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शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

45 - पोनी - एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा -(मनसा-मोहनी)

पोनी – एक  कुत्‍ते  की  आत्‍म  कथा

अध्‍याय -45

दादा जी की मृत्यु

मेरे मन में रह-रह कर कुछ अजीब से विचार आ रहे थे। जिन्हें मैं एक लयवदिता में जोड़ना चाहूं तो भी जोड़ नहीं पा रहा था। कुछ टूटे टुकड़ों की तरह जो मानो इधर उधर सब फैले हो। मुझे अंदर से ऐसा लग रहा था की घर में कुछ अशुभ होने वाला है। और ये मेरी बीमारी का नाटक भी मेरी मर्जी के बिना मेरे अचेतन में मुझसे कराया था। ये सब मेरे मन का वहम था या सच ही कुछ अशुभ होने वाला था। ये तो समय की गोद में छुपा था। परंतु अगर हम संवेदन शील है तो हम उनकी एक झलक, उन पद चापो की हल्की सी आहट तो सुनाई दे जाती है। लेकिन इसके लिए आपका सजग होना या संवेदनशील होना आवश्यक होता है। खैर मैं लाचार था मेरे पास शब्द नहीं थे, मैं उसे समझ भी नहीं सका था, और न ही उसकी व्याख्या ही कर सकता था। परंतु कुछ जरूर है जो समय मुझे दिखा रहा है। परंतु न मैं खुद ही उसे समझ पा रहा हूं और न ही उस सब से परिवार को आगाह ही कर पा रहा था।

एक दिन गुजर गया और मुझे थोड़ी राहत मिल, चलो हो सकता है मेरे अंदर की बैचेनी किसी और कारण से हो। या मेरा चित तनाव के बाद शांत हो रहा हो तो ये मार्ग की गति भी हो सकती थी। अब पापा-मम्मी को पूना से रोकने का जो नाटक किया था वह सब भूल गया था।