कुल पेज दृश्य

बुधवार, 5 अप्रैल 2017

जीवन ही है प्रभु-(साधना-शिविर) प्रवचन-02

जीवन ही है प्रभु-(साधना-शिविर)
ओशो
साधना-शिविर, जूनागढ़; दिनांक 10 दिसंबर, 1969; प्रात्य.

प्रवचन-दूसरा

ध्यान के संबंध में थोड़ी सी बातें समझ लेनी जरूरी हैं। क्योंकि बहुत गहरे में तो समझ का ही नाम ध्यान है।
ध्यान का अर्थ है--समर्पण। ध्यान का अर्थ है--अपने को पूरी तरह छोड़ देना परमात्मा के हाथों में। ध्यान कोई क्रिया नहीं है, जो आपको करनी है। ध्यान का अर्थ है--कुछ भी नहीं करना है और छोड़ देना है उसके हाथों में, जो कि सचमुच ही हमें सम्हाले हुए हैं।
जैसा मैंने कल रात कहा, परमात्मा का अर्थ है--मूल स्रोत, जिससे हम आते हैं और जिसमें हम लौट जाते हैं। लेकिन न तो आना हमारे हाथ में है और न लौटना हमारे हाथ में है। हमें पता नहीं चलता, कब हम आते हैं और कब लौट जाते हैं। ध्यान, जानते हुए लौटने का नाम है।
जब आदमी मरता है तो बिना चाहे बिना जाने लौट जाता है। ध्यान जानते हुए अपने को उस मूल स्रोत में खो देना है। ताकि हम जान सकें कि वह क्या है और यह भी जान सकें कि हम क्या हैं। तो ध्यान के लिए पहली बात तो स्मरण रखना--समर्पण, 'सरेंडर, टोटल सरेंडर'। सच तो यह है कि अधूरा समर्पण हो ही नहीं सकता है। ऐसा नहीं हो सकता कि आधा तो हम परमात्मा के हाथों में छोड़ दें और आधा अपने हाथों में रखें। छोड़ेंगे तो पूरा छोड़ेंगे, नहीं छोड़ेंगे तो बिलकुल नहीं छोड़ पायेंगे। अंग्रेजी में एक शब्द है, 'लेट गो', सब कुछ छोड़ देना। अगर एक क्षण को भी हम सब छोड़ पायें तो सब हमें मिल जाये, इसकी पात्रता उपलब्ध हो जाती है। पूरी तरह अपने को छोड़ देने का नाम ध्यान है। जिसने अपने को थोड़ा भी पकड़ा वह ध्यान में नहीं जा सकेगा; क्योंकि अपने को पकड़ना यानी रुक जाना अपने तक और छोड़ देना यानी पहुंच जाना उस तक, जहां छोड़कर हम पहुंच ही जाते हैं।
इस समर्पण की बात समझने के लिए हम तीन छोटे-छोटे प्रयोग करेंगे, ताकि यह समर्पण की बात पूरी समझ में आ जाये। समर्पण को भी समझने के लिए सिर्फ समझ लेना जरूरी नहीं है, करना जरूरी है, ताकि हमें खयाल में आ सके कि क्या अर्थ हुआ समर्पण का।
ध्यान विलीन होने की क्रिया है--अपने को खोने की, उसमें जो हमारा मूल स्रोत है। जैसे कोई बीज टूट जाता है और वृक्ष हो जाता है, ऐसे ही जब कोई मनुष्य टूटने की हिम्मत जुटा लेता है, तो परमात्मा हो जाता है। मनुष्य बीज है, परमात्मा वृक्ष है। हम टूटें तो ही वह हो सकता है। जैसे कोई नदी सागर में खो जाती है लेकिन नदी सागर में खोने से इनकार कर दे, तो फिर नदी ही रह जाती है और सागर में खोने से इनकार कर दे, तो नदी भी नहीं रह जाती, तालाब हो जाती है; बंधा हुआ डबरा हो जाती है। क्योंकि जो सागर में खोने से इनकार करेगा, उसे बहने से भी इनकार करना होगा। क्योंकि सब बहा हुआ अंततः सागर में पहुंच जाता है, सिर्फ रुका हुआ नहीं पहुंचता है। डबरे सिर्फ सूखते हैं और सड़ते हैं। सागर का महाजीवन उन्हें नहीं मिल पाता।
हम सब भी डबरों की तरह हो जाते हैं; क्योंकि हम सबकी वे जीवन-सरितायें परमात्मा के सागर की तरफ नहीं बहती हैं। और बह केवल वही सकता है, जो अपने से विराट में लीन होने को तैयार है। जो डरेगा लीन होने से, वह रुक जायेगा, ठहर जायेगा, जम जायेगा, बहना बंद हो जायेगा।
जिंदगी बहाव है रोज और महान से महान की तरफ जिंदगी यात्रा है और और विराट की मंजिल की तरफ।
लेकिन हम सब रास्तों पर रुक गये हैं, मील के पत्थरों पर। ध्यान इन बहावों को वापिस पैदा कर लेने की आकांक्षा है। यह बड़ा उल्टा है। वर्षा होती है पहाड़ों पर, तो बड़े-बड़े शिखर खाली रह जाते हैं; क्योंकि वे पहले से ही भरे हुए हैं और खड्ड और खाइयां भर जाती हैं, झीलें भर जाती हैं; क्योंकि वे खाली हैं। जो भरा है वह खाली रह जायेगा, जो खाली है वह भर जायेगा। परमात्मा की वर्षा तो प्रतिपल हो रही है। सब तरफ वही बरस रहा है। लेकिन हम अपने भीतर भरे हुए हैं, तो खाली रह जाते हैं। काश! हम भीतर गङ्ढों की तरह खाली हो जायें, तो परमात्मा हम में भर सकता है। हम तब उसके भराव को उपलब्ध हो सकते हैं, 'फुलफिलमेंट' को उपलब्ध हो सकते हैं। यह बहुत उल्टा है, लेकिन यही सही है। जो भरे हैं, वे खाली रह जायेंगे और जो खाली हैं, वे भर जाते हैं। इसलिए ध्यान का दूसरा अर्थ है--खाली हो जाना, 'एम्प्टी' हो जाना, बिलकुल खाली हो जाना है, कुछ भी नहीं बचाना है। मिटने का, समर्पण का, खाली होने का सबका एक ही अर्थ है।
ध्यान की आधार-शिला अक्रिया है, क्रिया नहीं है। लेकिन शब्द ध्यान से लगता है कि कोई क्रिया करनी होगी। जबकि जब तक हम कुछ करते हैं, तब तक ध्यान में न हो सकेंगे। जब हम कुछ भी नहीं कर रहे हैं तब जो होता है, वही ध्यान है। ध्यान हमारा न करना है। लेकिन मनुष्य-जाति को एक बड़ा गहरा भ्रम है कि हम कुछ करेंगे तो ही होगा। हम कुछ न करेंगे तो कुछ न होगा।
बीज को कुछ करना नहीं पड़ता टूटने के लिए, अंकुर बनने के लिए और बीज को कुछ करना नहीं पड़ता, फूल बन जाने के लिए; होता है। हम भी बच्चे से जवान हो जाते हैं, कुछ करना नहीं पड़ता है। जन्म होता है, जीवन होता है, मृत्यु होती है, हमारे करने से नहीं; होता है। जीवन में बहुत कुछ है, जो हो रहा है अपने से। और अगर हम कुछ करेंगे तो बाधा पड़ेगी होने में--गति नहीं आयेगी। खाना आपने खा लिया है, फिर वह पचता है, पचाना नहीं पड़ता आपको। और अगर आपको खयाल भी आ जाये कि मुझे पचाना है खाना, तो आप बड़ी कठिनाई में पड़ जायेंगे और पाचन में बाधा पड़ जायेगी। न हो तो कभी प्रयोग करके देखें। खाना खाने के बाद खयाल रखें कि भोजन पेट में पच रहा है। आप पायेंगे चौबीस घंटे बाद कि भोजन नहीं पच पाया। जो रोज पचता था, उसमें बाधा पड़ गयी। कभी कोशिश करके सोकर देखें, प्रयास करें सोने का तो फिर पायेंगे कि नींद आनी मुश्किल हो गई। नींद आती है, लानी नहीं पड़ती है।
यह समझ लेना जरूरी है कि जीवन में बहुत कुछ है, जो अपने से होता है, हमें नहीं करना होता। और यदि हम करते हैं तो उल्टे बाधा ही पड़ती है--सहयोग नहीं मिलता है।
ध्यान भी उन्हीं दिशाओं में से एक है, जहां हम जा सकते हैं, लेकिन अपने को ले जा नहीं सकते--जहां हमारा विकास हो सकता है, लेकिन हम अपने को धक्का देकर विकास नहीं करवा सकते।
यह बात बहुत स्पष्ट रूप से मन के सामने प्रगट हो जानी चाहिए कि ध्यान हमारी कोई क्रिया नहीं है, ध्यान हमारा समर्पण है। लेकिन हमारी भाषा में बड़ी भूल हो जाती है, समर्पण भी एक क्रिया है। असल में जिंदगी और भाषा में कुछ बुनियादी भेद हैं, और धीरे-धीरे हम भाषा के इतने आदी हो जाते हैं कि हम भूल ही जाते हैं कि जिंदगी कुछ बात और है। हिंदुस्तान का नक्शा हिंदुस्तान नहीं है और न घोड़ा शब्द घोड़ा है। घोड़ा शब्द तो लिखा है शब्द-कोष में और घोड़ा बंधा है अस्तबल में। वह दोनों में बड़ा भेद है, शब्द प्रत्येक चीज को जो शक्ल दे देते हैं, हम अगर जिंदगी में भी जो उसको खोजने गये तो बहुत मुश्किल में पड़ जायेंगे।
अब जैसे प्रेम करना एक क्रिया है शब्दों की दुनिया में; लेकिन जीवन में प्रेम किया ही नहीं जा सकता, होता है। वहां वह क्रिया नहीं है; वहां वह घटना है--हैपनिंग है। वहां कोई मनुष्य प्रेम में पड़ जाता है, कर नहीं सकता प्रेम। और अगर आपसे कहा जाये कि फलां व्यक्ति को प्रेम करो, तो ज्यादा से ज्यादा आप प्रेम का अभिनय कर सकते हैं; प्रेम नहीं कर सकते हैं। अगर चेष्टा की प्रेम करने की, तो आप खुद ही भीतर पायेंगे कि भीतर तो प्रेम नहीं है। चेष्टा से प्रेम असंभव है, मां बेटे को प्रेम नहीं करती; मां का बेटे से प्रेम होता है, और प्रेमी भी प्रेयसी से प्रेम नहीं करता है; प्रेम होता है। लेकिन भाषा में प्रेम क्रिया है और जीवन में प्रेम एक घटना है। ऐसे ही ध्यान किताब में पढ़ेंगे तो लगेगा करना पड़ेगा। और अगर ध्यान को समझने जायेंगे तो पता चलेगा करना नहीं है करना हो तो आसान भी मालूम पड़ता है, न करना बहुत कठिन मालूम पड़ता है।
तो फिर क्या किया जाये? मैंने यह मुट्ठी बांध ली, तो मुट्ठी बांधना एक क्रिया है। बांधने के लिए मुझे कुछ करना पड़ रहा है। फिर मैं किसी के पास जाऊं और पूछूं कि मुझे मुट्ठी खोलनी है, अब मैं क्या करूं? बांधना एक क्रिया है भाषा में, खोलना भी एक क्रिया है भाषा में; लेकिन जिंदगी के तथ्यों में बांधना तो क्रिया है, खोलना क्रिया नहीं है, खोलने के लिए कुछ भी करना नहीं पड़ेगा। सिर्फ मैं बांधूंगा नहीं तो मुट्ठी खुल जायेगी--मुट्ठी का खुलना अपने से हो जायेगा।
बांधना पड़ता है हमें, खुलना अपने से हो जाता है। अशांत होना क्रिया है, शांत होना क्रिया नहीं है। अशांत होने के लिए हमें बड़ी मेहनत करनी पड़ती है, बड़ा श्रम करना पड़ता है। और अशांति में सफल होने के लिए बड़ी कुशलता चाहिए; लेकिन शांत होना क्रिया नहीं है। अगर हम अशांत होना बंद कर दें, तो बस शांत होना हो जायेगा। इसको ऐसा भी समझ सकते हैं कि अशांति और शांति में विरोध नहीं है। अशांति का अभाव--'एब्सेंस'--शांति है। हमारी जो पकड़ है करने की, उसे पहले समझकर छोड़ देना चाहिए।
ध्यान हम करेंगे नहीं, ध्यान में हम होंगे। ध्यान में हम जायेंगे, ध्यान में हम बहेंगे, तैरेंगे नहीं। तैरना क्रिया है, बहना क्रिया नहीं है, बहना एक घटना है। उसमें हमें कुछ भी नहीं करना पड़ता है। और इसलिए मजे की बात है, जिंदा आदमी नदी में डूब जाये, मरे हुए आदमी को कभी डूबते हुए नहीं देखा गया; बल्कि जिंदा आदमी भी डूब जाये तो मरते ही ऊपर आ जाता है वापिस।
नदी भी बड़ा गजब का काम करती है! जिंदा को डुबा देती है, मुर्दे को उठा देती है! जिंदा को मार डालती है और मुर्दे को ऊपर तैरा देती है। आखिर मुर्दे में ऐसी कौन-सी कला है कि वह ऊपर आ जाता है और जिंदा नीचे चला जाता है? मुर्दे के पास एक कला है जो जिंदा के पास नहीं है। मुर्दा तैर नहीं सकता, वह तैरने में असमर्थ है। तैरने का उपाय ही नहीं है, मुर्दा सिर्फ बह सकता है। जो तैरता नहीं, वह नदी के ऊपर आ जाता है और जो तैरता है, वह नीचे चला जाता है। बात क्या है? तैरने में शक्ति का व्यय होता है--तैरने में नदी से लड़ना पड़ता है। नदी बहुत बड़ी है। और जीवन की नदी तो बहुत बड़ी है, उससे अगर हम लड़ेंगे तो डूबेंगे ही, मरेंगे ही; क्योंकि लड़ने में शक्ति नष्ट होगी। मुर्दा लड़ता ही नहीं, वह नदी के साथ एक हो जाता है। वह कहता है नदी से, जहां ले चलो वहीं चलने को राजी हैं, डुबाओ तो डूबने को राजी हैं, उठाओ तो उठने को राजी हैं। किनारे फेंक दो, तो जिस किनारे फेंक दो वही हमारी मंजिल है। कहीं हमें जाना नहीं है और ले चलो साथ तो साथ चलने को राजी हैं। मुर्दा कहता है कि हम अलग नहीं; तुम्हारे साथ हैं। फिर नदी मुश्किल में पड़ जाती है। मुर्दे को नदी हरा नहीं पाती है। मुर्दा नदी से ज्यादा ताकतवर सिद्ध होता है। मुर्दा मरा हुआ है और जिंदा आदमी लड़ता है, इसलिए कमजोर हो जाता है। रेजिस्ट करता है, विरोध करता है, इसलिए टूट जाता है।
ध्यान--मुर्दे आदमी की भांति हो जाने का नाम है। हम कुछ भी नहीं करते हैं, हम जीवन के प्रवाह में छोड़ देते हैं अपने को। जो हो, हो। इस स्थिति को समझने के लिए पहले हम तीन छोटे प्रयोग करेंगे। इस ध्यान की, मिटने की, स्थिति को समझने के लिए, वे तीन प्रयोग ध्यान की सीढ़ियां हैं। और अगर वे तीन हमें ठीक से समझ में आ जायें तो ध्यान बहुत आसान है। लेकिन अगर वे तीन हमारी समझ में न आयें तो फिर ध्यान बहुत मुश्किल हो जायेगा।
कल एक मित्र ने आकर कहा कि सूखा पत्ता सोच ही नहीं पाता कि वह नदी में बह रहा है, तो हम सोच ही नहीं पाते अपने को सूखे पत्ते की तरह। तो मैंने कहा--अच्छा है, मुर्दे की तरह सोचें। एक मुर्दा लाश बह रही है। और सूखे पत्ते में और मुर्दे में फर्क नहीं है, सूखा पत्ता हरे पत्ते की लाश है और मुर्दा हमारी लाश है। इसमें कोई बहुत फर्क नहीं है। हरा पत्ता जिंदा है और सूखा पत्ता मर गया है। वह भी लाश है हरे पत्ते की। हरा पत्ता लड़ता है हवाओं से। हवायें पूरब जाती हैं, तो हरा पत्ता कहता है, नहीं जायेंगे। हवायें पश्चिम जाती हैं, तो हरा पत्ता कहता है, अपनी जगह रहेंगे। इसलिए तो हरे पत्ते से गुजरती हवा में शोरगुल हो जाता है; क्योंकि पत्ते लड़ाई करते हैं। सूखा पत्ता कहता है--जहां ले चलो, जो मरजी, वहीं राजी हैं। सूखा पत्ता--पूरब ले जाती हवा, पूरब चला जाता; पश्चिम ले जाती तो पश्चिम चला जाता है। सूखा पत्ता विरोध नहीं करता है।
ध्यान अविरोध है, 'नान रेजिस्टेंस' है। जब मैं कहूं, बहना, तो आपको भीतर प्रतीति हो जानी चाहिए कि बहने का क्या मतलब है। एक दफे प्रतीति हो जाये फिर तो शब्द भी काम करता है। जैसे मैं आपसे कहूं कि नींबू और आप थोड़ी देर नींबू को सोचें तो आप पायेंगे, मुंह में पानी आना शुरू हो गया। अभी नींबू तो नहीं है, लेकिन नींबू का शब्द भी मुंह में पानी ला सकता है। क्यों? नींबू का अनुभव है, वह पानी लाया है मुंह में। और नींबू शब्द में भी वह अनुभव समा गया है। शब्द भी सार्थक हो सकते हैं, अगर अनुभव से जुड़ जायें।
तो इसलिए हम पहला प्रयोग करेंगे बहने का। पांच मिनट तक प्रयोग करके अनुभव करें कि बहने का मतलब क्या है।
और जब हमें भीतर से समझ में आ जाये कि यह रहा बहने का मतलब, यह मुर्दे की तरह होकर बह गये। तो फिर जब मैं कहूंगा, बहें, तो आप समझ पायेंगे कि मैं क्या कह रहा हूं।
फिर दूसरा, फिर तीसरा, ऐसे पांच-पांच मिनट के तीन प्रयोग समर्पण की पूर्ण भावना को खयाल में ले आने के लिए; फिर चौथा प्रयोग ध्यान का करेंगे। क्योंकि इन तीन को समझकर ही ध्यान किया जा सकता है।
एक तो थोड़े फासले पर बैठें। कोई किसी का स्पर्श न करता हो। ध्यान में कोई गिर भी सकता है। इसलिए इतनी दूरी पर बैठें कि कोई गिर जाये तो उससे कोई किसी के ऊपर न पड़ जाये। और इतनी जगह यहां है कि फैलकर बैठ जायें, पास बैठने की कोई जरूरत नहीं है। थोड़े फासले पर ही हो जायें, ताकि अपने को पूरी तरह छोड़ सकें; अन्यथा यही खयाल बना रहेगा कि अपने को संभाले रखें। अपने को संभाले रखना बाधा हो जायेगी। उसमें कंजूसी न करें। इतना दूर फासला पड़ा है, सब हट जायें आवाज दूर तक सुनाई पड़ेगी, घने मत बैठें। शीघ्र हट जायें। इसमें प्रतीक्षा मत करें; क्योंकि छोटी-सी बात से बहुत कुछ खोया जा सकता है। ना, ना, वहां ऐसे हिलने से कुछ भी नहीं होगा। वहां हिलने से क्या फर्क पड़ेगा? कोई आपके हिलने से जगह थोड़ी ही बन जायेगी? वहां से हट जायें। इतनी चारों तरफ जगह पड़ी है, यह मौका है उसका उपयोग करें पूरा। ऐसे बैठें कि आप बिलकुल बेफिक्र होकर बैठ सकें कि गिर गये, कोई बात नहीं। और बातचीत नहीं, आवाज नहीं, चुपचाप। हां, किसी को लेटना हो, लेट जाये। लेटने में और भी सुविधा हो जायेगी। और जगह तो काफी है, लेट सकते हैं। किसी को लेटना हो, पहले से ही लेट जायें; क्योंकि तब और आसानी से बह सकेंगे। बैठने में भी थोड़ा तनाव तो रहता ही है कि हम बैठे हैं। बैठना एक क्रिया है और लेटना एक क्रिया नहीं है।
अब पहली बात, पहला प्रयोग--पहला प्रयोग है, बहने का प्रयोग। नदी में कोई आदमी तैरता है, हम में से भी बहुत लोग तैरे होंगे; अन्यथा लोगों को तैरते देखा होगा। जब कोई तैरता है तो कुछ करता है। लेकिन तैरने से बिलकुल उल्टी दशा है बह जाना, 'फ्लोटिंग'। एक आदमी बहता है, तैरता नहीं। अपने हाथ-पैर रोक लेता है और बहा चला जाता है। फिर नदी जहां ले जाये, वहीं चला जाता है। फिर उसकी अपनी जाने की कोई इच्छा न रही। तैरने वाले की इच्छा है। तैरने वाला कहीं पहुंचना चाहता है। तैरने वाला नदी से लड़ेगा। तैरने वाले को उस किनारे पहुंचना है। नदी अगर बाधा देगी तो दुश्मन मालूम पड़ेगी। और नदी बाधा देगी; क्योंकि नदी अपने रास्ते भागी जा रही है। तैरने वाले का अपना रास्ता होगा तो भेद पड़ने ही वाला है। बहने का मतलब है, नदी के साथ एक हो जाना है। बहने के साथ नदी का कोई विरोध नहीं है। नदी जहां ले जाये वहीं हमारी मंजिल है। तब फिर नदी से कोई दुश्मनी नहीं रह जाती है। समर्पण का पहला अर्थ है, इस जीवन के साथ हम बह सकें, तैरें नहीं। ध्यान की पहली सीढ़ी है--बहने का अनुभव।
तो जैसा मैं कहूं वैसा थोड़ा प्रयोग करें, ताकि भीतर उसकी फीलिंग, उसका अनुभव हो सके। आंखें बंद कर लें। बंद करने का मतलब भी कि आंखें बंद हो जाने दें, उन पर भी जोर न डालें। पलकों को ढीला छोड़ दें, ताकि आंखें बंद हो जायें। पलक झपक जाये और बंद हो जाये। आंखों को बंद हो जाने दें। शरीर को ढीला छोड़ दें, कोई अकड़, कोई कड़ापन शरीर में न रखें। शरीर को बिलकुल ढीला छोड़ दें; क्योंकि हम कोई काम करने नहीं जा रहे हैं। हम बहने जा रहे हैं, तो हम अपने को बिलकुल 'रिलेक्स' और ढीला छोड़ दें। आंख बंद हो गई, शरीर ढीला छोड़ दिया। देखिए बीच में आकर न बैठें। अब आप लोग पीछे चले जायें और जो भी पीछे आयें, पीछे बैठें, वहां बीच में न बैठें, पीछे...।
अब एक छोटा-सा चित्र देखें, ताकि हम अनुभव कर सकें। देखें...पहाड़ों के बीच में, सूरज की रोशनी में चमकते हुए पहाड़ों के बीच में एक नदी भागी चली जा रही है। आंखों के पर्दे पर ठीक से देखें, सूरज की रोशनी में पहाड़ चमक रहे हैं और नदी तेज गति से भागी चली जा रही है। नदी की लहरें चमक रही हैं। नदी जोर से शोरगुल करती भागी चली जा रही है। नदी को बहुत ठीक से देखें। पहाड़ों के बीच में भागती हुई नदी सागर की तरफ। उन दो पहाड़ों के बीच बहती हुई एक नदी, तेज धार, बड़ी गति, गहरा नीला पानी, नदी भागी जा रही है सागर की खोज में। दूर कहीं अज्ञात में सागर है, नदी भागी जा रही है खोजने को। दूर की यात्रा पूरी करनी है, पहाड़ों के बीच में कलकल बही जाती नदी की लहरें तेज हैं, गहरी हैं बहुत, नीला है रंग, गति है जोर की। जब ठीक से देखेंगे तो बराबर दिखाई पड़ने लगेगा कि नदी भागी जा रही है। इसके भागने को भी ठीक से देख लें। इसकी गहराई को भी ठीक से समझ लें; क्योंकि थोड़ी ही देर में इसके साथ हम भी बह रहे होंगे। इसकी गहराई में हम भी उतर जायेंगे। नदी का गहरापन, नदी का नीलापन, चमकता है धूप में। उसे देखते-देखते ही मन पर हल्की शांति छा जायेगी।
अब इस नदी में हमें भी उतर जाना है। उतर जायें मन के चित्र पर। मन की कल्पना पर देखें कि हम भी इस नदी में उतर गये। अब इस नदी में अपने को भी डाल दें, एक मुर्दे की भांति। फिर डूबने का उपाय ही न रहेगा। अपनी लाश को बहता हुआ देखें इस नदी में। अब लाश तैर नहीं सकती इसलिए तैरने की कोशिश मत करना। तैरने का सवाल ही नहीं है, हाथ-पैर छोड़कर पड़ गये हैं। मुर्दे की तरह बहे जा रहे हैं। और तैरना नहीं है, बहना है। जैसे एक सूखा पत्ता नदी में बहने लगे, वैसे बहने लगें। और सूखा पत्ता तैरेगा कैसे? उसके पास हाथ-पैर नहीं हैं। सूखे पत्ते की भांति हो जायें और नदी में बहना शुरू कर दें। लहरें बहाने लगेंगी। सागर की तरफ नदी भाग रही है, आप भी उसके साथ बहने लगें। नदी के साथ एक हो जायें। तैरेंगे तो हमें कुछ करना पड़ेगा। वह समर्पण न होगा, और बहेंगे तो नदी कुछ करेगी, वह समर्पण होगा।
ध्यान में परमात्मा की नदी में हम अपने को छोड़ दें और बह जायें। हम कुछ भी न करें, उसके हाथों में छोड़ दें, जो उसे करना हो करे, न करना हो, न करे। जैसे कोई सूखा पत्ता बहती नदी में गिर गया हो, ऐसे ही नदी में गिर जायें और बह जायें। कोई प्रयास नहीं। नदी के लिए आप बोझ नहीं हैं; क्योंकि नदी को कोई मेहनत नहीं पड़ रही है, बस बही चली जा रही है।
ध्यान का पहला चरण है, 'फ्लोटिंग' का, बहने का अनुभव। एक पांच मिनट तक नदी में बहने का अनुभव करें, ताकि भीतर मन के कोने-कोने तक बहने की प्रतीति प्रगट हो जाये। बहें मुर्दे की भांति, कोई प्राण नहीं, हाथ-पैर हिलाने का कोई उपाय नहीं। चाहें तो भी नहीं हिला सकते। और बही जा रही है लाश तेजी से नदी के साथ। तैर नहीं रही है, कहीं जाना नहीं, कहीं पहुंचना नहीं है लाश को, सिर्फ नदी के साथ बहना है। सिर्फ बहने का ध्यान रहे; तैरना नहीं है। हाथ-पैर मत चलाना, छोड़ देना अपने को। नदी डुबाये तो डूब जाना, उबारे तो उबर आना। जहां ले जाये वहां चले जाना। हमारी कोई मंजिल नहीं है, हम बहने को तैयार हैं। अब मैं पांच मिनट के लिए चुप हो जाता हूं। आप नदी में बहें, ताकि बहने का ठीक-ठीक अनुभव खयाल में आ जाये, कि बहने का अर्थ क्या है?
ध्यान की यह पहली सीढ़ी बनेगी। इसे ठीक से पहचान लेना जरूरी है। दो पहाड़ चमकते हुए सूरज की रोशनी में, नदी भागती है बीच से, उसमें हम भी बहे चले जा रहे हैं। और बहते ही बहते इतनी शांति मालूम होने लगेगी, इतनी ताजगी घेर लेगी, इतना आनंद भीतर प्रगट होने लगेगा; सब चिंतायें गिर जायेंगी; सब भार गिर जायेगा; क्योंकि सभी चिंतायें तैरने की चिंतायें हैं, बहने वाले को कोई चिंता की जरूरत नहीं। सब तनाव गिर जायेगा; क्योंकि सब तनाव तैरने वाले के तनाव हैं। बहने वाले को कोई तनाव की जरूरत नहीं।
अब मैं चुप होता हूं। आप छोड़ दें अपने को, बिलकुल ढीला छोड़ दें और बह जायें...छोड़ दें...बह जायें...बिलकुल बह जायें...नदी में छोड़ दें और बह जायें। नदी भागी चली जाती है और आप बहे चले जाते हैं। छोड़ दें...बह जायें, बिलकुल छोड़ दें...नदी बहा ले जाये, बिलकुल बह जायें, नदी के साथ एक हो जायें। बहने का ठीक से अनुभव करें, मन एकदम शांत होने लगेगा। एकदम शीतलता और ताजगी भीतर प्रवेश कर जायेगी। बहें...पक्षियों का मधुर कलरव...छोड़ दें शरीर को, छोड़ दें, बिलकुल ऐसा छोड़ दें, जैसे मां की गोदी में बच्चा छोड़ देता है, ऐसा नदी की गोदी में अपने को छोड़ दें। नदी ले जायेगी। बहें...बहुत हलकापन लगेगा, मन का तनाव उतर जायेगा। बहें...सब छोड़ दें और बह जायें...बिलकुल छोड़ दें। नदी भागी चली जाती है, देखें पहाड़ चमकते हैं धूप में। नदी भागी चली जाती है और आप भी बहे जा रहे हैं। अपने को बहता हुआ देखें...एक पांच मिनट तक बहते-बहते ही मन का बहुत-सा कूड़ा करकट बह जायेगा, चिंता, तनाव, अशांति बह जायेगी; हलका हो जायेगा सब। जैसे भीतर तक स्नान प्रवेश कर गया हो; जैसे आत्मा तक नहा गयी हो--ऐसी ताजगी हो जायेगी।
बहें...छोड़ दें अपने को। धूप में चमकते हुए पहाड़ हैं, नदी की धार है, ठंडी हवायें हैं, पक्षियों के गीत हैं और हम बहे जा रहे हैं। नदी भागी चली जाती है, उसमें पड़े हम मुर्दे की भांति बहे चले जाते हैं। छोड़ते ही सब शांत हो जाता है, पकड़ ही अशांति है, तनाव है। छोड़ दें, फिर कैसा तनाव? फिर कैसी अशांति? नदी डुबा दे तो डूब जायें, नदी बहा दे तो बह जायें। नदी के साथ जरा भी विरोध न करें। देखें...बहें...अपने को बहता हुआ देखें। यह अनुभव ठीक से कर लें बहने का, ध्यान की पहली सीढ़ी यही है। बह रहे हैं, बह रहे हैं, बह रहे हैं; तैर नहीं रहे हैं, कुछ कर नहीं रहे हैं। नदी बहाये लिए जा रही है। आपको कुछ भी नहीं करना है, बस, बह जाना है। देखें मन बिलकुल शांत हो जायेगा। एक ताजगी घेर लेगी...मन बिलकुल मौन हो गया है, हलका, भारहीन, प्रफुल्लित हो गया है। मन स्वच्छ हो गया है, जैसे आत्मा तक नहा गई हो।
जो जीवन की सरिता में बहना सीख गया है, वह तनाव से मुक्त हो जाता है, वह शांत हो जाता है।
अब धीरे-धीरे नदी से बाहर निकल आयें, किनारे पर खड़े हो जायें। नदी अब भी बही जा रही है, किनारे पर खड़े होकर दो क्षण अनुभव करें, नदी में बहने ने कैसा सुख, कैसी शांति, कैसा आनंद भीतर भर दिया है! किनारे पर खड़े होकर पहचानें, अनुभव करें दो क्षण कि बहने के पहले और बहने के बाद में भीतर कुछ फर्क पड़ा? मन कुछ हलका, शांत, ताजा हुआ। नया हुआ। कैसा सब ताजा शांत हो गया! बाहर निकल आये हैं। अब धीरे-धीरे आंख खोलें और दूसरा प्रयोग समझें।
पहला प्रयोग है बहने का। 'फ्लोटिंग' ध्यान की पहली सीढ़ी है। दूसरा प्रयोग है, मरने का, मृत्यु का, मिट जाने का, जैसे कोई बीज मिटता है तो फिर अंकुर हो जाता है, जैसे कोई कली मिटती है तो फिर फूल हो जाती है। जब कुछ मिटता है, तभी कुछ हो पाता है। जब हम आदमी की तरह मिटेंगे, तभी हम परमात्मा की तरह हो पायेंगे। जन्म की पहली कड़ी मृत्यु है। और जो मरना नहीं सीख पाता, मिटना नहीं सीख पाता, वह कभी भी उस विराट तक नहीं पहुंच पाता, जहां तक पहुंचने में सब कुछ छूट जाना जरूरी है। जीसस का एक वचन है--'जो अपने को बचायेंगे, वे मिट जायेंगे और जो मिट जाते हैं, वे बचा लिए जाते हैं।'
तो दूसरा प्रयोग है, ध्यान की दूसरी सीढ़ी 'मिट जाने की'। ध्यान हम करते हैं तो परमात्मा कुछ करता है, हमें कुछ भी नहीं करना पड़ता है। हमें इतना ही करना पड़ता है कि हम उसे बाधा न दें और वह जो करना चाहता है, उसे करने की सुविधा दें। हम उसे करने देंगे। हम अपने को खुला छोड़ देंगे, वह आ जाये और जो उसे करना हो करे। सूरज निकला हो घर के बाहर और घर में अंधेरा हो। हमने द्वार बंद किये हैं और हम किसी से पूछें कि हमें सूरज की किरणों को भीतर लाना है, हम क्या करें? तो वह कहेगा, तुम कुछ न करो, सिर्फ द्वार खुले छोड़ दो; ताकि सूरज भीतर आ सके। तुम रोको मत, सूरज भीतर आ जायेगा। तुम छोड़ दो द्वार खुला। सूरज को गठरियों में बांधकर तो भीतर नहीं लाया जा सकता। उसकी किरणों को मुट्ठियों में बांधकर तो हम घर के भीतर नहीं ला सकते, डिब्बों में बंद करके तो भीतर नहीं ला सकते हैं, हम सिर्फ एक काम कर सकते हैं--'निगेटिवली'--नकारात्मक। और वह यह कि हम दरवाजा खुला छोड़ सकते हैं। फिर सूरज आ जायेगा। परमात्मा की अनंत शक्तियां इतना कर सकती हैं, जिसका कोई हिसाब नहीं। हम सिर्फ बाधा न दें। हम बीच में खड़े न हों। हम छोड़ दें और कहें कि जो होना है, वह हो। दूसरा प्रयोग और भी गहरा है। बहते हैं, लेकिन फिर भी हम हैं। तैरते नहीं हैं तो भी हम हैं। हमारा होना भी बाधा है। दूसरे प्रयोग में होने को भी मिटा देना है।
बुद्ध तो ऐसा करते थे कि जो ध्यान सीखने आते उनके पास, उन्हें तीन महीने के लिए मरघट पर बिठा देते थे। तीन महीने मरघट पर ही निवास करना पड़ता ध्यान करने वाले को और जब भी कोई लाश जलने आती तब उसे चिता के पास खड़ा हो जाना पड़ता। दिन में दो-चार-दस लोग भी मरते। रात मरघट सुनसान होता और ध्यान यह था कि जब लाश जलती हो किसी की, तो वह जो ध्यानी है, वह किनारे खड़ा हो जाये और अनुभव करता रहे कि मैं ही जल रहा हूं, मैं ही जल रहा हूं। यह और कोई नहीं जल रहा है, चिता पर मैं ही जल रहा हूं। तीन महीने में उस आदमी का शरीर बोध नष्ट हो जाता। तीन महीने में, 'मैं शरीर हूं' यह कल्पना ही मिट जाती। 'मैं शरीर हूं', यह भाव ही टूट जाता। तीन महीने निरंतर अपने को चिता पर चढ़ाकर वह अनुभव कर पाता कि मैं अलग हूं--मैं पृथक हूं।
अब हम दूसरा प्रयोग करेंगे। यह खयाल में ले लेंगे अनुभव ताकि फिर ध्यान में वे अनुभव हम काम में ला सकें, दूसरा प्रयोग करने के लिए बैठें। पांच मिनट के लिए मृत्यु के अनुभव में उतरें। आंख बंद हो जाने दें। पलकों को ढीला छोड़ दें, ताकि आंख बंद हो जाये। शरीर को ढीला छोड़ दें। बिलकुल ढीला छोड़ दें। उसको हमें पकड़कर नहीं रखना है। वह छोड़ ही दिया और आंख बंद हो गयी है। और कोई किसी दूसरे की फिक्र में न रहे। क्योंकि दूसरे से कोई प्रयोजन नहीं है कि आप बीच-बीच में किसी को देखें कि किसको क्या हो रहा है। किसी से कोई मतलब नहीं। आपको क्या हो रहा है, यह सवाल है। किसी को कुछ हो रहा है या नहीं हो रहा है यह मूल्य नहीं है कुछ। तो किसी को, किसी दूसरे को देखने की फिक्र छोड़ देनी चाहिए, अन्यथा वह दूसरे को देखने में अपने को देखने से वंचित रह जायेगा। आंख बंद करने को इसलिए कहता हूं, ताकि आप दूसरे की फिक्र छोड़ दें। भीतर अकेले ही रह जायें।
आंख बंद कर लें और अब दूसरा चित्र देखें। आंखों के सामने एक चिता जल रही है। जोर से चिता में लपटें उठ रही हैं। चिता के चारों तरफ अंधेरे में भी चेहरे पहचाने जा सकते हैं। आपके मित्र, प्रियजन सब इकट्ठे हो गये हैं। बहुत बार मरघट पर गये होंगे, लेकिन किसी और को जलाने। आज अपने को ही जलाने आप भी पहुंच गये हैं सबके साथ। चिता जल गयी है। चिता की लपटें बढ़ती चली जा रही हैं। ठीक से चिता को देख लें, क्योंकि इसी चिता पर थोड़ी देर में चढ़ जाना है। अभी हम नदी में बहे थे, अब आग में बह जाना है। नदी बहा सकती है, आग मिटा ही देती है। देख लें ठीक से आंखों के पर्दे पर आग जल रही है, चिता जल रही है। जोर से लपटें उठती हैं आकाश की तरफ। घेरा बांधकर मित्र, प्रियजन सब इकट्ठे खड़े हैं, उनके चेहरे भी दिखायी पड़ते हैं। आग की लपटों में उनके चेहरे चमकते हैं। आग की लपटों को ठीक से देख लें। अभी इसमें हमें ही उतर जाना है। यह किसी और की चिता नहीं है, हमारी ही चिता है। देखें चिता जल रही है और आप ही चिता पर चढ़ा दिये गये हैं। लाल लपटें आकाश की तरफ उठ रही हैं, चिता पूरी सुलग गयी है और मित्र, प्रियजन, बंधु सब आपकी अर्थी खोल रहे हैं और आपकी लाश को आपके प्रियजन चिता पर रख रहे हैं। किसी और को बहुत बार चिता पर चढ़ाया, किसी दिन हमको बहुत और लोग चढ़ायेंगे। ध्यान में हम खुद ही अपने को चढ़ाकर देख लें कि क्या होगा! चढ़ा दें चिता पर। हवायें तेज हैं, लपटों को उभाड़ती हैं, भभकाती हैं; और चिता पर कोई और नहीं चढ़ा है, हम ही चढ़े हैं, हम ही पड़े हैं--वह भी देख लें ठीक से कि हम ही जल रहे हैं। अब चिता ही नहीं जल रही, आप भी जल रहे हैं।
किसी मित्र ने पूछा है कि चढ़ा तो देता हूं चिता पर अपने को, लेकिन फिर भी मैं तो किनारे खड़ा देखता रहता हूं। निश्चित ही, कुछ हमारे भीतर है, जो सच में ही हम चिता पर चढ़ेंगे तो भी किनारे खड़े होकर ही देखता रहेगा। कल्पना की चिता पर ही नहीं, असली चिता पर भी जब आप चढ़ेंगे, मैं चढूंगा तो कुछ है, जो किनारे खड़ा होकर देखता रहेगा। कुछ है, जो बाहर बाहर खड़े होकर देखता रहेगा। शरीर तो चढ़ा दिया जा सकता है चिता पर, लेकिन कुछ है भीतर--जो चिता पर चढ़ ही नहीं सकता, जिसे कोई अग्नि नहीं जला सकती, जिसकी कोई मृत्यु नहीं, वह तो बाहर खड़े होकर देखता रहेगा। अपने को जलता हुआ अगर ठीक से देख लें तो हम दूसरे ही आदमी हो जायेंगे। बाद में हम वही आदमी कभी नहीं हो सकते, जो चिता पर चढ़ने के पहले थे। कुछ तो हम में जल ही जायेगा। कुछ तो हम में नष्ट हो ही जायेगा। देखते रहें पांच मिनट तक स्वयं को जलते हुए। अपने को जलता हुआ देखें...। थोड़ी देर में सब राख हो जायेगा, सब मिट जायेगा। न चिता रह जायेगी, न हम रह जायेंगे। थोड़ी-सी राख मरघट पर पड़ी रह जायेगी। एक पांच मिनट के लिए अपने को जलता हुआ देखें। सब जल रहा है। भागने का मन होगा, भाग नहीं सकते हैं, मर ही गये हैं, भागेंगे कहां? चिता से उतर आने का मन होगा, उतर नहीं सकते हैं। उतरेगा कौन? थोड़ी देर में राख बनने लगेगी। ये मित्र, प्रियजन विदा हो जायेंगे। मरघट शांत सन्नाटे में रह जायेगा। ठीक से देखें, चढ़े हैं चिता पर, जल रहे हैं। आग की लपटें उठ रही हैं, सब जला जा रहा है, हम भी जले जा रहे हैं।
पांच मिनट के लिए मैं चुप हो जाता हूं। छोड़ दें आग में अपने को। आग जोर पकड़ती जा रही है और हम जल रहे हैं। अपने को जलता हुआ देखें। थोड़ी देर में राख पड़ी रह जायेगी। मरघट पर सन्नाटा हो जायेगा। सब जल जायेगा, सिर्फ वही बच रहेगा, जो जल नहीं सकता है। जो जल सकता है, वह जल जायेगा। और उसी की तो हमें पहचान करनी है, जो जल न सके। जो जलता है, उसे जल जाने दें। देखें...आग लगी है, चिता की लपटें जल रही हैं, आप भी जले जा रहे हैं, जले जा रहे हैं, जले जा रहे हैं...लपटें बढ़ती जाती हैं, शरीर जलता जा रहा है। थोड़ी देर में सब राख हो जायेगा। हम ही राख हो जायेंगे और अपने को राख हुआ देखना बड़ा गहरा अनुभव है। देखें...सब राख हुआ जा रहा है...सब जलता जा रहा है। इधर लपटें बढ़ती हैं, उधर राख बढ़ रही है। हम जले जा रहे हैं, समाप्त हुए जा रहे हैं।
लपटों के पास कौन होगा? अब वे दूर खड़े हैं, बहुत बेरहम लपटें उनको झुलसाती हैं। राख से कौन प्रेम करेगा? राख के लिए कौन रुकेगा? अब वे जा रहे हैं। मित्र, प्रियजन, बंधु सब आखिरी नमस्कार करने आये हैं। मित्र, प्रियजन जाने शुरू हो गये हैं। उनकी पीठ दिखायी पड़ने लगी, मुंह और दिखायी नहीं पड़ता। लौट रहे हैं। आखिर वे मरघट में कब तक खड़े रहें? वे जाने लगे हैं, वे जा रहे हैं, वे वापिस चल पड़े हैं, उनके पदचाप पैरों के सुनायी पड़ने लगे हैं। वे जा चुके हैं। मरघट अकेला रह गया, चिता ही रह गयी। बिलकुल मिट जाना है, मिट जायें...।
अब मरघट पर कोई भी दिखायी नहीं पड़ता है। लपटें भी बुझने लगीं, राख का ढेर रह गया है। मरघट पर सन्नाटा छा गया है। सब मिट जायेगा। थोड़ी देर में अंगारे भी बुझ जायेंगे और राख पड़ी रह जायेगी। देखते रहें, अपने को मिटते देखना बहुत गहरा अनुभव है। ध्यान की दूसरी सीढ़ी वही है। मरघट निर्जन हो गया। अंधेरा घिर गया और राख का ढेर इकट्ठा हो गया। लपटों की आवाज भी बंद हो गयी। अंगारे भी बुझने लगे हैं। राख का ढेर पड़ा है।
देखें...ठीक से देखें मरघट पर कोई नहीं है। अंधेरी रात है, अंधेरे में दबी राख भर पड़ी रही, सब सुनसान है, अंगारे बुझ गये हैं, लपटें बुझ गईं, मरघट एकांत अकेला। अंधेरे में डूबा। एक ढेर है राख का, हमारी ही राख का।...हम मिट गये हैं। राख का एक ढेर और मरघट और सन्नाटा है। हवायें आती हैं और राख उड़ जाती है। इस राख को सम्हालने को भी कोई न रहा। यही हैं हम! यही थे हम! राख के इस ढेर को ठीक से पहचान लें, यही है वह चेहरा, जिसको बहुत बार दर्पण में देखा है। यही है वह शरीर, जिसे जीवन भर, अनेक-अनेक जीवन सम्हाला। यह राख का ढेर बहुत बड़ी सच्चाई है। इसे ठीक अनुभव कर लें। ध्यान का दूसरा चरण यही है। सब मिट गया है, सब मिट गया है, सन्नाटा है। राख का ढेर पड़ा है, उसे ठीक से देखें...देख लिया? राख के ढेर को, अपने होने को, अपनी आखिरी परिणति को?
स्वयं का मिट जाना ध्यान का दूसरा चरण है। मिट्टी, मिट्टी में मिल गयी है। इस भाव के आते ही कि सब मिट गया है, गहरी शांति उतर जायेगी। प्राण के भीतरी कोने तक सन्नाटा छा जायेगा। जब हम ही मिट गये तो कैसी चिंता, कैसी अशांति, कैसा दुख, कैसी पीड़ा! सब समाप्त हो गया। शून्य भीतर रह गया। और न मालूम इसी राख के ढेर ने कितने सपने देखे! न मालूम क्या-क्या सोचा, बनाया, बिगाड़ा! अब? अब मिट्टी हो चुके हैं!
जो मिट सकता है, वही प्रभु को पा सकता है। जो मिटने में असमर्थ है, वह उसे पाने का पात्र भी नहीं है। प्रभु के चरणों में यही समर्पित करना है--अपनी ही राख, अपनी ही मृत्यु, अपना ही मिट जाना और उसके द्वार खुल जाते हैं...रूप तो मिट गया अब अरूप रह गया है। आकार तो मिट गया, अब निराकार रह गया है। देह तो मिट गई, आत्मा रह गयी है।
अब धीरे-धीरे आंख खोल लें, फिर तीसरा प्रयोग समझें और पांच मिनट के लिए तीसरा प्रयोग करें।
पहला प्रयोग है, बहने का अनुभव। दूसरा प्रयोग है, मरने का अनुभव। और तीसरा प्रयोग है तथाता। तीसरा प्रयोग सबसे गहरा प्रयोग है। उसे ठीक से समझ लेना जरूरी है। तथाता का अर्थ है--चीजें जैसी हैं वैसी हैं। हमें उनसे कोई विरोध नहीं। पक्षी आवाज कर रहे हैं, कर रहे हैं। धूप गर्म है। हवायें चलती हैं और ठंड मालूम पड़ती है। जिंदगी जैसी है, वैसी हमें स्वीकार है। न हम उसमें कोई बदलाहट करना चाहते हैं, न कोई हेर-फेर करना चाहते हैं। हमारा कोई विरोध नहीं, हमारी कोई अस्वीकृति नहीं है। तथाता का अर्थ है थिंग्स आर सच--चीजें ऐसी हैं और हम उनके लिए राजी हैं। तथाता का अर्थ है, परिपूर्ण राजी हो जाना, टोटल एक्सेप्टबिलिटी।
जब हम किसी चीज के लिए पूरी तरह राजी हो जाते हैं तो चित्त की सब अशांति खो जाती है। तब चित्त का सर्व रोग, सब बीमारी, विनष्ट हो जाती है। तब चित्त का सब तनाव समाप्त हो जाता है। हमारे मन का तनाव और अशांति हमारे विरोध से पैदा होती है। हम चाहते हैं, चीजें ऐसी हों। अब एक कौवा आवाज करेगा, एक पक्षी चिल्लायेगा और हम चाहेंगे कि ध्यान कर रहे हैं, पक्षी चुप हों। लेकिन पक्षियों को आपके ध्यान से क्या प्रयोजन? हवायें चलेंगी और हम चाहेंगे हवायें न चलें, थोड़ी देर ठहर जायें। रास्ते पर गाड़ियां निकलेंगी, आवाज होगी, हार्न बजेगा और हम चाहेंगे, यह सब बड़ी बाधा, बड़ा डिस्टरबेंस, तब फिर ध्यान में आप कभी भी न जा सकेंगे।
जिंदगी आपके लिए ठहर नहीं सकती है। जिंदगी चलेगी, चलती रहेगी। फिर क्या रास्ता है? जो लोग भी ध्यान करने बैठते हैं, उनकी परेशानी यह है कि कभी कोई रास्ते पर हार्न बजा देता, कभी कोई बच्चा रोने लगता, कभी कोई कुत्ता आवाज करने लगता, कभी कोई सड़क पर झगड़ा हो जाता, उनकी मुसीबत यह है कि 'डिस्टरबेंस' हो जाते हैं। लेकिन मैं आपसे कहना चाहता हूं कि अगर तथाता की बात समझी तो इस दुनिया में डिस्टरबेंस जैसी चीज है ही नहीं। तथाता का मतलब है, जो हो रहा है, हमें स्वीकार है। डिस्टरबेंस का सवाल कहां है? 'डिस्टरबेंस' तो तब होता है, दिल में बाधा तब होती है, जब हम कहते हैं, ऐसा न हो और होता है, तब परेशानी होती है।
लेकिन हम कहते हैं, जैसा हो रहा है वैसा हो रहा है, हम राजी हैं। हार्न बजता है तो हम सुनने को राजी हैं। बच्चा रोता है तो हम सुनने को राजी हैं। पक्षी चिल्लाते हैं तो हम सुनने को राजी हैं। हमारा कोई विरोध ही नहीं। हम इस जीवन में एक विरोधी की तरह खड़े नहीं होते हैं। हम इस जीवन को एक मित्र की तरह स्वीकार कर लेते हैं। स्वीकृति का भाव ध्यान की गहरी से गहरी बात है। और जो व्यक्ति सब स्वीकार कर लेता है, वह व्यक्ति सबसे मुक्त हो जाता है। जहां तक हमारा विरोध है, वहां तक हमारा बंधन है। जहां तक हम अकड़े हैं, वहां तक हमारी मुसीबत है। जहां तक हम कह रहे हैं, ऐसा हो, ऐसा न हो, वहां तक परेशानी है। लेकिन जब हम कहते हैं, जैसा हो रहा है, वैसा हो रहा है, हमें स्वीकार है, हम राजी हैं, हम भी उसी के एक हिस्से हैं, तब फिर सब विरोध खो जाता है।
तथाता ध्यान का केंद्र है। जो है, हम उसके वैसे होने से पूरे राजी हैं। हम उससे अन्यथा की न मांग करते हैं, न आकांक्षा करते हैं। पक्षी हैं, चिल्लायेंगे ही; पत्ते हैं, हिलेंगे ही; आवाज करेंगे ही, शोरगुल होगा। हम स्वीकार करते हैं। तथाता का अर्थ है--हमें सब स्वीकार है, कोई विरोध नहीं। और जब कोई विरोध न हो तो अशांति कहां, बाधा कहां, तब कोई भिन्न कहां? और जब कोई विरोध न हो तो चित्त एकदम विलीन हो जाता है, वह शून्य हो जाता है। विरोध में ही हम खड़े होते हैं और मजबूत होते हैं। विरोध में ही अहंकार निर्मित होता है। जितना मैं कहता हूं, ऐसा नहीं, ऐसा नहीं, ऐसा नहीं, उतना ही मैं मजबूत होता चला जाता हूं। जब मैं कहता हूं, जैसा है, है, ऐसा ही सही, ऐसा ही सही, ऐसा ही सही तो 'मैं' के खड़े होने का उपाय कहां!
जीवन जैसा है, अगर स्वीकृत है तो अहंकार के बनने का उपाय नहीं। अस्वीकार से आता है अहंकार, निर्मित होता है, घना होता है, मजबूत होता है। जब मैं कहता हूं--पत्ते ऐसे न हों, चांद ऐसा न हो, हवाएं ऐसी न हों, पक्षी आवाज न करें, रास्ते पर सन्नाटा हो, तब मैं यह कह रहा हूं कि मेरी आज्ञा से सब चलें। मैं सब के ऊपर बैठ जाऊं, मैं मालिक हो जाऊं। लेकिन जब मैं यह कह रहा हूं--जो जैसा चले, धन्यभाग; जो जैसा चले, स्वीकार; जो जैसा चले, आभार है; जो जैसा है, कृतज्ञ हूं; जो जैसा चल रहा है, ठीक है; तब मैं अपने को थोपता नहीं। तब मैं विदा हो जाता हूं। तब मैं सबके साथ एक हो जाता हूं।
तथाता का अर्थ है--सर्व स्वीकृत--टोटल एक्सेप्टेंस, जो है, वैसा ही स्वीकार है। और अगर पांच मिनट भी सब स्वीकार किया तो हैरान हो जायेंगे कि मन कैसी शांति के नये लोकों में प्रवेश कर जाता है। सबके लिए राजी होने से सबके प्रति प्रेम बहना शुरू हो जाता है।
तीसरे प्रयोग की गहरी दिशा में अब एक ही हो जाना है उस सब से, जो है। पक्षियों की आवाजें हैं, वे पक्षियों की ही नहीं, हमारी ही आवाजें हो जायेंगी। और हवायें बह रही हैं, उनके झोंके पत्तों को हिला रहे हैं, वे हवाएं न रहेंगी, वे हम ही हो जायेंगे। और पत्ते हिल रहे हैं; सूरज की धूप में चमक रहे हैं; हवाओं में नाच रहे हैं--वे पत्ते न रह जायेंगे, वे हम ही हो जायेंगे। जो भी है, उसके साथ हम एक हो जायें।
कैसे एक हो सकते हैं? स्वीकार से। अगर सब हमें स्वीकार हो जाये तो हमारा भेद गिर जाता है।
अद्वैत को वही उपलब्ध होता है, अभेद को वही उपलब्ध होता है, जो सर्व स्वीकार को उपलब्ध हो जाता है। जिससे हम विरोध करते हैं, उससे हम टूट जाते हैं। जिससे हमारा विरोध नहीं, उससे हम जुड़ जाते हैं। जिसे हम इनकार करते हैं, उसके हमारे बीच सीमा खिंच जाती है। अगर हम सर्व और अपने बीच कोई सीमा न खींचें, कोई भेद-रेखा न खींचें, कोई विरोध न बांधें, तो सर्व और हमारे बीच न कोई रेखा है, न कोई भेद है, न कोई विरोध है। हमारा खींचा हुआ विरोध है, हमारी खींची हुई रेखा है। उस रेखा को हम अभी पोंछ डाल सकते हैं।
ध्यान के तीसरे प्रयोग में उस रेखा को बिलकुल पोंछ डालना है। तब ऐसा अनुभव नहीं करना है कि मैं यहां हूं और वहां पक्षी आवाज कर रहे हैं। ना, जो आवाज कर रहा है पक्षियों में, वही यहां सुन भी रहा है। विरोध कैसा! किसका विरोध? मैं ही आवाज कर रहा हूं, मैं ही सुन रहा हूं। सर्व स्वीकार से--ऐसी प्रतीति होनी शुरू हो जाती है। ट्रेन के पहियों की आवाज, उसकी सीटी का शोर, वह हमारे भीतर ही उठता हुआ मालूम पड़ेगा। ऐसा लगेगा, हम फैलकर बहुत बड़े हो गये हैं। सारे जगत को घेर लिया और सब हमारे भीतर ही हो रहा है। 'थिंग्स आर सच' चीजें ऐसी हैं, और हमने उन्हें स्वीकार कर लिया--हमारा कोई विरोध नहीं।
एक फकीर के पास एक आदमी गया था। और उस फकीर से उसने कहा कि आप तो बहुत शांत हैं और मैं बहुत अशांत हूं, तो मुझे शांत होने का रास्ता बता दें। उस फकीर ने कहा रास्ते की क्या जरूरत है? मैं शांत हूं, तुम अशांत हो। मैं अपनी शांति में राजी हूं, तुम अपनी अशांति में राजी हो जाओ। उस आदमी ने कहा, मैं कैसे राजी हो जाऊं? मैं अशांत हूं, मुझे अशांति मिटानी है। उस फकीर ने कहा, जब तक मिटाना है, तब तक तुम शांत न हो सकोगे। अपनी अशांति में राजी हो जाओ, फिर देखो अशांति बचती है या नहीं बचती! अगर कोई अपनी अशांति में राजी हो जाये तो अशांति फिर कहां है? अशांति तो नाराजी में थी, अशांति तो विरोध में थी, अशांति तो इस बात में थी कि नहीं, ऐसा नहीं होना चाहिए, अशांति नहीं होनी चाहिए, मुझे शांत होना है। उस आदमी ने कहा, आप ठीक कहते हैं, लेकिन मुझे शांत होना है। उस फकीर ने कहा, फिर तो तुम न हो सकोगे। और मैं तो कभी तुम्हारे पास पूछने न आया था कि तुम बड़े अशांत हो, मैं बड़ा शांत हूं तो मुझे अशांत होना है। मैं किसी के पास पूछने नहीं गया था। मैं जैसा था, मैं वैसे ही राजी हो गया और फिर मैं शांत हो गया। शांति परिणाम है, हम जैसे हैं, वैसे ही राजी होने का अंतिम फल है। शांत कोई भी नहीं हो सकता। जो जो है, वैसा ही होने को राजी हो जाये, शांति पीछे चली आती है छाया की तरह।
उस आदमी ने कहा, फिर भी मेरी समझ में नहीं आता। उस फकीर ने उसका हाथ पकड़ा और मकान के बाहर ले आया। वहां आकाश को छूता हुआ एक बड़ा दरख्त था। ऊपर चांद निकला है, ऊपर आकाश तक उठ गया है वृक्ष और पास में ही एक छोटा-सा पौधा भी है। उस फकीर ने कहा, देखते हो उस दरख्त को? उस आदमी ने कहा, हां, देखता हूं, बहुत बड़ा है। आकाश को छूता है। और उस फकीर ने कहा, देखते हो इस छोटे-से पौधे को? उसने कहा, हां, देखता हूं, बड़ा छोटा है बेचारा! उस फकीर ने कहा, बीस साल से मैं यहां हूं, लेकिन मैंने इस छोटे पौधे को बड़े दरख्त से कभी पूछते नहीं देखा कि तू बहुत बड़ा है, मैं बहुत छोटा हूं, मैं बड़ा कैसे हो जाऊं? मैंने इनके बीच कभी चर्चा नहीं सुनी है। छोटा अपने छोटे होने में राजी है और इसलिए छोटा नहीं रह गया। क्योंकि छोटा तो वह तभी मालूम पड़ सकता है, जब वह छोटे होने को राजी न रह जाये और बड़े की कामना करने लगे। बड़ा अपने बड़े होने में राजी है इसलिए बड़ा नहीं है; क्योंकि बड़े का कोई सवाल नहीं है। किसी से उसने तुलना ही नहीं की है।
वह फकीर कहने लगा, यह छोटे में राजी है, वह बड़े में राजी है, दोनों बड़े मजे में हैं। छोटा, छोटा है। बड़ा, बड़ा है। कोई झंझट नहीं, कोई झगड़ा नहीं, कोई तुलना नहीं, कोई अशांति नहीं। उस आदमी ने कहा, लेकिन, फिर भी नहीं समझा मैं। तो उस फकीर ने कहा कि तू अपनी नासमझी में ही राजी हो जा। अब तू समझने की भी कोशिश मत कर। जा और समझ ले कि मेरी समझ में नहीं आता और इसके लिए राजी हो जा।
तथाता का मतलब है, अज्ञान के लिए भी, अशांति के लिए भी, जो भी हमारे भीतर-बाहर है--सबके लिए राजी हैं। एक पांच मिनट के लिए अविरोध का प्रयोग करें, स्वीकार के भाव में डूब जायें। यह भी स्वीकार है, वह भी स्वीकार है। अविरोध के भाव में लीन हो जायें। श्वास-श्वास में रोयें-रोयें में स्वीकार की भावना भर जाये, तो पांच मिनट में आप पायेंगे, ऐसे आनंद के स्रोत खुल गये हैं, जो बिलकुल अपरिचित थे--ऐसे द्वार खुल गये हैं, जो सदा बंद थे--और ऐसी शांति बह गई चारों तरफ, जिसे हमने कभी न जाना था।
तो तीसरा प्रयोग पांच मिनट करें और फिर चौथा प्रयोग ध्यान का होगा। इन तीनों के जोड़ से ध्यान निकलेगा। तथाता का तीसरा प्रयोग करें। आंख बंद कर लें, शरीर को ढीला छोड़ दें। आंख को बंद हो जाने दें और शरीर को ढीला छोड़ दें। शरीर के ढीले होने का मतलब है, हम अपने चारों तरफ से एक हो गये, अलग न रह गये। अब जो कुछ भी हो रहा है, उसे चुपचाप अनुभव करते रहें, जानते रहें; विरोध न लें। गाड़ी आवाज करती है, पक्षी गीत गाते हैं, सब स्वीकार कर लें। जो भी हो रहा है, हो रहा है, हम राजी हैं--इसको भीतर मन में घूम जाने दें। हम राजी हैं, जो भी हो रहा है। हमारा कोई विरोध नहीं। जो भी हो रहा है, जो भी हो रहा है, हम राजी हैं। और बाहर ही नहीं, भीतर भी राजी हैं। अगर पैर शून्य हो गया, अगर पैर को चींटी काटती है, हम उसके लिए भी राजी हैं। हमारा कोई विरोध नहीं है। बाहर भीतर सब तरफ राजी हैं।
एक पांच मिनट के लिए तथाता की स्थिति में अपने को छोड़ दें। धूप पड़ रही है चेहरे पर, पसीना बहने लगे, हम राजी हैं। ठीक है, धूप पड़ेगी, पसीना बहेगा और जब हम राजी होंगे, तब धूप भी बड़ी शीतल मालूम पड़ने लगेगी। देखें, सड़क की आवाज भी बहुत प्रीतिकर मालूम होगी, जब हम राजी हों। जब हम राजी हैं, तब सारा जगत प्रीतिकर अनुभव होने लगता है। और उसी प्रेम के द्वार से परमात्मा का आगमन होता है। जब हम राजी हैं, तब प्रेम और जब प्रेम, तब परमात्मा है।
अब पांच मिनट के लिए मैं चुप हो जाता हूं।
आप राजी हो जायें। सब समग्र रूप से स्वीकार कर लें और फिर देखें मन कैसा शांत हो जाता है, जैसा कभी न हुआ होगा। मन के भीतर शांति के झरने फूट पड़ते हैं, जैसे कभी न फूटे होंगे। एक भीतर प्रकाश छा जाता है। एक आलोक शीतल, एक ठंडी प्रकाश की छाया फैल जाती है। देखें, चुपचाप अनुभव करें। जो है, है और हम राजी हैं। पक्षियो आवाज करो! हवाओ बहो! सूरज तपो! हम राजी हैं...राजी हैं...हम राजी हैं, हम राजी हैं, जो भी है उसके लिए हम राजी हैं--हमारा कोई विरोध नहीं। हम इसे बड़े जगत के एक हिस्से मात्र हैं। इन हवाओं के भी हम हिस्से हैं। इन आवाज करते पक्षियों के भी, इस तपती हुई धूप के भी, सड़क पर होते शोरगुल के भी--हम इस बड़े जगत के एक हिस्से हैं। हिस्सा विरोध कैसे कर सकता है? हमारा कोई विरोध नहीं! हम राजी हैं। हम बिलकुल राजी हैं। छोड़ दें अपने को इस स्वीकृति में। जो भी हो रहा है, ठीक है, शुभ है। जो भी हो रहा है, सुंदर है। जो भी हो रहा है, हम राजी हैं, हमारा कोई विरोध नहीं। और देखें, मन कैसा मौन होता चला जाता है। और देखें, भीतर कैसा नया प्रकाश फैलने लगता है। और देखें, मन कैसी शांति से भरता चला जाता है...ट्रेन की आवाज कैसी प्रीतिकर है। पक्षियों की आवाजें हैं, हवाओं की आवाज है...वृक्ष का, पत्तों का हिलना--सब स्वीकार है! जीवन जैसा है, स्वीकृत है। स्वीकार...स्वीकार...समग्र स्वीकार...जो भी है, स्वीकृत है। और जैसे ही स्वीकार होता है हम समस्त के एक हिस्से मात्र हो जाते हैं। फिर सूरज अलग नहीं, पक्षी अलग नहीं, वृक्ष अलग नहीं, पृथ्वी अलग नहीं, आकाश अलग नहीं, कोई अलग नहीं, सब जुड़ गया, सब एक हो गया। हम सबके साथ एक हो जाते हैं। छोड़ दें...सब स्वीकार कर लें...फिर धूप अलग नहीं, वृक्षों की हलचल अलग नहीं, यह पक्षियों की आवाज अलग नहीं, अब सब एक हैं। यह जो विराट का सागर है उसमें लीन हो जायें--एक हो जायें।
ठीक से अनुभव कर लें तथाता को, इस स्वीकृति को, इस राजी होने को। यह ध्यान का तीसरा चरण है। ठीक से पहचान लें, क्या अर्थ है स्वीकार का। देखें...भीतर कहीं कोई विरोध तो नहीं। देखें, भीतर कहीं किसी चीज को इनकार करने का भाव तो नहीं। देखें कहीं किसी चीज के कारण भीतर वहम और बाधा तो नहीं बनती! अनुभव कर लें, सब स्वीकृत है, सब स्वीकृत है, जो हो रहा है, स्वीकृत है। अस्वीकार है ही नहीं। तथाता ध्यान की आत्मा है, प्राण है। स्वीकार करते ही शांति का द्वार खुलता है। जगत से कोई विरोध नहीं; क्योंकि हम जगत के ही हिस्से हैं। विरोध कैसा! दुश्मनी कैसी! शत्रुता कैसी! और तब प्राणों का बाहर के प्राणों से मिलन हो जाता है। छोड़ दें। भाव उठेगा, विचार चलेगा, स्वीकार...स्वीकार...श्वास-श्वास में एक ही निवेदन--सब स्वीकार है...रोयें रोयें में एक ही प्रार्थना, एक ही पुकार--सब स्वीकार है...मन गहरे अर्थों में शून्य होता जा रहा है। सीमायें गिर जायेंगी और सब एक हो जायेगा देखें--भीतर कोई विरोध तो नहीं, कोई अस्वीकृति तो नहीं है। हो, तो विदा कर दें। हम समग्र के लिए पूर्ण राजी हैं। श्वास-श्वास शांत हो गयी। देखें--भीतर एक सन्नाटा छा गया है।
अब गहरी श्वास लें और धीरे-धीरे आंख खोल लें फिर ध्यान का प्रयोग समझें और फिर हम अंतिम प्रयोग ध्यान का करेंगे।
ये तीन प्रयोग समझने के लिए किये। ये तीन चरण हैं ध्यान के। पहला प्रयोग है बह जाने का। प्रयोग हमने इसलिए किये, ताकि शायद शब्द से समझ में न आये तो अनुभव से समझ में आ जाये, इसलिए कल्पना की। तैरने और बहने के विरोध को समझ लिया होगा। तैरना एक अहंकार है, बह जाना समर्पण है। दूसरा प्रयोग हमने किया मिट जाने का, समाप्त हो जाने का। अगर कोई बूंद, बूंद ही रहना चाहे तो फिर सागर को नहीं जान सकती। बूंद को सागर को जानना है तो मिटना पड़ेगा। लेकिन बूंद सागर में खोकर मिटती नहीं है, सागर हो जाती है। छोटे से और विराट हो जाते हैं। असल में छोटे हम हैं। अगर बड़े को जानना हो तो मिटना पड़ेगा। छोटा होना मिटे तो ही बड़ा होना हो सकेगा। क्षुद्र हम हैं, सीमा में बंधे हम हैं। सीमायें टूटें तो ही हम असीम हो सकें। लेकिन हम सब अपने को बचाने में लगे हैं।
ध्यान की दूसरी कड़ी है, अपने को बचाना नहीं; छोड़ देना, मिट जाना, समाप्त हो जाना है। निश्चित ही जो मिट सकता है, वही मिटेगा। जो नहीं मिट सकता है, वह नहीं मिटेगा। और हमारे भीतर दोनों हैं, वह भी जो मिट सकता है, वह भी जो नहीं मिट सकता है। जो मिट सकता है, वह मिटेगा ही। हम चाहें, चाहे न चाहें। जो नहीं मिट सकता है, वह हम चाहें तो भी नहीं मिट सकता है। वह रहेगा, रहेगा। तो दूसरा प्रयोग हमने किया चिता पर चढ़ जाने का, जल जाने का, राख हो जाने का। ध्यान में बहुत जरूरी है; क्योंकि मिटना पड़ेगा, मरना पड़ेगा। ध्यान स्वेच्छा से लाई गई मृत्यु का नाम है। तीसरा प्रयोग हमने किया तथाता का। तथाता का अर्थ है--चीजें जैसी हैं, उनकी स्वीकृति। और यदि कोई स्वीकार कर ले तो फिर अशांत ही नहीं हो सकता है।
अशांति आती है अस्वीकार से। तनाव आता है अस्वीकार से। हमारी जिंदगी में सब चिंता और परेशानी आती है अस्वीकार से।
एक बैलगाड़ी जाती है, एक शराबी बैठा हुआ है। साथ में आप भी बैठे हुए हैं और बैलगाड़ी उलट जाये तो ध्यान रखना, आपको चोट लगेगी शराबी को चोट नहीं लगेगी। और बड़े मजे की बात है कि चोट शराबी को लगनी चाहिए थी; क्योंकि शराबी पीये हुए था। हमें क्यों चोट लग गयी? हम तो शराब पीये हुए न थे। लेकिन गाड़ी उलटे तो शराबी बच जाये और आपको चोट लग जाये! शराबी सब स्वीकार कर लेता है; क्योंकि होश ही नहीं है विरोध करने को। वह गिरता है पूरी तरह गिर जाता है। गिरने से भी बचने का भाव नहीं होता। जो होश में है, वह बचेगा। गाड़ी उलटेगी तो तन जायेगा, बचने की चेष्टा में लग जायेगा। हड्डियां खिंच जायेंगी, सजग हो जायेगा, तनी हुई हड्डियां चोट खा जायेंगी और टूट जायेंगी। शराबी रोज सड़क पर गिरता है चोट नहीं खाता; पर आप गिरें तो मुश्किल में पड़ जायें। रोज बच्चे गिरते हैं और चोट नहीं खाते हैं; हम गिरें तो हड्डियां टूट जायें। बच्चे गिरने को भी स्वीकार कर लेते हैं तो शरीर उसमें भी राजी हो जाता है। और जब कोई गिरने को भी राजी हो जाये तो फिर चोट लगनी बहुत मुश्किल हो जायेगी। उसके राजी होने के कारण विरोध बंद हो जाता है।
जिंदगी को स्वीकार के भाव से जो लेता है, जिंदगी उसे चोट नहीं पहुंचा पाती और जो जिंदगी का विरोध करता है, उसे जिंदगी बहुत चोट पहुंचा जाती है, बहुत घाव कर जाती है, बहुत अल्सर बना देती है। जिंदगी को जो पूरी तरह स्वीकार कर लेता है, जैसी जिंदगी आती है, द्वार खोलकर राजी हो जाता है, उसे जिंदगी कभी चोट नहीं पहुंचा पाती है।
इसलिए तीसरा प्रयोग है, स्वीकार का। क्योंकि परमात्मा को जानना है अगर तो जीवन को पूरी तरह स्वीकार करके ही तो जान सकेंगे। जिसे हम अस्वीकार करते हैं, उससे हमारी दुश्मनी हो जाती है। जिसका हम विरोध करते हैं, उसके लिए हमारे द्वार बंद हो जाते हैं। अस्वीकार से हमारा चित्त बंद, 'क्लोज्ड' हो जाता है। फिर वह खुलता नहीं है। लेकिन जब हम स्वीकार कर लेते हैं तो सब खुल जाता है। उस खुले मन में ही अवतरण होता है, वही द्वार बनता है। इसलिए तीसरा चरण है तथाता--सर्व स्वीकृति।
बहने का भाव, मिट जाने का भाव, सर्व स्वीकृति का भाव--ये तीन ध्यान के चरण हैं। इन तीनों को हमने अलग-अलग करके देखा और समझा। अब हम इन तीनों भावनाओं का इकट्ठा प्रयोग ध्यान में करेंगे। इस इकट्ठे प्रयोग में 'बहने के', 'मिटने के', 'जो है, है'--इसके स्वीकार के गहरे परिणाम होंगे। शरीर गिर सकता है, शरीर झुक सकता है। उसे फिर सम्हालकर बैठेंगे तो वहीं अटक जायेंगे। उसे सम्हालना नहीं है, गिरता हो गिर जाये। और घबराना नहीं है कि चोट लग जायेगी। चोट कभी भी न लगेगी जब शरीर अपने आप गिरता है तो चोट नहीं लेता है। चोट का सवाल ही नहीं है। उसे सम्हालकर अगर बैठेंगे तो फिर उतना 'रेजिस्टेंस' उतना विरोध शुरू हो जायेगा--फिर उतनी स्वीकृति न रही। आंख से आंसू बह सकते हैं। मन एकदम हलका होगा, आंख के आंसू गिर जायेंगे। उनको भी रोक लिया तो तकलीफ हो जायेगी। किसी को रोना भी आ सकता है तो उसे भी रोकने की जरूरत नहीं। उन पंद्रह मिनटों के लिए, जो भी हो, हो, हमें उससे कोई बाधा नहीं। और कुछ भी निकल जायेगा तो अच्छा है। भीतर बहुत शांति और हलकापन छूट जायेगा।
अब हम चौथे प्रयोग के लिए बैठें।
ध्यान के प्रयोग में बैठने के पहले और मैं चाहूंगा कि आप थोड़े दूर-दूर हट जायें, ताकि--अब पूरा ही छोड़ना पड़ेगा शरीर को, वह गिर भी सकता है--गिर जाये तो चिंता नहीं लेनी है। अगर उसे रोकने में लग गए तो वहीं अटक जायेगा बिलकुल। वह गिरता हो तो गिर जाये। इसलिए अब थोड़े फासले पर हट जायें। कुछ और मित्र आगे हैं, वे वहां जो खुली जगह है, वहां थोड़े हट जायें चुपचाप बिना आवाज किये, ताकि कोई गिरे तो किसी के ऊपर न गिर जाये, या किसी को अपने को सम्हालना न पड़े। और वहां कुछ मित्र पीछे बैठे हैं, अगर उनको प्रयोग न भी करना हो, तो कम से कम बातचीत न करें। वहां पीछे बात न करें और थोड़ा दूर हटकर बैठें। कोई लेटना चाहे तो पहले ही चुपचाप किसी कोने में जाकर लेट सकता है। आंख बंद कर लें, शरीर को ढीला छोड़ दें।
और मैं थोड़ी देर सुझाव देता हूं। मेरे साथ अनुभव करें, ताकि शरीर पूरा-पूरा ढीला छूट जाये। मैं सुझाव देता हूं कि शरीर शिथिल हो रहा है और शरीर को शिथिल छोड़ते जायें, छोड़ते चले जायें। चाहे वह झुके तो झुक जाये, गिरे तो गिर जाये आप रोककर मत रखें। शरीर शिथिल हो रहा है, ऐसा भाव करें। शरीर शिथिल हो रहा है...अनुभव करें, छोड़ दें, जरा भी पकड़ें नहीं। शरीर बिलकुल शिथिल होता जा रहा है। जैसे उसमें कोई प्राण ही न हों। छोड़ें, नदी में बह गये थे, ऐसा शिथिल छोड़ दें। शरीर शिथिल होता जा रहा है। एक-एक अणु ढीला और शिथिल होता जा रहा है। छोड़ते जायें ढीला, शरीर शिथिल हो रहा है। धीरे-धीरे शरीर बिलकुल शिथिल हो जायेगा, पता होगा जैसे है ही नहीं। छोड़ दें, झुकता हो झुक जाये, गिरता हो गिर जाये। शरीर बिलकुल शिथिल होते-होते भीतर एक गहरी शांति छा जायेगी। छोड़ दें शिथिलता में, जैसा नदी में छोड़ा था बह जाने को। एक-एक अंग ढीला छोड़ते जायें। भाव करते-करते शरीर बिलकुल मिट्टी की तरह ढीला और शिथिल हो जायेगा। गिर जाने दें शिथिलता की नदी में, बह जायें। शरीर शिथिल हो गया है। छोड़ दें, पकड़ें नहीं। जो होना हो, हो। शरीर पर आप अपनी पकड़ न रखें। शरीर शिथिल छोड़ें।
श्वास शांत होती जा रही है। श्वास को भी छोड़ दें। भाव करें, अनुभव करें, श्वास शांत हो रही है। श्वास धीमी और शांत होती जा रही है। धीरे-धीरे जब मालूम पड़ेगा कि श्वास शांत हो रही है, तो ऐसा ही लगेगा कि मिटे जा रहे हैं, मिटे जा रहे हैं, मिटे जा रहे हैं। जैसा चिता पर मिट्टी का एक ढेर रह गया था। भाव करें, श्वास भी शांत हो रही है। श्वास शांत होती जा रही है। श्वास के शांत होते ही शरीर खो जायेगा। पता ही न चलेगा कि शरीर है भी! ऐसा लगेगा शरीर न रहा और हम रह गये हैं। छोड़ दें, श्वास को शांत होने दें। श्वास शांत हो गयी है। श्वास के शांत होने से शरीर और शिथिल हो जायेगा। शरीर को बिलकुल ढीला छोड़ दें। श्वास को शांत हो जाने दें, वह धीरे-धीरे शांत होते-होते इतनी शांत हो जाती है कि पता नहीं चलता कि कब आई, कब गई! उसकी पहचान ही बंद हो जाती है। जैसे चिता पर चढ़ गये थे और मिट गये थे, ऐसा ही श्वास को मिट जाने दें, शांत हो जाने दें। श्वास ही हमारा आधार बना है अहंकार का। उसे छोड़ दें ढीला, ढीला और ढीला, फिर वह खो जाये, खो जाये। श्वास शांत हो गई है। शरीर शिथिल हो गया है।
और अब तीसरा कदम तथाता का। अब सब स्वीकार में डूब जायें। जो है, है। उसके साक्षी बने रहें। अब तथाता में ठहर जायें। पक्षी आवाज कर रहे हैं, हम सुन रहे हैं। धूप गरम है, हम अनुभव कर रहे हैं। रास्ते पर शोरगुल है, हम उसके ज्ञाता हैं। पैर में दर्द हो रहा है, हम जान रहे हैं। शरीर गिर रहा है, हम पहचान रहे हैं, रोक नहीं रहे हैं। हम कर्ता नहीं, सिर्फ ज्ञाता हैं। शरीर गिरे तो उसे भी जान रहे हैं। शरीर झुके तो उसे भी जान रहे हैं, आंख से आंसू बहने लगें तो उसे भी जान रहे हैं। जो भी हो रहा है, हो रहा है। हम रोकने वाले नहीं, करने वाले नहीं, सिर्फ जान रहे हैं, जान रहे हैं, जान रहे हैं। सब स्वीकार है। और जो भी जान रहे हैं, उससे कोई इनकार नहीं है। अब सब स्वीकार में दस मिनट के लिए छोड़ दें अपने को और धीरे-धीरे सब शून्य हो जायेगा, सब मिट जायेगा, सब खो जायेगा।
उसी शून्य में परमात्मा के पदचाप पहली दफे सुनाई पड़ते हैं। उसका दीया जलता हुआ मालूम पड़ता है। उसकी वीणा का संगीत आता हुआ मालूम पड़ता है। छोड़ दें, सब स्वीकार है और हम सारे जगत से एक होने के करीब पहुंच गए। अब हमें सब स्वीकार है। जो भी चारों तरफ है, इसे जानते रहें, स्वीकार करते रहें। हम सिर्फ द्रष्टा हैं, जान रहे हैं, जान रहे हैं। और धीरे-धीरे भीतर के पर्दे उठ जायेंगे और धीरे-धीरे भीतर के द्वार खुल जायेंगे। ऐसी शांति बरस पड़ेगी, जैसी कभी न जानी हो। ऐसा प्रकाश भीतर छा जायेगा, जो अनजाना है, कभी पहचाना नहीं। ऐसे आनंद के झरने भीतर फूट पड़ेंगे, जो रोयें-रोयें को पुलकित कर जायेंगे, नया कर जायेंगे। छोड़ दें। जान रहे हैं, पहचान रहे हैं। द्रष्टा मात्र हैं, कुछ नहीं कर रहे हैं। सब स्वीकार है। तथाता के भाव में, सर्व स्वीकृति में डूब जायें। जो है, जैसा है, है और हम राजी हैं। पक्षियों का शोरगुल और सब कुछ जो भी हो रहा है, हम उसके जानने वाले साक्षी के अतिरिक्त और कोई भी नहीं हैं। न हमारा कोई विरोध है, न हमें कुछ बदलना है, न हमारी कुछ आकांक्षा है। अब दस मिनट के लिए साक्षी भाव से सर्व स्वीकार में डूब जायें।
और जैसे-जैसे स्वीकृति बढ़ेगी, भीतर झरने फूटने लगेंगे शांति के, आनंद के। नये-नये अनुभव भीतर प्रगट होने लगेंगे। छोड़ दें...साक्षी भाव में, स्वीकार भाव में लीन हो जायें, अब मैं चुप हो जाता हूं...।
साक्षी बने रहें...हवायें बह रही हैं, हम जान रहे हैं। पक्षी आवाज कर रहे हैं, हम जान रहे हैं। वृक्षों के पत्तों में शोरगुल है, हम जान रहे हैं। हम सिर्फ जान रहे हैं और स्वीकार है। हम मात्र ज्ञाता, मात्र साक्षी हैं। देख रहे हैं, जान रहे हैं, पहचान रहे हैं। सब स्वीकृति से धीरे-धीरे भीतर शून्य हो जायेगा। उसी शून्य के मंदिर में प्रभु का साक्षात्कार होता है...। जानते रहें, सुनते रहें, पहचानते रहें। साक्षी मात्र, सर्व स्वीकार से भरें, छोड़ दें, खो जायें, बह जायें--इस होने में, इस अस्तित्व में पूरी तरह लीन हो जायें। हम इसके ही हिस्से हैं। ये हवायें, यह सूरज, ये वृक्ष अलग नहीं हैं हम सब एक हैं। पूरी तरह छोड़ दें। जानते रहें स्वीकार करें। मन धीरे-धीरे शून्य हो जायेगा। उस शून्य मन में आनंद के झरने फूट पड़ेंगे, आनंद की वीणा बजने लगेगी। वहां आनंद का दीया जल जायेगा। बह जायें, मिट जायें, साक्षी मात्र रह जायें, स्वीकृति में खो जायें...और मन एकदम गहरी शांति में उतर जायेगा। गहरी से गहरी शांति भीतर प्रगट हो जायेगी और रोआं-रोआं आनंद से पुलकित हो जायेगा। और एक प्रकाश भीतर भर जायेगा, भीतर का सब अंधेरा टूट जायेगा।
इसी शांति में, इसी प्रकाश में, इसी आनंद में प्रभु का अनुभव उपलब्ध होता है। चारों तरफ उसकी मौजूदगी प्रतीत होने लगती है। तब पक्षी पक्षी नहीं रह जाते; पौधे पौधे नहीं रह जाते; तब हवायें हवायें नहीं रह जातीं; तब सूरज की गरमी, सूरज की गरमी नहीं रह जाती है। तब सब उसी परमात्मा का नृत्य हो जाता है। उसी के पदचाप सुनाई पड़ने लगते हैं। सर्व स्वीकार है और साक्षी मात्र रह जायें, जो भी हो रहा है, हम राजी हैं। हमारा कोई विरोध नहीं। जैसे एक बूंद सागर में खो जाती है, ऐसे हम सर्वस्व में खो जाने को राजी हैं। जैसे कोई नदी सागर में लीन हो जाती है, ऐसे हम इस विराट के सागर में खोने को राजी हैं। खो जायें...बह जायें...मिट जायें...सर्व स्वीकार कर लें और फिर देखेंकैसी आनंद की वीणा बजने लगती है! देखें, कैसे हजार-हजार दीये परमात्मा के प्रकाश के जल जाते हैं! खो गए हैं, मिट गए हैं, लीन हो गए हैं, एक हो गए हैं सबके साथ। मात्र गवाह हैं...मन बड़ी शीतलता और आनंद से भर गया है। मन शांत हो गया है, मन शून्य हो गया है। साक्षी रहें और सब स्वीकार कर लें...आपके आनंद में वृक्ष भी आनंदित, हवायें भी आनंदित, सूरज भी आनंदित। सिर्फ जानते रहें...स्वीकार कर लें...इस सब में खो जायें...।
इसी शांत, आनंद से भरे हुए चित्त में प्रभु की मौजूदगी का पता चलता है। वह चारों तरफ अनुभव होने लगता है--सूरज की किरणें उसकी किरणें हो जाती हैं; हवाओं के झोंके उसके झोंके हो जाते हैं; वृक्षों पर पक्षियों के गीत उसके गीत हो जाते हैं; पक्षियों के शोरगुल में उसकी शोरगुल और पुकार मिल जाती है। उन सब रूपों में उसकी मौजूदगी को अनुभव करें, चारों तरफ वही मौजूद है--सब में वही मौजूद है। धीरे-धीरे गहरी श्वास लें, प्रत्येक श्वास में वही मौजूद है। वही भीतर जाता है, वही बाहर आता है। आंख बंद करके भी वही मौजूद था, आंख खुलते भी चारों तरफ वही मौजूद है। जो भीतर जाता है, उसे बाहर भी अनुभव करें। धीरे से गहरी श्वास लें। प्रत्येक श्वास में गहरी शांति, बहुत आनंद मालूम होगा। जो भी हो रहा है चारों ओर, उसके द्रष्टा मात्र रह गए हैं।
साक्षी होते ही प्राण शांत हो जाते हैं, आत्मा शून्य हो जाती है। साक्षी होते ही वे द्वार खुल जाते हैं, जो प्रभु के मंदिर के हैं। साक्षी रह जायें, बस, साक्षी रह जायें...। मन शांत हो गया है, शांति के फूल खिल गए हैं। मन आनंदित हो गया है, आनंद के झरने फूट पड़े हैं। मन आलोकित हो गया है, मन प्रकाश से भर गया है, परमात्मा के बहुत से दीये जल गए हैं...धीरे-धीरे दो-चार गहरी श्वास लें फिर धीरे-धीरे आंख खोलें। अगर आंख न खुले, तो दोनों आंख पर हाथ रख लें फिर धीरे से आंख खोलें। जो लोग लेटे हैं या गिर गए हैं, वे थोड़ी गहरी श्वास लें फिर बहुत धीरे आहिस्ता से उठें। जल्दी न करें, धीरे उठें, झटके से नहीं।
और इस प्रयोग को रात्रि सोते समय करें, फिर सो जायें, ताकि कल सुबह जब यहां आयें तब रात भर की गहरी शांति से और गहरे प्रयोग में उतर सकें। बिस्तर पर इस प्रयोग को करें, ताकि पूरी रात भीतर मन की गहराइयों में ध्यान की धारा बहती रहे और वही शांति, वही आनंद हमारे भीतर सरकता रहे।
एक छोटी-सी सूचना खयाल में रख लें। पिछले तीन दिनों से आपसे कुछ बोलकर बात कर रहा हूं; लेकिन बहुत कुछ है, जो बोलकर नहीं कहा जा सकता है। बहुत कुछ है, जो मौन में ही कहा जा सकता है। अगर कोई भी मौन होने को राजी हो तो भीतर से भी बहुत कुछ दिया जा सकता है, कहा जा सकता है। तो आज दोपहर साढ़े तीन से साढ़े चार मौन प्रवचन होगा। मैं चुपचाप घंटे भर यहां बैठा रहूंगा। आप भी घंटे भर आकर चुपचाप बैठे रहेंगे और प्रतीक्षा भर करेंगे कि कुछ भीतर आ जाये, आ जाये, आ जाये। कुछ भी नहीं करेंगे। आंख बंद करके लेटना होगा--लेटेंगे; बैठना होगा--बैठेंगे; वृक्ष से टिकना होगा--टिकेंगे, जो जिसकी मौज हो, वैसा चुपचाप आकर साढ़े तीन बजे के पांच मिनट पहले ही यहां पहुंच जायें, ताकि पीछे कोई बाधा न हो। एक घंटे मैं भी आपके पास मौन बैठा रहूंगा। देखें, जो शब्द से नहीं कहा जा सकता है, हो सकता है, मौन से आप तक पहुंच जाये। उस बीच किसी को भी ऐसा लगे कि मेरे पास आना है, तो वह दो मिनट के लिए मेरे पास आकर बैठ जायेगा। फिर चुपचाप उठकर अपनी जगह चला जायेगा। सुबह की हमारी बैठक पूरी हुई।


साधना-शिविर, जूनागढ़; दिनांक १० दिसंबर, १९६९; प्रातः