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रविवार, 22 फ़रवरी 2015

कृष्‍ण--स्‍मृति--(प्रवचन--15)


अनंत सागर-रूप चेतना के प्रतीक कृष्ण—(प्रवचन—पंद्रहवां)
दिनांक 2 अक्‍टूबर, 1970;
सांध्‍या, मनाली (कुलू)

"भगवान श्री, श्री अरविंद के कृष्ण-दर्शन के बारे में कुछ कहने को बाकी रह गया था। आपने अहमदाबाद में बताया था कि वह बहुत हद तक मानसिक प्रक्षेपण हो सकता है। तो अरविंद का कृष्ण-दर्शन क्या मानसिक प्रक्षेपण है या "मिस्टिक' अनुभूति है?
एक दूसरा प्रश्न भी है--अर्जुन यदि सिर्फ निमित्त मात्र हैं, तो वे यंत्रमात्र रह जाते हैं। उनकी "इंडिविजुअलिटी' का क्या होगा?'

कृष्ण-दर्शन, या क्राइस्ट का दर्शन, या बुद्ध या महावीर का दो प्रकार से संभव है। एक, जिसको "मेंटल प्रोजेक्शन' कहें, मानसिक प्रक्षेपण कहें; जबकि वस्तुतः कोई सामने नहीं होता लेकिन हमारे मन की वृत्ति ही आकार लेती है। जबकि वस्तुतः हमारा विचार ही आकर लेता है। जबकि वस्तुतः हम ही बाहर भी रूप के निर्माता होते हैं। मानसिक प्रक्षेपण, "मेंटल प्रोजेक्शन' से मतलब यह है कि वस्तुतः उस प्रक्षेपण, उस रूप, उस आकृति के पीछे कोई भी नहीं होता। मन की यह भी क्षमता है। मन की यह भी शक्ति है। जैसे रात हम स्वप्न देखते हैं, ऐसे ही हम खुली आंख से भी सपने देख सकते हैं। तो एक तो यह संभावना है।

दूसरी संभावना, कृष्ण-दर्शन की, कृष्ण-रूप के दर्शन की संभावना नहीं है, कृष्ण-आकृति के दर्शन की संभावना नहीं है, दूसरी संभावना कृष्ण-चेतना में डूबे होने की, कृष्ण-चेतना के विस्तार के अनुभव की, कृष्ण-चेतना के साक्षात्कार की संभावना है। जैसा मैंने कल कहा था कि एक तो सागर-रूप कृष्ण और एक लहर-रूप कृष्ण। लहर-रूप कृष्ण का उपयोग उनके सागर-रूप अनुभव के लिए किया जा सकता है। उनके चित्र, उनके प्रतीक, उनकी मूर्ति का उपयोग उनके सागर-रूप दर्शन के लिए किया जा सकता है। लेकिन जब उनका सागर-रूप दर्शन हुआ तब कृष्ण की प्रतिमा विदा हो जाएगी, विलीन हो जाएगी। और कृष्ण की आकृति खो जाएगी, शून्य हो जाएगी। कृष्ण की प्रतिमा का उपयोग हो सकता है उनके विराट दर्शन के प्राथमिक बिंदु की तरह। लेकिन अगर किसी को विराट का तो दर्शन नहीं होता, कृष्ण की प्रतिमा का ही दर्शन होता है, कृष्ण की आकृति का ही दर्शन होता है, तो वह सिर्फ मानसिक प्रक्षेपण है।
तो जिसको कृष्ण-चेतना का दर्शन होगा, उस चेतना का अनुभव आकृति का अनुभव नहीं है। उस चेतना का अनुभव रूप का अनुभव नहीं है। यह सिर्फ नाम की बात होगी कि वैसा आदमी चूंकि कृष्ण को प्रेम करता है, या कृष्ण की आकृति से उसने यात्रा की है, इसलिए इस अनुभव को कृष्ण-चेतना का अनुभव कहेगा। अगर किसी दूसरे आदमी को यही अनुभव हुआ हो--यही होगा अनुभव; बुद्ध की आकृति से भी हो जाएगी, जीसस की आकृति से भी हो जाएगा--तो जीसस से चलने वाला इसको क्राइस्ट का अनुभव कहेगा, कृष्ण से चलने वाला कृष्ण का अनुभव कहेगा, लेकिन यह अनुभव सागर-रूप का है। अरविंद जिस अनुभव की बात कर रहे हैं वह कृष्ण की आकृति और कृष्ण के व्यक्तित्व के अनुभव की बात कर रहे हैं। वे कहते हैं, कृष्ण ही उनके सामने साकार खड़े हैं। ऐसा अनुभव प्रक्षेपण है। "मेंटल प्रोजेक्शन' है। इसका बड़ा सुख है। इसका बड़ा रस है, लेकिन है यह हमारे मन का विस्तार। यह हमारे मन ने ही चाहा है, यह हमारे मन का ही खेल है, यह हमारे मन ने ही फैलाया और जाना है।
मन से हम शुरू कर सकते हैं, अंत नहीं होना चाहिए। मन से हम शुरू करेंगे ही, लेकिन अंत तो अ-मन पर, "नो माइंड' पर होना चाहिए। यह बड़े मजे की बात है कि जहां तक रूप है, वहां तक मन होता है। जहां तक आकृति है, वहां तक मन होता है। जहां तक रूप है, वहां तक मन होता है। जहां रूप और आकृति नहीं होती, वहां मन खो जाता है, वहां मन के होने का उपाय नहीं है। मन का भोजन है आकृति, रूप, सगुणता। अगर सगुण खो जाए तो मन भी खो जाता है। और जिस कृष्ण के दर्शन की मैं बात कर रहा हूं, वह मन के रहते नहीं होगा, वह मन के खोने पर होता है।
तो जिसने भी कभी कहा हो कि हां, मैंने कृष्ण को व्यक्तिरूप में जाना और पहचाना और देखा और मिले, यह वे विराट चेतना के पर्दे पर अपने मन की आकृति को "प्रोजेक्ट' कर रहे हैं। जैसे रात फिल्म के पर्दे पर पीछे "प्रोजेक्टर' होता है, और फिल्म के पर्दे पर चीजें दिखाई पड़नी शुरू हो जाती हैं जो वहां नहीं हैं, वहां सिर्फ कोरा पर्दा है। ऐसे ही हमारे मन का उपयोग हम "प्रोजेक्टर' की भांति कर सकते हैं, करते हैं। लेकिन यह अनुभव आध्यात्मिक अनुभव नहीं है, यह अनुभव "सॉइकिक एक्सपीरियेंस' है, मानसिक अनुभव है। सुख इससे मिलेगा, क्योंकि कृष्ण को जानना, कृष्ण को देख लेना बड़ा तृप्तिदायी होगा। लेकिन यह सुख ही है, यह आनंद नहीं है। और न सत्य की अनुभूति है।
अरविंद पंडित थे, इसलिए अगर मैं कह रहा होऊं कि उनका जो अनुभव है वह "प्रोजेक्शन' है, ऐसी बात नहीं है, अनुभव का जो ढंग है वह "प्रोजेक्शन' का है। अनुभव का जो वे चित्रण कर रहे हैं, जो वर्णन कर रहे हैं, वह "प्रोजेक्शन' का है। और अगर सागर-रूप कृष्ण का अनुभव हो--या सागर-रूप क्राइस्ट का, उसमें बहुत फर्क नहीं पड़ता--तो वह अनुभव कभी खोयेगा नहीं। वह एक बार हुआ कि हुआ। इसके बाद उसके अतिरिक्त कोई अनुभव ही नहीं बचेगा। इसके बाद वृक्षों में, पौधों में, पत्थर में, लोगों में, सब तरफ कृष्ण ही दिखाई पड़ने लगेंगे। लेकिन "प्रोजेक्शन' तो आएगा और चला जाएगा। वह एक क्षण ऊगेगा और खो जाएगा।
यह भी ध्यान लेने जैसी बात है कि "प्रोजेक्शन' का जो अनुभव है, मानसिक चित्रों का जो देख लेना है, उसे अरविंद पंडित होने की वजह से नहीं देख पा रहे हैं। क्योंकि पंडित चित्रों को देखने में असमर्थ होता है। अरविंद की एक और दिशा भी है, वह काव्य की दिशा है। अरविंद पंडित ही नहीं, महाकवि भी हैं। और रवींद्रनाथ से कम हैसियत के कवि नहीं हैं अरविंद। और अगर "नोबल प्राइज' उन्हें नहीं मिल सका तो इसका कारण यह नहीं है कि उन्होंने रवींद्रनाथ से कम हैसियत की कविता लिखी, उसका कुल कारण यह है कि उनकी कविता दुरूह है और समझ में नहीं आ सकी। "सावित्री' दुनिया के श्रेष्ठतम महाकाव्यों में एक है। दस-पांच महाकाव्य उसकी कोटि के महाकाव्य हैं। पंडित तो नहीं देख सकता "प्रोजेक्शन', लेकिन अरविंद का कवि देख सकता है। और अरविंद के भीतर जो कवि की क्षमता है, वही आसान कर देगी उन्हें कि वे कृष्ण को देख लें। उनका कवि-हृदय ही "प्रोजेक्शन' कर पाता है। प्रक्षेपण जो है, वह कवि-हृदय के लिए आसान है। शुष्क तर्क अकेला अगर उनके जीवन में हो तो यह प्रक्षेपण भी नहीं हो सकता। उन्होंने जो अभिव्यक्ति की है अति बुद्धिवादी शब्दों में, इस कारण नहीं कह रहा हूं कि वे सिर्फ जानकार हैं--क्योंकि अभिव्यक्ति तो तर्क के और बुद्धि के शब्दों में करनी ही होती है--लेकिन ये शब्द किसी पार की कोई खबर नहीं लाते, किसी "ट्रांसेंडेंस' की कोई खबर नहीं लाते।
हम शब्दों का प्रयोग दो तरह से कर सकते हैं। एक तो शब्दों का प्रयोग हम ऐसा कर सकते हैं जब कि शब्दों का अर्थ शब्द की सीमा के भीतर होता है। जितना बड़ा शब्द होता है उतना ही बड़ा अर्थ होता है। एक शब्द का प्रयोग हम ऐसा कर सकते हैं, जो कभी-कभी करते हैं, जबकि अर्थ तो बड़ा होता है और शब्द छोटा होता है। अरविंद के साथ उलटा मामला है। उनके शब्द बहुत बड़े हैं, अर्थ बहुत छोटा है। अरविंद बहुत बड़े शब्दों का उपयोग करते हैं। लंबे-लंबे शब्दों का उपयोग करते हैं। शब्द से अर्थ अगर ज्यादा हो, तो "ट्रांसेंड' करता है और "मिस्ट्री' में प्रवेश कर जाता है। और अगर शब्द अर्थ से बहुत बड़ा हो, तो ज्यादा-से-ज्यादा "फिलासफी' में, बल्कि "फिलासफी' भी न कहकर "फिलालाजी' में--दर्शन में भी नहीं, भाषा-शास्त्र में प्रवेश कर जाता है। शब्द से बड़ा अर्थ जब शब्द लेकर चलता है तो गर्भित हो जाता है, "प्रेग्नेंट' हो जाता है। अरविंद का कोई शब्द "प्रेग्नेंट' नहीं है, उसमें कुछ गर्भ नहीं है। उसके पार जाने वाला उसमें कोई सूचक "ऐरो' नहीं है। ऐसा नहीं है कि शब्द हर क्षण शब्द के पार की सूचना दे रहा हो। अरविंद के शब्दों का सारा उपयोग ऐसा है कि शब्द पूरी सूचना दे रहा है जितना उसमें अर्थ है, बल्कि अर्थ से भी ज्यादा। और कारण हैं उसके।
जैसा मैंने सुबह आपसे कहा कि अरविंद का सारा शिक्षण जहां हुआ वहां उन दिनों जैसा विज्ञान पर डार्विन हावी था, ठीक वैसे "फिलासफी' पर हीगल हावी था। हीगल ने बड़े-बड़े शब्दों का प्रयोग किया है, जिनमें अर्थ उतना नहीं है। लेकिन इतने जटिल और बड़े शब्दों का उपयोग किया है कि हीगल को पढ़ते वक्त पहला जो असर पड़ता है वह बहुत "प्रोफाउंडिटी' का है। वह ऐसा लगता है कि बड़ी गहरी बात कही जा रही है। क्योंकि अक्सर हमें जो बात समझ में नहीं आती उसे हम गहरा समझ लेते हैं। वह जरूरी रूप से सच नहीं होती। जो बात समझ में नहीं आती वह जरूरी रूप से गहरी नहीं होती। हालांकि यह जरूर सच है कि जो गहरी होती है, वह आसानी से समझ में नहीं आती। लेकिन इसमें उलटा खेल चल जाता है। तो हीगल ने बड़े कठिन और बड़े दुरूह और लंबे शब्दों का प्रयोग किया है, और जिसको कहना चाहिए बहुत "ब्रेकेटेड लैंग्वेज' का उपयोग किया है। बड़े कोष्ठक पर कोष्ठक लगाए हैं भाषा में। उसकी वजह से बहुत जाल हो गया है और समझना मुश्किल हो गया है। लेकिन जैसे-जैसे "स्कालरशिप' आगे बढ़ी वैसे-वैसे हीगल की प्रतिमा छोटी होने लगी, क्योंकि जितना ही समझ में आया उतना ही पाया कि इस आदमी को कहना बहुत कम है, लेकिन कहता बहुत लंबे रास्तों से है। अरविंद का भी कहने का ढंग हीगलियन है। वे हीगल जैसे ही "सिस्टम मेकर' हैं। तो वह कहते तो बहुत कम हैं, शब्द बड़े उपयोग करते हैं, लंबे उपयोग करते हैं, बहुत लंबा चक्कर लेते हैं।
अभिव्यक्ति तो बुद्धिगत रूप से करनी पड़ेगी, लेकिन अभिव्यक्ति निरंतर ही अपने से पार का इशारा बनती हो तो इस बात की खबर लाती है कि उस आदमी ने शब्दों के पार भी कुछ जाना है। लेकिन सब शब्दों में समा जाता हो, तो इस बात की खबर नहीं मिलती। और फिर, सारा अरविंद को पढ़ जाने के बाद मुंह में जो स्वाद छूट जाता है, वह सिर्फ शब्दों का है। मुंह में जो स्वाद छूट जाता है, वह अनुभव का जरा भी नहीं है। कई बार कोई आदमी बिलकुल न बोले, तो उसकी मौजूदगी भी मुंह में अनुभूति का स्वाद छोड़ सकती है। कई बार कोई बहुत बोले, तो भी मुंह में सिर्फ शब्दों का स्वाद छूट जाता है, अनुभव का कोई स्वाद नहीं छूट पाता है। अभिव्यक्ति तो बुद्धिगत होगी ही, लेकिन जब अनुभूति की अभिव्यक्ति होगी तो वह साथ-साथ बुद्धि को अतीत और अतिक्रमण करने वाली भी होती है। वह हर बार सूचना कर जाती है कि कुछ कहने योग्य था जो नहीं कहा जा सकता है। अरविंद को देखकर ऐसा लगेगा कि जो भी कहने योग्य था जो नहीं कहा जा सकता है। अरविंद को देखकर ऐसा लगेगा कि जो भी कहने योग्य था उससे भी ज्यादा अरविंद कह सके हैं। इससे तो रवींद्रनाथ का मुझे एक स्मरण आता है, उससे आपकी समझ में आए।
रवींद्रनाथ के मरने के कुछ घड़ियों पहले एक मित्र ने रवींद्रनाथ को कहा कि तुमने तो गा लिया जो तुम्हें गाना था, अब तुम शांति से, सुख से, परमात्मा को धन्यवाद देते हुए विदा हो सकते हो। तुम्हें जो करना था वह तुम कर चुके पृथ्वी पर। रवींद्रनाथ ने आंख खोली और कहा कि कैसी गलत बात कह रहे हो! मैं तो यह प्रार्थना कर रहा हूं परमात्मा से कि अभी तो मैं साज जमा पाया था, बिठा पाया था, ठोंक-पीटकर मृदंग को, सितार को तैयार कर पाया था, और यह विदा होने का वक्त आ गया। अभी मैंने गया कहां? अभी जिसको लोगों ने मेरे गीत समझे हैं, वह केवल साज का ठोंकना-पीटना था। अब साज तैयार हो गया और मेरे जाने का क्षण आ गया। अभी मैं वह कह कहां पाया जो मुझे कहना था!
लेकिन अगर कोई अरविंद से कहे, तो अरविंद यह न कह सकेंगे। अरविंद बिलकुल कह चुके हैं जो उन्हें कहना था। बड़े ढंग से और व्यवस्था से कह चुके हैं। अरविंद और रवीन्द्र में मैं कहूंगा कि रवीन्द्र कहीं ज्यादा "मिस्टिक' हैं बजाय अरविंद के। ज्यादा रहस्य की तरफ उनके इशारे हैं। अरविंद के इशारे बहुत साफ हैं, "नान-मिस्टिक' हैं, रहस्य की तरफ नहीं हैं।
एक बात और पूछी है। वह यह पूछी है कि अगर अर्जुन सिर्फ निमित्त मात्र है, और जो होना था वह होना है, जो हो चुका है वही होना है, तो फिर अर्जुन के व्यक्तित्व का क्या होगा? वह तो फिर एक "इन्स्ट्रूमेंट', एक साधन रह जाएगा?
इसे समझने की कोशिश करेंगे तो बड़ी सरलता से कुछ सत्य दिखाई पड़ेंगे। अगर किसी को "इन्स्ट्रूमेंट' बनाया जाए, तो उसका व्यक्तित्व नष्ट होता है। लेकिन अगर कोई व्यक्ति "इन्स्ट्रूमेंट' बन जाए तो उसका व्यक्तित्व खिलता है, नष्ट नहीं होता। अगर कोई दबाव डालकर किसी आदमी को साधन बना दे, तो उस आदमी की आत्मा मर जाती है। लेकिन अगर कोई अपने ही हाथ से समर्पण कर दे और सब छोड़ दे और साधन बन जाए, तो उसकी आत्मा पूरी तरह खिल जाती है। उसका व्यक्तित्व नष्ट नहीं होगा, "फुलफिल्ड' हो जाता है। जो फर्क है असल में वह यह नहीं है। फर्क इतना ही है कि अगर मेरे ऊपर जबर्दस्ती आप हथकड़ियां डाल दें तो मैं गुलाम हो जाता हूं। और अगर मैं हथकड़ियां उठाकर आपको दे दूं और कहूं कि मेरे हाथ में डाल दें, तो मैं गुलामी का भी नियंता हो जाता हूं। मैं अपनी गुलामी का भी निर्धारक हो जाता हूं। मैं निरंतर डायोजनीज की कहानी कहता हूं, वह आपको कहना अच्छा होगा।
डायोजनीज गुजरता है एक जंगल से। नंगा फकीर, अलमस्त आदमी है। कुछ लोग जा रहे हैं गुलामों को बेचने बाजार। उन्होंने देखा इस डायोजनीज को। सोचा कि यह आदमी पकड़ में आ जाए तो दाम अच्छे मिल सकते हैं। और ऐसा गुलाम कभी बाजार में बिका भी नहीं है। बड़ा शानदार है! ठीक महावीर जैसा शरीर अगर किसी आदमी के पास था दूसरे फकीरों में, तो वह डायोजनीज के पास था। मैं तो यह निरंतर कहता ही हूं कि महावीर नग्न इसलिए खड़े हो सके कि वे इतने सुंदर थे कि ढांकने योग्य कुछ था नहीं। बहुत सुंदर व्यक्तित्व था। वैसा डायोजनीज का भी व्यक्तित्व था। गुलामों ने लेकिन सोचा कि हम हैं तो आठ, लेकिन इसको पकड़ेंगे कैसे! यह हम आठ की भी मिट्टी कर दे सकता है। यह अकेला काफी है। मगर फिर भी उन्होंने सोचा कि हिम्मत बांधो। और ध्यान रहे, जो दूसरे को दबाने जाता है वह हमेशा भीतर अपने को कमजोर समझता ही है। वह सदा भयभीत होता है। ध्यान रखें, जो दूसरे को भयभीत करता है, वह भीतर भयभीत होता ही है। सिर्फ वे ही दूसरे को भयभीत करने से बच सकते हैं, जो अभय हैं। अन्यथा कोई उपाय नहीं। असल में वह दूसरे को भयभीत ही इसलिए करता है कि कहीं यह हमें भयभीत न कर दे। मेक्याबेली ने लिखा है, इसके पहले कि कोई तुम पर आक्रमण करे, तुम आक्रमण कर देना; यही सुरक्षा का श्रेष्ठतम उपाय है। तो डरा हुआ आदमी।
वे आठों डर गए। बड़ी गोष्ठी करके, बड़ा पक्का निर्णय करके, चर्चा करके वे आठों एकदम से हमला करते हैं डायोजनीज पर। लेकिन बड़ी मुश्किल में पड़ जाते हैं। अगर डायोजनीज उनके हमले का जवाब देता तो वह मुश्किल में न पड़ते। क्योंकि उनकी योजना में इसकी चर्चा हो गई थी। डायोजनीज उनके बीच में आंख बंद करके हाथ जोड़कर खड़ा हो जाता है और कहता है, क्या इरादे हैं? क्या खेल खेलने का इरादा है? वे बड़ी मुश्किल में पड़ गए हैं कि अब इससे क्या कहें! उन्होंने कहा कि माफ करें, हम आपको गुलाम बनाना चाहते हैं। डायोजनीज ने कहा, इतने जोर से कूदने-फांदने की क्या जरूरत है! नासमझो, निवेदन कर देते, हम राजी हो जाते। इसमें इतना उछल-कूद, इतना छिपना-छिपाना यह सब क्या कर रहे हो? बंद करो यह सब। कहां हैं तुम्हारी जंजीरें? वे तो बड़ी मुश्किल में पड़ गए हैं। क्योंकि ऐसा आदमी कभी नहीं देखा था जो कहे--कहां हैं तुम्हारी जंजीरें? और इतने डांटकर वह पूछता है जैसे मालिक वह है और गुलाम ये हैं। जंजीरें उन्होंने निकालीं। डरते हुए दे दीं। उसने हाथ बढ़ा दिए और कहा कि बंद करो। और वे कहने लगे, आप यह क्या कर रहे हैं, हम आपको गुलाम बनाने आए थे, आप बने जा रहे हैं। डायोजनीज ने कहा कि हम यह राज समझ गए हैं कि इस जगत में स्वतंत्र होने का एक ही उपाय है और वह यह कि गुलामी के लिए भी दिल से राजी हो जाए। अब हमें कोई गुलाम बना नहीं सकता है। अब उपाय ही न रहा तुम्हारे पास। अब तुम कुछ न कर सकोगे।
फिर वे डरे हुए उसको बांधकर चलने लगे, तो डायोजनीज ने कहा कि नाहक तुम्हें यह जंजीरों का बोझ ढोना पड़ रहा है। क्योंकि उन जंजीरों को उन्हें पकड़कर उन्हें रखना पड़ रहा है। डायोजनीज ने कहा उतारकर फेंक दो। मैं तो तुम्हारे साथ चल ही रहा हूं। एक ही बात का खयाल रखें कि तुम समय के पहले मत भाग जाना, मैं भागने वाला नहीं हूं। तो उन्होंने जंजीरें उतारकर रख दीं, क्योंकि आदमी तो ऐसा ही मालूम हो रहा था। जिसने अपने हाथ में जंजीरें पहनवा दीं, उसको अब और जंजीर बांधकर ले जाने का क्या मतलब था? फिर जहां से भी वे निकलते हैं तो डायोजनीज शान से चल रहा है और जिन्होंने गुलाम बनाया है, वे बड़े डरे हुए चल रहे हैं कि पता नहीं, कोई उपद्रव न कर दे यह किसी जगह पर, कोई सड़क पर, किसी गांव में। और जगह-जगह जो भी देखता है वह डायोजनीज को देखता है और डायोजनीज कहता है, क्या देख रहे हो? ये मेरे गुलाम हैं। ये मुझे छोड़कर नहीं भाग सकते। वह जगह-जगह यह कहता फिरता है कि ये मुझे छोड़कर नहीं भाग सकते, ये मुझसे बंधे हैं। और वे बेचारे बड़े हतप्रभ हुए जा रहे हैं। किसी तरह वह बाजार आ जाए!
वह बाजार आ गया। उन्होंने जाकर किसी से गुफ्तगू की, जो बेचने वाला था, उससे बातचीत की। कहा कि जल्दी नीलाम पर इस आदमी को चढ़ा दो, क्योंकि इसकी वजह से हम बड़ी मुसीबत में पड़े हुए हैं। और भीड़ लग जाती है और लोगों से यह कहता है कि ये मेरे गुलाम हैं, अच्छा, ये मुझे छोड़कर नहीं भाग सकते। अगर हों मालिक, भाग जाएं। तो इसको छोड़कर कहां भागें हम, कीमती आदमी है और पैसा अच्छा मिल जाएगा। तो उसे टिकटी पर खड़ा किया जाता है और नीलाम करने वाला जोर से चिल्लाता है कि एक बहुत शानदार गुलाम बिकने आया है, कोई खरीदार है? तो डायोजनीज जोर से चिल्लाकर कहता है कि चुप, नासमझ! अगर तुझे आवाज लगाना नहीं आता है तो आवाज हम लगा देंगे। वह घबड़ा जाता है, क्योंकि किसी गुलाम ने कभी उस नीलाम करने वाले को इस तरह नहीं डांटा था। और डायोजनीज चिल्लाकर कहता है कि आज एक मालिक इस बाजार में बिकने आया है, किसी को खरीदना हो तो खरीद ले।
जिस "इन्स्ट्रूमेंटालिटी' में, जिस यांत्रिकता में हम यंत्र बनाए जाते हैं, जहां हमारी मजबूरी है, जहां हम गुलाम की तरह हैं, वहां तो व्यक्तित्व मरता है। लेकिन कृष्ण अर्जुन से यह नहीं कह रहे हैं कि तू यंत्रवत बन जा। कृष्ण अर्जुन से यह कह रहे हैं कि तू समझ। इस जगत की धारा में तू व्यर्थ ही लड़ मत। इस धारा को समझ, इसमें आड़े मत पड़, इसमें बह। और तब तू पूरा खिल जाएगा। अगर कोई आदमी अपने ही हाथ से समर्पित हो गया है इस जगत के प्रति, सत्य के प्रति, इस विश्वयात्रा के प्रति, तो वह यंत्रवत नहीं है, वही आत्मवान है। क्योंकि समर्पण से बड़ी और कोई घोषणा अपी मालकियत की इस जगत में नहीं है।
इस बात को थोड़ा ठीक से समझ लेना।
समर्पण से बड़ी घोषणा इस जगत में अपनी मालकियत की और दूसरी नहीं है। क्योंकि अगर मैं समर्पित करता हूं तो इसका मतलब ही यह है कि मैं अपना मालिक हूं और समर्पित कर सकता हूं। तो इससे अर्जुन यंत्रवत नहीं हो जाता, इससे अर्जुन आत्मवान हो जाता है। और उसका व्यक्तित्व पहली दफे पूरी निश्चेष्टा में, "एफर्टलेसली' खिलता है।

"भगवान श्री, हम फिर लौटकर अरविंद के कृष्ण-दर्शन पर आ रहे हैं। आपने बताया कि वह उनका आत्मप्रक्षेपण लगता है। लेकिन, आपने एक बार बताया था कि आज भी लामा-पद्धति के अनुसार एक ऐसा दिन आता है जबकि कुछ अधिकारी लामा बुद्ध के साथ आज भी संपर्क स्थापित करते हैं। एक बार और भी जब आप गांधी पर बोल रहे थे, तब किसी ने आपसे प्रश्न किया था कि ऐसी बात गांधी के संबंध में कैसे कहते हैं? क्या गांधी ने ऐसा कहा? तो आपने कहा था कि मैं यह बात गांधी से पूछकर कह रहा हूं। तीसरी बात और। लामा-पद्धति के बारे में ऐसा भी पढ़ने में आया है कि अब भी तिब्बत में कुछ वर्ष पूर्व तक ऐसे लामा थे जो कि जीवित अवस्था में भी सूक्ष्म-शरीर से दूसरे स्थान पर पहुंचकर स्थूल-रूप से अपने दर्शन देते थे और वापस अपने स्थान पर आ जाया करते थे। इन बातों के बारे में मैं आपसे कुछ जानना चाहता हूं।'

स संबंध में दोत्तीन बातें समझ लें।
एक तो, ऐसा मैंने कहा है कि बुद्धपूर्णिमा के दिन, जिस हिमालय की शृंखलाओं में हम बैठे हैं, इसी हिमालय के किसी शिखर पर बुद्धपूर्णिमा के दिन एक विशेष घड़ी में बुद्ध के व्यक्तित्व का दर्शन होता है। पांच सौ लामाओं से ज्यादा उस पर्वत शिखर पर कभी नहीं हुए हैं। उन पांच सौ लामाओं में से जब एक कम होता है, तभी एक नए लामा को जगह मिलती है। लेकिन इसमें और कृष्ण के दर्शन में, जो अरविंद को हुए, तभी एक नए लामा को जगह मिलती है। लेकिन इसमें और कृष्ण के दर्शन में, जो अरविंद को हुए, बुनियादी फर्क है। कृष्ण के दर्शन में अरविंद चेष्टारत हैं। इस दर्शन में बुद्ध चेष्टारत हैं, लामा नहीं। लामा सिर्फ मौजूद होते हैं।
इस फर्क को बहुत ठीक से समझ लेना चाहिए।
यह बुद्ध का आश्वासन है कि बुद्धपूर्णिमा के दिन फलां-फलां पर्वत पर रात्रि के इतने क्षणों में वे प्रगट होंगे। यह बुद्ध का सागर-रूप जो है, इस रात की इस घड़ी में फिर लहर बनेगा। लेकिन इसमें लामा कुछ भी नहीं कर रहे हैं। उनका कोई "पार्ट' नहीं है इसमें। एक फर्क।
दूसरा फर्क, अरविंद का दर्शन अकेले में हुआ दर्शन है। "प्रोजेक्शन' में और इसमें बुनियादी फर्क है। ये पांच सौ लोग इकट्ठा दर्शन करते हैं। "प्रोजेक्शन' हमेशा "पर्सनल' होता है। उसमें दूसरे आदमी को "पार्टिसिपेट' नहीं करवाया जा सकता। अगर अरविंद को जिस कृष्ण के दर्शन हो रहे हैं, आप कहें कि हम भी इस कमरे में आ जाएं और हमको भी करवा दें, तो वह कहेंगे, यह नहीं हो सकता। यह मुझको ही होता है, इसको दूसरे आदमी के साथ भागीदारी में नहीं देखा जा सकता। लेकिन पांच सौ व्यक्तियों के सामने जब कोई चीज प्रगट होती है, तो इसको व्यक्ति-मन का "प्रोजेक्शन' नहीं कह सकते। और दूसरी बात यह कि पांच सौ लोग "टैली' करते हैं कि हां ठीक, ठीक घड़ी पर, ठीक समय पर जो दिखाई पड़ा है वह, जो सुनाई पड़ा है वह, इसके पांच सौ गवाह होते हैं। अरविंद के अकेले वह खुद ही गवाह हैं। उससे भी पहले जो मैंने बात कही, उस कृष्ण-दर्शन में अरविंद की सतत चेष्टा है। उसमें पूरा प्रयास है कि कृष्ण का दर्शन कैसे हो! इसमें कोई चेष्टा नहीं है। इसमें एक घड़ी पर एक आश्वासन है, जो पूरा होता है। एक लहर जो पीछे सागर में उठी थी, वायदा कर गई है कि फलां-फलां घड़ी तुम इस तट पर इकट्ठे हो जाना, मैं फिर उठूंगी।

"वह "कलेक्टिव आटो-सजेशन' हो सकता है।'

सके कई कारण हैं कि नहीं हो सकता। क्योंकि यह जो  पांच सौ की सीमित संख्या है, इसमें हर व्यक्ति प्रवेश नहीं पाता। और सिर्फ वे ही लोग प्रवेश पाते हैं जो अपने अचेतन चित्त को जानने में समर्थ हो गए हैं। वह उसकी पात्रता का नियम है। जब तक अचेतन चित्त पर हमारी अपनी सामर्थ्य नहीं है, तब तक "कलेक्टिवली' हम "हिप्नोटाइज्ड' हो सकते हैं। लेकिन जिस दिन मेरे अपने अचेतन चित्त का मुझे पता हो गया, उस दिन मुझे "हिप्नोटाइज्ड' नहीं किया जा सकता। उस दिन कोई उपाय नहीं, क्योंकि मेरे भीतर वह कोई हिस्सा नहीं रहा जहां सुझाव डालकर और मेरे सामने कोई "प्रोजेक्शन' करवाया जा सके। इसलिए एक लामा के हटने पर ही दूसरा लामा चुना जाता है। और वह चुनाव भी बड़ी मुश्किल का चुनाव है।
लामा का चुनाव बड़ी मुश्किल का चुनाव है और उसके बड़े अजीब नियम हैं। एक लामा मरता भी है...अभी यह दलाई लामा जो आज हैं, यह पिछले दलाई लामा की ही आत्मा हैं...पिछला दलाई लामा जब मरता है, एक दलाई लामा जब मरता है तो वह अपना वक्तव्य छोड़ जाता है कि अगली बार इस-इस शरीर के ढंग में मैं प्रकट होऊंगा, तुम खोज लेना। और एक अजीब बात है कि एक छोटा-सा सूत्र छोड़ जाता है। उस सूत्र की पूरे तिब्बत के गांव-गांव में बैंड पीटकर घोषणा की जाती है। उस सूत्र का जो बच्चा जवाब दे देता है--बहुत मुश्किल है वह। दलाई लामा एक मरेगा, तो कितने वर्ष बाद तिब्बत के गांव-गांव में वह सूत्र घुमाया जाए, इसकी वह सूचना कर जाएगा। क्या-क्या चिह्न उस लड़के पर होंगे, इसकी सूचना कर जाएगा। और इसका उत्तर सिवाय इस दलाई लामा के किसी को भी पता नहीं है।  वह उत्तर लिखकर रख जाएगा, वह सब "सील्ड' होगा। और जब कोई बच्चा उसका उत्तर दे देगा और सारे चिह्न मिल जाएंगे, तब वह "सील्ड' उत्तर खोला जाएगा। अगर वह उत्तर वही है जो इस बच्चे ने दिया है, तो गवाही होगी कि यह दलाई लामा के योग्य हो गया, इसको दलाई लामा की जगह पर बिठा दिया जाए। यह उसकी ही आत्मा, जो उत्तर लिखकर गई थी, उत्तर दे रही है। तो तिब्बती लामाओं की परंपरा के अपने बड़े अजीब सूत्र हैं। यह जो एक आदमी खाली हो जाएगा, इस खाली आदमी को खोजने के नियम हैं। और इस पर सब तरह के प्रयोग करके यह जांचने की कोशिश की जाएगी कि यह आदमी "हिप्नोटाइज्ड' तो नहीं हो सकता। अगर यह हो जाता है, तो यह पात्र नहीं होगा। इसलिए "कलेक्टिव हिप्नोसिस' का कोई उपाय नहीं है।
फिर कुछ भी किया नहीं जाता। सिर्फ ये पांच सौ लामा एक खास घड़ी में, एक खास क्षण में मौन चुपचाप खड़े हो जाते हैं और घटना घटती है। न कोई सुझाव दिया जाता, न कोई बात की जाती, न कोई चीत की जाती है। यह बहुत भिन्न मामला है। यह अरविंद के कृष्ण-दर्शन का मामला नहीं है।
दूसरी बात, जैसा मैंने कहा कि उन आत्माओं से जिनके शरीर तो छूट गए लेकिन जो अभी सागर-रूप नहीं हो गई हैं, संबंध स्थापित किए जा सकते हैं। जो आत्माएं शरीर तो छोड़ चुकी हैं, लेकिन अभी सागर-रूप में खो नहीं गई हैं, अशरीरी जिनका व्यक्तित्व है, उनसे संबंध स्थापित किए जा सकते हैं। उसमें कोई कठिनाई नहीं है। उसमें जरा भी कठिनाई नहीं है।
कृष्ण अशरीरी आत्मा नहीं हैं, सागर-रूप हो गए हैं। गांधी अशरीरी आत्मा हैं। साधारण रूप से जो लोग भी मर जाते हैं, इन सबसे संबंध स्थापित किए जा सकते हैं। उसके अपने नियम, अपनी विधि, अपने "टेक्नीक' हैं। इसमें बहुत कठिनाई नहीं है। यह बड़ी सरल-सी बात है। कई बार ऐसी आत्माएं अपने स्वजनों से खुद भी संबंध स्थापित करने की चेष्टा करती हैं। हम घबड़ा जाते हैं उससे, हम परेशान हो जाते हैं उससे। जिनको हमने बहुत प्रेम किया है, उनको भी हम अशरीर देखकर प्रेम करने को राजी न होंगे। जिन्हें हमने बहुत चाहा है, वे भी कल अगर शरीर के बिना हमारे द्वार पर उपस्थित हो जाएं तो हम दरवाजा बंद करके पुलिस को चिल्लाएंगे कि हमें बचाओ! क्योंकि हमने शरीर को ही पहचाना है। उससे गहरी तो हमारी कोई पहचान नहीं है।
जो आत्माएं शरीर के बाहर हैं, लेकिन नए जन्मों की तलाश में हैं, उनसे संबंध स्थापित करना बहुत सरल-सी बात है। न उसमें "प्रोजेक्शन' का सवाल है, न उसमें उनके प्रकट होने का सवाल है, सिर्फ उनके पास शरीररूपी यंत्र नहीं रहा, बाकी उनके पास सारे यंत्र हैं। इसलिए आपको उनसे संबंध स्थापित करने का थोड़ा-सा खयाल हो तो बड़ी आसानी से कर सकते हैं। यहां हम इतने लोग बैठे हैं, यहां ऐसा नहीं है कि हम इतने ही लोग बैठे हैं। जितने दिखाई पड़ते हैं, उतने तो बैठे ही हैं, जो नहीं दिखाई पड़ते हैं वे भी मौजूद हैं, और उनसे अभी तत्काल, अभी संबंध स्थापित किया जा सकता है। सिर्फ आपको "रिसेप्टिव' होने की जरूरत है। कमरा बंद कर लें और तीन आदमी कमरे में सिर्फ आंख बंद करके, तीनों हाथ जोड़कर बैठ जाएं, और इतनी ही प्रार्थना कर लें कि इस कमरे में कोई आत्मा हो तो वह अपनी सूचनाएं दे। आप जो सूचनाएं उसको कह दें, वह देना शुरू कर देगी। आप इतना ही कह दें कि यह टेबल पर जो पेपरवेट रखा है, यह उछलकर जवाब देने लगे, तो आप दो-चार दिन में पाएंगे कि आपका पेपरवेट उछलकर जवाब देने लगा। आप यह कह सकते हैं कि दरवाजे पर खटखट करके आवाज दे वह आत्मा, तो दरवाजे पर आवाज हो जाएगी। फिर इसको आप आगे बढ़ा सकते हैं। यह बहुत कठिन नहीं है। क्योंकि आत्माएं चौबीस घंटे चारों तरफ मौजूद हैं। और ऐसी आत्माएं भी चारों तरफ मौजूद हैं जो हमेशा "विलिंग' हैं, जो अगर आप कुछ कहें तो करने को सदा तत्पर हैं। जो बड़ी उत्सुक हैं कि आप किसी तरह का संबंध उनसे स्थापित करें। जो "कम्यूनिकेशन' के लिए बड़ी आतुर हैं। जो कुछ कहना चाहती हैं, लेकिन उनको कहने का उपाय नहीं मिल रहा है। क्योंकि उनके और आपके बीच शरीर का ही "कम्यूनिकेशन' का माध्यम था, वह टूट गया है और दूसरे माध्यम का हमें कोई पता नहीं है। इसमें अड़चन नहीं है। यह बहुत सीधी-सी, सरल-सी, प्रेतात्म-विद्या का हिस्सा है।
यह जो पूछा गया है कि क्या, जैसा कहा जाता है, एक शरीर से आत्मा दूर जाकर वापस लौट आ सकती है? बिलकुल ही लौट आ सकती है। जा भी सकती है। क्योंकि शरीर से हमारा होना, शरीर में हमारा होना है। उससे बाहर की यात्रा सदा संभव है। उसके अपने मार्ग, अपनी विधियां हैं। शरीर के बाहर हुआ जा सकता है, यात्रा की जा सकती है, दूर तक जाया जा सकता है, वापस लौटा जा सकता है। कई बार आकस्मिक रूप से भी वैसा हो जाता है। जो आपको कुछ पता नहीं होता। ध्यान के किसी गहरे क्षण में आप अचानक कई बार ऐसा अनुभव कर पाएंगे कि आपको लगेगा आप शरीर के बाहर हो गए हैं और अपने ही शरीर को देख रहे हैं। फिर उस सबके विस्तार हैं, पर वह अलग बात है। उस पर कभी अलग ही हम इकट्ठे मिलें, तो प्रेतात्म-विद्या पर सारी बात की जा सकती है।

"भगवान श्री, रहस्य-विद्या के अतिरिक्त बौद्धिक स्तर पर भी आत्मा को समझने का और पुनर्जन्म का कोई प्रमाण है? यानी दार्शनिक रूप से भी क्या हम इसे सिद्ध कर सकते हैं, बिना साधना में गए, कि आत्मा है और पुनर्जन्म होता है?
भगवान श्री, जो आत्मा होश में मरती है, उनको भी पता रहता है पूर्व-जन्म का। इन प्रेतात्माओं को जो पता चलता है अपने पूर्वजन्म का, तो क्या ये सब होश में मरे हुए होते हैं?'

जो व्यक्ति मरता है, उसका सिर्फ शरीर ही मरता है, उसका चित्त नहीं मरता। उसका मन नहीं मरता, वह उसके साथ जाता है। और थोड़े समय तक, जैसे हम सुबह जब स्वप्न से जागते हैं तो थोड़े समय तक स्वप्न याद रहता है, दोपहर होते-होते तिरोहित हो जाता है। सांझ होते-होते कुछ याद नहीं रहती कि क्या स्वप्न था। जब लेकिन स्वप्न से हम एकदम उठते हैं तब स्वप्न का पिछला हिस्सा थोड़ा-सा हमें याद होता है, हालांकि स्वप्न हमने बेहोशी में देखा है। स्वप्न हमने होश में नहीं देखा। लेकिन जब नींद टूटने के करीब होती है तो थोड़ा-सा होश आने लगता है। और उस होश में जितना स्वप्न का अंकन, जितने भी संस्कार छूट जाते हैं, वे हमें जागने पर याद रहते हैं। लेकिन दोपहर होते-होते दोपहर की धूप खिलते-खिलते वे सब विदा हो जाते हैं, सांझ को हमें कोई स्वप्न याद नहीं रह जाता।
प्रेतात्मा, जैसे ही कोई व्यक्ति शरीर को छोड़ता है, थोड़े समय तक--और यह प्रत्येक व्यक्ति की याददाश्त का समय भिन्न-भिन्न होगा--उसे थोड़े समय तक अपने स्वजन, अपने प्रियजन याद रहते हैं। इन स्वजन और प्रियजनों को भुलाने के लिए बहुत उपाय किए गए हैं। आदमी मरा नहीं कि हम उसकी लाश को तत्काल मरघट ले जाना चाहते हैं। हम उसकी "आइडेंटिटी' को तत्काल नष्ट करना चाहते हैं। क्योंकि अब कोई अर्थ नहीं है कि वह हमें याद रखे। और यह शरीर जितनी देर रखा जा सके, उतनी देर तक वह हमें याद रख सकेगा, क्योंकि इसी शरीर के माध्यम से उसकी सारी स्मृतियां हमसे हैं। यह शरीर बीच का जोड़ है। इसको हम ले जाते हैं। एकदम से आदमी मरता है तो थोड़ी देर तक तो उसे पता ही नहीं चलता है कि मैं मर गया हूं। क्योंकि भीतर तो कुछ मरता नहीं। थोड़ी देर तक तो उसे ऐसा ही अनुभव होता है कि क्या कुछ गड़बड़ हो गई, शरीर अलग मालूम पड़ रहा है, मैं अलग हो गया हूं! हां, जो लोग ध्यान में गए हैं, उन्हें यह तकलीफ नहीं होती है, क्योंकि इस अनुभव से वह पहले गुजर गए होते हैं। मरने पर अधिकतम लोगों को बड़ी बिबूचन पैदा होती है। पहली बिबूचल यही पैदा होती है कि यह मामला क्या है! ये लोग रो क्यों रहे हैं, ये चिल्ला क्यों रहे हैं कि मैं मर गया, क्योंकि मैं तो हूं। सिर्फ इतना ही मालूम होता है कि शरीर अलग पड़ा है जो मेरा था, और मैं जरा अलग मालूम पड़ रहा हूं, और तो कुछ मर नहीं गया है।
इसी शरीर के माध्यम से हमारा सारा "एसोसिएशन' है स्मृतियों का, इसलिए हम तत्काल मरघट ले जाते हैं और शरीर को जला देते हैं या गड़ा देते हैं। उस शरीर के टूटते ही उस आदमी के स्मृतियों के जाल हमसे एकदम विच्छिन्न हो जाते हैं। और जैसे स्वप्न से उठा आदमी थोड़ी देर में स्वप्न भूल जाता है, ऐसा मृत्यु से उठा आदमी या जिसे हम जीवन कहते हैं उससे उठा हुआ आदमी थोड़ी देर में सब भूल जाता है। वह कितनी देर में भूल जाता है उसके हिसाब से हमने दिन तय किए हैं। जिनकी स्मृति बहुत कमजोर है वे तीन दिन में भूल जाते हैं। जिनकी स्मृति बहुत अच्छी है, वे तेरह दिन में भूल जाते हैं। यह बहुत सामान्य हिसाब से तय किए हुए दिन हैं कि तीन दिन में भूल जाएंगे कि तेरह दिन में भूल जाएंगे, लेकिन यह आमतौर से है। लेकिन प्रगाढ़ से प्रगाढ़ स्मृति का आदमी एक वर्ष में भूल जाता है। इसलिए एक वर्ष तक मृतक के कुछ संस्कार हम जारी रखते हैं। वह एक वर्ष तक हम उसके साथ थोड़ा-सा संबंध जारी रखते हैं, क्योंकि रह सकता है संबंध। लेकिन सामान्यतया ऐसा नहीं होता है। तीन दिन में सब टूट जाता है। कुछ का तो और भी जल्दी टूट जाता है। वह व्यक्ति-व्यक्ति पर निर्भर होगा। साल भर बहुत कम आत्माएं बचती भी हैं आत्मा रूप में। बहुत जल्दी शीघ्र नए जन्म ग्रहण कर लेती हैं।
होश में जो मरता है, वह तो कभी मरता ही नहीं, पहली बात। जो मरते वक्त पूरे होश में है, वह तो कभी मरता ही नहीं, क्योंकि वह जानता है कि सिर्फ शरीर छूटा। और जो इतने होश में है, उसका कोई न स्वजन है, न कोई प्रियजन है, न कोई पराया जन है। जो इतने होश में है, वह स्मृतियों के बोझ से लदता नहीं। जो इतने होश में है, उसकी तो बात ही नहीं है। और जो मृत्यु में होश से मरता है, वह अगले जन्म को होश से पा लेता है। जैसे मैंने कहा कि मृत्यु के बाद भी थोड़े दिन तक हमें स्मरण होता है जहां से हम आए, जन्म के बाद भी बच्चे को थोड़े दिन स्मरण होता है जहां से वह आया। यह प्रेतात्म-जीवन का जो अनुभव बीच में गुजरा, उसकी स्मृतियां उसके पास होती हैं। लेकिन वह धीरे-धीरे खो जाती हैं। और इसके पहले कि वाणी उसे उपलब्ध होती है, खो जाती हैं। कभी-कभी बहुत ही तीव्र स्मृति वाले बच्चों को वे स्मृतियां शेष रह जाती हैं, जो कि उसके बोलने के बाद भी जारी रहती हैं। वह "रेयर' घटना है। स्मृति की बहुत ही अनूठी संभावना के कारण ऐसा होता है।
एक सवाल इस संबंध में पूछा गया है कि क्या रहस्यात्मक अनुभूति के अतिरिक्त भी पुनर्जन्म का कोई दार्शनिक प्रमाण है?
दार्शनिक प्रमाण तो सिर्फ तार्किक होते हैं। तर्क के आधार पर होते हैं। और तर्क की एक खराबी है कि जितने वजन का तर्क पक्ष में दिया जा सकता है, ठीक उतने ही वजन का तर्क विपक्ष में दिया जा सकता है। तर्क जो हैं, उसको अगर ठीक से कहें तो जो जानते हैं वे तर्क को वेश्या कहते हैं, किसी के भी साथ खड़ा हो सकता है। उसका कोई अपना निजी मंतव्य तर्क का नहीं है।
तो जिन लोगों ने तर्क और दर्शन से सिद्ध करने की कोशिश की है कि पुनर्जन्म है, उनके विपरीत ठीक उतने ही वजन के तर्कों से सिद्ध किया जा सका है कि पुनर्जन्म नहीं है। तर्क जो है वह "सॉफिस्ट्री' है। "साफिस्ट्री' का मतलब कि तर्क जो है वह वकील की तरह है। उसका कोई अपना कोई हिसाब नहीं है। किसने उसको किया हुआ है अपनी तरफ, उसकी तरफ वह बोलता है। वह अपनी पूरी ताकत लगाता है। इसलिए तर्क से कभी कोई निष्कर्ष निष्पन्न नहीं होता। बहुत निष्कर्ष निष्पन्न होते हुए मालूम होते हैं, होता कभी नहीं। क्योंकि ठीक विपरीत तर्क से इतने दूर तक पक्ष में जाता है तो उतनी ही दूर तक विपक्ष में जा सकता है। इसलिए दर्शनशास्त्र कभी तय नहीं कर पाएगा कि पुनर्जन्म है या नहीं। बातें कर पाएगा। हजारों साल तक बातें कर पाएगा, लेकिन कुछ सिद्ध नहीं होगा।
तर्क के साथ एक और मजा है कि जिसे आप सिद्ध करते हैं, उसे आप पहले ही माने होते हैं। तर्क के साथ एक मजा है कि जिसे आप सिद्ध करते हैं, उसे आपने पहले ही माना होता है, तर्क तो आप पीछे उपयोग में करते हैं। "एज्यूम' किया होता है, वह आपका "प्री-सपोजीशन' होता है।
एक मित्र हैं, वे एक बड़े प्रोफेसर हैं और किसी विश्वविद्यालय में पुनर्जन्म पर खोज का कार्य करते हैं। कोई मुझसे उनको मिलाने लिवा आया। और उन्होंने मुझसे मिलते ही कहा कि मैं वैज्ञानिक रूप से सिद्ध करना चाहता हूं कि पुनर्जन्म है। तो मैंने उनसे कहा कि यह तो फिर वैज्ञानिक न हो पाएगा, क्योंकि क्या सिद्ध करना चाहते हैं यह आपने पहले ही पक्का किया हुआ है। वैज्ञानिक का मतलब यह होता है कि आप ऐसा कहिए कि मैं जानना चाहता हूं कि पुनर्जन्म है या नहीं। आप कहते हैं, मैं सिद्ध करना चाहता हूं कि पुनर्जन्म है। तो सिद्ध होना तो पहले ही है आपके मन में। पुनर्जन्म है, यह तो पक्का ही है। अब रह गया यह कि दलीलें इकट्ठी करनी हैं, तो दलीलें इकट्ठी की जा सकती हैं। एक आदमी सिद्ध करना चाहता है कि पुनर्जन्म नहीं है। यह तो पक्का ही है। अब रह गईं दलीलें, दलीलें इकट्ठी की जा सकती हैं। और यह जगत इतना अदभुत है और इतना जटिल है कि यहां सब तरह के पक्षों के लिए दलीलें उपलब्ध हो जाती हैं। इसमें कोई कठिनाई नहीं है।
दर्शन कभी सिद्ध नहीं कर पाएगा कि पुनर्जन्म है या नहीं है। तो आपके सवाल को थोड़ा और हटाकर कहें। ऐसा पूछें कि क्या विज्ञान कुछ कह सकता है कि पुनर्जन्म है या नहीं?
दर्शन तो कभी नहीं कह पाएगा। वह कह रहा है पांच हजार साल से, उससे कुछ हल नहीं होता। जो मानते हैं, है, वे माने चले जाते हैं। जो मानते हैं, नहीं है, वे नहीं मानते चले जाते हैं। और वह वाला कभी नहीं है वाले को "कनविंस' नहीं कर पाता। नहीं है वाला कभी है वाले को "कनविंस' नहीं कर पाता। यह बड़े मजे की बात है कि जो "कनविंस' पहले से ही नहीं है वह कभी "कनविंस' होता ही नहीं। तर्क के साथ तर्क की यह नपुंसकता है, तर्क की यह "इमपोटेंस' है कि आप सिर्फ उसी को "कनविंस' कर सकते हैं जो "कनविंस' था ही। अब उसका कोई मतलब ही नहीं है। एक हिंदू को आप "कनविंस' कर सकते हैं कि पुनर्जन्म है, क्योंकि वह "कनविंस' है। एक मुसलमान को "कनविंस' करने जाइए तब पता चलता है। एक ईसाई को आप "कनविंस' कर सकते हैं कि पुनर्जन्म नहीं है, एक हिंदू को "कनविंस' करने जरा जाइए तो पता चलता है। जो पहले से ही राजी है किसी सिद्धांत के लिए, तर्क बस उसी के लिए खेल कर पाता है और कुछ नहीं कर पाता है। नहीं, सवाल को कुछ और तरह से पूछिए कि क्या वैज्ञानिक ढंग से कुछ कहा जा सकता है कि पुनर्जन्म है या नहीं?
हां, विज्ञान कोई पक्ष लेकर नहीं चलता। दर्शन पक्ष लेकर चलता रहता है, तर्क पक्ष लेकर चलता रहता है। असल में वैज्ञानिक चित्त का मतलब ही यह है कि जो निष्पक्ष है और जिसके लिए दोनों "आल्टरनेटिव' खुले हैं, जिसने कभी "क्लोज नहीं किया। जो कहता है कि यह भी हो सकता है, वह भी हो सकता है, हम खोजते चलते हैं। तो विज्ञान जब से खोज करना शुरू किया है--ज्यादा देर नहीं हुई, अभी थोड़े ही दिन हुए कोई पचास साल, जब यूरोप और अमरीका में "साइकिक सोसाइटीज' निर्मित हुई और उन्होंने थोड़ा-सा काम करना शुरू किया। अभी कोई पचास साल ही हुए जबकि कुछ थोड़े-से बुद्धिमान लोग, जिनके पास वैज्ञानिक की बुद्धि है--रहस्यवादी का नहीं सवाल--रहस्यवादी तो बहुत दिन से कहता है कि है और रहस्यवादी लेकिन प्रमाण नहीं दे पाता, क्योंकि वह कहता है मैं जानता हूं; तुम भी जान सकते हो, लेकिन मैं तुम्हें नहीं जना सकता। तो रहस्यवादी कहता है कि मेरे सिर के दर्द जैसा है, मुझे पता है कि है। तुम्हारे सिर में दर्द होगा, तुम्हें पता चल जाएगा। लेकिन मेरे सिरदर्द का पता तुम्हें नहीं चल सकता। और मैं कितनी ही चेहरे की आकृतियां बनाऊं, छाती पीटकर रोऊं, तुम फिर भी कह सकते हो कि पता नहीं बनकर कर रहे हो कि सच में दर्द हो रहा है? इसको हमेशा कहा जा सकता है।
पिछले पचास वर्षों में यूरोप में कुछ थोड़े-से लोग हुए--ओलिवर लाज, ब्रॉड, राइन--और इन सारे लोगों ने कुछ दिशाएं खोजनी शुरू कीं। ये सारे वैज्ञानिक चित्त के लोग हैं, जिनकी कोई मान्यता नहीं है। इन्होंने कुछ काम करना शुरू किया है, वह काम धीरे-धीरे प्रामाणिक होता जा रहा है। इन्होंने जो काम किया है, उसकी निष्पत्तियां गहरी हैं; और उसकी निष्पत्तियां पुनर्जन्म होता है, इस दिशा में प्रगाढ़ होती जाती हैं, नहीं होता है, इस दिशा में क्षीण होती जाती हैं। जैसे एक तो प्रेतात्माओं से संबंध स्थापित किए जा सके हैं बड़ी तरकीबों से, बड़ी व्यवस्थाओं से और सब तरह के वैज्ञानिक ढंगों से कोशिश की जा सकी है कि कोई धोखा नहीं। बहुत-से मामले धोखे के सिद्ध हुए हैं। लेकिन उनका कोई सवाल नहीं है। अगर एक मामला भी धोखे का सिद्ध नहीं होता, तो भी प्रामाणिक है।
तो प्रेतात्माओं से संबंध स्थापित किए गए हैं वैज्ञानिक ढंग से और उन संबंधों के आधार पर सूचना मिलनी शुरू हो गई कि आत्मा शरीरों को बदलती है। कुछ "साइकिक सोसाइटीज' के सदस्यों ने जिंदगी भर काम किया, मरते वक्त वह वायदा करके गए कि मरने के बाद हम पूरी कोशिश करेंगे सूचना देने की। उसमें दो-एक लोग सफल हो सके। और मरने के बाद उन्होंने कुछ निश्चित सूचनाएं दीं, जिसका वायदा उन्होंने मरने के पहले किया था। उनसे कुछ प्रमाण इकट्ठे हुए हैं।
और, मनुष्य के व्यक्तित्व में कुछ और नई दिशाओं का अनुभव, जैसे "टैलीपैथी' का, "क्लरवायंस' का, दूर-श्रवण का, दूर-दृष्टि का और दूर-संवाद का, इस पर काफी काम हुआ है। हजार मील दूर बैठे हुए आदमी को भी मैं यहां बैठकर संदेश भेज सकता हूं, बिना किसी बाह्य उपकरण का उपयोग किए। तब इसका मतलब यह होता है कि शरीर ही नहीं, अशरीरी ढंग से भी संवाद संभव है।

"यह मन ही हो, आत्मा न हो, इसकी भी तो संभावना है!'

सकी बात करते हैं। वह मन भी हो, तो भी शरीर से भिन्न कुछ होना शुरू हो जाता है। और शरीर से भिन्न होना एक बार विज्ञान के खयाल में आना शुरू हुआ, तो बहुत दूर नहीं है आत्मा का होना। क्योंकि झगड़ा जो है वह यही है कि शरीर से भिन्न भीतर कुछ है? एक बार इतना भी तय हो जाए कि शरीर के भीतर शरीर से भिन्न मन भी है, तो भी यात्रा शुरू हो गई। और विज्ञान की यात्रा ऐसे ही शुरू होगी। पहले मन ही होगा, फिर धीरे-धीरे ही हम आत्मा तक विज्ञान को ले जा सकें, इशारे करवा सकें। लेकिन मन है।
अभी एक आदमी है, टेड नाम का एक व्यक्ति है। जिसके बड़े अनूठे अनुभव "साइकिक सोसाइटीज' में हुए हैं। अनूठे अनुभव उसके ये हैं कि वह आदमी अगर न्यूयार्क में बैठा है, उसने मुझे कभी नहीं देखा, मेरा कोई चित्र नहीं देखा, मेरे संबंध में कभी सुना नहीं, लेकिन आप अगर उससे कहें कि वह मेरे संबंध में सोचे, विचार करे, तो वह आंख बंद कर लेगा और वह मेरे संबंध में ध्यान करेगा और जब आधे घंटे बाद वह आंख खोलेगा, तो उसकी आंख में से मेरा चित्र उतारा जा सकता है। उसकी आंख से, कैमरा उसकी आंख से मेरा चित्र उतार लेगा। और इस तरह के हजारों चित्र उतारे गए हैं और फिर मेरे असली चित्र से जब मिलाया जाता है तब बड़ी हैरानी होती है। करीब-करीब, बस "फेंटनेसस' का फर्क होता है, इससे ज्यादा फर्क नहीं होगा। इतना साफ नहीं होता, लेकिन होता यही है।
इसका मतलब क्या है?
इसका मतलब यह है कि उसकी आंख किसी-न-किसी तरह मुझे देखने में समर्थ हो गई है। न केवल देखने में समर्थ हो गई है, बल्कि जैसा मेरे सामने आप मुझे देखें तो आपकी आंख में मेरा चित्र बनता है, ऐसे ही हजारों मील फासले पर अज्ञात अपरिचित आदमी का चित्र भी उसकी आंख में बन गया है। इसके हजारों प्रयोग हुए हैं और हजारों चित्र हजारों तरह के उस आदमी की आंख में पकड़े गए हैं।
"टेलीपैथी' के तो बहुत प्रयोग हो गए हैं। और अभी चूंकि "स्पेस ट्रेवेल' शुरू हुई, और चांद पर जाना है--चांद पर तो हम चले गए--कल मंगल पर जाना है, और फिर लंबी यात्राएं शुरू होंगी, जिनमें यात्री वर्षों के लिए जाएंगे और वर्षों बाद लौटेंगे। मंगल पर भी एक वर्ष लगेगा आने-जाने में। इस एक वर्ष की लंबी यात्रा में अगर यंत्रों ने जरा-सी भी चूक कर दी, तो फिर हमें उन यात्रियों से कभी कोई संबंध नहीं हो सकेगा कि वे कहां गए और क्या हुआ! बचे कि नहीं बचे! अनंत काल तक फिर हमें उनका कोई पता नहीं चलेगा। वे हमसे किसी तरह का "कम्यूनिकेशन' नहीं कर पाएंगे। इसीलिए रूस और अमरीका दोनों, जहां अंतरिक्ष की यात्रा पर गहन शोध चलती है, "टेलीपैथी' में उत्सुक हो गए हैं। क्योंकि अगर किसी दिन स्पेस यात्री का यंत्र खराब हो जाएगा और वह रेडियो यंत्रों के द्वारा हमें खबर न दे पाए, तो "टेलीपैथी' से खबर दे सके। एक "आल्टरनेटिव' चाहिए। नहीं तो, यंत्र का कोई भरोसा ही नहीं है।...इधर हम "आल्टरनेटिव' रखे हैं न, यह बैटरी सेट रखे हुए हैं। यंत्र का कोई भरोसा नहीं है। वह कभी भी...।
लेकिन अभी साधारण यंत्र का भरोसा न भी हो तो कोई खतरा नहीं है, लेकिन यात्री जो अंतरिक्ष में गया है, अगर उसके यंत्र हमें खबर न दे पाएं, या हम उसे खबर न दे पाएं, हमारा संबंध एक बार टूट जाए, तो फिर हमें कुछ पता नहीं चलेगा कि वह कहां गया? है भी अब जगत में या नहीं है? वह अश्वत्थामा की कथा हो जाएगी, उसका फिर कभी पता नहीं चलेगा। वह फिर कभी मरेगा भी नहीं। उसके बाबत हम फिर कुछ भी नहीं जान सकेंगे, कभी। तो वह कोई खबर दे सके यंत्र के अतिरिक्त। इसलिए रूस और अमरीका दोनों ही "टेलीपैथी' में भारी उत्सुक हैं। और दोनों ने गहरे प्रयोग किए हैं।
रूस में एक आदमी है फयादेव। उस आदमी ने हजारों मील दूर तक संदेश पहुंचाने का प्रयोग सफलता से किया। बैठकर वह संदेश भेजेगा किसी व्यक्ति विशेष को और उस व्यक्ति विशेष को उसके भीतर से संदेश आता हुआ मालूम पड़ेगा।
तो विज्ञान धीरे-धीरे आदमी शरीर ही नहीं है, उसके भीतर कुछ अशरीरी भी है, इस दिशा में कदम उठा रहा है। और एक बार यह तय हो जाए कि आदमी के भीतर कुछ अशरीरी भी है, तो पुनर्जन्म का द्वार खुल जाएगा। दर्शन से जो नहीं संभव हो सका, रहस्यवादी जो संभव नहीं कर सके सबको समझाना, वह विज्ञान संभव कर पाएगा। वह संभव हो सकता है। वह होता जा रहा है।

"भगवान श्री, ऐसा प्रयोग हुआ है कि "ग्लॉस कास्केट' में मरते हुए आदमी को सुलाया गया। इस पर आप कुछ कहने जैसा मानते हैं?'

सा प्रयोग बहुत जगह करने की कोशिश की गई, लेकिन परिणामकारी नहीं हुआ। ऐसा खयाल है--स्वाभाविक है, क्योंकि विज्ञान जब सोचता है तो पदार्थ की भाषा में सोचता है--अगर एक आदमी मरता है और शरीर के अतिरिक्त कुछ और है और वह निकल जाता है, तो "वेट' कम हो जाना चाहिए। लेकिन यह हो सकता है कि जो निकल जाता है वह "वेटलेस' हो। उसका "वेट' होना ही चाहिए! या वह इतने कम "वेट' का हो कि हमारे पास कोई मानदंड न हो। जैसे कि सूरज की किरणें हैं, इसमें कोई "वेट' है? है "वेट'। सूरज की किरणें हैं ये। इनको तराजू पर तौलिए। एक तराजू पर अंधेरा रखिए, एक पलड़े पर रोशनी रखिए। उसको थोड़ा नीचे जाना चाहिए, अगर सूरज की किरणें हैं। वह नहीं जाता। सूरज की किरणें नहीं होनी चाहिए, क्योंकि "वेट' नहीं है। लेकिन उनमें "वेट' है। अगर एक वर्गमील की सब सूरज किरणें इकट्ठी की जाएं, तो एक तोले का "वेट' देती हैं। लेकिन वह बड़ा मुश्किल मामला है! अब कितनी आत्मा में कितना "वेट' होगा, अभी देर है।
तो वह प्रयोग किया गया, प्रयोग कई जगह किया गया, क्योंकि स्वाभाविक हमारा खयाल है कि आदमी मरता है, तो मरते आदमी को कांच के "कास्केट' में बंद कर दिया सब तरफ से, कोई रंध्र, द्वार नहीं रहने दिया, वह मर गया! जितना वजन जिंदा में था उससे कुछ तो कम हो ही जाना चाहिए, अगर कुछ उसमें से निकल गया, एक। दूसरा, जो निकला है, उसके निकलने के लिए भी कांच टूट जाना चाहिए, क्योंकि कोई रंध्र, द्वार नहीं है। मगर दोनों संभव नहीं हुए। न तो कांच टूटा, क्योंकि सभी चीजों के निकलने के लिए कांच बाधा नहीं है। सूरज निकल जाता है, किरणें निकल जाती हैं। हड्डी और लोहा भी बाधा नहीं है, "एक्स-रे' की किरण निकल जाती है। तो आदमी को क्यों झंझट डालते हो कि उसको निकलने को कोई चीज तोड़नी पड़े। अब "एक्स-रे' की किरण आपकी हड्डी और छाती के भीतर चली जाती है, हड्डी को पार करके चित्र ले आती है और कहीं कुछ टूटता नहीं, कहीं कोई छेद नहीं हो जाता। तो जब "एक्स-रे' की बहुत स्थूल किरण भी कांच को बिना तोड़े, हड्डी को बिना तोड़े, लोहे की सींखचों को बिना तोड़े, लोहे की दीवाल को पार कर लेती है, तो आत्मा को ही कौन-सी कठिनाई हो सकती है। "लाजिकली' कोई कठिनाई नहीं मालूम पड़ती। और जगत में बहुत कुछ "वेटलेस' है। असल बात यह है कि जिसको हम "वेट' कहते हैं, वह बहुत गहरे में हम समझें तो "वेट' नहीं है, सिर्फ "ग्रेवीटेशन' है। मगर इसको जरा गणित की तरह समझना पड़ेगा।
आपका वजन है यहां समझ लीजिए कि चालीस किलो, तो चांद पर आपका वजन चालीस किलो नहीं होगा। आप बिलकुल यही होंगे। चांद पर आपका वजन आठ गुना कम हो जाएगा। इसलिए आप अगर यहां छः फीट ऊंचे कूद सकते हैं, तो चांद पर आठ गुना ज्यादा कूद सकेंगे। क्योंकि चांद की जो कोशिश है, "ग्रेवीटेशन' है, वह पृथ्वी से आठ गुना कम है। और सब वजन जमीन के खिंचाव का वजन है। अब यह हो सकता है कि जमीन आत्मा को न खींच पाती हो। यह कोई जरूरी नहीं है कि "ग्रेवीटेशन' जो है वह आत्मा को खींचता हो। तो फिर वजन नहीं होगा। अगर हम कभी किसी दिन ऐसी जगह बना लें जो "नॉन-ग्रेवीटेशनल' हो, वहां किसी का वजन नहीं होगा।
चांद पर भी जो यात्री जा रहे हैं, उनको जो सबसे महंगा और खतरनाक अनुभव होता है, वह "वेटलेसनेस' का है। जैसे ही पृथ्वी का घेरा छूटता है--दो सौ मील तक पृथ्वी खींचती है, दो सौ मील तक पृथ्वी की "ग्रेवीटेशनल फील्ड' है, दो सौ मील तक पृथ्वी की कशिश आदमी को खींचती है, दो सौ मील के बाद पृथ्वी के खींचने का घेरा समाप्त हो जाता है--उसके बाद आदमी एकदम "वेटलेस' हो जाता है। इसलिए अंतरिक्ष में जाने वाले यात्री को अगर जरा भी उसका पट्टा छूट गया जो कमर से बंधा है, तो वह फुग्गे की तरह यान में लटकेगा। फुग्गे की तरह वह, सिर उसका ऊपर जाकर यान के छत से लग जाएगा। और फिर उसको नीचे आना बड़ा मुश्किल हो जाएगा। क्योंकि नीचे "ग्रेवीटेशन' के बिना आना बहुत मुश्किल है, उसको खींचना पड़ेगा।
तो आत्मा पर "ग्रेवीटेशन' लागू होता ही हो तो, तो ये प्रयोग ठीक हैं, पेरिस या कहीं भी किए जाते हैं, अन्यथा ठीक नहीं हैं। मेरी अपनी समझ यह है कि पदार्थ पर जो नियम काम करते हैं, वह पदार्थ की सघनता के कारण ही करते हैं। आत्मा को अगर हम ठीक से समझें तो विरलता का अंत है वह। इसलिए उस पर कोई नियम काम नहीं करते। वह नियम के बाहर हो जाती है। और जब तक हम नए नियम से उस पर खोजने नहीं जाते, जब तक हम पदार्थ के नियमों को ही आधार बनाकर आत्मा के संबंध में खोज करते रहेंगे, तब तक विज्ञान का उत्तर आत्मा के संबंध में इनकार का रहेगा। वह कहेगा, नहीं है। लेकिन यह जो "साइकिक सोसाइटीज' की मैंने बात की, यह जो राइन और मायर्स के प्रयोग की मैंने बात की, यह जो  ओलिवर, लाज और ब्रॉड की चर्चा की, ये सारे लोग विज्ञान की प्रतिष्ठित पदार्थ को नापने की पद्धति को छोड़कर आत्मा के अज्ञात मापदंडों की खोज कर रहे हैं। इनसे आशा बंधती है कि कुछ सूत्र धीरे-धीरे निःसृत होंगे और विज्ञान उस बात की गवाही दे पाएगा, जिस बात की गवाही रहस्यवादियों ने सदा से दी है लेकिन प्रमाण नहीं दे पाए हैं।

"आपने कहा कि अर्जुन कृष्ण के प्रति समर्पित हुए इसलिए यंत्रवत न होकर स्वतंत्र हुए। विवेकानंद रामकृष्ण के प्रति समर्पित होकर भी यंत्रवत रहे, आत्मवान न हो पाए, इसका क्या कारण है?'

सके कारण हैं। रामकृष्ण और विवेकानंद के बीच का जो संबंध है, पहली तो बात गुरु और शिष्य के बीच का संबंध है। कृष्ण और अर्जुन के बीच जो संबंध है, वह गुरु-शिष्य का संबंध नहीं। दूसरी बात, कृष्ण की पूरी चेष्टा अर्जुन के द्वारा जगत को कोई संदेश देने की नहीं, विवेकानंद के द्वारा जगत तक संदेश पहुंचाने की है। कृष्ण को तो पता भी नहीं है कि वह जो कह रहे हैं वह गीता बन जाएगी। यह आकस्मिक घटना है कि वह बन गई। कृष्ण ने तो सहज ही युद्ध के स्थल पर खड़े होकर कहा होगा। यह तो पता भी नहीं होगा कि यह वक्तव्य जो है, इतना कीमती हो जाएगा और सदियों तक आदमी इस पर सोचेंगे। यह कहा तो गया था सिर्फ अर्जुन के लिए निपट, उसके सोचने के लिए था। यह नहीं था कि यह दुनिया को जाकर कहेगा। यह अर्जुन को बदलने के लिए थी यह खबर। यह उसके लिए ही था निपट। यह बड़ी "इंटीमेट' चर्चा थी। यह दो व्यक्तियों के बीच सहज व्यक्तिगत बातचीत थी। और मेरा अपना अनुभव यह है कि इस जगत में जितना भी महत्वपूर्ण है, वह सदा "इंटीमेट डायलाग' है। सदा। इसलिए लिखनेवाला कभी उस गहराई को उपलब्ध नहीं होता जो बोलनेवाला होता है। इसलिए दुनिया में जो भी श्रेष्ठ है, वह बोला गया है।
इधर आप हम सुबह बात करते थे--अरविंद ने कुछ भी नहीं बोला है, सब लिखा है। कृष्ण ने, क्राइस्ट ने, बुद्ध ने, महावीर ने, रमण ने, कृष्णमूर्ति ने सब बोला है। बोलने का माध्यम "पर्सनल' है, लिखने का माध्यम "इम्पर्सनल' है। लिखते हम किसी के लिए नहीं--पत्रों को छोड़कर। बाकी सब हम किसी के लिए नहीं लिखते। कौन है "रिसीवर' उसका कोई पता नहीं होता। "एब्सट्रैक्ट' है। लेकिन बोलने का माध्यम तो बड़ा व्यक्तिगत है, निजी है--हम किसी से बोलते हैं। तो कृष्ण तो अर्जुन से बोल रहे हैं सीधे। जगत का कोई सवाल नहीं है यहां। यहां दो मित्रों के बीच एक बात हो रही है। रामकृष्ण के साथ स्थिति और है। और कारण है स्थिति का। जैसा मैंने सुबह कहा, उसे थोड़ा खयाल में लेंगे तो समझ में आ जाएगा।
रामकृष्ण को अनुभव तो हुआ, लेकिन रामकृष्ण के पास वाणी बिलकुल नहीं थी। और रामकृष्ण को जीवन भर यही पीड़ा थी कि कोई मुझे मिल जाए जो वाणी दे दे। जो वह जानते थे, वह बोल नहीं सकते थे। रामकृष्ण एकदम अशिक्षित, अपढ़, शायद दूसरी बंगाली क्लॉस पता नहीं पास कि फेल। इतना उनका शिक्षण है। जान तो लिया उन्होंने बहुत, लेकिन इसको कहें कैसे! इसके लिए उनके पास शब्द नहीं, सुविधा नहीं, व्यवस्था नहीं। तो कोई चाहिए जिसके पास शब्द हों, सुविधा हो, व्यवस्था हो। विवेकानंद के पास तर्क है, वाणी है, अभिव्यक्ति है। रामकृष्ण के पास अनुभव है, तर्क नहीं है, वाणी नहीं है, अभिव्यक्ति नहीं है। रामकृष्ण के जो वक्तव्य भी हमें उपलब्ध हैं आज, वे बहुत काट-छांटकर और सुधार कर किए गए हैं। क्योंकि रामकृष्ण तो देहाती आदमी थे, वह बोलने में गाली भी दे देते थे। गाली भी बक देते थे। वह तो देहात के आदमी थे! जैसा देहात में सहज आदमी बोलता है वैसा बोलते थे। वे सब गालियां काटनी पड़ीं। मैं तो नहीं मानता कि ठीक हुआ, उनको होना चाहिए। "आथेंटिक' होनी चाहिए "रिपोर्ट'। जो उन्होंने कहा था वैसी होनी चाहिए थी। ठीक है, वह देते थे गाली, इसकी क्या बात है! और गाली ऐसी क्या बुरी है, होना चाहिए वहां। लेकिन हमारे मन में डर लगेगा कि साधु और गाली दे रहा हो, परमहंस! उसको अलग कर दें। इसलिए बहुत काट-छांटकर रामकृष्ण को पेश करना पड़ा है।
रामकृष्ण के पास संदेश के लिए कोई सुविधा नहीं थी। इसलिए रामकृष्ण बिलकुल गूंगे थे। विवेकानंद जब रामकृष्ण के पास आए तो रामकृष्ण को आशा बंधी के यह व्यक्ति जो मेरे भीतर घटा है उसे दुनिया तक कह सकेगा। इसलिए विवेकानंद को "इन्स्ट्रूमेंट' बनना पड़ा।
और एक घटना आपको कहूं जिससे खयाल में आ जाए।
विवेकानंद को समाधि की बड़ी आकांक्षा थी। तो रामकृष्ण ने उन्हें समाधि का प्रयोग समझाया, करवाया। रामकृष्ण महिमाशाली थे, उनकी मौजूदगी भी किसी के लिए समाधि बन सकती थी। उनके स्पर्श से भी बहुत कुछ हो सकता था। उतना जीवंत व्यक्तित्व था। जिस दिन पहली दफे विवेकानंद को समाधि का अनुभव हुआ, विवेकानंद ने क्या किया? उस आश्रम में कालू नाम का एक आदमी था। यह दक्षिणेश्वर के मंदिर के पास ही रहता था। बहुत भोला-भाला आदमी था। मंदिरों के पास जब तक भोले-भाले आदमी रहें, तभी तक मंदिरों की सुरक्षा है। जिस दिन वहां चालाक आदमी पहुंचते हैं उस दिन तो सब खराब हो जाता है। वह कालू बड़ा भोला-भाला आदमी था। उसको दिन भर पूजा में लग जाता था, क्योंकि उसके कमरे में जमाने भर के देवी-देवता थे--एकाध-दो नहीं थे। जो भी देवी-देवता मिलते थे, कालू उनको ले आते थे। उसके कमरे में कालू के लिए जगह ही नहीं बची थी, वह बाहर सोते थे। जो भी भगवान के चक्कर में पड़ेगा, एक दिन बाहर सोना पड़ेगा, क्योंकि भगवान भीतर सब जगह घेर लेता है। तो वह इतनी दिक्कत में पड़ गया था कि उसके पास सैकड?ो भगवान थे। तरहत्तरह के भगवान थे। जहां जो भगवान मिले, ले आए। अब वह सुबह से पूजा शुरू करता तो सांझ हो जाती, क्योंकि सभी की पूजा करनी पड़ती थी।
विवेकानंद ने उसे कई दफे समझाया कि कालू, तू बड़ा नासमझ है, फेंक इन सबको। भगवान तो अदृश्य है। वह तो सब जगह मौजूद है। वह कहता होगा, पहले हम अपने कोठे से निपट लें। बाकी वह बेचारा सीधा-साधा आदमी था। विवेकानंद ने बहुत उसको तर्क दिए। लेकिन सीधे-सादे आदमी को तर्क भी नहीं दिए जा सकते। वह हंसता था, वह कहता था ठीक कहते हो, लेकिन अब जिनको ले ही आए, अब इनका स्वागत-सत्कार तो करना ही पड़ेगा। कई दफे उसको कहा कि फेंक, ये कहां के अत्थर-पत्थर इकट्ठे कर रखे हैं--कहीं छोटे शंकर, बड़े शंकर, न-मालूम क्या-क्या, यह क्या तूने किया है? और दिन भर इसी में गंवाता है, किसी को टीका लगता है, कभी घंटा बजाता है, तेरा समय इसमें जाया हो रहा है। वह कालू कहता कि औरों का समय जिसमें जाया हो रहा है, मेरा इसमें जाया हो रहा है, और तो कोई खास फर्क नहीं पड़ रहा है। बाकी हर्ज क्या रहेगा आखिर में!
जिस दिन विवेकानंद को पहला दफा समाधि लगी, अचानक भीतर शक्ति की ऊर्जा का जन्म हुआ और विवेकानंद को जो पहला खयाल आया वह यह आया कि अगर इस ऊर्जा के क्षण मैं कह दूं कालू को कि फेंक अपने भगवानों को, तो रोक नहीं सकेगा। "टेलीपैथिक' हुआ। उन्होंने ऐसा सोचा, उधर बेचारे कालू, सीधे-सादे आदमी को संदेश मिल गया। उसने बांधी पोटली अपने सब भगवानों की और चला गंगा की तरफ फेंकने। यह तो मन में ही सोचा था विवेकानंद ने, यह तो अपने कमरे में बंद थे, लेकिन जब ऊर्जा जगी--तो यह समझ ही लेना कि जब ऊर्जा जगे, तो भूलकर भी उसका उपयोग मत करना। अन्यथा भारी नुकसान होता है। उसे जगने देना, बस उसका जगना ही उसका उपयोग है। उसका कोई उपयोग मत करना। विवेकानंद ने तत्काल उपयोग किया और जिस कालू को वह तर्क से नहीं समझा सके थे, उसके साथ पीछे के रास्ते से उपद्रव किया। उनको खयाल भी नहीं था, उन्होंने सिर्फ सोचा ही कि अगर इस वक्त मैं कालू को कह दूं कि उठ कालू और फेंक सब, तो इतनी ऊर्जा मेरे भीतर है कि अब कालू बच नहीं सकेगा। यह उन्होंने सोचा ही। उधर कालू ने अपना पूजा-मूजा कर रहा था, उसने सब पोटली बांधी, सब भगवानों को कंधे पर टांगकर वह बाहर निकला। रामकृष्ण ने उसे कहा कि पागल, अंदर ले जा। उसने कहा कि सब बेकार है। रामकृष्ण ने कहा, कालू, यह तू नहीं बोलता है। यह कोई और बोल रहा है। तू भीतर चल। मैं उसको देखता हूं शैतान को जो बोल रहा है।
वह भागे गए, दरवाजा तोड़ा और विवेकानंद को हिलाया और कहा कि बस, यह तुम्हारी आखिरी समाधि हुई, अब आगे तुम्हें समाधि की अभी जरूरत नहीं है। और यह कुंजी मैं अपने पास रखे लेता हूं। यह तुम्हारी समाधि की चाभी मैं अपने पास रखे लेता हूं। मरने के तीन दिन पहले लौटा दूंगा। विवेकानंद बहुत चिल्लाए और रोए कि आप यह क्या करते हैं, मुझे समाधि दें। रामकृष्ण ने कहा कि अभी तुझसे और बहुत काम लेने हैं। अभी तू समाधि में गया तो बिलकुल चला जाएगा। और वह काम जो चाहिए वह नहीं हो पाएगा। अभी तुझे मैंने जाना है वह सारी दुनिया तक पहुंचाना है। और तू मोह मत कर और तू स्वार्थी मत बन। तुझे एक और वृक्ष बनना है, वट वृक्ष, जिसके नीचे हजारों लोगों को विश्राम मिल सके और छाया मिल सके। इसलिए तेरी चाबी अपने पास रखे लेता हूं। यह चाबी पास रख ली गई। मरने के तीन दिन पहले यह विवेकानंद को वापिस मिली। मरने के तीन दिन पहले उनको दुबारा समाधि उपलब्ध हुई।
लेकिन इसमें जो मैं कहना चाहता हूं वह यह कि जिस समाधि की चाबी रखी जा सके, वह समाधि "साइकिक' से ज्यादा नहीं हो सकती। जो समाधि किसी दूसरे के हां या ना कहने पर निर्भर हो, वह गहरे मनस से ज्यादा नहीं हो सकती, मनस-पार नहीं हो सकती। मन के पार की नहीं हो सकती। और जिस समाधि में कालू को मूर्तियां फेंकने का खयाल आ जाए, वह समाधि बहुत आत्मिक नहीं हो सकती। उसका कोई कारण नहीं है आने का।
तो विवेकानंद को जो समाधि घटी, वह मानसिक है। शरीर से बहुत ऊपर है, लेकिन आत्मा से बहुत नीचे है। और फिर रामकृष्ण की जो तकलीफ थी, उसकी वजह से विवेकानंद को रोकना जरूरी था कि वह और गहरे न चले जाएं, अन्यथा कौन उस संदेश को लेकर जाता। आज रामकृष्ण को हम जानते हैं तो सिर्फ विवेकानंद की वजह से। लेकिन विवेकानंद को बड़ी कुर्बानी करनी पड़ी। लेकिन इस विराट जगत के लिए वैसी कुर्बानी अर्थपूर्ण है। और रामकृष्ण को विवेकानंद को रोकना पड़ा "साइकिक' पर कि वह आगे न चले जाएं, अन्यथा फिर विवेकानंद को राजी नहीं किया जा सकता था। और रामकृष्ण की दुविधा यही थी कि बुद्ध को जो दोनों एक साथ मिले हैं, वह रामकृष्ण को--अकेले हैं वह, जानना तो मिल गया है, बताना नहीं है उनके पास। वह उसे नहीं बता सकते। इसलिए किसी और आदमी के कंधे का सहारा लेना पड़ा। रामकृष्ण विवेकानंद के कंधों पर बैठकर ही यात्रा किए हैं। इसलिए इसमें मैं मानता हूं कि विवेकानंद "इन्स्ट्रूमेंट' बने, बनाए गए। लेकिन कृष्ण अर्जुन को "इन्स्ट्रूमेंट' नहीं बना रहे हैं। कोई बात ही नहीं है उसमें, वह सिर्फ कह रहे हैं, उसको प्रकट कर रहे हैं।
फिर अब हम ध्यान के लिए बैठें।