भिन्‍न तरीके से गिर रहे हैं। यदि आप एक लौ सूरज के समक्ष जलाएं, तो वह लौ सूरज से एक हो जाएंगी: परन्तु उसकी अपनी
निजता नहीं खो जाएगी, अभी भी वह होगी। यदि हम इस कमरे में पचास लौ जला दें, तो वे सब एक प्रकाश उत्पन्‍न करेंगी, परन्तु प्रत्येक लौ अपने में अपूर्व, अनूठी लौ होगी। इसलिए यह ब्रह्म में लीन होना एक सामान्य विलय नहीं है यह बहुत गूढ़ है। इसकी गूढ़ता यह है कि वह जो कि विलय होता है, शेष रहता है। बल्कि इसके विपरीत पहली बार वह है।
     
      यह जो इंडीवीजुअलटी है--निजता है, यह विभिन्‍न प्रकार से अनुगूँज करती है और वही उसकी सुंदरता है वह सुंदर है। अन्यथा वह सिर्फ कुरूप होगा। जरा सोचें कि बुद्ध उसी तरह से प्रतिध्वनि करते हैं जैसे कि जीसस, तो दुनिया गरीब हो जाएगी--बहुत ही दीन। बुद्ध अपनी तरह से प्रतिसंवेदना करते हैं, एवं जीसस अपनी तरह से प्रतिसंवेदन करते हैं। संसार इस तरह से समृद्ध होता है और यह एक सुंदरता की बात है। संसार और अधिक स्वतंत्र होता है और आप भी आप हो सकते हैं।
     
      परन्तु यह भेद समझने जैसा है कि जब मैं कहता हूं कि आप भी आपके जैसे हो सकते हैं, तो उसका अर्थ आपका अहंकार नहीं है। जब मैं कहता हूं कि आप हो सकते हैं, तो उसका अर्थ आपका अहंकार नहीं है। जब मैं कहता हूं कि आप हो सकते हैं, तो मेरा आशय है कि आपका स्वभाव, आपका ताओ, आपका अस्तित्व। परन्तु उसकी अपनी निजता है। वह निजता पर्सनैलिटी नहीं, व्यक्तित्व नहीं। अतः मैं कहता हूं कि वे एक ही अस्तित्व से संबद्ध हैं, पर फिर भी अपनी निजता में। वे उसी गहनता से प्रतिसंवेदन करते हैं, परन्तु एक निजता की भांति। वहां कोई अहंकार का भाव नहीं है, परन्तु अपूर्वता तो रहती है।

      यह संसार कोई रंगीन इकाई नहीं है, यह कोई ऊब से भरा नहीं है, इसके बहुरंग हैं, यह बहु ध्वनि वाला है। आप एक स्वर से भी संगीत पैदा कर सकते हैं, परन्तु वह मात्र ऊबा देने वाला होगा, थका देगा: वह जीवंत नहीं होगा: वह सुंदर नहीं होगा। कई स्वरों से एक अधिक सूक्ष्म व मिश्रित लय निकलती है--बहु-स्वर वाली--मल्टीटोनल। एक आंतरिक लय चलती है, परन्तु वह उबाने वाली नहीं होती। हर एक स्वर की अपनी निजता है। वह समग्रता की लयबद्धता को अपना योगदान करता है। वह योगदान करता है, क्योंकि उसकी अपनी निजता है। बुद्ध योगदान करते हैं, क्योंकि वे एक बुद्ध हैं। जीसस योगदान करते हैं, क्योंकि वे एक जीसस हैं। वे एक नया स्वर देते हैं, एक नयी लहर। एक नई ही लय पैदा होती है उनकी वजह से। परन्तु वह तभी संभव है जबकि उनकी अपनी एक निजता हो। और ऐसा गहरी बातों के लिए ही नहीं है। यहां तक
बहुत छोटी वे मामूली बातों में भी बुद्ध और जीसस भिन्‍न हैं। बुद्ध अपनी ही तरह से चलते हैं। कोई उनकी तरह से नहीं चल सकता। जीसस अपनी ही तरह से देखते हैं। कोई भी उस तरह से नहीं देख सकता। उनकी आंखें भी अनूठी हैं। उनके हाव-भाव, उनके शब्द जो वे उपयोग करते हैं, अपूर्व हैं। कोई भी एक-दूसरे के विशिष्ट गुण नहीं ले सकता।
     
      यह दुनिया अपूर्व स्वरों की एक सिम्फनी, राग-रागिनी है और उसके कारण ही संगीत ज्यादा समृद्धिशाली है। हर एक घाटी अपने ही ढंग से अनुगूँज करती है। वे सभी शुभचिंतक लोग जो कि एक मृत एकता को थोपना चाहते हैं, जो कि सब जगह से निजता को पोंछ डालना चाहते हैं, जो कहते हैं कि कुरान का तात्पर्य वही है जो गीता का है, जो कहते हैं कि बुद्ध भी वही सिखाते हैं जो कि महावीर, उनको पता नहीं है कि वे कितनी मूर्खता की बातें करते हैं। यदि वे अपनी बात में जीत जाएं, तो यह दुनिया बहुत दीन-हीन व दरिद्र हो जाएगी। कैसे कुरान वह कह सकती है जो कि गीता कहती है? और कैसे कुरान वह कह सकती है जो कि गीता कहती है? और कैसे वह गीता कह सकती है, जो कुरान कहती है। कुरान की अपनी निजता है, जो कि कोई गीता नहीं दोहरा सकती, और कोई कुरान गीता को पुनरुक्त नहीं कर सकती।
     
      कृष्ण की अपनी गरिमा है और मोहम्मद की अपनी। वे कभी नहीं मिलते और फिर भी मैं कहता हूं कि वे उसी स्थान पर खड़े हैं। वे कभी नहीं मिलते हैं यह सुंदरता है। और वे कभी भी नहीं मिलेंगे वे समानांतर रेखाओं की भांति हैं जो कि अनंत को जाती हैं। वे कभी भी नहीं मिलेंगे। यही मेरा मतलब है अपूर्वता से। वे शिखर की तरह हैं। जितना ही शिखर ऊंचा उठता है, उतनी ही कम संभावना उसके दूसरे शिखर से मिलने की हो जाती है। आप मिल सकते हैं यदि आप जमीन पर हैं तो। प्रत्येक चीज मिल रही हैं। परन्तु जितने उपर आप उठते जाते हैं, शिखर होते जाते हैं, उतनी ही मिलने की संभावना कम होती जाती है। इसलिए वे हिमालय के शिखरों की भांति हैं, जो कि कभी नहीं मिलते। यदि आप उन पर एक झूठी एकता को थोपे, तो आप उन शिखरों को सिर्फ नष्ट कर देंगे। वे भिन्‍न हैं, परन्तु उनकी भिन्‍नता रंगों की नहीं, उनकी भिन्‍नता किसी द्वंद्व के लिए नहीं है।
     
      द्वंद्व इसीलिए है, क्योंकि हम भिन्‍नताओं को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। फिर हम उनमें समरूपताएं ढूंढते हैं। या तो समरूपताएं होनी चाहिए अथवा हम द्वंद्व में होंगे। या तो हम वही बात बोले अन्यथा हम शत्रु होंगे। हमारे पास दो ही विकल्प हैं और दोनों ही गलत हैं। वे एक ही भाव से संबद्ध हैं। क्यों नहीं वे भिन्‍न हो सकते--बिलकुल ही भिन्‍न जो कि कहीं भी न मिलते हो? क्या आवश्‍यकता है किसी भी द्वंद्व की? वास्तव में, भिन्‍न स्वर एक बहुत सुंदर लय उत्पन्‍न करते हैं। तब एक अधिक गहरा मिलन होता है। स्वरों में कोई मेल नहीं है, परन्तु जो कुछ स्वर मिलकर उत्पन्‍न करते हैं, उसमें मेल हैं। परन्तु उस लयबद्धता को, उस एकलयता
के अनुभव करना प्रारंभ करना पड़े।
     
      यदि कोई भिन्‍न को ही जानता है तो मोहम्मद, जीसस, बुद्ध, मात्र स्वर हैं। कोई एक लयवदिता अनुभव नहीं होती, परन्तु विश्‍व एक छंद है। यदि आप अंतरालों को अनुभव करना शुरू करें, उनमें जो आंतरिक एकता है उसे अनुभव करें और ऊंचे शिखरों को जो कि कहीं भी नहीं मिलते, और यदि आप इन सब को एक साथ, इकट्टा, उनकी समग्रता में, एक संयुक्त एकता में देख सकें, तो आप दोनों को स्वीकार कर सकते हैंउनकी निजता को भी और उनमें जो लयबद्धता है उसको भी। तब फिर कोई समस्या नहीं है।
     



दूसरा प्रश्‍न
     भगवान, बुद्ध और महावीर जो कि समकालीन थे, फिर वे कभी भी क्यों नहीं मिले? शारीरिक रीति से भी नहीं मिले?
     

      वे नहीं मिल सकते। वे कभी नहीं मिल सकते, शारीरिक रीति से भी नहीं। वे कई बार मिलने के बहुत करीब भी आ गए। एक बार वे दोनों एक ही सराय में ठहरे हुए थे--एक हिस्से में महावीर और दूसरे हिस्से में बुद्ध, परन्तु कोई मिलना नहीं होता, मुलाकात नहीं होती। वे उन्हीं गांवों से कई बार गूजरें अपनी जिंदगी में। वे बिहार, जो कि बहुत छोटा सा प्रांत है, उसमें रहे। वे उन्हीं गांवों में गए भी। वे उन्हीं गांवों में रहे भी। उन्होंने उन्हीं लोगों से बात भी की। उनके अनुयायी बुद्ध से महावीर और महावीर से बुद्ध के बीच आते जाते रहे। बहुत विरोध भी रहा, बहुत बार लोगों का धर्म परिवर्तन भी हुआ, परन्तु वे कभी न मिले। वे मिल ही नहीं सकते। उनके अपने मूल स्वरूप ही अब कुछ ऐसे शिखर हैं कि उनका मिलना अब संभव नहीं है। यहां तक कि यदि वे एक-दूसरे के आस-पास में भी बैठे हों, तो भी मिलना नहीं हो सकता। यहां तक कि हमें
वे मिलते हुए भी नजर आए और छाती से छाती लगाए हुए दिखलाई पड़े, तो भी वे नहीं मिल सकते। उनकी मीटिंग असंभव हो गई है। वे इतने अपूर्व हैं, वे इतने शिखर की तरह हैं, कि आंतरिक मिल संभव नहीं हैं। इसलिए फिर बाह्य मिलन का क्या अर्थ है? वह बेकार है, वह अर्थहीन है।
     
      यह बात हमें समझ में नहीं आती। हम सोचते हैं कि दो अच्छे आदमी आपस में मिलने ही चाहिए। हमारे लिए यह जो न मिलने वाला रुख है, यह ठीक नहीं है। वास्तव में, कोई न मिलने, का भाव अभाव रुख नहीं है बस वह असंभव है। ऐसा नहीं है कि बुद्ध महावीर से मिलना न चाहेंगे। ऐसा नहीं है कि महावीर मना करेंगे। बस वह सिर्फ असंभव है। बस, वह हो नहीं सकता। कोई रुख नहीं है वैसा। इसलिए वास्तव में यह आश्‍चर्यजनक बात है। एक ही गांव में रहे, वे एक ही सराय में ठहरे, परन्तु न तो बौद्धों के साहित्य में और न जैनों के शास्त्रों में ऐसा कोई उल्लेख है कि किसी ने कहा हो कि वे मिले--एक भी उल्लेख नहीं है! यहां तक कि ऐसा भी कोई उल्लेख नहीं है कि किसी ने सुझाव दिया हो कि यह अच्छा होगा यदि वे दोनों मिलें। यह वाकई आश्‍चर्यजनक बात है। दोनों में से किसी ने भी मना नहीं किया है। न तो बुद्ध ने,
महावीर ने कभी ऐसा कहा है कि मैं नहीं मिलूंगा। फिर वे क्यों नहीं मिले? क्योंकि वह एक असंभावना है वह संभव ही नहीं है।
     
      हमारे लिए, जो कि पृथ्वी पर खड़े हैं, बड़ा अजीब लगता है, परन्तु यदि आप शिखर पर खड़े हों, तो कुछ अजीब नहीं लगेगा। क्यों नहीं हिमालय के एक शिखर से कहते कि दूसरे शिखर से मिले? वे इतने निकट हैं--इतने पास हैं। वे क्यों नहीं मिल सकते! उनके मूल स्वरूप, उनका अपना शिखर स्वरूप ही यह असंभावना उत्पन्‍न करता है। इसलिए ऐसा भी नहीं है कि वे कभी न मिले हों, बल्कि वे मिल ही नहीं सकते। वे कभी न मिलेंगे। वह द्वार ही बंद हो गया। और फिर भी मैं कहता हूं कि वे एक हैं। कितने भी शिखर एक दूसरे से भिन्‍न हों, अपनी जड़ों में वे सदैव एक हैं। वे दोनों पृथ्वी के एक ही हिस्से से जुडे हैं, लेकिन केवल जड़ों में ही वे एक हैं।
     
      यहां पर एक बात और सोचने जैसी है। चूंकि वे जड़ में एक ही हैं, इसलिए कोई ऐसी आवश्‍यकता नहीं है कि वे मिलें। केवल वे ही, जो कि जड़ों में एक नहीं हैं मिलने का प्रयत्न करेंगे, क्योंकि आधारित वे जानते हैं कि कोई मिलने नहीं है। मुझसे कई लोगों ने पूछा कि मैं क्यों सभी धर्मों का समन्वय करने का प्रयत्न नहीं करता? गाँधीजी ने किया है, कई थियोसाफी के लोगों ने किया है--उन्होंने सभी धर्मों का महान समन्वय करने का प्रयत्न किया है। मैं कहता हूं कि यदि आप प्रयत्न करते हैं, तो आप यह बतलाते हैं कि कोई समन्वय नहीं है ऐसा प्रयत्न नहीं बतलाता है कि कहीं पर सभी धर्म विभाजित हैं। मैं ऐसा बिलकुल भी अनुभव नहीं करता। अपने मूल में, जड़ों में वे सब एक हैं। शिखर पर, चोटी पर वे बंटे हुए हैं, और वे बंटे हुए होने चाहिए। प्रत्येक शिखर की अपनी सुंदरता है। उसे क्यों नष्ट करें? क्यों एक असत्य बात खड़ी करें, जो कि नहीं है! एक शिखर एक शिखर ही रहे--अकेला, अविभाज्य। पृथ्वी पर वे एक हैं। इसलिए कुरान को केवल कुरान ही होना चाहिए। कुछ भी गीता अथवा रामायण में से उस पर आरोपित नहीं करना चाहिएकुछ भी अंतर-प्रवेश नहीं, कोई मिश्रण नहीं होना चाहिए। कुरान अपनी पूरी शुद्धता में कुरान ही है। वह एक शिखर है, एक अनुपम शिखर, क्यों उसे नष्ट करें?
     
      यह आरोपण न करना तभी संभव है, जबकि आप जड़ों में, पृथ्वी में उनकी गहरी एकता से अवगत हैं। सभी धर्म अपनी मूल जड़ों में एक ही हैं, परन्तु अपनी अभिव्यक्ति में कभी भी नहीं और वे होने भी नहीं चाहिए। और इस तरह संसार और अधिक विकास करता है। जैसे-जैसे मनुष्य चेतना ज्यादा चेतन होती है, वह ज्यादा अखंड होती है। तब और अधिक धर्म होंगे, न कि कम। अंततः यदि प्रत्येक मनुष्य एक शिखर हो जाए, तो उतने ही धर्म होंगे, जितने कि मनुष्य होंगे। क्या जरूरत है किसी को मोहम्मद का अनुगमन करने की, यदि वह स्वयं ही एक शिखर हो सकता हो? क्या आवश्‍यकता है किसी को कृष्ण का अनुकरण करने की, यदि वह स्वयं ही एक शिखर हो सके? यह बड़ा दुर्भाग्य है कि किसी को भी किसी अन्य का अनुकरण करना
पड़ता है।
     
      यह एक अनिवार्य बुराई है। यदि आप शिखर नहीं हो सकते, तो आपको अनुकरण करना पड़ेगा, परन्तु अनुकरण इस प्रकार करें कि जितनी जल्दी हो सके आप स्वयं ही एक शिखर हो जाएं, वही अच्छा है। हमारे पास एक सुंदर संसार होगा, एक बहत्तर जगत और अधिक मानवता के साथ, यदि प्रत्येक एक अपूर्व शिखर हो जाए। परन्तु वह शिखर केवल अविभाज्यता के द्वारा ही आ सकता है अहंकार को व झूठे व्यक्तित्व को गला कर अपने सच्चे स्वभाव में केंद्रित होने से अपने सच्चे शुद्ध स्वरूप में स्थित होने से ही वह उपलब्ध हो सकता है। तब आप एक घाटी की भांति हो जाते हैं, और तब प्रति ध्वनियां होती हैं।

     

तीसरा प्रश्‍न:
     भगवान श्री, आपने कल तीन तरह से सुनने के विषय में बतलाया। प्रथम, बुद्धि द्वारा सुनना द्वितीय, भाव, सहानुभूति व प्रेम द्वारा सुनना: तृतीय, समग्रता से सुनना--बीइंग के द्वारा यानी श्रद्धा के द्वारा। पहले दो प्रकार के सुनने के तात्पर्य को ध्यान में रखते हुए, कैसे कोई तृतीय प्रकार के सुनने की कला तक पहुंचे? और क्या तीसरे प्रकार के सुनने में बुद्धि और भाव जूड़े हुए और संलग्न हैं?


      बुद्धि से सुनने का अर्थ होता है कि जब आप सुन रहे हैं तो साथ ही साथ आप तर्क भी कर रहे हैं। एक लगातार बहस चालू है। मैं आपसे कुछ कह रहा हूं, आप सुन रहे हैं और भीतर लगातार तर्क चल रहा है कि क्या सही है और क्या गलत है! आप अपनी धारणाओं, अपने आदर्शों, अपने तरीकों से तुलना कर रहे हैं। जब आप मुझे सुन रहे हैं, जब आप लगातार यह देख रहे हैं कि क्या मैं आपके विचारों से एकमत हो रहा हूं या नहीं, कि क्या मैं आपके अनुसार ठीक हूं या नहीं, कि क्या आप मुझ पर भरोसा कर सकते हैं या नहीं, कि क्या मैं आश्‍वस्त कर पा रहा हूं या नहीं। इस तरह कैसे संभव है सुनना? आप अपने आप से बुरी तरह भरे हुए हैं, इसलिए बड़ा चमत्कार है कि भीतर के इतने शोरगुल में भी आप कुछ सुन पाने में सफल हो जाते हैं! और फिर भी जो कुछ आपने सुना होगा, वह वही नहीं होगा जो मैंने कहा होगा: वह हो ही
नहीं सकता। जब मन कई विचारों से भरा हुआ हो, तो जो कुछ भी उस तक आता है, उसे वह अपने रंग देता चला जाता है। तब वह नहीं सुनता जो कि कहा जा रहा है, बल्कि वह जो कि वह सुनना चाहता है। वह चुनाव करता है, वह छोड़ता है वह अपने अर्थ लगता है। तभी केवल कुछ भीतर घुस पाता है। पर अब उसकी दूसरी ही शक्ल हो जाती है। यह तात्पर्य है बुद्धि द्वारा सुनने का।
     
      यदि आप, जो कुछ भी कहा जा रहा है उसे गहराई से समझना चाहते हैं, तो आपको इस भीतरी शोरगुल को बंद करना पड़ेगा। आपको उसे बंद कर ही देना चाहिए। वह चालू ही न रहे। अन्यथा आप लगातार अपने द्वारा ही ऐसी संभावनाएं नष्ट कर रहे हैं जिससे कि आप पर कुछ भी घटित हो। आप चूक सकते हैं, और प्रत्येक बहुत कुछ चूक रहा है। हम अपने ही मन के घेरे में बंद रहते हैं और वही घेर हम सब जगह साथ ले जाते हैं। इसलिए जो भी हम देखते हैं, जो भी हम सुनते हैं, जो भी हमारे चारों ओर हो रहा होता है, वह कभी भी सीधे हमारे भीतर तक नहीं पहुंचाया जाता। मन सदैव ही बीच में आ जाता है अपनी चालाकियां दिखलाने। यह ध्यान रखना चाहिए कि यह हो रहा है। यह पहला कदम है, भीतर जाने के लिए। दूसरी श्रेणी की सुनने की कला तक पहुंचने के लिए यह पहली बात है कि आपका मन हो भी कर रहा हो, उसके प्रति होश रहे। वह बीच में आ रहा है। जहां भी आप जाते हो, वह आपसे पहले ही पहुंच जाता है। यह कोई छाया की तरह नहीं कि आपके पीछे-पीछे आए। यह तो पहले चला जाता है और आपको उसके पीछे जाना पड़ता है।

      यह आपसे पहले चला जाता है और हर वस्तु को रंग दे देता है। और इस तरह आप कभी भी किसी वस्तु के सत्य रूप से परिचित नहीं हो सकते। मन एक कल्पना नि£मत करता है। आपको मन के इस तरह काम करने की व्यवस्था से अवगत हो जाना चाहिए।
     
      परन्तु हम कभी भी इस बात को नहीं जान पाते, क्योंकि हम तो मन में तादात्म्य जोड़े होते हैं--हम कभी नहीं जान पाते कि मन कुछ अपने आप करता चला जाता है। जब मैं कुछ कहता हूं और वह आपके विचार से मेल नहीं खाता, तब ऐसा नहीं होता कि आप सोचें कि आपका मन विचार से मेले नहीं खा रहा, बल्कि आप स्वयं नहीं मान पाते। आप में और आपके मन के बीच कोई अंतराल नहीं है आप तादात्म्य जोड़े हैं और वस्तुतः यही सारी समस्या है। और यही एक तरीका है जिसे कि मन आपके साथ चालाकी कर सकता है। आप एक विचार अथवा एक विचार की प्रक्रिया से अपना तादात्म्य जोड़ लेते ही। और यह बड़ा विचित्र है, क्योंकि केवल दो दिन पहले वह आपका विचार नहीं था। आपने उसे कहीं सुन लिया। अब आपने उसे
पकड़ लिया और अब वह आपका हो गया! और अब यह विचार कहेगा--नहीं, यह बात ठीक नहीं है,

      क्योंकि यह मेरे विचार के अनुसार नहीं है। आप यह अंतर नहीं महसूस कर पाएंगे कि यह तो मन बोल रहा है, स्मृति बोल रही है। आप नहीं देख पाएंगे कि यांत्रिकता बोल रही है। और आपको उससे अलग रहना चाहिए। यहां तक कि यदि आपको तुलना भी करनी हो, जांचना भी हो, तो भी आपको अलग रहना चाहिए--अलग अपनी स्मृति से, अपने मन से, अपने अतीत से। तब भी बहुत सूक्ष्म तादात्म्य होता है। मेरा मन भी मैं हूं। इसलिए मैं कहता हूं कि मैं कम्युनिस्ट हूं या मैं कैथोलिक हूं, या हिंदू हूं। मैं कभी भी नहीं कहता कि मेरा मन इस तरह से पाला-पोसा गया है कि मेरा मन हिंदू है। यही सत्य बात भी है। आप हिंदू नहीं हैं। आप कैसे हिंदू हो सकते हैं? यह तो बस मन है। यदि आप हिंदू हैं, तो फिर आपके रूपांतरण की कोई
संभावना नहीं है।
     
      मन बदला जा सकता है और आप सदा इस योग्य बने रहें कि उसे बदल सकें। यदि आप उसके साथ तादात्म्य जोड़ेंगे, तो आप अपनी स्वतंत्रता खो देंगे। बड़ी से बड़ी स्वतंत्रता है--अपने मन से स्वतंत्र होना। मैं कहता हूं, सबसे बड़ी स्वतंत्रता अपने मन से मुक्त हो जाने में है, क्योंकि यह बहुत सूक्ष्म दासता हैइतनी गहरी कि आप इसे कभी दासता अनुभव ही नहीं कर पाते हैं। यह कैद खाना ही आपका घर बन जाता है। सदैव सजग रहें कि आपका मन आपकी चेतना नहीं है। और जितने ही आप सजग रहेंगे, आप पाएंगे कि चेतना एक बिलकुल ही भिन्‍न बात है। चेतना उर्जा है। मन मात्र विचार है,आप उसके मालिक हो जाएं। उसे अपना मालिक न बनने दें। उसे स्वयं से पहले कहीं न जाने दें।, उसे अपने पीछे-पीछे आने दें। उसका उपयोग करें, परन्तु उसके द्वारा आप उपयोग न किए जाएं। वह एक यंत्र है, परन्तु हम उसके साथ तादात्म्य जोड़े बैठे हैं। इसलिए इस तादात्म्य तोड़े। स्मरण रखें कि आप मन नहीं हैं।
     
      परन्तु वास्तव में तथाकथित धार्मिक लोग सदैव याद रखते हैं कि हम शरीर नहीं हैं। वे कभी भी स्मरण नहीं रखते कि हम मन नहीं हैं। और शरीर की भी बंधन नहीं है। मन ही बंधन है, और वस्तुतः आपका शरीर प्रकृति से आता है, परमात्मा से आता है और आपका शरीर प्रकृति से आता है, परमात्मा से आता है और आपका मन समाज से आता है। इसलिए शरीर के पास सौंदर्य है, परन्तु मन के पास कदापि नहीं। मन हमेशा ही कुरूप है। वह संस्कारित है, एक झूठा निर्माण है। शरीर एक सुंदर संदेश है। यदि आप मन को गिरा सकें, तो आप शरीर के साथ कोई संघर्ष नहीं पाएंगे। शरीर तब उस विराट के लिए एक द्वार बन जाता हैउस असीम विस्तार के लिए। शरीर में कुछ तो कुरूप नहीं। वह तो स्वाभाविक फूल का खिलना है। परन्तु तथा कथित धार्मिक लोग हमेशा ही शरीर के विरोध में रहे हैं और मन के पक्ष में रहे हैं। उन्होंने बड़ा भारी
उत्पात पैदा किया है। उन्होंने बड़ी अजीब उलझन पैदा की है। उन्होंने सारी संवेदनशीलता समाप्त कर दी, क्योंकि शरीर ही सारी संवेदनशीलता का स्रोत है। एक बार आप शरीर के खिलाफ हो जाएं, आप संवेदनशील हो जाएंगे।
     
      मन मात्र अतीत के अनुभव, ज्ञान व सूचनाओं का संकलन है। वह केवल एक कम्प्यूटर है। हम उससे ही तादात्म्य बनाए हुए हैं! कोई ईसाई है कोई हिंदू है, कोई कम्युनिस्ट है कोई कैथोलिक है कोई यह है, कोई वह है। कोई भी स्वयं नहीं है, बल्कि सदैव ही किसी अन्य से कहीं और जगह तादात्म्य बनाए है। इसे स्मरण रखें। इसके प्रति सजग रहें और अपने मन व स्वयं के बीच एक दूसरी बनाए रखें। कभी भी स्वयं के व अपने शरीर के बीच दूरी न बनाए। अपने व अपने मन के बीच ही दूरी बनाए। तब आप और अधिक जीवंत होंगे, बच्चे के अधिक समान। होंगे, ज्यादा निर्दोष और ज्यादा सजग होंगे। इसलिए पहली बात दूरी बनाने की है--तात्पर्य कि तादात्म्य न जोड़े। याद रखें कि आप मन नहीं हैं, तब पहले प्रकार का सुनना दूसरी
प्रकार के सुनने में परिवर्तित हो जाएगा।
     
      दूसरी प्रकार का सुनना भावात्मक है--गहरे में अनुभूत, सहानुभूतिपूर्ण। यह एक प्रेमपूर्ण रुख है। आप कोई संगीत सुन रहे हैं या कोई नृत्य देख रहे हैं, तब आप बुद्धि की बात याद नहीं रखते। आप उसमें भाग लेने लगते हैं। जब आप एक नृत्य को देख रहे होते हैं, आपके पांव भी उसमें भाग लेने लगते हैं। जब आप एक संगीत सुनते हैं, आपके हाथ भी उसमें भाग लेने लगते हैं। आप उसके एक हिस्से होने लगते हैं। यह एक सहानुभूतिपूर्ण तरीका है सुनने का, जो कि बुद्धि से ज्यादा गहरा है। जब आप अपने हृदय से सुनते हैं और उसे अनुभव करते हैं, तो आप उपर उठ गए महसूस करते हैं। आप ऐसा महसूस करते हैं जैसे कि कहीं और उठा कर ले जाए गए हों। तब आप इस दुनिया में नहीं होते। वास्तव में तो आप इसी दुनिया में होते हैं,
परन्तु आप ऐसा अनुभव करते हैं जैसे कि आप इस दुनिया में नहीं हैं। क्यों? क्योंकि आप बुद्धि की दुनिया में नहीं होते। एक भिन्‍न ही आयाम खुलता है और आप उसमें अपने को प्रक्रिया रूप से पाते हैं।

      बुद्धि सदैव ही एक दर्शन है--बाहर खड़ी हुई--अंदर कभी भी नहीं। इसलिए जितनी अधिक बुद्धि संसार में बढ़ती है, उतने ही हर बात में हम निष्क्रिय दर्शक होते जाते हैं। आप नहीं नाचेंगे। परन्तु आप दूसरों को नाचते हुए देखेंगे! यदि ऐसा दिन-प्रतिदिन होता गया जैसा कि हो रहा है, तो जल्दी ही आप कुछ भी नहीं कर रहे होंगे। आप सिर्फ दूसरों की ओर देखते रहेंगे। यह संभव है। एक दिन आप प्रेम भी नहीं करेंगे। यह संभव हो गया है। आप दूसरों को प्रेम करते हुए देखेंगे। आप एक फिल्म में क्या देखते हैं? दूसरों को प्यार करते हुए। आप सिर्फ एक देखने वाले हैं एक मृत, निष्क्रिय दर्शक। आप दूसरों को खेलते हुए देखते हैं। आप दूसरों को गाते हुए, नाचते हुए देख रहे हैं।
     
      किसी स्थान पर काम के एक चरित्र ने कहा है--प्रेम मेरे लिए नहीं है! हमारे नौकर मेरे लिए वह कर लेंगे। वास्तव में, धनिक के लिए प्रेम भी उसके नौकरों द्वारा किया जाना चाहिए। वह क्यों करें? तर्क वही है। यदि नौकर आपके लिए संगीत बजा सकते हैं, यदि नौकर आपके लिए प्रार्थना कर सकते हैं, तो फिर प्रेम क्यों नहीं कर सकते? एक नौकर आपके लिए मंदिरों में पूजा कर रहा है, तो फिर क्यों नहीं? यदि नौकर का उपयोग आपके और परमात्मा के बीच किया जा सकता है, तो क्यों नहीं आपके और आपके प्रेमी अथवा प्रेमिका के बीच उसका उपयोग किया जा सकता? उसमें फिर क्या गलती है? तर्क तो वही है। और वास्तव में, जो धनिक हैं, वे प्रेम भी अपने आप नहीं करेंगे, क्योंकि उनके लिए वह काम नौकर कर सकते हैं। केवल गरीब ही अपने लिए प्रेम करेंगे और उसके कारण बहुत विपत्ति में फंसेंगे। हर बात, हर काम दूसरों द्वारा कराया जा सकता है। आप मात्र एक दर्शक हो सकते हैं, क्योंकि बुद्धि एक दर्शक है, कभी भी भागीदार नहीं। यदि हम बुद्धि के चारों ओर दुनिया बनाए तो यह क्रिया शून्य देखना घटित होगा।
     
      द्वितीय केंद्र अधिक संलग्न हो गया है, तो आप उसमें भाग लेने लगेंगे। मैं कहता हूं कि आप अधिक समझने लगेंगे, यदि आप भाग लेने लगे, क्योंकि जिस क्षण भी आप सहानुभूतिपूर्ण होते हैं, आपका मन खुल जाता है--अधिक खुल जाता है उससे जब कि आप लगातार अपने से संघर्ष में होते हैं। मन अब खुला है, ग्राहक है, निमंत्रण देता हुआ है। इस तरह कोई भाव द्वारा सुन सकता है। परन्तु एक गहराई और जो भावना से भी अधिक गहरी है और उस गहराई को ही मैं समग्र रूपेण सुनना कहता हूं--अपनी पूरी सत्ता से। भाव भी एक भाग ही है। बुद्धि भी एक भाग है, भाव भी एक भाग है। क्रिया का स्रोत दूसरा ही है। आपके अस्तित्व में बहुत से भाग हैं, आपके बीइंग में, स्वरूप में। आप के द्वारा अधिक अच्छा सुन सकते हैं, परन्तु फिर भी वह
एक भाग ही है। जब आप अपने भाव से सुन रहे हैं, तब आपकी बुद्धि सा जाएंगी, अन्यथा वह दखल देगी।
     
      तृतीय है समग्रता से सुनना--न केवल भाग लेना, बल्कि उसके साथ एक हो जाना भी हो रहा है। कोई एक बुद्धि से नृत्य देखता है, दूसरा नृत्य को अनुभव करता है और उसमें भाग लेने लगता है। जब कि आप अपनी सीट पर बैठे हैं, नर्तक नाच रहा है, तब आप उसमें हिस्सा लेने लगते हैं, आप ताल को मिलाने लगते हैं। और तीसरा है, नृत्य ही हो जाना स्वयं--नर्तक नहीं, बल्कि नृत्य ही। पूरा होना संलग्न हो गया। आप इतने भी बाहर नहीं हैं कि उसे अनुभव कर सकें। आप वही हैं। इसलिए स्मरण रखें कि गहन से गहन ज्ञान तभी संभव है, जबकि आप उसके साथ एक हो गए हों। यह श्रद्धा से होता है।
     
      इसे कैसे पाएँ?  अपनी बुद्धि के प्रति सजग रहें। अपने मन से तादात्म्य न जोड़े। फिर दूसरे पर आएभावना पर। तब फिर ध्यान रहे कि भावना भी एक हिस्सा ही है और आपका पूरा अस्तित्व मृत पड़ा है। वह वहां नहीं है। इसलिए उस समग्र को आगे लाएं। अब आप समग्र को आगे लाते हैं, तो ऐसा नहीं है कि बुद्धि को मान कर दिया गया है अथवा भावना को मना कर दिया गया है। आप ही उनमें हैं, परन्तु एक भिन्‍न ही समन्वय में। कुछ भी निषेध नहीं किया गया है। सब कुछ वहां पर मौजूद है, परन्तु एक भिन्‍न ही ढांचे में। आपका समग्र अस्तित्व ही अब हिस्सा ले रहा है--उसमें है--वही हो गया है।
     
      इसलिए जब आप सुनें, तो इस तरह से सुनें जैसे कि आप सुनना ही हो गए हैं। जब मैं कुछ कह रहा हूं, तो उसमें लड़े नहीं, उससे सहानुभूतिपूर्ण न हों, बल्कि वही हो जाएं। समग्र हो जाए, वही हो जाएं। उसे आने दें और उसे भीतर गूंजने दें बिना किसी मुकाबले के, बिना किसी भावना के, वरन पूरी समग्रता से। उसे साथ प्रयोग करें और आप जीने का एक नया आयाम अनुभव करेंगे--खाली सुनने के लिए ही नहीं, वरन प्रत्येक चीज के लिए। आप उस तरह से खाना खा सकते हैं आप उस भांति चल सकते हैं आप उस तरह से सो सकते हैं आप उस भांति जी सकते हैं।
     
      एक दिन कबीर की गायों के लिए भोजन नहीं था, इसलिए उसने अपने बेटे कमाल को खेत से घास काट लाने को कहा। कमाल जाता है और लौट कर नहीं आता है। दोपहर गुजर गई, शाम भी आ रही है। कबीर प्रतीक्षा करते हैं और गाए भूखी हैं। कहां गया कमाल? तो कबीर कमाल की खोज में जाते हैं।
     
      कमाल एक घास के खेत में खड़ा है। सूरज डूब रहा है। हवा चल रही है। घास लहरों की तरह झूम रही है और कमाल भी लहरों की तरह उनके साथ झूम रहा है। सारा दिन इस तरह बीत गया है और कबीर उसके पास जाते हैं और कहते हैं, कमाल, क्या पागल हो गए हो? क्या कर रहे हो?
     
      अचानक कमाल दूसरी ही दुनिया में लौटता है और कहता है--मैं तो भूल ही गया था कि मैं कमाल हूं। मैं तो घास ही बन गया था। मैं वही हो गया था: मैं तो एक घास ही हो गया था। मैं उसी के साथ हिल रहा था, मैं उसी के साथ नाच रहा था। और मैं यह भूल ही गया कि मैं यहां किस लिए आया था। बतलाएं मुझे कि मैं यहां क्यों आया था? कबीर कहते हैं--घास काटने के लिए। इस पर कमाल हंसने लगता है और कहता है--कैसे कोई स्वयं को काट सकता है? आज तो यह संभव नहीं है। मैं फिर कभी आउंगा और कोशिश करूंगा, परन्तु मैं वादा नहीं कर सकता, क्योंकि मैंने एक दूसरी ही दुनिया जानी है, एक दूसरा ही जगत मेरे समझ खुला है। कबीर ने उसी दिन उसका नाम कमाल रख दिया। कमाल का अर्थ होता है चमत्कार। यह एक चमत्कार है।
     
      यदि आप किसी भी बात में समग्र हो जाएं, तो चमत्कार घटित हो जाता है। यह मात्र सुनने के लिए ही नहीं है। यह हर बात के लिए है। समग्र हो जाएं। समग्रता से गति करें। अपने को बांटे नहीं। कभी भी स्वयं को विभाजित न करें। कैसा भी विभाजन अपनी शक्ति को नष्ट करना है। कैसा भी विभाजन आत्मघातक है। यदि आप प्रेम करते हैं, तो समग्रता से करें। यदि आप सुनते हैं, तो पूरी समग्रता से सुनें। कुछ भी पीछे न बचाएँ। बस बिलकुल समग्रता में बढ़े।
     
      केवल यह समग्र गति ही आत्मानुभव लाती है, जहां कि अहंकार नहीं पाया जा सकता। बुद्धि के साथ वह पाया जाता है। भावना के साथ वह पाया जा सकता है, परन्तु वह हमारी समग्रता के साथ कभी भी नहीं पाया जा सकता। वह हमारी बुद्धि के सा पाया जा सकता है क्योंकि बुद्धि का अपना कोई केंद्र नहीं होता। वह समग्रता के केंद्र को काम में नहीं आने देगा। बुद्धि को अपना केंद्र निर्मित करना पड़ता है। वही अहंकार
बन जाता है।
     
      भागना भी समग्र को नहीं आने देगी। भावना का अपना केंद्र हो जाएगा। वह अहंकार हो जाता है। इसलिए आदमी और औरतों के भिन्‍न-भिन्‍न प्रकार के अहंकार होते हैं। पुरुष का अहंकार बुद्धि-केंद्रित होता है और स्त्री का भाव-केंद्रित। उनके अहंकार के अलग-अलग गुण-धर्म होते हैं। इसीलिए स्त्री और पुरुषों के भिन्‍न-भिन्‍न प्रकार के अहंकार होत हैं। उनके भिन्‍न-भिन्‍न ही गुण होते हैं अहंकार के। इसीलिए एक आदमी कभी भी स्त्री को नहीं समझ पाता और एक स्त्री एक आदमी को कभी भी नहीं समझ पाती। उनके अलग-अलग केंद्र होते हैं और अलग-अलग उनकी भाषाएं होती हैं।
     
      जब बुद्धि कहती हैं हां, तो उसका मतलब होता है हां। जब भाव हां कहता है, तो जरूरी नहीं होता कि उसका अर्थ हो ही हो। जब भाव कहता है ना, तो उसका मतलब हो सकता है हां। वह एक निमंत्रण हो सकता है। कि आगे अभी और भी फुसलाया जाए। और यदि आप एक स्त्री को उसके शब्द पर ही लेंगे तो आप मुश्‍किल में पड़ेंगे, क्योंकि उसका शब्द बुद्धि से नहीं आया है। उसका चलने का अपना अलग मार्ग है, एक अलग गुण है। बुद्धि का अहंकार सीधा गणित की तरह होता है। आप उसे सीधे, साफ, सरलता से समझ सकते हैं। इसलिए एक आदमी को समझना बड़ा कठिन नहीं है, क्योंकि उसका तर्क सीधा है--दो और दो चार होते हैं। एक स्त्री को समझना कठिन बात है, क्योंकि उसका तर्क सीधा नहीं होता, वह वर्तुल में चलता है, इसलिए दो और दो कभी भी चार नहीं होते। उनसे कुछ भी बन सकता है, परन्तु चार कभी भी नहीं। उसका तर्क वर्तुल में घूमता है। भाव वर्तुल में चलता है। तर्क व बुद्धि एक सीधी रेखा में चलते हैं।

      जब कुछ वर्तुल में चलता है, तो आप कभी भी निश्‍चित नहीं हो सकते, क्योंकि उसका तात्पर्य बिलकुल उल्टा भी हो सकता है। वह चक्र में घूमेगा और वह अपनी ही धारणा के विपरीत हो जाएगा। इसलिए एक स्त्री के साथ हर किसी को सजग रहना चाहिए, उसके लिए नहीं जो कि उसने कहा है, बल्कि जो उसका अर्थ है। जो वास्तविक कथन है उसको बहुत मान्यता नहीं देनी है--बल्कि जो कि वह अर्थ रखती है। और उसका तात्पर्य बिलकुल उल्टा भी हो सकता है। इसलिए यह हमेशा होता है कि जो बहुत बुद्धि शील लोग होते हैं। वे कभी भी अपनी पत्नियों का साथ ठीक से नहीं निभा पाते--कभी भी नहीं। सुकरात, जो एक बहुत बुद्धि शील आदमी था, बुद्धि से एक जीनियस, तर्क का हर एक पहलू जानता है, परन्तु अपनी पत्नी के साथ आराम से नहीं हो पाता था। वह समझ ही नहीं पाता था कि वह क्या कह रही है। वह समझ पाता था जो वह कहती थी, परन्तु वह नहीं समझ पाता था, जो कि उसका मतलब था। वह इतना तर्कपूर्ण था कि वह हमेशा मुद्दे को चूक जाता था। वह सीधा रेखा में चलता था और उसकी पत्नी वर्तुल में चलती थी।

      बुद्धि का अपना अहंकार होता है--सीधा, रेखाबद्ध। भावना का अपना अहंकार होता है--वर्तुलाकार। परन्तु समग्रता का कोई अहंकार नहीं होता। समग्रता ही इंण्डिविजुअलिटी है, निजता है, होना है। इसलिए जब आप समग्रता को उपलब्ध होते है, तो आप न तो पुरुष होते हैं और न स्त्री। आप दोनों होते हैं और फिर भी दोनों नहीं। आप दोनों के पार होते हैं और दोनों को समझाते हैं। यही मतलब होता है--अर्धनारीश्‍वर काआधा स्त्री, आधा पुरुष। अंतर में एक गहरी एकता हो जाती है। आपकी समग्रता एक हो जाती है--जहां कोई विभाजन नहीं।
     
      एक बात ध्यान में रखनी है। यह कोई ठोस ढांचा नहीं है। जब मैं कहता हूं कि एक पुरुष का अहंकार बुद्धिगत होता है तो यह कोई स्थाई ढांचा नहीं है। किन्हीं क्षणों में वह भावात्मक अहंकार पर लौट कर जा सकता है। किन्हीं क्षणों में कोई स्त्री बुद्धि के अहंकार पर जा सकती है। तब चीजें ज्यादा उलझ जाती हैं। जब आदमी कठिनाई में होता है, तो वह अपने भावात्मक अहंकार पर लौट जाता है। वह रोना शुरू कर देता है और इस तरह से बात करने लगता है कि वह उसकी भी समझ में नहीं आता। और फिर बाद में वह पूछता है कि मुझे क्या हो गया था? अपने अनजाने मैं रोने लगा। मैं इस तरह व्यवहार करने लगा जो कि मुझे कतई पसंद नहीं है। एक बहुत तगड़ा आदमी किसी विशेष परिस्थिति में भावात्मक ढंग से व्यवहार करने लग सकता है। एक बहुत भावात्मक स्त्री किसी खास परिस्थिति में बिलकुल पुरुष की भांति व्यवहार कर सकती है। एक भिन्‍न परिस्थिति में, अहंकार एक केंद्र से दूसरे पर बदल सकता है। यह और भी अधिक कठिनाइयां पैदा करता है। परन्तु इसके प्रति सजग होना पड़े।
     
      भावना के साथ अथवा बुद्धि के साथ अहंकार को होना ही पड़ेगा। केवल समग्रता में ही अहंकार नहीं होता। इसलिए मैं यह आपको कसौटी बतलाता हूं, एक मापदंड कि यदि आप हैं और आप कोई मैं अनुभव नहीं करते तो आप समग्र हैं। आप यहां बैठे हैं। इस तरह सुनें जैसे आपके भीतर कोई मैं नहीं है। आपके कान हैं, आपके सुनने की सारी प्रक्रिया है, परन्तु कोई मैं नहीं है। तब आप समग्र--टोटल हैं। कैसे आप तब विभाजित होंगे बिना मैं के, बिना किसी अहंकार के? कैसे आप बंटेंगे? अहंकार ही विभाजन है।
     
      जैसे मैंने कहा कि बहुत सारे व्यक्तित्व होते हैं, ऐसे ही बहुत सारे अहंकार होते हैं। प्रत्येक केंद्र का अपना एक अहंकार होता है। बुद्धि का अपना होता है, भाव का अपना, काम केंद्र का अपना अहंकार होता है--उसका अपना मैं होता है। यदि आप गहरे नीचे जाएं शरीर की अलग-अलग संरचना में, तो आप पाएंगे कि प्रत्येक कोष का अपना एक अहंकार होता है। वही विभाजन है। यदि आप बिना अहंकार के हैं, यदि आप कहीं पर भी बीना मैं के हैं, तो फिर आप समग्र हैं। और उसी समग्रता में--यहां तक कि एक क्षण के लिए भी यदि आप समग्र हो पाते हैं, तो आप जाग जाएंगे अचानक। और फिर कुछ भी आपको जगा सकता है--कुछ भी।
     
      एक झेन एक मिट्टी का बरतन कुएं से ले जा रही थी। तीस साल तक आश्रम में रह कर उसने लगातार साधना की थी, हर प्रयत्न किया था, उस शांति के लिए, उस थिरता के लिए जहां कि सत्य प्रकट हो सके, परन्तु वह नहीं हुआ। अचानक पानी का बरतन गिर जाता है और फूट जाता है। वह वहां खड़ी है, पानी के बरतन को टूटते हुए देखती है और पानी बह रहा है और वह जाग जाती है। अचानक उसे वह प्रकाश उपलब्ध हो जाता है। वह दौड़ती है, वह नाचती है। वह मंदिर में चली जाती है।
     
      उसका गुरु आता है और उसके पांव छूता है और कहता है, अब तम बुद्ध हो गई हो। तुम्हें उपलब्धि हो गयी है। परन्तु वह साध्वी पूछती है--परन्तु मुझे यह बतलाओ यह कैसे हुआ? क्योंकि मैंने बहुत कोशिश की लगातार प्रयत्न पर प्रयत्न किया तीस वर्ष तक और वह नहीं हुआ। और आज ही मैंने यह तय किया था यह सब बेकार है और यह नहीं होगा, इसलिए मैंने सारे प्रयत्न दौड़ दिए। इसलिए आज ही यह क्यों हो गया?    

      गुरु ने जवाब दिया--क्योंकि पहली बार तुम समग्र हुई बिना अहंकार के। प्रयत्न अहंकार निर्मित करता है। वह सारा प्रयत्न ही बाधा था। अब तुम बिना किसी प्रयत्न के, बिना किसी आकांक्षा के, पानी का बरतन ले जा रही थी और अचानक घड़ा गिर गया है और फूट गया है और अचानक तुम सजग हो जाती हो बिना किसी भी अहंकार के। वह सुनना ही, वह बरतन। का फूटना ही, टूटने की आवाज, पानी का बहना और तुम वहां हो बिना किसी अहंकार से समग्रता से सुनती हुई। घटना घट गई। इसलिए जब मैं कहता हूं समग्रता से सुनें,
तो मेरा तात्पर्य यही है।




आखिरी प्रश्‍न :
     भगवान श्री, वे क्या गुण है और संकेत हैं, जो कि यह बतलाते हैं कि कोई उस ब्रह्म की ध्वनि ओम को पहुंच गया है या नहीं?
           

      यह एक कठिन है--कठिन, क्योंकि घटना सदैव ही भीतर घटती है, एक तरह से व्यक्तिगत रूप से। और उसे अथवा उसके बारे में बाहर से कुछ भी नहीं जान सकते। आप बाहर से कभी भी निश्‍चित नहीं हो सकते कि क्या कोई उस ब्रह्म की ध्वनि ओम को उपलब्ध हो गया है। जितने ही गहरे आप जाते हैं, उतनी ही आंतरिक वह घटना हो जाती है। लोगों की दुनिया है बाहर, जहां कि आप निश्‍चित कर सकते हैं। इसलिए कैसे कोई जाने कि वह कास्मिक साउंड--बह्म की ध्वनि ओम को उपलब्ध कर चुका है, कि वह गहरी से गहरी जमीन पर पहुंच चुका है?
           
      आप बाहर से तय नहीं कर सकते। हां, सचमुच बहुत सी घटनाएं होने लगेंगी उस व्यक्ति के द्वारा जिन्हें कि बाहर से जाना जा सकता है कि वह मनुष्य उस ब्रह्म की भूमि को पहुंच चुका है। फिर भी यह एक अनुमान ही होगा जो कि उसके व्यवहार से निकाला जाएगा। और व्यवहार झूठा भी हो सकता है। व्यवहार नकल भी किया जा सकता है बिना एक बुद्ध हुए। और कभी-कभी यह भी होता है कि आप बुद्ध से ज्यादा अच्छी तरह नकल कर पाएँ, क्योंकि बुद्ध तो इस बात के प्रति असजग हैं। जो कुछ भी हो रहा है, वह मात्र हो रहा है। इसलिए आप और भी भली प्रकार नकल कर सकते हैं। आप उसका अभ्यास कर सकते हैं। आप उसमें दक्ष हो सकते हैं। और बुद्ध भी आपसे प्रतियोगिता नहीं कर सकते हैं, क्योंकि उन्होंने उसे एक भी बार नहीं
दोहराया है।
           
       इसलिए बाहर से नकल करना संभव है--बहुत आसानी से संभव है। प्रामाणिकता को उपलब्ध करना बहुत ही कठिन है। नकल करना सरल है, बहुत ही सरल: क्योंकि आपके भीतर तो आप वही हैं, आप बाहर से कुछ और बन सकते हैं। इसलिए बाहर से यह कहना कठिन है कि किसी के भीतर क्या यह घट गया है। और बाहर से निश्‍चित नहीं कर सकते। अगर आप पूछते हैं कि कैसे जानूं कि मैंने भीतर से कास्मिक साउंड, ब्रह्म नाद को प्राप्त कर लिया है या नहीं? तो मैं कहूंगा कि जब आपने उसे पा लिया होगा, तो आप जान लेंगे। यदि कोई पूछे कि मैं कैसे जानूं कि मैं जिंदा हूं या मर गया? कैसे मैं जानूं? तो हम उसे क्या कहेंगे? हम कहेंगे कि यदि तुम इतना भी जब सोच सकते हो कि तुम मर गए हो या जिंदा हो, तो फिर तुम जीवित हो। जब आप कास्मिक साउंड, ब्रह्म-ध्वनि को पहुंचते हैं, जब आप अपने अस्तित्व की भूमि पर पहुंचते हैं,
जब आप ओम की ध्वनि को सुनते हैं जो कि तुम्हारे द्वारा उच्चरित नहीं है, किसी के द्वारा उच्चरित नहीं है, वरन चारों ओर एक ब्रह्म-ध्वनि की तरह हो रही है--तो तुम जानते हो।
           
      यह घटना इतनी प्रामाणिक होती है कि कभी सवाल ही नहीं उठता है कि मैं वास्तविक हूं या नहीं। आप धूमिल हो जाते हैं। आप वास्तविक हो जाते हैं। आप मात्र एक छाया, एक प्रेम हो जाते हैं। अब आपकी वास्तविकता जैसी पहले कभी थी, उसके जैसी नहीं होती। वास्तविक चारों तरफ है परन्तु वह एक सपना भी हो सकता है। आप सपने में भी ऐसा अनुभव करते हैं कि हर चीज वास्तविक है। इसलिए कैसे तय करें कि जो यह ध्वनि आप सुन रहे हैं वास्तविक है या कोई सपना है? इसका निष्कर्ष किसी दूसरे ही मार्ग से आता है। आप फिर वापस वैसे ही कभी भी नहीं हो सकेंगे।
     
      यह ध्वनि का सुनना आपके अस्तित्व में एक विस्फोट होगा। आप फिर से वही नहीं हो सकेंगे। आप यहां तक कि अपने अतीत से अपने आपको नहीं जोड़ सकेंगे। वह बस गिर जाएगा। आप उसे स्मरण रखेंगे जैसे कि यह किसी और का अतीत था। आपकी स्मृति अब आपकी नहीं होगी। इस अनुभव के बाद, आपका दोबारा जन्म होगा और आपका दूसरा जन्म ही इस बात के लिए सबूत होगा। आप फिर से वही नहीं होंगे। पुराना गिर गया। आप उस पुराने आदमी को वापस नहीं पा सकेंगे। अब वह कहीं नहीं है। वह वहां था। अब वह वहां नहीं है। आपके लिए यही एक सबूत होगा कि आपने सुन लिया है।
     
      परन्तु मैं सोचता हूं कि एक तीसरी बात और है इस संबंध में। कोई ओम का उच्चारण करता चला जा सकता ओम वह दोहराए चला जा रहा है उसमें और जो ओम ध्वनि आई है उसमें कोई अंतर है अथवा दोनों वही हैं? आप उसके अनुभव करेंगे, क्योंकि आप ओम के केंद्र हैं जिसको कि आप उच्चरित करते हैं, और तब वह बाहर गूँजती है। यह एक आयाम है। आप इसे निर्मित करते हैं, जैसे कि आप एक शांत झील में पत्थर फेंकते हैं। पत्थर केंद्र बन जाता है और फिर लहर पैदा होती हैं जो कि बाहर की किनारों की और जाती हैं। जब आप कहते हैं--ओम, तब आप अपने भीतर एक केंद्र निर्मित करते हैं--आप एक पत्थर डालते हैं और तब ध्वनि बाहर, और बाहर, और बाहर जाती है--दूर बहुत दूर आपसे। यह एक आयाम है।

           
      जब आप ओम की ध्वनि सुनते हैं--कास्मिक साउंड, तो वह भिन्‍न होती है। वह आती है, वह कभी भी जाती नहीं। वह आपसे दूर जाती हुई नहीं है। वह आपके पास आती हुई है और उसका केंद्र कहीं भी नहीं मिलता। वह बस आती जाती है, आती जाती है, और आती जाती हैं। आप उससे भर जाते हैं। आप भिन्‍नता देखते हैं। वे आती ही जाती हैं। वे कभी भी रुकती नहीं। इसलिए यह भी एक आयाम है, दिशा है। यदि ध्वनि का केंद्र आप हैं, तो लहरें आप से बाहर जाती है क्योंकि ओम आपके द्वारा उच्चारित किया जाता है। यदि आप केंद्र नहीं हैं, तो ध्वनि तरंगें आती जाती हैं और आती ही जाती हैं, कहीं किसी जगह से! केंद्र का पता नहीं और उसका कोई पता कभी नहीं चलता किसी ने केवल बो हमे से पूछा--परमात्मा का केंद्र कहां है? जगत का केंद्र कहां है? उसने कहा--या तो सब कहीं या फिर कहीं नहीं। दोनों का एक ही अर्थ है।
           
      मैं दूसरी तरह से भी कह सकता हूं। साधारणतः साधक ही परमात्मा की खोज में जाते हैं, परन्तु जब तक कि परमात्मा स्वयं तुम्हारे पास नहीं आता, तब तक आप एक कल्पना में, एक स्वप्न में हो। यदि आप ब्रह्म की, परमात्मा की खोज में जाते हैं, केंद्र की खोज में जाते हैं, तो आप खोजते ही रहेंगे और आप उसे कभी भी नहीं खोज सकेंगे। कैसे आप केंद्र को खोज सकते हैं? केंद्र ही आप तक आ सकता है। इसलिए यह हमेशा ही झूठा संबंध है, कि साधक परमात्मा की तरफ जा रहा है--वास्तविक संबंध भिन्‍न ही है--परमात्मा ही साधक की तरफ आ रहा है। जब आप तैयार होते हैं, वह आता है। जब आप खुले होते हैं, तो वह अतिथि बनता है। जब आपका निमंत्रण योग्य वह समग्र होता है, तो वह वहां होता है। वह सदैव ही आता हुआ है, न कि जाता हुआ है। इसलिए वस्तुतः कोई भी घटा मनुष्य के परमात्मा को खोजने की नहीं है, वरन परमात्मा के मनुष्य को खोजने की है।
           
      परन्तु आप छिपे हुए हैं, वह आपको नहीं खोज सकता। जब कभी वह आता है, आप बच जाते हैं। आप बंद हैं, कभी भी खुले नहीं। वह द्वार खटखटाता ही रहता है और आपके द्वार बंद ही पड़े हैं। इसलिए जब वह ओम आता है, जब यह आपके पास आ रहा होता है, आप बस भर जाते हैं। आप बस इसमें नाह जाते हैं और स्रोत का पता नहीं चलता। यदि आप उस स्रोत का पता लगा लें कि वह कहां से आ रहा है, तो आप पाएंगे कि कोई बाहर से ओम की ध्वनि कर रहा है और वह आपके पास आ रही है। कोई किसी साज पर ओम बजा रहा है और वह आ रहा है।
           
      उसका कोई स्रोत नहीं है। इसलिए रहस्यवादियों ने सदैव ही कहा है कि परमात्मा का कोई उदगम नहीं है। वह उदगम रहित है। वह कहीं से भी नहीं आता--मात्र आकाश से आता है और वह यहां है। जब आप ऐसा अनुभव करते हों, तभी आप जानते हैं कि अब ओम कास्मिक है। वह अब आपसे संबंधित नहीं। झेन में, वे लोग कोआन का, अर्थहीन पहेली का ध्यान के लिए उपयोग करते हैं। रिंझाई, हमेशा ही अपने शिष्यों को एक हाथ की ताली की कोआन देगा। वह असंभव बात है! कैसे आप एक हाथ की ताली सुन सकते हैं? इसलिए जब भी कोई साधक उसके पास जाएगा, वह कहेगा--पहले जाओ और पता लगाओ कि एक हाथ की ताली की आवाज कैसी होती है। उसे सुनो, और फिर मेरे पास आना और मुझे कहना। यह बड़ा अर्थहीन लगता है। परन्तु जब रिंझाई जैसा आदमी ऐसी बात कहे किसी को, तो वह जाएगा और दरवाजा बंद करेगा और बैठ जाएगा ध्यान में और सोचेगा।
           
      वह एक घंटे लौटकर आएगा और कहेगा--क्या मूर्खता की बात आप भी पूछते हैं! क्या यह संभव है? रिंझाई कहेगा, मैंने सुनी है, अब तुम जाओ और फिर से प्रयत्न करो। और मैंने प्रयत्न किया है, और मैंने सुना है। इसलिए तुम जाओ और प्रयत्न करो, और आ जाएगी।
           
      रिंझाई का शिष्य रोजाना आता रहेगा। हर सुबह वह गुरु के दर्शन करेगा और गुरु उससे पूछेगा--क्या तुमने सुना? वह कहेगा--नहीं, मैंने तो नहीं सुना अब तक। और गुरु भरसक प्रयत्न के लिए कहेगा। वह फिर उस ध्वनि की कल्पना करने लगेगा, क्योंकि यह बड़ा निराशाजनक है कि हर रोज जाओ और गुरु को कुछ भी कहने के लिए नहीं हो। इसलिए वह कहेगा--हां, मैंने सुन लिया है। वह बिलकुल पत्तों में से हवा के चलने जैसी है। परन्तु फिर गुरु कहेगा--नहीं, वह नहीं है, क्योंकि हवा और पत्तियां दो वस्तुएं हैं। वह तो एक की है। पत्तों में से हवा के चलने की बहुत सी साधारण सी आवाज है। दो वस्तुएं रगड़ पैदा करती हैं, इसलिए यह भी दो हाथों की आवाज हुई। तुम मुझे मूर्ख नहीं बना सकते। हवा का पत्तों में से चलना--यह दो हाथों की आवाज हुई। वह शिष्य बार-बार फिर आएगा और कहेगा--मैंने पानी की बूंदों की आवाज छत पर पड़ती
सुनी है। इस तरह वह कितनी ही बातें लेकर आएगा और उसे हर बार मना कर दिया जाएगा।

      और यह कई महीने चलेगा अचानक रिंझाई पूछेगा--वह आदमी कहां है? वह नहीं आया और इतने दिन हो गए। जाओ और पता लगाओ कि वह क्या कर रहा है। और उसे उसकी किसी कोठरी में ढूंढ लिया जाएगा अथवा वह किसी पेड़ के नीचे खोया हुआ मिलेगा और फिर उसे गुरु के पास लाया जाएगा। और गुरु उसे कहेगा--अब तुमने उसे सुन लिया? क्या सुन लिया तुमने? और वह कहेगा, मैंने सुन लिया। हां, मैंने उसे सुन लिया।
           
      क्या ध्वनि सुन ली उसने? केवल एक ही ध्वनि है। वह ध्वनि ब्रह्म के ओम की है जो कि बिना किसी घर्षण के पैदा होती है--दो वस्तुएं नहीं, केवल ध्वनि। वह किसी ताली बजाने से उत्पन्‍न नहीं होती। परन्तु जिस क्षण भी कोई कहेगा कि उसने उसे सुन लिया है, वह एक दूसरा ही आदमी होगा। आप फिर वही आदमी नहीं हो सकते। और भेद सदैव यही होगा कि ध्वनि कहीं से नहीं आ रही होगी--उदगम--रहित ध्वनि, बिना उत्पन्‍न की हुई। तब ही वह ब्रह्म ही, ओम की ध्वनि होगी।

आज इतना ही।
ओशो
बंबई, दिनांक 16 फरवरी, 1972, रात्रि