देखने के
संबंध में
छट्टी ओशो
‘’किसी
गहरे कुएं के
किनारे खड़े
होकर उसकी गहराइयों
में निरंतर
देखते रहो—जब
तक विस्मय-विमुग्ध
न हो जाओ।‘’
ये
विधियां
थोड़े से फर्क
के साथ एक
जैसी है।
‘’किसी गहरे
कुएं के
किनारे खड़े
होकर उसकी गहराईयों
में निरंतर
देखते रहो—जब
तक विस्मय-विमुग्ध
न हो जाओ।‘’
किसी गहरे
कुएं में
देखो; कुआं
तुममें
प्रतिबिंबित
हो जाएगा।
सोचना बिलकुल
भूल जाओ;
सोचना बिलकुल
बंद कर दो;
सिर्फ गहराई
में देखते
रहो। अब वे
कहते है कि
कुएं की भांति
मन की भी
गहराई है। अब
पश्चिम में
वे गहराई का
मनोविज्ञान
विकसित कर रहे
है। वे कहते
है कि मन कोई
सतह पर ही
नहीं है। वह
उसका आरंभ भर
है। उसकी
गहराइयां है,
अनेक
गहराइयां है,
छिपी गहराइयां
है।


















