गुलाब तो गुलाब है, गुलाब है-अध्याय-06
A Rose is A Rose is A Rose-(हिंदी अनुवाद)
दिनांक- 03 जुलाई 1976 अपराह्न चुआंग त्ज़ु सभागार में
[एक संन्यासी पूछता है कि ओशो जो शिक्षा दे रहे हैं उसे लोग किस तरह गलत समझते हैं, खासकर सेक्स के संदर्भ में।]
हमेशा से ऐसा ही रहा है। लोग इतनी बेहोशी की हालत में रहते हैं कि उनके लिए कुछ भी समझ पाना लगभग नामुमकिन होता है। उनमें गलतफहमी स्वाभाविक है। मन एक विकृत तंत्र के रूप में कार्य करता है। वे नहीं देख सकते कि क्या है। वे उस पर कुछ प्रक्षेपित करते हैं, और उन्हें कभी पता नहीं चलता कि वे अपना ही प्रक्षेपण देखते रहते हैं।
यदि कोई यौन रूप से जुनूनी है, मानसिक रूप विकृत है, तो वह जो कुछ भी कहता है, जो कुछ भी सुनता है, जो कुछ भी देखता है, वह किसी न किसी तरह उसके जुनून से प्रभावित होगा। और मानवता यौन जुनून-पागलपन की तहत जी रही है। धर्मों ने इतना दमन किया है कि हर इंसान पीड़ित है। इसलिए वह देख ही नहीं पाता कि वह क्या कर रहा है। वह इसे और-ओर विकृत करता जाता है और इसे अपना ही रंग देता है। वह सुन भी नहीं सकता क्योंकि जिस क्षण शब्द उसमें प्रवेश करते हैं, उनका वही अर्थ नहीं रह जाता।
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