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शनिवार, 8 अगस्त 2015

साधना--सूत्र--(प्रवचन--06)

स्‍वामित्‍व की अभीप्‍स–(प्रवचन—छठवां)

सूत्र:

10—शक्ति की उत्कट अभीप्सा करो।

और जिस शक्ति की कामना शिष्य करेगा,
वह शक्ति ऐसी होगी जो उसे लोगों की दृष्टि
में ना—कुछ जैसा बना देगी।

 11—शांति की अदम्य अभीप्सा करो।

जिस शांति की कामना तुमको होगी,
वह ऐसी पवित्र शांति है,
जिसमें कोई विध्‍न न डाल सकेगा।
और जिस शांति के वातावरण में
आत्मा उसी प्रकार विकसित होगी, जैसे
शांत सरोवर में पवित्र कमल विकसित होता है।

 12—स्वामित्व की अपूर्व अभीप्सा करो।

 परंतु ये संपत्तियां केवल शुद्ध आत्मा की हों
और इसलिए सभी शुद्ध आत्मा इसके समानरूप से स्वामी हों
और इस प्रकार ये सभी की (जब वे संयुक्त हों) संपत्ति हों।
 दसवा सूत्र, 'शक्ति की उत्कट अभीप्सा करो। और जिस शक्ति की कामना शिष्य करेगा, वह शक्ति ऐसी होगी जो उसे लोगों की दृष्टि में ना—कुछ जैसा बना देगी।’

शुक्रवार, 7 अगस्त 2015

साधना--पथ--(प्रवचन--01)

साधना की भूमिका—(प्रवचन—पहला)

दिनांक 1 जून, 1963; सन्‍ध्‍या
मुछाला महावीर, रणकपुर

चिदात्मन्!
सबसे पहले मेरा प्रेम स्वीकार करें। इस पर्वतीय निर्जन में, मैं उससे ही आपका स्वागत कर सकता हूं। यूं इसके अतिरिक्त मेरे पास देने को कुछ है भी नहीं।
प्रभु के सान्निध्य ने जिस अनंत प्रेम को मेरे भीतर जन्म दिया है उसे बांटना चाहता हूं उसे उलीचना चाहता हूं। और आश्चर्य तो यही है कि जितना उसे बांटता हूं वह उतना ही बढ़ता जाता है।
शायद, वास्तविक संपत्ति वही है जो बांटने से बढ़ती है। जो बांटने से कम हो, वह संपति वास्तविक नहीं है।
क्या आप मेरे इस प्रेम को स्वीकार करेंगे?

साधना--पथ (ओशो)

साधना—पथ
ओशो
तीन साधना—शिविरों : (--मुछाला महावीर, रणकपुर (साधना पथ)
                  --आजोल (अंतर्यात्रा) एवं नारगोल (प्रभु की पगडंडियां)
                  में हुए प्रवचनों, प्रश्‍नोत्‍तरों एवं ध्‍यान—सूत्रों का अपूर्व संकलन।)

 आलोक-आमंत्रण:

 मैं मनुष्य को एक घने अंधकार में देख रहा हूं। जैसे अंधेरी रात में किसी घर का दीया बुझ जाये, ऐसा ही आज मनुष्य हो गया है। उसके भीतर कुछ बुझ गया है।
पर-जो बुझ गया है, उसे प्रज्वलित किया जा सकता है।
और, मैं मनुष्य को दिशाहीन हुआ देख रहा हूं। जैसे कोई नाव अनंत सागर में राह भूल जाती है, ऐसा ही आज मनुष्य हो गया है। वह भूल गया है कि उसे कहां जाना है और क्या होना है?
पर, जो विस्मृत हो गया है, उसकी स्मृति को उसमें पुन: जगाया जा सकता है।

साधना--सूत्र--(प्रवचन--05)

अप्राप्‍य की इच्‍छा—(प्रवचन—पांचवां)

सूत्र:

7—जो तुम्हारे भीतर है, केवल उसी की इच्छा करो।

क्योंकि तुम्हारे भीतर समस्त संसार का प्रकाश है,
वही प्रकाश जो साधना—पथ को प्रकाशित कर सकता है।
यदि तुम उसे अपने भीतर नहीं देख सकते,
तो उसे कहीं और ढूंढना व्यर्थ है।

 8—जो तुमसे परे है, केवल उसी की इच्छा करो।

वह तुमसे परे है,
क्योंकि जब तुम उसे प्राप्त कर लेते हो,
तो तुम्हारा अहंकार नष्ट हो चुका होता है।

 9—जो अप्राप्य है, केवल उसी की इच्छा करो।

 वह अप्राप्य है, क्योंकि
पास पहुंचने पर वह बराबर दूर हटता जाता है।
तुम प्रकाश में प्रवेश करोगे,
किंतु तुम ज्योति को स्पर्श कदापि न कर सकोगे।

 इन सूत्रों के साथ यात्रा गहरी होती है। धर्म की भाषा थोड़ी बेबूझ है। होना अनिवार्य है, क्योंकि धर्म का संबंध तथ्य से कम, रहस्य से ज्यादा है।

मेरा स्‍वर्णिम भारत--(प्रवचन--01)

चार महावाक्‍य—(प्रवचन—एक)


'प्‍यारे ओशो।
पैंगल उपनिषद्केअनुसार चार महावाक्‍य है।
पहला: तत्‍वमसि, वह तू है;
दूसरा: त्‍वं तदसि, तू वह है;
तीसरा: त्‍वं ब्रह्मास्‍मि, तू ब्रह्म है; और
चौथा : अहं ब्रह्मास्‍मि, मैं ब्रह्म हूं।

प्‍यारे ओशो! इस महावाक्‍यों के अर्थ और अर्थभेद बताने की अनुकंपा करें।

चिदानंद! उपनिषद् सद्गुरु और शिष्य के बीच शून्य में हुआ संवाद है। आंखों आंखों में बात हो गयी है। हृदय ने हृदय पर गीत गाया है। न तो गुरु ने कुछ कहा है और न शिष्य ने कुछ सुना है, फिर भी गुरु ने सब कह दिया है और शिष्य ने सब सुन लिया है।

तंत्र--सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--25

शब्‍द,ध्‍वनि और अनाहत—(प्रवचन—पच्‍चीसवां)

सूत्र:

37—हे देवी, बोध के मधु—भरे दृष्‍टिपथ में संस्‍कृत
वर्णमाला के अक्षरों की कल्‍पना करो—पहले अक्षरों की भांति,
फिर सूक्ष्‍मतर ध्‍वनि की भांति और फिर सूक्ष्‍म भाव की भांति।
और तब, उन्‍हें अलग छोडकर मुक्‍त हो जाओ।

38—ध्‍वनि के केंद्र में स्‍नान करो, मानों जलप्रपात की
अखंड ध्‍वनि में स्‍नान कर रहे हो। या कानों में अंगुलि
डालकर नादों के नाद, अनाहत को सुनो।

ज्‍यांपाल सार्त्र ने आत्मकथा लिखी है; उसने उसे नाम दिया है :’वर्ड्स'—शब्द। यह नाम बहुत अर्थपूर्ण है। यही प्रत्येक मनुष्य की आत्मकथा है—शब्द और शब्द और शब्द। तुम शब्दों से भरे हो। यह शब्दों की प्रक्रिया दिनभर तुम्हारे मन में चलती रहती है; और रात में भी जब तुम सोए हो, तुम शब्दों से, विचारों से भरे रहते हो।

गुरुवार, 6 अगस्त 2015

साधना--सूत्र--(प्रवचन--04)

उत्‍तेजना एवं आकांक्षा—(प्रवचन—चौथा)

      सूत्र:

5—उत्तेजना की इच्छा को दूर करो।

इंद्रियजन्य अनुभवों से शिक्षा लो और उसका निरीक्षण करो,
क्योंकि आत्म—विद्या का पाठ इसी प्रकार आरंभ किया जा सकता है
और इसी प्रकार तुम इस सीडी की पहली पटिया पर अपना पैर जमा सकते हो।

6—उन्नति की आकांक्षा को दूर करो।

फूल के समान खिलो और विकसित होओ।
फूल को अपने खिलने का भान नहीं रहता,
किंतु वह अपनी आत्मा को वायु के समक्ष
उन्मुक्त करने को उत्सुक रहता है।
तुम भी उसी प्रकार अपनी आत्मा को
शाश्वत के प्रति खोल देने को उत्सुक रहो।
परंतु उन्नति की आकांक्षा नहीं,
शाश्वत ही तुम्हारी शक्ति और तुम्हारे सौंदर्य को आकृष्ट करे।
क्योंकि शाश्वत के आकर्षण से तो तुम पवित्रता के साथ आगे बढ़ोगे, पनपोगे,
किंतु व्यक्तिगत उन्नति की बलवती कामना
तुमको केवल जड़ व कठोर बना देगी।

बुधवार, 5 अगस्त 2015

तंत्र--सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--24

संदेह और श्रद्धा, मृत्‍यु और जीवन—(प्रवचन—चौबीसवां)

प्रश्‍नसार:

1—क्‍या मिश्रित ढंग के व्‍यक्‍ति को दो भिन्‍न—भिन्‍न विधि करनी चाहिए?
2—जीवन—स्‍वीकारकी दृष्‍टि रखने वाले तंत्र में मृत्‍यु—दर्शन का कैसे उपयोग हो सकता है?
3—शरीर के मृतवत होने से मन का रूपांतरण कैसे संभव है?

 पहला प्रश्न :

मैं समझता हूं कि मैं पूरे अर्थों में न भावुक ढंग का आदमी हूं, और न बौद्धिक ढंग का; मैं मिश्रित ढंग का हूं। तो क्‍या मुझे बारी—बारी से दो भिन्‍न ढंग की विधियों का प्रयोग करना चाहिए?
कृपया मार्ग दर्शन दें?

यह प्रश्न महत्वपूर्ण है। बहुत सी बातें समझने जैसी हैं।
एक, जब भी तुम्हें महसूस हो कि तुम न बौद्धिक ढंग के आदमी हो न भावुक ढंग के तो भलीभांति समझ लो कि तुम बौद्धिक ढंग के आदमी हो। कारण कि विभ्रम, मन की उलझन बौद्धिक चित्त का लक्षण है।

साधना--सूत्र--(प्रवचन--03)

द्वैतभाव—(प्रवचन—तीसरा)

सूत्र:

4—द्वैतभाव को समग्ररूप से दूर करो।

यह न सोचो कि तुम बुरे मनुष्‍य से
या मूर्ख मनुष्‍य ये दूर रह सकते हो
वे तो तुम्‍हारे ही रूप है।
यद्यपि तुम्‍हारे मित्र अथवा गुरूदेव से कुछ कम ही वे तुम्‍हारे रूप हों।
फिर भी वे है तुम्‍हारे ही रूप।
स्‍मरण रहे कि सारे संसार का पाप वे उनकी लज्‍जा,
तुम्‍हारी अपनी लज्‍जा, तुम्‍हारा अपना पापा है।
तुम संसार के एक अंग हो और तुम्‍हारे कर्मफल
उस महान कर्मफल से अकाटयरूप से संबद्ध है।
और ज्ञान प्राप्‍त करने के पहले
तुम्‍हें सभी स्‍थानों में से होकर निकलना है,
अपवित्र और पवित्र स्‍थानों से एक ही समान।

जैसे—जैसे मनुष्य ज्यादा सभ्य हुआ है, जैसे—जैसे ज्यादा शिक्षित, सुसंस्कृत हुआ है, वैसे—वैसे ज्यादा चिंतित, बेचैन और परेशान भी हो गया है। क्या होगा कारण? जैसे—जैसे मनुष्य की बुद्धि बढ़ती है, दुख क्यों बढ़ जाता है?

मंगलवार, 4 अगस्त 2015

मेरा स्‍वर्णिम भारत--(विविध उपनिषाद)

मेरा स्वर्णिम भारत
(ओशो)
(उपनिषाद—सूत्रों, संस्‍कृत सुभाषितों एवं वेद व ऋषि—वाक्‍यों पर ओशो से प्रश्‍नोत्‍तर—प्रवचनांश)

भारत केवल एक भूगोल या इतिहास का अंग ही नहीं है। यह सिर्फ एक देश, एक राष्‍ट्र, एक जमीन का टुकडा मात्र नहीं है। यह कुछ और भी है—एक प्रतीक,एक काव्‍य, कुछ अदृश्‍य सा—किंतु फिर भी जिसे छुआ जा सके। कुछ विशेष ऊर्जा—तरंगों से स्‍पंदित है यह जगह, जिसका दावा कोई और देश नहीं कर सकता।
......सदियों से, सारी दुनिया से साधक इस धरती पर आते रहे है। यह देश दरिद्र है, उसके पास भेज देनें को कुछ भी नहीं है, पर जो संवेदनशील है उनके लिए इससे अधिक समृद्ध कौम इस पृथ्‍वी पर कहीं और नहीं है। यह समृद्धि आंतरिक है।
रजनीश उपनिषाद से

तंत्र--सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--23

शांति और मुक्‍ति के चार प्रयोग—(प्रवचन—तैइसवां)

सूत्र:

33—बादलों के पार नीलाकाश को देखने मात्र से शांति
को, सौम्‍यता को उपलब्‍ध होओ।
34—जब परम रहस्‍यमय उपदेश दिया जा रहा हो,
उसे श्रवण करो। अविचल, अपलक आंखों से;
अविलंब परम मुक्‍ति को उपलब्‍ध होओ।
35—किसी गहरे कुएं के किनारे खड़े होकर उसकी
उसकी गहराईयों में निरंतर देखते रहो—जब तक
विस्‍मय—विमुग्‍ध न हो जाओ।
36—किसी विषय को देखो, फिर धीरे—धीरे उससे
अपनी दृष्‍टि हटा लो, और फिर धीरे—धीरे
उससे अपने विचार अलग कर लो। तब!

हम अपनी सतह पर जीते हैं—किनारे—किनारे, सीमा पर। इंद्रियां महज सीमा पर हैं; और तुम्हारी चेतना गहरे केंद्र पर है। और हम इंद्रियों में जीते हैं। वह स्वाभाविक है, लेकिन वहां जीवन का परम फूल नहीं खिलता है; वह तो उसका आरंभ भर है।

तंत्र--सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--22

तीसरी आँख और सिद्धियां—(प्रवचन—बाईस्‍वां)

प्रश्‍न सार:
      1—देखने की विधियां तीसरी आँख को कैसे
प्रभावित करती है?
      2—सम्‍मोहन विद्याओं में लगे लोगों की आंखें
            डरावनी क्‍यों होती है?
      3—आंखों की गति रोकने से मानसिक तनाव क्‍यों
            होता है?

पहला प्रश्न :

कृपया तीसरी आंख के साथ दो सामान्य आंखों के संबंध को समझाएं। देखने की विधियां किस भांति तीसरी आँख को प्रभावित करती हैं।

पहले तो दो बातें समझ लेने की हैं। एक, तीसरी आंख की ऊर्जा वही है जो ऊर्जा दो सामान्य आंखों को चलाती है। ऊर्जा वही है, सिर्फ वह नई दिशा में नए केंद्र की ओर गति करने लगती है। तीसरी आंख है; लेकिन निष्‍क्रिय है। और जब तक सामान्य आंखें देखना बंद नहीं करतीं, तीसरी आंख सक्रिय नहीं हो सकती, देख नहीं सकती।

साधना--सूत्र--(प्रवचन--02)

जीवन की तृष्‍णा—(प्रवचन—दूसरा)

सूत्र:
2—जीवन की तृष्‍णा को दूर करो।

3—सुख—प्राप्ति की इच्छा को दूर करो।

किंतु जो महत्वाकांक्षी हैं,
उन्हीं के समान परिश्रम करो।
जिन्हें जीवन की तृष्णा है,
उन्हीं के समान प्राणिमात्र के जीवन का सम्मान करो।  
जो सुख के लिए ही जीवन—यापन करते हैं,
उन्‍हीं के सामने सुखी रहो।
ह्रदय के भीतर पाप के अंकुर को
ढूंढ़कर उसे बाहर निकाल फेंको।
यह अंकुर श्रद्धालु शिष्‍य के ह्रदय
में भी उसी प्रकार बढ़ता और पनपता है,
जैसे कि वासनायुक्‍त मानव के ह्रदय में।
केवल सूरवीर ही उसे नष्‍ट कर डालने में सफल होते हैं।
दुर्बलों को तो उसके बढ़ने—पनपने,
फूलने—फलने और फिर नष्ट होने की राह देखनी होती है।

शनिवार, 1 अगस्त 2015

साधना--सूत्र--(प्रवचन--01)

महत्‍वाकांक्षा—(प्रवचन—पहला)

सूत्र:

ये नियम शिष्यों के लिए हैं।
इन पर तुम ध्यान दो।
इसके पहले कि तुम्‍हारे नेत्र देख सकें,
उन्हें बहरे हो जाना चाहिए।
और इसके पहले कि तुम सदगुरुओं की उपस्थिति में बोल सकी,
तुम्हारी वाणी को चोट पहुंचाने की वृत्ति से मुक्त हो जाना चाहिए।
इसके पहले कि तुम्हारी आत्मा सदगुरुओं के समक्ष खड़ी हो सके,
उसके पैरों को हृदय के रक्त से धो लेना उचित है।

 1. महत्वाकांक्षा को दूर करो।

      महत्वाकांक्षा पहला अभिशाप है।
जो कोई अपने सहयोगियों से आगे बढ़ रहा है,
उसे यह मोहित करके अपने पथ से विचलित कर देती है।
सत्कर्मों के फल की इच्छा का यह सबसे सरल रूप है।
बुद्धिमान और शक्तिशाली लोग इसके द्वारा
बराबर अपनी उच्च संभावनाओं से स्‍खलित होते रहते हैं।
फिर भी यह बड़ी आवश्यक शिक्षा का साधन है।
इसके फल चखते समय मुंह में राख और धूल बन जाते हैं।
मृत्यु और वियोग के समान इससे भी अंत में यही शिक्षा मिलती है
कि स्वार्थ के लिए अहं के विस्तार के लिए कार्य करने से
परिणाम में निराशा ही प्राप्त होती है।