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शुक्रवार, 29 नवंबर 2019

मेरी प्रिय पुस्तकें-(सत्र-06)

मेरी प्रिय पुस्तकें-ओशो

सत्र-छठवां

अब पोस्टस्क्रिप्ट, पश्चलेख। पिछले सत्र में जब मैंने कहा था कि यह उन पचास पुस्तकों की श्रृंखला का अंत है, जिनको मुझे अपनी सूची में शामिल करना था, यह तो मैंने बस ऐसे ही कह दिया था। मेरा मतलब यह नहीं था कि मेरी प्रिय पुस्तकों का अंत हो गया है, बल्कि संख्या से था। मैंने इसलिए पचास चुनी थी, क्योंकि मुझे लगा कि वह एक सही संख्या होगी। फिर भी निर्णय तो लेना ही पड़ता है, और सभी निर्णय स्वैच्छिक होते हैं। लेकिन आदमी प्रस्ताव रखता है और परमात्मा निपटारा करता है--परमात्मा, जो कि है नहीं।

जब मैंने कहा था कि यह श्रृंखला का अंत है, तो वह भीड़ जो मुझे तंग कर रही थी--‘गीत गोविंद’ के जयदेव, ‘दि सीक्रेट्‌ डॉक्ट्रिन’ की मैडम ब्ला-ब्ला ब्लावट्‌स्की, और पूरी मंडली, उनमें बहुतों से तो मैं परिचित हूं लेकिन पहचानना भी नहीं चाहता, मेरी सूची में उन्हें

शामिल करने की बात तो बहुत दूर है। जैसे ही उन्होंने सुना कि यह श्रृंखला का अंत है, वे सभी अपने-अपने रास्ते चले गए।
तब तो मेरी खुशी का ठिकाना न रहा, तब मुझे जीसस का वक्तव्य का मतलब दिखाई पड़ा: धन्य हैं वे जो विनम्र हैं, क्योंकि प्रभु का राज्य उन्हीं का है। वे यह भी कहते हैं: धन्य हैं वे जो अंत में खड़े हैं, आखिर में, जो आगे आने का प्रयास नहीं करते--संक्षेप में कहें, जो आगे आने के लिए किसी को धक्का नहीं देते, जो बस खड़े रहते हैं और प्रतीक्षा करते हैं। जब भीड़ छंट गई तो मैंने उन थोड़े से धन्यभागियों को देखा; इसलिए इस पोस्टस्क्रिप्ट की आवश्यकता पड़ी।

मुझे खुद भी भरोसा नहीं हो पाया कि मैंने गौतम बुद्ध के ‘धम्मपद’ को सम्मिलित नहीं किया था। गौतम बुद्ध अंतिम पंक्ति में शांत बैठे थे। मैं उस व्यक्ति को जितना प्रेम करता हूं उतना मैंने किसी को भी नहीं किया है। मैं उन पर अपने पूरे जीवन भर बोलता रहा हूं। दूसरों पर बोलते समय भी मैं उन पर बोलता रहा हूं। इसे लिख लो, यह एक स्वीकृति है। बुद्ध को बीच में लाए बिना मैं जीसस पर नहीं बोल सकता; बुद्ध को बीच में लाए बिना मैं मोहम्मद पर नहीं बोल सकता। यह और बात है कि उनका उल्लेख मैं सीधे करूं या न करूं। बुद्ध को बीच में लाए बिना मेरे लिए बोलना सच में असंभव है। वे ही मेरा खून, मेरी हड्डी-मांस-मज्जा हैं। वे मेरा मौन हैं, और मेरा संगीत भी। जब मैंने उन्हें वहां बैठे हुए देखा तो मुझे स्मरण आया। मैं उनसे क्षमा भी नहीं मांग सकता, यह बात अक्षम्य है।
‘धम्मपद’ का शाब्दिक अर्थ है ‘सत्य का मार्ग,’ या और ज्यादा सही होगा ‘सत्य के पदचिह्न।’ तुम्हें विरोधाभास दिख रहा है?

भीतर आते हुए
बाहर जाते हुए
जल-पंछी
नहीं छोड़ता है कोई पदचिह्न,
और न ही उसे जरूरत है किसी मार्गदर्शक की।

सत्य को कहा नहीं जा सकता। उसका कोई पदचिह्न भी नहीं होता है। आकाश में उड़ते पक्षी कोई पदचिह्न नहीं छोड़ते... और बुद्धपुरुष आकाश के पक्षी हैं। लेकिन बुद्धपुरुष हमेशा विरोधाभासों में बोलते हैं, और यह बात सुंदर है कि कम से कम वे बोलते तो हैं। अपनी बात का खंडन किए बिना वे बोल नहीं सकते, यह उनकी मजबूरी है। सत्य बोलने का मतलब है अपनी ही बात का खंडन करना। और कुछ न बोलना भी अपनी ही बात का खंड़न करना है क्योंकि जब तुम कुछ भी नहीं बोलने का प्रयास करते हो तो भी तुम्हें पता है कि तुम्हारा मौन भी कुछ और नहीं, बल्कि एक अभिव्यक्ति है, भले ही बिना शब्दों की है, लेकिन फिर भी है तो अभिव्यक्ति ही।
बुद्ध ने अपनी श्रेष्ठतम पुस्तक नाम ‘धम्मपद’ रखा, और इसमें विरोधभास ही विरोधभास है। वे विरोधाभासों से इतने अधिक भरे हुए हैं, और यकीन मानिए, मेरे अलावा उन्हें कोई नहीं हरा सकता है। बेशक मुझसे पराजित होने में उन्हें मजा आएगा, जैसे कभी-कभार पिता अपने पुत्र से पराजित होने का मजा लेता है। पुत्र अपने पिता की छाती पर बैठ जाता है विजयी, और पिता बस उसे जीतने का मजा लेने देता है। सभी बुद्धपुरुष उन सबसे पराजित हो जाना चाहते हैं जो उन्हें प्रेम करते हैं। मैं अपने शिष्यों को यह अनुमति देता हूं कि वे मुझे पराजित करें, और वे मुझसे आगे निकल जाएं। मेरे शिष्य मुझसे भी आगे निकल जाएं, इससे अधिक और क्या प्रसन्नता की बात हो सकती है।
बुद्ध शुरुआत ‘धम्मपद’ नाम से ही करते हैं--यही वे करने जा रहे हैं, वे उसे कहने जा रहे हैं जो नहीं कहा जा सकता, वे उसे बोलने जा रहे हैं जिसे बोला नहीं जा सकता। अनिर्वचनीय को उन्होंने इतनी सुंदरता से कहा कि धम्मपद एवरेस्ट की भांति हो गया है। यहां सब तरफ पर्वत ही पर्वत हैं लेकिन एवरेस्ट की ऊंचाई को कोई छू नहीं सकता।
मैंने बुद्ध को बैठे हुए देखा। मैंने दूसरे लोगों को भी देखा, अत्यंत सुंदर, अत्यंत विनम्र--वे ब्लावट्‌स्की की तरह नहीं हैं जो चिल्लाते हुए द्वार पर हथौड़े मार रही है कि ‘‘मुझे भीतर आने दो।’’ मैंने नग्न महावीर को देखा...क्योंकि सत्य नग्न है, वे एकदम शांत खड़े थे। और उनके शिष्य उनकी पुस्तक को हाथ में लिए हुए थे, न कि वे स्वयं।

दूसरी: ‘जिन-सूत्र’--‘विजेता के सूत्र।’ ‘जिन’ एक सुंदर शब्द है, इसका अर्थ है जिसने जीत लिया है: वह जिसने स्वयं पर विजय पा ली है।
मैं इन सूत्रों पर अनेक भागों में बोल चुका हूं, लेकिन अभी तक उनका अंग्रेजी में अनुवाद नहीं हो पाया है। यहंा पर एक बात जरूर कहना चाहता हूं: ‘जिन-सूत्रों’ को मैं पोस्टस्क्रिप्ट में सम्मिलित करता हूं।
कोई भी उतना मौन में नहीं रहा है जितना कि महावीर रहे हैं, न ही उतना नग्न। केवल मौन ही इतना नग्न हो सकता है। याद रहे, मैं नंगा नहीं कह रहा हूं, मैं कह रहा हूं नग्न। दोनों शब्द बिलकुल भिन्न हैं, ‘नंगा’ अश्लील है; और ‘नग्न’ बस पूरी तरह से खुला है, वल्नरेबल, अनावृत। एक बच्चा नंगा नहीं होता, बस नग्न होता है। महावीर अपनी नग्नता में बहुत सुंदर हैं।
कहा जाता है कि उन्होंने अपने सूत्र किसी से नहीं कहे थे; केवल उन अंतरंग शिष्यों ने जो उनके समीप बैठे थे, उन्हीं शिष्यों ने इन सूत्रों को अपने भीतर सुना था। उन्होंने केवल सुना। यह सर्वाधिक आश्चर्यजनक घटनाओं में से एक है... महावीर के पास ग्यारह अंतरंग शिष्यों का एक इनर सर्किल था, और जब वे सभी एक साथ वही शब्द सुनते थे, तभी वे समझते थे कि यह शब्द लिखा जाना चाहिए, यद्यपि बाहर से देखा जाए तो महावीर ने कुछ भी नहीं बोला है, लेकिन इन शिष्यों ने एक सूक्ष्म ढंग से उनकी तरंग को ग्रहण किया है।
सारे संसार में लिखी गई किसी और पुस्तक से एकदम भिन्न तरीके से ‘जिन-सूत्रों’ की रचना हुई है। महावीर मौन रहे, और ग्यारह शिष्यों ने वही शब्द एक साथ सुना--‘एक साथ’ पर जोर है--तब उन्होंने उसी शब्द को लिख दिया। ‘जिन-सूत्रों’ की उत्पत्ति इसी प्रकार से हुई है। एक पुस्तक की कैसी अदभुत उत्पत्ति! इससे सुंदर प्रारंभ की कोई सोच भी नहीं सकता और निश्चित ही इन सूत्रों में, मनुष्य को प्राप्त हो सकने वाला योग्य सर्वोच्च प्रकाश है, स्वयं पर विजय पाने का पूरा विज्ञान है।

तीसरी... मैंने एक ऐसे व्यक्ति को देखा जिसे मैं पहचान नहीं पाया। मैंने सोचा कि ‘‘अजीब बात है।’’ ‘‘हजारों जन्मों की यात्रा में मैं कई लोगों के साथ, कई विचारधाराओं में, कई मार्गों का यात्री रहा हूं। फिर कौन है यह आदमी? यह बिलकुल पहचान में नहीं आ रहा है।’’ वह कोई सदगुरु नहीं था, इसीलिए मैं उसे पहचान नहीं पाया, लेकिन वह इतना विनम्र था कि उसे सम्मिलित करना ही चाहिए। उसकी पुस्तक मुझे हमेशा प्रिय रही है। मुझे किसी तरह का कोई भी कारण समझ में नहीं आता कि इसे पचास की सूची में शामिल करना मैं कैसे भूल गया। वह एक ग्रीक आदमी था, कजानजाकिस, ‘जोरबा दि ग्रीक’ का लेखक। मुझे यह भी नहीं पता कि उसके नाम का उच्चारण कैसे किया जाता है, लेकिन ‘जोरबा दि ग्रीक’ अति उत्तम रचना है। जिस व्यक्ति ने इसे लिखा है वह न तो बुद्ध है, न महावीर है, लेकिन उसमें किसी भी क्षण इनके जैसा होने की क्षमता है। वह करीब-करीब तैयार है, परिपक्व है, जैसे कि बस वह अपने लिए सही मौसम का इंतजार कर रहा है।
जोरबा से मेरे संबंध प्रेम के हैं। मुझे अजीब तरह के लोगों से प्रेम है। जोरबा बड़ा ही अजीब व्यक्ति है--और वह कोई वास्तविक व्यक्ति भी नहीं है, केवल काल्पनिक है, लेकिन मेरे लिए वह करीब-करीब एक वास्तविकता बन गया है, क्योंकि वह एपीकुरस, चार्वाक और संसार के सभी भौतिकवादियों का प्रतिनिधित्व करता है। वह उनका प्रतिनिधित्व ही नहीं करता है, बल्कि वह उनका सबसे अच्छे रूप में प्रतिनिधित्व करता है।
एक जगह जोरबा अपने मालिक से कहता है, ‘‘मालिक, आपके पास सब-कुछ है, लेकिन फिर भी आप जीवन से चूक रहे हैं, क्योंकि आपमें थोड़ी सी दीवानगी नहीं है। यदि आपमें थोड़ा सा भी दीवानापन आ जाए तो आपको पता चलेगा कि जीवन क्या है।’’
मैं उसे समझ सकता हूं; न केवल उसको, बल्कि हर युग के जोरबाओं को उनके ‘थोड़े से दीवानेपन’ के साथ समझ सकता हूं। लेकिन मेरा भरोसा किसी भी चीज के थोड़े से में नहीं है। मैं तो उतना ही दीवाना हूं जितना कोई हो सकता है, पूरा दीवाना। यदि तुम सिर्फ थोड़े से ही दीवाने हो, तो निश्चित ही, जीवन को भी सिर्फ थोड़ा सा ही समझ सकोगे, लेकिन यह बिलकुल नहीं जानने से तो कुछ बेहतर है।
जोरबा, बेचारा जोरबा, अनपढ़ जोरबा, एक मजदूर... वह शरीर से बहुत बड़ा रहा होगा, मजबूत शरीर वाला, और थोड़ा सा दीवाना रहा होगा। लेकिन उसने अपने मालिक को बड़ी अच्छी सलाह दी: ‘‘थोड़े से दीवाने हो जाएं,’’ उसने कहा था। मैं कहता हूं, थोड़े से दीवानेपन से काम नहीं चलेगा; पूरी तरह से दीवाने हो जाओ! लेकिन तुम केवल मेडिटेशन में, ध्यान में ही पूरा दीवानापन ला सकते हो, वरना तुम पागल हो जाओगे। इस दीवानेपन का तुम उपभोग न कर सकोगे; बल्कि यही तुम्हारा उपभोग कर लेगा। यदि तुम्हें पता नहीं है कि ध्यान क्या है, तो तुम भस्म जाओगे। इसलिए मैंने एक नया नाम गढ़ा है: ‘जोरबा दि बुद्धा।’
जोरबा दि बुद्धा मेरा संश्लेषण है। कला की श्रेष्ठ कृति की रचना करने के लिए कजानजाकिस से मुझे प्रेम है, लेकिन मुझे अफसोस भी है क्योंकि वह अब भी अंधकार में है। कजानजाकिस, तुम्हें एक सदगुरु की जरूरत है, थोड़े ध्यान की जरूरत है, अन्यथा जीवन क्या है यह तुम कभी न जान पाओगे।

चौथी: एक बहुत ही सुंदर व्यक्ति को मैंने देखा है। उनके बारे में मैंने चर्चा की है, लेकिन अपनी चाही हुई पचास पुस्तकों की सूची में उनका उल्लेख नहीं किया है। उनका नाम है, अल-हिल्लाज मंसूर। अल-हिल्लाज ने कोई पुस्तक नहीं लिखी है, बल्कि केवल थोड़े से वक्तव्य हैं, या यूं कहें कि घोषणाएं हैं। अल-हिल्लाज जैसे लोग केवल घोषणा करते हैं, किसी अहंभाव के कारण नहीं--उन्हें किसी प्रकार का कोई अहंकार नहीं होता, इसलिए तो वे घोषणा करते हैं--‘‘अनलहक!’’
‘‘अनलहक’’ उनकी घोषणा है, इसका अर्थ है ‘‘मैं खुदा हूं, और कोई दूसरा खुदा नहीं है।’’ मुसलमान उनको क्षमा न कर सके, उन लोगों ने उन्हें मार डाला। लेकिन क्या तुम अल-हिल्लाज को मार सकते हो? असंभव! जब उन्हें मारा जा रहा था, तब भी वे हंस रहे थे।
किसी ने उनसे पूछा: ‘‘तुम किसलिए हंस रहे हो?’’
उन्होंने उत्तर दिया: ‘‘क्योंकि तुम मुझे नहीं मार रहे हो, तुम केवल शरीर को मार रहे हो, और मैंने बार-बार कहा है कि मैं शरीर नहीं हूं। अनलहक! मैं स्वयं खुदा हूं।’’ अब ये लोग ही पृथ्वी के नमक हैं।
अल-हिल्लाज मंसूर ने कोई पुस्तक नहीं लिखी है। केवल उनकी कुछघोषणाओं को उनके प्रेमियों और मित्रों ने संगृहीत किया है। मैं उन्हें अनुयायी भी नहीं कहूंगा, क्योंकि अल-हिल्लाज जैसे लोग अनुयायिओं को, नकल करने वालों को स्वीकार नहीं करते है। वे बस प्रेमियों को, मित्रों को ही स्वीकार करते हैं।
मुझे खेद है कि मैं उनके बारे में बिलकुल ही भूल ही गया था। ऐसा करना मेरे लिए ठीक नहीं है। लेकिन अल-हिल्लाज आपको मेरी दिक्कत को समझना चाहिए। जितनी पुस्तकों के बारे में तुमने कभी सुना भी न होगा उससे अधिक पुस्तकें मैंने पढ़ी हैं। मैंने एक लाख से भी अधिक पुस्तकें पढ़ी हैं। अब उनमें से पचास को खोजना बहुत ही मुश्किल काम है। मैंने सिर्फ कुछ पुस्तकें ही चुनी हैं, और स्वाभाविक है कि मुझे बहुत पुस्तकों को छोड़ देना पड़ा, आंखों में आंसू लिए। मैं उनको भी चुनना चाहता था... लेकिन मैं आपका नाम पोस्टस्क्रिप्ट में लिखवा रहा हूं।

पांचवीं: इनको बहुत कम लोग ही जानते हैं, कारण सीधा सा है कि उन्होंने न कभी कुछ लिखा और न कभी कुछ बोला। वह व्यक्ति हैं, महाकाश्यप। उनके विषय में बस यही घटना ज्ञात है।
एक दिन बुद्ध सुबह के अपने प्रवचन में कमल का फूल हाथ में लिए हुए आए। वे मौन बैठ कर फूल को देखने लगे, एक शब्द भी नहीं बोले। दस हजार संन्यासियों की सभा बेचैन हो गई। ऐसा कभी न हुआ था। पहली बात तो यह कि बुद्ध जो कभी कुछ लेकर नहीं आते थे, आज कमल का फूल लेकर आए; दूसरी बात, वे आते ही बोलना शुरू कर देते थे, लेकिन आज काफी समय बीत गया, और वे बस फूल को देखे चले जाते हैं। बहुत से लोगों ने सोचा होगा कि वे पगला गए हैं। केवल एक ही व्यक्ति इस बात से राजी नहीं था। वह हंस पड़ा। उनका नाम था, महाकाश्यप।
बुद्ध ने आंखें उठाईं, हंसे और महाकाश्यप को अपने पास बुलाया, फूल उनको दिया और सभा से कहा, आज का प्रवचन पूरा हुआ, उन्होंने कहा, ‘‘जिस योग्य तुम हो वह मैं तुम्हें दे चुका हूं, महाकाश्यप को वह दिया जिसके वह योग्य है, और ठीक भी है। कई वर्षों तक मैं तुमसे शब्दों के माध्यम से बोला, लेकिन तुम कभी नहीं समझे। आज मैं मौन की भाषा में बोला हूं, और महाकाश्यप की हंसी ने बता दिया कि वह समझ गया है।’’ तो इस रहस्यमय ढंग से उनके उत्तराधिकारी को खोज लिया गया। महाकाश्यप बुद्ध के उत्तराधिकारी बना दिए गए। इस अजीब ढंग से...
महाकाश्यप के शिष्यों ने उनके बारे में कुछ लिखा है जिसे उनकी पुस्तक कहा जा सकता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि उन्होंने उसे लिखा नहीं है, न ही उनके शिष्यों ने अपने हस्ताक्षर किए हैं। वे गुमनाम रहे हैं। लेकिन जो कुछ भी लिखा गया है उसका सौंदर्य अदभुत है। कुछ अंश है, जैसे चांद के टुकड़े हों: अगर तुम उन सबको एक साथ रख सको तो फिर से पूर्णिमा का चांद बन जाएगा। ध्यान ही वह राज है जिससे उन सबको साथ रखा जा सकता है।
महाकाश्यप के पीछे जो परंपरा चली वह झेन है। वे झेन का, ध्यान का प्रथम स्रोत हैं। अजीब बात है... कि बुद्ध भी नहीं, बल्कि महाकाश्यप प्रथम हैं। ...क्योंकि बुद्ध चालीस वर्ष तक बोलते रहे, महाकाश्यप ने कभी कुछ नहीं बोला; अगर उन्होंने कभी किसी तरह की कोई आवाज की तो वह सिर्फ उनकी हंसी की है। अगर तुम उसे उनका बोलना कहो, तो बात अलग है। एक तरह से यह बोलना ही है, वह हंसी यह कह रही है कि यह सारा अस्तित्व एक मजाक है। जैसे कि वह बुद्ध से कह रही है कि ‘‘क्या मजाक है!’’
जिस क्षण तुम्हें यह समझ आता है कि यह पूरा अस्तित्व ही एक मजाक है, तुम समझ गए। इसके अलावा और कोई समझ नहीं है, और कोई संबोधि नहीं है। बाकी सब-कुछ झूठ है।

देवगीत, क्या तुम मुझे बता सकते हो कौन सा नंबर चल रहा है?--क्योंकि मरणोपरांत रिकॉर्ड में भी, पोस्टस्क्रिप्ट में भी मुझे दस की संख्या पूरी करनी है। कौन सा नंबर तुमने कहा?
‘‘नंबर छह, ओशो।’’
ठीक है। यह बहुत अच्छा हुआ कि मैंने ‘मरणोपरांत’ कहा है। मैं सचमुच में मिट चुका हूं, इसीलिए मैं तुम्हें मुझे ‘धन्यभागी’ कहने की अनुमति देता हूं। यदि मैं नहीं मिटा हूं तो मुझे धन्यभागी कहना उचित नहीं है।
 शब्द ‘मरणोपरांत’ संयोगवश मेरे खयाल में आया है। मैं ‘पोस्टस्क्रिप्ट’ कहने जा रहा था, लेकिन कभी-कभी सत्य संयोगवश बाहर आ जाता है। यह व्यवस्थित नहीं होता, क्रमबद्ध नहीं होता; यह केवल ज्वालामुखी की भांति फूट पड़ता है। मैं इसे कहने वाला नहीं था, लेकिन यह अपने से ही निकल आया। सत्य के अपने ही रास्ते हैं। मैं सच में ही एक मरणोपरांत व्यक्ति हूं, बहुत पहले ही मिट चुका हूं।

छठवीं: मैंने हरमन हेस को देखा। वह कोई बुद्धपुरुष नहीं है--जो बुद्धत्व के पार जा चुके हैं उनके बारे में तो क्या कहें। वह बस एक साधारण सा व्यक्ति था, लेकिन काव्य की उड़ान में उसने दुनिया की श्रेष्ठतम पुस्तकों में से एक लिखी है, ‘सिद्धार्थ।’
सिद्धार्थ वास्तव में गौतम बुद्ध का नाम है जो उनके माता-पिता ने उन्हें दिया था। वे गौतम बुद्ध के रूप में प्रसिद्ध हुए। गौतम उनका पारिवारिक नाम था; बुद्ध का सीधा सा अर्थ है ‘जागा हुआ।’ उनका असली नाम सिद्धार्थ था, जो उनके माता-पिता ने ज्योतिषियों की राय से उन्हें दिया था। यह सुंदर नाम है। सिद्धार्थ का यह भी अर्थ होता है ‘वह जो अर्थ को उपलब्ध हो गया है।’ ‘सिद्ध’ यानी ‘जिसने प्राप्त कर लिया’; ‘अर्थ’ यानी जिसका अर्थ होता है। दोनों को मिला दो, तो सिद्धार्थ का मतलब होता है, ‘जो अपने जीवन के अर्थ को उपलब्ध हो गया है।’ उनके मां-बाप, ज्योतिषी, और वे लोग जिन्होंने उनको यह नाम दिया वे बुद्धिमान लोग रहे होंगे--अगर वे बुद्धत्व को उपलब्ध नहीं, तो कम से कम बुद्धिमान तो रहे होंगे... कम से कम सांसारिक रूप से बुद्धिमान।
हरमन हेस की ‘सिद्धार्थ’ बुद्ध की कहानी को दूसरे ढंग से दोहराती है, लेकिन उसी आयाम में, उसी अर्थ के साथ। यह अविश्वसनिय है कि हरमन हेस ने इसे लिखा है, लेकिन वह स्वयं सिद्ध नहीं हो पाया। वह एक मामूली सा लेखक ही रहा--हां, एक नोबल पुरस्कार विजेता, लेकिन इससे कोई बहुत फर्क नहीं पड़ता है। आप बुद्ध को नोबल पुरस्कार नहीं दे सकते; वे हंसेगे और उसे फेंक देंगे। लेकिन पुस्तक बहुत सुंदर है, और मैं इसे शामिल करता हूं।

सातवीं: अत्यधिक परंपरावादी और कट्टर यहूदी धर्म में भी पूरी तरह से बुद्धत्व को उपलब्ध कुछ सदगुरु हुए हैं--कुछ तो बुद्धत्व के पार भी जा चुके हैं, यह बात बहुत कम लोगों को पता है। उनमें से एक हैं, बाल शेम तोव। उनको शामिल न करने के लिए मैं अपने आप को माफ नहीं कर सकता, और क्षमा मांगने के लिए और कोई दूसरा नहीं है।
बाल शेम तोव। तोव उनके नगर का नाम था। उनके नाम का सीधा अर्थ है ‘तोव नगर के बाल शेम’; इसलिए हम उनको केवल बाल शेम ही कहेंगे। उनके बारे में मैं बोल चुका हूं, क्योंकि जब मैं हसीद धर्म पर बोल रहा था, मैंने कोई भी जरूरी बात नहीं छोड़ी थी। मैं ताओ, झेन, सूफी, हसीद, सभी पर बोल चुका हूं। मैं किसी भी परंपरा का हिस्सा नहीं हूं, इसलिए मैं किसी भी दिशा में जाने के लिए स्वतंत्र हूं। मुझे किसी नक्शे की भी जरूरत नहीं है। मैं तुम्हें फिर से याद दिलाता हूं:

भीतर आते हुए
बाहर जाते हुए
जल-पंछी
नहीं छोड़ता है कोई पदचिह्न,
और न ही उसे जरूरत है किसी मार्गदर्शक की।

बाल शेम तोव ने कभी कोई शास्त्र नहीं लिखे--रहस्यवाद के जगत में ‘शास्त्र’ एक गंदा शब्द है--लेकिन उन्होंने कई सुंदर कहानियां कही हैं, वे इतनी सुंदर हैं कि उदाहरण के रूप में मैं उनमें से एक तुम्हें सुनाता हूं जिससे तुम उस व्यक्ति की गुणवत्ता का स्वाद पा सको।
बाल शेम के पास एक स्त्री आई। वह निःसंतान थी; वह संतान चाहती थी। वह बाल शेम को निरंतर तंग करती और कहती: ‘‘अगर आप आशीर्वाद दें तो सभी कुछ संभव है। कृपया मुझे आशीर्वाद दें। मैं संतान चाहती हूं।’’
आखिरकार थक कर--हां, यहां तक कि बाल शेम भी तंग करने वाली स्त्री से थक सकते हैं--उन्होंने पूछा: ‘‘तुम लड़का चाहती हो या लड़की?’’
स्त्री तो बहुत प्रसन्न हुई; वह बोली: ‘‘निस्संदेह, लड़का ही चाहिए।’’
बाल शेम ने कहा: ‘‘तो फिर इस कहानी को सुनो। मेरी मां निःसंतान थी, उसने भी अपने नगर के रबाई को उसे आशीर्वाद देने के लिए लगातार परेशान और तंग किया। आखिर रबाई ने कहा, ‘पहले मेरे लिए एक सुंदर टोपी बना लाओ।’ मेरी मां ने एक सुंदर सी टोपी बनाई और रबाई के पास गई।’’
टोपी इतनी सुंदर थी कि मेरी मां ने कहा, ‘‘इसके बदले में मुझे कुछ भी नहीं चाहिए, आपको इस टोपी को पहने हुए देखना ही बहुत सुंदर लग रहा है। मैं बहुत संतुष्ट हूं। आपको मेरे प्रति आभारी होने की जरूरत नहीं है, मैं ही आपकी आभारी हूं। धन्यवाद, रबाई।’’
‘‘और मेरी मां चली गई। इसी तरह मेरी मां गर्भस्थ हुई।’’ और मेरा जन्म हुआ, बालशेम ने बताया।
उस स्त्री ने कहा: ‘‘बहुत खूब, तो कल ही मैं एक सुंदर सी टोपी लेकर आती हूं।’’
दूसरे दिन वह एक बहुत सुंदर टोपी लेकर वापस आई। बाल शेम ने टोपी ले ली और उसे ‘‘धन्यवाद’’ भी नहीं दिया। वह स्त्री लंबे समय तक प्रतीक्षा करती रही, फिर उसने पूछा, ‘‘बच्चे के बारे में क्या?’’
बाल शेम ने कहा: ‘‘बच्चे के बारे में सब-कुछ भूल जाओ! टोपी इतनी सुंदर है कि मैं तुम्हारा आभारी हूं। मुझे तुम्हारा धन्यवाद करना चाहिए। क्या तुम्हें वह कहानी याद है जो मैंने तुम्हें सुनाई थी? उस स्त्री ने बदले में कुछ नहीं मांगा था, इसीलिए वह गर्भस्थ हुई, और मेरे जैसा बच्चा’’--बाल शेम पैदा हुआ।
‘‘लेकिन तुम कुछ पाने की इच्छा के साथ आई हो। बस इस टोपी को देकर तुम बाल शेम जैसा बच्चा चाहती हो? उसके बारे में सब-कुछ भूल जाओ,’’ उसने कहा, ‘‘और फिर कभी मत आना--कभी नहीं।’’
कई बातें ऐसी हैं जिन्हें केवल कहानियों के माध्यम से ही कहा जा सकता है। बाल शेम ने आधारभूत बात कह दी है: मांगो मत और वह मिल जाएगा। मांगो मत--यही मूल शर्त है।
बाल शेम की कहानियों से जो हसीद धर्म अंकुरित हुआ वह आज तक की सबसे सुंदर खिलावट है। हसीद धर्म की तुलना में यहूदियों ने कुछ भी नहीं किया है। हसीद धर्म एक छोटी सी धारा है, लेकिन अभी भी जीवंत है, अभी भी प्रवाहमान है।

आठवीं: फरीद। मैं उन पर पहले ही बोल चुका हूं--लेकिन अंग्रेजी में नहीं, हिंदी में। सूफी रहस्यदर्शी, फरीद--कबीर, नानक और दूसरे अन्य रहस्यदर्शियों के समकालीन थे। वे मुझे प्रिय हैं। अपने गीतों में उन्होंने खुद को फरीदा कहा है। वे सदा अपने को ही संबोधित करते हैं, किसी और को नहीं। वे हमेशा शुरू करते हैं, ‘‘फरीदा क्या तू सुन रहा है? फरीदा जाग, फरीदा ऐसा कर वैसा कर।’’ हिंदी भाषा में जब तुम फरीद नाम का प्रयोग करोगे तो वह सम्मानीय होता है। लेकिन फरीदा कहने पर वह सम्माननीय नहीं रह जाता। इस तरह से तो केवल नौकरों को बुलाया जाता है। फरीद अपने को फरीदा कहते हैं, क्योंकि वे मालिक हैं... शरीर सेवक है।
महान सम्राट अकबर फरीद से उनके गीत सुनने के लिए आया करता था। एक बार अकबर को एक उपहार, बहुत कीमती उपहार प्राप्त हुआ, हीरों से जड़ी सोने की कैंची। गुड़िया को वह अच्छी लगी होती--किसी भी स्त्री को अच्छी लगती। अकबर को भी अच्छी लगी थी, उसे यह इतनी अच्छी लगी और उसने सोचा कि फरीद के लिए यह उपहार अच्छा रहेगा। वह आया और उसने वह मूल्यवान कैंची फरीद को दे दी। फरीद ने उसे उलट-पलट कर देखा, फिर अकबर को वापस कर कहा: ‘‘यह मेरे किसी काम की नहीं। यदि तुम मुझे कुछ उपहार देना चाहते हो, तो एक सुई ले आओ।’’
अकबर हैरान था। उसने पूछा: ‘‘सुई क्यों?’’
फरीद बोले: ‘क्योंकि कैंची का काम चीजों के टुकड़े करना है, और सुई का काम है टुकड़ों को जोड़ना। मेरा काम कैंची वाला नहीं है, सुई का है। मैं चीजों को जोड़ता हूं, मैं संश्लेषण करता हूं।
फरीद न तो सिग्मंड फ्रायड से राजी होते, न ही मनोविश्लेषण से, क्योंकि मनोविश्लेषण सोने की कैंची है, हर चीज के टुकड़े कर देती है। वह असागोली और मनोसंश्लेषण से राजी होते। जोड़ो, चीजों को एक साथ ले आओ, एक इकाई में। मेरे आंसू देखते हो? वे फरीद के लिए हैं... फरीदा... हां, फरीदा के लिए। उनके लिए कोई भी श्रद्धांजलि कम है। वे आंसुओं को समझ जाएंगे, सोने की कैंची को नहीं। काश, अकबर फरीद के चरणों पर गिर पड़ा होता और रोए होता... सदगुरु के लिए वास्तविक उपहार यही होता।
फरीद ने कोई पुस्तक नहीं लिखी, लेकिन उनके प्रेमियों ने उनके गीत लिखे हैं। उनके गीत अत्यंत सुंदर हैं, लेकिन तुम्हें उन गीतों को पंजाबी भाषा में ही सुनना पड़ेगा। वे पंजाब में रहते थे, उनके गीत पंजाबी में हैं, हिंदी में नहीं हैं। पंजाबी हिंदी से बहुत अलग है। हिंदी थोड़ी कोमल है, व्यवसायियों की भाषा है। पंजाबी है तलवार की तरह, योद्धा की भाषा है। यह बहुत गहराई तक जाकर दिल को छू लेती है। अगर तुम फरीद के गीतों को पंजाबी भाषा में सुनो तो तुम्हारा दिल झूम उठेगा।
जब मैं पंजाब में यात्रा किया करता था तो लोगों से पूछा करता था, ‘‘क्या तुम मेरे लिए फरीद के गीत गा सकते हो?’’ और कभी-कभार कोई गाने वाला मिल जाता था, जो फरीद के गाने का ढंग जानता था। और वे सभी अच्छे गायक... वे सभी सुंदर क्षण... पंजाबी भाषा की अपनी एक गुणवत्ता है। हर भाषा की अपनी एक गुणवत्ता है। लेकिन पंजाबी निश्चित ही एक तलवार है, उसे और अधिक धार नहीं दे सकते।

नौवीं... मैं जल्दी में हूं, क्योंकि मेरा समय लगभग पूरा हो गया होगा, या हो चुका है, क्योंकि मैंने गुड़िया को भीतर आते हुए देखा है। यह कितनी दुखद बात है कि समय भी उसी नियम का अनुसरण करता है फिर चाहे वह मेरा हो या तुम्हारा। इसे क्रोनॉलॉजिकल, क्रमबद्ध नहीं होना चाहिए, बल्कि रिलेटिव, सापेक्ष होना चाहिए। मेरे समय को वही नियम पालन नहीं करना चाहिए, इसे आइंस्टीन के सापेक्षवाद से संबंधित नहीं होना चाहिए। इसे अंतहीन होना चाहिए। लेकिन मैं जानता हूं कि ऐसा हो नहीं सकता, इसलिए मैं जल्दी में हूं, और तुम्हें पता है कि जब मैं जल्दी में होता हूं तब भी मैं विश्राम में ही होता हूं।
नौवीं: एक अन्य कवि, एक गायक, एक नर्तक, जिनकी गुणवत्ता बिलकुल ही भिन्न है: शिव, और उनकी पुस्तक ‘विज्ञान भैरव तंत्र।’ मैं इस पर बोल चुका हूं। यह बहुत छोटी है, केवल एक सौ बारह सूत्र। तुम इन सूत्रों को पुस्तक के एक पृष्ठ पर आसानी से लिख सकते हो, या ज्यादा से ज्यादा दो पृष्ठों पर। इस पर मैं पांच भागों में बोल चुका हूं, कई सौ पृष्ठों में--‘दि बुक ऑफ सीक्रेट्‌स।’ मेरे हिसाब से कोई भी और पुस्तक इतनी घनीभूत नहीं है जितनी कि ‘विज्ञान भैरव तंत्र’--शिव की यह पुस्तक है। प्रत्येक सूत्र अपने आप में एक मेथड है, एक विधि है।
देवगीत, कृपया हस्तक्षेप मत करो। मुझे अपना काम खत्म कर लेने दो। जो व्यक्ति रोगी वाली कुर्सी पर बैठा होता है उसे लोग पेशेंट, मरीज कहते हैं; लेकिन उन्हें डॉक्टरों को पेशेंट, धैर्यवान होना सिखाना चाहिए। आशु, तुम डॉक्टर नहीं हो इसलिए तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है। कोई महिला कभी चिंता नहीं करती, वह दूसरों को चिंता में डाल देती है; यह और बात है। देखो, गुड़िया भी हंस रही है, जो एक असली अंग्रेज महिला के लिए असाधारण बात है!
अच्छा है, हंसना हमेशा ही अच्छा होता है। यह मुझे प्रीतिकर है। लेकिन मुझे अपना काम जारी रखना है चाहे तुम हंसो या रोओ; इस कुर्सी पर बैठे हुए आदमी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं चट्टान की भांति कठोर हूं और कमल की भांति कोमल, लेकिन मैं दोनों एक साथ हूं। इसे स्पष्ट करने के लिए मैं तुम लोगों से कहे देता हूं: पहले तो मैं चट्टान हूं; और इससे मैं तुम्हारी खोपड़ी को तोड़ दूंगा। तुम्हारे लिए मैं कमल नहीं हो सकता हूं, लेकिन तुम जो कर रहे हो वह बहुत सुंदर है।

दसवीं: मैं हमेशा उमास्वाति और उनकी पुस्तक पर बोलना चाहता था। उमास्वाति एक रहस्यदर्शी हैं, लेकिन बहुत रुखे-सूखे रहस्यदर्शी--जैसे कि इस समय मेरे ओंठ हैं रूखे-सूखे बिना किसी नमी के। उन्होंने एक बहुत रूखी-सूखी पुस्तक लिखी है, लेकिन उसमें परम का बिलकुल सही वर्णन है। उनकी पुस्तक का नाम है ‘तत्व सूत्र।’ ‘तत्व’ का अर्थ है ‘परम सत्य।’ ‘तत्‌’ यानी ‘वह’--परम। ‘यह’ यानी जो अभी है, और ‘वह’ यानी परम।
देवगीत, हस्तक्षेप बंद करो। मैं जानता हूं कि तुम अपनी मशीन के विषय में अधिक जानते हो। मैं भी तुम्हारी चेतना के विषय में अधिक जानता हूं। और यही मतलब की बात है।
‘तत्व सूत्र’ सुंदर है और मैं इस पर बोलना चाहता था, लेकिन बार-बार स्थगित करता रहा। यह बहुत ही गणितीय है, जैसे कुंदकुंद का समयसार। सभी जैन रहस्यदर्शी ऐसे ही हैं--रूखे-सूखे, अत्यंत रूखे-सूखे।
लक्ष्मी ने सचमुच एक ऐसी जगह चुनी है--कच्छ! महावीर, कुंदकुंद, उमास्वाति, ये सभी के सभी कच्छ को पसंद करते। लेकिन मेरे लिए यह कैसा दुर्भाग्य है! मैं हमेशा हिमालय में रहना चाहता था, लेकिन मुझे मेरे अपने लोगों के लिए हिमालय में रहने का खयाल ही छोड़ देना पड़ा।
बुद्ध, बोधिधर्म या बाशो के साथ ऐसा नहीं हुआ; उमर खय्याम, खलील जिब्रान, मिखाइल नैमी के साथ ऐसा नहीं हुआ, लेकिन यह मेरे साथ हुआ। मैं जानता हूं कि इसमें भी कुछ रहस्य होगा। वह यह हो सकता है कि मुझे कच्छ को भी हिमालय जैसा सुंदर बनाना पड़े। एक बात पक्की है: मैं जहां कहीं भी रहूंगा, मैं उसे दुनिया का सबसे सुंदरतम स्थान बना दूंगा, चुनौती चाहे जो भी हो।

ग्यारहवीं: और पोस्टस्क्रिप्ट के लिए अंतिम... मेरा मतलब है आज के लिए। कल के बारे में कोई नहीं जानता। अंतिम पुस्तक कुछ इतनी सुंदर है कि इसे भूल जाने के लिए मुझे वास्तव में असली दीवाना होना चाहिए। खयाल रखना, मैं पागल नहीं कह रहा हूं, मैं कह रहा हूं दीवाना। मैं दीवाना रहा होऊंगा कि इसे भूल गया। अगर मैं पागल होता तो इसे भूल पाना असंभव था। तब यह स्मरण में आने वाली पहली पुस्तक होती, अंतिम नहीं। वह है ‘दि सांग ऑफ नरोपा’--‘नरोपा के गीत।’
मैं इस पर कभी नहीं बोला, क्योंकि मैंने कभी नहीं सोचा कि इसके बारे में कुछ कहा जा सकता है, लेकिन यह मेरे हृदय में बनी रही। मैं इसका उल्लेख केवल इसलिए कर रहा हूं ताकि जो मुझसे प्रेम करते हैं वे इसे खोजना शुरू कर दें...नरोपा के गीत, काव्य और नृत्य। और यह मेरा भी काव्य और नृत्य है।

ॐ मणि पद्मे हुम,
कमल में मणि।

मेरे पूरे आनंद के साथ, तुम दोनों का धन्यवाद। 

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