अध्याय 52
यात्रा का अंतिम
छंद
ये घटना कर्म जो चल रहा था। इसे मैं रोक देना चाहता था। कम से कम बहार का रूक जाये तो अंदर और अधिक ठहराव से बैठा जा सकता है। पानी पीने के बाद मैं अंदर जाकर लेट गया। पापा जी ने ऐ. सी. चला दिया। ठंडी हवा के कारण मेरी आँख लग गई। शायद शरीर को कुछ विश्राम मिल गया। पता नहीं कितनी देर बाद मैं उठा और इसके बाद मैं आँगन में ही जाकर बैठ गया जैसे किसी का इंतजार कर रहा हूं। कुछ मेरी समझ में नहीं आ रहा था। एक प्रकार का उसे नशा कहूं या बेहोशी वह मुझ पर चढ़ता जा रहा था। कुछ देर बाद उठ कर मैं नीचे जो कच्ची क्यारी थी उस के अंदर घूस कर मैंने बाथरूम किया। अब ऊपर चढ़ना मेरे लिए थोड़ा कठिन था। श्याम को भी सब मिन्नत कर रहे थे की कुछ खा ले परंतु अंदर कुछ जा ही नहीं रहा था। आज पाँच-छ: दिन हो गए थे। केवल पानी या थोड़े दूध को ही पीकर जी रहा था। पापा जी एक दवाई लेकर आए इंजेक्शन भर कर मेरे आधे खुले मुख से वह धीरे-धीरे डालते रहे। शायद कोई ताकत की दवाई होगी। कुछ अंदर गई बाकी पूरा मुख न खुलने की वजह से बाहर ही गिर गई। उसके बाद मैं पास रखे अपने मग्गे से थोड़ा पानी पिया।
रात भी सब के सो
जाने के बाद मैं बाहर आँगन में जाकर लेट गया था। आसमान एक दम साफ था। तारे खूब चमक
रहे थे। मैं उस कच्ची मिट्टी की क्यारी में लेट गया। मिट्टी की भी अपनी सुगंध होती
है। उस में इस तरह से लेटने से मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। और बतलाऊं आपको मैं इस
तरह से यहीं पर मरना चाहूंगा। या हो सके तो दूर जंगल में जहां मेरी मां ने प्राण
त्यागे थे। एक खुल आसमान में तले। मेरे को आज भी याद है मां ने किस सहजता से प्राण
त्यागे थे। दादा जी बंध कमरे में मरे थे। कमरा बड़ा था परंतु मनुष्य का ऐसा भाग्य
कहां की अब वह खुले में अपने प्राण त्यागे सके। वह तो दवाइयां मशीनों और भिड़ के
बीच घूट-घूट कर ही मरता होगा। भला आप सोचो मेरा अंदर के कमरे में दम घूँटता है।
कितना बड़ा कमरा है,
फिर भी में बेचने होकर बाहर आ कर खुले में लेट जाना चाहता हूं। क्या
ये संवेदना मनुष्य भूल गया है। विज्ञान ने उससे ये सब छिन लिया है।
सुबह जब मैं क्यारी
में गया तो वहां पर एक पत्थर की सिल्ली रखी थी। जिससे मैं टकरा गया और वह मेरे ऊपर
गिरने लगी। अचानक मैं तेजी से पीछे हटा। परंतु शरीर में इतनी तेजी अब नहीं रही थी।
वह मेरे ऊपर गिर ही रही थी और मैं दब भी सकता था। परंतु वहां रखा एक गमला बीच में
आ गया केवल मेरे पैर ही उसकी चपेट में आया। उसे मैंने खिंच कर निकाला लिया। अगर
पूरा दब जाता तो उठना भी मेरे लिए अति कठिन था। तब मैं अंदर गया तो पैर में दर्द
था। पापा जी कंप्यूटर पर कुछ काम कर रहे थे। आज कल बहुत काम करते रहते है। कहते है
पोनी तेरी आत्म कथा लिख रहा हूं। और मैं अंदर ही अंदर हंसता की मेरी भी क्या कोई
कथा हो सकती है। एक सपाट जीवन है, कोई उतार चढ़ाव नहीं। मेरे क्या हजारों
लाखों मनुष्यों का जीवन एक दम से सपाट होता है। वही कल किया था वही आ कर रहे हो।
हो गई आपकी पुराण कथा कोन पढ़ेगा। और उन्होंने मेरे पैर को देखा जो मिट्टी से सना
हुआ था। उन्होंने उसे एक कपड़े से साफ कर उस पर कुछ दवाई लगाई जिसे मैं बड़े प्रेम
से लगते देख रहा था। दर्द था परंतु वह दूर पैर में था अगर मैं उस अंदर से अपने को
देखता हूं और मानता हूं की मैं ये हूं, तो दर्द मेरी और आता
है अगर मैं केवल देखता हूं तो मुझे दर्द का पता ही नहीं चल रहा था।
फिर मैं वहीं उस
नरम कालीन पर लेट गया जहां पापा जी काम कर रहे थे। अब मेरा अधिक समय पापा जी के
संग साथ ही बीतता था। जब श्याम के समय डा0 के पास ले जाने का समय आया तो मैं थोड़ा
घबराया कि ज्यादा चल तो नहीं पा सकूंगा। मैं अंदर से डा0 के पास नहीं जाना चाहता
था। इसलिए दीदी जी ने मेरा चेहरा और पेर देख लिया फिर उसने भी कोई जिद्द नहीं की।
वह समझ गई थी की डा0 केवल लूट रहा है उसे कुछ पता नहीं था। नाहक पोनी के शरीर को इंजेक्शन
से छलनी कर रहा था। दीदी की इस बात को सून कर मैं अति खुश हुआ की चलो जान छूटी
अच्छा ही हुआ। वरना तो इस टाँग के दर्द से कैसे इतना चलता, नाहक
पापा जी को परेशान अलग से होती। क्योंकि दुकान तक तो मुझे चल कर ही जाना होता था।
वहीं से सवारी मिलती थी जिस पर हम बैठ कर जाते थे।
दिन तो किसी तरह से
कट रहा था परंतु रात काफी भारी हो जाती है। जब सब तो सो जाते थे लेकिन मैं सो भी
नहीं पा रहा था। मेरे शरीर मैं रह-रह कर एक अजीब सा दर्द उठ रहा था। मानो जैसे में
महीन बालों से कहीं जूड़ा हुआ हूं। अंदर से वो महीन बाल या तार एक-एक कर के टूट रहे
है। दर्द तो मुझे इतना मालूम नहीं रहा हो था। परंतु ये एक अजीब अनुभूति मैं आपने
शरीर के अंदर घटते हुए देख रहा थी। जो इससे पहले कभी नहीं हुई थी। ऐसा क्यों हो
रहा था जिसका कारण तो वह परमात्मा ही जानता होगा। अब मृत्यु एक ऐसा रहस्य अपने में
समेटे है जिसके बारे में कोई नहीं जानता। तब फिर मैं कैसे बता सकता था। परंतु ये
एक अजीब बात आप को बता रहा हूं। जिसे आप समझ सकते है या नहीं कहा नहीं जा सकता।
शरीर से जूड़े महीन तार जो सर से लेकर पूंछ तक धीरे-धीरे टूट रहे थे। कुछ-कुछ देर
बाद। रात को मैं अचानक उठा परंतु पेर में दर्द के कारण ऊपर नहीं चढ़ सकता था।
इसलिए नीचे वाली क्यारी में ही बाथरूम करने चला गया।
इसके बाद आँगन में
ही लेट गया मन तो कर रहा था छत पर चलूं। परंतु पिछला पेर जमीन पर पूरा टिक नहीं
रहा था। वह उस पत्थर के नीचे आने की वजह से कुछ कुचल गया था। परंतु वैसे मुझे उस
में कोई दर्द नहीं हो रहा था। सुबह जब पापा जी उठे पापा जी तीन बजे ही उठ जाते थे।
पहले तो मम्मी भी उठ जाती थी परंतु अभी कुछ दिन से वह सोती रहती है। पापा जी जब
मुझे बैठे देख तो मेरे पास आए की दर्द हो रहा है। मैंने आंखें खोली और उनकी गोद
में सर रख दिया। बाहर मौसम अच्छा था जब की अंदर कुछ गर्मी थी। पापा जी ने कहां
अंदर चल ए. सी. चला देता हूं। और मैं उठ कर उनके साथ अंदर चला गया। पैर को पूरा
नहीं टेक पा रहा था अभी। पापा जी समझ गए की पोनी के पैर में अभी भी चोट का दर्द
है। तब उन्होंने पास ही आयोडेक्स उठा कर मेरे पेर पर लगाई और प्यार से पट्टी बांध
दी।
सुबह सब उठे तब तो
मैं पहले ही उठ कर बाहर क्यारियों मैं बैठा था। पापा जी समझ गए की मेरा जी अच्छा
नहीं है। वह मुझे गोद में उठा कर ऊपर टी. वी. रूम में ले गए। अब मुझसे सीढ़ियों पर
नहीं चढ़ा जा रहा था। तब मैं ऊपर जाने के बाद थोड़ा पानी पिया। उसके बाद मम्मी और
दीदी शायद मम्मी को दवाई दिलाने के लिए ले गई। पापा जी ने कुछ देर टी. वी. देखा
फिर कहां की नीचे चले मेरा उठने का मन नहीं कर रहा था। मैं लेटा ही रहा। काफी देर
बाद दीदी-और मम्मी आई तब मुझे खाने के लिए पूछने लगी। अंडे की टोकरी मेरे सामने
रखी अगर खाए तो बनाऊँ। मैंने अपना मुख फेर लिया क्योंकि दो दिन पहले भी जो अंडे
मम्मी ने बनाये थे वह बाहर किसी कुते को ही देने पड़े थे। मैं अंदर ही अंदर हंस
रहा था की वो पेडिग्री और ये अंडे मेरे बाद मेरे भाई कुत्तों को मेरी और से दान
करना। कुछ चूं भी बची हुई है। जो दाँत तो साफ करती है खाने में एक दम से चॉकलेट
जैसी लगती है। यानि आप उन्हें हमारी चॉकलेट कह सकते हो।
दीदी टी. वी. रूम
में ही लेट गई ताकि मैं अकेला न रहूं। वह अपने कमरे में नहीं गई। कुछ देर बाद में
नीचे पापा मम्मी के पास कमरे में आकर लेट गया। उतरने में इतना दर्द नहीं हो रहा
जितना की चढ़ने में। जहां पर जाकर मैं लेटता था पापा जी ने जाकर उस जगह को खोद
दिया दीदी जब पूछने लगी तो कहां की पोनी यहां आकर लेटता है, अगर
ये नरम मुलायम हो जायेगी तो उसे लेटने में और भी अच्छा लगेगा। परंतु मैं अंदर से
जानता था पापा जी के मन की बात की मेरे बाद मुझे यहीं दबाया जायेगा। इस बात से
मुझे गर्व भी था की मेरा मालिक मुझे कितना प्यार कर रहा है। वह मुझे मरने के बाद
इस दिल में ही नहीं अपने अंगन में स्थान देकर अपनी यादों को समाए रहना चाहता था।
कितने कम कुत्ते ऐसे होगे। मेरे जैसा भाग्यशाली पापा होगा मालिक होगा मैं उन
करोड़ों में से एक हूं।
श्याम होते न होते
मेरा शरीर सिकुड़ना शुरू हो गया था। परंतु शायद ये अंदर की कोई प्रक्रिया थी, जिसे
बाहर से नहीं जाना जा सकता था। मेरा मन छत पर जाने का कर रहा था। लगता था एक बार
छत पर जाकर लेट जांऊ इस पूरे ओशोबा हाऊस को निहार लूं। तब में पापा जी पास जाकर
खड़ा हो गया। पापा जी मेरे सर पर हाथ फेरा और कहने लगे चल खुले में चलते है। और
उन्होंने मुझे गोद में उठा लिया। में बहुत खुश था। छत पर पेड़ो के बीच मुझे उतर
दिया और वह सामने ही अपनी कुर्सी पर बैठ गये। मैंने प्रत्येक क्यारी को सूंध कर
धूम कर अच्छे से देखा और फिर बाथरूम भी किया। मेरे बाथरूम में लाल-खून आ रहा था।
लेकिन छत पर आकर मुझे बहुत ही अच्छा लग रहा था। आसमान पर तारे निकल आये थे परंतु
पूर्णिमा का चाँद अंबर के तारों की चमक को मध्यम कर रहा था। मैं लम्बे पैर कर के
लेट गया। आज श्याम के समय आज वरूण घर पा
ही आ गया था। न जाने क्यों उसने छूटी कर ली थी। वह पापा जी के साथ लैपटॉप कर कुछ
काम करने की कोशिश कर रहा था। रह-रह कर मेरा हाल भी जान रहा था और कह रहा था कि
पोनी को डा0 के पास क्यों नहीं लेकर गए तब दीदी ने कहां की पोनी के पैर में चोट लग
गई थी इसलिए वह चल नहीं सकता था। तब उसने कहां की मैं उठाकर वहां तक ले चलता हूं।
तब पापा जी ने मना कर दिया की अब रहने दो। काफी देर हम छत पर ही रहे। वहीं मम्मी
पापा दीदी वरूण भैया ने चाय पी। उसके बाद वरूण भैया मुझे गोद में उठा कर नीचे टी
वी रूप के पास ले आये।
आज कुछ अजीब सा
मानो सब कुछ बेगाना सा लग रहा था। लगता था सब जल्दी से देख लूं आज शायद ये मेरी
अंतिम रात होगी। अगर मैं देर रात मरा तो क्या मेरे आस पास कोई नहीं होगा। तब क्या
किया जा सकता है। पेट में रह-रहा कर दर्द की एक लहर उठ रही थी। पापा जी उठे और
बाथरूम में नहाने के लिए चले गए। दीदी और मम्मी बाजार से कुछ सामान लेने चली गई।
वरूण भैया भी अपने कमरे में चला गया। अब मैं अकेला था। मुझे एक अजीब से दबाव ने
अचानक आकर घेर लिया। जैसे कोई मेरे शरीर
के अंग-अंग से कुछ निचोड़ रहा था। पेट में बहुत ऐंठन हुई। और गला भी जलने लगा तब
मैं उठा और पानी पीने के लिए अपने मग्गे के पास गया तो देखा की पापा जी तो बाथरूम
में नहा रहे थे। शरीर में एक खास तरह की जलन हो रही थी। मैं पापा जी के पास जाकर
खड़ा हो गया। सामने ही पानी की बाल्टी भरी थी। वैसे नहाने के नाम से मुझे बहुत डर
लगता था। डर न कह कर उसे डर का दिखावा कहा जाये तो ही ठीक होगा। परंतु न जाने कौन
सी शक्ति मुझ से ये सब करा रही थी। पापा जी ने पूछा नहाओगे। मैं पास ही खड़ा रहा
पापा जी ने सोचा की गर्मी लग रही होगी और वह मेरा शैम्पू निकाल कर मेरे शरीर पर
अच्छे से मल-मल के नहलाने लगे कई दिन से डा0 के यहां आने जाने के कारण शरीर बहुत
गंदा हो गया था। मैं आँख बंद कर पापा जी की छुअन का आनंद ले रहा था। और अंदर से
जान रहा था की पोनी ये तेरा आखिरी स्नान है। आखिरी प्रेम है पापा के संग का, इसे
पूर्णता से जी ले। फिर और कोई बात तेरे मन की मन में न रह जाये। इसलिए वो सब में
करना चाहता था।
खूब प्यार से पापा
जी ने नहलाया और मेरे तौलिया से अच्छे से पोंछ दिया। इतनी देर में मम्मी और दीदी
भी बाजार से आ गई थी। मुझे इस तरह से नहाते देख कर कहने लगी की अरे वाह पोनी तो
कितना अच्छा हो गया खूद ही नहाने के लिए चला गया। फिर मम्मी ने पूछा की क्या कुछ
खाएगा। तब मम्मी ने मेरे वर्तन में थोड़ा सा दूध डाला दिया। उस ठंडे दूध को
मैं खड़ा होकर प्यार से पीने लगा। सारे
परिवार ने एक राहत की स्वांस ली की पानी अब शायद ठीक हो जाए। उसके बाद मैं अपने
शरीर को हिला कर सुखा रहा था। फिर वहीं पंखे के नीचे बैठ गया। उसके बाद मैं लेट
गया पापा जी नहाकर आये और मुझे लाड़ किया मैंने पूंछ हिलाकर उनका स्वागतम किया।
फिर सब ने खाना खाया। मुझे तो आज सात-आठ दिन हो गए थे कुछ खाए हुए दीदी जी खाने के
बाद गुड़ या चॉकलेट मुझे जरूर खिलाती थी। लेकिन मैं कई दिन से वो भी नहीं खा रहा
था। लेकिन अब तो तीन दिन से दूध भी तो नहीं पी रहा था। लेकिन अचानक आज कैसे ये सब
मुझसे हो गया। ये भी एक अचरज था।
आज दूध पीने से
परिवार के लोगों को उम्मीद जगी की पोनी ठीक हो रहा है। दीदी ने एक छोटा सा टूकड़ा चॉकलेट
का अपने मुख से निकाल कर मुझे दिया। इसे देना नहीं कहना चाहिए जबरदस्ती मेरे मुख
में डाला। जिसे में ग्रहण करना नहीं चाहता था। अब मैं उसे सटक नहीं पा रहा था। वह
मेरे मुख में रखी की रखी रह गई थी। मैं अपने जबड़ों को हिला नहीं पा रहा था। केवल
खोल ही सकता था। शायद इसलिए ठोस चीज अंदर नहीं जा सकती थी। पापा जी जानते थे
उन्होंने दादा जी को भी देखा था किस तरह से उन्होंने दस दिन पहले कुछ खाना बन कर
दिया था केवल जूस ही पीते थे और आखिर के तीन दिन तो केवल पानी ही अंदर जाता था।
प्रत्येक प्राण के शरीर में पानी अंतिम
समय तक जा सकता है। इसलिए शरीर भोजन को ग्रहण नहीं कर पाता अगर वह भोजन लेता रहेगा
तो प्राणों को निकलने में समय लगेगा। एक प्रकार से प्राण निकलने कि प्रक्रिया में
भोजन अवरोध का कार्य करता है। जो प्रकृति को मंजूर नहीं है।
चॉकलेट मेरी जीभ पर
ही रखी रही परंतु शायद दीदी को यह बहम हो गया मैंने खा ली थी। अब उसे मैं कोई
स्वाद नहीं ले पा रहा था। मेरी जीभ भी निष्क्रिय हो गई थी। अब दूध जो मैंने पिया
था वह भी स्वाद विहीन था। उसके बाद सारे शरीर में एक अजीब से ऐंठन शुरू हो गई और
धीर-धीरे शरीर में दर्द बढ़ रहा था। मैं धीरे-धीरे कुं...कुं...करके रो रहा था।
पापा जी नीचे कालीन पर मेरे पास आकर बैठ गए उन्होंने मेरा सर अपनी गोद में रख लिया
और मेरे पूरे शरीर को सहलाने लगे। पेट को सहला रहे थे तब उन्हें बड़ा अजीब लगा। कि
मेरा पेट जो हमेशा बहुत गर्म रहता था एक दम से ठंडा हो गया था। मेरे पेर में जो
दर्द था जहां पर चोट लगी थी उसे भी सहला रहे थे। वह भी ठंडे हो रहे थे। उनका इस
तरह से मेरे पास बैठना मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। मैं आंखें बंद कर के उसे महसूस
कर रहा था। पापा जी की छुअन मुझे आज भी उसी तरह से लग रही थी जिस तरह से पहली बार
इस घर में मैं आया था। पापा जी प्यार ने मेरे पूरे शरीर को सहलाया थे। तब मेरे
अंदर जो हल्के से भय की एक लकीर थी वह अभय में विलीन हो रही थी। मेरे तन और मन का
भय पल में गायब हो गया था। ठीक सालों बाद फिर वही घट रहा था। शायद वह आगमन था और
ये विदाई थी। कितनी ही देर पापा जी मुझे यूं ही सहलाते रहे। फिर मुझे नींद लग गई।
तब पापाजी उठ कर सोफे पर बैठ गए। काफी देर मैं उसी तरह से सोता रहा। जब उठा तो फिर
दर्द शुरू हो गया तब दीदी ने पापा को मना किया आप बैठो मैं पोनी के पास बैठती हूं
और दीदी अपनी गोद में मुझे लेकर एक बच्चे की तरह से लाड़ कर रही थी। परंतु दीदी का
मुझे पाता नहीं की कब वह मुझसे बड़ी थी और कब मैं उसे अपने से छोटा समझने लगा था।
परंतु आज दीदी मुझे मां जैसी लग रही थी। मम्मी जी भी मुझे बार-बार कह रही थी पोनी
कुछ खाएगा देख हमने आज तेरी पसंद का पुलाव बनाया है। जो मुझे बहुत प्रिय था, भटूरे,
चावल छोले, नूडल्स आदि में बहुत चाव के साथ
खाता था। बनने पर चाहे मुझे कम ही मिले क्योंकि बीमारी के बाद ये सब बंद थी। परंतु
स्वाद के लिए तो जरूर थोड़े तो मिलते ही थी।
अचानक मैं दीदी की
गोद से उठा और नीचे चला गया। मेरे पेर का दर्द भी न जाने कहां गया हो गया था। मैं
जाकर नीचे क्यारी में लेट गया। न जाने क्यों में बंद कमरे में समा नहीं रहा था।
लगता था किसी खुले आसमान के नीचे जहां दूर अंबर में तारे हो...मैं अपना विस्तार एक
पूर्णता का फैलाव चाह रहा था। बंद कमरे में मुझे एक प्रकार दबाव एक जकड़न सी महसूस
हो रही थी। कुछ देर बाद मुझे उलटी हुई जो दूध मैंने पिया था वह बाहर आ गया। तब
वरूण भैया अपने कमरे में जाने लगे तो मुझे इस तरह से क्यारी में लेटे देख कर मेरे
पास आये की यहां क्यों लेटा है। उनकी समझ में कुछ भी नहीं आया उन्होंने पापा जी को
आवाज दी की पौनी क्यारी में क्यों लेटा है। पापाजी और दीदी नीचे आँगन में उतर कर
आए, मुझे इस तरह से लेटे देख कर कुछ परेशान हुए सामने मैंने उलटी कर रखी थी।
मुझे उठा कर आँगन में पंखे के नीचे लिटाया। मेरे मुख पर जो उलटी लगी थी एक कपड़े
से साफ कर दी। और मुझसे कहां की अंदर चल ए. सी. चला देता हूं। परंतु मेरी हिम्मत
नहीं हो रही तब उन्होंने खुद ही उठा कर अंदर मेरे बिस्तरे पर मुझे लिटा कर ए. सी.
चला दिया। मेरी आंखें बंद हो रही थी। पापा दीदी और मम्मी मेरे पास थे। लग रहा था
कहीं गहरे में डूब रहा हूं। मैं बार-बार आंखें खोल कर देख लेता था। सामने ही मम्मी
थी। कमरे में ओशो का प्रवचन चल रहा था। क्योंकि मम्मी पापा और मैं रात को जब सोते
थे तो ओशो जी का प्रवचन सुनते हुए ही सोते थे। ओशो जी आवाज मुझे अपने अंदर लिए जा
रही थी और पापा जी की छुअन एक अपने होने का अहसास करा रही थी। एक तरफ बेहोशी दूसरी
और होश गहरे और गहरे लिए जा रहा था। सब मेरे सामने होते हुए भी आंखें के आगे अंधरा
छाने लगा था। अब मेरी आँख तो खुली हुई थी परंतु में देख नहीं पा रहा था। परंतु कान
और स्पर्श अभी में महसूस कर रहा था। दूर पापा जी का स्पर्श मुझे एक प्रेम के बहाव
में अपने साथ बहाए लिए चला जा रहा था। धीरे-धीरे कानों में ओशो जी आवाज भी बंद हो
गई। अब केवल पाप जी का स्पर्श था जो मुझे अंदर और अंदर जाते हुए भी कितने पास लग
रहा था। शरीर तो मिट गया था कहीं दूर। परंतु कही अपने होने का मुझे पूरा पता था।
यानि शरीर के पार भी कुछ है। कितना सुखद लग रहा था। हाए! अगर यही मृत्यु है,
और वो इतनी सुखद और आनंद दाई है तो मैं हजार बार मरना चाहूंगा।
एक खुशी मेरे अंदर
भर रही भी और मिटने का भय तिरोहित हो गया। बस कितनी देर ऐसा ही रहा और दूर पड़े
मेरे शरीर ने जोर से तीन हिचकिया ली और मैं पूर्णता शरीर से अलग हो गया। मेरा एक
तार बिंदु जो दूर तक शरीर से जुड़ा था वह टूट गया। सब द्वारा खुल गए। अब मैं सब
बंधनों से मुक्त हो गया। लेकिन मुझे मार्ग का पता नहीं था परंतु एक होश और प्रेम
का कलेवा मेरे पास था जो मुझे मार्ग दे रहा था। कोई बंधन नहीं थे सब विस्तार था
चारों और फिर एक अंजान और शायद एक मधुर यात्रा पर चल पड़।
चै...र..वे...ति....चै...र.....वे....ति.....चैरवेति।
बस इति..... प्रेम
नोट- (पोनी ने
करीब 14 अगस्त रात ग्यारह बजे अपना शरीर छोड़ दिया था। पापा जी ने दीदी को ऊपर से
फोन कर के नीचे बुलाया। उसे तो यकीन नहीं आ रहा था कि अभी तो आधा घंटे पहले पोनी
के पास थी,
वह बार-बार कच्ची मिट्टी में जाकर लेट रहा था। इस लिए उसे उठाकर
अंदर ए सी में लिटाया था। और ये सब सून कर वह धार-धार रो पड़ी। जीवन में कुछ ऐसा
भी घटता है जिस पर आप यकीन नहीं कर सकते।
और ये ऐसा ही विषमय भरा क्षण था। पापा जी फिर दीदी से नमक के बारे में पूछा परंतु
घर पर तो मात्र एक थैली थी। इसी सब के लिए पापाजी पहले ही कहने वाले थे की नमक
लाकर रख दो। आज रात पोनी पर भारी है। परंतु कहा नहीं की बच्ची है, घबरा न जाएगी। दीदी घर के बाहर जैसे ही नकली और सामने ही दुकान खुली थी
वहां से पाँच थैली नमक की ले आई एक थैली घर पर थी। वरूण को फोन कर बुलाया की पोनी
ने शरीर छोड़ दिया। उसे भी विश्वास नहीं हो रहा था की एक घंटे पहले तो मैं पोनी से
मिल कर गया था। ऐसा नहीं हो सकता। वह बार-बार पोनी कि आंखों को देख रहा था। शायद
इतनी पास से मृत्यु को उसने भी पहली बार देखा था। पापा जी ने कहा की नहीं पोनी चला
गया अब गड्ढा खोद लेते है। वरूण ने कहा पर तब पापाजी ने कहा जहां पोनी रात जो जाकर
लेटा था। और पानी के अंतिम सफर पर चलने की बिदाई शुरू हो गई। उसी अंगन में जिस पर
वह बार-बार जाकर लेट जाता था। शायद वह चाहता था कि मुझे अंतिम सफर अपने से दूर न
करना। शायद यही उसकी अंतिम इच्छा थी। प्यार से पापा और वरूण भैया ने उठा कर सुला
दिया। ऊपर से उसका प्रिय कोट उढ़ा दिया। आंखें तब भी खुली थी मानो जाते हुए भी वह
सब को निहार रहा था। दीदी ने कहा पोनी की अंतिम फोटो ले लो। सच ऐसा लग रहा था वह
चिरनिंद्रा में नहीं निंद्रा में सो रहा था। फिर खूब सारा नमक डाल कर थोड़ा चंदन
और गंगा जल के साथ हल्दी भी डाल दी। और अब वरूण और दीदी उस पर मिट्टी डालने से डर
रहे थे की उन्हें पोनी जीवित लग रहा था।
पापा जी की आंखों में आंसू थे और दीदी बच्चे की तरह रो रही थी। मिट्टी डालने के
बाद पापा ने उसे खूब दबाया वरण भैया डर रहे थे। उसके बाद वह पत्थर की सिल्ली जिससे
मेरे पेर पर चोट लगी थी उस से उसे अच्छी तरह से ढक दिया। ऊपर से तीन चार अगर बत्ती
जला थी। अब तो वहां एक मिट्टी तो थी जो उस आंगन में किसी वृक्ष के पत्तों के रूप
में लहरायेगा। पक्षी उस पर बैठेंगे गीत-गायेंगे, हवा जिसे
छूकर अठखेलियां करेगी, और धूप पोर-पोर पत्ते पर इधर से उधर
नाचेंगी। यहीं की मिट्टी यहीं रह गई। नमन है शत-शत इस धरा को, इस जीवन को, इन लोगों को, और
उस परमात्मा को जिसने मुझे इस जीवन को यूं जीने का मोका दिया।)
ये सब जो शब्दों में
बांधा गया है ये एक दम से सत्य घटनाओं पर आधारित है। हां ये हो सकता है की कुछ बातें
हमें दिखाई नहीं दी हो या हम उसे ठीक तरह से समझ नहीं सके हो। परंतु ये एक सुंदर जीवन
की पूर्णता है। नीचे जो फोटो डाली जा रही हे वे पोनी की अंतिम फोटो है। उसे देख कर
लग रहा है की वह अभी मरा नहीं है एक गहरी नींद में सो रहा है।
आपका पोनी इति
मनसा - मोहनी
दसघरा नई दिल्ली



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