मृत्यु के पीछे अजन्मा, अमृत और सनातन का दर्शन—
अध्याय—1—2
प्रश्न: भगवान
श्री, लक्ष्य के साथ क्रियाएं बनती हैं और निश्चित परिणाम
की इच्छा रहती है। अगर हर समय चित्त निरहंकार या निर्विचार रहा, तो क्रियाएं कैसे होंगी? निर्विचार मन कुछ व्यक्त
कैसे कर सकता है? सब निरंतर निर्विचार रहने से निष्क्रिय हो
जाएं, तो समाज कैसे चल सकता है? समाज
नष्ट नहीं हो जाएगा?
निरहंकार होने से कोई निष्क्रिय नहीं
होता है; न ही निर्विचार होने से कोई निष्क्रिय होता है।
निरहंकार होने से सिर्फ कर्ता का भाव चला जाता है। लेकिन कर्म परमात्मा को समर्पित
होकर पूर्ण गति से प्रवाहित होते हैं। नदी बहती है, कोई
अहंकार नहीं है। हवाएं चलती हैं, कोई अहंकार नहीं है। फूल
खिलते हैं, कोई अहंकार नहीं है। ठीक ऐसे ही सहज, निरहंकारी जीवन से सब कुछ होता है, सिर्फ भीतर कर्ता
का भाव संगृहीत नहीं होता है।
इसलिए सुबह जो मैंने कहा कि अर्जुन का
अहंकार ही पूरे समय उसकी पीड़ा और उसका संताप बना है। इसका यह अर्थ नहीं कि वह
अहंकार छोड़ दे, तो कर्म छूट जाएगा।





