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शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

गीता दर्शन--(भाग--1)-(प्रवचन-006) ओशो


मृत्यु के पीछे अजन्मा, अमृत और सनातन का दर्शन—
(प्रवचन—छठवां)

अध्‍याय—1—2

प्रश्न: भगवान श्री, लक्ष्य के साथ क्रियाएं बनती हैं और निश्चित परिणाम की इच्छा रहती है। अगर हर समय चित्त निरहंकार या निर्विचार रहा, तो क्रियाएं कैसे होंगी? निर्विचार मन कुछ व्यक्त कैसे कर सकता है? सब निरंतर निर्विचार रहने से निष्क्रिय हो जाएं, तो समाज कैसे चल सकता है? समाज नष्ट नहीं हो जाएगा?
  निरहंकार होने से कोई निष्क्रिय नहीं होता है; न ही निर्विचार होने से कोई निष्क्रिय होता है। निरहंकार होने से सिर्फ कर्ता का भाव चला जाता है। लेकिन कर्म परमात्मा को समर्पित होकर पूर्ण गति से प्रवाहित होते हैं। नदी बहती है, कोई अहंकार नहीं है। हवाएं चलती हैं, कोई अहंकार नहीं है। फूल खिलते हैं, कोई अहंकार नहीं है। ठीक ऐसे ही सहज, निरहंकारी जीवन से सब कुछ होता है, सिर्फ भीतर कर्ता का भाव संगृहीत नहीं होता है।

इसलिए सुबह जो मैंने कहा कि अर्जुन का अहंकार ही पूरे समय उसकी पीड़ा और उसका संताप बना है। इसका यह अर्थ नहीं कि वह अहंकार छोड़ दे, तो कर्म छूट जाएगा।

गीता दर्शन--(भाग--1)-(प्रवचन-005) ओशो

अर्जुन का पलायन-- अहंकार की ही—(प्रवचन—पांचवां)
अध्याय १-२
दूसरी अति

अहो बत महत्पापं कर्तुंव्यवसिता वयम्।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः।। ४५।।

अहो! शोक है कि हम लोग (बुद्धिमान होकर भी) महान पाप करने को तैयार हुए हैं, जो कि राज्य और सुख के लोभ से अपने कुल को मारने के लिए उद्यत हुए हैं।
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्।। ४६।।
यदि मुझ शस्त्ररहित, न सामना करने वाले को, शस्त्रधारी धृतराष्ट्र के पुत्र रण में मारें, तो वह मरना भी मेरे लिए
अति कल्याणकारक होगा।

संजय उवाच
एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत्।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः।। ४७।।

गुरुवार, 8 सितंबर 2016

गीता दर्शन--(भाग--1)-(प्रवचन-004) ओशो

दलीलों के पीछे छिपाममत्‍व और हिंसा—

अध्‍याय (1—2) ओशो—प्रवचन—चौथा


प्रश्न :

भगवान श्री, आज सुबह आपने बताया कि गीता अध्यात्म—शास्त्र नहीं है, मानस—शास्त्र है। मगर आपने यह भी बताया कि राम में रावण का अंश होता है और रावण में राम का होता है। वैसे ही गीता में भी क्या ऐसा नहीं हो सकता कि शास्त्र में भी अध्यात्म का कुछ अंश आ गया हो?

मैं अध्यात्म को ऐसी अनुभूति कहता हूं, जो अभिव्यक्त नहीं हो सकती। इशारे दिए जा सकते हैं, लेकिन इशारे अभिव्यक्तिया नहीं हैं। चांद को अंगुली से बताया जा सकता है, लेकिन अंगुली चांद नहीं है।
गीता को जब मैंने कहा कि मनोविज्ञान है, तो मेरा अर्थ ऐसा नहीं है, जैसे कि फ्रायड का मनोविज्ञान है। फ्रायड का मनोविज्ञान मन पर समाप्त हो जाता है; उसका कोई इशारा मन के पार नहीं है। मन ही इति है, उसके आगे और कोई अस्तित्व नहीं है। गीता ऐसा मनोविज्ञान है, जो इशारा आगे के लिए करता है। लेकिन इशारा आगे की स्थिति नहीं है।

गीता दर्शन--(भाग--1)-(प्रवचन-003) ओशो

विषाद और संताप से आत्‍म—क्रांति की और


(अध्‍याय-01-02) प्रवचन—तीसरा



            गाण्डीव स्रंसते हस्तात्त्वफ्चैव परिदह्यते।
            न च शक्‍नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मन: ।।30।।
            निमित्तानि च पश्यामि वियरीतानि केशव।
            न च श्रेयोsनुयश्यामि हत्‍वा स्वजनमाहवे ।।31।।
            न कांक्षे विजयं कृष्‍ण न च राज्यं सुखानि च ।
            कीं नो राज्येन गोविन्द कीं भोगैजीवितेन वा ।।32।।

तथा हाथ से गांडीव धनुष गिरता है। और ऋचा थी बहुत जलती है तथा मेरा मन भ्रमित—सा हो रहा है। इसलिए मैं खड़ा रहने को भी समर्थ नहीं हूं। और हे केशव! लक्षणों को भी विपरीत ही देखता हूं तथा युद्ध में अपने कुल को मारकर कल्याण भी नहीं देखता। हे कृष्ण ! मैं विजय को नहीं चाहता और राज्य तथा सुखों को भी नहीं चाहता। हे गोविंद! हमें राज्‍य से क्‍या प्रयोजन। अथवा भोगों से और जीवन से भी क्या प्रयोजन है।

गीता दर्शन--(प्रवचन--002)


अध्याय १-२ (दूसरा प्रवचन)
अर्जुन के विषाद का मनोविश्लेषण

योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः।। २३।।
संजय उवाच
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्।। २४।।
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्।
उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति।। २५।।
तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितृनथ पितामहान।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा।। २६।।
श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि।
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान्।। २७।।
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्।
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्।। २८।।
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते।। २९।।

एस धम्‍मो सनंतनो--(प्रवचन--030)

मंथन कर, मंथन कर—(प्रवचन—तीसवां)

 पहला प्रश्न :

      होश हो तो दूसरा सदा कल्याणकारी है। क्या ऐसा ही आप बुद्ध पुरुष कहते हैं?
होश हो तो दूसरा न तो कल्याणकारी है और न अकल्याणकारी; होश हो तो तुम सभी जगह से अपने कल्याण को खींच लेते हो। होश न हो तो तुम सभी जगह से अपने अकल्याण को खींच लेते हो। बोध हो तो तुम जहां होते हो, वहीं स्वर्ग निर्मित होने लगता है—तुम्हारे बोध के कारण। बोध न हो तो तुम जहां होओगे, वहां नर्क की दुर्गंध उठने लगेगी—तुम्हारे ही कारण।
      ऐसा समझो कि मूर्च्छित—मूर्च्छित जीना नर्क का निर्माण है; जागकर जीना स्वर्ग का। जागते हुए किसी ने कभी कोई दुख नहीं पाया। सोते हुए कभी किसी ने कोई सुख नही पाया।
सोते हुए ज्यादा से ज्यादा सुख की आशा हो सकती है, सुख कभी मिलता नहीं। सुख की आशा में तुम बहुत दुख उठा सकते हो भला, लेकिन सुख कभी मिलता नहीं। जागकर जो मिलता है, उसी का नाम सुख है।

एस धम्‍मो सनंतनो--(प्रवचन--029)

कल्याण मित्र की खोज—(प्रवचन—उन्‍नतीसवां)

 सारसूत्र:

निधीनं' व पवत्तारं यं पस्से व वज्जदास्सिनं।
निग्‍गव्‍हवादि मेधावि तादिसं पंडित भजो।
तादिसं भजमानस्स सेय्यो होति न पापिको ।।70।।

न भजे पापके मित्ते न भजे पुरिसधमे।
भजेथ मित्ते कल्याणे भजेथ पुरिसधमे ।।71।।

धम्मपीती' सुखं सेति विपसन्नेन चेतसा ।
अरियप्पवेदिते धम्मे सदा रमति पंडितो ।।72।।

उदकं हि नयंति नेत्तिका उसुकारा नमयति तेजनं ।
दारु नमयंति तच्छका अत्तानं दमयंति पंडिता ।।73।।

एस धम्‍मो सनंतनो--(प्रवचन--028)

जागरण और आत्मक्रांति—(प्रवचन—अट्ठाइसवां)
 

 पहला प्रश्न :

      लोभ और लाभ का रास्ता ईर्ष्या और घृणा से, भय और दुश्चिंता से पटा पड़ा है; वह जीवन में जहर घोलकर रख देता है, ऐसा मेरे लंबे जीवन का अनुभव है। फिर भी क्या कारण है कि किसी न किसी रूप में लाभ की दृष्टि बनी ही रहती है?

 लोभ से जीवन में दुख आया, लोभ से जीवन में जहर मिला, लोभ से जीवन में विपदाएं आयीं, कष्ट—चिंताएं आयीं, अगर ऐसा समझकर लोभ। को छोड़ा तो लोभ को नहीं छोड़ा। क्योंकि यह समझ ही लोभ की है।
      जहां अमृत की आकांक्षा की थी, वहां जहर पाया—हानि हुई, लाभ न हुआ। जहा सुख चाहा था, वहा दुख मिला—हानि हुई, लाभ न हुआ। सोचा था चैन और सुख और शाति का जीवन होगा, दुश्चिंता से पट गया—हानि हुई, लाभ न हुआ। लोभ में हानि पाई इसलिए लोभ से छूटने चले, यह तो फिर लोभ के हाथ में ही पड़ जाना हुआ। हानि दिखाई पड़ती है लोभ की दृष्टि को।

एस धम्‍मो सनंतनो--(प्रवचन--027)

लाभ—पथ नही निर्वाण—पथ—(प्रवचन—सत्‍ताइसवां)

 सारसूत्र:

न हि पापं कतं कम्‍मं सज्‍जु खीरं व मुच्‍चति।
उहंत बालमन्‍वेति भस्‍माच्‍छन्‍नो व पावक ।।65।।

यावदेव अनत्‍थाय ज्‍जतं बालस्‍स जायति।
हन्‍ति बालस्‍स कुक्‍कंसं मुदमस्‍त विपातयं ।।66।।

असंत भावनमिच्‍छेय्य पुरक्‍रवारं च भिक्‍खुसु।
आवसेसु च इस्‍सरियं पूजा पर कुलेसु चे ।।67।।

ममेव कतमज्‍जयन्‍तु गिही पूब्‍बजिता उभो।
ममेवातिवसा अस्‍सू किच्‍चकिश्‍चेसु किस्‍मिचि।
इति बालस्स संकल्‍पो इच्‍छा मानो च बड्ढ़ति ।।68।।


अज्‍जा हि लाभूपनिसा अज्‍ज निब्‍बानगामिनी।
एवमेतं अभिज्‍जाये भिक्‍खु बुद्धस्‍स सावको।
सक्‍कारं नाभिनन्‍देय्य विवेकमनुबूहये ।।69।।

एस धम्‍मो सनंतनो--(प्रवचन--026)

मौन मे खिले मुखरता—(प्रवचन—छब्‍बीसवां)

 पहला प्रश्‍न:

      हर बार बोलने के बाद ऐसा अनुभव होता है कि मैंने बेईमानी की; चुप रहने पर ही अपने साथ ईमानदारी, पूरी ईमानदारी करती मालूम होती हूं। ऐसा क्यों है?

 शुभ लक्षण है, चिंता की कोई बात नहीं है।
      बोलते ही दूसरा महत्वपूर्ण हो जाता है। बोलते ही मन वही बोलने लगता है जो दूसरे को प्रीतिकर हो। बोलते ही मन शिष्टाचार, सभ्यता की सीमा में आ जाता है। बोलते ही हम स्वयं नहीं रह जाते, दूसरे पर दृष्टि अटक जाती है। इसलिए बोलना और ईमानदार रहना बड़ा कठिन है। बोलना और प्रामाणिक रहना बड़ा कठिन है। अच्छा है, इतनी समझ आनी शुरू हुई। शुभ लक्षण है। ज्यादा से ज्यादा चुप रहना उचित है। पहली कला चुप होने की सीखनी पड़ेगी। उतना ही बोलो जितना अत्यंत अनिवार्य हो। जिसके बिना चल जाता हो उसे छोड़ दो, उसे मत बोलो। और तुम अचानक पाओगे कि नब्बे प्रतिशत से ज्यादा तो व्यर्थ का है, न बोलते तो कुछ हर्ज न था, बोल के ही हर्ज हुआ।

एस धम्‍मो सनंतनो--(प्रवचन--025)

पुण्यातीत ले जाए, वही साध—कर्म—(प्रवचन—पच्‍चीसवां)


सूत्र:

न तं कम्‍मं कतं साधु यं कत्‍वा अनुतप्‍पति।
यस्‍स असुमुखी रोदं विपाकं परिसेवति।।61।।

तं च कम्‍मं कतं साधु यं कत्‍वा नानुतप्‍पति।
यस्‍स पतीतो सुमनो विपाकं परिसेवति।।62।।

मधुवा मज्‍जति बालो याव पापं न पच्‍चति।
यदा न पच्‍चति पापं अथ वालो दुक्‍खं निगच्‍छति।।63।।

मासे—मासे सुसग्‍गेन बालो भुज्‍जेथ भोजनं।
न सो संखतधम्‍मानं कलं अग्‍धिति सोलसि।।64।।


     सूत्र के पूर्व एक बहुत बुनियादी बात समझ लेनी जरूरी है।
मनुष्य के जीवन को हम दो खंडों में बांट सकते हैं एक तो मनुष्य का होना, बीइंग, और एक मनुष्य का कर्म, उसका कृत्य, डूइंग।

गीता दर्शन--(भाग--1)-(प्रवचन-001) ओशो


 अध्याय १-२ (पहला प्रवचन)



विचारवान अर्जुन और युद्ध का धर्मसंकट



श्रीमद्भगवद्गीता प्रथमोऽध्यायः



धृतराष्ट्र उवाच

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।

मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय।। १।।
धृतराष्ट्र बोले: हे संजय, धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में इकट्ठे हुए, युद्ध की इच्छा वाले, मेरे और पांडु के पुत्रों ने क्या किया?


धृतराष्ट्र आंख से अंधे हैं। लेकिन आंख के न होने से वासना नहीं मिट जाती; आंख के न होने से कामना नहीं मिट जाती। काश! सूरदास ने धृतराष्ट्र का खयाल कर लिया होता, तो आंखें फोड़ने की कोई जरूरत न होती। सूरदास ने आंखें फोड़ ली थीं; इसलिए कि न रहेंगी आंखें, न मन में उठेगी कामना! न उठेगी वासना! पर आंखों से कामना नहीं उठती, कामना उठती है मन से। आंखें फूट भी जाएं, फोड़ भी डाली जाएं, तो भी वासना का कोई अंत नहीं है।

एस धम्‍मो सनंतनो--(प्रवचन--024)

हु लुत्फ—ए—मय तुझसे क्या कहूं——(प्रवचन—चौबीसवां)

पहला प्रश्न :
 भगवान, आप मुझे देख—देखकर शराब की बातें क्यों करते हैं? सीधे—सीधे क्यों नहीं कह देते? मैं सिद्ध हूं; आपको कुछ हूं कहना है?
 रू ने पूछा है।
      पियक्‍कड़ों को देखकर शराब की बात उठ आए यह स्वाभाविक है। मेरे पास तुम्हें कहने को कुछ भी नहीं है—तुम्हीं को कहता हूं। एक दर्पण हूं; उससे अगद। नहीं। तुम्हारी तस्वीर तुम्हीं को लौटा देता हूं।
      तो प्रश्न तो मजाक में ही पूछा है तरु ने, लेकिन मजाक का भी बड़ा सत्य होता ते। जरूर बात उसकी पकड़ में आई। उसको देखकर मुझे शराब की बात याद आती होगी।
लेकिन तरु ही अगर पियक्कड़ होती तो कोई अड़चन न थी; सभी पीए हुए हैं। अलग—अलग मधुशालाएं हैं। अलग—अलग ढंग की शराब है। लेकिन सभी पीए हुए हैं। किसी ने धन की शराब पी है, किसी ने पद की शराब पी है, लेकिन सभी बेहोश हैं।

एस धम्‍मो सनंतनो--(प्रवचन--023)

सत्संग—सौरभ—(प्रवचन—तेइसवां)

सारसूत्र:
यावजीवम्‍पि ते बालो पंडितं पयिरूपासति।
न सो धम्मं दब्बी सूपरसं यथा।।58।।

मुहुत्‍तमपि चे विज्‍यू पंडितं पयिरूपासिति।
खिप्‍पं धम्मं विजानाति जिव्‍हा सुरपरसं यथा।।59।।

चरंति बाला दुम्‍मेधा अमित्‍तेनेव अत्तना।
करन्‍तो पापकं कम्मं यं कटुकफ्फलं।।60।।

ज सत्संग की कुछ बात करें। इन सूत्रों में सत्संग की ही आधारशिला है। सत्संग से ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ और नहीं है। अंधे को जैसे आंख मिल जाए, या गूंगे को जबान; या मुर्दा जैसे जग जाए और जीवित हो जाए, ऐसा सत्संग है। सत्संग का अर्थ है : तुम्हें पता नहीं है; किसी ऐसे का साथ मिल जाए जिसे पता है, तो जैसे तुम्हें ही पता हो गया; तो जैसे तुम्हारे हाथ में अंधेरे में मशाल आ गई।

एस धम्‍मो सनंतनो--(प्रवचन--022)

बुद्धि, बुद्धिवाद ओर बुद्ध—(प्रवचन—बाईसवां)
 


पहला प्रश्‍न:
      भगवान बुद्ध का मार्ग संदेह के स्वीकार से शुरू होता है। क्या उनका बग भी आज के युग जैसा ही बुद्धिवादी था, संदेहवादी था? और क्या आज के समय में धम्मपद सबसे ज्यादा प्रासांगिक है?

      हीं—बुद्ध का युग तो बुद्धिवादी नहीं था; न ही संदेहवादी था। बुद्ध अपने समय से बहुत पहले पैदा हुए थे। अब ठीक समय था बुद्ध के लिए—पच्चीस सौ साल बाद।
      बुद्ध जैसे व्यक्ति सदा ही अपने समय के पहले होते हैं। जमाने को बड़ी देर लगती है उस जगह पहुंचने में, जो बुद्ध पुरुषों को पहले दिखाई पड़ जाता है। बुद्धत्व का अर्थ है देखने की ऊंचाइयां। जैसे कोई पहाड़ पर चढ़कर देखे, दूर सैकड़ों मील तक दिखाई पड़ता है। और जैसे कोई जमीन पर खड़े होकर देखे तो थोड़ी ही दूर तक आंख जाती है।

एस धम्‍मो सनंतनो--(प्रवचन--021)

बाल—लक्षण—(प्रवचन—इक्‍कीसवां)    

 सारसूत्र:

दीघा जागरतो रत्ति दीघं संतस्स योजना।
दीखे बालानं संसारो सद्धम्मे अविजानतं।।54।।

चरं वे नाधिगच्छेथ्व सेथ्यं सादिसमत्तनो।
एकचरियं दत्हं कयिरा नत्थि बाले सहायता।।55।।

पुत्‍तामत्‍थि धनम्मत्थि इति बालो विहज्‍जति।
अत्ता अत्तनो नत्थि कुतो पुत्‍तो कुत्‍तो धनं।।56।।


के बालो मज्जति बाल्यं पंडितो वापि तेन सो।
बाले व पंडितमानी स वे वालो'ति बुच्‍चति।।57।।

एस धम्‍मो सनंतनो--(ओशो) भाग--03

एस धम्‍मो सनंतनो (भाग—3)
 —ओशो

 (ओशो द्वारा भगवान बुद्ध की सुललित वाणी धम्‍मपद पर दिए गए दस अमृत प्रवचनों का संकलन)

 बुद्ध एक ऐसे उत्‍तुंग शिखर है, जिसका आखिरी शिखर हमें दिखाई नहीं पड़ता। बस थोड़ी दूर तक हमारी आंखें जाती है। हमारी आंखों की सीमा है। थोड़ी दूर तक हमारी गर्दन उठती है। हमारी गर्दन के झुकने की सामर्थ्‍य है। और बुद्ध खोते चले जाते है—दूर....

सोमवार, 5 सितंबर 2016

एस धम्‍मो सनंतनो--(प्रवचन--20)

प्रेम की आखिरी मंजिल: बुद्धो से प्रेम—(प्रवचन—बीसवां)

पहला प्रश्‍न:

जिन भिक्षुओं ने बुद्ध की मूर्तियां बनायीं और बुद्ध-वचन के शास्त्र लिखे, क्या उन्होंने बुद्ध की आज्ञा मानी? क्या वे उनके आज्ञाकारी शिष्य थे?

बुद्ध की आज्ञा तो उन्होंने नहीं मानी, लेकिन मनुष्य पर बड़ी करुणा की। और बुद्ध की आज्ञा तोड़ने जैसी थी, जहां मनुष्य की करुणा का सवाल आ जाए। ऐसे उन्होंने बुद्ध की आता तोड़कर भी बुद्ध की आशा ही मानी। क्योंकि बुद्ध की सारी शिक्षा करुणा की है।
      इसे थोड़ा समझना पड़ेगा।
      बुद्ध ने कहा मेरी मूर्तियां मत बनाना, तो जिन्होंने मूर्तियां बनायीं उन्होंने बुद्ध की आता तोड़ी। लेकिन बुद्ध ने यह भी कहा कि जो ध्यान को उपलब्ध होगा, समाधि जिसके जीवन में खिलेगी, उसके जीवन में करुणा की वर्षा भी होगी।
तो जिन्होंने मूर्तियां बनायीं उन्होंने करुणा के कारण बनायीं। बुद्ध के चरण-चिह्न खो न जाएं, और बुद्ध के चरण-चिह्नों की छाया अनंत काल तक बनी रहे।