कुल पेज दृश्य

शनिवार, 25 जुलाई 2015

तंत्र--सूत्र (भाग--2)-प्रवचन--19

भक्‍ति मुक्‍त करती है—(प्रवचन—उन्‍नीसवां)

सूत्र:

1—कलपना करो कि तुम धीरे—धीरे शक्‍ति या ज्ञान से
वंचित किए जा रहे हो। वंचित किए जाने के क्षण
अतिक्रमण करो।
2—भक्‍ति मुक्‍त करती है।

तंत्र के लिए मनुष्य स्वयं ही रोग है। ऐसा नहीं है कि तुम्हारे मन में उपद्रव है, वस्तुत: तुम्हारा मन ही उपद्रव है। ऐसा नहीं है कि तुम तनावग्रस्त हो, बल्कि तुम स्वयं ही तनाव हो।

गुरुवार, 23 जुलाई 2015

ज्‍यों कि त्‍यों रख दीन्‍हीं चदरियां--(पंच महाव्रत)--प्रवचन--10

संन्यास—(प्रवचन—दसवां)
दिनांक 14 नवंबर 1970,

क्रास मैदान, बंबई
प्रश्नोत्तर :

आचार्य श्री, पंच महाव्रत: अहिंसा, अपरिग्रह, अचौर्य, अकाम और अप्रमाद की साधना फलीभूत हो सके तथा व्यक्ति और समाज का सर्वांगीण विकास हो सके, इसमें आपके द्वारा प्रस्तावित नयी संन्यास-दृष्टि का क्या अनुदान हो सकता है, कृपया इसे सविस्तार स्पष्ट करें।

अहिंसा, अपरिग्रह, अचौर्य, अकाम और अप्रमाद संन्यास की कला के आधारभूत सूत्र हैं। और संन्यास एक कला है। समस्त जीवन की एक कला है। और केवल वे ही लोग संन्यास को उपलब्ध हो पाते हैं जो जीवन की कला में पारंगत हैं। संन्यास जीवन के पार जाने वाली कला है। जो जीवन को उसकी पूर्णता में अनुभव कर पाते हैं, वे अनायास ही संन्यास में प्रवेश कर जाते हैं। करना ही होगा। वह जीवन का ही अगला कदम है। परमात्मा संसार की सीढ़ी पर ही चढ़कर पहुंचा गया मंदिर है।

का सोवै दिन रैन--(प्रवचन--07)

प्रेम नाव है—(प्रवचन—सातवां)

दिनांक 6 अप्रैल, 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

सूत्र:
      सतगुरु सरन में आइ, तो तामस त्यागिये।
ऊंच नीच कहि जाय, तो उठि नहिं लागिये।।
उठि बोलै रारै रार, सो जानो घींच है।
जेहि घट उपजै क्रोध, अधम अरु नीच है।।
माला वाके हाथ, कतरनी कांख में।
सूझै नाहिं आगि, दबी है राख में।।
अमृत वाके पास, रुचै नहिं रांड को।
स्वान को यही स्वभाव, गहै निज हाड़ को।।
का भे बात बनाए, परचै नहिं पीव सों।
अंतर की बदफैल, होइ का जीव सों।।
कहै कबीर पुकारि सुनो धरम आगरा।
बहुत हंस लै साथ, उतरो भव सागरा।।
सूतल रहलौं मैं सखियां, तो विष कर आगर हो।
सतगुरु दिहलै जगाइ, पायौं सुख सागर हो।।
जब रहली जननी के ओदर, परन सम्हारल हो।

बुधवार, 22 जुलाई 2015

ज्‍यों कि त्‍यों रख दीन्‍हीं चदरियां--(पंच महाव्रत) -प्रवचन--09

अचौर्य—(प्रवचन—नौवां)

दिनांक 13 नवंबर 1970,
क्रास मैदान, बंबई

प्रश्नोत्तर :

आचार्य श्री, अचौर्य पर आपने कहा है कि शरीर, भाव या मन के तल पर किसी दूसरे की नकल या किसी दूसरे का अनुगमन चोरी है। लेकिन जीवन अंतर्संबंधों का एक जाल है; यहां सब जुड़े हुए हैं। तब व्यक्ति अपनी शुद्धतम मौलिकता तथा बाहर से आने वाली सूक्ष्म तरंगों के प्रभाव अथवा आरोपण को किस प्रकार पृथक करे? और वह उससे कैसे बचे?

जीवन अंतर-संबंधों का जाल है, लेकिन जीवन सिर्फ अंतर-संबंध ही नहीं है। अंतर संबंधित होने के लिए भी व्यक्ति चाहिए, अंतर-संबंध भी दो व्यक्तियों के बीच संबंध है; लेकिन दो व्यक्ति भी चाहिए, जिनके बीच संबंध हो सके। तो जीवन, जो हमें बाहर दिखायी पड़ता है वह तो अंतर-संबंध है, लेकिन एक और भी जीवन है भीतर, जो अंतर-संबंधित होता है। वह व्यक्ति अगर न हो, तो अंतर-संबंध सब झूठ हो जाते हैं। जुड़ेगा कौन?

तंत्र--सूत्र-(भाग--2) प्रवचन--18

प्रामाणिक होना अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण है—(प्रवचन—अठ्ठाहरवां)

प्रश्‍न—सार:

1—क्‍या अभिव्‍यक्‍ति की उन्‍मुक्‍तता प्रामाणिक
होने की और एक कदम है?
            2—काम—क्रोध आदि पर ध्‍यान देने से बेचैनी सी
                  क्‍यों होती है?
            3—भाववेग में मूर्च्‍छा पकड़ती है, तो रूकें कैसे?
            4—क्‍या दीक्षा और गुरु—कृपा विधियों से अधिक
                  महत्‍वपूर्ण नहीं है?

पहला प्रश्न :

पिछली रात आपने कहा कि आधुनिक आदमी क्रोध, हिंसा, कामवासना वगैरह को अभिव्‍यक्‍त करने में गैर—प्रामाणिक हो गया है। आप यह भी कहते है कि भारत के विद्यार्थी और उसकी युवा पीढ़ी अपने आवेगों की अभिव्‍यक्‍ति में पश्‍चिम की युवा पीढ़ी से बहुत कम उग्र है। क्‍या इसका अर्थ यह है कि पश्‍चिम के युवक अपनी अभिव्‍यक्‍ति में अधिक प्रामाणिक हो रहे हो? कामवासना और क्रोध में अभिव्‍यक्‍ति की मुक्‍तता क्‍या आवेगात्‍मक अभिव्‍यक्‍ति में प्रामाणिक होने की और गति की सूचक है?

सोमवार, 20 जुलाई 2015

ज्‍यों की त्‍यों धरि दीन्‍हीं चदरिया–(पंच महाव्रत) प्रवचन–08

अपरिग्रह—(प्रवचन—आठवां)
दिनांक 12 नवंबर 1970,

क्रास मैदान, बंबई
प्रश्नोत्तर :

आचार्य श्री, आप बहुत बार कहते हैं कि भौतिक संपन्नता आध्यात्मिक विकास का आधार है; लेकिन अपरिग्रह पर हुए पिछले प्रवचन में आपने कहा कि कम चीजें हों तो व्यक्ति कम गुलाम होता है, और चीजें अधिक हों तो व्यक्ति अधिक गुलाम हो जाता है। कृपया संपन्नता व अपरिग्रह के इस मौलिक विरोधाभास को स्पष्ट करें, और साथ ही समझायें कि अधिक चीजें व्यक्ति को अधिक गुलाम कैसे बनाती हैं? और पजेसर कैसे पजेस्ड हो जाता है?

संपन्नता आध्यात्मिक जीवन का आधार है, लेकिन आधार से ही कोई भवन निर्मित नहीं हो जाता। आधार भी हो, और भवन न उठाया जाये, यह हो सकता है। भवन तो बिना आधार के कभी नहीं होता, लेकिन आधार बिना भवन के हो सकते हैं। कोई नींव को भरकर ही छोड़ दे तो भवन तो नहीं उठेगा, पर आधार जरूर होंगे। लेकिन भवन हो तो बिना आधार के नहीं होता है।

तंत्र--सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--17

अचानक रूकने की कुछ विधियां—(प्रवचन—सत्रहवां)

सूत्र:

25—जैसे ही कुछ करने की वृति हो, रूक जाओ।
26—जब कोई कामना उठे, उस पर विमर्श करो।
फिर, अचानक, उसे छोड़ दो।
27—पूरी तरह थकने तक घूमते रहो,
और तब जमींन पर गिरकर,
इस गिरने में पूर्ण होओ।

जीवन के दो तल हैं, दो संतुलन हैं : एक होने का है, दूसरा करने का।
तुम्हारा होना तुम्हारा स्वभाव है। वह तुम हो, सदा हो, उसे पाने के लिए तुम्हें कुछ करना नहीं है। वह तुम हो ही, वही तुम हो। यह बात भी नहीं है कि वह कुछ है जो तुम्हारे पास है, तुम्हारे अधिकार में है। तुममें और उसमें इतनी दूरी भी नहीं है। तुम ही अपना होना हो, अस्तित्व हो।

रविवार, 19 जुलाई 2015

का सोवै दिन रैन--(प्रवचन--06)

सत्‍संग की कला: संन्‍यास—(प्रवचन—छठवां)

दिनांक 5 अप्रैल, 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍नसार:


1—क्या यह सच नहीं है कि ज्ञानोपलब्ध लोगों की अनुपस्थिति में—— और वे दुर्लभ लोग सदा नहीं होते——पंडित और पुरोहित ही धर्म की मशाल जलाए रखते हैं?
2—गुरु की निंदा सुनने का हमेशा निषेध किया गया है। ऐसा भी कहा गया है कि कोई गुरु की निंदा करे तो कान भी धो डालना चाहिए। भगवान, आपका प्रेमी तो कभी ही मिलता है; पर आपके निंदक तो हर जगह मिल जाते हैं। ऐसे मौकों पर हमें क्या करना चाहिए?
3—आपके सत्संग में रहकर बड़े ही आनंद का अनुभव हो रहा है और जीवन एक उत्सव नजर आ रहा है। लेकिन क्या इस क्षणभंगुर जीवन का आनंद भी क्षणभंगुर नहीं है?
4—तन्मयता से किया गया प्रत्येक कार्य साधना है। तो क्या जरूरी है कि परमात्मा की साधना के लिए संन्यास लिया जाए?
5—इस बार सांध्य— दर्शन में लगातार दो दिन प्रभु—पास का सुयोग मिला। पहले दिन कुछ देर आपको देखते रहने के बाद घबड़ाहट होने लगी, धड़कन तेज हो गयी, सिर में चक्कर, नशा जैसा और बेचैनी अनुभव हुई।... यह क्या है?

तंत्र--सूत्र (विज्ञान भैरव तंत्र)--भाग--2

तंत्र—सूत्र—(विज्ञान भैरव तंत्र)
(भाग—2)

(ओशो द्वारा भगवान शिव के विज्ञान भैरव तंत्र पर दिए गए 80 प्रवचनों में से 17 से 32 प्रवचनों का संकलन।)

(भूमिका) तंत्र: ह्रदय की तीर्थयात्रा—

 मनुष्य जैसे-जैसे सुसंस्कृत होता चला गया, तंत्र की जीवन शैली से बिछुडता चला गया। उसने संस्कृति की विशाल प्रतिसृष्टि का सृजन तो किया लेकिन तंत्र की ओर मुख मोड़कर। धीरे- धीरे प्रतिष्ठित समाज से उखड़कर तंत्र, मेघदूत के अभिशप्त यक्ष की भांति अज्ञातवास में समय व्यतीत करने लगा। तंत्र और तांत्रिक, दोनों ही शब्द निंदा व्यंजक हो गये।
सुसंस्कृत मनुष्य के शब्दकोश में तंत्र शब्द कितना ही गर्हित क्यों न हो, वह भेष बदलकर, अन्य उपसर्गों का हाथ थामकर मनुष्य के जीवन में चुपचाप जीता चला आया है। हमें 'तंत्र' स्वीकार नहीं है लेकिन स्व-तंत्र या पर-तंत्र का हम खूब प्रयोग करते हैं। किसी के ध्यान में नहीं आता कि वही बहिष्कृत तंत्र 'स्व' या 'पर' की ओट में हमारे बीच पनप रहा है।

ज्‍यों की त्‍यों धरि दीन्‍हीं चदरिया–(पंच महाव्रत) प्रवचन–07

ब्रह्मचर्य—(प्रवचन—सातवां)


दिनांक 11 नवंबर 1970,
क्रास मैदान, बंबई

प्रश्नोत्तर :

आचार्य श्री, आपने कहा है कि आत्म-अज्ञान ही हिंसा का स्रोत है और कल आपने कहा कि हिंसा-वृत्ति के लिए मनुष्य स्वयं जिम्मेदार है, तो क्या आत्म-अज्ञान के लिए भी मनुष्य स्वयं जिम्मेदार है? क्यों और कैसे, इसे स्पष्ट करें।

अंधेरी रात हो अमावस की, और कोई अपनी गुहा में बैठा हो अंधकार में डूबा हुआ, तो आंखें बंद रखे या आंखें खुली रखे, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। आंखें बंद हों, तो भी अंधकार होगा; और आंखें खुली हों, तो भी अंधकार होगा। लेकिन फिर सुबह हो जाये, सूर्य निकल आये, सूर्य की किरणों का जाल उस गुहा के द्वार पर फैल जाये, पक्षी गीत गाने लगें; और फिर भी वह आदमी अपनी आंखें बंद किए बैठा रहे, तो फर्क पड़ता है।

शनिवार, 18 जुलाई 2015

ज्‍यों की त्‍यों धरि दीन्‍हीं चदरिया–(पंच महाव्रत) प्रवचन–06

अहिंसा (प्रश्नोत्तर)—(प्रवचन—छठवां)
10 नवंबर 1970,
क्रास मैदान, मुम्‍बई

प्रश्‍नसार :
आचार्य श्री, षणमुखानंद हाल में हुए एक प्रवचन में आपने कहा है कि हिंसा-वृत्ति एक बीमारी है और उसे उसके समस्त रूपों में पहचान लेना अहिंसक होने की पहली शर्त है। तो कृपया हिंसा-वृत्ति के जीव-रासायनिक (बायोकेमिकल) तथा साइकिक संरचना पर प्रकाश डालें, ताकि हिंसा को हम अधिक गहराई से पहचान सकें।

मनुष्य के लिए हिंसा एक बीमारी है, लेकिन पशु के लिए नहीं। पशु के लिए हिंसा स्वभाव है। पशु के तल पर अहिंसा की कोई संभावना नहीं है, इसलिए हिंसा का उसे कोई बोध भी नहीं है। हिंसा पशु के लिए स्वाभाविक है--अहिंसा असंभव है। मनुष्य के लिए हिंसा पशु से मिला हुआ संस्कार है। लेकिन उसकी विकसित चेतना के लिए रोकने वाली बीमारी है। चेतना जैसे ही विकसित होती है, वैसे ही उसका अतीत भी उसके लिए जंजीरें बन जाता है। जो विकासमान है, उसके लिए रोज ही उसका "कल' बंधन बन जाता है।

तंत्र--सूत्र--(भाग--1) प्रवचन--16

अचेतन पाप के पार—(प्रवचन—सोहलवां)

प्रश्‍नसार:

1—दमन के बिना अपने स्‍त्रोत पर लौटने का क्‍या उपाय है?
2—पश्‍चिम के मनोविश्‍लेषक मन के निर्ग्रंथन के उपाय में सफल क्‍यों नहीं हो पाते?
3—क्‍या यह सच नहीं है कि कोई विधि तब तक शक्‍तिशाली नहीं होती जब तक व्‍यक्‍ति को दीक्षित न किया जाए?
4—अगर तादात्‍म्य एकमात्र पाप है तो अनेक विधियां ऐसा क्‍यों कहती है कि किसी चीज के साथ एकात्‍म हो जाओ?

शुक्रवार, 17 जुलाई 2015

तंत्र--सूत्र-(भाग--1) प्रवचन--15

शुद्ध चैतन्‍य में प्रवेश की विधियां—(प्रवचन—पंद्रहवां)

सूत्र:

22—अपने अवधान को ऐसी जगह रखो,
जहां तुम अतीत की किसी घटना को देख रहे हो
और अपने शरीर को भी।
रूप के वर्तमान लक्षण खो जाएंगे,
और तुम रूपांतरित हो जाओगे।
      23—अपने सामने किसी विषय को अनुभव करो।
            इस एक को छोड़कर अन्‍य सभी विषयों की
            अनुपस्‍थिति को अनुभव करो।
            फिर विषय—भाव और अनुपस्‍थिति—भाव को भी
            छोड़कर आत्‍मोपलब्‍ध होओ।
      24—जब किसी व्‍यक्‍ति के पक्ष या विपक्ष में कोई भाव
            उठे तो उसे उस व्‍यक्‍ति पर मत आरोपित करो,
            बल्‍कि केंद्रित रहो।

ज्‍यों की त्‍यों धरि दीन्‍हीं चदरिया–(पंच महाव्रत) प्रवचन–05

अप्रमाद—(प्रवचन—पांचवां)
5 सितंबर 1970,
षणमुखानंद हाल, मुम्‍बई

मेरे प्रिय आत्मन्,
मनुष्य एक सात मंजिला मकान है, ए सेवन-स्टोरी हाउस, लेकिन हम एक मंजिल में ही जीते और मर जाते हैं। पहले उन सात मंजिलों के नाम आपको समझा दूं। जिस मंजिल में हम जीते हैं, उस मंजिल का नाम कांशस, चेतन है। उस मंजिल के ठीक नीचे दूसरी मंजिल है, जो तलघरे में है, जमीन के नीचे है, अंडरग्राउंड है। उस मंजिल का नाम है अनकांशस, अचेतन। उस मंजिल के भी और नीचे पाताल की तरफ तीसरी मंजिल है, उसका नाम है कलेक्टिव अनकांशस, समष्टि अचेतन। और उसके नीचे भी एक चौथी मंजिल है, और भी नीचे, सबसे नीचे, उस मंजिल का नाम है, कॉस्मिक अनकांशस, ब्रह्म-अचेतन। जिस मंजिल पर हम रहते हैं उसके ऊपर भी एक मंजिल है, उस मंजिल का नाम है सुपर-कांशस, अति-चेतन। उसके ऊपर एक मंजिल है जिसको कहें कलेक्टिव कांशस, समष्टि चेतन।

का सोवै दिन रैन–(प्रवचन–05)

जीवन—ध्‍यान—मंदिर का सोपान—(प्रवचन—पांचवां)

दिनांक 4 अप्रैल, 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

सूत्र:

            हीरा जन्म न बारंबार, समुझि मन चेत हो।।
जैसे कटि पतंग पषान, भए पसु पच्छी।
जल तरंग जल माहि रहे, कच्छा औ मच्छी।।
अंग उघारे रहे सदा, कबहुं न पावै सुक्ख।
सत्य नाम जाने बिना, जनम जनम बड़ दुक्ख।।
सीतल पासा ढारि, दाव खेलो सम्हारी।
जीतौ पक्की सार, आव जनि जैहौ हारी।।
रामै राम पुकारिके, लीनो नरक निवास।
मुड गडाए रहे जिव, गर्भ माहि दस मास।।
नाहिं जाने केहि पुण्य, प्रकट भे मानुष—देही।
मन बच कर्म सुभाव, नाम सों कर ले नेही।।
लख चौरासी भर्मिके, पायो मानुष—देह।
सो मिथ्या कस खोवते, झूठी प्रीति—सनेह।।
बालक बुद्धि अजान, कछु मन में नहिं जाने।
खेलै सहज सुभाव, जहीं आपन मन माने।।
अधर कलोले होय रह्यो, ना काहू का मान।
भरी बुरी न चित धरै, बारह बरस समान।।
जीवन रूप अनूप, मसी ऊपर मुख छाई।
अंग सुगंध लगाए, सीस पगिया लटकाई।।
अंधे भयो ज्ये नहीं, फटि गई हैं चार।
जोवन जोर झकोर, नदी उर अंतर बाढ़ी।
संतो हो हुसियार, कियो ना बाहू गाढ़ी।।
दे गजगीरी प्रेम की, मदो दसो दुआर।
वा साईं के मिलन में, तुम जनि लावो बार।।
वृद्ध भए पछिताय, जबै तीनों पन हारे।
भई पुरानी प्रीति, बोल अब लागत प्यारे।।
लचपच दुनिया है रही, केस भए सब सेत।
बोलन बोल न आवई, लूटि लिए जम खेत।।

बुधवार, 15 जुलाई 2015

ज्‍यों की त्‍यों धरि दीन्‍हीं चदरिया–(पंच महाव्रत) प्रवचन--04

अकाम—(प्रवचन—चौथा)
4 सितंबर 1970,

षणमुखानंद हाल, मुम्‍बई
मेरे प्रिय आत्मन्,
अहिंसा, अपरिग्रह, अचौर्य, तीन महाव्रतों पर हमने विचार किया है। आज चौथा व्रत है, अकाम। काम मनुष्य की सर्वाधिक महत्वपूर्ण ऊर्जा का नाम है। जिन तीन व्रतों की हमने बात की उन सबके आधार में काम की शक्ति ही काम करती है। यदि काम सफल हो जाये तो परिग्रह बन जाता है। यदि काम स्वयं की हीनता से विफल हो जाये तो चोरी बन जाता है। यदि काम दूसरे के कारण से विफल हो जाये तो हिंसा बन जाता है। काम के मार्ग पर, कामना के मार्ग पर, इच्छा के मार्ग पर, अगर कोई बाधा बनता हो तो काम हिंसक हो उठता है। अगर कोई बाधा न हो, भीतर की ही क्षमता बाधा बनती हो तो काम चोर हो जाता है। और अगर कोई बाधा न हो, भीतर की कोई अक्षमता न हो और काम सफल हो जाये तो परिग्रह बन जाता है। इस काम को गहरे से समझना जरूरी है।

तंत्र--सूत्र--(भाग--1) प्रवचन--14

प्रेम को ध्‍यान बनाओ, ध्‍यान को प्रेम—(प्रवचन—चौहदवां)

      प्रश्नसार:

      1—समाधि को केंद्रित होना क्‍यों कहते है?
      2—ध्‍यान के बिना कैसे अकेला प्रेम पर्याप्‍त है?
      3—मनुष्‍य संवेदनहीन क्‍यों है?

पहला प्रश्न :

यदि बुद्धत्‍व और समाधि का अर्थ समग्र चैतन्‍य, जागतिक चैतन्‍य, सर्वव्‍यापी चैतन्‍य है, तो आश्‍चर्य होता है कि इस जागतिक चैतन्‍य की अवस्‍था को केंद्रित होना क्‍यों कहा जाता है? क्‍योंकि केंद्रित होना एकाग्र होने जैसा लगता है। इस जागतिक चैतन्‍य या समाधि को केंद्रित होना क्‍यों कहते है?