जीवन ही है प्रभु-(साधना-शिविर)--ओशो
साधना-शिविर, जूनागढ़; दिनांक
11 दिसंबर, 1969; रात्रि.
प्रवचन-चौथा
मेरे प्रिय आत्मन् ,
'जीवन ही है प्रभु' इस संबंध में
एक मित्र ने पूछा है, कैसे दिखाई पड़े फिर हमें कि जीवन ही
प्रभु है। क्योंकि हमें तो चारों ओर दोष ही दिखायी पड़ते हैं। सबमें दोष दिखायी
पड़ते हैं। 'क्यों दिखाई पड़ते हैं सबमें दोष?' इस संबंध में उन्होंने पूछा है।
प्रभु की खोज में एक सूत्र यह भी है, इसलिए इसे समझ लेना
जरूरी है। निश्चित ही दोष दिखायी पड़ते हैं दूसरों में। कारण क्या है? कारण है सिर्फ एक--अपने अहंकार की तृप्ति। दूसरे में दोष दिखायी पड़ता है।
दूसरे में दोष की खोज चलती है। उसका राज छोटा-सा है।






