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शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-081

ध्यान की खेती संतोष की भूमि में-(प्रवचन-इक्यासिवां)

सूत्र:

ददति वे यथासद्धं यथापसादनं जनो।
तत्‍थ यो मड्कु भवति परेसं पानभोजने।
न सो दिवा वा रतिं वा समाधिं अधिगच्‍छति।।206।।

यस्‍स च तं समुच्‍छिन्‍नं मूलधच्‍चं समूहंत।
सवे दिवा वा रतिं वा समाधि अधिगच्‍छति।।207।।

नत्‍थि रागसमो अग्‍गि नत्‍थि दोससमो गहो।
नत्‍थि मोहसमं जालं नत्‍थि तण्‍हासमा नदी।।208।।

सुदस्‍सं वज्‍जमज्‍जेसं अत्‍तनोपन दुदृशं।
परेसं हि सो वज्‍जानि ओपुणात यथाभुसं।
अत्‍तनोपन छोदेति कलिं व कितवा सठो।।209।।

परवज्‍जानुपस्‍सिस्‍स निच्‍चं उज्‍झानसज्‍जिनौ
आसवातस्‍स बड्ढ़न्‍ति आरा सो आसवक्‍खया।।210।।

आकासे व पदं नत्थि समणो नत्थि बाहिरे।
पपज्चभिरता पजा निप्पपज्चा तथागता।।211।।

आकासे व पदं नत्थि समणो नत्थि बाहिरे।
संखारा सस्मता नत्थि नत्थि बुद्धानमिज्‍जितं।।212।।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-080

शब्दों की सीमा, आंसू असीम(प्रवचन—अस्सीवांं )

पहला प्रश्‍न:

इस देश में बुद्धपुरुषों के उपासक के घर में भोजनोपरात सदा से ही बुद्धपुरुष कुछ न कुछ उपदेश अवश्य करते रहे हैं। क्या इस परंपरा के पीछे कोई सूत्र है? कृपा करके समझाएं।
सूत्र सीधा और साफ है। तुम वही दे सकते हो, जो तुम्हारे पास है। तुम शरीर का भोजन दे सकते हो। बुद्धपुरुष वही दे सकते हैं, जो उनके पास है। वे आत्मा का भोजन दे सकते हैं। तुम जो देते हो, वह तो न कुछ है। बुद्धपुरुष जो देते हैं, वह सब कुछ है। जो समझदार हैं, वे यह सौदा कर ही लेंगे। यह सौदा बड़ा सस्ता है। बुद्ध को, महावीर को लोग भोजन देते, तो भोजन के बाद वे दो वचन उपदेश के कहते थे। तुमने कुछ दिया, उससे बहुत ज्यादा तुम्हें देते थे। तुमने जो दिया, उसका क्या मूल्य है? कितना मूल्य है? उन्होंने जो दिया, वह अमूल्य है। वे दो पंक्तिया कभी किसी के जीवन के अंधेरे मार्ग पर रोशनी बन जातीं। वे दो पंक्तियां कभी किसी के सूखे मरुस्थल जैसे हृदय में फूल बनकर खिल जातीं। वे दो पंक्तिटग़ं जहां गीतों का पैदा होना बंद हो गया था, वहां गीतों को जन्म देने लगतीं। उन थोड़े— थोड़े उपदेशों ने लोगों का आमूल जीवन बदल डाला है।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-079

सत्य सहज आविर्भाव है(प्रवचन—उन्नासिवां)

सूत्र:

असज्‍झायमला मंता अनुट्ठानमला घरा।
मलं वण्णस्‍स्‍ कोसज्‍जं रक्‍खतो मलं।।201।।

ततो मला मलंतरं अविज्‍जा परमं मलं।
एतं मलं पहत्‍वान निम्‍मला होथ भिक्‍खवे।।202।।

सुजीवं अहिरिकेन काकसूरेन घंसिन।
पक्‍खन्‍दिना पगब्‍भेन संकिलिट्ठेन जीवितं।।203।।

हिरिमता च दुज्‍जीवं निच्‍चं सुचिगवेसिना।
अलीनेनप्‍पगब्‍भेन सुद्धाजीवेन पस्‍सता।।204।।

एवं भो पुरिस! जानहि पापधम्‍मा असज्‍जता।
मा तं लोभो अधम्‍मो च चिरं दुक्‍खाय रन्‍धयु।।205।।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-078

तृष्णा का स्वभाव अतृप्ति है(प्रवचन—अठहत्रवां) 

 पहला प्रश्न :

श्रेय और प्रेय के भेद को हमें फिर से समझाने की कृपा करें।


से तो भेद साफ है। और साफ नहीं भी। क्योंकि भेद दो बड़ी सूक्ष्म बातों में है। जिसे श्रेय कहते हैं, अंतिम अर्थों में वही प्रेय सिद्ध होता है। और जिसे प्रेय कहते हैं, वह तो श्रेय है ही नहीं। इसलिए भेद सूक्ष्म भी है। लेकिन शब्द की तरफ से न पकड़े, चैतन्य की तरफ से पकड़े।
मूच्‍छित आदमी जिसे करने योग्य मानता है, उसे बुद्ध ने प्रेय कहा है। सोया लुआ आदमी जिसे करने योग्य मानता है, उसे प्रेय कहा है। जागा हुआ आदमी जिसे करने योग्य मानता है, उसे श्रेय कहा है। असली सवाल निद्रा को जागरण में बदलने का है। तभी प्रेय से मुक्ति और श्रेय में गति होगी।
छोटा बच्चा है, वह तो आग से भी खेलना चाहे, वह तो सौप से भी खेलना चाहे, रोको तो रोए भी, रोको तो नाराज भी हो, उसे अभी श्रेय और प्रेय का कुछ भी पता नही। अभी तो इस अबोध अवस्था में जो उसे प्रिय लगता है, वह प्रिय भी कहां है! आग से खेलेगा तो जलेगा; सांप से खेलेगा तो मरेगा। यह प्रीतिकर भी नहीं है। लेकिन अबोध अवस्था में निर्णय भी कैसे करे?

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-077

जितनी कामना, उतनी मृत्‍यु(प्रवचन—सत्रतरवांं) 

 सूत्र:

पांड़लापसोव दानिसि यमपुरिसापि च तं उपट्ठितिा।
उय्योगमुखे च तिट्ठसि पाथयम्‍पि च ते न बिज्‍जति।।195।।

सो करोहि दीपमत्‍तनो खिप्‍पमवायम पंडितो भव।
निद्धन्‍तमलो अनंगणो दिब्‍बं अरियभूमिमेहिसि।।196।।

उपनीतवयो च दानिसि सम्‍पयातोसि यमस्‍यसन्‍तिके।
वासोपि च ते नत्‍थि अन्‍तरा पाथेय्यम्‍पि च ते न विज्‍जति।।197।।

सो करोहि दीपमत्‍तनौ खिप्‍पम वायम पंडितो भाव।
निद्धन्‍तमलो अनंगणो न पुन जातिजरं उपेहिसि।।198।।

अनुपुब्‍बेन मेधावी थाकथकं खणे-खणे।
कम्‍मरो रज्‍जतस्‍सेव निद्धमें मलमत्‍तनो।।199।।

अयसा व मलं समुट्ठाय तमेव खादति।
एवं अतिधेनचारिनं सानि कम्‍मानि नयन्‍ति दुग्‍गति।।200।।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-076

धर्म अनुभव है(प्रवचन—छिहत्ररवां) 

 पहला प्रश्न:

आप बुद्धिवाद से बचने को क्यों कहते हैं?

ताकि तुम बुद्धिमान हो सको। ताकि कभी तुम बुद्ध भी हो सको।
बुद्धिवाद झूठी बुद्धिमत्ता है। बुद्धिवाद वस्तुत: तुम्हारे भीतर छिपे हुए चैतन्य का जागरण नही, सिर्फ उधार है। बुद्धिवाद है दूसरों के विचारों को अपना मान लेना। बुद्धिवाद है, जो तुम नहीं जानते हो, उसके संबंध में कुछ धारणाएं केवल विचार करके तय कर लेना। जैसे अंधा आदमी प्रकाश के संबंध के कोई धारणा बना ले। वह धारणा होगी बुद्धिवाद। सोचे, सुने, दूसरों ने जो गीत गाए प्रकाश के उनका ,संग्रह करे, अनेकों से पूछे और प्रकाश के संबंध में जो भी पता चल सके उस सबके आधार पर कोई धारणा बना ले, अनुभव तो अंधे को प्रकाश का नहीं है, आंख तो [सके पास नहीं है, तो प्रकाश की वह जो भी धारणा बनाएगा वह बुद्धिवाद होगी। वह केवल बुद्धि का ही खेल है। वह वाद मात्र है।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-075

तुम—तुम हो(प्रवचन—पिचहतरवाां) 

सूत्र:

कोधं जहे विप्‍पजहेय्य मानं सज्‍जोजनं सब्‍बमतिक्‍कमेय्य।
तं नामरूपस्‍मि असज्‍जमानं अकिज्‍चनं नानुपातन्‍ति दुक्‍खा।।189।।

यो वे उप्‍पतितं कोध रथं भन्‍तं व धारये।
तमहं सारथिं ब्रूमि रस्‍मिग्‍गाहो इतरो जनो।।190।।

अक्‍कोधेन जिन कोधं असाधुं काधुना जिने।
जिने कदरियं दानेन सच्‍चेन अलिकवादिनं।।191।।

सचचं भणे न कुज्‍झेय्य दज्‍जप्‍पस्‍मिाम्‍पि याचितो।
एतेह तीहि ठानेहि गन्‍छे देवान सन्‍तिके।।192।।

सदा जागरमानानं अहोरत्‍तानुसिक्‍खिनं।
निब्‍बानं अधिमुत्‍तानं अत्‍थं गच्‍छन्‍ति आसवा।।193।।

पोराणमेतं अतुल! नेतं अज्‍जनामिव।
निन्‍दन्‍ति तुण्‍हीमासीनं निन्‍दन्‍ति बहुभाणिनं।
मितभाणिनम्‍पि निन्‍दन्‍ति नत्‍थि लोके अनिन्‍दितो।।194

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-074

जगत का अपरतम संबंध: गुरु—शिष्‍य के बीच—(प्रवचन-चौहत्ररवां) 

 पहला प्रश्‍न:
     
संतो की वाणी सुनने या पढ़ने से मन या मस्तिष्क का तनाव दूर होता है। असंतों के कलाम की यह विशेषता नहीं होती। कृपया बताएं कि इसका कारण क्या है?
 पूछा है फारूख खां ने।
पहली बात, संतों की वाणी सिर्फ वाणी नहीं है। वाणी ही हो तो खोल ही है, भीतर कुछ सार नहीं; शब्द ही हैं, भीतर कुछ सार नहीं। संतों की वाणी वाणी से कुछ ज्यादा है। वाणी तो केवल सहारा है उसे देने का, जो और किसी ढंग से दिया नहीं जा सकता। वाणी तो वाहन है। शब्दों पर चढ़ाकर, शब्दों के घोड़ों पर चढ़ाकर जो भेजा जा रहा है, वह शब्द से बहुत पार है। उसकी ही वर्षा जब हो जाती है हृदय पर तो शांति   मिलेगी, सुख मिलेगा, संतोष मिलेगा।
असंतों की वाणी कोरी है, खाली है। जैसे मरा हुआ आदमी, लाश पड़ी है। और यही आदमी जीवित था कल तक। शरीर अब भी वैसा ही है, लेकिन शरीर के भीतर से कोई चीज उड़ गयी। अब तो पिंजड़ा पड़ा रह गया है, पक्षी उड़ गया। असंतों की वाणी ऐसी है जैसे मरा हुआ आदमी। शब्द की देह तो है, लेकिन अनुभव की आत्मा नहीं है। तो असंतों की वाणी से सुगंध तो मिलनी कठिन है, दुर्गंध ही मिलेगी। संतों की वाणी से संतोष मिलेगा, क्योंकि संतोष सत्य की छाया है।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-073

आदमी अकेला है(प्रवचन—त्रिहतरवां)

 सूत्र:
अयोगे युज्‍जमत्‍तानं योगस्‍मिज्‍च अयोजयं।
अत्‍थं हित्‍वा पियग्‍गाही पिहेतत्‍तानुयोगिनं।।183।।

मा पियेहि समागज्‍छि अप्‍पियेहि कुदाचनं।
पियानं अदस्‍सनं दुक्‍खं अप्‍पियाजज्‍च दस्‍सनं।।184।।

तस्‍मा पियं न कयाराथ पियापायो हि पापको।
गंथा तेसं न विज्‍जन्‍ति येसंनत्‍थि पियाप्‍पियं।।185।।

पियतो जायते सोको पियतो जायते भयं।
पियतो विप्‍पमुत्‍तस्‍स नत्‍थि पियाप्‍पियं।।186।।

तण्‍हाय जायते सोको तण्‍हाय जायते भयं।
तण्‍हाय विप्‍पमुत्‍तस्‍स नत्‍थि सोको कुत्‍तो भयं।।187।।

छंदजातो अनक्खातो मनसा च फुटो सिया।
कामेसु च अप्‍पटिवद्धचित्‍तो उद्धसोतो ति बुच्‍चति।।188।।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-072


आत्मबोध ही एकमात्र स्‍वास्‍थ्‍य-(प्रवचन-बहात्ररवां)

पहला प्रश्‍न:

      संसार में दुःख ही दुःख है या कुछ सुख भी?
 संसार पर्यायवाची है दुख का। यह प्रश्न ऐसा ही है जैसे कोई पूछे, दुख में दुख ही दुख है, या कुछ सुख भी है?
सुख की आशा है। लेकिन सुख कभी घटता नहीं। आशा दुराशा सिद्ध होती है। सुख घटेगा, ऐसा संसार आश्वासन देता है। लेकिन आश्वासन यहां कभी पूरे होते नहीं। एक आश्वासन टूटता है तो संसार दस और देता है। आश्वासन देने में संसार कृपण नहीं है। खूब दिल खोलकर आश्वासन देता है। तुम जितना मांगो, उससे हजारगुना देने की तैयारी दिखलाता है। लेकिन देता कुछ भी नहीं। जीवन ले लेता है तुमसे इन्हीं आश्वासनों के सहारे। इन्हीं आशाओं के सहारे तुम्हें दौड़ा लेता है खूब, थककर गिर जाते हो कब्र में। कब्र में गिरते—गिरते तक भी तुम्हारे आश्वासन पर भरोसे टूटते नहीं। तब तुम सोचते हो कब्र में गिरते—गिरते—बैकुंठ है, स्वर्ग है, वहा मिलेगा सुख। वह भी संसार का ही धोखा है।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-071


उठने मे ही मनुष्यता की शुरुआत है(प्रवचन-इकहत्ररवा  

सूत्र:

नत्थि रागसमो अग्नि नत्‍थि दोससमो कलि ।
नत्थि खंधसमा नत्थि संति परं सुखं ।।178।।

जिधच्छा परमा रोगा संखारा परमा दुखा ।
एतं जत्वा ययाभूतं निब्बानं परमं सुखं ।।179।।

आरोग्य परमा लाभा संतुट्ठी परमं धनं ।
विक्सास परमा जाति निबानं परमं सुखं ।।180।।

पविवेकंर रसं पीत्‍वा रसं उपसमस्स च ।
निद्दरो होति निष्‍पापो धम्‍मपीतिरसं पिवं ।।181।।

एस धम्मो सनतनां-(ओशो)-भाग-08

एस धम्‍मो सनंतनो
(भाग—8) ओशो


किसी गायक को गीत गाते देखकर तुम्‍हें याद आ जाती है अपने कंठ की कि कंठ तो मेरे पास भी है। और किसी नर्तक को नाचते देखकर तुम्‍हें याद आ जाती है, अपने पैरों की कि पैर तो मेरे पास भी है। चाहूं तो नाच तो मैं भी सकता हूं। किसी चित्रकार को चित्र बनाते हुए देखकर तुम्‍हे भी याद आ जाती है कि चाहूं तो चित्र मैं भी बना सकता हूं। ऐसो ही किसी बुद्ध को देखकर तुम्‍हें याद आ जाती है कि चाहूं तो बुद्धत्‍व मैं भी पा सकता हूं।

ओशो
एस धम्‍मो सनंतनो
भाग—8

आपुई गई हिराय-(प्रश्नत्तोर)-प्रवचन-04

आपुई गई हिराय-(प्रश्नत्तोर)-ओशो


दिनांक 04-फरवरी, सन् 1981,
ओशो आश्रम, पूना।
प्रवचन-तीसरा-(फिकर गया सईयो मेरियो नी)

      प्रश्न-सार

1     आद्य शंकराचार्य की एक और प्रश्नोत्तरी उपस्थित करने के लिए क्षमा चाहता हूं--
      आपसे और शंकराचार्य से भी।
      उपस्थिते प्राणहरे कृतान्ते
           किमाशु कार्यं सुधिया प्रयत्नात्।
      वाक्कायचित्तेः सुधिया यमघ्नं
           मुरारिपादांबुजचिंतनं च।।
      इस प्रश्न का उत्तर देने की अनुकंपा करें।

2     दुख का मूल आधार क्या है? आनंद इतना दुर्लभ क्यों है?
      अनुकंपा करें और मुझे दुख-निरोध का उपाय समझाएं।

आपुई गई हिराय-(प्रश्नत्तोर)-प्रवचन-03

आपुई गई हिराय-(प्रश्नत्तोर)-ओशो


दिनांक 03-फरवरी, सन् 1981,
ओशो आश्रम, पूना।
प्रवचन-तीसरा-(सत्संग अर्थात आग से गुजरना)

     प्रश्न-सार
आज से पच्चीस सौ वर्ष पहले भगवान बुद्ध के एक श्रावक बिना भिक्षु हुए बुद्ध से जुड़े थे,
      और बुद्ध उन्हें भिक्षुओं से अधिक स्वस्थ और निकट मानते थे।
      जो लोग आपसे बिना संन्यास लिए शिष्यत्व स्वीकार करके आपसे जुड़ना चाहते हैं,
      आप उन्हें अपने साथ जोड़ कर उनका शिष्यत्व क्यों स्वीकार नहीं करते हैं?
      ऐसे लोगों में से एक मैं भी हूं। जरा मुझ पर भी दया करें।

आपुई गई हिराय-(प्रश्नत्तोर)-प्रवचन-02

आपुई गई हिराय-(प्रश्नत्तोर)-ओशो
 
दिनांक 02-फरवरी, सन् 1981,
ओशो आश्रम, पूना।
प्रवचन-दुसरा-(धर्म तो आंख वालों की बात है)

      प्रश्न-सार

1-विश्वविख्यात धर्म-चिंतक पाल टिलिक कहते हैं कि अकेला होना हर आदमी की किस्मत में
      बदा है। हर आदमी अकेला रहने के लिए अभिशप्त है।
क्या यह सच है? क्या आप भी आदमी को उसके अकेलेपन से छुटकारा नहीं दिला सकते हैं?

2-बुल्लेशाह ने एक अक्षर का गुण गाया है। बुल्लेशाह कहते हैं: एक अक्षर पढ़ो--और छुटकारा है।
      समझाएं कि यह एक अक्षर क्या है और इसके पढ़ने से मुक्ति का क्या संबंध है।

3-मूकोऽस्ति को वा बधिरश्च को वा
           वक्तुं  न  युक्तं  समये  समर्थः।
      तथ्यं सुपथ्यं न शृणोति वाक्यं
           विश्वासपात्रं न किमस्ति नारी।।
आद्य शंकराचार्य की इस प्रश्नोत्तरी पर कुछ कहने की अनुकंपा करें।

आपुई गई हिराय-(प्रश्नत्तोर)-प्रवचन-01

आपुई गई हिराय-(प्रश्नत्तोर)-ओशो


दिनांक 01-फरवरी, सन् 1981,
ओशो आश्रम, पूना।
प्रवचन-पहला –(नी सईयो मैं गई गुवाची)

     प्रश्न-सार


*     आज प्रारंभ होने वाली प्रवचनमाला का शीर्षक है: आपुई गई हिराय।
      संत पलटू के इस वचन का आशय हमें समझाएं।

*     "आपुई गई हिराय'--यह बात कुछ गूढ़ मालूम पड़ती है।
      क्या बात है, खोजने वाला खुद को पा लेता है या खो देता है?
      खोज का क्या अर्थ, जिसमें खोजी न रहा!

पहला प्रश्न: भगवान,
आज प्रारंभ होने वाली प्रवचनमाला का शीर्षक है: आपुई गई हिराय। निवेदन है कि संत पलटू के इस वचन का आशय हमें समझाएं।

आनंद दिव्या,

गुरुवार, 13 अप्रैल 2017

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (शांडिल्य) प्रवचन--36

मौजूदगी ही उसकी है—सोलहवां प्रवचन

सोलहवां प्रवचन
26 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍न सार :

1-संसार में ही परमात्मा के छिपे होने का प्रमाण क्या हो?

2-पूर्वजन्म के पाप या प्रारब्ध क्षणमात्र में कट जाते हैं या भोगने पड़ते हैं?

3-मैं पचपन वर्ष का। तीन बार विवाह हुआ और हर बार पत्नी की मृत्यु। अभी भी स्त्री के प्रति      मन ललचाता हूं। मैं क्या करू?

4-मैं शात हो रही हूं या उदास? कृपया मार्ग बताएं।

5-मैंने सब ध्यान बंद कर दिया है। कृपा कर इस दिशा में हमारा मार्गदर्शन करें।

6-यह संभावना भी तो है कि आप के जाने बाद आपका संन्यास धर्म एक वृहत संगठन का    रूप लेगा जिसमें पद—शृंखला और राजनीति भी प्रविष्ट हो जाएगी।

7-दूसरे व्यक्ति की उपस्थिति के समय, भोजन के समय ध्यान भूल— भूल जाता है।

8-पूरे समय ध्यान की स्थिति क्यों नहीं बनी रहती?

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा-(शांडिल्य)-प्रवचन-01

भक्ति जीवन का परम स्वीकार है—पहला प्रवचन

दिनांक 11 जनवरी, 1987,
श्री रजनीश आश्रम पूना।

सूत्र :

      ओम् अथातोभक्तिजिज्ञासा।।1।।
      सापरानुरक्तिरीश्वरे।।2।।
      तत्संस्थास्यामृतत्वोपदेशात्।।3।।
      ज्ञानमितिचेन्नद्विषतोऽपिज्ञानस्यतदसस्थिते:।।4।।
      तयोपक्षयाच्च।। 5।।


      ओम् अथातोभक्तिजिज्ञासा!

      यह सुबह, यह वृक्षों में शांति, पक्षियों की चहचहाहट... या कि हवाओं का वृक्षों से गुजरना, पहाड़ों का सन्नाटा... या कि नदियां का पहाड़ों से उतरना... या सागरों में लहरों की हलचल, नाद... या आकाश में बादलों की गड़गड़ाहट—यह सभी ओंकार है।
      ओंकार का अर्थ है : सार—ध्वनि; समस्त ध्वनियों का सार। ओंकार कोई मंत्र नहीं, सभी छंदों में छिपी हुई आत्मा का नाम है। जहां भी गीत है, वहां ओंकार है। जहां भी वाणी है, वहां ओंकार है। जहां भी ध्वनि है, वहां ओंकार है।

एस धम्मो सनंतनो-(प्रवचन-070)

विपन्नता का कारण : हमारी मान्यताएं

(प्रवचन-सत्तरवांं)

 पहला प्रश्न:


जगत झूठ है और जीवन दुख ही दुख है, ऐसी टेक पर खड़ा होने वाला जीवन क्या और भी ज्यादा दुखी, उदास और विपन्न न हो जाएगा? क्या पूरब के देशों में यही चीज सामूहिक तल पर नहीं घटित हुई?

जीवन दुख है, यह कोई दार्शनिक धारणा नहीं। ऐसा बुद्धपुरुष सोचते नहीं हैं कि जीवन दुख है, ऐसी उनकी मान्यता नहीं है कि जीवन दुख है, जीवन को दुख सिद्ध करने में उनका कोई आग्रह नहीं है, जीवन ऐसा है। यह जीवन का तथ्य है। इसे तुम लाख झुठलाओ, झुठला न पाओगे। इसे तुम लाख दबाओं, दबा न पाओगे। यह उभर—उभरकर प्रगट होगा। और जब उभरेगा, तब बहुत दुखी कर जाएगा। क्योंकि तुम तो मानकर जीते हो कि जीवन सुख है, फिर उभरता है दुख। सुख की धारणा जब—जब टूटेगी, तभी—तभी तुम दुखी हो जाओगे।

एस धम्मो सनंतनो-(प्रवचन-069)

मृत्यु तो एक झूठ है—(प्रवचन-उन्नसठवांं) 

सूत्र:

            सुसुखं वत! जीवाम वेरिनेसु अवेरिनो ।

            वेरिनेसु मनुस्‍सेसु विहराम अवेरिनो ।।173।।

            सुसुखं वत! जीवाम आतुरेसु अनातुरा ।
            आतुरेसु मनुस्‍सेसु विहराम अनातुरा ।।174।।

            सुसुखं वत! जीवाम उस्‍सेकेसु अनुस्‍सुका ।
            उस्‍सेकेसु मनुस्‍सेसु विहराम अनुस्‍ससुका ।।175।।

            सुसखं वत! जीवामयेसं नौ नत्‍थि किज्‍चिना ।
            पीति भक्‍खा भविस्‍साम देवा आभस्‍सरा यथा ।।176।।

            जयं वेरं पसवति दुक्‍खं सेति पराजितो ।
            उपसंतो सुखं सेति हित्‍वा जयपराजयं ।।177।।

एस धम्मो सनंतनो-(प्रवचन-068)

परम दिशा तुम्हारे भीतर की और—(प्रवचन-अडसठवां)   

पहला प्रश्न:


नकारात्मक मन से, आलोचक दृष्टि से और अहंकार से कैसे छुटकारा होगा? बुद्धि जलकर राख कब होगी? ये दुखदायी हैं, तो भीं उनसे लगाव क्यों बना है?

हली बात, नकारात्मक मन से छुटकारे की चेष्टा सफल नहीं हो सकती, क्योंकि विधायक मन को बचाने की चेष्टा साथ में जुड़ी है। और विधायक और नकारात्मक साथ—साथ ही हो सकते हैं। अलग—अलग नहीं। यह तो ऐसे ही है जैसे सिक्के का एक पहलू कोई बचाना चाहे और दूसरा पहलू फेंक देना चाहे। मन या तो पूरा जाता है, या पूरा बचता है, मन को बाट नहीं सकते। नकारात्मक और विधायक जुड़े हैं, संयुक्त हैं, साथ—साथ हैं। एक—दूसरे के विपरीत हैं, इससे यह मत सोचना कि एक—दूसरे से अलग—अलग हैं। एक—दूसरे के विपरीत होकर भी एक—दूसरे के परिपूरक हैं। जैसे रात और दिन जुड़े हैं, ऐसे ही नकारात्मक और विधायक मन जुड़े हैं।