(सदमा - उपन्यास)
गाड़ी समय से एक दम दादर स्टेशन पर रूकी। उसके पास कोई अधिक सामान तो था नहीं के अच्छी बुरी यादें ही थी। जिनका वज़न न के बराबर था। बस एक ह्रदय में दर्द था। की अगर वह कुछ दिन और रूक सकता तो कितना ही अच्छा होता। परंतु वह क्या कर सकता था, पहले ही वह इतनी अधिक छुट्टी कर चूका है अब और की गुंजाइश नहीं थी। देखो अब कितने दिनों में समय निकाल कर वह उस लड़की का पता ठिकाना ढूंढ पता है। आसमान पर अभी सूर्य का उदय नहीं हुआ था। परंतु उसकी लालिमा ने सारे अंबर को लाल रंग दिया था। स्टेशन पर अधिक भीड़ नहीं थी बस कुछ पक्षियों के मधुर नाद गुंज रहे थे। दूर स्टेशन से घोषणा हो रही है की कौन सी गाड़ी किस स्टेशन पर आई है और कितनी देर रुकेगी। कितने दिनों बाद उसने अपनी मात्र भूमि पर पैर रखा है। कितनी अंजानी ही बन जाती है ये पृथ्वी ये जगह आप इससे कुछ देर के लिए अलग हो कर जब वापस आते हो। कैसे अजनबी जैसा व्यवहार करती है। तो जब हम एक मनुष्य से भी काफी दिनों बात मिलते है तब वहां भी तो कैसा अनबोला सा व्यवहार बीच में आ कर खड़ा हो जाता है। अपने घर की वह सड़क ले लो या वह दरवाजा जिस को आपने हजारों बार छू-पकड़ कर खोला है। वह भी जब आप इतने दिनों में आते हो तो कैसा पराया-पराया सा लगता है। मानो अब वह भी आप से रूठ गया है।
तब आप डरे सहमे से
किस तरह से अपराध भाव से उसे खोलते हो। मानो अगर आपने उसे जारा और अधिक जोर से
पकड़ा तो वह आपसे फिर कभी बात-चीत भी नहीं करेगा। वही अपना पलंग वही कुर्सी कैसे
आज आप से बात तक नहीं करना चाहती सी लगती है। और कुछ समय बाद ही वह कैसे आप में
घुल मिल कर सब भुल अपने पन का भाव लिए आपका स्वागत करती सी दिखती है। सामान हो या
स्थान वह भी अपने में एक पूर्णता समेटे चलता है अपने साथ। घर पहुंच कर अपने सामान
को एक और रख कर उसने पहले तो सोचा चाय बना ली जाये परंतु घर में तो दूध ही नहीं
था। पास की दुकान तो अभी खुल गई होगी। परंतु पेंटल का अब घर से बाहर जाने का जरा
भी मन नहीं था। मानो उसके ह्रदय के ताले इस घर ने अब बंद कर दिये है। तब उसने एक
मस्त ब्लैक कॉफी बना कर पीने की सोची। और उसने कॉफी पीने के बाद कपड़े उतार कर
नहाने की तैयारी की। नहा कर वह बहार निकला और उसने सोचा नाश्ता तो अब क्या करना
पहले दूध और दही तो ले ही आता हूं। और वह चप्पल पहन कर पास की दुकान तक गया। पचास
कदम की ही दूरी पर थी दूध की दुकान थी। उसने दुकान जब पर ब्रेड को देखा तो उसे याद
आया की एक ब्रेड भी साथ ले ली जाये तो अच्छा रहेगा। आज कितने दिनों बाद उसे दफ्तर
जाना था। उसने कपड़े पहने और दो ब्रेड टोस्ट में लगा कर दूध गर्म किया। बस हो गया
आज का नाश्ता। अपना बैग उठा कर ताला लगा कर वह दफ्तर की और चल दिया। अभी दफ्तर
जाने का समय नहीं हुआ था फिर उसने सोचा की एक तो रेलवे पास को रिन्यू भी कराना है।
फिर भिड़ हो जायेगी और इस समय रेल गाड़ियां कुछ हल्की ही मिलेंगी। और कुछ देर पहले
ही जाना चाहता था वह अपने दफ्तर में। ज्यादा दिन की छुट्टियों के बाद एक हिचक सी
होती है। अपने जाने पहचाने स्थान पर जाने के लिए।
वह जब दफ्तर पहुंचा
तो सफाई हो रही थी। और वह इस बीच कैंटीन में जाकर एक चाय का आनंद लेने लगा। जब वह
अपनी सीट पर आया तो उसके और साथी आ कर अपनी-अपनी सीट पर बैठ कर काम सम्हाल रहे थे।
उसने भी उनसे हाथ मिला कर मुलाकात की और दफ्तर का हाल चाल पूछा। दोस्त कहने लगे की
यार तुम तो ऐसे गायब हुए की जैसे गधे के सर से सींग। कहां चले गए थे।
पेंटल—क्या बतलाऊँ
एक दोस्त था ऊटी का उसके साथ कुछ ऐसा हादसा हुआ की कह नहीं सकता। एक तो उसके एक
पैर में फ्रैक्चर आ गया दुसरा वह अपनी याद दास्त खो बैठा है। अब मजबूरी में वहां
दो महीने रुकना पड़ा उसका कोई है भी नहीं बस एक बूढ़ी नानी है यानि की जिस के साथ
वह रहता है। अब वह बेचारी इस उम्र में कहां सम्हाल पाती, ये
तो अच्छा हुआ की समय पर में वहां पहुंच गया। और उसकी देखभाल करने में नानी की मदद
करने लगा। परंतु अब वह चल फिर लेता है। बाकी दिमाग के बारे में तो कहा नहीं जा
सकता की वह कब ठीक होगा भी या नहीं। ये तो समय या फिर राम ही जानता है।
सब दोस्तों ने इस
दूख में पेंटल का साथ दिया की चलो दोस्त-दोस्त के ही तो काम आता है। प्रकृति ने
तुम्हें कैसे अचानक वहां भेज दिया। सब अपने-अपने काम में लग गए। अब पेंटल को समझ
नहीं आ रहा था की कहां से काम शुरू करें। क्योंकि तीन महीने के पैंड़िग फाइलें
उसका इंतजार कर रही थी। उसके साथियों ने उसकी कुछ मदद की और कहां की कुछ जो फाइलें
तेरे बिना चल सकती थी वह तो हमने पूरी कर के साहब को भेज दी। बाकी जो जरूरी है। वह
तो तेरे को ही देखनी है।
अब बिना देरी के
पेंटल अपने काम पर लग गया। चाय का विश्राम भी उसने लेने से मना कर दिया की मैं जब
आया था तब चाय पी ली थी अब मन नहीं है। और वह काम करता रहा। इस बीच बड़े साहब ने
उसे अंदर आफिस में बुलाया। और कहां की वहां सब ठीक है। तब पेंटल ने कहां नहीं सर
दोस्त की हालत बहुत खराब थी। एक सदमे में वह अपनी सारी याद दास्त खो बैठा। साहब ने
कहा-वहीं दोस्त जो पिछले दिनों तेरे साथ आया था। यानी वही स्कूल टीचर। तब साहब ने
भी अचरज से पूछा की उसे क्या हुआ वह तो बहुत समझदार लगता था। बात करने में तो नहीं
लगता की वह इस बीमारी का शिकार हो सकता है।
दफ्तर के साहब ने
समझा वह डिप्रेशन में चला गया। नहीं सर एक वह तो बहुत सरल है। तब उसने सारी बात
अपने साहब को बतलाई। और कहां की अब में उसकी क्या मदद कर सकता हूं। तब साहब ने
कहां वहां तो अब ठीक है पहले इस दफ्तर को तो सम्हालो तेरे बिना कितना काम रुका हुआ
है। उसके बाद बात करते है। हर बीमारी का कोई न कोई हल होता है। तुम घबराओ मत।
सर की इस बात से
पेंटल को थोड़ी राहत मिली। शब्दों में कितनी ताकत होती है। एक शब्द जो आपको एक
साहस देते है दूसरी और ऐसे भी शब्द है जो आपकी हिम्मत को भी तोड़ देते है। इतना सब
होने पर भी समय बहुत तेजी से गुजर रहा था। पेंटल सुबह जल्दी दफ्तर में आता और देर
तक काम करता था। ताकि साहब ने जो उसके लिए किया है। उसे अब और नहीं झेलना पड़े। इस
बीच बस वह कभी-कभी समय निकाल कर फोन की डायरेक्टर को घर ले गया था। वह पर नाम पते
ढूंढते हुए वह फोन नम्बर चाहता था। जे. के. मल्होत्रा ढूंढते हुए कम से कम दस नाम
मिले। उसने दस को ही फोन नम्बर नोट कर लिया।
उसने सोचा की दफ्तर
से कभी वह फोन से बात कर के पता करेगा की कौन सा जे. के. मल्होत्रा है जिसे वह
ढूंढ रहा है। उसने इसके बारे में चार पाँच जे. के. मल्होत्रा को फोन किया। परंतु
सब और से नकारात्मक जवाब आ रहा था। कही जाकर आठवें जे. के . मल्होत्रा के नौकर से
पता चला की उनकी लड़की का नाम नेहालता है। उस डर भी लग रहा था परंतु एक फोन पर
उसके नौकर ने कहां हां बाबू क्या काम है...मेम साहब को बुलाऊं आप कौन बोल रहे है।
और उसने फोन रख दिया। फिर कई बार हिम्मत की कि फोन मिलाऊं परंतु एक दो घंटी बजते
ही वह बंद कर देता और सोचा की क्या बात करेगा। वह कैसे बात करेगा। और कहां से बात
चित की शुरू आत करेगा। और फिर उन्हें क्या गर्ज है की वह इतनी दूर जाये या अपनी
लड़की को भेजे। वे कोई सोम प्रकाश के रिश्तेदार तो नहीं है। तब ये झंझट वे क्यों
मोल ले।
और सच बात भी कुछ
ऐसी ही थी। की माता पिता अपनी जवान लड़की को किसी अंजान के पास क्यों भेजेंगे और
हो सकता है वह फिर बीमार हो जाये। ठीक है उनके प्रति दया भाव आ सकता है। परंतु
जीवन का एक रिस्क भी तो है। ये पेंटल अच्छी तरह से जानता है की ये बात कोई फोन पर
नहीं की जा सकती। इसके लिए तो एक माहोल बनाना होगा। और उसके लिए समय चाहिए। अगर वह
अकेली लड़की से बात करें तो बात बनने की संभावना अधिक हो जाति है। क्योंकि वह उसकी
संवेदना को जगा सकता है। मेरे दोस्त ने तो तुम्हारी लिये अच्छा किया। अब वह लाचार
है। जब तुम लाचार थी तो उसने तुम्हारी मदद की। हां मैं जानता हूं इस में तुम्हारा
कोई कसूर नहीं है,
परंतु तुम उसकी मदद तो कर सकती हो। नहीं तो एक बार उसे देख कर थोड़ी
संतावना तो दे सकती हो।
इस सब की तैयार वह
मन ही मन कर रहा था। और समय का इंतजार कर रहा था। ऊटी से उसे आये करीब दो महीने से
अधिक हो गये थे। दिसम्बर से अब फरवरी चल रहा है। दफ्तर का काम भी उसने अब लगभग
सारा समेट लिया है। अब उसके पास श्याम को नहीं तो कम से कम इतवार को तो पूरा दिन
रहता है।
एक इतवार उसने जो
पता लिख था,
उस पर जाने के लिए समय निकाला। कि चलो चल कर देखते है। वही
आमने-सामने बात होगी तो ही कुछ हो सकता है। फाने पर तो बनने की बजाए बिगड़ने की
संभावना अधिक है। मन में कहीं उधेड़ बून और भय भी था। की एक अंजान लड़की से वह
कैसे इतनी बड़ी बात पहली ही मुलाकात में कर सकता है। तब सोनी की याद आई की अगर
सोनी साथ हाथी तो उसे कितना सहयोग मिलता। परंतु जो नहीं हो सकता उसके बारे में
सोचने से भला क्या लाभ हो सकता है। ये बस तो उसे अकेले ही करना होगा। क्योंकि
मीलों दूर उसका वह दोस्त एक पीड़ा एक यातना झेल रहा है।

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