जीवन—ध्यान—मंदिर
का सोपान—(प्रवचन—पांचवां)
दिनांक
4 अप्रैल, 1978;
श्री
रजनीश आश्रम,
पूना।
सूत्र:
हीरा
जन्म न
बारंबार, समुझि
मन चेत हो।।
जैसे
कटि पतंग पषान, भए
पसु पच्छी।
जल
तरंग जल माहि
रहे, कच्छा
औ मच्छी।।
अंग
उघारे रहे सदा, कबहुं
न पावै सुक्ख।
सत्य
नाम जाने बिना, जनम
जनम बड़ दुक्ख।।
सीतल
पासा ढारि, दाव
खेलो सम्हारी।
जीतौ
पक्की सार, आव
जनि जैहौ
हारी।।
रामै
राम पुकारिके, लीनो
नरक निवास।
मुड
गडाए रहे जिव, गर्भ
माहि दस मास।।
नाहिं
जाने केहि
पुण्य, प्रकट
भे मानुष—देही।
मन
बच कर्म सुभाव, नाम
सों कर ले
नेही।।
लख
चौरासी
भर्मिके, पायो
मानुष—देह।
सो
मिथ्या कस
खोवते, झूठी
प्रीति—सनेह।।
बालक
बुद्धि अजान, कछु
मन में नहिं
जाने।
खेलै
सहज सुभाव, जहीं
आपन मन माने।।
अधर
कलोले होय
रह्यो, ना
काहू का मान।
भरी
बुरी न चित
धरै, बारह
बरस समान।।
जीवन
रूप अनूप, मसी
ऊपर मुख छाई।
अंग
सुगंध लगाए, सीस
पगिया लटकाई।।
अंधे
भयो ज्ये नहीं, फटि
गई हैं चार।
जोवन
जोर झकोर, नदी
उर अंतर बाढ़ी।
संतो
हो हुसियार, कियो
ना बाहू गाढ़ी।।
दे
गजगीरी प्रेम
की, मदो दसो
दुआर।
वा
साईं के मिलन
में, तुम
जनि लावो बार।।
वृद्ध
भए पछिताय, जबै
तीनों पन
हारे।
भई
पुरानी
प्रीति, बोल
अब लागत
प्यारे।।
लचपच
दुनिया है रही, केस
भए सब सेत।
बोलन
बोल न आवई, लूटि
लिए जम खेत।।