देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर
सामाजिक)—ओशो
तेरहवां प्रवचन
समाजवाद: पूंजीवाद का विकास
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
मेरे खयाल में तो अगर कोई बात सत्य है, उपयोगी है, तो सत्य अपना माध्यम खोज ही लेता है। नहीं अखबार थे तब की दुनिया में,
सत्य मरा नहीं। बुद्ध के लिए कोई अखबार नहीं था, महावीर के लिए कोई अखबार नहीं था, क्राइस्ट के लिए
कोई अखबार नहीं था। तो भी क्राइस्ट मर नहीं गए। अगर बात में कुछ सच्चाई है,
तो सत्य अपना माध्यम खोज लेगा। अखबार भी उसका माध्यम बन सकता है।
लेकिन अखबार की वजह से कोई सत्य बचेगा, ऐसा नहीं है। या
अखबार की वजह से कोई असत्य बहुत दिन तक रह सकता है, ऐसा भी
नहीं है। माध्यम की वजह से कोई चीज नहीं बचती है, कोई चीज
बचने योग्य हो, तो माध्यम मिल जाता है। अखबार भी मिल ही
जाएगा। नहीं मिले, तो भी इसकी चिंता नहीं करनी चाहिए। हम जो
कह रहे हैं, वह सत्य है, इसकी चिंता
करनी चाहिए। अगर वह सत्य है तो माध्यम मिलेगा।






