ओ प्यारे, मेरे न्यारे,
यूं काहे
पुकारे, मेरे प्रीतम।
तुम्हारे प्रेम को मैं जानती हूं
तुम अपने प्रेम की बाते
यू मुझे मत बतलाओ
उसने मुझे छूआ है,
केवल मुझे ही नहीं मेरे सजल गात का भी
मैंने उसे महसूस किया है,
मैं उस अथाह सागर में डूबी हूं।
मैं उस भेद भरे भाव को
भली भांति जानने लगी हूं
तुम्हारी उस प्रेम दृष्टि को मैंने
उसे पल-पल अनुभव किया है,
और सबसे अधिक बुरा यह है कि
तुम्हारा चाबुक मारने जैसी, वो
डांट-फटकार
में भी मैंने उसे प्रेम पीत को अनुभव किया है,
उसमें पहले डरी थी परंतु अब डोली हूं,
वो नहीं चिरती मेरे ह्रदय को
न ही वहां कोई दर्द ही महसूस
करती हूं,
पता नहीं कहां खो गया मेरा वह होना,
मेरा वह अहंकार, ही मुझे डराता
था।
वो मेरे आंसू तब डर के थे
परंतु अब आनंद उत्सव के है।
परंतु तुम भेद नहीं करना उस सब का
क्योंकि तब तुम मुझे डांटना छोड़ दो
परंतु उस चाबुक सी पटकार भी मुझे जगाती है
मेरे सोये पन का अब मुझे पता चल रहा है
और तुम्हारी वो बड़ी-बड़ी लाल आंखें
अब बरता सा लगता है उसमें प्रेम का रंग
तुम अपनी मधुर वाणी से मत करो,
उस प्रेम का बखान।
वह एक ऐसा प्रवाहमान लावा है—
जिसमें मैं और मेरी सारी कमजोरी, मेरा भय,
मेरा अपनापन और नीचता डूबती जारी रही है।
अब भी आप उसकी तीव्र जलन और दर्द
को मैं मेरे ह्रदय में बसाये बैठी हूं।
केवल कुछ स्थान ही भय
विहीन ढूंढ रही हूं
परंतु नहीं ढूंढ पा
रही हूं,
तुम्हारे प्रेम के उस
उत्ताप में वह भी पिंगल रहे है।
कैसे गल-पिंगल रही है
मेरी अस्मिता क्षण-क्षण
खो रही है मेरा वो
सारा ज्ञान, मेरी बुद्धि का विशद
इस बार तो कर दो तुम
उसे भी नष्ट
शायद अब उस की मुझे
जरूरत नहीं है
तुम्हारे प्रेम की
सुरक्षा की खातिर,
ही मेरा होना है।
मैंने अपने पीतांबर को छोड़कर
तुम्हें अपने को सौंप दिया हैं।
तुम्हारे प्रेम का प्रमाण यह है कि
मैं एक बंदिनी बनकर रह गई हूं
तुम्हारे प्रेम के वो गीत,
अब न उनमें स्वर है न ताल,
तुमने बना दिया है मुझे बावरी
मैं अब और गीत नहीं गा पाऊंगी
मैं अब कहां हूं, उसे ढूंढ नहीं
पा रही
ये कैसी आग है विरह की,
जो देती है शीतलता
ये जलाती नहीं,
ये कैसा उत्ताप नशा है।
पूरा मदिरालय भी
अब नहीं कर पा रहा मुझे बेहोश
वो तमस कैसे खिली चाँदनी बन हंस रही है।
हां अब वहां नहीं है
कोई तमस का एक टुकड़ा भी
तुम्हारे प्रेम का नशा भी कैसा है
क्यों में इस समझ नहीं पा रही
नहीं कर रहा है मुझे बेहोश।
नहीं जानती अपने होने के अहं को
परंतु तुम सच बतलाना क्या मैं अभी हूं
मैं उस होने को देख पा रही हूं
और कहूं तो थक गई हूं आपने होने से अब
मैं अब नहीं मैं होना चाहती हूं?
कभी भी! कहीं
भी! उस सम्पूर्णता सी।
(ओशो की मधुशालाा)
मनसा-मोहनी दसघरा
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