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शनिवार, 21 फ़रवरी 2015

कृष्‍ण--स्‍मृति--(प्रवचन--14)


अकर्म के पूर्ण प्रतीक कृष्ण—(प्रवचन—चौदहवां)

दिनांक 2 अक्‍टूबर, 1970;
प्रात:, मनाली (कुलू)


"आपने कहा है कि श्रीकृष्ण के मार्ग में कोई साधना नहीं है। केवल "सेल्फ रिमेंबरिंग', पुनरात्मस्मरण है। लेकिन, आप सात शरीरों की साधना की बात करते हैं। तो सात शरीरों के संदर्भ में कृष्ण की साधना की रूपरेखा क्या होगी, कृपया इसे स्पष्ट करें।'

कृष्ण के विचार-दर्शन में साधना की कोई जगह ही नहीं है। इसलिए सात शरीरों का भी कोई उपाय नहीं है। साधना के मार्ग पर जो मील के पत्थर मिलते हैं, वे उपासना के मार्ग पर नहीं मिलते हैं। साधना मनुष्य को जिस भांति विभाजित करती है, उस तरह उपासना नहीं करती। साधना सीढ़ियां बनाती है, इसलिए आदमी के व्यक्तित्व को सात हिस्सों में तोड़ती है। फिर एक-एक सीढ़ी चढ़ने की व्यवस्था करती है। लेकिन उपासना आदमी के व्यक्तित्व को तोड़ती ही नहीं। कोई खंड नहीं बनाती। मनुष्य का जैसा अखंड व्यक्तित्व है, उस पूरे को ही उपासना में लीन कर देती है।

इसलिए साधकों ने तो बहुत-सी सीढ़ियां बनाई हैं, बहुत-से मील के पत्थर लगाए हैं, बहुत-बहुत विभाजन किए हैं--सप्त शरीरों में विभाजन किया है मनुष्य के व्यक्तित्व का, सात चक्रों में विभाजन किया है मनुष्य के व्यक्तित्व का, तीन हिस्सों में विभाजन किया है मनुष्य के व्यक्तित्व का; अलग-अलग साधकों ने मनुष्य के व्यक्तित्व को अलग-अलग सीढ़ियों में बांटकर साधना की है, लेकिन उपासना के जगत में कोई विभाजन नहीं है। वहां मनुष्य जैसा है, उस पूरे ही मनुष्य को सिर्फ स्मरण करना है। स्मरण खंड-खंड नहीं होता, साधना खंड-खंड हो सकती है। किसी आदमी को स्मरण ऐसा नहीं आता कि मैं थोड़ा परमात्मा हूं और थोड़ा नहीं हूं। जब आता है तो पूरा आता है, अन्यथा नहीं आता है।
स्मरण की प्रक्रिया ही अलग है। स्मरण की प्रक्रिया "सडन' है, "ग्रेजुअल' नहीं है। स्मरण पूरा-का-पूरा एक ही छलांग में घटित होता है। स्मरण एक विस्फोट है। साधना का एक क्रम है, स्मरण का कोई क्रम नहीं है। जैसे उदाहरण के लिए ऐसा समझें--आपको किसी का नाम पक्की तरह मालूम है। वक्त पड़ा है और याद नहीं आ रहा है। और आप कहते हैं ओंठ पर रखा है, जीभ पर रखा है। बड़े मजे की बात आप कहते हैं। कहते हैं, जीभ पर रखा है और याद नहीं आ रहा है। असल में दोनों बातें आपको याद आ रही हैं कि मुझे याद भी है और याद नहीं भी आ रहा है। बड़ी असमंजस की स्थिति है। आपको मालूम है कि मालूम है, आपको भलीभांति पता है कि पता है, लेकिन याद नहीं आ रहा है। विस्मरण का मतलब ही यही है कि जो याद है और याद नहीं आ रहा है। मन के किसी गहरे तल को पता है कि याद है, लेकिन मन के ऊपरी तल तक खबर नहीं पहुंच पा रही। बीच में सेतु नहीं बन पा रहा। गहरा मन कहता है कि मालूम है, लेकिन उथला मन कहता है कि मुझ तक खबर नहीं आ रही। इसलिए हम कहते हैं कि जीभ पर रखा है लेकिन याद नहीं आ रहा है। दोनों बातें एकसाथ याद आ रही हैं। मालूम है, यह भी याद आ रहा है, याद नहीं आ रहा है, यह भी मालूम हो रहा है।
फिर आप क्या करते हैं?
फिर आप बड़ी कोशिश करते हैं। फिर हजार उपाय करते हैं। सिर पर बल दे देते हैं, मुट्ठियां कस लेते हैं, सब तरह से खोजते हैं, बीनते हैं, और जितना खोजते हैं उतना ही पाते हैं कि याद नहीं आ रहा है। जितना खोजते हैं, उतना ही पाते हैं कि याद आना मुश्किल हुआ जा रहा है। क्यों? क्योंकि जितना आप खोजते हैं उतना ही आप "टेंस' और तनाव से भर जाते हैं। और जितना तनाव से भर जाते हैं उतना ही आपके गहरे मन और आपका संबंध टूट जाता है। तनाव से भरा हुआ मन खंडित हो जाता है, शांत मन इकट्ठा हो जाता है। जितना आप कोशिश करते हैं कि याद करूं, याद करूं, उतना आप मुश्किल में पड़ते हैं। क्योंकि जो आदमी यह कह रहा है कि मैं याद करूं, वह साथ ही यह भी स्मरण में रखे हुए है कि मुझे याद नहीं आ रहा है। ये दोहरे सुझाव उसको एकसाथ मिल रहे हैं। बार-बार कह रहा है कि याद करूं और बार-बार जान रहा है कि याद नहीं आ रहा है, तो उसका आत्मविश्वास कम होता जा रहा है। और मन तनता जा रहा है। वह याद नहीं कर पाएगा। फिर उस आदमी ने कहा कि जाने दो। नहीं आता याद तो जाने दो। वह आदमी बैठकर सिगरेट पीने लगा है, या बगिया में काम करने लगा है, या रेडियो खोलकर सुनने लगा है, या अखबार पढ़ने लगा, और अचानक याद आ गया है। और जब ऐसा याद आता है, तो कभी आधा याद आता है? बस पूरा याद आ जाता है।
क्यों? इस आकस्मिक अत्तनाव की हालत में, "रिलेक्सेशन' की हालत में क्यों याद आ गया? तनाव मिट गया है, आपने याद करने की बात छोड़ दी, दोनों मन जो टूटे थे--याद करने वाला और जिसे याद था, वे दोनों लड़ रहे थे; याद करने वाला कहता था, याद आना चाहिए और तना हुआ था, वही बाधा थी, वही तनाव था। वह छूट गया। आप बगिया में काम कर रहे हैं, या अखबार पढ़ रहे हैं, या रेडियो सुनने लगे हैं और अचानक याद आ गया है। जो कोशिश से याद नहीं आया था, वह अचानक याद आ गया। जो प्रयास से नहीं खोजा जा सका था, वह अप्रयास में उपलब्ध हो गया है। लेकिन जब यह याद आती है तो अधूरी नहीं आती, बस पूरा ही आ जाता है। क्योंकि पूरा ही आपको मालूम है।
यह मैंने उदाहरण के लिए कहा। यह हमारी सामान्य स्मृति की बात है। इस स्मृति में मन के दो हिस्से काम करते हैं। जिसको हम "कांशस माइंड' कहते हैं, वह; जिसको हम "अनकांशस माइंड' कहते हैं, वह--हमारा चेतन मन और हमारा अचेतन मन। इसे हम ऐसा समझ ले सकते हैं कि चेतन मन हमारे मन का वह हिस्सा है, जिससे हम चौबीस घंटे काम लेते हैं। अचेतन मन हमारे मन का वह हिस्सा है, जिससे हमें कभी-कभी काम लेना पड़ता है, चौबीस घंटे काम नहीं लेते। चेतन मन हमारा प्रकाशित मन है, अचेतन मन हमारा अंधकार में डूबा मन है। यह जो स्मृति का मैंने उदाहरण लिया, यह अचेतन में दबी है और चेतन याद करने की कोशिश कर रहा है। चेतन अचेतन के खिलाफ लड़ रहा है। जब तक लड़ेगा तब तक याद नहीं आएगा। जैसे ही लड़ाई छोड़ेगा, दोनों मिल जाएंगे और याद आ जाएगा। और जो अचेतन के द्वार पर खड़ा था, बिलकुल चेतन में प्रवेश करने को, उसी को आप कह रहे थे कि जीभ पर रखा है।
परमात्मा की स्मृति, या आत्मस्मृति, या "सेल्फ रिमेंबरिंग' और गहरी बात है। वह अचेतन में नहीं दबा है। उसके नीचे एक और अचेतन मन है, जिसको हम "कलेक्टिव अनकांशस' कहें--हम सबका सामूहिक अचेतन मन। इसे ऐसा समझें कि चेतन मन है हमारा ऊपर का प्रकाशित हिस्सा, उसके नीचे दबा हुआ हमारा अचेतन मन है--हमारा ही व्यक्तिगत अंधेरे में दबा हिस्सा--उसके नीचे हम सबका समूह-मन है, वह भी अंधेरे में दबा। और उसके भी नीचे "कॉज्म?िक अनकांशस' है, जो समस्त जगत, समस्त जीवन, समस्तता का अंधकार में डूबा हुआ मन है। परमात्मा की स्मृति उस "कॉज्म?िक अनकांशस' में, समष्टि-अचेतन में दबी पड़ी है। तो स्मरण का कुल मतलब इतना ही है कि हम अपने भीतर इतने एक हो जाएं कि न केवल अपने अचेतन से जुड़ जाएं, समूह-अचेतन से जुड़ जाएं बल्कि उसके नीचे समष्टि-अचेतन से जुड़ जाएं।
अब जैसे उदाहरण के लिए, अब आप ध्यान में बैठते हैं, तो जब ध्यान की गहराई आती है, तो पहले तो आप व्यक्ति-अचेतन में उतरते हैं। आप रोने लगते हैं, हंसने लगते हैं; कोई रोता है, कोई हंसता है, कोई नाचता है, कोई डोलता है, यह आपके व्यक्ति-अचेतन में दबी हुई क्रियाएं प्रकट होती हैं। लेकिन दस मिनट पूरे होते-होते आप व्यक्ति नहीं रह जाते, आप एक "कलेक्टिविटी' हो जाते हैं। आप अलग-अलग नहीं रह जाते। जो गहरे उतर जाते हैं, वे समूह-अचेतन में उतर जाते हैं। फिर उस क्षण में उन्हें ऐसा नहीं लगता कि मैं नाच रहा हूं, उस वक्त ऐसा ही लगता है कि नाच चल रहा है और मैं एक हिस्सा हो गया हूं। उस वक्त उन्हें ऐसा नहीं लगता है कि मैं हंस रहा हूं, उस वक्त ऐसा ही लगता है कि हंसी फूट रही है और मैं भी भागीदार हूं। उस वक्त ऐसा नहीं लगता है कि मैं हूं, बल्कि ऐसा लगता है कि सब कुछ नाच रहा है, सारा जगत नाच रहा है। चांदत्तारे नाच रहे हैं, पौधे-पक्षी नाच रहे हैं, आसपास जो भी है, कण-कण, वह सभी नाच रहा है। उस नाचने के हम एक हिस्से हो गए हैं। तब आप "कलेक्टिव अनकांशस' में उतर गए। तब आप समूह-अचेतन में उतर गए।
उसके भी नीचे दबा हुआ "कॉज्म?िक अनकांशस' है। उसमें जिस दिन आप उतर जाएंगे--यह "कलेक्टिव' से ही उतरेंगे; यह समूह-चित्त जब और-और गहरा होता जाएगा तब आपको यह भी पता नहीं चलेगा कि सब नाच रहे हैं और मैं एक हिस्सा हूं, आपको यह भी पता नहीं चलेगा कि मैं हिस्सा हूं, आपको यही पता चलेगा कि सब और मैं एक ही हूं। हिस्सा भी नहीं हूं। "टोटल' का मैं एक भाग नहीं हूं, मैं ही "टोटल' हूं। जिस क्षण ऐसी प्रतीति होगी उसी क्षण "कॉज्म?िक अनकांशस' से तीर की तरह कोई स्मरण आपके चेतन मन तक उठकर आ जाता है। उस वक्त आपको स्मरण होता है कि मैंने तो जाना जो मुझे पता ही था कि मैं कौन हूं। मैं ब्रह्म हूं। अहं ब्रह्मास्मि का बोध उस क्षण में आपके चेतन तक फैल जाता है। यह जो स्मरण की प्रक्रिया है, यह मैंने चार हिस्सों में बांटी आपको समझाने के लिए। कृष्ण इसको बांटते ही नहीं। यह समझाने के लिए बांटा कि आपको कठिन होगा। ये अलग-अलग चार चीजें नहीं हैं, यह एक ही चीज का फैलाव है, गहरे और गहरे, और गहरे। और जितना गहरा होता है, उतना हम खंड को अलग नाम दे रहे हैं।
हमारे बहुत गहरे में हमें पता ही है कि हम परमात्मा हैं। हमें परमात्मा होना नहीं है, सिर्फ "डिस्कवर' करना है, सिर्फ आविष्कार करना है, उघाड?ना है। ऋषि कहते हैं उपनिषद में कि स्वर्ण-पात्र से ढंका है जो सत्य, तू उसे उघाड़ दे। वह जो ढंका है उसे तू उघाड़ दे। परमात्मा होना हमारी उपलब्धि नहीं है, सिर्फ उघाड़ना है, "अनकवर' होना है। कुछ जो ढंका है, वह उघड़ जाए। किससे ढंका है? हमारी ही विस्मृति से ढंका है। हम अपने मन के बिलकुल अग्रिम भाग में जी रहे हैं, जैसे कोई बड़े भवन में रहता हो, और अपनी दहलान में जीता हो। और धीरे-धीरे दहलान में ही पैदा हुआ हो, दहलान में ही बड़ा हुआ हो, दहलान में ही जीआ हो और भूल ही गया हो, उसे पता ही न हो कि उसका बड़ा भवन भी है। उसे पता ही न हो, वह दहलान में जी लेता हो, सो जाता हो, काम करता हो, खाता हो, पीता हो और उसे याद ही न हो कि एक बड़ा भवन भी है उस दहलान से जुड़ा हुआ। असल में कोई दहलान अकेली नहीं होती। कभी देखी है कोई दहलान अकेली? दहलान किसी बड़े भवन का हिस्सा ही होती है। उस बड़े भवन का हमें कोई पता नहीं है। हम अपने चेतन मन में ही जी रहे हैं, वह हमारी दहलान है। वह हमारा सिर्फ बाहर का हिस्सा है जहां छपरी पड़ती है। इससे ज्यादा नहीं है। लेकिन हमें कोई पता नहीं भीतर का। उस भीतर का भी हमारे बहुत गहरे में स्मरण है पर उस भीतर की अपनी गहराई में भी हम नहीं उतरे हैं। इस भीतर की गहराई में उतर जाना खंड में नहीं होगा। चर्चा और समझाना खंड में होगा।
साधना के मार्ग से जो चलते हैं, वे एक-एक खंड को साधने की कोशिश करते हैं। कृष्ण कहते ही इतना हैं कि तुम परमात्मा हो, इसे स्मरण करना है। इसलिए उपनिषद बार-बार कहते हैं, स्मरण करो, स्मरण करो। सिर्फ "रिमेंबर' करना है कि कौन हैं हम। यह हम भूल गए हैं, यह हमने खो नहीं दिया है। यह कुछ ऐसा भी नहीं है कि हमारा कोई भविष्य है, जो हमें होना है। सिर्फ विस्मरण है। बहुत बात बदल जाती है। साधना में सिर्फ विस्मरण नहीं है, साधना के खयाल में कोई चीज खोजी गई है, या कोई चीज अभी हुई ही नहीं है जो होने वाली है। या साधना के क्रम में कुछ चीज गलत जुड़ गई है जिसे काटना होगा, अलग करना होगा। स्मरण की प्रक्रिया में न कुछ काटना है, न कुछ अलग करना है, न कुछ गलत जुड़ गया है, न हमें कुछ होना है, न हम अन्यथा हो गए हैं, हम जो हैं वह हैं, सिर्फ विस्मरण है। बस विस्मरण के अतिरिक्त और कोई पर्दा नहीं है।
कृष्ण का सारा-का-सारा आधार उपासना का है और उपासना का सारा आधार स्मरण का है। लेकिन भूल गए उपासक स्मरण को। उसकी जगह उन्होंने सुमिरन शुरू कर दिया। स्मरण को भूल गए, अब वे सुमिरन कर रहे हैं! बैठे हैं और राम-राम जप रहे हैं। राम-राम जपने से याद न आएगा कि मैं राम हूं। स्मरण शब्द धीरे-धीरे सुमिरन बन गया। स्मृति शब्द धीरे-धीरे सुरति बन गया। और उस शब्द के दूसरे ही "कनोटेशन' और दूसरे ही अर्थ हो गए। एक आदमी बैठकर अगर यह भी दोहराता रहे कि मैं परमात्मा हूं, मैं परमात्मा हूं, तो भी कोई हल न होगा। यह दोहराने से हल न होगा। इसके दोहराने से, "रिपीटीशन' से कोई वास्ता नहीं है। इससे भ्रम भी पैदा हो सकता है कि वह आदमी नीचे तो उतर ही न पाए और चेतन मन में ही समझने लगे कि मैं परमात्मा हूं और भीतर के तलों का उसे कोई बोध ही न हो।
इसलिए स्मरण की क्या होगी प्रक्रिया? क्या होगा मार्ग? क्या होगा द्वार? मेरे देखे अगर आप शांत और शून्य सिर्फ बैठ जाएं, कुछ न करें--आपका कुछ भी करना बाधा बनेगा। असल में करने से हम वह पा सकते हैं जो हम नहीं हैं। करने से वह मिल सकता है जो हमारे पास नहीं है। इसलिए स्मरण का बहुत गहरा अर्थ तो "टोटल इनएक्टिविटी' है, अकर्म है। इसलिए कृष्ण बहुत जोर देते हैं अकर्म पर। वह निरंतर कहे जाते हैं, अकर्म। गहरे में अकर्म, "नो एक्टिविटी'। जैसा मैंने आपसे कहा कि छोटी-सी चीज भी भूल जाते हैं, तो जब तक आप "एक्टिवली' उसको याद करने की कोशिश करते हैं, नहीं कर पाते हैं, लेकिन जब आप उस हिस्से को छोड़ देते हैं और उस हिस्से में "इनएक्टिव' हो जाते हैं, अकर्म में हो जाते हैं, तब वह स्मरण आ जाता है। अगर हम "टोटल इनएक्टिविटी' में हो जाएं तो वह जो कॉज्म?िक अनकांशस' में है, वह जो ब्रह्मांड-अचेतन में पड़ा है, वह एकदम तीर की तरह उठता है। जैसे बीज फूटता है अंकुर की तरह, ऐसे ही हमारे चित्त के किसी गहरे से बीज टूटता है और एक अंकुर उठकर हमारे चेतन मन के प्रकाश तक आ जाता है, और हम जानते हैं कि हम कौन हैं। अकर्म है सूत्र। साधना में सदा कर्म है सूत्र। साधना में सदा क्रिया है मार्ग। उपासना में सदा अक्रिया है द्वार, अकर्म है मार्ग।
कृष्ण के इस अकर्म को थोड़ा ठीक से समझ लेना अच्छा होगा। क्योंकि मैं मानता हूं कि इसे ठीक से नहीं समझा जा सका। इसे समझना बहुत मुश्किल था। क्योंकि जिन लोगों ने कृष्ण पर टीकाएं लिखी हैं और जिन लोगों ने कृष्ण की व्याख्या की है, उनकी किसी की भी पकड़ में अकर्म नहीं बैठ सका। या तो अकर्म का मतलब उन्होंने समझा कि संसार छोड़कर भाग जाओ। लेकिन छोड़कर भागना एक कर्म है। छोड़ना एक कर्म है, एक कृत्य है। अकर्म का निरंतर यही मतलब समझा गया कि तुम कुछ भी मत करो। दुकान मत करो, काम मत करो, गृहस्थी मत करो, प्रेम मत करो, भाग जाओ सब छोड़कर। सिर्फ भागना करो। सिर्फ त्यागना करो। लेकिन त्याग उतना ही कर्म है, जितना भोग कर्म है। तो कृष्ण को नहीं समझा जा सका। अकर्म का मतलब छोड़ना, भागना, त्यागना हो गया। हिंदुस्तान की लंबी परंपरा त्याग रही है, छोड़ रही है, भाग रही है। और कोई गौर से नहीं देखता कि कृष्ण बिलकुल भागे हुए नहीं हैं। कभी-कभी हैरानी होती है कि एक लंबी परंपरा भी अंधी हो सकती है। कोई यह नहीं देख रहा है कि जो आदमी अकर्म की बात कर रहा है, वह गहन कर्म में खड़ा हुआ है। इसलिए भागना उसका अर्थ हो नहीं सकता।
कृष्ण तीन शब्दों का प्रयोग करते हैं--अकर्म, कर्म और विकर्म। कर्म वे उसे कहते हैं, सिर्फ करने को ही कर्म नहीं कहते। अगर करने को ही कर्म कहें, तब तो अकर्म में कोई जा ही नहीं सकता। फिर तो अकर्म हो ही नहीं सकता। कर्म को कृष्ण ऐसा करना कहते हैं जिसमें कर्ता का भाव है। जिसमें करने वाले को यह खयाल है कि मैं कर रहा हूं। मैं कर्ता हूं। "इगोसेंट्रिक' कर्म को वे कर्म कहते हैं। ऐसे कर्म को, जिसमें कर्ता मौजूद है। जिसमें कर्ता यह खयाल करके ही कर रहा है कि करने वाला मैं हूं। जब तक मैं करने वाला हूं, तब तक हम जो भी करेंगे वह कर्म है। अगर मैं संन्यास ले रहा हूं, तो संन्यास एक कर्म हो गया। अगर मैं त्याग कर रहा हूं, तो त्याग एक कर्म हो गया।
अकर्म का मतलब ठीक उलटा है। अकर्म का मतलब है ऐसा कर्म, जिसमें कर्ता नहीं है। अकर्म का अर्थ, ऐसा कर्म जिसमें कर्ता नहीं है। जिसमें मैं कर रहा हूं, ऐसा कोई बिंदु नहीं है। ऐसा कोई केंद्र नहीं है जहां से यह भाव उठता है कि मैं कर रहा हूं। अगर मैं कर रहा हूं, यह खो जाए, तो सभी कर्म अकर्म है। कर्ता खो जाए तो सभी कर्म अकर्म है। इसलिए कृष्ण का कोई कर्म कर्म नहीं है, सभी कर्म अकर्म है।
कर्म और अकर्म के बीच में विकर्म की जगह है। विकर्म का अर्थ है, विशेष कर्म। अकर्म तो कर्म ही नहीं है, कर्म कर्म है; विकर्म का अर्थ है, विशेष कर्म। इस शब्द को भी ठीक से समझ लेना चाहिए, दोनों के बीच में खड़ा है।
विशेष कर्म किसे कहते हैं कृष्ण? जहां न कर्ता है, और न कर्म। फिर भी चीजें तो होंगी। फिर भी चीजें तो होंगी ही। आदमी श्वास तो लेगा ही। न कर्म है, न कर्ता है। श्वास तो लेगा ही। श्वास कर्म तो है ही। खून तो गति करेगा ही शरीर में। भोजन तो पचेगा ही। ये कहां पड़ेंगे? ये विकर्म हैं। ये मध्य में हैं। यहां न कर्ता है, न कर्म है। साधारण मनुष्य कर्म में है, संन्यासी अकर्म में है, परमात्मा विकर्म में है। वहां न कोई कर्ता है, न कोई कर्म है। वहां चीजें ऐसी ही हो रही हैं, जैसे श्वास चलती है। वहां चीजें बस हो रही हैं। "जस्ट हैपनिंग'
आदमी के जीवन में भी ऐसा थोड़ा कुछ है। वह सब विकर्म है। लेकिन वह परमात्मा के द्वारा ही किया जा रहा है। आप श्वास ले रहे हैं? आप श्वास लेते होंगे, फिर कभी मर न सकेंगे। मौत खड़ी हो जाएगी और आप श्वास लिए चले जाएंगे। या जरा श्वास को रोक कर देखें, तो पता चलेगा कि नहीं रुकती है। होकर रहेगी। जरा श्वास को बाहर ठहरा दें, तो पता चलेगा नहीं मानती है, भीतर जाकर रहेगी। न हम कर रहे हैं, न हम कर्ता हैं, श्वास के मामले में। जीवन की बहुत क्रियायें ऐसी ही हैं। अकर्म में वह आदमी प्रवेश कर जाता है जो विकर्म के इस रहस्य को समझ लेता है। फिर वह कहता है, फिर नाहक मैं क्यों कर्ता बनूं! जब जीवन का सभी महत्वपूर्ण हो रहा है, तो मैं क्यों बोझ लूं? वह बड़ा होशियार आदमी है, वह "वाइज़ मैन' है।
वह इस तरह का आदमी है कि मैंने सुना है कि एक आदमी ट्रेन में सवार हुआ और अपने पेटी-बिस्तर को अपने सिर पर लेकर बैठ गया। पास-पड़ोस के यात्रियों ने उससे कहा कि यह पेटी-बिस्तर सिर पर क्यों लिए हो? इनको नीचे रख दो। उस आदमी ने कहा, ट्रेन पर बहुत वजन पड़ेगा। तो यह सोचकर कि मैं अपने सिर पर रख लूं, थोड़ा वजन मैं भी बंटा लूं। यात्री बहुत हैरान हुए। उन यात्रियों ने कहा, तुम पागल तो नहीं हो? क्योंकि तुम अपने सिर पर रखोगे तो भी ट्रेन पर वजन तो पड़ता ही रहेगा। ट्रेन पर वजन पड़ेगा ही और तुम पर नाहक पड़ेगा। तो वह आदमी हंसने लगा। और उस आदमी ने कहा कि मैं तो समझता था तुम सब संसारी हो, लेकिन तुम संन्यासी मालूम पड़ते हो। मैं तो तुम्हें देखकर यह सिर पर रखे था।
वह आदमी एक संन्यासी था। उसने कहा, मैं तो तुम्हें देखकर ही यह सिर पर रखे था, लेकिन तुम भी हंसते हो? पूरी जिंदगी में तुमने वजन कहां रखा है? अपने सिर पर रखा है, या परमात्मा पर छोड़ दिया है? क्योंकि तुम अपने सिर पर भी रखो तो भी परमात्मा पर ही पड़ता है। यह तुम अपने सिर पर क्यों रखे हो? तो उसने कहा कि मैं तो समझा कि यहां संसारी बैठे हैं, इसलिए इनके ढंग से बैठना चाहिए। मुझे क्या पता था कि यहां संन्यासी बैठे हैं! उसने न केवल नीचे रखा वजन, बल्कि वजन के ऊपर बैठ गया। उसने कहा कि अब मैं अपनी ठीक स्थिति में बैठ सकता हूं। यह मेरा ढंग है। लेकिन सोचकर कि तुम सबको अजीब न लगे।
जो विकर्म को समझ लेगा, वह अकर्म में उतर जाएगा। कर्म हमारी स्थिति है, जैसे हम जी रहे हैं। विकर्म हमारी समझ होगी, अकर्म हमारा होना हो जाएगा।
कृष्ण की साधना, उपासना--जो हम नाम देना चाहें--उसमें गहरे में अकर्म है। आपको कुछ करना नहीं है, जो हो रहा है उसे होने देना है। आपके कर्ता को मिट जाने देना है। जिस दिन आपका कर्ता मिटा कि बीच की दीवाल टूट जाएगी और स्मरण आ जाएगा। कर्ता ही आपकी बाधा है। "द डूअर', वह जो करने वाला है, जो कह रहा है मैं कर रहा हूं, वही पर्त है स्टील की, लोहे की, जिसके नीचे पड़ी दबी है स्मृति। और जब तक आप कर्ता बने रहेंगे तब तक स्मृति नहीं लौटेगी। इसलिए बैठकर राम-राम दोहराने से नहीं होगा, बैठकर यह कहने से कि मैं परमात्मा हूं नहीं होगा, क्योंकि मैं आपसे कहता हूं कि यह आपका कर्ता ही दोहरा रहा है। यह आप ही दोहरा रहे हो, यह आपका कर्ता ही कह रहा है कि मैं हूं। कृपा करके कर्ता को जाने दें।
कैसे जाएगा कर्ता?
विकर्म को समझें। कर्म करते रहें और विकर्म को समझें। कर्म करते रहें और जीवन को समझें। "द वेरी अंडरस्टेंडिंग'। जिंदगी की समझ बताएगी कि मैं क्या कर रहा हूं--न मैं जन्मता हूं, न मैं मरता हूं, न मैं श्वास लेता हूं, न मुझसे कभी किसी ने पूछा कि आप होना चाहते हैं? न मुझसे कोई कभी पूछेगा कि अब जाने का वक्त आ गया, आप जाना चाहते हैं? न मुझसे कोई कभी पूछता कि कब मैं जवान हो जाता हूं, कब बूढ़ा हो जाता हूं। कोई मुझसे पूछ ही नहीं रहा है, मेरा कुछ होना नहीं है। मैं न रहूं तो क्या फर्क पड़ जाएगा! मैं नहीं था तो क्या फर्क था! चांदत्तारे कुछ फीके थे? फूल कुछ कम खिलते थे? पहाड़ कुछ छोटे थे? बादल कुछ गमगीन थे? सूरज कुछ परेशान था? मैं नहीं था तब सब ऐसा था। मैं जब नहीं रहूंगा तब सब ऐसा रहेगा। जैसे पानी पर खींची गई रेखा मिट जाए, ऐसे मैं मिट जाऊंगा। कहीं कुछ फर्क नहीं पड़ेगा। सब ऐसा ही चलता रहेगा। सब ऐसा ही चलता रहा है। तो मैं नाहक यह "मैं' को क्यों ढोऊं? जब मेरे बिना सब ऐसा चलता रहेगा तो मैं भी मेरे बिना क्यों न चल जाऊं। जब मेरे बिना कहीं भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा, तो मैं ही नाहक मुझमें इस "मैं' से क्यों फर्क डालूं।
विकर्म की समझ का नाम प्रज्ञा है। विकर्म की समझ का नाम "विजडम' है। जो विकर्म को समझ लेता, वह सब समझ लेता है। तब कर्म एकदम अकर्म हो जाता है। विकर्म कीमिया है, वह बीच का द्वार है। कर्म से गुजरते वक्त पड़ेगा विकर्म, और अकर्म स्मरण आ जाता है। आपको लाना नहीं पड़ता। जिस स्मरण को आप लाएंगे, वह कर्म होगा। जो स्मरण आएगा, वही आपके कर्ता के बाहर से आएगा; कॉज्म?िक' से आएगा, ब्रह्मांड से आएगा। इसलिए वेद को हम कह सके कि यह अपौरुषेय है। इसका यह मतलब नहीं है कि जिन्होंने लिखा वे आदमी नहीं थे। इसलिए हम अपौरुषेय कह सके कि जो खबरें उन्होंने वेद में दी हैं वे उनके पुरुष से नहीं आई थीं, वे उनके पुरुष के पार से आई थीं। वे उनकी "पर्सनलिटी' के बाहर से आई थीं, वे उनके होने के आगे से आई थीं, वे "कॉज्म?िक' खबरें थीं। इसीलिए हम कह सके कि वेद जो है, वह ईश्वर का वचन है।
उसका यह मतलब नहीं है कि वेद ही ईश्वर का वचन है। जब भी किसी के भीतर से व्यक्ति के पार से कोई खबर आती है, वह ईश्वर का वचन होता है। इसलिए मुहम्मद के कुरान को कहा जा सका कि वह ईश्वर का इलहाम है, उसकी तरफ से दिया गया ज्ञान है। इसलिए जीसस कह सके कि मैं तुमसे जो कह रहा हूं वह मैं नहीं कहता, वह परमात्मा ही कह रहा है। इसलिए कृष्ण तो सीधा कह सके कि मैं हूं ही नहीं, परमात्मा ही है। यह सब मैं ही करवा रहा हूं, यह खेल, यह युद्ध, यह सब मैं ही करवा रहा हूं। और तू घबड़ा मत अर्जुन, क्योंकि जिन्हें तू मारेगा, उन्हें मैं पहले ही मार चुका हूं। यह जो कृष्ण इतने सहजता से कह सके कि जिन्हें तू मारेगा उन्हें मैं पहले ही मार चुका हूं। वे मर ही चुके हैं, सिर्फ तेरा काम उन तक खबर पहुंचाने का है कि तुम मर गए हो और कोई बात नहीं है ज्यादा, यह काम मैं कर ही चुका हूं, यह हो ही चुका है; यह जो व्यक्ति बोल रहा है, अब व्यक्ति नहीं है, अब "कॉज्म?िक' खबर है। यह ब्रह्मांड के गहरे से आई हुई सूचना है कि यह जो सामने तुझे जिंदा दिखाई पड़ते हैं, मैं कहता हूं कि ये मर ही चुके हैं, घड़ी-दो-घड़ी की देर है, उसमें तू निमित्त भर है। तो तू यह मत सोच कि तू मार रहा है। तू मार रहा है, तब तू भयभीत हो जाएगा। कर्ता आया कि भय आया, कर्ता आया कि चुनाव आया, कर्ता आया कि चिंता आई, कर्ता आया कि संताप आया। तो तू यह सोच ही मत, तू यह जान ही मत; तू भूल में पड़ा है, तू यह नहीं कर रहा है। तू "कॉज्म?िक' के हाथों में, ब्रह्म के हाथों में एक इशारे से ज्यादा नहीं है, एक "गेस्चर' से ज्यादा नहीं है। करने दे उसे वह जो कर रहा है, तू अपने को छोड़। इसलिए वे कहते हैं, "सर्वधर्मान् परित्यज्य',...तू सब छोड़-छोड़कर आ। तू अपने को छोड़कर आ, तू अकर्म में आ जा।
अकर्म प्रक्रिया है स्मरण की।

"भगवान श्री, अभी आपने कर्म, अकर्म और विकर्म पर बड़ी गहरी और बड़ी असाधारण चर्चा की। कश्मीर-प्रवास के समय भी जिस समय महेश योगी के विदेशी शिष्यों के सामने आत्म-साक्षात्कार की बात आई थी, उस समय भी आपने उन्हें अकर्म का ही बोध कराया था। इसमें कहीं कोई "कन्फ्यूजन' नहीं लगता है। लेकिन कृष्ण ने जो कुछ गीता में कहा, उसमें थोड़ा-सा "कनफ्यूजन' जरूर दिखाई पड़ता है। गीता के चौथे और पांचवें अध्याय में अकर्म-दशा पर कृष्ण ने भी जोर दिया है, किंतु गीता की अकर्म-दशा दोहरी भासित होने के कारण "कन्फ्यूजन' पैदा करती है। दोहरी इस प्रकार कि पहले कृष्ण कहते हैं कि सब कर्म करके वे कतई किए न हों, ऐसा होना योग बताया है; और कर्म कतई न करते हुए सब कर्म किए हों, ऐसा होना संन्यास है। यह दोहरी बात तत्वतः क्या है, इस पर कुछ प्रकाश डालें।
भगवान श्री, साथ में एक और प्रश्न ले लें।
शांकरभाष्य में, ज्ञानी को कर्म की जरूरत ही नहीं--ऐसा शंकराचार्य प्रस्तुत करते हैं। और कर्मी को ही कर्म करना उनको मंजूर है। और अभी आपने बताया कि हमें कुछ करना नहीं है, तो अर्जुन केवल यंत्र ही नहीं रह जाएगा? उसकी "इंडिवीजुऍलिटी' का क्या होगा?'

कृष्ण कहते हैं, सब कर्म किए हों और फिर भी ऐसा होना कि कर्म किए ही नहीं हैं, योग है। सब कर्म किए हों, फिर भी ऐसा होना कि किए ही नहीं हैं, योग है। अर्थात अकर्ता में प्रतिष्ठित होना योग है। दूसरी बात वे जो कहते हैं, वह इसी बात का दूसरा पहलू है। कुछ भी न करते हुए जानना कि सब कुछ किया है, संन्यास है।
संन्यास और योग एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। निश्चित ही पहलू उलटे होते हैं। लेकिन एक ही सिक्के के दो पहलू जुड़े होते हैं और तय करना बहुत मुश्किल है कि पहला पहलू कहां खत्म होता है और दूसरा कहां शुरू होता है। उलटे होते हैं, दोनों की एक-दूसरे की तरफ पीठ होती है, लेकिन अगर हम सिक्के को चीरें-फाड़ें और तय करने जाएं कि सामने वाला पहलू कहां खत्म होता है और पीछे वाला पहलू कहां शुरू होता है, तो हम बड़ी मुश्किल में पड़ेंगे। वे दोनों कहीं खत्म नहीं होते, दोनों बिलकुल ही एकसाथ जुड़े होते हैं। जिसे हम पृष्ठभूमि कह रहे हैं, जिसे हम पिछला पहलू कह रहे हैं, वह अगले पहलू की ही पीठ होती है।
तो अगर हम ज्ञानी को उसके चेहरे की तरफ से पकड़ें तो वह योगी मालूम पड़ेगा और उसकी पीठ की तरफ से पकड़ें तो वह संन्यासी मालूम पड़ेगा। और कृष्ण की दोनों परिभाषाओं में कोई "कन्फ्यूजन' नहीं है। वे ज्ञानी की दोनों तरफ से परिभाषा कर रहे हैं। वे यह कह रहे हैं कि वह करते हुए न करता है, न करते हुए करता है। और ध्यान रहे, ज्ञानी में ये दोनों बातें एकसाथ ही हो सकती हैं, एक अलग नहीं हो सकती। क्योंकि जो आदमी करते हुए न करता है, वही न करते हुए करता हो सकता है। ये दोनों बातें एक ही चीज के पहलू हैं, और ध्यान रहे, कोई भी सिक्का एक पहलू का नहीं होता, अब तक बनाया नहीं जा सका। दूसरा पहलू होगा ही। कहां से हम पकड़ते हैं, यह हम पर निर्भर करेगा। कृष्ण दोनों तरफ से पकड़ते हैं। और वह अर्जुन को सब तरफ से समझाने की कोशिश कर रहे हैं। वह उसको यह कह रहे हैं कि अगर तू योग में उत्सुक हो गया है तो योगी का यह मतलब है कि करते हुए न करने को उपलब्ध हो जा। अगर तू कहता है कि मुझे योग वगैरह की गहन चर्चा में मत उलझाइये, मैं तो यह देखकर दुख और यह भय और यह मोह पीड़ित हूं, मैं इनको नहीं मारता, मैं संन्यास ले लूंगा, तो वे उससे कहते हैं कि तू संन्यासी ही हो जा, लेकिन संन्यासी का मतलब ही यह है वह कहते हैं कि जो कुछ न करते हुए भी सब करता है।
वह अर्जुन को सब तरफ से घेरा डाल रहे हैं, और कुछ भी नहीं। इसलिए कोई जगह उनके वक्तव्य "कंट्राडिक्ट्री' मालूम पड़ते हैं। आपके साथ मेरी वही हालत हो जाती है। आपको मैं सब तरफ से घेरा डालता हूं, आप एक तरफ से कहते हैं, यह नहीं, तो मैं कहता हूं जाने दो, चलो दूसरी तरफ से शुरू करें। लेकिन आप कहीं से भी राजी हो जाएं। जहां आप राजी नहीं हुए थे, आखिर में आप पाएंगे कि दूसरी तरफ से राजी होकर आप उस छोर पर भी पहुंच गए हैं जहां आप राजी नहीं हुए थे। अर्जुन कहीं से भी राजी हो जाए, वह योगी होने को राजी हो जाए तो कृष्ण कहते हैं, चलो चलेगा। क्योंकि वे जानते हैं कि एक सिक्के में दो पहलू होते हैं, वह दूसरा पहलू बच नहीं सकता। तुम कहते हो हम सीधा सिक्का लेंगे, लो। उसका उलटा हिस्सा कहां जाएगा, वह तुम्हारे हाथ में पहुंच जाएगा।
एक ताओइस्ट कहानी है, वह मैं आपसे कहूं, उससे खयाल में आ जाएगा--
लाओत्से के फकीरों ने बड़ी अदभुत कहानियां कही हैं। ऐसी कहानियां दुनिया में किसी ने भी नहीं कहीं। एक फकीर है। जंगल में रहता है वह, उसने दस-बीस बंदर पाल रखे हैं। एक दिन सुबह कोई आ गया है जिज्ञासु और उससे ऐसा सवाल पूछा है जैसा सवाल आपने पूछा। उसने कहा है कि कभी आप ऐसा कहते हो, कभी आप ऐसा कहते हो, हम बड़े "कन्फ्यूजन' में पड़ जाते हैं। सांझ आप कुछ कहते हो, सुबह आप कुछ कहते हो, हम बड़े उलझन में पड़ जाते हैं। तो उस फकीर ने कहा, तू बैठ और देख। उसने अपने बंदरों को बुलाया और उनसे कहा कि सुना बंदरो, आज से तुम्हारे भोजन में परिवर्तन किए देता हूं। बंदरों को रोज सुबह चार रोटियां मिलती थीं। शाम तीन रोटियां मिलती थीं। उसने कहा कि उलट-फेर किए देता हूं। आज से तुम्हें सुबह तीन रोटियां मिलेंगी और सांझ को चार रोटियां मिलेंगी। बंदर एकदम नाराज हो गए और उन्होंने कहा कि हम बगावत कर देंगे, वह बर्दाश्त के बाहर है, यह परिवर्तन हम नहीं सह सकते। हम तो अपने नियम पर कायम रहेंगे। चार रोटी सुबह चाहिए। उसने कहा, यह नहीं होगा। तीन रोटी मिलेंगी सुबह, चार रोटी शाम मिलेंगी। बंदर हमला करने को उतारू हो गए। उसने कहा, अच्छा भाई ठहरो, तुम चार सुबह ले लो। बंदर बड़े प्रसन्न हुए। उसने उस आदमी की तरफ मुंह फेरा और उसने कहा कि सुनते हो, रोटियां सात ही मिलनी हैं, मगर बंदर तीन सुबह मिलेंगी इससे बहुत नाराज हैं। अभी भी सात ही मिलनी हैं, वे चार सुबह लें कि चार सांझ लें कि तीन सुबह लें कि तीन सांझ लें; लेकिन अब वे प्रसन्न हैं।
अर्जुन को कृष्ण ऐसे ही घेर रहे हैं। वे कभी उसको कहते हैं कि अच्छा तू तीन ले ले। वह कहता है कि यह नहीं हो सकता। तो वे कहते हैं, चार ले ले। रोटियां सात ही हैं। उसको कैसे अर्जुन लेने को राजी होगा, यह अर्जुन पर छोड़ते हैं। इसलिए इतनी लंबी गीता चलती है। वह बार-बार बदलते हैं कि अच्छा यह कर ले। अच्छा तू भक्त हो जा, अच्छा तू योगी हो जा, अच्छा तू कर्मयोग साध ले, अच्छा तू भक्तियोग साध ले, अच्छा नहीं तो ज्ञानयोग साध ले, तू क्या कहता है वही साध ले। मगर वे रोटियां सात हैं। अर्जुन को गीता के आखिर-आखिर तक समझ में आता है कि रोटियां सात हैं, और वह आदमी सात रोटियों से ज्यादा देगा नहीं, फिर कहीं से भी लिया जाए इससे कोई बहुत फर्क नहीं पड़ता।
दूसरे प्रश्न का उत्तर।
शंकर की परिभाषा पक्षपाती की परिभाषा है। शंकर की परिभाषा चुनाव की परिभाषा है। शंकर कर्म के सख्त विरोध में हैं। वे कहते हैं, कर्म ही बंधन है। वे कहते हैं, कर्म ही अज्ञान है। कर्म को छोड़े बिना उपाय नहीं। यहां वे कृष्ण के अकर्म को कर्म का छोड़ना बना लेते हैं कि कर्म छोड़ो। और कर्म के छोड़ने का मतलब भी वे यही लेते हैं कि जो-जो कर्मी का संसार है, जो कर्म का जगत है, उससे भाग जाओ। कर्म के संबंधों से हट जाओ।
ज्ञानी के लिए कोई कर्म नहीं है, यह बात तो सच है। लेकिन शंकर इसे जो व्याख्या देते हैं, वह ठीक नहीं है, अधूरी है। ज्ञानी के लिए कोई कर्म नहीं है, यह बिलकुल ही सच है, क्योंकि ज्ञानी के लिए कोई कर्ता नहीं है। लेकिन "एम्फेसिस' कर्ता के न होने पर होनी चाहिए--अर्जुन से जो कृष्ण कह रहे हैं। शंकर "एम्फेसिस' को बदलते हैं। वह कर्म पर "एम्फेसिस' डालते हैं कि कर्म नहीं होना चाहिए। असल में कर्म के दो हिस्से हैं--कर्ता और कर्म। कृष्ण का पूरा जोर इस पर है कि कर्ता न रह जाए। कर्म तो रहेगा ही। परमात्मा भी कर्म के बिना नहीं है, तो या तो कर्मी है, संसारी है, अज्ञानी है। परमात्मा भी कर्म के बिना नहीं है, क्योंकि यह संसार उसका कर्म है, अन्यथा यह संसार कैसे चलता है। यह कैसे चलता है, क्यों चलता है? इस चलने के पीछे चलने वाली ऊर्जा का हाथ है। तो कर्म के बाहर तो परमात्मा भी नहीं है, ज्ञानी कैसे होगा! जोर है कृष्ण का कर्ता न होने पर। लेकिन संसार को छोड़कर भागने वाला संन्यासी, "एस्केपिस्ट', पलायनवादी, वह कहेगा--कर्म छोड़ो। और तब शंकर को संसार को माया कहने को मजबूर हो जाना पड़ता है। उनको कहता पड़ता है, यह परमात्मा का कर्म नहीं है, सिर्फ हमारा भ्रम है। नहीं तो मुश्किल पड़ जाएगी। अगर यह परमात्मा का कर्म है--यह फूलों का खिलना और यह पहाड़ों का बनना और मिटना और यह चांदत्तारों का चलना और ऊगना और डूबना--अगर यह परमात्मा का कर्म है, तब तो परमात्मा भी संन्यस्त नहीं है। तो फिर आदमी से अपेक्षा क्या करनी है! तो इसलिए शंकर को और दूसरी झंझट में पड़ना पड़ता है।
असल में तर्क की अपनी झंझटें हैं। एक तर्क आपने पकड़ा, तो उसकी "कोरललीज' हैं। फिर आपको उसकी आखिरी सीमा तक जाना पड़ेगा। तर्क बहुत "टास्क मास्टर' है। एक तर्क आपने पकड़ा तो वह आपको फिर "लाजिकल कनक्लूज़न' तक, वह जो तर्क का अंत होगा, वहां तक ले जाएगा। एक बार शंकर ने यह कहा कि कर्म बंधन है, कर्म ही अज्ञान है, और ज्ञानी का कोई कर्म नहीं है, तब फिर मुश्किल हो गई। यह कर्म का विराट जाल! फिर इसको सपना कहे बिना कोई रास्ता नहीं है। यह झूठ है। यह है ही नहीं, यह सिर्फ भास रहा है, यह "एपीयरेंस' है, यह सिर्फ माया है, यह सिर्फ जादूगरी है, यह ऐसे है जैसे एक जादूगर एक बीज बोता है और आम का वृक्ष हो जाता है और आम लग जाते हैं--न कहीं कोई बीज है, न कहीं कोई आम है, न कहीं कोई वृक्ष है, एक "हिप्नोटिक ट्रिक' है--वह सिर्फ भास है। लेकिन, बड़े मजे की बात है कि "हिप्नोटिक ट्रिक' देखने वालों के लिए झूठ हो, करने वाले के लिए कर्म है। "हिप्नोटिस्ट' के लिए तो कर्म है ही। "हिप्नोटिज्म' भी तो करना ही पड़ता है।
शंकर इसलिए जाल में पड़ते जाते हैं। और बड़ी मुश्किल खड़ी हो जाती है कि अब वह क्या करें? अब यह माया को कैसे समझाएं? अगर माया सिर्फ हमारा भ्रम है, हमने पैदा किया है, तो भी कम-से-कम परमात्मा "अलाविंग' तो होगा ही कि वह हमको "अलाऊ' करता है। यानी इतना तो कर्म मानना ही पड़ेगा उसका कि वह हमको आज्ञा देता है कि तुम भ्रम देखो। क्योंकि उसकी इतनी आज्ञा भी न हो, तो हम कैसे देख पाएंगे! हम भ्रम देख रहे हैं। हो सकता है कि भ्रम झूठ हो, लेकिन हमारा देखना तो कर्म होगा ही।
इसलिए शंकर छूट नहीं पाते, चक्कर बढ़ता जाता है। और वह बड़ी मुश्किल में पड़ जाते हैं। लेकिन बड़े तार्किक हैं, और गहरी चेष्टा करते हैं यह समझाने की कि कर्म असत्य है, है नहीं। ज्ञानी के लिए कोई कर्म नहीं है। बाकी उनका जोर कर्ता के मिटाने पर उतना नहीं पड़ता जितना कर्म के मिटाने पर पड़ता है। लेकिन क्या मैं यह कह रहा हूं कि शंकर सत्य को नहीं पहुंच सके? नहीं, यह मैं नहीं कह रहा हूं। शंकर सत्य को पहुंच गए। क्योंकि जिस दिन कर्म को आप बिलकुल मिटा देंगे, कर्ता बचेगा कैसे? कैसे बचेगा? क्योंकि कर्ता बच ही तब तक सकता है जब तक कर्म का भाव है। तो शंकर का पूरा "लाजिक' "एब्सर्ड' है, गलत है, लेकिन शंकर की अनुभूति गलत नहीं है। इस बहुत गलत-सलत रास्ते से वे पहुंच तो गए। ऐसे भटके, इधर-उधर बहुत चक्कर लगाए, मंदिर के आसपास बहुत दौड़े, तब मंदिर में प्रवेश किया, लेकिन कर गए। कर गए दूसरे कारण से। क्योंकि कर्म को अगर बिलकुल निषिद्ध किया जा सके, कल्पना में भी, ज्ञान में भी अगर यह माना जा सके कि कर्म है ही नहीं, तो कर्ता बचेगा कहां? क्योंकि कर्ता बच सकता है कर्म करने से; इस भाव से कि कर्म है, बच सकता है। तो बिलकुल गलत छोर से यात्रा शुरू की। कृष्ण के छोर से यात्रा शुरू नहीं की।
कृष्ण कह रहे हैं, कर्ता को जाने दो, क्योंकि जब कर्ता चला जाएगा तो कर्म चला जाएगा। ये दोनों एक ही चीज के दो छोर हैं। लेकिन मैं शंकर के मुकाबले कृष्ण को चुनने को राजी हूं। इसलिए राजी हूं कि शंकर की पूरी व्याख्या "एस्केपिस्ट' बन जाती है। शंकर भगाने वाले बन जाते हैं। और शंकर के भागने वाले को भी उन लोगों पर निर्भर रहना पड़ता है जो भागने वाले नहीं हैं। अगर यह पूरी पृथ्वी शंकर से राजी हो जाए, तो एक क्षण चल नहीं सकता। एक क्षण चलने का उपाय नहीं रह जाएगा। और इसलिए पूरी पृथ्वी राजी नहीं हो सकती। और शंकर भी कितनी ही चेष्टा करें, कर्म को कितना ही माया कहें, वह माया होकर भी शेष रह जाता है। शंकर भी भीख तो मांगने निकलते ही हैं, भिक्षा तो लेते ही हैं, समझाने तो जाते ही हैं, समझाने की चेष्टा तो करते ही हैं। शंकर के विरोधियों ने शंकर का खूब मजाक लिया है। शंकर के विरोधी कहते हैं, तुम किसको समझाते हो? अगर सब माया है, तो काहे भ्रम में पड़ते हो? तुम यह गांव-गांव किसलिए भटकते हो? यह चलना किसलिए? यह समझाना किसलिए? किसको समझा रहे हो, जो नहीं है उसको? कहां जा रहे हो, जो नहीं है वहां? कहां से आ रहे हो, जो नहीं था वहां से? यह भिक्षा का पात्र, यह भिक्षा मांगना, यह भूख, यह प्यास, यह किसी का पूरा करना, यह न करना--शंकर कहेंगे, सब माया है।
एक कहानी मुझे याद आती है। एक बौद्ध भिक्षु जो जगत को माया ही मानता, संसार को झूठा ही मानता, वह एक सम्राट के दरबार में गया। उसने बड़े तर्क दिए और सिद्ध कर दिया कि सब झूठ है। तर्क में एक सुविधा है। तर्क तो सिद्ध कभी नहीं कर पाता कि सत्य क्या है, लेकिन यह सिद्ध कर सकता है कि झूठ क्या है? तर्क यह तो कभी नहीं बता पाता है कि क्या है, तर्क यह जरूर बता पाता है कि क्या नहीं है। तलवार की तरह है--तलवार मार तो सकती है, जिला नहीं पाती। तोड़ तो सकती है, जोड़ नहीं पाती। मिटा तो सकती है, बना नहीं पाती। तो तर्क में एक धार है तलवार जैसी, "डिस्ट्रक्वि' है। तर्क ने कभी भी कुछ "कन्स्ट्रक्ट' नहीं किया, कर नहीं सकता।
सम्राट के दरबार में उसने सब सिद्ध कर दिया कि सब झूठ है। लेकिन सम्राट भी अपने ढंग का आदमी है। उसने कहा कि सब होगा झूठ, लेकिन एक चीज नहीं हो सकती है, वह मेरे पास है। उसे मैं बुलाए लेता हूं। उसके पास एक पागल हाथी है। उसने उस पागल हाथी को बुलवा लिया। महल पर, सड़क खाली कर दी गई और पागल हाथी छोड़ दिया गया और उस गरीब भिक्षु को छोड़ दिया गया, सम्राट छत पर खड़ा है। वह पागल हाथी दौड़ता है, वह भिक्षु भागता है और चिल्लाता है कि मुझे बचाओ! मैं मरा, मैं मर जाऊंगा, मुझे बचाओ, लेकिन वह हाथी को दौड़ाए चले जाते हैं, वह उसको बिलकुल पकड़वाते भी नहीं, पूरे गांव में दौड़वाते हैं। फिर आखिर हाथी उसे पकड़ लेता है सूंड़ में। वह चिल्लाता है, हाथ-पैर जोड़ता है, रोता है, गिड़गिड़ाता है कि मैं मर जाऊंगा, फिर उसे छुड़ाया जाता है। फिर सम्राट उसे महल के भीतर बुलाता है, फिर उससे पूछता है कि यह हाथी? वह भिक्षु कहता है, सब असत्य है। तुम्हारा रोना? वह कहता है, आप भ्रम में आ गए, सब असत्य, वह मेरा होना असत्य, वह मेरा रोना-चिल्लाना असत्य, वह मेरे मरने का भय असत्य, वह मेरी प्रार्थना असत्य, वह तुम जिनसे प्रार्थना की गई असत्य, वह तुमने जो छुड़वाया असत्य, कुछ सत्य नहीं है।
अब इसके साथ बड़ी मुश्किल है। इसके साथ बड़ी मुश्किल है। अब वह पागल हाथी भी हार गया, अब कोई मतलब न रहा। क्योंकि यह आदमी यह आदमी, मगर है "कंसिस्टेंट'। वह यह कहता है कि जब सभी असत्य है, तो मेरा रोना कैसे सत्य हो जाएगा? वह कह रहा है, सब असत्य है, बचाने की पुकार असत्य है। हां, वह यह कह रहा है, जब मैं कह रहा हूं कि संसार असत्य है, तो तुमने भ्रम समझा; मेरी बचाने की आवाज भ्रम भी, झूठी थी, माया थी। जो आदमी सारे जगत को माया कहने को राजी है। उसे समझाना बड़ा कठिन है। क्योंकि वह सबको ही कहने को राजी है। शंकर के विरोधी मजाक उड़ाते हैं, लेकिन शंकर को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। शंकर कहते हैं, तुम्हारा यह देखना असत्य है कि मैं समझाने जाता हूं, कि मैं किसी को समझाता हूं, कि कोई समझाता है, कि कोई समझाने वाला है। न कोई समझाने वाला है, न कोई समझने वाला है, सब माया है। जिसने यह कहा सब माया है, उसको अब तर्क का कोई उपाय न रहा।
लेकिन, तर्क में यह कितना ही सही हो जाए, हम जीवन को चाहे माया ही नाम दे दें, लेकिन माया भी है। उसके होने को शंकर इनकार नहीं कर सकते। वह है। रात हम सपना देखते हैं, वह झूठ है, लेकिन वह है। उसके "एक्जिस्टेंस' को, उसके अस्तित्व को इनकार नहीं कर सकते। सपना कितना ही झूठा हो, है। सांप मुझे रस्सी में दिखाई पड़ा हो, लेकिन दिखाई पड़ा है। यह सवाल नहीं है कि वह है या नहीं, लेकिन मेरा दिखाई पड़ना तो कम-से-कम है। न होगा सांप, रस्सी तो है। न होगी रस्सी, मुझे दिखाई पड़ा, यह तो है। न होगा यह दिखाई पड़ना, जिसे दिखाई पड़ा, वह तो है।
अस्तित्व को हम अंततः निषिद्ध नहीं कर सकते। वह बच ही जाता है। आखिर, आखिर, आखिर। हां, डिकार्ट ठीक कहता है कि हम सब निषेध कर दें, लेकिन आखिर उसको कैसे निषेध करेंगे जो निषेध कर रहा है? "वी कैन नाट निगेट द निगेटर'। सब असत्य कर दें, लेकिन शंकर? शंकर तो हैं। इसलिए शंकर की जो व्याख्या है, वह अधूरी है, और एक पहलू की है। वह सिक्के के एक पहलू पर जोर दे रहे हैं, दूसरे पहलू का उनको पता नहीं है। और दूसरे को इनकार कर रहे हैं, जबकि सिक्के के दोनों पहलू हैं।
तो शंकर कृष्ण से कम "कन्फ्यूजिंग' हैं, शंकर कृष्ण से कम भ्रम में डालते हैं। इसलिए शंकर के साथ जो खड़े हैं, वे निर्भ्रांत खड़े हो गए। इसलिए शंकर हिंदुस्तान में संन्यासियों का बड़ा आत्मविश्वासी वर्ग पैदा कर सके, वह कृष्ण पैदा नहीं कर सके। सच तो यह है कि शंकर का ही एक निर्भ्रांत संन्यासियों का वर्ग खड़ा हुआ। क्योंकि शंकर एक पहलू की बात करते हैं, बिना इसकी फिक्र किए कि दूसरा पहलू अस्तित्व में है। लेकिन दूसरे पहलू के अस्तित्व की भी अगर बात की जाए, तो उसको समझने के लिए बड़ी गहरी समझ चाहिए। इसलिए शंकर संन्यासियों का एक बड़ा वर्ग भी पैदा कर सके, लेकिन नासमझ संन्यासियों को भी बड़ी संख्या में इकट्ठा कर सके। हिंदुस्तान का संन्यास भी शंकर के साथ पैदा हुआ और हिंदुस्तान का संन्यास शंकर के साथ ही मंदबुद्धि भी हुआ है। ये दोनों बातें एकसाथ हुई हैं। क्योंकि कृष्ण के साथ खड़े होने के लिए बड़ी मेधा चाहिए, जो "कन्फ्यूज्ड' होती ही नहीं, जो "कंट्राडिक्शन' से "कन्फ्यूज्ड' होती ही नहीं, जो विरोधों से भ्रम में नहीं पड़ती। हम सब विरोध से भ्रम में पड़ जाएंगे। इसलिए शंकर की कृष्ण की गीता की जो व्याख्या है वह सर्वाधिक लोकप्रिय हुई है। उसका कारण यह है कि शंकर ने पहली दफे गीता को निर्भ्रांत कर दिया, उसमें से सब भ्रांतियां अलग कर दीं, साफ-सुथरा कर दिया, सब विरोध छांट डाले, एक सीधी एकरस व्याख्या कर दी। लेकिन मेरा मानना है कि कृष्ण के साथ जितना अन्याय शंकर ने किया उतना किसी और ने नहीं किया। हालांकि यह भी हो सकता है कि अगर शंकर ने टीका न की होती, तो गीता खो गई होती। यह भी हो सकता है। क्योंकि शंकर की टीका ही के कारण गीता सारे जगत में बची है। मगर यह सब है, ऐसा ही है।

"भगवान श्री, शंकर की माया का अर्थ झूठ न होकर परिवर्तनशीलता नहीं हो सकता?'

र्थ तो कुछ भी किया जा सकता है। लेकिन शंकर परिवर्तनशीलता को ही झूठ कहते हैं। शंकर कहते ही यह हैं कि वही है असत्य, जो सदा एक-सा नहीं है। वही है मिथ्या, जो कल था कुछ और, आज है कुछ और, कल होगा कुछ और। शंकर की मिथ्या और असत्य की परिभाषा ही परिवर्तन है। शंकर कहते हैं, जो शाश्वत है, सदा है, वही है; वही है, वैसा ही है। जिसमें कभी कोई परिवर्तन नहीं हुआ, जिसमें परिवर्तन हो ही नहीं सकता, वही है सत्य। सत्य की शंकर की परिभाषा शाश्वतता है। "इटरनिटी' है। और संसार की परिभाषा परिवर्तन है, जो बदल रहा है, जो बदलता जा रहा है, जो एक क्षण भी वही नहीं है जो एक क्षण पहले था।
अब इसका मतलब क्या हुआ? इसका मतलब यह होता है कि जो एक क्षण पहले कुछ और था और एक क्षण बाद कुछ और हो गया--इसका मतलब क्या हुआ--इसका मतलब यह हुआ कि जो एक क्षण पहले था वह भी वह नहीं था, और एक क्षण बाद जो हो गया वह भी वह नहीं है, क्योंकि एक क्षण बाद वह फिर कुछ और हो जाएगा। जो नहीं है, उसी का नाम असत्य है। जो एक क्षण पहले भी वही था, एक क्षण बाद भी वही है, एक क्षण बाद भी वही होगा, जो है ही वही, वही है सत्य। शंकर सत्य और असत्य की जो परिभाषा करते हैं, उसमें परिवर्तन ही असत्य का पर्याय बन जाता है। और अपरिवर्तनीय ही सत्य का पर्याय बन जाता है। लेकिन, मैं जो कह रहा हूं, या कृष्ण जो कहेंगे, वह यह कहेंगे कि परिवर्तन उतना ही सत्य है, जितना अपरिवर्तन सत्य है। कृष्ण यह कह रहे हैं कि परिवर्तन उतना ही सत्य है, जितना अपरिवर्तन सत्य है। क्योंकि वह जो अपरिवर्तित है, परिवर्तन के बिना नहीं हो सकता। और वह जो परिवर्तित हो रहा है, अपरिवर्तित कीली के बिना नहीं घूम सकता। असल में अपरिवर्तित के होने के लिए परिवर्तन जरूरी है। और परिवर्तन के होने के लिए अपरिवर्तित होना जरूरी है।
वह जो "अनमूविंग' है, वह है ही इसीलिए कि उसके चारों तरफ "मूविंग' है। कृष्ण के साथ--कृष्ण सारे द्वंद्व को आत्मासात करते हैं सब दिशाओं से। वे यह कहते हैं कि गति का आधार अगति है। अगति का होना गति पर है। अगर हम कृष्ण को समझें, तो उसका मतलब यह है कि सत्य के होने के लिए भी असत्य अनिवार्यता है। नहीं तो सत्य भी नहीं हो सकेगा। सत्य के होने के लिए असत्य वैसी ही अनिवार्यता है, नहीं तो सत्य भी नहीं हो सकेगा। सत्य के होने के लिए असत्य वैसी ही अनिवार्यता है, जैसे प्रकाश के होने के लिए अंधकार अनिवार्यता है। जो विपरीत है वह अनिवार्य है। असल में वे एक ही चीज के दो पहलू हैं, हमारी दिक्कत है कि हम उसको विपरीत मानकर चल पड़ते हैं। वह एक ही चीज के दो पहलू हैं। इसलिए हम पूछते हैं, असत्य आया कहां से? यह क्यों नहीं पूछते हैं कि सत्य आया कहां से? जब सत्य बिना कहीं से आए आ जाता है, तो असत्य को कौन-सी कठिनाई है? यह बड़े मजे की बात है कि ब्रह्मज्ञान पर चर्चा करने वाले लोग निरंतर पूछते हैं, असत्य आया कहां से? और उनमें से एक भी इतनी बुद्धि नहीं लड़ाता कि सत्य आया कहां से? और अगर सत्य आ जाता है बिना कहीं से, तो असत्य को क्या बाधा है? बल्कि सच तो यह है कि असत्य को ज्यादा सुविधा है बिना कहीं से आने के, बजाय सत्य के। सत्य को कहीं से आना चाहिए। असत्य को आने की क्या जरूरत है। जो असत्य ही है, वह बिना कहीं से भी आ सकता है! असत्य का मतलब ही है कि जो नहीं है। उसके आने के लिए क्या मूलस्रोत की जरूरत है?
नहीं, सत्य और असत्य आए कहां से, ऐसा सोचना गलत है। सत्य और असत्य युगपत हैं, "साइमल्टेनियस' हैं। वे एक ही अस्तित्व के दो पहलू हैं। उनके आने-जाने का सवाल नहीं है। जिस दिन तुम्हारा जन्म आया उसी दिन मौत आ गई, आएगी नहीं। वह जन्म का ही दूसरा पहलू है। लेकिन अभी तुमने एक पहलू देखा, सत्तर साल लग जाएंगे दूसरे को देखने में, यह दूसरी बात है। यह तुम्हारी असमर्थता है कि तुम एक साथ नहीं देख सके। तुमको सिक्का उलटाने में सत्तर साल लग गए। बाकी जिस दिन जन्म आया, उसी दिन मौत आ गई। जिस क्षण सत्य आया, उसी क्षण असत्य आ गया। आ गया की भाषा ही गलत है--सत्य है, असत्य है। "एक्जिस्टेंस' है, "नानएक्जिस्टेंस' है। अस्तित्व है, अनस्तित्व है।
शंकर ने एक पहलू पर जोर दिया है, इसके साथ एक दूसरा पहलू भी ध्यान में ले लेना जरूरी है।
शंकर ने जोर दिया कि यह जो दिखाई पड़ रहा है यह माया है। यह एक पहलू था। बुद्ध ने इसके ठीक उलटे पहलू पर जोर दिया जो नागार्जुन में जाकर पूरा हो गया। उसने कहा, जिसको दिखाई पड़ रहा है, वह माया है। तो शंकर की भाषा में संसार झूठ हो गया, नागार्जुन की भाषा में आत्मा झूठ हो गई। नागार्जुन यह कहता है कि जो दिखाई पड़ रहा है, वह जिसको दिखाई पड़ रहा है, इनमें दोनों में मौलिक आधार वह नहीं है जो दिखाई पड़ रहा है, मौलिक आधार वह है जिसको दिखाई पड़ रहा है, वह झूठ है। और सब झूठ उससे पैदा हो रहे हैं। क्योंकि मैं आंख बंद कर लेता हूं, संसार दिखाई नहीं पड़ता, लेकिन मैं आंख बंद करके सपने पैदा कर लेता हूं। आंख बंद कर लेता हूं, संसार नहीं दिखाई पड़ता है, लेकिन मैं आंख बंद करके सपने देखने लगता हूं। असली बुनियादी झूठ मैं हूं। अगर संसार भी न हो, तो मैं सपने पैदा करूंगा। मजे की बात है कि मैं सपने के भीतर भी सपने पैदा कर लेता हूं। आपने ऐसे भी सपने देखे होंगे जिसमें आप सपना देख रहे हैं। बहुत "मिरेकुलस' है यह बात कि एक आदमी सपना देख रहा है कि वह सपना देख रहा है। जैसे कि जादूगर के डब्बे के भीतर डब्बे होते हैं, ऐसा सपने के भीतर सपने, सपने के भीतर सपने होते हैं। आप ऐसा देख सकते हैं कि मैं एक फिल्म देख रहा हूं, फिल्म में अपनी ही कहानी देख रहा हूं, उस कहानी में मैं सो गया हूं और सपना देख रहा हूं। डब्बे के भीतर डब्बे डाले जा सकते हैं। इसमें कोई अड़चन नहीं है। तो नागार्जुन कहता है कि संसार को किसलिए झूठ कहने की झंझट में पड़े हो, असली झूठ भीतर बैठा हुआ है। नागार्जुन कहता है, वह जो भीतर है, वही झूठ है।
असल बात यह है कि जगत में सत्य और असत्य एकसाथ हैं। अगर किसी ने बहुत जोर दिया कि सत्य ही है, तो उसको असत्य को कहीं-न-कहीं दिखाना पड़ेगा कि वह कहां है। अगर किसी ने जोर दिया कि असत्य ही है, तो उसको दिखाना पड़ेगा सत्य कहां है। कृष्ण की दुविधा बड़ी गहरी है। और जो लोग दुविधा में नहीं होते, अक्सर उथले होते हैं। दुविधा में होना बड़ी गहरी बात है। सौभाग्य से दुविधा मिलती है। दुविधा का मतलब यह है कि जिंदगी को हमने उसकी पूर्णता में देखना शुरू किया है। न हम यह कहते हैं कि सिर्फ असत्य है, हम देखते हैं और पाते हैं कि सत्य और असत्य किसी एक ही चीज के तालमेल हैं। किसी एक ही चीज के स्वर हैं। किसी एक ही बांसुरी से पैदा हुआ अस्तित्व भी है, अनस्तित्व भी है। और जब कोई आदमी इसको ऐसा पूर्णता में देखता है, तब उसकी कठिनाई हम समझ सकते हैं कि वह जो भी वक्तव्य देगा, वह "कन्फ्यूजिंग' हो जाएंगे। इसलिए कृष्ण के सभी वक्तव्य "कन्फ्यूजिंग' हैं। और बहुत गहरे दर्शन से ही "कन्फ्यूजिंग' वक्तव्य दिए जा सकते हैं।

"शंकर का माया को अनिवर्चनीय कहना क्या उनका "कांप्रोमाइज' करना नहीं है?'

शंकर को तो "कांप्रोमाइज' करनी ही पड़ेगी। जो भी अधूरे सत्य पर जोर देगा, उसको समझौता करना ही पड़ेगा किसी-न-किसी रूप में स्वीकार करना पड़ेगा--कहो कि माया है, कहो कि निवृत्ति सत्य है, कहो कि व्यवहार सत्य है--कुछ नाम दो, लेकिन कहीं-न-कहीं स्वीकार, उसको स्वीकृति देनी पड़ेगी, क्योंकि वह है। शंकर भी ऐसा नहीं कह सकते कि हम माया की बात नहीं करते, क्योंकि जो है ही नहीं उसकी क्या बात करनी। उनको भी बात तो करनी ही पड़ेगी। तो शंकर को "कांप्रोमाइज' करना पड़ेगा! सिर्फ कृष्ण जैसा आदमी "कांप्रोमाइजिंग' नहीं होता। उसको "कांप्रोमाइज' की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि वह दोनों को साथ-साथ स्वीकार कर रहा है। वह कह रहा है, दोनों हैं। जो एक को इनकार करेगा उसको किसी-न-किसी गहरे तल पर समझौता बनाना पड़ेगा उस दूसरे से, जिसको उसने इनकार किया है। जो दोनों को स्वीकार करता है, उसको अब समझौते का कोई कारण न रहा। समझौते की कोई जरूरत न रही। ऐसा कहें कि समझौता पहले से ही है।

"भगवान श्री, दुविधा को आपने शुभ कहा। पहले आपने अनिर्णायक स्थिति के विपरीत व किसी-न-किसी पक्ष में होने की अनिवार्यता पर जोर दिया है। कृपया स्पष्ट करें।'

मैंने कहा कि दुविधा सौभाग्य है। इसका मतलब यह नहीं है कि दुविधा में रहना सौभाग्य है। इसका मतलब है कि जिनको दुविधा पैदा होती है, फिर वह दुविधा के पार जाने की चेष्टा में लग जाते हैं। जिनको होती नहीं पैदा, वे वहीं खड़े रह जाते हैं, वे कहीं जाते नहीं।
तो दुविधा संक्रमण है। दुविधा यात्रा का बिंदु है। दुविधा पैदा होगी तो दुविधा के पार होना पड़ेगा। यह पार होना दो तरह से हो सकता है। या तो किसी पक्ष में हो जाएं नीचे गिरकर, तो दुविधा मिट जाएगी। शंकर से राजी हो जाएं, नागार्जुन से राजी हो जाएं, दुविधा मिट जाएगी। और जो राजी होते हैं, इसीलिए राजी होते हैं कि दुविधा मिट जाती है। झंझट के वे बाहर हो जाते हैं। लेकिन दुविधा वे खोते हैं बुद्धि को खोकर। जिसके पास बुद्धि नहीं है, उसको दुविधा होती ही नहीं। बुद्धि खो दें, दुविधा मिट जाती है। लेकिन मैं मानता हूं यह कि दुविधा को मिटाना महंगा हुआ, दुर्भाग्य हुआ। दुविधा मिटनी चाहिए बुद्धि के और अतिक्रम से, और ऐसे बिंदु पर पहुंचकर मिटनी चाहिए कि जहां से दोनों एक मालूम पड़ने लगें और दुविधा न रह जाए।
दो में से एक का चुनना--एक रह जाएगा, आप दुविधा के नीचे गिर जाएंगे। यह अगर ठीक से कहें, तो यह "इर्रेशनल' हालत होगी। यह "एब्सर्ड' हालत होगी, बुद्धि से नीचे गिर गए आप। दुविधा तो मिट गई। पागल इसी तरह अपनी दुविधा मिटाते हैं। बुद्धि छोड़ देते हैं, फिर दुविधा मिट जाती है। "ट्रांसरेशनल' स्थिति भी है। "इर्रेशनल बिलो रीजन' है, "ट्रांसरेशनल अबव रीजन' है। बुद्धि के पार जाकर भी दुविधा मिटती है, लेकिन वहां दोनों एक दिखाई पड़ते हैं, इसलिए मिटती है। वहां विरोध खो जाता है--एक के बचने से नहीं, दो के मिट जाने से, एक ही रह जाने से। इसलिए मैं कहता हूं, दुविधा सौभाग्य है। वह अबुद्धि से बुद्धि में ले जाती है। और सौभाग्य इसलिए है कि उससे बुद्धि के पार बुद्धि-अतीत का द्वार खुलता है।

"भगवान श्री, आपने कहा कि शंकर की व्याख्या अधूरी है। गीता पर लगभग चालीस-पचास व्याख्याएं हैं। क्या कोई व्याख्या पूरी भी है? लोकमान्य तिलक की व्याख्या को क्या आप पूरी कहेंगे? वह "एस्केपिस्ट' तो नहीं हैं, "एक्टिविस्ट' हैं और "मॉरलिस्ट' भी हैं। आप उनके "एक्टिविजम' को और शंकर के "सुपरामॉरलिज्म' को, दोनों को एकसाथ मिलाने का प्रयत्न कर रहे हैं क्या?'

कृष्ण पर कोई टीका पूरी नहीं है। हो नहीं सकती। जब तक कि कृष्ण जैसा व्यक्ति ही टीका न करे।
कृष्ण पर कोई टीका पूरी नहीं है। सब पहलू हैं। और कृष्ण अनंत पहलू हैं। उनमें से जिसको जो प्रीतिकर है, चुन लेता है। शंकर उसी गीता में संन्यास सिद्ध कर देते हैं, अकर्म सिद्ध कर देते हैं। उसी गीता में तिलक कर्म सिद्ध कर देते हैं, कर्मयोग सिद्ध कर देते हैं। शंकर से ठीक उलटा पहलू तिलक चुन लेते हैं। शंकर के पहलू को चुने हुए हजार साल हो गए थे। और हजार साल में शंकर के पलायनवादी पहलू ने हिंदुस्तान की जड़ों को बहुत तरह से कमजोर किया। भगोड़ापन कमजोर करेगा। हिंदुस्तान में जो भी सक्रिय होने की क्षमता थी, उस सबको क्षीण किया। हजार साल के अनुभव ने "पेंडुलम' को घुमा दिया। जरूरी हो गई कि गीता की कोई व्याख्या हो जो कर्म को प्रश्रय दे और कहे जोर से कि गीता कर्म के लिए ही कहती है। ठीक दूसरे "एक्स्ट्रीम' पर तिलक ने वक्तव्य दिया। एक पहलू चुना था शंकर ने, अकर्म का--कर्म छोड़ने वाले अकर्म का, तिलक ने दूसरा पहलू चुना कर्म में डूबने वाले का। तो कर्म की व्याख्या तिलक ने की, वह भी उतनी ही अधूरी है।
बहुत-सी व्याख्याएं हैं कृष्ण पर, अंदाजन पचास नहीं हजार, और रोज बढ़ती जाती हैं। लेकिन कोई टीका गीता के साथ न्याय नहीं कर पाती। उसका कारण है कि कोई टीकाकार "ट्रांसरेशनल' होने की हिम्मत नहीं कर पाता। असल में टीकाकार सदा "रेशनल' ही होता है। तर्क से पार अगर वे जाएं, तो गीता निर्मित हो जाएगी, टीका निर्मित नहीं होगी। तब गीता बन जाएगी। तब टीका की कोई जरूरत नहीं रह जाएगी। टीका का मतलब ही यह होता है कि जो हमें समझ में नहीं पड़ता, उसे हम समझाने योग्य टिप्पणी दे रहे हैं। टीका का मतलब ही यह होता है, "कमेंट्री' का का मतलब ही यह होता है कि जो गीता में आपको समझ में नहीं आता, वह मैं समझाता हूं। तो मैं उसकी एक व्याख्या करूंगा। और जब समझाने के लिए ही व्याख्या करूंगा, तो वह तर्क के पार नहीं जा सकती। तर्क के पार अगर कोई भी बात जाएगी तो वह स्वयं गीता बन जाएगी, "कमेंट्री' नहीं रह जाएगी।

"आप अभी कह रहे हैं, वह क्या है?'

क बात पक्की है कि वह "कमेंट्री' नहीं है, वह टीका नहीं है।

"और दूसरी बात?'

दूसरी बात तुम पर छोड़ता हूं। क्योंकि कुछ तुम पर भी छोड़ा जाना चाहिए न!

"भगवान श्री, मेरे पूर्व प्रश्न का एक अंश बाकी रहा लेने से। वह यह कि शंकर का "सुपरामॉरलिज्म' और तिलक का "एक्टिविज्म', दोनों को मिलाने से क्या आप मानते हैं कि गीता पूरी हो जाएगी? क्योंकि जिस अति-नैतिकता की बात आप करते हैं, उसकी बात शंकर करते हैं, तिलक नहीं। तिलक घोर नैतिकवादी हैं। और जिस प्रवृत्ति की बात आप करते हैं, उसकी बात तिलक करते हैं, शंकर नहीं, वह निवृत्तिमार्गी हैं।'

ह बात सच है। शंकर अति-नैतिकवादी हैं, "सुपरामॉरलिस्ट'। क्योंकि नीतिवादी कर्मवादी होगा। नैतिक धारणा कहेगी, यह करो और यह मत करो। शंकर कहते हैं, सभी कर्म माया है। तो तुम चोरी करो कि साधुता करो, सब कर्म माया है। रात में सपना देखूं कि डाकू हो गया, कि राम में सपना देखूं कि साधु हो गया, सुबह उठकर कहता हूं, दोनों सपने थे। दोनों एक-से बेकार हो गए। इसलिए शंकर के लिए कोई नीति नहीं है, कोई अनीति नहीं है--हो नहीं सकती। चुनाव का कोई उपाय नहीं है। दो सपने में कोई चुनाव होता है? चुनाव तो तभी हो सकता है जब हम दो यथार्थों में चुनाव करते हों।
तो चूंकि जगत माया है, इसलिए शंकर के विचार में नैतिकता की कोई जगह नहीं है। शंकर की दृष्टि अति-नैतिक है। वह नैतिकता के पार चली जाती है। अकर्म नैतिकता के पार जाएगा ही। इसलिए जब शंकर की टीका के पहली दफा पश्चिम में अनुवाद हुए, तो लोगों ने उसे "इस्मारल' ही समझा। उसे समझा कि यह तो बड़ी अनैतिक दृष्टि है। क्योंकि अगर कुछ ठीक नहीं, कुछ गलत नहीं, सभी कर्म एक-सा है और सभी स्वप्न एक-से हैं, तब तो आदमी भटक जाएगा। तब तो आदमी पतित हो जाएगा। तब तो आदमी का क्या होगा? तो पश्चिम में, जो कि हिब्रू विचार पर खड़े हुए लोग हैं, जहां कि सारा धर्म "डू दिस एंड डू नाट डू दिस', इस पर खड़ा हुआ है, जहां "टेन कमांडमेंट्स' के आधार पर सारी संस्कृति खड़ी हुई है, जहां धर्म का मतलब है साफ-साफ बताना कि क्या करो और क्या न करो, उनके लिए शंकर की बात अनैतिक मालूम पड़े तो कठिन नहीं है। लेकिन, शंकर की बात अनैतिक नहीं है। क्योंकि अनैतिक का मतलब होता है, नीति के विपरीत चुनाव। शंकर की बात अचुनाव की है, "च्वॉइसलेस' है। इसलिए अति-नैतिक है। वह यह भी नहीं कहते कि तुम अनैतिक हो जाओ, वह यह नहीं कहते हैं कि तुम चोर हो जाओ। वह यह नहीं कहते कि तुम होने को चुनो, यही कहते हैं कि गलती है तुम्हारी। तुम कुछ होने को ही मत चुनो। तुम न-होने में हो जाओ। यह अति-नैतिक, "ट्रांसमॉरल' दृष्टि है।
तिलक की दृष्टि नैतिक दृष्टि है, "मॉरल' दृष्टि है। वे कहते हैं, कर्म में चुनाव है। शुभ कर्म है, अशुभ कर्म है। करने योग्य कर्म हैं, न करने योग्य कर्म हैं। वांछनीय है, अवांछनीय है। और मनुष्य का धर्म "आट' "चाहिए' के आसपास निर्मित है। तो तिलक तो कर्मवादी हैं। इसलिए वह जगत को अयथार्थ नहीं कहते, यथार्थ कहते हैं। और यह जो दिखाई पड़ रहा है, यह माया नहीं है, सत्य है। और इस सत्य के बीच हम जो हैं, निर्णायक हैं, और ठीक और गलत का प्रतिपल चुनाव है। और धर्म का अर्थ ही यही है कि प्रतिपल हम उसको चुनें जो शुभ है। तो तिलक तो ठीक विपरीत व्याख्या में हैं।
प्रश्न यह पूछा गया है कि क्या इन दोनों के मिला देने से पूरी बात हो जाएगी? नहीं। नहीं होगी पूरी बात। उसके कई कारण हैं।
पहला जो सबसे बुनियादी कारण है वह यह है कि अगर हम एक आदमी के हाथ-पैर और हड्डियां सब अलग कर लें और फिर मिलाकर रख दें, तो क्या आदमी पूरा हो जाएगा? नहीं, पूरा नहीं होगा। आदमी पूरा हो तो हड्डियां इकट्ठे में काम करती हैं, हड्डियों को जोड़कर आदमी को पूरा करें, तो पूरा आदमी नहीं आता। "पार्ट्स' को इकट्ठा करने से "होल' पैदा नहीं होता। अंश को जोड़ने से पूर्ण नहीं बनता। जोड़ कभी पूर्ण पर नहीं ले जाता। हां, पूर्ण में अंश जुड़े होते हैं, यह बिलकुल दूसरी बात है।
तो जो मैं कह रहा हूं, उसमें तिलक और शंकर समाहित हो जाएंगे। लेकिन तिलक और शंकर को जोड़ने से कृष्ण की पूरी दृष्टि नहीं समझी जा सकती। और भी एक कारण है कि तिलक और शंकर सिर्फ दो दृष्टियां हैं। कृष्ण के बाबत और हजार दृष्टियां भी हैं। लेकिन उन सबको जोड़ने से भी कृष्ण नहीं बनेंगे। जोड़ हमेशा "मेकेनिकल' होगा, "आर्गनिक' नहीं हो पाता। तो एक मशीन को तो हम जोड़कर पूरा बना सकते हैं, लेकिन एक व्यक्तित्व को, जीवंत व्यक्तित्व को हम जोड़कर कभी पूरा नहीं बना सकते। यह बड़े मजे की बात है। यह मजे की बात है, "मेकेनिकल' जोड़ में और "आर्गनिक' जोड़ में, मृत जोड़ में और जीवंत जोड़ में एक बुनियादी फर्क है, जो खयाल में ले लेना चाहिए।
मृत जोड़ अपने अंशों का पूरा जोड़ होता है। जीवंत जोड़ अपने अंशों से थोड़ा ज्यादा होता है। जीवंत जोड़ का मतलब है, जैसे आप हैं, अगर आपके शरीर के हम सारे अंगों का हिसाब-किताब कर लें कि कितना लोहा है आपके भीतर, कितना तांबा है आपके भीतर, कितना "अल्यूमीनियम' है आपके भीतर, कितना नमक है, कितना पानी है, कितना "फास्फोरस' है, कितना क्या है वह हम सब जोड़कर निकाल लें, तो एक आदमी के भीतर मुश्किल से तीन-चार रुपये का सामान होता है। इससे ज्यादा नहीं नहीं होता। ज्यादा हिस्सा, कोई नब्बे हिस्सा तो पानी ही होता है। जिसका दाम लगाना फिलहाल ठीक नहीं। बाकी जो "अल्यूमीनियम', "फास्फोरस', लोहा इत्यादि सब होता है मिला-जुला कर, वह कोई तीन और चार रुपये, पांच और चार रुपये के बीच होता है। यह सारा अगर हम एक कागज पर रख लें--सब--और इसको जोड़ दें, तो जोड़ तो हो जाएगा लेकिन आप उसमें बिलकुल नहीं होंगे; आप भर नहीं होंगे और सब होगा। क्योंकि आप एक जीवंत व्यक्ति थे, जो इस जोड़ से ज्यादा थे। इस जोड़ के भीतर थे, लेकिन जोड़ ही नहीं थे। इस जोड़ के भीतर मौजूद थे, लेकिन जोड़ ही नहीं थे। यह जोड़ पूरा हो जाएगा और आप नहीं होंगे।
कृष्ण का जो जीवनदर्शन है, वह एक "आर्गनिक यूनिटी' है। उससे हजार पहलुओं पर टीकाएं हुई हैं। उस पर रामानुज कुछ और कहते हैं, शंकर कुछ और कहते, निंबार्क कुछ और कहते, अरविंद कुछ और कहते। ये हजारों कुछ-कुछ कहने वाले लोगों को अगर हम सबको इकट्ठा करके रख लें, तो भी वह "आर्गनिक यूनिटी' पैदा नहीं होती है जो कृष्ण हैं। हां, सब इकट्ठा हो जाएगा, कृष्ण उसमें नहीं होंगे। हां, इससे उलटी बात जरूर सच है। अगर कृष्ण हों, तो यह सब उसमें होगा। लेकिन इससे कुछ ज्यादा भी होगा। इसलिए शंकर और तिलक के जोड़ने से तो कुछ मामला नहीं बड़ा अगर हम समस्त व्याख्याकारों को, समस्त टीकाकारों को जोड़ लें, तो भी वह पूर्ण से कम होगा और मृत होगा। वह जीवंत नहीं हो सकता। वह जोड़ ही होगा। वह गणित का जोड़ ही होगा। वह "आर्गनिक टोटलिटी' नहीं हो सकती।
इसलिए मैं जो कह रहा हूं, वह कृष्ण की कोई व्याख्या नहीं है। मैं कोई उनकी व्याख्या नहीं कर रहा। मुझे उनकी व्याख्या से प्रयोजन ही नहीं है। इसलिए मैं जरा भी चिंतित और भयभीत नहीं हूं कि मेरे वक्तव्यों में विरोध हो जाएगा। होगा ही। क्योंकि वह कृष्ण में है, उसका मैं कुछ कर नहीं सकता। मैं कृष्ण की व्याख्या नहीं कर रहा, कृष्ण को सिर्फ आपके सामने खोल रहा हूं। मैं अपने को उन पर थोपने का कोई उपाय नहीं कर रहा, सिर्फ उनको खोल रहा हूं। वे जैसे हैं--गलत हैं, सही हैं; अनुचित हैं, उचित हैं, जैसे हैं; "एब्सर्ड' हैं, "इर्रेशनल' हैं, "सुपरारेशनल' हैं, जैसे हैं; नैतिक हैं, अनैतिक हैं, जैसे हैं; मुझे उनमें कोई चुनाव नहीं है। जैसे कृष्ण को जीवन में कोई चुनाव नहीं है, ऐसा मैं उनमें कोई चुनाव नहीं कर रहा, उनको बस खोले चला जा रहा हूं। इसमें मैं बहुत कठिनाई में पडूंगा ही। इसलिए कठिनाई में पडूंगा, जैसे कि कृष्ण की गीता से हजारों साल कठिनाई में पड़े हैं, तो मैं जो भी कहूंगा, वह फिर टीका योग्य होगा; वह टीका योग्य होगा और आप सब उसकी टीका करते हुए लौटेंगे कि मेरा क्या मतलब था? क्योंकि मैं तो सीधा पूरा ही खोले दे रहा हूं। उसमें मैं कोई यह फर्क कर ही नहीं रहा कि यह कहने से कृष्ण की दूसरी बात कहने में क्या कठिनाई होगी, इसका हिसाब ही नहीं रख रहा हूं। दूसरी बात जब होगी तब दूसरी बात कह दूंगा, तीसरी बात जब होगी तब तीसरी कह दूंगा। उनको खोलता चला जाऊंगा, वे जैसे हैं पूरे आपके सामने खुल जाए। तो जो मैं कह रहा हूं, इसीलिए मैंने कहा, वह व्याख्या नहीं है, वह "कमेंट्री' नहीं है।

"तो फिर आप कृष्ण होकर ही बात कर रहे हैं?'

होने की जरूरत तब पड़ती है जब कोई न हो। होने की क्या जरूरत है? कोई होने की जरूरत ही नहीं है किसी को? हैं ही।

"भगवान श्री, श्री अरविंद ने जो टीका श्रीमद्भगवद्गीता पर लिखी है, अभी आपने उनका नाम लिया तो खयाल आया कि आप सृष्टि-दृष्टिवाद, जिसमें सृष्टि पर भार है और दृष्टि-सृष्टिवाद, जिसमें दृष्टि पर भार है--उन दोनों के करीब आ गए। तकलीफ यह है कि अरविंद "सुपरामेंटल' की जब बात करते हैं कि प्रभु की चेतना नीचे उतरेगी, तब एक "डुअलिज्म' आ जाता है। वह आ जाता है या नहीं? और रमण महर्षि का अजातवाद चैतन्य महाप्रभु के अचिंत्य भेदाभेदवाद के पास और आपके पास भी आता है कि नहीं? और अरविंद का कृष्ण-दर्शन का वह प्रसंग क्या था?'

रविंद "सुपरामेंटल' की बात करते हैं। अति-चेतन, अति-मनस की बात करते हैं। लेकिन, बात है "रेशनल'। अरविंद बुद्धि से पार कभी नहीं जाते। वे अगर बुद्धि के अतीत की बात भी करते हैं, तो बुद्धिगत धारणाओं में ही करते हैं। अरविंद निपट बुद्धिवादी हैं। वे जो बात करते हैं, जिन शब्दों, जिन धारणाओं की चर्चा करते हैं, वे सब धारणाएं अरविंद के बुद्धिवाद की धारणाएं हैं। अरविंद के पूरे वक्तव्य में बड़ी संगति है, जो "सुपरारेशनल' के वक्तव्यों में कभी नहीं होती। बड़ी "कंसिस्टेंसी' है। बड़ा गणित है, बड़ा तर्क है, जो "मिस्टिक' के शब्दों में नहीं होता। हो नहीं सकता। "मिस्टिक' के, रहस्यवादी के शब्द में तो एक शब्द के बाद जो दूसरा शब्द होता है, वह पहले का खंडन कर जाता है। अरविंद कहीं अपना खंडन नहीं करते।
अरविंद एक सुव्यवस्थित "सिस्टम मेकर' हैं। "सिस्टम मेकर' कभी भी "सुपरारेशनल' नहीं होता। हो नहीं सकता है। "सिस्टम' बनाना हो तो "रीज़न' से बनती है। और जो "सुपरारेशनल' होते हैं, सदा गैर-"सिस्टेमेटिक' होते हैं। उनकी कोई "सिस्टम' नहीं होती। "सिस्टम' हो नहीं सकती। व्यवस्था होगी कैसे अतक्र्य में? अचिंत्य में व्यवस्था होगी कैसे? इसलिए इस सदी में जितने लोग "रीज़न' के थोड़े पार गए हैं, वे सब "फ्रेग्मेंटरी' हैं, "सिस्टेमेटिक' नहीं हैं। चाहे विट्गिंस्टीन हो, चाहे हुसरेर हो, चाहे हाइडिगर हो, मारलुपांटी हो--कोई भी हों, ये सारे-के-सारे लोग "फ्रेग्मेंटरी' हैं। कृष्णमूर्ति हों, ये सब "फ्रेग्मेंटरी' हैं। इनकी कोई "सिस्टम' नहीं है। इनकी कोई "सिस्टम' नहीं है। ये कोई व्यवस्था नहीं बनाते। इनके वक्तव्य "एटामिक' हैं, आणविक हैं। और एक वक्तव्य दूसरे वक्तव्य का खंडन कर सकता है, करता है।
अरविंद का मामला बहुत भिन्न है। सच तो यह है कि शंकर के बाद हिंदुस्तान में अरविंद के मुकाबले बड़ा "सिस्टम मेकर' नहीं हुआ। इतना बड़ा व्यवस्थापक नहीं हुआ है। लेकिन यही उनकी कमजोरी और गरीबी है। यही उनकी दीनता है। क्योंकि वह शब्द और तर्क और सिद्धांत के बड़े माहिर, कुशल खिलाड़ी हैं। लेकिन जिंदगी का असली सत्य इन सबसे पार है। तो वह विभाजन करके रख देते हैं। असल में अरविंद की शिक्षा पश्चिम में हुई--सारी शिक्षा। सीखकर लौटे वे तर्क और गणित। सीखकर लौटे वे पश्चिम के सोने की ऍ?रिस्टॉटेलियन पद्धति। सीखकर लौटे वे डार्विन का विकासवाद। सीखकर लौटे वे विज्ञान की तर्क-चिंतन व्यवस्था। सारा मानस उनका पाश्चात्य है। हिंदुस्तान में अरविंद से ज्यादा पाश्चात्य मानस का व्यक्ति नहीं था इस सदी में। फिर पूरब की उन्होंने की व्याख्या, सो जो होना था वह हुआ। पूरब के पास कोई तर्क-व्यवस्था नहीं है। पूरब की गहनतम अनुभूतियां अतक्र्य हैं। पूरब के अनुभव अचिंत्य हैं। पूरब के अनुभव अज्ञात, अनजान के, ज्ञान के अतीत के हैं, जानने वाले के पार के हैं। पूरब का अनुभव रहस्य का है, "मिस्ट्री' का है। फिर अरविंद पश्चिम का मानस लेकर और पूरब की अनुभूतियों की व्याख्या करने बैठे, सो एक अच्छी व्यवस्था बनी जो कि पूरब का कोई आदमी न बना सकता था। तो उन्होंने सारी बातें कीं, और सारे साधन उपयोग किए चिंत्य के।
लेकिन वे बातें ही हैं, इसीलिए वे चिंत्य के माध्यम से कर सके। अगर अनुभव भी अरविंद का अचिंत्य का हो, तब "कैटेगरीज' टूट जाती हैं, वे "कैटेगरीज' में नहीं जी सकते थे। कहीं "कैटेगरीज' नहीं टूटतीं। यानी मजे की बात यह है कि वे उन चीजों के लिए भी धारणाएं बनाते हैं जिनके लिए कभी धारणाएं नहीं बनाई गई थीं। जैसे "सुपरामेंटल'। वह बनाते जाते हैं धारणाएं, वह खंड करते जाते हैं, वह ठीक गणित बिठाए चले जाते हैं, वह सारी बात कर देते हैं।
दूसरी बात जो पूछी है, वह भी इस संबंध में खयाल लेने जैसी है।
धर्मों का, समस्त धर्मों का चिंतन एक अर्थ में गैर-विकासवादी है, "नॉन एवॅलूशनरी' है। समस्त धर्म दो हिस्सों में बंटे रहे हैं। एक हिस्सा है, जो "क्रिएशन' में मानता है, सृष्टि में मानता है। जैसे ईसाई हैं, मुसलमान हैं, हिंदू हैं, सब सृष्टि में मानते हैं। यह मानते हैं, परमात्मा ने सृष्टि की। और जो लोग सृष्टि में मानते हैं, वे गहरे में विकास में नहीं मान सकते। क्योंकि विकास में मानने का यह मतलब होगा कि परमात्मा ने जब पहले बनाया प्रकृति को, सृष्टि को, तो वह अपूर्ण थी, और फिर धीरे-धीरे उसमें विकास हुआ। पूर्ण परमात्मा अपूर्ण को नहीं बना सकता है। इसलिए सृष्टिवादी विकासवादी नहीं हो पाता। विकास का मतलब है, रोज विकास हो रहा है। सृष्टि का मतलब है, एक क्षण में पूरा-का-पूरा सृजन किया गया है, विकास नहीं हो रहा। जो ऐसा नहीं मानते थे, जैसे जैन या बौद्ध, तो उन्होंने माना कि सृष्टि हुई ही नहीं है। जो है वह अनादि है, उसका कभी सृजन नहीं हुआ। सृजन हुआ ही नहीं।
इसलिए बड़े मजे की बात है, सृष्टि हिंदुओं का शब्द है, प्रकृति जैनों, बौद्धों, सांख्यों का शब्द है। अब सब घोल-मेल हो गया धीरे-धीरे। प्रकृति शब्द हिंदुओं का नहीं है, क्योंकि हिंदू प्रकृति कह ही नहीं सकते। प्रकृति का मतलब है, जो बनाने के पहले से मौजूद है, "प्रीक्रिएशन', जो बनाने के पहले से भी मौजूद है। जो सदा मौजूद ही है, जिसको कभी बनाया ही नहीं गया। सृष्टि का मतलब है, जो कभी मौजूद नहीं थी और कभी बनाई गई। इसलिए प्रकृति शब्द बड़े और लोगों का है। वह उनका है जो "क्रिएशन' में मानते ही नहीं। और सृष्टि उनका है, जो मानते हैं किसी क्षण में सृष्टि बनाई गई। इसलिए सांख्य, जैन या बौद्ध चूंकि सृष्टि को नहीं मानते, इसलिए उनके पास स्रष्टा की कोई धारणा नहीं है। जब बनाया ही नहीं गया, तो बनाने वाले का कोई सवाल नहीं है। इसलिए ईश्वर खो गया वहां। उसकी कोई जगह वहां नहीं रही। क्योंकि ईश्वर को बनाने वाले की तरह हमें जरूरत पड़ी थी। और जिन्होंने माना बनाया ही नहीं गया, बात खत्म हो गई। जिन्होंने सृष्टि मानी, उनके पास स्रष्टा है।
अरविंद पश्चिम से धारणा लेकर आए "एवॅल्यूशन' की। अरविंद की जब शिक्षा हुई तब डार्विन छाया हुआ था यूरोप पर। वह धारणा लेकर आए विकास की। यहां आकर पूर्वी मनस का जब उन्होंने अध्ययन किया और पूर्वी अनुभूतियों का जब उन्होंने--अध्ययन किया मैं कहता हूं, जाना नहीं। अध्ययन उनका गहन है। ज्ञान उनका इतना गहन नहीं है। मनन और चिंतन, उनकी बड़ी तीव्र मेधा है; लेकिन अनुभूति उनकी बहुत क्षीण है। तो जब उन्होंने पूरब का पूरा अध्ययन किया और पश्चिम के मनस और डार्सिन के खयाल को लेकर वे आए, तो जिसको हम कहते हैं, "क्रास ब्रीडिंग', अरविंद में "क्रास ब्रीडिंग' हो गई। वर्णसंकर एक विचार पैदा हुआ। वह वर्णसंकर विचार में विकास का सिद्धांत भारत के मनस में जुड़ गया। अब बड़ी तकलीफ हुई। क्योंकि भारत का मनस प्रकृति की, पदार्थ की चिंतना ही नहीं करता, वह चिंतना करता है चित्त की, मनस की, आत्मा की। और पश्चिम से विकास का सिद्धांत लेकर वह आए और भारत के मनस की "साइकिक' चिंतना का दोनों का जोड़ हो गया, तो "साइकिक एवॅल्यूशन' का खयाल अरविंद को पैदा हो गया, कि एक मनस का विकास हो रहा है।
इस विकास में एक नई बात उन्होंने जोड़ी, जो बिलकुल उनकी थी और बिलकुल नई है और इसी कारण बिलकुल गलत है। मौलिक बातें सड़ जाती हैं, जड़ हो जाती हैं--अक्सर। क्योंकि एक ही व्यक्ति उनको खोजता है। परंपरागत बातें सड़ जाती हैं, जड़ हो जाती हैं, लेकिन अक्सर गलत नहीं होतीं। क्योंकि करोड़ों लोग उन्हें खोजते हैं। अरविंद का नवीनतम जो खयाल है, जिसकी वजह से उनकी प्रतिष्ठा हुई, वह है--परमात्म-चेतना का अवतरण।
सदा ऐसा ही सोचा गया है कि व्यक्ति उठेगा ऊपर और परमात्मा से मिलेगा। एक ऊर्ध्वगमन होगा। अरविंद कहते हैं, परमात्मा उतरेगा और व्यक्ति से मिलेगा। एक तरह से सोचने पर ये भी एक सिक्के के दो पहलू हैं। असल में, सत्य बहुत बीच में है। और वह सत्य है कि मिलन वहां होता है, जहां हम भी कुछ चले होते हैं और परमात्मा भी कुछ चला होता है। मिलन तो वहीं होता है। हम भी चले होते हैं, वह भी चला होता है। लेकिन पुरानी धारणा हमारे चलने पर जोर देती थी। उसका कारण था। क्योंकि परमात्मा का चलना तो सुनिश्चित है, हमारा चलना ही सुनिश्चित नहीं है। वह तो चलेगा ही, इसलिए उसको छोड़ा जा सकता है, हिसाब के बाहर रखा जा सकता है। हमारे चलने भर की बात है। हम अपने चार कदम को उठा लें, उसके चार कदम उठने ही वाले हैं। इसलिए उसको छोड़ दिया था, खयाल के बाहर रखा था। क्योंकि उसके चलने पर जोर देने का परिणाम कहीं हमारे चलने की कमजोरी न बन जाए।
अरविंद ने दूसरे पहलू से पकड़ा और कहना शुरू किया कि परमात्मा उतरेगा। इसका प्रभाव पड़ा, क्योंकि जो चलने के लिए बिलकुल उत्सुक नहीं थे, उन्होंने कहा यह बड़ी हृदय की बात है। यह लगती है, जंचती है। इसलिए हिंदुस्तान में अरविंद की तरफ जितने लोग दौड़े पिछले वर्षों में, उतना किसी की तरफ नहीं दौड़े। उसका कुल कारण इतना था कि जो भी और गहरे अर्थों में नहीं दौड़ सकते थे, वह पांडिचेरी की तरफ दौड़ने लगे। उन्हें लगा कि यह सस्ता मामला है। पांडिचेरी तो पहुंचा जा सकता है, और उसके बाद परमात्मा उतरेगा, उसके बाद हमें कुछ...परमात्मा के उतरने की बात सच है, लेकिन हमारे चढ़े बिना वह कभी नहीं उतरता। और इसमें एक दूसरी बात ध्यान रखने की है कि चढ़ने के मामले में, मैं चढूंगा तो मुझ पर उतरेगा, आप चढ़ेंगे तो आप पर उतरेगा, लेकिन उतरने के मामले में कैसे तय होगा कि किस पर उतरे? सब पर उतर जाएगा। क्योंकि परमात्मा तो सब पर उतर जाएगा। फिर कोई हिसाब करेगा, चुनाव करेगा कि इस पर उतरूं, इस पर न उतरूं!
तो पांडिचेरी में एक खयाल पैदा हुआ कि अरविंद कोशिश करेंगे और सब पर उतर जाएगा। यह खयाल पैदा हुआ, जो कि लोभ बना--जो अभी भी लोभ जारी है। खयाल यह हुआ कि जब एक पर उतर जाएगा, जैसे कि गंगा उतरी भगीरथ पर। तो फिर भगीरथ पर थोड़े ही उतरी, उतर गई सबके लिए, बह गई। तो भगीरथ का काम अरविंद कर देंगे। और एक दफा परमात्मा उतर गया, तो फिर सब पानी पिएंगे। फिर गंगा के किनारे सब बस जाएंगे।
इस भ्रम ने बड़ा उपद्रव पैदा किया। और मैं मानता हूं, यह बड़ी गलत धारणा है। व्यक्ति को जाना पड़ता है। घटना उतरने की घटती है, लेकिन व्यक्ति को तैयारी करनी पड़ती है। और सामूहिक रूप से कभी परमात्मा उतरेगा, ऐसा मुझे कोई कारण नहीं दिखाई पड़ता। क्योंकि परमात्मा की तरफ से वह उतरने को तैयार ही है। लेकिन समूह कब तैयार होगा? और समूह में आप आदमी ही हैं सिर्फ! उड़ते हुए पक्षी नहीं हैं? पौधे नहीं हैं? जंगल के जानवर नहीं हैं। ये सड़क के किनारे पत्थर नहीं हैं? परमात्मा जिस दिन उतरेगा, उस दिन पत्थर वंचित रहेगा, आपको मिल जाएगा? उस दिन पौधे वंचित रहेंगे, आपको मिल जाएगा? यह सोचना असंभव है।
इसलिए अरविंद की जो धारणा उतरने की है, उसने हमारे लोभ को तो बड़ा सुख दिया, लेकिन वह सार्थक नहीं है। इसलिए पांडिचेरी में जो प्रयोग चल रहा है, उससे ज्यादा व्यर्थ प्रयोग मनुष्यजाति के इतिहास में कभी नहीं चला। एकदम व्यर्थ प्रयोग चल रहा है। लेकिन वह हमारे लोभ के अनुकूल पड़ता है, इसलिए चल सकता है।
अरविंद को सोचते वक्त, दूसरा नाम स्मरण दिलाया है रमण का। रमण अरविंद से ठीक उलटे आदमी हैं। अरविंद बड़े पंडित हैं, तो रमण का पांडित्य से कभी कोई नाता नहीं रहा। अरविंद बड़े जानकार हैं, तो रमण से गैर-जानकार आदमी खोजना मुश्किल है। अरविंद सब जानते मालूम पड़ते हैं, लेकिन रमण अज्ञानी होने की तैयारी में हैं। रमण कुछ जानते हुए नहीं मालूम पड़ते। इसलिए रमण की जिंदगी में जो संभव हो पाया, वह अरविंद की जिंदगी में संभव नहीं हो सका। अरविंद जानकार बने रहे और रमण जान गए। रमण की जिंदगी में घटना घटी है। लेकिन चूंकि वे जानकार बिलकुल नहीं हैं, इसलिए उनके वक्तव्य एक ऐसे आदमी के हैं जो ज्ञान की भाषा जानता ही नहीं है। ज्ञान मिल गया है, ज्ञान की भाषा नहीं जानता। इसलिए वक्तव्य की दृष्टि से वक्तव्य बड़े कमजोर हैं। तर्क की दृष्टि से बड़े दीन हैं। लेकिन अनुभव की दृष्टि से उनकी समृद्धि का कोई मुकाबला नहीं है। रमण कोई "सिस्टम' तो नहीं बना सकते, कोई व्यवस्था नहीं दे सकते। रमण के सब वक्तव्य "एटामिक' हैं, सब आणविक हैं। ज्यादा हैं भी नहीं। क्योंकि रमण के पास कहने को भी नहीं है। थोड़ा-सा कहने को है--वह जितना जाना है। और वह जो जाना है, उसको कहने के लिए भी बहुत शब्द उनके पास नहीं हैं। थोड़े-से शब्द हैं, जिनमें वे उसको कहे चले जाते हैं। इसलिए रमण को तो एक पन्ने पर इकट्ठा किया जा सकता है। एक पन्ना भी बड़ा पड़ सकता है, एक पोस्टकार्ड भी काफी है। लेकिन अगर अरविंद को इकट्ठा करने चलो, तो एक "लाइब्रेरी' भी छोटी है। और ऐसा नहीं है कि अरविंद जो कह सकते थे वे सब कह गए हैं, अभी उनको कहने के लिए दस-पांच जन्म लेना पड़े। अभी उनके पास कहने को बहुत था।
इसका यह मतलब नहीं है कि उनके पास कहने को बहुत था इसलिए उन्होंने नहीं जाना। नहीं, इससे कोई बाधा नहीं पड़ती। बुद्ध के पास कहने को बहुत है। बुद्ध ने बहुत कहा। बुद्ध रमण जैसे आदमी हैं, अनुभव की तरह; और जानकारी की तरह वे अरविंद जैसे आदमी हैं। इसलिए कहने का उपाय उनके पास बहुत है। महावीर ने बहुत कम कहा है। महावीर का ज्यादा समय मौन में बीता। बहुत कम कहा है। बहुत थोड़े वक्तव्य हैं महावीर के। और जो वक्तव्य भी हैं, बहुत संक्षिप्त हैं। रमण जैसा मामला दिखता है। महावीर ने बहुत नहीं कहा। दिगंबरों के पास तो कोई ग्रंथ ही नहीं है महावीर का। श्वेतांबरो के पास ग्रंथ हैं, वे भी महावीर के पांच सौ वर्ष बाद इकट्ठे किए गए हैं।

"आप रमण को बुद्ध तक इतनी दूर ले जाते हैं। उन्हें कृष्णमूर्ति के निकट रखकर समझाएं जरा।'

दूर और पास नहीं है कुछ। कृष्णमूर्ति ठीक रमण जैसे व्यक्ति हैं। रमण से और बुद्ध, अरविंद इनको मैंने क्यों तौला, उसका कुछ कारण है। कृष्णमूर्ति ठीक रमण जैसे अनुभव के व्यक्ति हैं, लेकिन अरविंद जैसी जानकारी कृष्णमूर्ति की भी नहीं है। हां, रमण से ज्यादा मुखर हैं। रमण से ज्यादा तर्कयुक्त हैं। लेकिन कृष्णमूर्ति के तर्क और अरविंद के तर्क में बड़ा फर्क है। अरविंद एक तार्किक हैं, कृष्णमूर्ति तार्किक नहीं हैं। और अगर तर्क का उपयोग कर रहे हैं, तो पूरे वक्त तर्क को मिटाने के लिए ही कर रहे हैं। और अगर तर्क की पूरी-की-पूरी चेष्टा है, तो वह अतक्र्य में प्रवेश के लिए ही है। लेकिन जानकार बहुत नहीं हैं। इसलिए मैंने दूर का उदाहरण लिया। बुद्ध से मैंने इसलिए कहा, ताकि आपको दोनों बात खयाल में आ जाए--बुद्ध का अनुभव रमण जैसा और जानकारी अरविंद जैसी। कृष्णमूर्ति का अनुभव रमण जैसा, जानकारी अरविंद जैसी नहीं।
दूसरा फर्क है। रमण बहुत मौन हैं, कृष्णमूर्ति मुखर हैं। इसीलिए कृष्णमूर्ति के भी वक्तव्यों को अगर छांटा जाए तो बहुत ज्यादा नहीं हैं। इसलिए जो कृष्णमूर्ति को सुनते हैं वे अनुभव करेंगे कि वह एक ही चीज को निरंतर चालीस वर्षों से दोहराए चले जा रहे हैं। एक ही बात को दोहराए चले जा रहे हैं। एक पोस्टकार्ड पर उनके वक्तव्य भी इकट्ठे हो सकते हैं। लेकिन वह कहने में ज्यादा विस्तार लेते हैं, तर्क का उपयोग करते हैं। रमण विस्तार भी नहीं लेते। इसको ऐसा समझें कि कृष्णमूर्ति के वक्तव्य तो "एटामिक' हैं, लेकिन वक्तव्यों के आसपास तर्क का, विचार का, चिंतन का जाल भी खड़ा करते हैं। रमण के वक्तव्य निपट "एटामिक' हैं, उनके आसपास कोई वक्तव्य का, तर्क का, समझाने का जाल भी नहीं है। रमण के वक्तव्य उपनिषदों जैसे हैं, सीधे "स्टेटमेंट्स' हैं। हां, उपनिषद कह देते हैं, ब्रह्म है। फिर वह यह भी फिक्र नहीं करता कि क्यों है, है कि नहीं, कैसे है, क्या तर्क है, क्यों है, यह कुछ नहीं। सीधे, "बेयर स्टेटमेंट्स' हैं। ऐसा, कि है। रमण उपनिषद के ऋषियों से जोड़े जा सकते हैं।

"रमण के अजातवाद पर कुछ कहें।'

हां, रमण या रमण जैसे और लोग भी कहते हैं, जो है वह कभी जन्मा नहीं, अजात है; यह दूसरा पहलू है एक और बात का, जिसे हम निरंतर कहते हैं लेकिन खयाल में नहीं लेते। सैकड़ों वक्तव्य हैं इस बात के कि जो है वह मरेगा नहीं, अमृत है। अमर्त्य है। इसका दूसरा पहलू है। क्योंकि अमर्त्य वही हो सकता है जो अज्ञात हो, जो जन्मा न हो। तो रमण कहते हैं, जो है, वह जन्मा नहीं है। इसीलिए तो जो है, वह मरेगा नहीं। आप कब जन्मे, आपको पता है?
यह बड़े मजे की बात है, आप कब जन्मे, आपको पता है? आप कहेंगे कि नहीं, पता तो नहीं है। हां, जन्म के लेखे-जोखे हैं, जो दूसरों ने हमें बताए। अगर मुझे कोई न बताए कि मैं जन्मा, तो क्या मुझे पता चल सकेगा कि मैं जन्मा? यह "इन्फर्मेशन' है, जो दूसरों ने मुझे दी है। दूसरे मुझे कहते हैं कि फलां-फलां तारीख को फलां-फलां घर में जन्मा। अगर यह खबर मुझे न दी जाए तो क्या कोई भी उपाय मेरे पास है, "इंट्रेंसिक', भीतर, जिससे मैं पता लगा सकूं कि मैं कभी जन्मा? नहीं, आपके पास भीतरी कोई "एविडेंस' नहीं है कि आप जन्मे। असल में भीतर जो है, वह कभी जन्मा ही नहीं, "एविडेंस' हो कैसे सकता है? आप कहते हैं कि मैं कभी मरूंगा, लेकिन आपको मरने का कोई अनुभव है? नहीं, आप कहेंगे, दूसरों को हमने मरते देखा। लेकिन समझ लें कि एक आदमी को हम किसी को मरते न देखने दें--इसमें कोई कठिनाई नहीं है--क्या एक ऐसा आदमी जिसको हम किसी को मरते न देखने दें, कभी इस नतीजे पर पहुंच सकेगा--किसी भी कारण से, किसी भीतरी वजह से--कि मैं मरूंगा? नहीं पहुंच सकता। यह भी "आउटर "एविडेंस' है। यह भी हमने किसी और को मरते देखा है। लेकिन हमारे भीतर कोई प्रमाण नहीं है, कोई गवाही नहीं है कि हम मरेंगे। इसीलिए शायद इतने लोग मरते हैं, फिर भी हमें खयाल नहीं पैदा होता कि हम मरेंगे। हम मरते जाते हैं, सोचते हैं मर रहा होगा दूसरा कोई। बाकी चूंकि भीतरी कोई गवाही नहीं है कि मैं मरूंगा, न भीतरी कोई गवाही है कि मैं कभी जन्मा। भीतर की गवाही किस चीज की है? भीतर सिर्फ एक गवाही है कि मैं हूं, और कोई गवाही नहीं है।
तो गैर-गवाही की बातें माने जाने के लिए रमण मना करते हैं। वह कहते हैं कि जिसकी पक्की गवाही है, उतनी ही मानना काफी है। मैं हूं, इतनी गवाही है। मैं भी वह कहता हूं कि मैं हूं, उतनी गवाही है। और अगर थोड़े और भीतर प्रवेश करेंगे, तो पाएंगे, मैं भी  नहीं हूं। हूं, इतनी ही गवाही है।
कल बात करेंगे।