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शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-071

उठने मे ही मनुष्यता की शुरुआत है(प्रवचन-71)


सूत्र:

नत्थि रागसमो अग्नि नत्‍थि दोससमो कलि ।
नत्थि खंधसमा नत्थि संति परं सुखं ।।178।।

जिधच्छा परमा रोगा संखारा परमा दुखा ।
एतं जत्वा ययाभूतं निब्बानं परमं सुखं ।।179।।

आरोग्य परमा लाभा संतुट्ठी परमं धनं ।
विक्सास परमा जाति निबानं परमं सुखं ।।180।।

पविवेकंर रसं पीत्‍वा रसं उपसमस्स च ।
निद्दरो होति निष्‍पापो धम्‍मपीतिरसं पिवं ।।181।।


तस्‍माहि:
धीरज्व पज्‍चज्‍च बहुस्‍सुतं च धोरय्हसीलं वतवंतमरियं।
तं तादिसं सप्‍पुरिसं सुमेधं भजेथ नक्‍खत्तपथं' व चंदिमा ।।182।।


श्रावस्‍ती में एक कुलकन्‍या का विवाह। मां—बाप ने भिक्षु संध के साथ भगवान को भी निमंत्रित किया। भगवान भिक्षु—संध के साथ आकर आसन पर विराजे है। कुलकन्या भगवान के चरणों में झुकी और फिर अन्य भिक्षुओं के चरणों में। उसका होने वाला पति उसे देखकर नाना प्रकार के काम— संबंधी विचार करता हुआ रागाग्नि से जल रहा था। उसका मन काम की गहन बदलियों और धुओं से ढंका था। उसने भगवान को देखा ही नहीं। न देखा उस विशाल भिक्षुओं के संघ को। उसका मन तो वहां था ही नहीं। वह तो भविष्य में था। उसके भीतर तो सुहागरात चल रही थी। वह तो एक अंधे की भांति था।
भगवान ने उस पर करुणा की और कुछ ऐसा किया कि वह वधू को देखने में अनायास असमर्थ हो गया। जैसे वह नींद से जला ऐसे ही वह चौककर खड़ा हो गया। और तब उसे भगवान दिखायी पड़े और तब दिखायी पड़ा उसे भिक्षु— संघ। और तब दिखायी पड़ा उसे कि अब तक मुझे दिखायी नहीं पड़ रहा था। संसार का धुआ जहां नहीं है वहीं तो सत्य के दर्शन होते हैं। वासना जहां नहीं है वहीं तो भगवत्ता की प्रतीति होती है। उसे चौकन्ना और विस्मय में डूबा देखकर भगवान ने कहा कुमार। रागाग्नि के समान दूसरी कोई अग्नि नहीं है। वही है नर्क वही है निद्रा। जागो प्रिय जागो। और जैसे शरीर उठ बैठा है ऐसे ही तुम भी उत्तिष्ठित हो जाओ। उठो! उठने में ही मनुष्यता की शुरुआत है।
और तब उन्होंने यह गाथा कही—

नत्थि रागसमो अग्नि नत्थि दोससमो कलि।
नत्मि खंधसमा दुक्खा नत्थि सति परं सुखं।।

'राग के समान आग नहीं है। द्वेष के समान मैल नहीं है। पंचस्कंधों के समान दुख नहीं है। शांति से बढ़कर सुख नहीं है। '
पहले तो इस प्रसंग को ठीक से समझ लें। यह प्रसंग अनूठा है।
साधारणत: भारत में परंपरा रही है कि विवाह के समय किसी संन्यासी को निमंत्रित न किया जाए। हिंदू विवाह में किसी संन्यासी को निमंत्रित नहीं करते। यह बात तर्कयुक्त मालूम होती है। क्योंकि कहा संन्यास और कहां विवाह! इन दोनों का क्या मेल? संन्यासी की मौजूदगी, जो लोग विवाह में बंधने जा रहे हैं, उनके लिए बाधा भी बन सकती है। संन्यासी की उपस्थिति उनके लिए इस बात का स्मरण भी बन सकती है कि संसार व्यर्थ है। जो अभी राग के सपनों में सोने जा रहे हैं, उन्हें यह नींद है, यह आग है, यह वासना व्यर्थ और असार है, ऐसी प्रतीति देने वाले व्यक्ति के करीब ले जाना उचित नहीं है।
तो हिंदू परंपरा रही है कि संन्यासी को विवाह में न बुलाया जाए। और विवाह के बाद, जो लोग विवाह के बंधन में बंधे हैं, वे संन्यासी से आशीर्वाद भी लेने न जाएं। क्योंकि संन्यासी का आशीर्वाद अगर सच में आशीर्वाद है तो विवाह के विपरीत होगा। अगर वह कुछ कहेगा, तो विवाह के विपरीत कहेगा। उसकी आशीष जगाने की होगी, सुलाने की नहीं हो सकती। जो अभी सोने को तत्पर हुआ है, वह जागे हुए लोगों से बचे, यह बात तर्कयुक्‍त मालूम होती है।
लेकिन बुद्ध ने ये सारी प्रक्रियाएं तोड़ दीं। बुद्ध ने यह सारी परंपरा तोड़ दी। बुद्ध ने कहा, विवाह के क्षण ही संन्यासी को निमंत्रित करना, बुलाना। क्योंकि यह मौका है जब कच्चा मन एक ढांचे में ढल रहा है। जब कच्चा मन एक यात्रा पर निकल रहा है। इस घड़ी में जो भी संस्कार पड़ जाते हैं, गहरे होते हैं।
मनोवैज्ञानिक भी इस बात से सहमत होते हैं कि मनुष्य के जीवन में कुछ घड़ियां होती हैं जो सर्वाधिक संवेदनशील होती हैं। उन घड़ियों में जो संस्कार पड़ जाते हैं, वे गहरे अचेतन तक चले जाते हैं।
जैसे बच्चा पैदा हुआ, तब पहली घड़ी। बच्चा पैदा होकर जो देखता है, जो अनुभव करता है, पहली बार आंख खोलता है, पहली बार मां के गर्भ से निकलकर श्वास लेता है, उन दस—पंद्रह सेकेंड में जो घटता है, वह सदा के लिए उसके मन का आधार बन जाता है। उससे महत्वपूर्ण घटना फिर दुबारा कभी न घटेगी। इसलिए वे दस—पंद्रह सेकेंड अपूर्व मूल्य के हैं। और मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि उनका जितना सदुपयोग हो सके उतना अच्छा है।
अभी तो जो हम उपयोग करते हैं वह सदुपयोग नहीं है, दुरुपयोग है। अभी तो बच्चा पैदा होता है, डाक्टर उसे पैरों से पकड़कर उलटा टल देता है। यह यात्रा शुरू हो गयी उपद्रव की। यह बच्चे को सदमा लगता है। अभी—अभी सब सुखपूर्ण था, अब अचानक एकदम दुखपूर्ण हो गया। ऐसे तो नौ महीने गर्भ में रहने के बाद जब आख खोलता है बच्चा, तो रोशनी तक कष्टकारी है। इसलिए मनोवैज्ञानिक कहते हैं, बहुत धीमी रोशनी होनी चाहिए। लेकिन जहा अस्पतालों में बच्चों को जन्म दिया जा रहा है, वहा बड़ी तेज रोशनी होती है। बच्चे की आंखें अभी अति कोमल हैं, गुलाब की पंखुड़ियों जैसी हैं, अभी इतनी तेज रोशनी उनके लिए सदा के लिए चोट से भर देगी, तिलमिला देगी, यह पहला अनुभव संसार का बुरा अनुभव हो जाएगा।
पश्चिम में, जहा मनोविज्ञान के नए आधार रखे जा रहे हैं, फर्क आना शुरू हुआ है। अब बच्चों को ऐसे कमरों में जन्म दिया जा रहा है जहां अत्यंत धीमी रोशनी होती है। और अत्यंत सुकोमल, रंगीन, प्रीतिकर, नीली, धीमी नीली रोशनी होती है। कि बच्चा आख खोले तो उसे कोई चोट न लगे। फिर बच्चे को एकदम ऐसे बिस्तर पर लिटा देना जो सख्त है, खतरनाक है, अभी बच्चे की त्वचा बहुत कोमल है। तो पश्चिम में अब उसे ठीक उसके शरीर के योग्य गरम पानी में लिटाते हैं। क्योंकि मां के पेट में वह अपने शरीर के तापमान वाले गरम पानी में ही तैरता है। उसे गरम पानी में लिटाते हैं। ताकि बाहर आकर वह जगत को प्रीतिकर पाए। ऐसा पाए कि उसमें निश्चित हो सके, विश्रांति को पा सके।
ये जो पहले क्षण हैं, अगर सुखद हों तो यह बच्चा सुखी होगा। सुखी होगा इस अर्थ में, इसका दृष्टिकोण सुख का होगा। अगर पहली ही चोटें ऐसी पड़ गयीं तो इस बच्चे के मन में पहले ही घाव बन गए। अब यह डरा हुआ जीएगा। यह मानकर ही चलेगा कि दुश्मन हैं यहां चारों तरफ, मित्र कोई भी नहीं है। इसका दृष्टिकोण विषाक्त हो। इस घड़ी को वैज्ञानिक कहते हैं, ट्रामेटिक। इस समय जो पैदा हो जाता है, संस्कार पूरे जीवन पीछा करेगा।
फिर दूसरी घड़ी आती है जब तुम्हारा विवाह होता है। तब फिर तुम्हारे जीवन में एक नया सूत्रपात हो रहा है। अब तक तुम अकेले थे, अब तक तुम आधे थे, अब तुम एक स्त्री से जुड़े या एक पुरुष से जुड़े, अब तुम पूरे हुए त्तुम्हारी चाहत, तुम्हारा प्रेम, तुम्हारी वासना अब एक नयी यात्रा पर निकल रही है। अब तक का जीवन एक ढंग का था, अब जीवन एक दूसरे ढंग का होगा।
ये घड़ियां भी बड़ी महत्वपूर्ण हैं। इन घड़ियों को भी हम व्यर्थ गंवा देते हैं। इन घड़ियों में भी जो हम करते हैं, वह सब थोथा है। दूल्हे को घोड़े पर चढ़ा दिया है, बैंड—बाजे बजा रहे हैं। बचकाना है। इस बचकानी प्रवृत्ति से बाहर निकालने की जरूरत है। ये घड़ियां अति बहुमूल्य हैं। ये घड़ियां अत्यंत शात हो गए पुरुषों के निकट बीतनी चाहिए। वातावरण संगीतमय हो। लेकिन धूम—धड़ाक से भरा हुआ फिल्मी संगीत ठीक नहीं। यह वातावरण संगीतमय हो, वीणा बजे, बांसुरी बजे, शहनाई बजे, पर यह संगीत ऐसा हो जो इन घड़ियों को मनुष्य के भीतर सदा के लिए प्रीतिकर बनाकर बिठा दे।
तो बुद्ध ने तो तोड़ दी पुरानी परंपरा। उन्होंने कहा कि संन्यासी आ सकता है। वे स्वयं जाते थे। अगर विवाह हो और निमंत्रित किए जाएं तो वे जाते थे। न केवल अकेले, बल्कि अपने हजारों भिक्षुओं को लेकर। ताकि वहा का सारा वातावरण बदल दें। जहां हजारों भिक्षु आ गए हों, वहां की हवा बदल जाएगी। जहा बुद्ध मौजूद हों, वहां की हवा बदल जाएगी। वहां दूल्हा और दुल्हन तो गौण हो जाएंगे। वहा बुद्ध की मौजूदगी प्रगाढ़ हो जाएगी। वह प्रकाश—स्तंभ इन छोटी सी घड़ियों का, इन बहुमूल्य घड़ियों का उपयोग कर लेगा। वह छाप गहरी पड़ जाएगी। और यह याद मन में बैठ जाएगी कि विवाह ही जीवन का अंत नहीं है। जाओ, लेकिन एक दिन इसके बाहर आना होगा। जाओ जरूर, लेकिन अनुभव से एक दिन पकोगे और इसके बाहर भी आओगे। क्योंकि लोग हैं जो बाहर आ गए हैं। बुद्ध हैं। यह बुद्ध की शांति   और यह बुद्ध का आनंद भी याद रह जाएगा।
यह सुगंध पीछा करेगी। कितने ही सपनों में खोए होओ, यह सुगंध कभी—कभी
तुम्हारे सपने को तोड़ देगी। और कभी—कभी जब जीवन का विषाद और जीवन का दुख तुम्हें अतिशय काटने लगेगा तो तुम आत्महत्या की नहीं सोचोगे, तुम आत्म—रूपांतरण की सोचोगे। तुम कहोगे कि ठीक है, अगर यह जीवन दुखपूर्ण है, कष्टपूर्ण है और अगर यहां रस नहीं बह रहा है, तो जीवन समाप्त नहीं हो जाता है, एक और भी जीवन है। बुद्ध जैसा जीवन है।
आधुनिक युग में जब तुम्हारे जीवन में कष्ट होता है, कठिनाई होती है, तो कोई द्वार नहीं मिलता। तब तुम्हें ऐसा लगता है, अब खतम ही कर लो अपने को, अब क्या सार है! यही रोज—रोज उठना, यही रोज—रोज काम करना, यही पत्नी, यही पति, यही झगड़े, यही कलह, यही चिंताएं, यही जिम्मेवारियां, आखिर कार इसमें सार क्या है? और दस साल जीएंगे तो यही—यही दोहरेगा। इससे तो बेहतर अपने को समाप्त कर लो।
दुनिया में आत्महत्या करने वालों की संख्या रोज बढ़ती जाती है। पश्चिम में बहुत बढ़ गयी है। क्योंकि पश्चिम से संन्यासी तो विदा ही हो गया, उसकी तो कहीं झलक ही नहीं मिलती। चर्च में जो पादरी है, या सिनागाग में जो रबाई है, वह भी संन्यासी नहीं है, वह भी तुम जैसा संसारी है, उसके जीवन में भी कुछ नहीं है, उसकी मौजूदगी में भी कुछ नहीं है, उसकी मौजूदगी भी किसी और जीवन की नयी शैली का इंगित नहीं देती, कोई पुकार नहीं है, कोई आह्वान नहीं है।
तो बुद्ध ने यह परंपरा तोड़ दी। बुद्ध ने कहा कि विवाह में तो अगर संन्यासी उपलब्ध हों तो जरूर बुला लेना। ताकि उस समय युवक और युवती जो विवाह में बंध रहे हैं, अभी बड़ी आशाओं से, ये आशाएं कल टूटने ही वाली हैं, क्योंकि इन आशाओं के पूरे होने का कोई उपाय नहीं है। यह जो बड़ी—बड़ी कल्पनाएं संजोकर जा रहे हैं, ये कल्पनाएं आज नहीं कल धूल—धूसरित हो जाएंगी। तब इनके सामने एक बात स्मरण में रहनी चाहिए—एक और भी जीवन की शैली है, यही जीवन सब कुछ नहीं है। तब ये बुद्ध की तरफ मुड़ सकेंगे। संन्यास की तरफ मुड़ सकेंगे।
तो यह जो छोटी सी घटना है, यह समझने जैसी है।
श्रावस्ती में एक कुलकन्या का विवाह है। मां—बाप ने भिक्षु—संघ के साथ शास्ता को भी नियंत्रित किया। भगवान भिक्षु—संघ के साथ आकर आसन पर विराजे। कुलकन्या भगवान के चरणों में झुकी और फिर अन्य भिक्षुओं के चरणों में। उसका होने वाला पति उसे देखकर नाना प्रकार के काम—संबंधी विचार करता हुआ रागाग्नि से जल रहा था।
यहीं स्त्रियों और पुरुषों में बुनियादी फर्क है। स्त्री का जो काम है, वह निष्‍क्रिय काम है। वह ठंडी आग है। पुरुष का जो काम है, वह सक्रिय काम है। वह प्रज्वलित अग्नि है। इसलिए स्त्री को धर्म के जगत में यात्रा करना ज्यादा सुगम पड़ता है, बजाय पुरुष के। क्योंकि पुरुष के भीतर की सारी ऊर्जा सक्रिय है, बहिर्गामी है। स्त्री के भीतर की ऊर्जा निक्रिय है और अंतर्गामी है।
इसलिए तुम अगर चर्च में, मंदिर में, गुरुद्वारे में स्त्रियों की संख्या ज्यादा देखो पुरुषों की बजाय, तो कुछ आश्चर्य मत मानना। वह स्वाभाविक है। बुद्ध के भिक्षु—संघ में भी चार भिक्षुओं में तीन स्त्रियां थीं, एक पुरुष। और वही अनुपात था महावीर के साधु और साध्वियों का। चार साधुओं में तीन साध्वियां, एक साधु। और मैंने बहुत गौर से देखा है, करीब—करीब यही अनुपात है, जहा तुम चार धार्मिक व्यक्ति पाओ, तीन स्त्रिया पाओगे, एक पुरुष।
फिर स्त्रिया जब साधना में उतरती हैं तो समग्ररूपेण उतर जाती हैं। पुरुष इतना समग्ररूपेण नहीं उतर पाता। पुरुष का मन बहुत दिशाओं में भागने वाला मन है। स्त्री का मन भागने वाला मन नहीं है। विश्राम स्त्री के लिए स्वाभाविक है।
तो दोनों मौजूद हैं। कन्या भी मौजूद है जिसका विवाह होना है, वर भी मौजूद है। लेकिन वर को तो बुद्ध दिखायी ही नहीं पड़े। कन्या को दिखायी पड़े। गयी, उनके चरणों में झुकी।
इसे भी खयाल रखना, स्त्री के लिए झुकना सरल है। समर्पण सरल। पुरुष के लिए झुकना कठिन है। अति कठिन। बहुत समझ हो तो ही पुरुष झुक पाता है। जरा भी नासमझी हो तो पुरुष अकड़ा रह जाता है। टूट भला जाए झुकना नहीं चाहता। उसमें ही समझता है कि पुरुषत्व है। स्त्री कोमल लता सी है, जरा सा हवा का झोंका और झुक जाती है। पुरुष सख्त मजबूती से खड़े वृक्षों की भांति है। तूफान भी आए तो झुकना नहीं चाहता। फिर अगर कहीं तूफान बड़ा हुआ और पुरुष को झुकना ही पड़ा, तो वे बड़े वृक्ष गिर जाते हैं, फिर उठ नहीं पाते। छोटे—छोटे पौधे जो झुक जाते हैं, तूफान के निकल जाने पर फिर उठ आते हैं। तूफान उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाता।
स्त्री कोमल लताओं जैसी है। झुकना उसका आंतरिक अंग है। इसलिए कन्या तो जाकर बुद्ध के चरणों में झुकी। उसे बुद्ध दिखायी पड़ गए। वह क्षणभर को बुद्ध के चरणों में झुकते समय भूल ही गयी होगी कि उसका होने वाला पति भी बैठा है। फिर न केवल वह बुद्ध के चरणों में झुकी, वह भिक्षुओं के चरणों में भी झुकी। लेकिन पुरुष को दिखायी ही न पड़ा। उस युवक को बुद्ध दिखायी ही न पड़े। उसकी आंखों में तो आग छायी हुई है। वह तो उतावला हो रहा है। कब जल्दी यह रस्म—रिवाज पूरा हो। उसकी वासना तो प्रदीप्त है।
उसका होने वाला पति उसे देखकर नाना प्रकार के काम—संबंधी विचार करता हुआ रागाग्नि से जल रहा था।
उसके भीतर तो अग्नि जल रही है। लपटें। धुआ ही धुआ है। उसे कहां बुद्ध का पता! आए बैठे, इतने भिक्षु आए उसे कुछ दिखायी नहीं पड़ा। तुमने खयाल किया, जब तुम किसी वासना से बहुत भरे होते हो तो तुम्हें वही दिखायी पड़ता है जो तुम्हारी वासना का बिंदु होता है। और कुछ दिखायी नहीं पड़ता।
एक आदमी ने एक दुकान से—सर्राफ की दुकान से—एकदम हीरे—जवाहरातों पर मुट्ठी बांध ली और भागा। पकड़ा गया—भरी दोपहरी, बीच 'बाजार! मजिस्ट्रेट भी उससे हैरान हुआ, उसने कहा कि तू कैसा पागल है, चोर हमने भी देखे, रोज ही आते हैं, मगर कोई भरी दोपहरी में! जहां ग्राहक बैठे, दुकान चल रही, लोग बैठे, रास्ता चल रहा, वहा तू एकदम घुस गया और हीरे—जवाहरात लेकर भाग गया! यह कोई ढंग है! उस चोर ने कहा, मुझे हीरे—जवाहरात के सिवाय कुछ और दिखायी ही नहीं पड़ रहा था। जैसे ही मुझे हीरे—जवाहरात दिखायी पड़े, फिर मुझे कोई नहीं दिखायी पड़ा—न दुकानदार, न ग्राहक, न रास्ता, न चलते हुए लोग।
जब वासना बहुत प्रगाढ़ हो तो तुम्हें वही दिखायी पड़ता है जो तुम्हारी वासना तुम्हें दिखाती है। शेष सब अंधेरे में हो जाता है। शेष सब पर पर्दा पड़ जाता है। उस युवक को' बुद्ध दिखायी नहीं पड़े। उसने भगवान को देखा ही नहीं।
कभी—कभी भगवान तुम्हारे पास से भी गुजर जाएं और हो सकता है तुम्हें दिखायी न पड़े। बहुत बार गुजरे ही होंगे। क्योंकि अनंत काल में ऐसा तो नहीं हो सकता कि तुम कभी बुद्धों के करीब न आए होओ। ऐसा तो नहीं हो सकता कि कभी कोई जिनत्व को उपलब्ध व्यक्ति तुम्हारे पास से न गुजरा हो। ऐसा तो नहीं हो सकता कि कभी कोई कृष्ण, कभी कोई क्राइस्ट, कोई मोहम्मद, कोई जरथुस्त्र तुम्हारे गांव से न गुजरा हो, तुम्हारे पड़ोस में न ठहरा हो। ऐसा हो ही नहीं सकता। तुम कोई नए तो नहीं हो ( अति प्राचीन हो, सनातन हो। सदा—सदा से यहां रहे हो। जरूर बहुत बार ये मौके आए होंगे। लेकिन तुमने देखा नहीं, यह सच है। अब तो तुम्हें याद भी नहीं। तुम्हें पहचान भी नहीं।
आज भी तुम्हारे पास से बुद्धपुरुष गुजरें तो शायद ही तुम देख पाओ। तुम्हें वही दिखायी पड़ेगा जो तुम देख सकते हो। तुम अगर धन के दीवाने हो तो धन दिखायी पड़ेगा। तुम अगर पद के दीवाने हो, पद दिखायी पड़ेगा। तुम्हारी आंखें बस उसी दिशा में देखती हैं जहां तुम्हारी वासना त्वरा से भागी जा रही है। शेष सब अंधेरा हो जाता है। तो हम करीब—करीब निन्यानबे प्रतिशत अंधे हैं। बस एक प्रतिशत हमें दिखायी पड़ता है। और इसीलिए अक्सर ऐसा हो जाता है, कि शुभ अवसर आते हैं और चूक जाते हैं।
इस युवक की हालत को तुम इस युवक की ही हालत मत समझना। बहुत मौकों पर तुम्हारी भी यही हालत है। ऐसा मत सोचना कि बेचारा! यह कहानी तुम्हारी है। यह आदमी की कहानी है। ये सारी कहानियां आदमी की हैं। इन कहानियों को ऐसा सोचकर मत टाल देना कि ही, किसी को ऐसा हुआ होगा। ऐसा मनुष्य को होता है। ऐसा हर मनुष्य को हो रहा है।
उसने भगवान को देखा ही नहीं।

तुमने कभी इस अनुभव से गुजरकर निरीक्षण किया है? रास्ते से तुम चले जा रहे हो और एक सुंदर स्त्री तुम्हें दिखायी पड़ जाए, फिर तुम्हें कुछ और दिखायी पड़ता है? फिर कुछ दिखायी नहीं पड़ता। फिर कौन गुजर रहा है, कौन आ रहा है, कौन जा रहा है, सब धूमिल हो जाता है। वह सुंदर रूप आंखों को बांध लेता है। तुम्हें राह पर पड़ा हीरा दिखायी पड़ जाए, फिर तुम्हें कुछ और दिखायी पड़ेगा? फिर कुछ भी दिखायी न पड़ेगा। इस अंधेपन के कारण हम बुद्धों से वंचित हो जाते हैं। और बुद्ध के बुद्ध रह जाते हैं।
उसे भगवान दिखायी ही न पड़े। न देखा उसने इस विशाल भिक्षुओं के संघ को। चलो एक भगवान को न देखा हो, मगर ये हजारों पीत वस्त्रों में आए हुए भिक्षु! ये भी उसे दिखायी न पड़े। उसकी आंखों में कुछ और ही भरा है। उसकी आंखें भरी हैं, खाली नहीं। आंखें जब खाली होती हैं तब कुछ दिखायी पडता है, भरी आंखों में कुछ दिखायी नहीं पड़ता। उसे तो अपनी पत्नी ही दिखायी पड़ रही है। शायद उसे नाराजगी भी आ रही हो कि ये किस तरह के लोग आ गए—कि मेरी पत्नी को इनके पैरों में झुकना पड़ रहा है। मेरी पत्नी और किसी के पैरों में झुक रही है! शायद उसे इससे अड़चन भी हुई हो। ये कौन लोग हैं! इन्होंने समझा क्या है अपने आपको! वह खुद तो उठा नहीं झुकने, उसे तो दिखायी नहीं पड़ रहा है कुछ, शायद पत्नी को झुकते देखकर उसे बेचैनी बढ़ रही हो।
ऐसा मेरे पास लोग आ जाते हैं। एक महिला मेरे पास आती है, उसके पति नाराज हैं। पति कहते हैं कि मेरे होते हुए तुझे कहीं जाने की क्या जरूरत है? तुझे जो पूछना है, मुझसे पूछ। और तुझे जो जानना है, मुझसे जान।
अब यह भी खूब अनूठी बात है। कोई पत्नी कभी अपने पति से कुछ पूछ सकती है! और पत्नी कभी मान सकती है कि पति में भी कोई अकल हो सकती है! अकल ही होती तो उसको तुमने चुना होता! अकल ही होती तो तुम उसके जाल में फंसते! अकल ही होती तो तुम पति होते! दुनिया में कोई और तुम्हें मान ले, लेकिन पत्नी तो नहीं मान सकती कि तुममें कुछ अकल है।
अब पति उससे कह रहा है कि हमसे पूछ लो। जो भी जानना है, हमसे जान लो। और वह पति को भलीभांति जानती है—पत्नी से भलीभांति और कौन पति को जानता है! वह तुम्हारी हर कमजोरी को जानती है। तुम्हारी हर सीमा को जानती है। वह तुम्हारी बटनों को दबाना जानती है। जरा सी बटन दबा दे, तुम क्रोधित हो जाते हो। जरा सी बटन दबा दे, तुम प्रभावित हो जाते हो। तुम उसके हाथ की कठपुतली हो और तुम उससे कह रहे हो कि मुझसे पूछ।
तो मैंने उनकी पत्नी को कहा कि तुम उन्हीं से पूछ क्यों नहीं लेती, तू यहां क्यों परेशान होती है—जब वह इतने उससे कहते हैं! उसने अपना माथा ठोंक लिया, उसने कहा, उनसे पूछकर क्या नरक जाना है! वह खुद तो जा ही रहे हैं, मुझको भी ले जाएंगे। और उनके पास है क्या जो मैं उनसे पूछूं?
मगर पति की तकलीफ भी समझना। पति को इस बात से अड़चन होती है कि उनकी पत्नी किसी के चरणों में झुके। इससे पतिभाव को चोट पहुंचती है। यह बात ही उनको अखरती है कि उनकी पत्नी और किसी के चरणों में झुके! उनकी पत्नी और किसी और के सामने झुके! तो पति तो पत्नियों को समझाते रहे हैं कि हम परमेश्वर हैं। अब और इसके आगे तो कहीं जाने को है नहीं, पति परमात्मा है। आगे खतम हो गयी बात। पत्नियों ने कभी सुना नहीं, यह दूसरी बात है! पति लेकिन यह समझाते रहे हैं, यह तो सच ही है।
उसे तो कठिनाई ही होने लगी होगी। ये कहां के लोग आ गए हैं? और ये लोग उसे बड़े अजीब से लगे होंगे। ये पीत वस्त्रधारी यहां क्या कर रहे हैं? इनकी यहां जरूरत क्या है? इन्हें किसने यहां बुला लिया है? लड़की के मा—बाप को बुद्ध से लगाव रहा होगा। लेकिन लड़के के मा—बाप को या लड़के को बुद्ध से कोई संबंध न रहा होगा। यह अपरिचित सी भीड़, ये अजीब से लोग! अगर थोड़े बहुत उसे समझ में भी आए होंगे कि मौजूद हैं, कहीं धुंधले में खड़े दिखायी भी पड़े होंगे, तो सिर्फ बेचैनी का कारण हुए होंगे। और पत्नी को झुकते देखकर उसकी अड़चन और बढ़ गयी होगी।
वह तो वहां था ही नहीं। वह तो भविष्य में था। उसके भीतर तो सुहागरात चल रही थी। वह तो एक अंधे की भाति था। वह तो झपटकर अपनी पत्नी को पकड़ लेना चाहता था। उसे कुछ और सूझ नहीं रहा था।
भगवान ने उस पर करुणा की।
जो इतनी अग्नि में जल रहा हो, उस पर करुणा करनी ही पड़ेगी। उस पर दया खायी। उसका दुख समझा होगा। उसका पागलपन देखा होगा।
उन्होंने कुछ ऐसा किया कि वह वधू को देखने में अनायास असमर्थ हो गया। कथा कुछ कहती नहीं कि उन्होंने क्या किया। कुछ ऐसा किया। एक दूसरी कहानी से तुम्हें समझाऊं कि क्या किया होगा।
एक सूफी फकीर के पास एक युवक आया, चरणों में सिर रखा और कहा कि मैंने निश्चय कर लिया है, मैंने पक्का विचार कर लिया है कि आपके चरणों में समर्पण करूंगा। फकीर ने कहा, तूने कहावत सुनी है कि इसके पहले शिष्य गुरु को चुने, गुरु शिष्य को चुन लेता है? युवक ने कहा, सुनी तो है, लेकिन मुझ पर लागू नहीं होती। मैंने ही निश्चय किया है कि आपके चरणों में सिर रखूंगा। फकीर ने कहा, तूने दूसरी कहावत सुनी है कि भगवान जिसको बुलाता है वही भगवान की तरफ जाता है? उस युवक ने कहा, छोड़ो ये कहावतें, सुनीं, न सुनीं, इससे कोई मतलब नहीं है, लेकिन अपने संबंध में मैं जानता हूं कि मैंने महीनों विचार करने के बाद यह तय किया है कि समर्पण करूंगा।
उस फकीर ने कहा, तू मेरे साथ आ। झोपड़ी के बाहर उसे ले गया, पास ही खेत में एक किसान—दोपहरी है, काम से थक गया होगा, बैलों को विश्राम देना होगा, तो वृक्ष के नीचे बैठा है। उसी के पास एक कुत्ता बैठा है। फकीर ने कहा, देखता है वह किसान और कुत्ता वहां? दूर से दिखाया। और फकीर ने कहा कि अब देख! मैं इस किसान को खबर भेजता हूं कि तू तीन पत्थर इस कुत्ते को मार! ऐसा फकीर का कहना था कि किसान ने एक पत्थर उठाया और फेंका; दूसरा उठाया और फेंका; और तीसरा उठाया और फेंका; और कुत्ते को भगा दिया।
युवक ने मन में सोचा, संयोग की बात मालूम पड़ती है। लेकिन फकीर ने जोर से कहा कि नहीं, संयोग की बात नहीं है। तब तो युवक और भी चौंका। क्योंकि उसने यह कहा नहीं था प्रगट में कि संयोग की बात मालूम पड़ती है, ऐसा मन में सोचा था कि संयोग की बात मालूम पड़ती है। लेकिन फकीर ने कहा, नहीं, संयोग नहीं है। उस युवक के मन में फिर हुआ, जिद्दी रहा होगा, कि यह भी संयोग हो सकता है। फकीर ने कहा, कह रहा हूं कि नहीं, यह. भी प्रयोग नहीं है। तब तो चौकन्ना हुआ युवक। जैसे नींद से जागा।
फकीर ने कहा, तो फिर देख! अभी यह बैठा है, तू चाहता है यह खड़ा हो जाए? उसने कहा, दिखाएं। ऐसा कहना ही था फकीर का कि वह किसान खड़ा हो गया। मगर युवक को संदेह उठा कि हो सकता है उसका विश्राम पूरा हो गया हो और वह उठने के ही करीब हो! तो फकीर ने कहा, देख, बायां हाथ ऊपर उठवाऊं कि दायां हाथ ऊपर उठवाऊं? इसका तो कोई कारण नहीं होगा? उसने कहा कि नहीं, इसका कोई कारण नहीं होगा, बायां उठवाएं। ऐसा कहना था कि उस किसान ने बायां हाथ ऊपर उठाया। अब जरा मुश्किल था। अब फकीर ने कहा, तू मेरे साथ आ।
दोनों किसान के पास गए। का किसान, अनुभवी किसान। फकीर ने कहा कि देखें, एक छोटा सा प्रयोग हम किए हैं, उसके संबंध में थोड़ी जानकारी चाहिए। आपने कुत्ते को पत्थर क्यों मारे? बड़ी देर से बैठा था आपके पास, आपने पत्थर न मारे, फिर अचानक पत्थर क्यों मारे? किसान ने कहा कि देखो, मैं विश्राम कर रहा था, मैंने ध्यान ही नहीं दिया था कुत्ते पर, अचानक मैंने देखा कुत्ता, तो मैंने भगाना चाहा। तो फकीर ने पूछा, अच्छा, भगाना चाहा तो एक ही पत्थर से काम हो जाता, तीन क्यों मारे? तो उस किसान ने कहा कि इसलिए ताकि कुत्ते को ठीक सिखावन लग जाए, दुबारा यहां न आए। फकीर ने पूछा, फिर आप अचानक उठकर खड़े क्यों हो गए? तो उस किसान ने कहा, मैं काफी विश्राम कर चुका था, फिर मैंने सोचा कि इतना ज्यादा विश्राम शरीर के स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं, तो मैं खड़ा होकर जरा व्यायाम कर लेना चाहता था। तो फिर आपने बायां हाथ ऊपर क्यों उठाया? तो उस किसान ने कहा, हइ हो गयी, हाथ मेरे हैं, मैं बायां हाथ उठाऊं कि दायां, तुम कौन हो? मेरी मर्जी! तुम कोई अदालत हो? और मैंने कोई जुर्म किया है ' और उस युवक से कहा कि देख छोकरे, यह फकीर खतरनाक मालूम होता है, इस तरह के सूफी कच्ची उमर के लोगों को उलटी—सीधी बातें पढ़ाया करते हैं। इससे सावधान रहना। यह तुझे कुछ उलटी—सीधी बातें पढ़ा रहा है।
फकीर युवक को लेकर अपने झोपड़े पर लौट आया। उसने कहा, अब तेरा क्या खयाल है? क्योंकि वह किसान भी जिद्द करता है कि ये मेरे विचार हैं।
एक मन के संबंध में बहुत बुनियादी सत्य समझ लेना—जितने विचार तुम अपने कहते हो, उनमें शायद ही कोई तुम्हारा होता है। तुम अक्सर दूसरों के पकड़ते हो। तुम से बलशाली आदमी जब तुम्हारे करीब होता है, तत्‍क्षण तुम उसके विचार पकड़ लेते हो। कहने की जरूरत नहीं होती। विचारों की तरंगें प्रतिक्षण ब्राड़कास्ट हो रही हैं, हर एक आदमी से हो रही हैं, जो कमजोर होता है वह बलशाली की पकड़ लेता है। जैसे पानी ऊपर से नीचे की तरफ बहता है, ऐसे बलशाली व्यक्ति से विचार कमजोर व्यक्तियों की तरफ बहते हैं।
इसलिए तो कहा है, बुरे आदमियों के पास मत बैठना। क्योंकि अक्सर ऐसा होता है, तुम्हारे तथाकथित भले आदमियों से बुरे आदमी ज्यादा बलशाली होते हैं। तुम्हारे नपुंसक भले आदमियों की बजाय अपराधी बहुत बलशाली होते हैं। इसलिए कहा कि बुरे आदमियों के पास मत बैठना। बुरे का सत्संग मत करना। वह बुरा है, लेकिन बलशाली तो है ही!
अब जिस आदमी ने दस हत्याएं की होंगी, वह कोई कम बल का आदमी नहीं है! उसने दुरुपयोग किया है बल का, यह दूसरी बात है। उसने ठीक नहीं किया बल का उपयोग, यह दूसरी बात है। लेकिन बलशाली है, इसमें तो कोई संदेह नहीं। उससे जरा सावधान! उसके पास बैठे तो उसके मस्तिष्क से चलती हुई सूक्ष्म तरंगें तुम्हारा मस्तिष्क पकड़ लेगा। और अगर तुम भी हत्या का विचार करने लगो तो कुछ आश्चर्य न होगा। हालांकि तुम यही सोचोगे कि मैं सोच रहा हूं।
इसलिए कहा, सत्संग करना। जहा कोई ज्ञान को उपलब्ध हुआ हो, उसके पास बैठना। वहां तुम्हारी यात्रा सुगम हो जाएगी। जो शुभ विचार कभी तुम्हारे भीतर तरंगें भी नहीं लिए हैं, उसकी मौजूदगी में तरंगें लेने लगेंगे। जो फूल तुम्हारे भीतर कभी खिले ही नहीं, उनकी पखुडियां खिलने लगेंगी। कलियां खिलने लगेंगी, फूल बनने लगेंगी। जो किरण तुम्हारे भीतर कभी उठी ही नहीं, सोयी की सोयी ही पड़ी थी, अचानक किसी के संघात में जगकर खड़ी हो जाएगी। सत्संग का अर्थ ही यही है कि किसी ऐसे बलशाली व्यक्ति के पास पहुंच जाना जो जाग गया है, ताकि उसका जागरण तुम्हें झकोरे देने लगे। ताकि उसका जागरण झंझावात बन जाए। ताकि उसका जागरण अलार्म बन जाए और तुम्हारे चारो तरफ बजने लगे। और तुम्हें सोने न दे। और तुम्हारी नींद को तोड़े। और तुम्हें सपनों से जगाए।
बुद्ध ने क्या किया होगा? कुछ खास नहीं किया होगा, सिर्फ इतना ही किया होगा, उस युवक की तरफ ध्यान दिया होगा। सिर्फ अपनी आंखें उस युवक की तरफ फेरी होंगी। जैसे तुम टार्च लिए होते हो न और किसी के चेहरे की तरफ टार्च को फेर दो, तो सारे टार्च की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ने लगे। ऐसा बुद्ध ने अपने भीतर की टार्च को उस युवक की तरफ घुमाया होगा। रोशनी दौड़ी उस युवक की तरफ। उस रोशनी के संघात में उसके भीतर सोयी हुई प्रज्ञा जैसे चौंककर जग गयी।
जैसे वह नींद से जागा, ऐसे चौंककर खड़ा हो गया। और तब उसे भगवान दिखायी पड़े।
भगवान कब दिखायी पड़े? जब वह अपनी होने वाली पत्नी को देखने में असमर्थ हो गया। यह बात बड़ी समझने जैसी है।
तुम्हारी आंखें सीमित हैं। या तो तुम कामना देखो, या आत्मा देखो। या तो तुम काम देखो, या राम देखो। दोनों एक साथ न देख सकोगे। कभी तुमने रुपए का सिक्का हाथ में रखकर देखा? तुम दोनों पहलू एक साथ नहीं देख सकते। या तो उलटा रखो सिक्का, तो उसकी पीठ देखो, या सीधा रखो—सिक्का, तो उसका मुंह देखो। लेकिन तुम दोनों पहलू एक साथ नहीं देख सकते। सिक्का तो छोटी सी चीज है, फिर भी दोनों पहलू एक साथ देखने का कोई उपाय नहीं है। एक ही देख सकते हो। ऐसा ही राम और काम। एक तरफ नजर लगी हो तो दूसरी तरफ नजर बंद हो जाती है। दूसरी तरफ नजर जाए तो इस तरफ बंद हो जाती है।
तो जैसे ही बुद्ध ने कुछ किया—कुछ किया यानी अपने प्रकाश की धारा को उस युवक की तरफ फेंका, एक सेतु बन गया प्रकाश का, नहा गया होगा वह युवक उस प्रकाश में—अचानक उसे अपनी होने वाली पत्नी दिखायी न पड़ी, कहां गयी? जो है वही थोड़े ही तुम्हें दिखायी पड़ता है। जो तुम देखना चाहते हो, वही दिखायी पड़ता है। तुमने खयाल किया, तुम क्या देखना चाहते हो वही दिखायी पड़ता है। तुम्हारा संसार सीमित है। तुम्हारा संसार तुम्हारा चुनाव है।
वैज्ञानिक कहते हैं कि जितनी घटनाएं तुम्हारे पास घट रही हैं, उसमें से केवल दो प्रतिशत तुम देखते हो, अट्ठानबे प्रतिशत तुम देखते ही नहीं। अब समझो कि एक सुंदर युवती आती है। तुम पूरी युवती देखते हो? नहीं देखते। तुम कुछ देखते हो, कुछ छोड़ देते हो। अगर पीछे कोई तुमसे याद करने को कहे कि तुमने क्या देखा, तो तुम शायद थोड़ा—बहुत स्मरण कर पाओगे। शायद तुमसे कोई पूछे कि उसके बाल का रंग क्या था, तो तुम शायद याद न कर पाओ। उसकी आंखों का रंग क्या था, तो शायद तुम याद न कर पाओ। लेकिन कुछ तुम याद कर पाओगे। जो तुम याद कर पाओगे वही तुमने देखा था।
तुम्हें इस बगीचे में से गुजारा जाए और बाद में तुमसे पूछा जाए, क्या देखा? तो हर आदमी अलग—अलग बातें याद करेगा। जो जिसने देखा होगा वही तो याद करेगा न! बगीचे से सब एक ही गुजरे थे। हो सकता था कोई फूलों का पारखी गुजरा हो। तो वह फूलों को देखेगा। और किसी लकड़हारे को गुजारकर ले गए, तो वह सोचेगा कि कौन—कौन से झाडू काटकर लकड़ी बेची जा सकती है! उसकी याददाश्त उनकी ही होगी। और अगर तुम किसी चित्रकार को ले गए, तो उसने रंगों का अनूठा जमघट देखा होगा। हरे रंग में भी हजार हरे रंग देखे होंगे। एक ही हरा सौ थोड़े ही है, जरा गौर से देखो। हर वृक्ष अलग ढंग से हरा है। लेकिन कोई पेंटर, कोई चित्रकार ही अलग—अलग हरे रंग देख सकता है। उसे शायद कुछ और दिखायी ही न पड़े। अगर तुम किसी वनस्पतिशास्त्री को ले आओ, तो वह नाम ही नाम देखेगा। लैटिन और ग्रीक नाम उसको याद आएंगे। कि कौन सा वृक्ष किस जाति का है, कहां से आता है, किस देश से आता है। अगर गुलाब का पौधा वह देखेगा तो सोचेगा, ईरान से आता है।
यह तुम शायद सोचोगे ही नहीं, क्योंकि तुम्हें ईरान से क्या लेना—देना है! गुलाब का ईरान से क्या लेना—देना! लेकिन वनस्पतिशास्त्री तत्क्षण सोचेगा, ईरान से आता है। इसीलिए तो हिंदुओं के पास गुलाब के लिए कोई नाम नहीं है। गुलाब तो ईरानी नाम है। गुल आब। हिंदी में तो कोई नाम ही नहीं है गुलाब के लिए। हो भी नहीं सकता, क्योंकि यह पौधा ही हमारा नहीं है। यह पौधा ही उधार है। मगर, सबको यह बात दिखायी न पड़ेगी।
हम वही देखते हैं, जो देखने के लिए हम तैयार हैं।
जैसे ही बुद्ध की रोशनी उस युवक पर पड़ी होगी, उसकी चेतना में एक क्रांति घट गयी—क्षणभर को सही, लेकिन उस धक्के में वह घूम गया। उसका चाक पूरा घूम गया। कहां से कहा हो गया। अभी पत्नी ही दिखायी पड़ती थी, अब पत्नी दिखायी न पड़ी। और जब पत्नी न दिखायी पड़ी, तब जैसे नींद से जागा। उसे भगवान दिखायी पड़े। वह अपूर्व रूप भगवान का, वह अपूर्व ज्योति, वह दिव्यता, वह शांति  ! क्षणभर को बारात खो गयी होगी, विवाह खो गया होगा, मंडप खो गया होगा। सब खो गया होगा। क्षणभर को वह किसी और ही लोक में प्रविष्ट हो गया। और तब उसे दिखायी पड़ा भिक्षु—संघ।
जब भगवान दिखायी पड़े, तो उसे दिखायी पड़े ये लोग जो उनके दीवाने हैं। तब उसे दिखायी पड़े ये लोग जिनमें भी थोड़ी— थोड़ी किरण उनकी है, भगवान की है। जिनमें थोड़ा— थोड़ा स्वाद उनका है। जब मूलस्रोत दिखायी पड़ा, तो ये दिखायी पड़े। जब सूरज दिखायी पड़ा तो ये छोटे—छोटे दीए भी दिखायी पड़े। जब सूरज ही न दिखता हो तो दीए क्या खाक दिखायी पड़ेंगे। सूरज दिखा, रोशनी पहचान में आयी, तो और भी रोशन दीए समझ में आए। तब उसे भिक्षु—संघ दिखायी पड़ा। संसार का धुआ जहा नहीं है, वहीं तो सत्य के दर्शन होते हैं। और वासना जहां नहीं है, वहीं तो भगवत्ता के शिखर प्रगट होते हैं।
उसे चौकन्ना और विस्मय में डूबा देख भगवान ने कहा, कुमार! रागाग्नि के समान दूसरी कोई अग्नि नहीं।
यह भी खूब उपदेश हुआ किसी के विवाह पर! लेकिन बुद्धपुरुष अटपटी बातें कहते सदा पाए गए हैं। यह भी कोई बात हुई! लेकिन बुद्ध तो वही कहेंगे, जो है, जैसा है। और यह मौका सुंदर है। अभी जल रही हैं लपटें तेज। जब तुम्हारे घर में आग लगी हो प्रखर और सब जल रहा हो, तब तुम्हें जगाना ज्यादा आसान है। जब आग बुझी—बुझी हो जाए, राख ही राख रह जाए, तब जगाना मुश्किल है।
इस घड़ी में तो आग ही आग है। सुहागरात के बाद लपटें इस तरह की न रह जाएंगी। हनीमून के बाद तो अक्सर विवाह समाप्त हो जाते हैं, बचता क्या है? खोल रह जाती, राख रह जाती, बुझे दीए रह जाते। फिर आदमी ढोता है उनको। जब आग प्रगाढ़ता से जल रही है और रोआ—रोआ उसमें जल रहा है, तब जागरण आसान है। तब चोट करनी आसान है। बुद्ध ने ठीक ही अवसर चुना है। कितना ही अटपटा लगे, लेकिन ठीक अवसर चुना है।
रागाग्नि के समान दूसरी कोई अग्नि नहीं, कुमार.! वही है नर्क, वही है निद्रा। जागो, प्रिय जागो! और जैसे शरीर उठ बैठा है, वैसे ही तुम भी उठ जाओ, उत्तिष्ठित हो जाओ।
अभी शरीर चौंककर उठा है। अब ऐसे ही तुम्हारा सूक्ष्म मन भी चौंककर उठे। स्थूल और सूक्ष्म के भीतर छिपा हुआ परम सूक्ष्म भी चौंककर उठे।
उठो। उठने में ही मनुष्यता की शुरुआत है।
जो ऐसा भीतर उत्तिष्ठित नहीं हो गया है, वह मनुष्य जैसा दिखता भर है, मनुष्य है नहीं। अभी मनुष्यता की शुरुआत नहीं हुई।
और तब उन्होंने यह गाथा कही—

नत्थि रागसमो अग्गि।

'राग के समान आग नहीं।'

नत्थि दोससमो कलि ।

'द्वेष के समान मैल नहीं।'

नत्थि खंधसमा दुक्खा।

'पंचस्कंधों के समान दुख नहीं।'

नत्थि सति परं सुखं।

'और शांति   से बढ़कर सुख नहीं।'
तू किस सुख की बात सोच रहा है? हम देखकर कहते हैं कि वहां सुख नहीं है। हम अनुभव से गुजरकर कहते हैं, वहां सुख नहीं है। तू जिस तरफ दौड़ा जा रहा है, हम भी दौड़े और देख इन भिक्षुओं को, ये भी दौड़े हैं और देख अनंतकाल में अनंत लोग दौड़े हैं, लेकिन सभी खाली हाथ लौट आए हैं। सुख चाहता है न! लेकिन दिशा तेरी गलत है।
पंचस्कंध बुद्धों का विशिष्ट शब्द है। बुद्ध कहते हैं, मनुष्य का व्यक्तित्व बना है दो चीजों से—नाम, रूप। रूप यानी देह। नाम यानी मन। रूप यानी स्थूल, नाम यानी सूक्ष्म। देह तो एक है, स्थूल देह तो एक है, मन के चार रूप हैं। उन चार के नाम हैं—वेदना, संज्ञा, संस्कार, विज्ञान। ऐसे सब मिलाकर पाच। इन पांच से मनुष्य का व्यक्तित्व बना है। और इन पांच में ही जो जीता है, बुद्ध कहते हैं, पंचस्कंधों के समान दुख नहीं। स्वाद में जी रहे हैं, धन इकट्ठा करने में जी रहे हैं, पद में जी रहे हैं, राग में जी रहे हैं, आसक्ति में जी रहे हैं; देह को बचाने में लगे हैं कि मर न जाए बुढ़ापा न आ जाए साजने—सवारने में लगे हैं—इस तरह जो जी रहा है पंचस्कंधों में—या तो मन की वासनाएं हैं, पद की, महत्वाकांक्षाओं की, या शरीर की वासनाएं हैं, इन वासनाओं में जो जी रहा है, वह दुख में जीता है। अशांति में जीता है।
'और शांति से बढ़कर कोई सुख नहीं है। '
वह दुख ही दुख में जीता है, इसलिए इस तरह के जीवन की दिशा नर्क की दिशा है।

दूसरा सूत्र—

क समय भगवान पांच सौ भिक्षुओं के साथ आलवी नगर आए आलवी नगरवासियों ने भगवान को भोजन के लिए निमंत्रित किया उस दिन आलवी नगर का एक निर्धन उपासक भी भगवान के आगमन को सुनकर धर्म—श्रवण के लिए मन किया। किंतु प्रात: ही उस गरीब के दो बैलों में से एक कहीं चला गया सो उसे बैल को खोजने जाना पड़ा बिना कुछ खाए— पीए ही दोपहर तक वह बैल को खोजता रहा बैल के मिलते ही वह भूखा— प्यासा ही बुद्ध के दर्शन को पहुंच गया उनके चरणों में झुककर धर्म—श्रवण के लिए आतुर हो पास ही बैठ गया।
लेकिन बुद्ध ने पहले भोजन बुलाया। उसके बहुत मना करने पर भी पहले उन्होंने जिद की और उसे भोजन कराया। फिर उपदेश की दो बातें कहीं। वह उन थोड़ी सी बातों को सुनकर ही स्रोतापत्ति— फल को उपलब्ध हो गया भगवान के द्वारा किसी को भोजन कराने की यह घटना बिलकुल नयी थी ऐसा पहले कभी उन्होंने किया न था—और न फिर पीछे कभी किया तो बिजली की भांति भिक्षु— संघ में
चर्चा का विषय बन गयी अंतत: भिक्षुओं ने भगवान से जिज्ञासा की। तो उन्होंने कहा भूखे पेट धर्म नहीं। भूखे पेट धर्म समझा जा सकता नहीं भिक्षुओ भूख के समान और कोई रोग नहीं है।
और तब उन्होंने यह गाथा कही—

जिधच्छा परमा रोना संखारा परमा द्रुखा।
एतं जत्वा यकभूतं निबानं परमं सुखं ।।

'भूख सबसे बडा रोग है, संस्कार सबसे बड़े दुख हैं। ऐसा यथार्थ जो जानता है, वही जानता है कि निर्वाण सबसे बड़ा सुख है। '
इस बात को समझना।
भूख को सबसे बड़ा रोग कहा बुद्ध ने। क्यों. क्योंकिन्नब भूख प्रगाढ़ हो, पेट भरा न हो, तो सारी चेतना पेट के इर्द—गिर्द ही घूमती है। जब शरीर भूखा हो तो चेतना ऊंचाइयों पर उड़ ही नहीं सकती। शरीर के आसपास ही मंडराती है।
एक सत्य तुमने देखा होगा, पैर में कांटा चुभ जाए तो फिर चेतना वहीं—वहीं घूमती है न! एक दात टूट जाए तो चेतना वहीं—वहीं घूमती है न! सिर में दर्द हो तो चेतना वहीं—वहीं घूमती है न! जहां पीड़ा हो, चेतना वहीं रुक जाती है।
इसलिए हमारे पास जो शब्द है—वेदना, वह बहुत अदभुत है। वेदना के दो अर्थ होते हैं, बोध और दुख। वेदना बना है विद से, जिससे वेद बना है। इसलिए उसका एक अर्थ होता है, बोध, ज्ञान। और वेदना का दूसरा अर्थ होता है, दुख, पीड़ा। एक ही शब्द के ये दो अर्थ और बड़े अजीब से! जिनका कोई तालमेल नहीं। लेकिन तालमेल है।
जब दुख होता है, तो वहीं सारा बोध संगृहीत हो जाता है। जहा दुख है, वहीं बोध संगृहीत हो जाता है। फिर दुख से हटना मुश्किल हो जाता है। अब जो आदमी भूखा है, उसके लिए शरीर ही शरीर दिखायी पड़ता है। कहां आत्मा की बातें! हम कहते हैं न—भूखे भजन न होहि गुपाला। अब एक आदमी भूखा है, अगर भगवान की प्रार्थना भी करे, तो कुछ होगा नहीं। सारी प्रार्थना पर भूख छा जाएगी।
इसलिए मैं निरंतर कहता हूं कि दरिद्रता के कारण दुनिया में धर्म बढ़ नहीं पाता। केवल समृद्ध समाज ही धार्मिक हो सकते हैं। और बुद्ध के समय में, महावीर के समय में इस देश ने बड़ी ऊंचाई ली, क्योंकि देश बड़ा समृद्ध था।
तुम थोड़ा सोचो, महावीर चालीस हजार भिक्षुओं को अपने साथ लेकर घूमते थे। हर गांव की इतनी संभावना थी, क्षमता थी कि चालीस हजार भिक्षुओं को खिला सके। बुद्ध भी पचास हजार भिक्षुओं को लेकर घूमते थे। गांव—गाव की इतनी क्षमता थी कि पचास हजार भिक्षुओं को खिला सके। कभी तीन मास, चार मास वर्षा में एक जगह भी रुकते थे। तो पचास हजार भिक्षुओं को खिलाना, क्षमता की बात थी। आज तो पूरा गाव भी पांच भिक्षुओं को खिलाने में समर्थ नहीं रह गया है। संपन्न था देश, खूब समृद्ध था। सोने की चिड़िया ऐसे झूठे ही नहीं कहा जाता था! बुद्ध के समय में इस देश ने सबसे ऊंचा शिखर देखा समृद्धि का। उस समृद्धि के शिखर पर ही बुद्ध और महावीर प्रगट हुए। फिर दुबारा बुद्ध और महावीर के प्रगट होने का उपाय न हुआ।
इसलिए यह कुछ आश्चर्य की बात नहीं है कि आज अमरीका में धर्म के संबंध में प्रगाढ़ रस है। होगा ही। होना ही चाहिए। जहां समृद्धि है, जहा पेट पूरी तरह भर गया है, वहां आत्मा का खालीपन दिखायी पड़ने लगता है। इनमें सीढ़ी दर सीढ़ी संबंध है। जिस आदमी ने नींव भर ली मकान की वही तो दीवालें उठाएगा न 1 नींव ही नहीं भरी तो दीवाल कैसे उठेगी? और जिसने दीवाल उठा ली वह छप्पर रखेगा। दीवाल ही नहीं उठी तो छप्पर कैसे रखेगा? और छप्पर उठ गया तो फिर स्वर्ण का कलश, स्वर्ण—कलश चढ़ाएगा।
धर्म तो स्वर्ण—कलश है। धर्म तो आखिरी ऊंचाई है। उसके पार तो फिर कुछ भी नहीं है। जिसने नीचाइयों की सुविधाएं अभी नहीं जुटायी, वह ऊंचाइयों के सपने भला देखे, लेकिन सत्य में उन्हें उपलब्ध न हो सकेगा।
इसलिए मैं निरंतर कहता हूं कि गरीब समाज धार्मिक नहीं हो सकता। यह मैं नहीं कह रहा हूं कि कोई गरीब व्यक्ति धार्मिक नहीं हो सकता 1 गरीब व्यक्ति चेष्टा करके अपवाद हो सकता है। लेकिन गरीब समाज धार्मिक नहीं हो सकता है। मैं यह भी नहीं कह रहा हूं कि समृद्ध समाज अनिवार्य रूप से धार्मिक हो जाएगा, लेकिन समृद्ध समाज की धार्मिक होने की संभावना है। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि हर समृद्ध व्यक्ति धार्मिक हो जाएगा। लेकिन समृद्ध व्यक्ति की धर्म की तरफ उत्सुकता बढ़ने की ज्यादा संभावना है बजाय असमृद्ध व्यक्ति के।
हमारे भीतर तीन तल हैं—शरीर की जरूरतें हैं, फिर मन की जरूरतें हैं, फिर आत्मा की जरूरतें हैं। शरीर की जरूरतें हैं—रोटी, रोजी, कपड़ा, मकान। फिर मन की जरूरतें हैं—संगीत, साहित्य, कला। अब जिसका भूख से भरा पेट है, वह शेक्सपियर पढ़ेगा? कैसे पढ़ेगा! कालिदास को समझेगा? कैसे समझेगा! शास्त्रीय संगीत सुन पाएगा? इधर पेट में भूख कचोटती होगी, शास्त्रीय संगीत नहीं समझ पाएगा, न सुन पाएगा। मन की जरूरतें। जब मन की जरूरतें भी भर जाती हैं, शास्त्रीय संगीत में भी अब कुछ नहीं दिखायी पड़ता, वह संगीत भी चुक गया, अब किसी और बड़े संगीत की खोज शुरू होती है, तब ध्यान। एक ऐसे संगीत की खोज शुरू होती है जहां वाद्य की भी जरूरत नहीं रह जाती। एक ऐसे संगीत की खोज शुरू होती है जो भीतर बज ही रहा है, जिसको बजाना नहीं पड़ता—अनाहत नाद—जो अपने से बज रहा है—ओंकार—तब आत्मा की जरूरतें शुरू होती हैं।
तो बुद्ध ने ठीक कहा कि ' भूख सबसे बड़ा रोग है। संस्कार सबसे बड़े दुख हैं। ऐसा यथार्थ जो जानता है वही जानता है कि निर्वाण सबसे बड़ा सुख है। '
उन्होंने उस भूखे आदमी को भोजन कराया। लेकिन यह बात एक ही दफा घटी है, यह भी खयाल रखने जैसी बात है। ऐसा बुद्ध ने बार—बार नहीं किया। क्योंकि यह भूखा आदमी सिर्फ भूखा आदमी ही नहीं था, इस भूखे आदमी के भीतर बड़ी मुमुक्षा थी। यह बड़ी प्रगाढ़ता से आकांक्षा कर रहा था परमात्मा के खोज की, सत्य के खोज की—या जो भी नाम दो। यह सिर्फ भूखा होता तो बुद्ध को इसमें कोई विशेष उत्सुकता नहीं थी। उत्सुकता इसलिए थी कि इसके भीतर एक और बड़ी भूख थी जो इस छोटी भूख के कारण दबी पड़ी थी। इसके भीतर एक बड़ी भूख का अंकुर फूट रहा था, जो नहीं फूट पा रहा था, क्योंकि यह छोटी भूख इसे खाए जा रही थी।
यह सुबह ही से बुद्ध का ही स्मरण करता घूम रहा था। खोज रहा था बैल को, स्मरण कर रहा था बुद्ध का। इतनी जल्दी थी इसे कि घर से बिना खाए—पीए निकल पड़ा था कि जल्दी—जल्दी बैल को खोजकर बुद्ध के पास पहुंच जाऊं। फिर इतनी जल्दी थी, इतनी आतुरता थी कि बैल मिल गया तो उसे किसी तरह बांध—बूंधकर खेत—खलिहान में, भागा! घर नहीं गया कि दो रोटी खा ले। भागा! कि पहले बुद्ध को सुन लूं। इसकी धर्म की प्यास निश्चित प्रगाढ़ रही होगी।
तुम तो छोटे—छोटे कारणों से चूक जाओ। कभी ध्यान नहीं करते, क्योंकि कहते हो कि आज जरा शरीर स्वस्थ नहीं है। कभी कहते हो, आज ध्यान कैसे करें, घर में मेहमान आए हैं। कभी कहते हो, आज ध्यान कैसे करें, आज जरा दफ्तर में थक गए। आज कैसे ध्यान करें, आज कैसे ध्यान करें, तुम बहाने खोजते रहते हो।
इस आदमी ने बहाना नहीं खोजा। इसके पास बहाने काफी थे—बैल खो गया, अब कहां बुद्ध के पास जाएं! बैल खोजें कि बुद्ध को खोजें! बात छोड़ देता। तुम होते तो बात ही छोड़ दिए होते। फिर बैल भी मिल गया होता तो कहता, अब दोपहरी भर थका—माँदा हूं घर थोड़ा भोजन करूं, विश्राम करूं, फिर देख लेंगे, ऐसी जल्दी क्या है! और बुद्ध कोई भागे थोड़े ही जाते हैं!
इसकी बड़ी प्रगाढ़ आकांक्षा रही होगी कि भूखा ही आ गया। इसका कुम्हलाया हुआ चेहरा, इसका भूखा पेट, यह थका—मादा जब बुद्ध के चरणों में झुका होगा तो उन्होंने देखा होगा—इसका शरीर ही भूखा नहीं है, इसकी आत्मा भी भूखी है। यह सच में ही. तो उन्होंने बड़ी जिद्द की कि तू पहले भोजन कर। उन्होंने खुद भोजन बुलाया। अब बुद्ध के पास कहां भोजन! किसी को दौड़ाया कि जल्दी गांव से भोजन लेकर आओ ' भिक्षुओं में चर्चा की बात उठ ही गयी होगी कि यह कौन विशिष्ट आदमी आ गया, एक गंवार सा किसान है! बुद्ध इसमें क्या देख रहे हैं?
जो कभी—कभी तुम्हें नहीं दिखायी पड़ता, वह बुद्धों को दिखायी पड़ता है। क्योंकि तुम्हें तो हीरे तभी दिखायी पड़ते हैं, जब जौहरी उन्हें साफ—सुथरा करके, निखारकर, पालिश करके रख देते हैं, तब दिखायी पड़ते हैं। बुद्धों को तो हीरे तब दिखायी पड़ जाते हैं जब वे पत्थर की तरह पड़े हैं। जब उनमें कोई चमक नहीं है। यह एक अनगढ़ हीरा था। यह चमक सकता था। यह पत्थर नहीं था।
बुद्ध ने उसे भोजन कराया पहले, फिर उसे दो शब्द कहे, ज्यादा नहीं, और कथा कहती है कि उन दो शब्दों को, उन थोड़ी सी बातों को सुनकर ही वह स्रोतापत्ति—फल को उपलब्ध हो गया।
स्रोतापत्ति—फल का अर्थ होता है, जो व्यक्ति बुद्ध की धारा में प्रविष्ट हो गया। स्रोतापन्न हो गया। जो बुद्ध की चेतना में प्रविष्ट हो गया। जो नदी में उतर गया। किनारे पर खड़ा था, उसने कहा, ठीक, अब मैं आता हूं, अब चलता हूं सागर की तरफ। स्रोतापत्ति। यह बुद्ध की साधना पद्धति में सबसे महत्वपूर्ण फल है। क्योंकि फिर शेष सब इसके बाद ही होगा। जो धारा में ही नहीं उतरा है वह तो सागर कब—कैसे पहुंचेगा? उसके तो पहुंचने का कोई उपाय नहीं है।
वहां ऐसे लोग थे जो वर्षों से बुद्ध को सुन रहे थे और अभी स्रोतापत्ति—फल को उपलब्ध नहीं हुए थे। अभी किनारे ही पर खड़े सोच—विचारकर रहे थे, दुविधा में पड़े थे—करें कि न करें? जंचती भी है बात कुछ, नहीं भी जंचती है बात कुछ। इसने कुछ सोच—विचार न किया। इसने तो बुद्ध के दो शब्द सुने और इसने कहा, बस काफी है। डूब गया। स्रोतापत्ति—फल का अर्थ होता है, डूब गया, डुबकी ले ली। बुद्धमय हो गया।
भिक्षुओं ने भगवान से जिज्ञासा की कि बात क्या है? ऐसा सम्मान आपने कभी किसी को दिया नहीं। भोजन करवाने की आपने कभी किसी को चेष्टा नहीं की। अक्सर तो ऐसा होता है कि लोगों को आप समझाते हैं, उपवास करो। इस आदमी को उलटा भोजन करवाया।
उपवास का सूत्र भी आगे आता है।

तीसरा सूत्र, उसकी कथा—

म्राट प्रसेनजित भोजन— भट्ट था। उसकी सारी आत्मा जैसे जिह्वा में थी। खाना-खाना और खाना। और तब स्वभावत: सोना-सोना और सोना। इतना भोजन कर लेता कि सदा बीमार रहता। इतना भोजन कर लेता कि सदा चिकित्सक उसके पीछे सेवा में लगे रहते। देह भी स्थूल हो गयी। देह की आभा और कांति भी खो गयी। एक मुर्दा लाश की तरह पड़ा रहता। इतना भोजन कर लेता।
बुद्ध गांव में आए तो प्रसेनजित उन्हें सुनने गया।
जाना पड़ा होगा। सारा गाव जा रहा है और गाव का राजा न जाए तो लोग क्या कहेंगे? लोग समझेंगे, यह अधार्मिक है। उन दिनों राजाओं को दिखाना पड़ता था कि वे धार्मिक हैं। नहीं तो उनकी प्रतिष्ठा चूकती थी, नुकसान होता था। अगर लोगों को पता चल जाए कि राजा अधार्मिक है, तो राजा का सम्मान कम हो जाता था। तो गया होगा। जाना पड़ा होगा।
लेकिन जाने के पहले—इतनी देर बुद्ध को पता नहीं घंटाभर सुनना पड़े डेढ़ घंटा सुनना पड़े कितनी देर बुद्ध बोले इतनी देर वहां रहना पड़े— तो उसने डटकर भोजन कर लिया।
इतनी देर भोजन करने को मिलेगा नहीं। खूब डटकर भोजन करके गया।
राजा था तो सामने ही बैठा बुद्ध के वचन सुनने को और जैसे ही बैठा वैसे ही झपकी लेने लगा
फुरसत कहो थी! न बुद्ध को सुनने आया था, न सुनने की स्थिति थी। इतना खाकर आ गया था कि डोलने लगा। और तो मस्ती में डोल रहे थे, वह नींद में डोलने लगा।
बुद्ध ने यह देखा। उन्हें उस पर बड़ी दया आयी। उसकी झपकियां देखीं और बुद्ध ने कहा महाराज क्या ऐसे ही जीवन गंवा देना है? जागना नहीं है ' बहुत गयी थोड़ी बची है अब होश सम्हालो। भोजन जीवन नहीं है इस परम अवसर को ऐसे ही मत गंवा दो प्रसेनजित ने कहा भंते सब दोष भोजन का है मानता हूं। उसके कारण ही मेरा स्वास्थ्य भी सदा खराब रहता है तंद्रा भी बनी रहती है। प्रमाद और आलस्य भी घेरे रहता है। और इसके बाहर होने का कोई मार्ग भी नहीं दिखायी पड़ता। सब दोष भोजन का है भगवान।
बुद्ध ने उससे कहा पागल! दोष भोजन का कैसे हो सकता है ' अपने दोष को भोजन पर टाल रहा है। भोजन जबरदस्ती तो तेरे ऊपर सवार नहीं हो जाता।
इसे खयाल रखना। हम भी यही करते हैं। हम दोष टालते हैं।
मुल्ला नसरुद्दीन पकड़ा गया अदालत में, क्योंकि उसने एक कास्टोबेल की पिटाई कर दी। और जब झूमता, नशे में डोलता अदालत में लाया गया, तो मजिस्ट्रेट ने कहा कि नसरुद्दीन, कितनी बार तुम्हें समझाया है, यह शराब छोड़ो। उसने कहा, हुजूर, सब दोष शराब का है, इसी शराब की वजह से यह गरीब कास्टेबिल पिट गया है। सब दोष शराब का है! आप बिलकुल ठीक कहते हैं।
दोष शराब का कैसे हो सकता है? लेकिन हम दोष टालते हैं। कोई आदमी दोष अपने पर नहीं लेता। और जो अपने पर ले लेता है, उसी के जीवन में क्रांति घट जाती है।
उसने बुद्ध से कहा भगवान भंते सब दोष भोजन का है। इसके कारण ही सब उलझन हो रही है! इससे बाहर आने का कोई उपाय भी नहीं दिखता है
बुद्ध ने कहा दोष भोजन का कैसे हो सकता है ' दोष बोध का है। तुम्हें पता भी है कि स्वास्थ्य खराब हो रहा है तुम्हें पता है आलस्य आ रहा है तुम्हें पता है जीवन व्यर्थ जा रहा है लेकिन यह बोध तुम भोजन करते वक्त सम्हाल नहीं पाते यह बोध भोजन कर लेने के बाद तुम्हारे पास होता है लेकिन जब भोजन करते हो तब चूक जाता है।
तो प्रसेनजित ने पूछा मैं क्या करूं ' बुद्ध ने कहा तुमसे शायद न भी हो सके मैं देखता हूं तुम बहुत? जड़ हो गए हो। तो प्रसेनजित के पास उसका अंगरक्षक खड़ा था अंगरक्षक का नाम था सुदर्शन। तो बुद्ध ने कहा सुदर्शन तू अंगरक्षक कैसा। यह अंग तो सब खराब हुआ जा रहा है! और तू अंगरक्षक है! तू खाक सेवा कर रहा है अपने सम्राट की। तू याद रख! और जब प्रसेनजित भोजन को बैठे तो बिलकुल सामने खड़ा हो जा। खड़ा ही रह सामने। और याद दिलाता रह कि ध्यान रखो स्मरण करो बुद्ध ने क्या कहा था तू चूकना ही मत यह नाराज भी होगा यह तुझे हटाएगा भी मगर तू हटना ही मत। तू अंगरक्षक है तू अपना काम पूरा कर। यह बात सुदर्शन को भी जमी कि अंगरक्षक तो है ही और उसकी आंखों के सामने यह अंग सब खराब हुआ जा रहा है यह देह नष्ट हुई जा रही है। तो वह खड़ा रहने लगा।
वह बड़ा हिम्मत का आदमी रहा होगा। क्योंकि प्रसेनजित बहुत नाराज होता जब उसे बीच में याद दिलायी जाती। जब वह ज्यादा खाने लगता, वह कहता, याद करो, याद करो, भगवान ने क्या कहा है? तो वह कहता, बंद कर बकवास! कहा के भगवान! फिर सोचेंगे। मगर वह मानता ही नहीं, वह याद दिलाए ही जाता, दिलाए ही जाता। धीरे—धीरे इसका परिणाम होना शुरू हुआ।
रसरी आवत जात है, सिल पर परत निसान
पड़ने लगा निशान।
करत करत अभ्यास के जडमति होत सुजान
थोड़ा— थोड़ा बोध जगने लगा। नाराज भी होता था, फिर क्षमा भी माग लेता सुदर्शन से कि नहीं, तेरी क्या भूल! फिर सुदर्शन ने कहा कि देखिए, मुझे भगवान को उत्तर देना पड़ेगा। और वहां से कई दफे खबर आ चुकी है कि सुदर्शन खबर दे! तो प्रसेनजित और भी डरा।
तीन महीने भगवान उस नगर में रुके थे। प्रसेनजित जब दुबारा आया तो वह आदमी ही दूसरा था उसके चेहरे पर आभा लौट आयी थी। तेजस्विता आ गयी थी उसने भगवान का बहुत धन्यवाद किया उसने सुदर्शन का भी बहुत धन्यवाद किया सुदर्शन के साथ अपनी बेटी का विवाह किया। उसे आधा राज्य दे दिया।
जब दुबारा वह भगवान के पास आया था रूपांतरित होकर अत्यंत अनुग्रह से भरा हुआ तब भगवान ने यह गाथा कही थी—

आरोग्य परमा लामा संतुट्टी परमं धनं।
विक्सास परमा जाति निबानं परमं तखं ।।

आरोग्य सबसे बडा लाभ है। संतोष सबसे बड़ा धन है। विश्वास सबसे बड़ा बंधु है और निर्वाण सबसे बड़ा सुख है। '
आरोग्य शब्द बड़ा अदभुत है। अंग्रेजी के हेल्थ शब्द में वह बात नहीं। आरोग्य का अर्थ है, सारे रोगों से मुक्ति। इसमें मन के रोग सम्मिलित हैं। देह के रोग सम्मिलित हैं। इसमें आत्मा के रोग सम्मिलित हैं। आरोग्य शब्द विराट है। तभी तुम कहे जा सकते हो आरोग्य को उपलब्ध हुए जब तुम्हारी सारी उपाधियां खो जाएं। जब तुम्हारे ऊपर कोई सीमा न रह जाए।
आरोग्य सबसे बडा लाभ है। '
तो बुद्ध तो बार—बार कहते हैं कि मैं तो चिकित्सक हूं, वैद्य हूं र तुम्हें आरोग्य देने आया हूं सिद्धात देने नहीं, दर्शनशास्त्र देने नहीं।

आरोग्य परमा लामा ......।

परम लाभ कहा आरोग्य को। तो निश्चित ही यह शारीरिक स्वास्थ्य ही नहीं होगा। मानसिक, आध्यात्मिक सभी तलों पर जब व्यक्ति रोगों से मुक्त हो जाता है। और बड़े से बड़ा रोग है, मूर्च्छा। बड़े से बड़ा रोग है, बेहोशी।

आरोग्य परमा लामा संतुट्ठी परमं धनं।

और जो आरोग्य को उपलब्ध हो जाता है वह संतोष को भी उपलब्ध हो जाता है। क्योंकि जहा आरोग्य है, वहा संतोष है। जहा कोई रोग न रहा, वहा कैसा असंतोष। वहां तो छोटे से पर्याप्त मिलने लगता है। थोड़ा सा भोजन और खूब तृप्ति हो जाती है। थोड़ा सा मिल जाए, बहुत मिल जाता है। क्षुद्र में विराट मिलने लगता है।
'संतोष सबसे बड़ा धन। विश्वास सबसे बड़ा बंधु। और निर्वाण सबसे बड़ा सुख।
निर्वाण का अर्थ होता है, शून्य भाव। पहले रोग मिटते हैं। तो फिर धीरे—धीरे रोगों के सहारे जो अहंकार जीता है वह भी विसर्जित हो जाता है। सभी रोगों का केंद्र है अहंकार। जब सब रोग हट जाते हैं तो धीरे—धीरे अहंकार भी गिर जाता है। जब खंभे न रहे सम्हालने को तो अहंकार का भवन गिर जाता है। उस घड़ी जो अवस्था बनती, उसको बुद्ध निर्वाण कहते हैं। निर्वाण सबसे बड़ा सुख।
आखिरी सूत्र—

पविवेकं रसं पीत्वा रसं उपसमस्स च।
निद्दरो होति निप्पापो धम्मपीतिरसं पिवं। 
     तस्‍माहि:
धीरन्च पज्‍च्‍ज्‍च बहुस्सुतं व धोरय्हसीलं वतवतमरियं।
न तादिसं सपुरिसं सुमेधं भजेथ नक्सतपथं व चंदिमा ।।

क दिन वैशाली में विहार करते हुए भगवान ने भिक्षुओं से कहा—भिक्षुओं सावधान। मैं आज से चार माह बाद परिनिवृत्त हो जाऊंगा। मेरी घड़ी करीब आ रही है मेरे विदा का क्षण निकट आ रहा है। इसलिए जो करने योग्य हो करो। देर मत करो।

ऐसी बात सुन भिक्षुओं में बड़ा भय उत्पन्न हो गया स्वाभाविक। भिक्षु— संघ महाविषाद में डूब गया। स्वाभाविक। जैसे अचानक अमावस हो गयी। भिक्षु रोने लगे छाती पीटने लगे। झुंड के झुंड भिक्षुओं के इकट्टे होने लगे और सोचने लगे और रोने लगे और कहने लगे अब क्या होगा? अब क्या करेंगे।
लेकिन एक भिक्षु थे, तिष्यस्थविर उनका नाम था वे न तो रोए और न किसी से कुछ बात ही करते देखे गए। उन्होंने सोचा शास्ता चार माह के बाद परिनिवृत्त होंगे और मैं अभी तक अवीतराग हू। तो शास्ता के रहते ही मुझे अर्हतत्व पा लेना कहिए। और ऐसा सोच वे मौन हो गए। ध्यान में ही समस्त शक्ति उंडेलने लगे। उन्हें अचानक चुप हो गया देख भिक्षु उनसे पूछते आवुस, आपको क्या हो गया है? क्या भगवान के जाने की बात से इतना सदमा पहुंचा? क्या आपकी वाणी खो गयी ' आप रोते क्यों नहीं? आप बोलते क्यों नहीं? भिक्षु डरने भी लगे कि कहीं पागल तो नहीं हो गए
आघात ऐसा था कि पागल हो सकते थे। जिनके चरणों में सारा जीवन समर्पित किया हो, उनके जाने की घड़ी आ गयी हो! जिनके सहारे अब तक जीवन की सारी आशाएं बांधी हों, उनके विदा का क्षण आ गया हो! तो स्वाभाविक था।
लेकिन तिष्य जो चुप हुए सो चुप ही हुए। वे इसका भी जवाब न देते। वे कुछ लत्तर ही न देते एकदम सन्नाटा हो गया।
अंतत: यह बात भगवान के पास पहुंची कि क्या हुआ है तिष्यस्थविर को? अचानक उन्होंने अपने को बिलकुल बंद कर लिया। जैसे कछुआ समेट लेता है। मापने को और अपने भीतर हो जाता है। ऐसा अपने को अपने भीतर समेट लिया है। यह कहीं कोई पागलपन का लक्षण तो नहीं। आघात कहीं इतना तो गहन नही पड़ा कि उनकी स्मृति खो गयी है वाणी खो गयी है?
भगवान ने तिष्यस्थविर को बुलाकर पूछा तो तिष्य ने सब बात बतायी अपना हदय कहा और कहा कि आपसे आशीर्वाद मांगता हूं कि मेरा संकल्प पूरा हो। ,,आपके जाने के पहले तिष्यस्थविर विदा हो जाना चाहिए।.. मौत की नहीं मांग कर रहे हैं वे यह तिष्यस्थविर नाम का जो अहंकार है यह विदा हो जाना चाहिए..... मैं अपना प्राणपण लगा रहा हूं आपका आशीर्वाद चाहिए। अब न बोलूंगा न हिलूंगा न डोलुंगा क्योंकि सारी शक्ति इसी पर लगा देनी है चार माह! ज्यादा समय भी पास में नहीं। और आपने कहा भिक्षुको सावधान हो जाओ और जो करने योग्य है करो! तो यही मुझे करने योग्य लगा कि ये चार महीने जीवन की क्रांति के लिए लगा दूं—पूरा लगा हूं। इस पार या उस पार। लेकिन यह कहने को न रह जाए कि मैने कुछ उठा रखा था। कि मैने कुछ छोड़ दिया था किया नहीं था।
बुद्ध ने तिष्य भिक्षु को आशीर्वाद दिया और भिक्षुओं से कहा भिक्षुओं जो मुझ पर स्नेह रखता है उसे तिष्य के समान ही होना चाहिए। यही तो है जो मैने कहा था कि करो, जो करने योग्य है करो सावधान मैं चार माह के बाद परिनिवृत्त हो जाऊंगा। रोने— धोने से क्या होगा। रो— धोकर तो जिंदगियां बिता दीं तुमने। चर्चा करने से क्या होगा! झुंड के झुंड बनाकर विचार करने से और विषाद करने से क्या होगा। तुम मुझे तो न रोक पाओगे मेरा जाना निश्चित है। रो—रो कर तुम यह क्षण भी गंवा दोगे आंसू नहीं काम आएंगे। नौका बना लो। तिष्यस्थविर ने ठीक ही किया है। इसने मौन की नौका बना ली। इसी मौन की नौका से कोई तिरता है। इसीलिए तो हम साधु को मुनि कहते हैं। मुनि का अर्थ होता है जिसने मौन की नौका बना ली तिष्यस्थविर मुनि हो गया है।
गंध— माला आदि से पूजा करने वाले मेरी पूजा नहीं करते। वह वास्तविक पूजा नहीं है। जो ध्यान के फूल मेरे चरणों में आकर चढ़ाता है वही मेरी पूजा करता है। ऐसा बुद्ध ने कहा। धर्म के अनुसार आचरण करने वाला ही मेरी पूजा करता है ऐसा बुद्ध ने कहा ध्यान ही मेरे प्रति प्रेम की कसौटी है। रोओ मत ध्याओ। रोओ नहीं ध्याओ
और तब उन्होंने ये गाथाएं कहीं—

पविवेकं रसं पीत्वा रसं उपसमस्स च।
निद्दरो होति निप्पापो धम्मपीतिरसं पिवं।।

'एकांत का रस पीकर तथा शांति का रस पीकर मनुष्य निडर होता है और धर्म का प्रेमरस पीकर निष्पाप होता है।'
तो, एकांत का रस पीकर—स्वात का अर्थ होता है, अपने भीतर डुबकी लो। बाहर बहुत संबंध जोड़े, दूसरे से बहुत नाते बनाए, दुख के अतिरिक्त क्या कब पाया? अब अपने से नाता जोड़ो। एक नया सेतु बनाओ—अपने और अपने बीच। अब अपने में जाओ। एकांत का अर्थ नहीं होता है, हिमालय चले जाओ। एकांत का अर्थ होता है, जो संबंधों में बहुत ज्यादा जीवन ऊर्जा लगायी है, उसे संबंधों से मुक्त करो। अपने साथ रमो। आत्मलीन बनी। 

'एकात का रस ......।'

पविवेक रसं पीत्वा।

और बुद्ध उसको रस कह रहे हैं। प्यारा शब्द उपयोग कर रहे हैं। क्योंकि जिसने एकात का रस पी लिया, उसने अमृत पी लिया। जिसे तुम संबंध में खोज रहे हो और कभी संबंध में पा न सकोगे, वह एकांत में पाया जाता है। वह अपने ही स्वभाव में छिपा पड़ा है। वह झरना तुम्हारा है। वह तुम्हारी ही गहराइयों में दबा पड़ा है।
'एकांत का रस पीकर तथा शांति   का रस पीकर मनुष्य निडर होता है।
अब तुम भयभीत हो रहे हो, बुद्ध ने कहा, रो रहे हो, चीख रहे हो। मेरे जाने के कारण तुम भयभीत हो रहे हो। क्योंकि तुमने मुझसे तो संबंध बनाया, अपने से संबंध नहीं बनाया। मैं जा रहा हूं तो तुम रो रहे हो। पत्नी जाएगी तो पति रोका। पति जाएगा तो पत्नी रोकी, बेटा जाएगा तो बाप रोका, बाप जाएगा तो बेटा रोका। जिन्होंने दूसरों से संबंध बनाने में ही सारी ऊर्जा नियोजित की है, वे रोते ही रोते जीवन गंवा के। अपने से संबंध जोड़ो।
'शांति का रस पीकर.।

रसं उपसमस्स च।

उस एकांत का, मौन का, शब्द श—यता में डूबकर अपना रस पीओ, अपने को चखो। तो फिर निडर हो जाओगे। फिर कोई भय नहीं है, बुद्ध रहें कि जाएं! कौन क्हा आता—जाता है! सब जहां हैं, वहीं हैं। न कोई आता, न कोई जाता, सिर्फ हमारे गबंध टूटते और बनते। तुम अगर असंग हो जाओ, तो फिर कोई जीवन में पीड़ा नहीं, दुख नहीं।
'धर्म का प्रेमरस पीकर निष्पाप हो जाओ। '
धर्म कहां है? धर्म का अर्थ होता है, स्वभाव। धर्म का अर्थ होता है, तुम्हारी। नयति। तुम जो वस्तुत: हो, वही धर्म।
'इसलिए: जैसे चंद्रमा नक्षत्र—पथ का अनुसरण करता है, वैसे ही धीर, प्राज्ञ, बहुश्रुत, शीलवान, व्रतसंपन्न, आर्य तथा बुद्धिमान पुरुष का अनुगमन करना चाहिए।
'तो बुद्ध ने कहा, इस तिष्य को देखो, यह धीर है, प्रात है, बहुश्रुत है, शीलवान है, व्रतसंपन्न है, आर्य है, बुद्धिमान है, इसका अनुगमन करो। रोओ—धोओ मत।

तस्माहि:
धीरन्च पज्‍चज्‍च बहुत्सुतं व धोरय्हसीलं वतवतमरियं।

इसके पीछे जाओ। इससे सीखो। जो इसे हुआ है, वही तुम्हें भी होने दो। यह जो तिष्यस्थविर कर रहा है। क्या कर रहा है?
कोलाहल से काल की निद्रा नहीं टूटती,
न धक्के मारने से समय का द्वार खुलता है
रचनात्मक समाधि के व्यूह में जाओ
नीरवता और शांति को सिद्ध करो
रात, अंधकार और अकेलापन
शक्ति के असली उत्स हैं
रोशनी से बचो
और लक्ष्य को अंधेरे में विद्ध करो
बाहर बहुत रोशनी है, इसलिए हम आंखें खोले बैठे रहते हैं। बाहर बहुत रूप है, इसलिए हम आंखें खोले बैठे रहते हैं। आंख बंद करते हैं तो भीतर अंधेरा है।
रात, अंधकार और अकेलापन
शक्ति के असली उत्स हैं
रोशनी से बचो
और लक्ष्य को अंधेरे में विद्ध करो
जब कोई मौन हो जाता है, ध्यान में डूबता, तो अपने ही गहन अंधेरे में डूबता है। तुमने देखा, वृक्ष की असली ऊर्जा आती जड़ों से, जो अंधेरे में दबी हैं। शक्ति के असली उत्स, स्रोत अंधेरे में हैं। मां के गर्भ में अंधेरे में पड़ा हुआ बच्चा बढ़ता है, जीवन को पाता है। बीज भूमि में दब जाता है, अंधेरे में फूटता है। तुम थक जाते दिन में, रात के अंधेरे में सो जाते, सुबह फिर पुनरुज्जीवित होते हो—नया जीवन, नयी ऊर्जा लेकर आते हो।
जिसे अपने भीतर जाने का रहस्य समझ में आ गया, उसके जीवन में परम ऊर्जा प्रगट होने लगती है। वह एक ऐसे उत्स पर पहुंच जाता है, एक ऐसे स्रोत पर कि जितना भी खर्च करो, करो, कुछ खर्च नहीं होता। वह अविनाशी स्रोत को उपलब्ध हो जाता है।
बुद्ध ने अनेक—अनेक रूपों में लोगों को जागने की ही शिक्षा दी है। कोई ज्यादा भोजन कर रहा है, तो उसे जगाया। कोई भूखा है—तो कैसे जाग पाएगा—तो भोजन दिया। कोई रागाग्नि में डूबा है, तो उसे झकझोरा, जगाया। कोई शब्दों में, रोने—धोने में, संबंधों में डूबा है, तो उसे हिलाया।
तोड़कर पुराने आभूषण
नहीं बनाया कोई नया आभरण
नकारकर स्थापित मूल्य
नहीं रचा कोई नया प्रतिमान
केवल दी मूर्च्छा—विमुक्त दृष्टि
सत्य को मुक्ति।
केवल दी मूर्च्छा—विमुक्त दृष्टि
बुद्ध का दान इतना ही है—मूर्च्छा—विमुक्त दृष्टि। तुम सोए—सोए न जीओ। जागकर जीओ। होश से जीओ। बुद्ध ने कोई प्रार्थना नहीं सिखायी किसी आकाश में बैठे परमात्मा के प्रति। न बुद्ध ने कहा भिखारी बनकर मांगो। न बुद्ध ने कहा याचक बनो, हाथ फैलाओ किसी परमात्मा के सामने। बुद्ध ने तो कहा, अपने भीतर जाओ और परमात्मा मिल जाएगा, तुम परमात्मा हो।
नहीं किसी याचक की प्रार्थना
कि देवता पूरी करें कामना
नहीं किसी संत्रस्त की गुहार
कि इंद्र करें रिपु का हनन
केवल नमन उनको
जो अरिहंत, जो संत,
भले ही उनका कोई धर्म कोई पंथ
मात्र समर्पण की वर्णमाला
एकमात्र मंत्र
एकमात्र मंत्र सिखाया—समर्पण की वर्णमाला। कैसे तुम अपने अंतस्तल के केंद्र पर अपनी परिधि को समर्पित कर दो। कैसे तुम व्यर्थ को सार्थक पर समर्पित कर दो। कैसे तुम बाहर को भीतर पर समर्पित कर दो।
मात्र समर्पण की वर्णमाला
एकमात्र मंत्र
और कोई मंत्र नहीं सिखाया बुद्ध ने।
नहीं किसी याचक की प्रार्थना
कि देवता पूरी करें कामना
नहीं किसी संत्रस्त की गुहार
कि इंद्र करें रिपु का हनन
केवल नमन उनको
जो अरिहंत, जो संत
भले ही उनका कोई धर्म कोई पंथ
मात्र समर्पण की वर्णमाला
एकमात्र मंत्र
अरिहंत शब्द बौद्धों का बहुमूल्य शब्द है। उसका अर्थ होता है, जिसने अपने शत्रुओं पर विजय पा ली। और शत्रुओं का जो प्रधान है, उसको बुद्ध ने प्रमाद कहा है, मूर्च्छा। जो जाग गया, वह अरिहंत। जो जाग गया, वही संत। फिर उसका क्या धर्म और क्या पंथ, इसका कुछ हिसाब रखने की जरूरत नहीं। जहा तुम्हें कोई अरिहंत मिल जाए, कोई संत मिल जाए, उसके पीछे चलो।
'जैसे चंद्रमा नक्षत्र—पथ का अनुसरण करता है, वैसे ही धीर, प्रात, बहुश्रुत, शीलवान, व्रतसंपन्न, आर्य तथा बुद्धिमान पुरुष का अनुगमन करना चाहिए।
जहां संत मिल जाएं, उनकी छाया में उठो—बैठो। जहा संत मिल जाएं, उनकी तरंगों में डूबो। उनका रस पीओ। उनकी धारा में बहो, स्रोतापन्न बनो।
ये छोटी—छोटी कथाएं और इन कथाओं के मध्य में आए छोटे—छोटे सूत्र तुम्हारे समग्र जीवन को रूपातरित कर सकते हैं। लेकिन मात्र सुनने से नहीं, गुनो, करो। जैसे बुद्ध ने कहा न, कि भिक्षुओ, मैं आज से चार माह बाद परिनिवृत्त हो जाऊंगा, इसलिए जो करने योग्य है, करो। फिर बुद्ध चार माह रहें तुम्हारे साथ, कि चार साल रहें, कि चालीस साल, क्या फर्क पड़ता है। जो करने योह है, करो। सावधान!

आज इतना ही।