(सदमा - उपन्यास)
आज पेंटल ने निर्णय लिया की कितनी दिन से टाल रहा हूं परंतु आज तो वहां जाना ही होगा। जो भी हो उसे एक बार आज नेहालता से मिलना ही होगा। सो उसने वहां का पता एक कागज पर लिख लिया और उस दिन कुछ जल्दी ही उठ कर घर से निकल गया। क्योंकि कम से कम दो तीन घंटे का सफर तो था ही। फिर उसके बाद उस पते को ढूंढना भी था। उस इलाके में पहुंचते-पहुंचते सूर्य सर पर आ गया था। काफी पूछने और ढूंढने से उस घर का पता चला। परंतु शहर में रहने वालों की ये बीमारी है की वे अपने पड़ोसी को भी नहीं जानते। वे केवल अपनी दुनियां में इतना मस्त रहते है। सामने क्या हो रहा है किसी को पता नहीं चलता। गांव देहात में आप नाम से ही पता लगा सकते हो। देखने में नेहालता का मकान काफी बड़ा लग रहा था। पैसे वाले आदमी दिखाई दे रहे थे। अब एक दम से अंदर भी नहीं जाया जा सकता है। अब क्या बात की जाये ओर किस से यही पेंटल सोच रहा था। कि जब नेहालता से मिलेगा तो सीधी बीमारी की बात करना भी गलत होगा। अब तक वह उस गली के दो तीन चक्कर लगा चूका परंतु उसे कोई मार्ग नहीं सूझा। गली के एक कोने में एक फल सब्जी वाला खड़ा उसे दिखाई दिया। पेंटल ने उससे बात करने की गर्ज से चार केले खरीद लिए। जब की केले उसे कभी खाने अच्छे नहीं लगते थे। केले ले कर पास ही नाली पर बनी एक छोटी सी पुलिया थी। वहां पर कुछ छांव भी थी। इसलिए वह उस पर बैठ कर उन्हें खाने लगा। सामने ही एक तालाब साफ सुथरा बड़ा सा दिखाई दे रहा था। और उसके दाएं कौन पर एक बड़ा सा मंदिर था। जिसमें इक्का दुकान ही आदमी आता जाता दिखाई दे रहा है।
बात शुरू करने के
लिए पेंटल ने फल-सब्जी वाले से कहां की किस जिले के हो साहब। वह बोला की जौनपुर
जिले से हैं। अरे क्या बात है अपने पड़ोसी ही तो निकले। मैं कानपुर से हूं। यहां
कब से काम कर रहे हो। करीब पाँच साल हो गये। बीबी बच्चे तो अपने देश ही है। साल
में चार पाँच महीने के लिए यहां आ जाता हूं बाकी तो वहां खेत से ही गुजर हो जाती
है। एक बात पूछनी है जो तुम अपने हो। इसलिए कर रहा हूं सबसे तो ये बात कही नहीं जा
सकती। ये सामने जो कोठी है इस में सब्जी देने जाते हो। ये कैसे लोग है। साहब
ज्यादा तो कह नहीं जा सकता। परंतु मुझे तो एक दम छोटा परिवार लगता है। एक लड़की
है। और माता-पिता। तब पेंटल ने कहां की मेरे एक जानने वाले के यहां इस की लड़की की
शादी की बात चल रही थी। उन्होंने मुझे पत्र लिख का पूछताछ की है। भला आप तो जानते
है, रिश्तेदारी का मामला है। उन्हें भी मना नहीं किया जा सकता। और यहां शहर
में यूं रिश्ते का पता लगाना कोई बच्चों का खोल तो नहीं है।
मैं जब से इन लोगों
को सब्जी दे रहा हूं। पैसे के मामले में नौकर चाकर अच्छे है मालकिन भी कभी-कभी
सब्जी या फल लेने आ जाती है। मुझे तो भले आदमी लगते है। परंतु दो साल भर पहले करीब
इनके यहां एक हादसा हुआ था। लड़की के दिमाग में चोट आई थी। वह सब भूल-भाल गई थी। फिर
इलाज कराया तो ठीक हो गई। परंतु अब तो एक दम से ठीक है कभी-कभी जब देखता हूं तो वह
काफी सीधी साधी और सरल दिखती है। देखो बाबू एक बात हम आपको अनुभव से कहते है। जो
मालिक अपने नौकर से या सब्जी फल वाले से जैसे बात करता है, उस
का चरित्र उसी से झलक जाता है। लड़की बात तो कम ही करती है। परंतु नौकर चाकरों को
इज्जत से बोलती है। कभी-कभी कोई फल लेना होता तो राम लाल को आवाज दे बोलती है राम
लाल काका जरा अच्छे-अच्छे कुछ सेब भी खरीद लेना। तब वह कहता अच्छा बेटी जरूर। नौकर
जब बेटी कह कर पुकारता है तो आप समझ लो की वह कितने विश्वास और प्रेम से वहां पर
रहता है।
इसी तरह से बात कर
पेंटल ने घर परिवार के बारे में जानने की कोशिश की। कुछ-कुछ तो पता चला। उसने कहां
आप से बात कर आज अपने देश की मिट्टी की सुगंध आ गई। कितनी मीठी भाषा है अपने
जौनपुर की। अच्छा बाबू राम-राम फिर मिलते है। तब सब्जी वाले ने पेंटल से विदा चाही
की अभी तो आधे घर भी नहीं किए है और सर पर धूप चढ़ गई। रात को बुखार हो गया था
इसलिए चलने में भी देर हो गई इसलिए यहां पल भर के विश्राम करने के लिए इस छाव में
रूक गया सो आपसे मुलाकात हो गई।
इस काम को करने के
लिए पेंटल समझ गया था,
की उसके काम में अभी समय लगेगा। जानकारी तो मिली परंतु जानकारी से
मुलाकात तो नहीं हो सकती। सो पता लगना होगा। कि किस समय वह लड़की घर से बहार
निकलती है कहां जाती है। तब उसे पूरा दिन यहीं पर रुकना होगा। जो अति कठिन कार्य
था। तब एक दम से उसके दिमाग में विचार आय की क्यों न मंदिर में जा कर थोड़ा इंतजार
करूं या पंडित जी से भी कुछ बात चीत की जाये। पेंटल मंदिर के एक कोने में बैठ जाकर
गया। तब अचानक उसे एक लड़की पूजा का थाल लिए आती हुई नजर आई। उसके मस्तिष्क ने
कहां कही ये वो ही तो नहीं है। परंतु ऐसा होना हजार में से एक का होना समझो। फिर
भी उसने भगवान के सामने हाथ जोड़े और कहां की तू ही सब जानता है। अगर हम सच्चे है
और हमारी नियत में खोट नहीं है तो तू ही मार्ग दिखा। काफी सुंदर थी वह लड़की।
कपड़े पहनावे से तो वह सुशील और समझदार लड़की लग रही थी। परंतु एक बात थी उसे वह
सूरत कुछ जानी पहचानी भी लगी। कहां देखा है या उसका भ्रम था। काफी देर वह मंदिर
में बैठ कर पूजा करती रही। और जब जाने लगी तो पेंटल के सामने आ कर खड़ी हो गई।
पेंटल आँख बंद किए हुए ध्यान कर रहा था।
तभी उसे किसी के
पास होने का अहसास हुआ। देखा तो वही लड़की सामने खड़ी है। और उसने प्रसाद पेंटल की
और बढ़ा दिया। कुछ पल के लिए तो लगा की ये एक स्वप्न है। परंतु सच ही उसने जैसे ही
दोनों हाथ आगे बढ़ाये उसमें प्रसाद रख दिया। पेंटल ने प्रसाद को माथे से लगाया और
धन्यवाद के लिए गर्दन झुका दी। अब गोर से देखने में उसकी शक्ल एक दम से जानी
पहचानी सी लग रही थी। परंतु कोठे पर तो जब उसने उसे देखा तो उसका रूप सिंगार ही
अलग था। कपड़े भी हमारे परिचय में कितना विभेद पैदा कर देते है। परंतु अब वह एक
समझदार महिला लग रही थी। प्रसाद दे कर वह मंदिर की सीढ़ियां उतर कर चल दी। अब
पेंटल को याद आ रहा था अरे ये तो वही लड़की है। परंतु इतनी देर में वह मंदिर में
भगवान के सामने सर झुका कर जल्दी से बाहर आया वह लड़की आंखों से ओझल हो गई थी। वह
सड़क पर तेजी से चला की पीछा कर के पता लगा लिया जाये की यह उसी घर में जाती है कि
नहीं।
परंतु वह हार गया।
उस लड़की का उसे कोई पता नहीं चला। वह अचानक इतनी जल्दी कहां चली गई। अब पेंटल
पछता रहा था। कि उसने उससे बात ही क्यों न कर ली। परंतु वह पक्का नहीं कर पा रहा
था की ये वही लड़की है या नहीं। परंतु पक्का तो अब भी नहीं हुआ। परंतु किनारे पर
पहुंच कर आदमी कैसे हारता है। अब पेंटल महसूस कर रहा था। वह उसी पुलिया पर जाकर
बैठ गया। और अपनी मंद बुद्धि पर पछता रहा था। परंतु अचानक एक दम से उसे वह कैसे
पहचानता उसने तो उसे देखा जरूर था। परंतु गौर से नहीं देखा था। एक उड़ती ही नजर से
देखा था।
चलों फिर अगले
हफ्ते मिलने का इंतजार करते है। ये सोच कर वह घर की और चल दिया परंतु आज उसके कदम
भारी थे। जब मनुष्य किनारे पर आ कर हार जाता है तब वह अधिक टूट जाता है। एक आस
उम्मीद जो अभी सामने दिखाई दे रही थी। पल में कहीं गायब हो जाती है। वो आस उम्मीद
हमें थकने नहीं देती नहीं देती। पर ये मन
हमारा बहुत पाजी है। वह तो आदमी को कभी चेन से बैठने नहीं देता। वह तो कहता है अब
बस बहुत हुआ ये नहीं हो सकता।

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