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बुधवार, 5 अप्रैल 2017

जीवन ही है प्रभु-(साधना-शिविर) प्रवचन-04

जीवन ही है प्रभु-(साधना-शिविर)--ओशो
साधना-शिविर, जूनागढ़; दिनांक 11 दिसंबर, 1969; रात्रि.

प्रवचन-चौथा

मेरे प्रिय आत्मन् ,
'जीवन ही है प्रभु' इस संबंध में एक मित्र ने पूछा है, कैसे दिखाई पड़े फिर हमें कि जीवन ही प्रभु है। क्योंकि हमें तो चारों ओर दोष ही दिखायी पड़ते हैं। सबमें दोष दिखायी पड़ते हैं। 'क्यों दिखाई पड़ते हैं सबमें दोष?' इस संबंध में उन्होंने पूछा है।
प्रभु की खोज में एक सूत्र यह भी है, इसलिए इसे समझ लेना जरूरी है। निश्चित ही दोष दिखायी पड़ते हैं दूसरों में। कारण क्या है? कारण है सिर्फ एक--अपने अहंकार की तृप्ति। दूसरे में दोष दिखायी पड़ता है। दूसरे में दोष की खोज चलती है। उसका राज छोटा-सा है।

जीवन ही है प्रभु-(साधना-शिविर) प्रवचन-03

जीवन ही है प्रभु-(साधना-शिविर)--ओशो
साधना-शिविर, जूनागढ़; दिनांक 10 दिसंबर, 1969; रात्रि.

प्रवचन-तीसरा

मेरे प्रिय आत्मन् ,

एक मित्र ने पूछा है कि यदि ध्यान से जीवन में शांति हो जाती है, तो फिर ध्यान सारे देश में फैल क्यों नहीं जाता है?

पहली बात तो यह कि बहुत कम लोग हैं पृथ्वी पर जो शांत होना चाहते हैं। शांत होना बहुत कठिन है। असल में शांति की आकांक्षा को उत्पन्न करना ही बहुत कठिन है। और कठिनाई शांति में नहीं है। कठिनाई इस बात में है कि जब तक कोई आदमी ठीक से अशांत न हो जाये तब तक शांति की आकांक्षा पैदा नहीं होती। पूरी तरह अशांत हुए बिना कोई शांत होने की यात्रा पर नहीं निकलता है। और हम पूरी तरह अशांत नहीं हैं। यदि हम पूरी तरह अशांत हो जायें तो हमें शांत होना ही पड़े। लेकिन हम इतने अधूरे जीते हैं कि शांति तो बहुत दूर, अशांति भी पूरी नहीं हो पाती।

जीवन ही है प्रभु-(साधना-शिविर) प्रवचन-02

जीवन ही है प्रभु-(साधना-शिविर)--ओशो
साधना-शिविर, जूनागढ़; दिनांक 10 दिसंबर, 1969; प्रात्य.

प्रवचन-दूसरा

ध्यान के संबंध में थोड़ी सी बातें समझ लेनी जरूरी हैं। क्योंकि बहुत गहरे में तो समझ का ही नाम ध्यान है।
ध्यान का अर्थ है--समर्पण। ध्यान का अर्थ है--अपने को पूरी तरह छोड़ देना परमात्मा के हाथों में। ध्यान कोई क्रिया नहीं है, जो आपको करनी है। ध्यान का अर्थ है--कुछ भी नहीं करना है और छोड़ देना है उसके हाथों में, जो कि सचमुच ही हमें सम्हाले हुए हैं।
जैसा मैंने कल रात कहा, परमात्मा का अर्थ है--मूल स्रोत, जिससे हम आते हैं और जिसमें हम लौट जाते हैं। लेकिन न तो आना हमारे हाथ में है और न लौटना हमारे हाथ में है। हमें पता नहीं चलता, कब हम आते हैं और कब लौट जाते हैं। ध्यान, जानते हुए लौटने का नाम है।

जीवन ही है प्रभु-(साधना-शिविर) प्रवचन-01

जीवन ही है प्रभु-(साधना-शिविर)--ओशो
साधना-शिविर, जूनागढ़; दिनांक 09 दिसंबर, 1969; रात्रि.

प्रवचन-पहला-(प्रभु की खोज)

मेरे प्रिय आत्मन् ,
जीवन के गणित के बहुत अदभुत सूत्र हैं। पहली अत्यंत रहस्य की बात तो यह है कि जो निकट है वह दिखायी नहीं पड़ता, जो और भी निकट है, उसका पता भी नहीं चलता। और मैं जो स्वयं हूं उसका तो स्मरण भी नहीं आता। जो दूर है वह दिखायी पड़ता है। जो और दूर है और साफ दिखायी पड़ता है। जो बहुत दूर है वह निमंत्रण भी देता है, बुलाता भी है, पुकारता भी है।
चांद बुला रहा है आदमी को, तारे बुला रहे हैं। जगत की सीमाएं बुला रही हैं, एवरेस्ट की चोटियां बुलाती हैं, प्रशांत महासागर की गहराइयां बुलाती हैं। लेकिन आदमी के भीतर जो है वहां की कोई पुकार सुनायी नहीं पड़ती।

ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)-प्रवचन-10

ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)
ओशो

प्रवचन-दसवां-(ध्यान: जीवन में  क्रांति)


जीसस ने कहा है: जो भारग्रस्त हैं, चिंता से भरे हैं, जिनका मन विक्षिप्तता का बोझ हो गया है, वे मेरे पास आएं, मैं उन्हें निर्भार कर दूंगा।
यही मैं तुमसे भी कहता हूं। चिंताएं, दुख, पीड़ाएं, संताप इसलिए हैं, क्योंकि तुमने इन्हें जोर से पकड़ रखा है। चिंताएं किसी को पकड़ती नहीं, दुख किसी को पकड़ते नहीं, आदमी ही उन्हें पकड़ लेता है।
ध्यान की सारी प्रक्रिया दुख छोड़ने की, पीड़ा छोड़ने की प्रक्रिया है। धन नहीं छोड़ना है, संसार नहीं छोड़ना है; छोड़ देना है दुख को पकड़ने की वृत्ति। और एक बार यह अनुभव हो जाए कि दुख ने आपको नहीं, आपने दुख को पकड़ा हुआ था, तो जीवन में क्रांति घटित हो जाती है। क्योंकि फिर कोई भी जान कर दुख को पकड़ नहीं सकता।

ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)-प्रवचन-09

ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)
ओशो
प्रवचन-नौवां-(ध्यान: चुनावरहित सजगता)


ध्यान के संबंध में थोड़े से प्रश्न हैं। एक मित्र ने पूछा है कि वृत्तियों का देखना, ऑब्जर्वेशन भी क्या एक तरह का दमन नहीं है? एक प्रकार का सप्रेशन नहीं है?

आपकी आंतरिक आकांक्षा पर निर्भर करता है कि वृत्तियों का देखना भी दमन बन जाए या न बने।
यदि कोई व्यक्ति वृत्तियों का ऑब्जर्वेशन, निरीक्षण, देखना, साक्षी होना, इसीलिए कर रहा है कि वृत्तियों से मुक्त कैसे हो जाए, तो यह देखना दमन बन जाएगा, सप्रेशन बन जाएगा। यदि आपकी आकांक्षा निरीक्षण में केवल इतनी ही है कि मैं वृत्तियों से मुक्त कैसे हो जाऊं? मुक्त होने की बात आपने पहले ही तय कर रखी है, वृत्तियों को देखने के पूर्व आप एक पक्ष लेकर ही वृत्तियों को देखने जा रहे हैं कि ये वृत्तियां बुरी हैं, इनसे छुटकारा चाहिए; ये वृत्तियां नरक हैं, इनसे मुक्ति चाहिए; ये वृत्तियां ही दुख हैं, इनसे पार होना है;

ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)-प्रवचन-08

ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)
ओशो
प्रवचन-आठवां-(ध्यान: मन की मृत्यु)


थोड़े से सवाल हैं। एक मित्र ने पूछा है कि सुबह के ध्यान में शरीर बिलकुल ही गायब हो जाता है। और जो बचता है वह बहुत विशाल, ओर-छोर से परे लगता है। पर ध्यान के बाद शेष दिन में शरीर का बोध फिर शुरू हो जाता है, फिर क्षुद्र शरीर का अनुभव होने लगता है। तो क्या यह सब अहंकार की ही लीला है?

इस संबंध में तीन बातें खयाल में लेनी चाहिए। एक तो ध्यान में जैसे ही गहराई बढ़ेगी, शरीर तिरोहित हो जाएगा। या कभी-कभी बहुत विशाल हो जाएगा। या कभी ऐसा भी हो सकता है कि बहुत क्षुद्र, बहुत छोटा भी हो जाएगा; जितना है उससे भी छोटा मालूम पड़ेगा। शरीर की प्रतीति मन पर निर्भर है। यदि मन बहुत फैल जाता है तो शरीर फैला हुआ मालूम पड़ने लगता है। मन अगर बहुत सिकुड़ जाता है तो छोटा मालूम पड़ने लगता है। शरीर की सीमा वस्तुतः मन की सीमा से ही प्रतीत होती है। यह अनुभव सिद्ध है। और अहंकार की लीला नहीं है, ध्यान का परिणाम है।

ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)-प्रवचन-07

ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)
ओशो
प्रवचन-सातवां-(ध्यान: प्रकाश का जगत)


एक मित्र ने पूछा है: जब आप ध्यान में कहते हैं कि प्रकाश के सागर में डूब जाएं, तो हमें तो यही पता चलता रहता है कि जमीन पर पड़े हैं, तो सागर में कैसे डूब जाएं?

निश्चित ही पता चलता रहेगा कि आप जमीन पर पड़े हैं, अगर आपने इससे पहले के दो चरणों में पूरा श्रम नहीं उठाया। यदि पहले चरण में आप अपने को बचा कर कीर्तन करते रहे हैं, अगर कीर्तन में पूरे नहीं डूबे; अगर कीर्तन के बाद पंद्रह मिनट में, जब आपको कहा है कि आप अब कीर्तन की धुन पर सवार हो जाएं, अगर उस पर सवार नहीं हुए, अगर उस लहर में बहे नहीं, तो तीसरे चरण में आप पाएंगे कि आप जमीन पर ही पड़े हैं।

ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)-प्रवचन-06

ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)
ओशो
प्रवचन-छट्ठवां-(ध्यान: प्रभु के द्वार में  प्रवेश)


प्रभु के द्वार में प्रवेश इतना कठिन नहीं है, जितना मालूम पड़ता है। सभी चीजें कठिन मालूम पड़ती हैं, जो न की गई हों। अपरिचित, अनजान कठिन मालूम पड़ता है। जिससे हम अब तक कभी संबंधित नहीं हुए हैं, उससे कैसे संबंध बनेगा, यह कल्पना में भी नहीं आता।
जो तैरना नहीं जानता है, वह दूसरे को पानी में तैरता देख कर चकित होता है। सोचता है बहुत कठिन है बात। जीवन-मरण का सवाल मालूम पड़ता है।
लेकिन तैरने से सरल और क्या हो सकता है! वस्तुतः तैरना कोई कला नहीं, सिर्फ पानी में गिरने के साहस का फल है। तैरना कोई कला नहीं है। पहली बार आदमी गिरता है तो भी हाथ-पैर तड़फड़ाता है, थोड़े अव्यवस्थित होते हैं।

ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)-प्रवचन-05

ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)
ओशो
प्रवचन-पांचवां-(ध्यान: द्वैत से अद्वैत की ओर)


दोत्तीन मित्रों ने एक ही सवाल पूछा है कि ध्यान का प्रयोग करते समय, जब मैं कहता हूं कि आप अपने शरीर के बाहर निकल जाएं, छलांग लगा लें, और पीछे लौट कर देखें, तो उन्होंने पूछा है, यह हमारी समझ में नहीं आता कि कैसे निकल जाएं और कैसे पीछे लौट कर देखें?

जिनको छलांग लग जाती हो उनके लिए तो किसी विधि की जरूरत नहीं है। इसीलिए मैंने विधि की बात नहीं कही। क्योंकि कुछ लोग सहज ही बाहर निकल जाते हैं, किसी विधि की जरूरत नहीं है। निकलने का खयाल ही उन्हें बाहर ले जाता है। जिनको ऐसा न होता हो, उनके लिए मैं विधि कहता हूं। लेकिन जिनको होता हो उन्हें विधि करने की जरा भी जरूरत नहीं है। जिन्हें यह न होता हो आसानी से कि कैसे बाहर निकल जाएं, वे एक छोटा सा प्रयोग रात सोते समय घर पर करें। तो एक-दो दिन के भीतर आसान हो जाएगा।

मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-051)

 आत्‍मस्वीकार से तत्‍क्षण कांति--(प्रवचन—इक्यावानवां)

पहला प्रश्‍न:

अकारण जीने की कला का सूत्र क्या है? कृपा करके करें।


कारण से जीयो या अकारण जीयो, हर हालत में तुम अकारण ही जीते हो। कारण भला तुम खोज लो, कारण है नहीं। कारण तुम्हारा ही आरोपण है। इसे समझने की कोशिश करो।
जीवन कहीं जा नहीं रहा है, जीवन है। जीवन का कोई भविष्य नही है, बस वर्तमान है। वर्तमान ही एकमात्र अस्तित्व का ढंग है।
तुम जन्मे, क्या कारण है? पूछोगे, उलझोगे। पूछोगे तो कोई न कोई प्रश्न का उत्तर देने वाला भी मिल जाएगा; कोई न मिलेगा तो तुम खुद ही अपने मन को कोई उत्तर देकर समझा लोगे। ऐसे ही तो सारे दर्शनशास्त्र निर्मित हुए हैं। आदमी ने पूछा—उत्तर देने वाला कोई भी नहीं है—आदमी ने ही पूछा, आदमी ने ही उत्तर दे लिए। फिर प्रश्नों की पीड़ा से बचने के लिए उत्तरों को सम्हालकर रख लिया, संजोकर रख लिया, मंजूषाएं बना लीं—वेद बने, कुरान—बाइबिल बनी। आदमी की बेचैनी समझ में आती है। उसे लगता है, क्यों? कारण होना चाहिए!

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-050)

(अशांति की समझ ही शांति)--प्रवचन—पचासवां
सारसूत्र:

अथ पापानि कम्मानि करं वालो न बुज्‍झति।
सेहि कम्मेहि दुम्‍मेधो अग्‍निदड्ढ़ो' व तप्पति।।120।।

न नग्‍गचरिया न जटा न पंका
नाकसका थण्डिलसाकिका वा।
रज्जोवजल्लं उक्कुटिकपधानं
सोधेन्ति मच्चं अवितिण्णकंखं।।121।।

अलंकतो चेपि समं चरेथ्य
सन्तो दन्तो नियतो ब्रह्मचारी।
सब्‍बेसु भूतेसु' निधाय दण्ड
सो ब्राह्मणो सो समणो स भिक्‍खू ।।122।।


हिरीनिसधो पुरिसो कोचि लोकस्मि विज्जति।
यो निन्दं अप्पबोधति अस्सो भद्रो कसामिव ।।123।।

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-049)

 (महोत्सव से परमात्मा, महोत्सव में परमात्मा)--प्रवचन—उन्नचासवां 

पहला प्रश्‍न:


भगवान, मैं आपको वर्षों से सून रहा हूं, लंबे अर्से से मैं आपके पास हूं। मैंने समय—समय पर आयसे कई भिन्न—भिन्न वक्तव्य और परस्पर विरोधी वक्तव्य सुने, लेकिन उनके संबंध में कहीं कोई प्रश्न गै मन में नहीं उठा। और उनके बावजद आप मेरी दृष्टि में और मेरे हृदय में सदा—सर्वदा एक ओrर अखंड बने रहे। इस पर कुछ प्रकाश डालने की अनुकंपा करें।

मेरे पास दो ढंग से हो सकते हो। एक तो विचार से, बुद्धि से, और एक हृदय से और भाव से। बुद्धि और विचार से अगर मेरे पास हो, तो बड़ी अड़चन होगी। रोज—रोज विरोधी वक्तव्य होंगे। रोज—रोज तुम्हें सुलझाना पड़ेगा, फिर भी तुम सुलझा न पाओगे।
बुद्धि कभी कुछ सुलझा ही नहीं पाती। जहा सीधी—सीधी बात हो, वहा भी बुद्धिं उलझा लेती है। तो मेरी बातें तो बड़ी उलझी हैं। जहा सब साफ—सुथरा हो, वहा भी बुद्धि समस्याएं खड़ी कर लेती है। तो मैं तो उन रास्तों की बात कर रहा हूं जो बड़े धुंधलके से भरे हैं। एक ही रास्ते की बात हो, तो भी बुद्धि विरोध खोज लेती है। येतो अनंत रास्तों की बातें हैं।

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-048)

(आज बनकर जी!)--प्रवचन—अडतालिसवां 
सारसूत्र:

सब्‍बे तसन्‍ति दण्‍डस्‍स सब्‍बे भायंति मच्‍चुनो।
अत्‍तानं उपमं कत्‍वा न हन्‍नेय न घातये ।।115।।


सुखकामानि भूतानियो दण्‍डेन विहिंसति।
अत्‍तनो सुखमेसानो पेच्‍च सो न लभते सुखं।।116।।

सुखकामानि भूतानि यो दण्‍डेन न हिंसति।
अत्‍तनो सुखमेसानो पेच्‍च सो लभते सुखं।।117।।

मावोच्‍च फरूसं कज्‍जि वुत्‍ता पटिवदेय्युतं।
दुख्‍खा हि सारम्‍भकथा पटिदण्‍डा फुस्‍सेय्यु तं।।118।।

सचंनेरेसि अत्‍तानं कंसो उपहतो यथा।
एक पत्‍तोसि निब्‍बानं सारम्‍भो ते न विज्‍जति।।119।।

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-047)

(अकेलेपन की गहन प्रतीति है मुक्ति)-प्रवचन—सैतालिसवांं 

पहला प्रश्‍न:

हम तो जीते—जी और सोते—जागते भय और अपराध—भाव के द्वारा आशेष नारकीय पीड़ा से गुजर चकते हैं। क्या यह काफी नहीं है? कि मरने के बाद फिरे हमें नर्क भेजा जाए!



पहली बात, कोई भेजने वाल नहीं है, कोई भेजता नहीं है। तुम जाते हो इसे बहुत ठीक से समझ लो। अन्‍यथा बुद्ध के दृष्‍टिोण को पकड़ न पाओगे।
बुद्ध के दृष्टिकोण में जो अत्यंत आधारभूत बात है, वह यह है—धर्म, ईश्वर से शून्य। अगर तुम किसी भांति ईश्वर को पकड़े रहे, तो बुद्ध के धर्म को समझ न पाओगे। ईश्वर के बहाने तुमने किसी दूसरे पर दायित्व छोड़ा है।
तुम कहते हो, दुख तो हम भोग चुके बहुत, अब हमें नर्क न भेजा जाए—जैसे तुम्हें कोई भेजने वाला है! कि प्रार्थना और पूजा हमने इतनी की, अब हमें स्वर्ग भैजा जाए—जैसे कि कोई पुरस्कार बांट रहा है। वहां कोई भी नहीं है।

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-046)

 (जीवन—मृत्यु से पार है अमृत).प्रवचन—छियालिसवां 
सारसूत्र:

वणिजो व भयं मग्‍गं अप्‍पसत्‍थोमहद्धनो।
विसं जीवितुकामो व पापनि परिवज्‍जये।।109।।

पाणिम्‍हि चे वणो नास्‍स हरेय्य पाणिना विसं।
नाब्‍बणं विसमन्‍वेति नित्‍थ पापं अकुब्‍बतो।।110।।

यो अप्‍पदुट्ठस्‍स नरस्‍स दुस्‍सति।
सुद्धस्‍स पोसस्‍स अनंगणस्‍स।
तमेव बालं पच्‍चेति पापं।
सुखमो रजो पटिवातं व खितो।।111।।

गब्‍भमेके उप्‍पज्‍जन्‍ति निरयं पापकम्‍मिनौ।
सग्‍गं सुगतिनो यन्‍ति परिनिब्‍बन्‍ति अनासवा।।112।।

ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)-प्रवचन-04

ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)
ओशो

प्रवचन-चौथा-(ध्यान: जीवन की बुनियाद)


जीवन में दुख भी है और सुख भी, क्योंकि जन्म भी है और मृत्यु भी। लेकिन इस बात पर बहुत कुछ निर्भर करता है कि दोनों में से हम किसको चुन कर जीवन की बुनियाद बनाते हैं।
यदि कोई व्यक्ति मृत्यु को चुन कर जीवन की बुनियाद रखे, तो फिर जन्म भी केवल मृत्यु की शुरुआत मालूम पड़ेगी। और अगर कोई जीवन को ही बुनियाद रखे, तो फिर मृत्यु भी जीवन की परिपूर्णता और जीवन की अंतिम खिलावट मालूम पड़ेगी। कोई व्यक्ति अगर दुख को ही जीवन का आधार चुन ले, तो सुख भी केवल दुख में जाने का उपाय दिखाई पड़ेगा। और अगर कोई व्यक्ति सुख को जीवन का आधार बना ले, तो दुख भी केवल एक सुख से दूसरे सुख में परिवर्तन की कड़ी होगी। यह निर्भर करता है चुनाव पर।

ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)-प्रवचन-03

ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)
ओशो
प्रवचन-तीसरा- (ध्यान: मनुष्य की आत्यंतिक संभावना)


पहले ध्यान के संबंध में कुछ बातें और फिर हम ध्यान में प्रवेश करेंगे।
सबसे पहली बात, साहस न हो तो ध्यान में उतरना ही नहीं। और साहस का एक ही अर्थ है: अपने को छोड़ने का साहस। और सब साहस नाम मात्र के ही साहस हैं। एक ही साहस--अपने से छलांग लगा जाने का साहस, अपने से बाहर हो जाने का साहस--ध्यान बन जाता है। जैसे कोई वस्त्रों को उतार कर रख दे, नग्न हो जाए, ऐसे ही कोई अपने को उतार कर रख कर नग्न हो सके तो ही ध्यान में प्रवेश कर पाता है।
शरीर भी वस्त्र से ज्यादा नहीं है और मन भी वस्त्र से ज्यादा नहीं। लेकिन इन वस्त्रों से हमारा बड़ा मोह है। इन वस्त्रों को ही हमने अपनी आत्मा समझा है, इन वस्त्रों को ही हमने अपना जीवन माना हुआ है। इसलिए उतारने में बड़ी कठिनाई होती है।

ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)-प्रवचन-02

ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)
ओशो

प्रवचन-दूसरा (ध्यान: एक गहन मुमुक्षा)


ध्यान के संबंध में एक-दो बातें आपसे कह दूं और फिर हम ध्यान में प्रवेश करें।
एक तो ध्यान में स्वयं के संकल्प के अभाव के अतिरिक्त और कोई बाधा नहीं है। यदि आप ध्यान में जाना ही चाहते हैं तो दुनिया की कोई भी शक्ति आपको ध्यान में जाने से नहीं रोक सकती है। इसलिए अगर ध्यान में जाने में बाधा पड़ती हो तो जानना कि आपके संकल्प में ही कमी है। शायद आप जाना ही नहीं चाहते हैं। यह बहुत अजीब लगेगा! क्योंकि जो भी व्यक्ति कहता है कि मैं ध्यान में जाना चाहता हूं और नहीं जा पाता, वह मान कर चलता है कि वह जाना तो चाहता ही है। लेकिन बहुत भीतरी कारण होते हैं जिनकी वजह से हमें पता नहीं चलता कि हम जाना नहीं चाहते हैं।
अब जैसे, जो व्यक्ति भी कहता है, मैं ध्यान में जाना चाहता हूं, उसे बहुत ठीक से समझ लेना चाहिए कि क्या वह सुख और दुख दोनों को छोड़ने को तैयार है?

ध्यान के कमल-(साधना-शिविर) -प्रवचन-01

ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)
ओशो

प्रवचन-पहला (ध्यान: एक बड़ा दुस्साहस)

प्रश्न: सांझ आप कहते हैं कि इंद्रियों की पकड़ में जो नहीं आता वही अविनाशी है। और सुबह कहते हैं कि चारों तरफ वही है; उसका स्पर्श करें, उसे सुनें। क्या इन दोनों बातों में विरोध, कंट्राडिक्शन नहीं है?

इंद्रियों की पकड़ में जो नहीं आता वही अविनाशी है। और जब मैं कहता हूं सुबह आपसे कि उसका स्पर्श करें, तो मेरा अर्थ यह नहीं है कि इंद्रियों से स्पर्श करें। इंद्रियों से तो जिसका स्पर्श होगा वह विनाशी ही होगा। लेकिन एक और भी गहरा स्पर्श है जो इंद्रियों से नहीं होता, अंतःकरण से होता है। और जब मैं कहता हूं, उसे सुनें, या मैं कहता हूं, उसे देखें, तो वह देखना और सुनना इंद्रियों की बात नहीं है। ऐसा भी सुनना है जो इंद्रियों के बिना भीतर ही होता है। और ऐसा भी देखना है जो आंखों के बिना भीतर ही होता है। उस भीतर सुनने-देखने और स्पर्श करने की ही बात है। और यदि उसका अनुभव शुरू हो जाए, तो फिर वह जो विनाशी दिखाई पड़ता है चारों ओर, उसके भीतर भी अविनाशी का सूत्र अनुभव में आने लगता है।