कुल पेज दृश्य

बुधवार, 5 अप्रैल 2017

जीवन ही है प्रभु-(साधना-शिविर) प्रवचन-01

जीवन ही है प्रभु-(साधना-शिविर)
ओशो
साधना-शिविर, जूनागढ़; दिनांक 09 दिसंबर, 1969; रात्रि.

प्रवचन-पहलो-(प्रभु की खोज)

मेरे प्रिय आत्मन् ,
जीवन के गणित के बहुत अदभुत सूत्र हैं। पहली अत्यंत रहस्य की बात तो यह है कि जो निकट है वह दिखायी नहीं पड़ता, जो और भी निकट है, उसका पता भी नहीं चलता। और मैं जो स्वयं हूं उसका तो स्मरण भी नहीं आता। जो दूर है वह दिखायी पड़ता है। जो और दूर है और साफ दिखायी पड़ता है। जो बहुत दूर है वह निमंत्रण भी देता है, बुलाता भी है, पुकारता भी है।
चांद बुला रहा है आदमी को, तारे बुला रहे हैं। जगत की सीमाएं बुला रही हैं, एवरेस्ट की चोटियां बुलाती हैं, प्रशांत महासागर की गहराइयां बुलाती हैं। लेकिन आदमी के भीतर जो है वहां की कोई पुकार सुनायी नहीं पड़ती।

मैंने सुना है, सागर की मछलियां एक दूसरे से पूछती हैं, सागर कहां है। सागर में ही वे पैदा होती हैं, सागर में ही जीती हैं और सागर में ही मिट जाती हैं। लेकिन वे मछलियां पूछती हैं कि सागर कहां है। वे आपस में विवाद भी करती हैं कि सागर कहां है। मछलियों में ऐसी कथाएं भी हैं कि उनके किन्हीं पुरखों ने कभी सागर को देखा था। मछलियों में ऐसे महात्मा हो चुके हैं जिनकी स्मृतियां रह गयी हैं, जिन्होंने सागर का अनुभव किया था। और बाकी मछलियां सागर में ही जीती हैं, सागर में ही रहती हैं, सागर में ही मरती हैं। और उन पुरखों की याद करती हैं जिन्होंने सागर का दर्शन किया था।
मैंने सुना है, सूरज की किरणें आपस में पूछती हैं दूसरी किरणों से--सच में प्रकाश को देखा है? सुनते हैं कहीं प्रकाश है और सुनते हैं कहीं सूरज है! लेकिन कहां है? कुछ पता नहीं। और किरणों में भी कथाएं हैं उनके पुरखों की, जिन्होंने सूरज को देखा था, और प्रकाश को अनुभव किया था। धन्य थे वे लोग, धन्य थीं वे किरणें, जिन्होंने प्रकाश को अनुभव किया और अभागी हैं वे किरणें जो विचार कर रही हैं, और दुखी हैं, और पीड़ित हैं, और परेशान हैं।
मछलियों की बात समझ में आ जाती है, बड़ी पागल हैं। और किरणों की बात भी समझ में आ जाती है कि बड़ी पागल हैं, लेकिन आदमी की बात आदमी को समझ में नहीं आती कि हम भी बड़े पागल हैं। ईश्वर में ही जीते हैं, ईश्वर में ही जन्म लेते हैं, ईश्वर में ही श्वास-श्वास है, ईश्वर में ही मृत्यु है, ईश्वर में ही उठना है, उसमें ही विलीन हो जाना है। और हम खोजते हैं और पूछते हैं ईश्वर कहां है? और हम उन पुरखों को याद करते हैं जिन्होंने ईश्वर का दर्शन किया। और हम उन लोगों की मूर्तियां बनाकर मंदिरों में स्थापित किये हैं जिन्होंने ईश्वर को जाना। फिर मछलियों पर हंसना ठीक नहीं है। फिर मछलियों पर व्यंग्य करना ठीक नहीं है। फिर मछलियां भी ठीक ही पूछती हैं कि सागर कहां है?
स्वाभाविक ही है, मछलियों को सागर का पता न चलता हो। क्योंकि जिससे हम कभी बिछुड़ते ही नहीं उसका पता ही नहीं चलता। अगर कोई आदमी जन्म से ही स्वस्थ हो मरने तक तो उसे स्वास्थ्य का कभी भी पता नहीं चलेगा। स्वास्थ्य का पता चलने के लिए बड़ी दुर्भाग्य की बात है कि बीमार होना जरूरी है। स्वास्थ्य से टूटें, अलग हो जायें, तो ही स्वास्थ्य का पता चलता है।
 और मैंने तो सुना है, और भगवान न करे कि वह बात आपके संबंध में भी सच हो। मैंने सुना है कि बहुत से लोग जब मरते हैं तभी उनको पता चलता है कि वे जीते थे। क्योंकि जब तक मरें नहीं तब तक जीवन का कैसे पता चल सकता है। जीवन के गणित का पहला रहस्यपूर्ण सूत्र यह है कि यहां जो सबसे ज्यादा निकट है वह दिखायी नहीं पड़ता। यहां जो उपलब्ध ही है उसका पता ही नहीं चलता। जो दूर है उसकी खोज चलती है। जो नहीं मिला है उसके लिए हम तड़फते हैं और भागते हैं, दौड़ते हैं। और जो मिला ही हुआ है उसे भूल जाते हैं क्योंकि उसे याद करने का मौका ही नहीं आता है।
परमात्मा का अर्थ--प्रभु का अर्थ है--वह जिससे हम आते हैं और जिसमें हम चले जाते हैं। कोई नास्तिक भी ऐसे प्रभु को इनकार नहीं कर सकता, क्योंकि निश्चित ही हम कहीं से आते हैं और कहीं चले जाते हैं। सागर पर लहर उठती है, और फिर वापस सागर में खो जाती है। तो लहर जहां से आती है और जहां खो जाती है वह भी तो होगा ही; और जब लहर नहीं थी तब भी था और जब लहर थी तब भी था और जब लहर नहीं रह जायेगी तब भी होगा। तभी तो लहर उससे उठ सकती है और उसी में खो सकती है। नास्तिक भी यही कह सकता कि हम कहीं से आते हैं और फिर कहीं खो जाते हैं। और भी एक बात ध्यान रख लेने की है कि जहां से हम आते हैं वहीं हम खो जाते हैं। और कहीं खोयेंगे भी कैसे। लहर सागर से ही उठेगी तो सागर में ही तो विलीन होगी। और तूफान और आंधियां हवाओं में उठेंगी तो हवाओं में ही तो बिखर जायेंगी। और वृक्ष मिट्टी में पैदा होंगे, फूल खिलेंगे तो फिर बिखरेंगे कहां? खोयेंगे कहां? वापस मिट्टी में गिरेंगे और खो जायेंगे।
जीवन का दूसरा सूत्र आपको कहना चाहता हूं--जीवन के गणित का--वह यह है कि जहां से हम आते हैं, वहीं हम वापस लौट जाते हैं। उसको क्या नाम दें, जहां से हम आते हैं और जहां हम वापस लौटे जाते हैं? कोई नाम काम चलाने के लिए दे देना जरूरी है। उसी को प्रभु कहूंगा, जहां से हम आते हैं और जहां हम लौट जाते हैं। इसलिए मेरे प्रभु से किसी का भी झगड़ा नहीं हो सकता इस जमीन पर। न कभी हुआ है, न हो सकता है। क्योंकि प्रभु से मैं इतना ही मतलब ले रहा हूं--द ओरिजनल सोर्स, वह जो मूल आधार है। कहीं से तो हम आते ही होंगे। यह सवाल नहीं है कि कहां से? कहीं से हम आते ही होंगे और कहीं हम खो जाते होंगे। और जहां से आना होता है, वहीं खोना होता है। क्योंकि जिससे हम उठते हैं, उसी में बिखर सकते हैं। हम और कहीं बिखर नहीं सकते। असल में जीवन जिससे हमने पाया है उसी को लौटा देना पड़ता है।
प्रभु मैं उसको कहूंगा, इन आने वाले दिनों में उसकी व्याख्या कर लेनी ठीक है, अन्यथा पता नहीं आप प्रभु से क्या सोचें। उसकी व्याख्या कर लेनी ठीक है। प्रभु मैं उसको कहूंगा--वह जो मूल आधार है, मूल स्रोत है। जहां से सब निकलता है और जहां सब खो जाता है। ऐसा प्रभु कहीं आकाश में बैठा हुआ नहीं हो सकता। ऐसे प्रभु की कोई सीमा नहीं हो सकती। ऐसे प्रभु का कोई व्यक्तित्व नहीं हो सकता, कोई आकृति, कोई रूप, कोई आकार नहीं हो सकता। क्योंकि जिससे सब आकार निकलते हों उसका खुद का आकार नहीं हो सकता है। अगर उसका भी अपना आकार हो तो उससे फिर दूसरे आकार न निकल सकेंगे।
आदमी से आदमी पैदा होता है, क्योंकि आदमी का एक आकार है। और आम के बीज से आम का पौधा पैदा होता है क्योंकि आम का बीज एक आकार है। पक्षियों से पक्षी पैदा होते हैं। सब चीजें अपने आकार से पैदा होती हैं। लेकिन ईश्वर से सब पैदा होता है इसलिए ईश्वर का कोई आकार नहीं हो सकता। वह आदमी के आकार का नहीं हो सकता है।
यह आदमी की ज्यादती है, अन्याय है कि अपने आकार में उसने भगवान की मूर्तियां बना रखी हैं। यह आदमी का अहंकार है कि उसने भगवान को भी अपनी शक्ल में बनाकर रख दिया है। यह आदमी का दंभ है कि वह सोचता है भगवान भी होगा तो उसे आदमी जैसा ही होना चाहिए। फिर आदमी भी बहुत तरह के हैं, इसलिए बहुत तरह के भगवान हैं। चीनियों के भगवान के गाल की हड्डी निकली हुई होगी, नाक चपटी होगी। चीनी सोच ही नहीं सकते, भगवान की नाक और चपटी न हो। और नीग्रो के भगवान के ओंठ बड़े चौड़े होंगे और बाल घुंघराले होंगे और शक्ल काली होगी। नीग्रो सोच ही नहीं सकता कि गोरा भी भगवान हो सकता है। गोरा और भगवान? गोरा शैतान हो सकता है। गोरा भगवान कैसे हो सकता है?
बहुत तरह के लोग हैं इसलिए बहुत तरह की शक्लों में भगवान का निर्माण कर लिया है।
आदमियों के बनाये गये इस भगवान के संबंध में मैं कुछ भी नहीं कहूंगा। मैं तो उस भगवान के संबंध में कहूंगा जो किसी का बनाया हुआ नहीं है, अनक्रिएटेड है--जिससे सब बनते हैं और जिसमें सब बिगड़ जाते हैं, लेकिन जो न कभी बनता है और न कभी मिटता है। आदमी अपनी शक्ल में भगवान को बना लेता है। अगर वृक्ष भगवान के संबंध में सोचते होंगे तो भूलकर आदमी की शक्ल में न सोचते होंगे। आदमी तो उनको शैतान मालूम पड़ता होगा। न मालूम कब आकर दरख्तों की शाखाएं काट लेता है और न मालूम कब फल पकने भी नहीं पाते और तोड़ लेता है। वृक्ष अगर सोचते होंगे तो आदमी की शक्ल में शैतान को सोचते होंगे। सारी जमीन से वृक्षों को काट डाला आदमी ने। वृक्ष कभी भी आदमी की शक्ल में भगवान को नहीं सोच सकते। और अगर वृक्षों के नीचे आदमी ने अपनी शक्ल के भगवान बिठा दिये होंगे तो वृक्ष बड़े नाराज होते होंगे कि शैतानों ने अपनी शक्ल भी यहां लगा रखी है। नहीं, वृक्ष के लिए संभव नहीं है कि वह आदमी की शक्ल में भगवान का विचार कर सकें।
सारी दुनिया में भगवान के लिए झगड़ा इसलिए है कि हमने अपनी-अपनी शक्लों में उसे ढाल लिया है। इसलिए आदमी की शक्ल बदलती जाती है तो भगवान की शक्ल भी हमें बदलनी पड़ती है। रोज-रोज उसमें बदलाहट करनी पड़ती है। अगर पांच हजार साल पहले के भगवान को देखें तो उसकी शक्ल और है, उसके ढंग, रीति-रिवाज और हैं। वह पांच हजार साल पहले के आदमी की शक्ल में बनाया गया है। वह पांच हजार साल पहले का भगवान यह कहता है कि अगर कोई एक आंख फोड़ेगा किसी की तो हम उसकी दो आंख फोड़ देंगे। वह पांच हजार साल पहले का भगवान यह कहता है कि अगर किसी ने जरा सी गलती की तो हम नरक की अग्नि में सड़ायेंगे उसको, जलायेंगे उसको। उस दिन किसी ने शक भी नहीं किया कि ऐसा कैसा भगवान है जो इस तरह की बेहूदी बातें बोलता है। असल में आदमी खुद ऐसी बातें उस समय बोल रहा था इसलिए उस पर शक नहीं हुआ। उसे उसने अपनी शक्ल में भगवान को बना लिया।
फिर आदमी की समझ बढ़ी, और ऐसे आदमी हुए जिन्होंने कहा, जीसस ने  जैसे कहा--अगर कोई तुम्हारे गाल पर चांटा मारे तो दूसरा गाल उसके सामने कर देना। जब अच्छे आदमी का यह सबूत बना, अच्छे आदमी के लिए यह प्रमाण और आदर्श बना कि कोई तुम्हारे गाल पर चांटा मारे तो दूसरा गाल उसके सामने कर देना, तो भगवान को बदलना पड़ेगा अब। क्योंकि अच्छा आदमी जब इतना अच्छा आदमी है कि एक चांटा मारे जाने पर दूसरा गाल कर देता है तो उस भगवान के संबंध में हम क्या सोचें, जो कहता है कि अगर एक आंख किसी ने किसी की फोड़ी तो उसकी दो आंख फोड़ दी जायेंगी। और ईंट का जवाब पत्थर से दिया जायेगा। और नर्क की अग्नि में सड़ाया जायेगा। यह भगवान फिर बहुत कठोर मालूम पड़ेगा। यह तो आदमी से भी गया बीता मालूम पड़ेगा। इसमें क्षमा तो मालूम ही नहीं पड़ती है। यह भगवान, जिसने नर्क को ईजाद किया है, इस आदमी में क्षमा तो मालूम ही नहीं पड़ती है।
फिर हमें भगवान की शक्ल बदलनी पड़ती है। इसलिए हर युग भगवान की शक्ल बदलता है। पुरानी शक्लें आउट आफ डेट हो जाती हैं, पुरानी पड़ जाती हैं। इसलिए नयी शक्ल बनानी पड़ती है।
भगवानों के भी बहुत फैशन रहे हैं दुनिया में। लेकिन कुछ लोग ऐसे हैं कि वे हमेशा पुराने फैशनों से जकड़े रहते हैं। इसलिए दुनिया में इतने धर्म हो गये हैं। वे अलग-अलग युग के फैशन हैं। वे अभी-अभी तक पकड़े रहे हैं, लोगों को पकड़े हुए हैं! इसलिए इतने धर्म हो गये हैं।
लेकिन मैं इन भगवानों की बात नहीं करूंगा, क्योंकि ये कोई भगवान ही नहीं हैं। मैं तो उस प्रभु की बात करूंगा, जो जीवन का मूल स्रोत है। मैं तो उस प्रभु की बात करूंगा, जो जीवन ही है। और जीवन से अलग करके सोचना परमात्मा को, बड़ी भूल है।
असल में हम प्रतीकों में सोचते हैं और प्रतीकों के कारण भूल हो जाती है। पुरानी से पुरानी किताबें यह कहती हैं कि जैसे कुम्हार घड़े को बनाता है ऐसे ही भगवान जगत को बनाता है। असल में जब यह बात कही गयी होगी तब कुम्हार सबसे बड़ा कारीगर रहा होगा। उससे बड़ा कोई कारीगर न रहा होगा। नहीं तो भगवान से कुम्हार की अगर कोई तुलना करता तो झगड़ा-झंझट हो सकता था। जिस समय की यह बात है, कम से कम दस हजार साल पुरानी बात होगी, उस समय कुम्हार सबसे बड़ा वैज्ञानिक, सबसे बड़ा कारीगर--जिसने मिट्टी का घड़ा बना दिया--रहा होगा। हमने भगवान का कुम्हार से तालमेल बिठा लिया। हमने कहा--भगवान कुम्हार जैसा होना चाहिए जो सारी दुनिया को बनाता है, चाक पर चढ़ाता है और दुनिया को रचता है।
असल में संसार शब्द का मतलब भी चाक ही होता है, द ह्वील। संसार का मतलब होता है, कुम्हार का चाक। जैसे कुम्हार घड़े मिट्टी से गढ़ता रहता है, फिर घड़े मिटते जाते हैं, मिट्टी में चले जाते हैं। वह दूसरे घड़े बनाता रहता है। लेकिन इस प्रतीक ने बड़ा नुकसान पहुंचाया। और मनुष्य-जाति को कुछ बुनियादी भूलों में से एक भूल यह पकड़ गयी, इस प्रतीक की। इससे एक खतरा हो गया कुम्हार अलग है और घड़ा अलग है। इससे ऐसा लगा कि संसार अलग है और परमात्मा अलग है। यह प्रतीक खतरनाक सिद्ध हुआ।
नहीं, मैं किसी दूसरे प्रतीक की बात करूं। क्योंकि मुझे यह प्रतीक उचित नहीं मालूम पड़ता। एक आदमी चित्र बनाता है। तो जब चित्रकार चित्र बनाता है तो चित्रकार अलग होता है, चित्र अलग होता है। चित्र बनता जाता है। और चित्रकार अलग होता जाता है। जब चित्र पूरा बन जाता है तो चित्रकार बिलकुल अलग हो जाता है और चित्र की अपनी जिंदगी शुरू हो जाती है। फिर चित्रकार मर जाये तो चित्र नहीं मरेगा और चित्रकार बीमार पड़ जाये तो चित्र बीमार नहीं पड़ेगा। और चित्रकार पागल हो जाये तो चित्र पर कोई असर नहीं पड़ेगा। चित्र का अपना अस्तित्व अलग हो गया। पुराने लोगों ने अब तक परमात्मा और संसार के बीच ऐसा ही संबंध सोचा था कि उसने संसार को बनाया और अलग हो गया। संसार का अपना अस्तित्व है, और वह अलग बैठ गया है। उसे हमें खोजना पड़ेगा कि वह कहां बैठ गया है।
नहीं, मैं कोई दूसरा प्रतीक लेना चाहता हूं, ताकि मेरी बात खयाल में आ सके। एक नृत्यकार, चित्रकार नहीं, एक नाचने वाला एक नर्तक है और नृत्यकार नाच रहा है। जब नृत्यकार नाचता है तो नृत्य और नृत्यकार अलग-अलग नहीं होते। और नृत्यकार अगर रुक जायेगा तो नाच भी रुक जायेगा। नृत्यकार मर जायेगा तो नाच भी मर जायेगा। और ऐसा नहीं है कि नर्तक को घर के बाहर छोड़ आओ और उसके नाच को घर ले आओ। नर्तक और नृत्य एक हैं। चित्रकार और चित्र एक नहीं हैं, कुम्हार और घड़ा एक नहीं हैं। नर्तक और नृत्य एक हैं। इसे थोड़ा समझ लेना कि नर्तक जब नाच रहा है, तब नृत्य है, जब नहीं नाच रहा है तो नृत्य नहीं है। नृत्य को अलग नहीं किया जा सकता।
मेरे लिए प्रभु--मेरे लिए परमात्मा एक नर्तक है, चित्रकार नहीं है, एक कुम्हार नहीं है। सारा जीवन उसका नृत्य है। वह इससे अलग नहीं है। एक क्षण को भी अलग हो नहीं सकता है। हो जाये तो यह नृत्य बंद हो जायेगा।
इसलिए जब हमने पुराने प्रतीक के आधार पर परमात्मा को अलग कर लिया तो हमारी पूरी दिशा बदल गयी उसकी खोज की। और उस खोज के बड़े घातक परिणाम हुए। क्योंकि एक तो वह अलग था नहीं और हमने उसे अलग मानकर अलग खोजना शुरू कर दिया इसलिए उसका मिलना मुश्किल हो गया। वह कभी नहीं मिलेगा। अगर कोई नाचते हुए नृत्यकार को देखकर यह सोचे कि यह तो रहा नृत्य, अब नृत्यकार कहां है? तो मैं नृत्यकार को खोजने जाता हूं। तो वह कभी भी नृत्यकार को नहीं खोज पायेगा, क्योंकि वह नृत्य में ही मौजूद है। वह नृत्य की जो लयबद्धता है, वह उसमें ही मौजूद है। वह जो नृत्य की गति है, वह उसी में मौजूद है। हो सकता है, हमें घुंघरू की आवाज सुनायी पड़ती है और हाथ-पैरों की गति दिखायी पड़ती है और नृत्यकार दिखायी भी नहीं पड़ता क्योंकि नृत्य बहुत तेज है। लेकिन हम कहते हैं कि यह तो नृत्य रहा, नृत्यकार कहां है? तो हम नृत्यकार खोजने निकल जायें, फिर हम कभी नृत्यकार को न खोज पायेंगे। क्योंकि वह वहीं था, नृत्य में, नाच में।
आदमी ने जो प्रतीक चुन लिया एक बार कि परमात्मा अलग और संसार अलग, उससे सब गड़बड़ हो गयी। जो खोजने गये वे खोज न पाये क्योंकि वे खोजते कैसे। जो उसे खोजने गये उन्होंने संसार की तरफ पीठ कर ली फिर खोजने गये क्योंकि उन्होंने कहा संसार तो अलग है भगवान से, हम तो भगवान को खोजना चाहते हैं। तो उन्होंने फूलों पर आंख बंद कर ली; उन्होंने तितलियों पर आंख बंद कर ली; उन्होंने पक्षियों के गीतों पर कान बंद कर लिए; उन्होंने वृक्षों को देखना बंद कर लिया; उन्होंने हवाओं से दोस्ती छोड़ दी; उन्होंने पृथ्वी से संबंध तोड़ लिया; उन्होंने मनुष्यों की तरफ पीठ फेर ली--उन्होंने सब तरफ से अपने को बंद कर लिया। उन्होंने कहा--यह तो संसार है, हम तो भगवान को खोजने जाते हैं। बस वे कहीं खोजने नहीं गये, वे सिर्फ आंख बंद करके मरने लगे। वे आंख बंद करके अपने भीतर खत्म होने लगे और सड़ने लगे। वह था यहीं, सबमें मौजूद था। लेकिन हमने जो सोचा, उसमें भूल हो गयी।
तो एक तो भूल यह हुई कि जो उसे खोजने गये वे उसे खोज न पाये। फिर दूसरी भूल यह हुई कि जो कोई खोजने चला जाये तो मनुष्य का मन अगर खोज ही न पाये, खोज ही न पाये, तो आखिरी मनुष्य के मन के पास एक उपाय है कि जब वह बिलकुल हार जाये; न खोज पाये, न खोज पाये तो वह कल्पना कर ले और पा ले। अगर आप दिन भर भूखे रहे हैं और भोजन नहीं खोज पाये हैं तो रात सपने में भोजन कर लेंगे। एक आदमी किसी को प्रेम करता है और उसे न उपलब्ध कर पाये तो पागल हो जायेगा। और फिर उपलब्ध कर लेगा पागल होकर। फिर वह उसी से बातें करने लगेगा, उसी के साथ जीने लगेगा। फिर सारी दुनिया से उसे मतलब न रहा उसे अपनी प्रेयसी मिल गयी, अपना प्रेमी मिल गया। उसने अब कल्पना कर ली। मनुष्य के मन--मन ने एक सुविधा जुटायी है आदमी को, कि जिसे हम न खोज पायें, उसे भी सपने में जीया जा सकता है।
जो लोग ईश्वर को इस भांति खोजने गये और नहीं खोज पाये, नहीं खोज पाये, फिर उन्होंने अपना कल्पित ईश्वर खड़ा कर दिया। फिर वे उससे बातें करने लगे, उसके साथ खेलने लगे, नाचने लगे, कुछ करने लगे। वे सारी की सारी बातें एकदम विक्षिप्तता की बातें हैं, मन की रुग्णता की बातें हैं, मन के सपनों की बातें हैं। उनसे परमात्मा का कोई संबंध नहीं है।
दूसरा दुष्परिणाम यह हुआ कि जिन लोगों ने खोजबीन की और नहीं पाया, उन्होंने कहा कि ईश्वर है ही नहीं। हम खोजने ही गलत चले गये। हम फिजूल मेहनत में पड़ गये। ईश्वर कहीं है ही नहीं, सब खोज लिया। योग देखा, प्रार्थना देखी, ध्यान देखा, साधना की, तप किया, उपवास किया, कहीं भी नहीं है। उन लोगों ने कहना शुरू किया, ईश्वर है ही नहीं।
इस जगत में दो तरह के धार्मिक लोग हुए--एक, जिन्होंने कल्पना कर ली ईश्वर की। और एक, जिन्होंने इनकार ही कर दिया। ये दोनों बातें महंगी और खतरनाक हो गयी हैं। जबकि ईश्वर यहां मौजूद था, सदा से मौजूद है। नृत्य में नृत्यकार मौजूद है, उसे नृत्य में ही खोजना पड़ेगा। और नृत्य में खोजने का एक ही ढंग है कि हम नृत्य से भागें न। हम नृत्य के प्रति जागें, हम नृत्य को पहचानें। और जितना हम नृत्य को पहचानेंगे और जितना गहरा उसमें प्रवेश करेंगे उतना ही नर्तक उपलब्ध होने लगेगा। धीरे-धीरे नृत्य तो खो जायेगा, नर्तक रह जायेगा।
धीरे-धीरे हम जानेंगे कि नर्तक ही सत्य है--नृत्य तो खेल था, नृत्य तो लीला थी। लेकिन नृत्य में ही छिपा है और बड़ा विराट नृत्य है। और एक बात और खयाल रख लें कि नृत्य कुछ ऐसा है कि हम भी उसके बाहर नहीं हैं, हम भी उस नृत्य के ही हिस्से हैं।
तो मैं दूसरी बात और कहना चाहता हूं, यह मामला कुछ ऐसा नहीं है कि नर्तक को कोई दूसरा खोजने निकला है। मामला ऐसा है कि नर्तक का हाथ ही उत्सुक हो गया है कि मैं जानूं कि नर्तक कहां है। हम भी कुछ अलग अगर नृत्य से होते तो आसानी हो जाती। हम भी नृत्य के हिस्से और भाग हैं। जैसे कि नाचने वाले का हाथ ही पूछने लगे कि नर्तक कहां है? जैसे नाचने वाले का हाथ ही खोजने लगे कि नर्तक कहां है। जैसे नाचने वाले की आंखें ही पूछने लगें कि नर्तक कहां खो गया है? नृत्य तो दिखायी पड़ रहा है, नर्तक कहां है?
हम उसके ही हाथ और उसकी ही आंखें हैं। हम कुछ चाहें तो भी उससे अलग नहीं हो सकते। असल में जिससे हम चाहकर भी अलग नहीं हो सकते वही परमात्मा है।
लोग मुझसे कहते हैं; परमात्मा को कहां खोजें? मैं उनसे कहता हूं, कि पहले मुझे यह बताओ कि तुमने उसे खोया कब और कहां? क्योंकि खोजा उसे जा सकता है जिसे खो दिया हो। परमात्मा को हम खो ही नहीं सकते। उपाय नहीं खोने का, मार्ग नहीं खोने का। हम कैसे खोयेंगे उसे? ज्यादा से ज्यादा हम भूल सकते हैं, खो नहीं सकते। भूलने और खोने में बड़ा फर्क है। हम भूल सकते हैं। भूल तो हम अपने तक को सकते हैं। भूल ही गये हैं।
पिछले महायुद्ध में ऐसा हुआ कि एक आदमी युद्ध के मैदान पर था, चोट खा गया गोली की। बेहोश हो गया और जब होश आया तो अपने को भूल चुका था। उसे अपना नाम याद न रहा। लेकिन सैनिकों को नाम की कोई खास जरूरत भी नहीं होती, उनके नंबर से पता चल जाता है। लेकिन युद्ध में कहीं उसका नंबर भी गिर गया। जब वह लाया गया स्ट्रेचर पर तो उसका नंबर नहीं था। जब वह होश में आया, उससे पूछा तेरा नाम क्या है तो उसने कहा--यही मैं आपसे पूछना चाहता हूं। मेरा नाम क्या है? मैं किसका बेटा हूं, मैं किसका पति हूं, मैं किसका पिता हूं, मैं हूं कौन? मेरा नंबर क्या है? मैं किस रेजिमेंट का हूं? पहले तो लोगों ने समझा मजाक है लेकिन वह मजाक न थी। उसके तो मस्तिष्क को चोट लग गयी थी, वह भूल गया था। फिर तो बड़ी मुश्किल हुई। कोई उपाय न रहा कि कैसे पता लगे कि वह कौन है। न मालूम कितने लोग मर चुके थे। न मालूम कितने लोग युद्ध में खो चुके थे। यह आदमी कौन है, यह है कौन? इसका कैसे पता लगे? फिर किसी ने सुझाव दिया कि इसे गांव-गांव में घुमाया जाये। अपने गांव को शायद यह पहचान ले। उसे गांव-गांव में ले जाया गया। वह स्टेशन पर उतरकर खड़ा हो जाता और देखता रहता और लोगों को देखता, लेकिन उसे कुछ पहचान में न आता। फिर तो थक गये उसे घुमाने वाले। लेकिन एक नगर में, जैसे ही वह स्टेशन पर उतरा, उसने कहा--यह मेरा गांव है। वह तो भागने लगा, वह तो उनके लिए रुका भी नहीं। वह जो उसके साथ आये थे, उन्होंने कहा--रुको भी। लेकिन वह तो भागा। वह तो और सीढ़ियां पार उतर गया था वह उसके पीछे भागा। वह तो भागा जा रहा था। वह तो कहता, अरे मेरा गांव! मेरी गली, मेरा घर, मेरी मां! वह जाकर अपनी मां के पैरों पर गिर पड़ा। उसके साथी भागे हुए पीछे पहुंचे। उसके साथियों ने कहा--तुम तो बिलकुल खो ही गये थे, तुमने कैसे खोज लिया? उसने कहा, खो नहीं गया था, खो गया होता तो फिर खोजना मुश्किल था। सिर्फ भूल गया था। उसकी याद आ गयी।
परमात्मा की खोज नहीं करनी है, सिर्फ याद करनी है। लेकिन याद के नाम से भी बड़े धोखे चल रहे हैं। उसको लोग 'प्रभु-स्मरण' कहते हैं। कोई राम-राम जप रहा है, वह कहता है--प्रभु-स्मरण कर रहे हैं। कोई कुछ और कर रहा है, कोई कुछ और कर रहा है, वह कहता है हम स्मरण कर रहे हैं। स्मरण शब्द बहुत कीमती है। ऐसे तोतों की तरह नाम जपने से कोई स्मरण नहीं होता है। स्मरण का मतलब है रिमेंबरिंग। स्मरण का अर्थ है, स्मृति, उसकी याद आ जानी। लेकिन राम-राम जपने से उसकी याद कैसे आ जायेगी? और अगर आ गयी है याद तो अब क्यों जपे चले जा रहे हैं?
अगर राम कहने से याद आ सकती तो एक दफा कहने से आ जाती और जब एक दफा कहने से नहीं आयी तो दूसरी दफा कहने से कैसे आ जायेगी, तीसरी दफा कहने से कैसे आ जायेगी? लेकिन लाख-लाख, दो-दो लाख, करोड़-करोड़ जप कर रहे हैं लोग, हिसाब रख रहे हैं। एक करोड़ बार चिल्ला चुके और अभी याद नहीं आ पायी। अभी वे कह रहे हैं, अगले साल फिर एक करोड़ जप करेंगे।
मैं एक गांव में गया था, वहां एक लाइब्रेरी बनायी हुई है एक सज्जन आदमी ने--और सज्जनों की तो कमी नहीं है हमारे देश में--उनका काम ही यह है, उन्होंने जीवन अर्पित कर दिया है इसके लिए कि न मालूम कितने लोगों को लगाकर वह राम-राम लिखवाते रहते हैं। और वे किताबें भर गयी हैं, बहियें भर गयी हैं; हजारों-लाखों कापियां भर गई हैं। और सारे हिंदुस्तान में उनके भक्त हैं, जो राम-राम राम-राम लिखकर वहां भेजते रहते हैं और वहां वह लाइब्रेरी बढ़ती जाती है। वह कहते हैं, इतने अरब हो गये हैं नाम, इतने खरब हो गये हैं नाम। वह मुझे भी ले गये वहां। मैंने कहा--नाम कितने ही खरब हो गये, याद आयी कि नहीं? नाम लिखने से कैसे याद आ जायेगी। सच तो यह है कि जिसकी हमें याद ही नहीं है, उसका नाम भी हमारे पास कैसे हो सकता है, नाम भी हमारे पास कैसे हो सकता है। राम को कौन कहता है कि उसका नाम है। कैसे पहचाना, कौन-सा प्रमाणपत्र है? कौन कहता है कि अल्लाह उसका नाम है? और कौन कहता है कि खुदा उसका नाम है? कैसे पहचान लिया है? यह नाम कैसे पहचान गये? याद आ जाये तो शायद नाम भी आ जाता, लेकिन याद तो आयी नहीं और हम नाम से याद लाने की कोशिश करते हैं।
नहीं, प्रभु-स्मरण का बहुत और ही मतलब है। प्रभु-स्मरण का मतलब राम की रट-रट लगानी नहीं है। नाम की रटंत नहीं है। प्रभु-स्मरण का अर्थ है--कि यह जो नृत्य चल रहा है, यह जो जीवन की विराट लीला चल रही है; इसके प्रति हम बोधपूर्ण हो जायें। यह हमें दिखायी पड़ने लगे, यह हमें अनुभव होने लगे; इसकी हमें प्रतीति होने लगे कि यह हो रहा है। जब फूल खिले तो ऐसे ही न खिल जाये, हमें फूल खिलता हुआ मालूम पड़े। जब आकाश में बादल चलें तो ऐसे ही न गुजर जायें बिना पहचाने, हम उन्हें देख पायें और पहचान पायें। हमारे पास से जब कोई गुजरे तो ऐसे ही न गुजर जाये, उसके भीतर जो है उसका थोड़ा-सा स्पर्श हमें हो सके। और जिंदगी में चारों तरफ 'वह' मौजूद है। उसके स्मरण का मतलब बहुत दूसरा है। उसके स्मरण का मतलब इस बात का बोध है कि हम जिससे आये हैं वह चारों तरफ मौजूद है।
और अगर इसे हम समझ पायें तो इस बोध में कोई कठिनाई नहीं है। हमने उसे खो नहीं दिया है। हम उसे कितना ही खो दें, वह तो हमें खोता ही नहीं है। असल में जिंदगी में जो भी महत्वपूर्ण है परमात्मा ने हमें स्वयं उसे याद रखने की जरूरत नहीं समझी, श्वास चलती रहती है, आपको याद रहे न रहे, अगर आपके याद रखने के साथ चलती हो तो जिंदगी में कई दफे आदमी मर जाये। आपको याद रखने की जरूरत नहीं, श्वास चलती रहती है, चलती रहती है, चलती रहती है। आप भूल जाते हैं तो भी चलती रहती है। बल्कि सच तो यह है कि आपकी स्मृति और आपकी श्वास का कोई संबंध ही नहीं है। आप खाना खा लेते हैं और पचा लेते हैं और पचाने का आपको कभी पता नहीं चलता है और बड़ा काम पेट में चलता रहता है। वैज्ञानिक तो कहते हैं कि इतनी बड़ी फैक्ट्री एक आदमी के पेट में लगी है कि अगर हम इतना इंतजाम--रोटी से खून बनाने का इंतजाम--अगर बाहर करें तो कई मील के घेरे में हमें इंतजाम करना पड़े फैक्ट्री का, और इतना शोरगुल मचे जिसका कोई हिसाब नहीं। लेकिन हमारे भीतर वह चुपचाप काम चल रहा है।
इतना अदभुत है जगत कि इसमें चुपचाप बड़े से बड़े तारे पैदा हो जाते हैं और विलीन हो जाते हैं। उनका शोरगुल भी नहीं होता, उनका कोई पता भी नहीं चलता। जिंदगी में जो भी महत्वपूर्ण है, वह आपके बिना जाने चुपचाप चल रहा है। लेकिन अगर हमें उसका स्मरण आ जाये जो जिंदगी में चारों तरफ चुपचाप चल रहा है; अगर उसकी पगध्वनि हमें सुनायी पड़ने लगे जो हमारे पास से गुजर रहा है--तो प्रभु का स्मरण--तो उसे प्रभु का स्मरण होगा। और तब बैठकर हम कोई नाम न जपने लगेंगे और बैठकर हम कोई माला न फेरने लगेंगे, क्योंकि यह सब बातें बहुत स्टुपिड हैं, बहुत ही बुद्धिहीनता की हैं। और इनको करने से कोई और बुद्धिहीन; ज्यादा से ज्यादा बुद्धिहीन हो सकता है। और कुछ भी नहीं हो सकता है।
इसलिए जो कौम इस तरह के काम पकड़ लेती है उसकी बुद्धि और प्रतिभा धीरे-धीरे खो जाती है और जंग खा जाती है। प्रभु का स्मरण तो चौंका देगा, जगा देगा। ज्यादा जीवंत हो जायेंगे आप। सब चीजों में रंग-रस बदल जायेगा। सब कुछ और हो जायेगा। सब कुछ और हो जायेगा, जिंदगी बहुत रसपूर्ण, अर्थपूर्ण नृत्य से भर जायेगी; एक संगीत का अर्थ आ जायेगा। जिंदगी आपको पहली दफे ऐसी लगेगी जैसे फूट पड़ी भीतर से, जैसे कोई बीज फूटता है और अंकुर बन जाता है; और कोई कली टूटती है और फूल बन जाती है; और कोई वीणा के तारों को छेड़ देता है और सन्नाटा बंद हो जाता है। और चारों तरफ वीणा के स्वर गूंज जाते हैं। ठीक जब प्रभु का स्मरण आयेगा तो आपकी वीणा के तार गूंज उठेंगे, आपकी कली टूटकर फूल बन जायेगी, आपका बुझा दीया अचानक लपट लेकर जल उठेगा। आप पायेंगे, आप बिलकुल दूसरे आदमी हो गये हैं। तब बैठकर राम-राम नहीं जपते रहेंगे, तब आप पायेंगे कि जपें किसको? वही मौजूद है। पुकारें किसको? वही मौजूद है। कौन किसको पुकारे? क्योंकि मैं भी वही हूं।
और तब जिंदगी एक नया अर्थ लेकर, एक नयी गति लेकर चलना शुरू हो जायेगी। वह जिंदगी एक धार्मिक आदमी की जिंदगी है--आनंद से भरी, अमृत से भरी, शांति से भरी, प्रेम से भरी। उसका कण-कण फिर आनंद है। फिर दुख नहीं है। क्योंकि फिर दुख भी आनंद है। फिर कांटे नहीं हैं क्योंकि फिर कांटे ही फूल हैं। फिर मृत्यु नहीं है क्योंकि फिर मृत्यु भी और बड़े जीवन में प्रवेश है।
इस प्रभु की बात करना चाहूंगा, इन चार दिनों में। और बात ही क्यों? क्योंकि अकेली बात से क्या होगा? बातें तो हम बहुत कर चुके, बहुत सुन चुके और कई बार तो ऐसा हो जाता है कि बातें सुनना भी एक रोग हो जाता है, हम सुनते चले जाते हैं, सुनते चले जाते हैं। फिर सुनना भी एक रस हो जाता है। लेकिन सुनने से वीणा कैसे निकलेगी। आप खाने के संबंध में बातें नहीं सुनते हैं, खाना खाते हैं। और परमात्मा के संबंध में सिर्फ बातें सुनते हैं। आप सोने के लिए बिस्तर पर जाते हैं, सोने के संबंध में किताब नहीं पढ़ते। हां, कुछ लोग पढ़ते हैं, जिनको नींद नहीं आती; अनिद्रा। कुछ लोग हैं, कुछ अभागे लोग हैं, जिनको नींद जैसी सरल चीज भी असंभव हो गयी है। वे जरूर किताबें पढ़ते हैं। वे किताबों में पढ़कर खोजते हैं कि कैसे सो जायें। हमें हंसी आती है क्योंकि हम ऐसे ही सो जाते हैं। हम बिस्तर पर सिर रखते हैं और सो जाते हैं, हमें कुछ और नहीं करना पड़ता। लेकिन जो नहीं सो पाता है, उससे पूछिये। क्या नींद इतनी आसान है? बल्कि उसे हैरानी होती है कि लोग कहीं धोखा तो नहीं दे रहे हैं कि कहते हैं कि बिस्तर पर सिर रखते हैं और सो जाते हैं। मैंने तो बहुत दफा सिर रखा है बिस्तर पर। नींद का तो कोई पता नहीं चलता है। हजारों उपाय करो, नींद नहीं आती है। करवटें बदलो, भगवान को स्मरण करो, मालाएं फेरो, हाथ-पैर धोओ, यह करो, वह करो, गर्म दूध पीयो, गरम पानी से स्नान करो--कुछ नहीं होता, नींद नहीं आती। सब उपाय करता हूं, नींद नहीं आती। और लोग कहते हैं कि हम बस तकिये पर सिर रखते हैं और सो जाते हैं। पता नहीं, सारी दुनिया धोखा तो नहीं दे रही है कि आंख बंद करके लोग पड़े हैं। जिसको नींद नहीं आती, उसे शक आता है। लेकिन उस बेचारे को पता नहीं। उसे यह पता ही नहीं है कि नींद न तो किताबें पढ़कर लायी जा सकती है क्योंकि किताबें पढ़ने से नींद में सिर्फ बाधा पड़ सकती है।
और न नींद हमारे किसी उपाय से लायी जा सकती, क्योंकि कोई भी उपाय श्रम है, और श्रम नींद में बाधा है। न माला फेरने से नींद लायी जा सकती क्योंकि माला फेरना भी जागने का काम है। और जो भी जागने का काम है उससे नींद में बाधा पड़ेगी। राम-राम जपने से भी नींद नहीं आ सकती, क्योंकि जपने से और नींद टूट सकती है। नींद आयेगी कैसे। कोई उपाय नींद नहीं ला सकता। लेकिन वह आदमी कहेगा, फिर भी मैं सोना चाहता हूं।
लेकिन हम परमात्मा के संबंध में किताबें पढ़ते हैं, उपाय करते हैं। लेकिन परमात्मा में जीना चाहते हैं, तब फिर कुछ और भी करना पड़ेगा। अकेली बात काफी नहीं है। बात कुछ खबर ला सकती है, बात कुछ प्यास जगा सकती है; बात कहीं आप झपकी ले रहे हों तो चौंका सकती है। लेकिन चलना पड़ेगा। यात्रा करनी पड़ेगी, कुछ करना पड़ेगा। और कितना आश्चर्यजनक है--उसे पाने के लिए कुछ करना पड़ेगा, जिसे हमने कभी खोया ही नहीं।
लेकिन मैंने कहा कि जीवन के गणित का यह सूत्र है कि जो निकट है वह भूल जाता है और परमात्मा हमारे निकटतम है, इसलिए बिलकुल भूल गया है। यह बिलकुल स्वाभाविक है, यह तर्कयुक्त है। अगर मैं आपसे कहूं कि जरा आंख बंद करके अपनी मां की तस्वीर याद करिए तो आप सदा सोचते रहे होंगे कि मां की तस्वीर मुझे भलीभांति याद है। लेकिन आंख बंद करके जब मां की तस्वीर का खयाल करने बैठेंगे, तो रेखाएं बिखर जायेंगी, चेहरा बनाना मुश्किल हो जायेगा। मां को जिसको पहले दिन से देखा, जिसकी तस्वीर सबसे ज्यादा निकट थी; वह भी बिखर जायेगी। कोई अभिनेत्री की तस्वीर याद भी आ सकती है, साफ-साफ दिखायी पड़ती है, लेकिन मां की तस्वीर बिखर जायेगी। असल में हम इतने निकट रहे हैं कि फिर हमने मां को देखने की जरूरत भी नहीं समझी। हम उसके इतने हिस्से थे कि हमने कभी उसे गौर से देखा भी नहीं। कभी आपने अपनी मां को गौर से देखा है? नहीं, हम जो निकट है, उसे गौर से देखते ही नहीं। और परमात्मा तो हमारे निकटतम है। निकटतम भी शब्द  ठीक नहीं है। हम वही हैं। उसके साथ एक ही हैं इसलिए निकटतम कहना भी ठीक नहीं है। वही हम हैं तो उसे तो हम बिलकुल ही भूले हुए हैं। उसका तो हमें कुछ पता ही नहीं है।
इसका पता लगाने हम कहां जायें, हिमालय पर? काशी, मक्का, मदीना--कहां जायें? और अगर परमात्मा यहां नहीं मिलता जूनागढ़ में, तो हिमालय पर कैसे मिल जायेगा? मैं ही खोजने वाला, जूनागढ़ से हिमालय चला जाऊंगा--मैं ही--जो यहां हूं वहां होऊंगा। जगह बदल जायेगी झाड़ बदल जायेंगे, हवाएं बदल जायेंगी, सूरज की रोशनी कम ज्यादा होगी, ठंडक होगी, गर्मी होगी, कुछ फर्क होंगे, झरने होंगे--लेकिन मैं तो वही होऊंगा जो यहां हूं। और वह मुझे यहां नहीं खोज में आता तो वहां कैसे आ जायेगा। अगर मुझे उसका स्मरण यहां नहीं आता तो वहां कैसे आ जायेगा।
रवींद्रनाथ ने एक बहुत अदभुत गीत लिखा है और गीत में वहां व्यंग्य करवाया है बुद्ध की पत्नी यशोधरा से। बुद्ध लौट आये हैं वापस, बारह वर्षों की खोज के बाद। घर आये हैं। तो रवींद्रनाथ ने अपने गीत में बुद्ध की पत्नी से कहलवाया है कि मुझे और कुछ भी नहीं पूछना है, मुझे सिर्फ एक ही बात पूछनी है कि जो तुम्हें वहां जंगल में जाकर मिला, वह क्या यहां मौजूद नहीं था? इतना ही मुझे बता दो, बाकी मुझे कुछ भी नहीं पूछना है। वह जो तुम्हें बारह वर्ष जंगलों में खोजकर मिला, वह इस घर में क्या मौजूद नहीं था? और बुद्ध चुप रह गये। जवाब देना मुश्किल है। बुद्ध को भी जवाब देना मुश्किल है क्योंकि बात तो यही सच है कि जिसे वे खोजकर आये हैं यहां भी था। और जिस खोजने के ढंग से उन्होंने वहां खोजा है उसी खोजने के ढंग से वह यहां भी खोजा जा सकता था। इसलिए सवाल खोजने वाले ढंग और खोजने वाले आदमी का है, खोजने वाली जगह का नहीं।
लेकिन हजारों साल से हम ऐसा सोच रहे हैं कि वह कहीं और जाकर खोजना पड़ेगा। और यह क्यों सोच रहे हैं? यह हम इसलिए सोच रहे हैं कि हम सदा से ऐसा मानकर बैठे हैं कि जिंदगी से कहीं दूर है, जीवन से कहीं और है, जीवन से भिन्न। न केवल इतना ही, बल्कि कुछ नासमझों ने तो हमें यह भी सिखा दिया है कि जीवन की बिलकुल शत्रुता में वह मिलेगा। जब तक हम जीवन के पक्के दुश्मन न हो जायें, यानी दुश्मनी इस तरह की न कर लें कि लोग अगर पैर के बल चलते हैं तो हम सिर के बल, शीर्षासन न लगायें तब तक वह नहीं मिलेगा। दुश्मनी पक्की करनी है और लोगों से बिलकुल उल्टे हो जाना है। लोग जो करते हैं, वह जिंदगी का जो रास्ता है उससे उल्टे चले जाना तब वह मिलेगा।
बड़ी हैरानी की बात है, जिंदगी से अगर इतनी दुश्मनी है उसकी तो जिंदगी के होने का मतलब क्या है। अगर जिंदगी से वह इतना नाराज है, तो फिर जिंदगी है क्यों? और अगर जिंदगी इतनी बुरी है तो वह क्यों इसे बढ़ाये चला जाता है? क्यों इसे जिंदगी दिये चला जाता है? क्यों ये श्वासें आती हैं और जाती हैं? और क्यों ये जन्म हैं? और क्यों ये फूल खिलते हैं? और क्यों ये बीज बन जाते हैं?
अगर जिंदगी इतनी बुरी है, जिसे महात्मा कहते हैं, तो परमात्मा बड़ा नासमझ है। या तो महात्मा ठीक है या परमात्मा ठीक है। दोनों में से चुनाव करने का वक्त आ गया है। अगर महात्मा ठीक है तो परमात्मा बिलकुल गलत है क्योंकि वह जिंदगी को रोज जन्म दिये जा रहा है। वह काम रोकता ही नहीं। वह कभी का काम रोक सकता था। वह कभी का लाक आउट कर देता। ताला लगा देता--तालाबंदी कर देता, हड़ताल कर देता, कुछ भी तो कर सकता था। वह कभी का बंद कर देता--कि जिंदगी अब बस बहुत हो गयी, जिंदगी बंद कर देते हैं।
वह है कि नाचे चला जाता है। वह है कि उसकी अतृप्ति का अंत ही नहीं है। वह तृप्त ही नहीं होता। वह कहता है, बुद्ध भी बना लिए, ठीक है, लेकिन और बेहतर आदमी बनाना है। राम बना लिया, ठीक है, लेकिन अभी और बेहतर आदमी बनाना है। कृष्ण आ गये बहुत ठीक है, लेकिन और बढ़िया बांसुरी बजाने वाला पैदा करेंगे। वह तृप्त ही नहीं होता। वह कहता, हम रोज नया माडल...वह आदमी को रोज नया बनाये चला जाता है। उसकी अतृप्ति का कोई अंत नहीं है। इसलिए पुराना दुबारा नहीं बनाता। इसलिए राम को फिर से नहीं बनाता, ऐसी भूल नहीं करता वह। इसलिए कृष्ण को दुबारा नहीं बनाता।
क्योंकि दुबारा सिर्फ वे ही बनाते हैं जिनमें मौलिकता की कमी है। जो ओरिजनल नहीं है। जो मौलिक नहीं है। फिर वही एक आदमी एक गीत लिख लेता है, फिर उसी गीत को लौट-लौटकर दोहराये चला जाता है, फिर नयी-नयी कड़ियों में उसी को बांधता रहता है। एक आदमी एक चित्र बना लेता है, फिर घूम-फिरकर वही चित्र बनाये चला जाता है। फिर जिंदगी-भर वह वही करता रहता है, वही चित्र दोहर-दोहरकर आता रहता है। एक आदमी एक कहानी लिख लेता है, फिर बस वही कहानी, वही प्लाट, वह फिर बार-बार लिखे चला जाता है--नाम बदल देता है, थोड़ी घटना बदल देता है, लेकिन वही।
लेकिन ईश्वर बहुत अदभुत है। कितने अरब-अरब, खरब-खरब लोग जमीन पर पैदा होते हैं, लेकिन एक-एक आदमी अनूठा और अलग है और अद्वितीय है, यूनीक है। दुबारा दोहराता नहीं है एक ही आदमी। रिपीटिशन है ही नहीं वहां। अभी भी तीन-साढ़े तीन अरब आदमी जमीन पर हैं, अगर खोजने जायें तो एक जैसे दो आदमी नहीं मिलेंगे। आदमी तो बहुत दूर की बात है, दो एक जैसे पत्ते भी न मिलेंगे खोजने से। एक आम का पत्ता तोड़ लें, और खोजने चले जायें। तो दूसरा पत्ता न मिलेगा ठीक वैसा।
उसकी सृजनात्मकता बड़ी मौलिक है, वह रोज नये को पैदा किये चला जाता है। लेकिन आदमी? आदमी कहता है--राम जैसे बन जाओ; बुद्ध जैसे बन जाओ; महावीर जैसे बन जाओ। आदमी बड़ा अमौलिक है। आदमी बड़ा रूढ़िग्रस्त है। वह कहता है ठीक है, चलो, राम हो गये तो अब राम जैसे ही बन जाओ। अब नये की क्या जरूरत है?
लेकिन परमात्मा नये की खोज में निरंतर लगा हुआ है और महात्मा सदा पुराने की खोज में लगे हुए हैं। वे कहते हैं--हमारी किताब जितनी ज्यादा पुरानी उतनी अच्छी और परमात्मा रोज नये को पैदा करता है। वह बूढ़े को विदा कर देता है और बच्चे को खड़ा कर देता है। वह कहता है--अब आप हट आइए, अब आप काफी पुराने हो गये। अब आप जरा मंच के पीछे आ जाइये। बड़ा नासमझ है! एक अर्थ में नासमझ है। नासमझ इन अर्थों में कि बूढ़ा तो इतना अनुभवी था कि उसको हटाकर गैर-अनुभवी जरा से बच्चे को उसकी जगह दे रहे हो। बूढ़े ने तो जिंदगी भर इतना अनुभव से, ज्ञान से सीखा था, इकट्ठा किया था; इतना समझ पाया था--उसको विदा कर रहे हो। और एक बिलकुल अनजान, अपरिचित बच्चे को ला रहे हो जिसका कुछ भरोसा नहीं कि अच्छा होगा कि बुरा होगा, कि क्या करेगा क्या नहीं करेगा, चोर होगा, बेईमान होगा, साधु होगा, असाधु होगा--कुछ पता नहीं। एक अबोध बच्चे को रख रहे हो उसकी जगह हटाकर।
लेकिन परमात्मा नये को प्रेम किये चला जाता है। वह कहता है--जो भी पुराना हो जाता है वह वापस हट आए। नये में जीवन है, पुराने में मृत्यु है। जो पुराना है, अर्थात जो मर रहा है, मर गया है, मरने के करीब पहुंच गया है। नया, अर्थात, जो अभी जीयेगा, जन्मेगा, बढ़ेगा, फैलेगा, फलेगा, फूलेगा...आगे और आगे।
तो महात्मा कहते हैं कि जीवन के विरोध में है धर्म। वे कहते हैं जीवन को छोड़ दो तो ही धार्मिक हो सकते हो। और मेरा मानना है कि इसी शिक्षा के कारण पृथ्वी धार्मिक नहीं हो पायी क्योंकि जीवन को छोड़ना असंभव है। जो भाग जाते हैं छोड़कर वे भी छोड़ते नहीं। सिर्फ नयी शक्लों में, नये दरवाजों से जीवन में वापस लौट आते हैं। घर छोड़कर भागते हैं, फौरन एक आश्रम बनाते हैं। अब आश्रम में और घर में सिवाय बोर्ड के और कोई फर्क नहीं है। इधर बेटे-बेटियां, पति-पत्नी इनको छोड़कर भागते हैं वहां चेला और चेलियां, शिष्य और शिष्याएं इकट्ठा कर लेते हैं।
ये सब नामों के रूपांतरण हैं। इसमें कोई भी फर्क नहीं है। बाप अपने बेटों के लिए जितना चिंतित होता है गुरु अपने शिष्यों के लिए उससे ज्यादा चिंतित रहता है। बाप को अपने बेटों के बिगड़ जाने का जितना भय सताता है, गुरुओं को अपने शिष्यों के बिगड़ जाने का उससे भी ज्यादा भय सताता है। एक तरफ से दरवाजा जीवन का बंद करते हैं, जीवन का झरना दूसरी तरफ से टूटकर बहना शुरू हो जाता है। वह नयी-नयी शक्लों में खोज लेता है। लेकिन जिंदगी से कोई भाग नहीं सकता। क्योंकि जिंदगी से भागना असंभव है। हम जहां भी जायेंगे, जिंदगी वहां है। हम सिर्फ जिंदगी की शक्लें बदल सकते हैं, रूप बदल सकते हैं, द्वार बदल सकते हैं, लेकिन जिंदगी से भाग नहीं सकते। हम यह कर सकते हैं कि हम यह कपड़े न पहनें, इनको हम गेरुवे रंग से रंग लें। लेकिन वह गेरुवा रंग उतना ही जिंदगी का हिस्सा है जितना कोई और रंग। और गेरुवे वस्त्र जिंदगी के लिए उतने ही आनंदपूर्ण हो सकते हैं जितने कोई और रंग। इससे क्या फर्क पड़ता है कि किसने कौन से वस्त्र पहन रखे हैं, इससे क्या फर्क पड़ता है कि कौन किस मकान में ठहर गया है। इससे क्या फर्क पड़ता है?
इससे सिर्फ एक ही फर्क पड़ता है कि एक पाखंड, हिपोक्रेसी पैदा होती है, और कोई फर्क नहीं पड़ता। इसलिए अगर हम जिंदगी को सीधे-सीधे स्वीकार कर लें तो हमें पाखंड और बेईमानियां न खोजनी पड़ें।
अभी एक संन्यासी मेरे पास मिलने आये। साथ में एक आदमी को लाये थे। मैंने उनसे कहा कि कल सुबह आप आ जायें, अभी तो मुझे वक्त नहीं है, कुछ और लोगों को समय दिया है। आप कल सुबह आ जायें। उन्होंने कहा--बड़ा मुश्किल होगा। क्योंकि मैं पैसे पास में नहीं रखता। तो यह भाई पैसा रखते हैं--वह साथ चलते हैं। वह भाई पैसा रखते हैं और इनकी सुविधा से मुझे आना-जाना पड़ता है क्योंकि टैक्सी का पैसा भी चुकाना पड़ता है और पैसा मैं रखता नहीं। तो अगर इनको सुबह समय हो तो फिर मैं आ सकता हूं। तो मैंने उनसे कहा--पैसे का एक बंधन था वह समझ में आता था, अब यह एक और डबल बंधन है। यह आदमी और एक उपद्रव है! इसको अगर समय नहीं है तो आप नहीं आ सकते? क्योंकि यह पैसा रखता है, यह देगा लेगा।
अब यह सब पाखंड है। अगर टैक्सी में बैठना है तो पैसे देने हैं। तो अपने खीसे में रखें कि दूसरे के खीसे में रखें, इससे क्या फर्क पड़ता है। हां, एक फर्क पड़ता है क्योंकि रखने वाला यही सोच रहा है कि जो खीसे में रखा है वह नरक जायेगा, हम स्वर्ग जायेंगे। अब बड़ा मजा है। पैसे तुम्हारे, खीसे में रखे हुए है वह और नरक जायेगा? और आप धार्मिक संन्यासी हैं और आप उसको नरक भिजवा रहे हैं और वह बिचारा आपकी सेवा कर रहा है, आपकी टैक्सी के पैसे चुका रहा है।
जिंदगी से भागने का परिणाम हुआ है पाखंड। सीधा नंगा पाखंड खड़ा हो गया है सब तरफ। क्योंकि हम जिंदगी से भागेंगे कैसे? जिंदगी चारों तरफ है, जहां भी हम जायेंगे वहीं है। जिंदगी को जीना पड़ेगा। तो अगर कमायेंगे नहीं तो भीख मांगनी पड़ेगी। भीख मांगने का मतलब हमारे लिए कोई और कमायेगा। और क्या मतलब होता है भीख मांगने का? लेकिन मजा यह है कि हम कमाने को पाप समझते हैं और कोई दूसरा कमाता है, उससे लेने को पाप नहीं समझते। तो यह तो सिर्फ लीगल, कानूनी तरकीब हुई। इससे कुछ हल होना वाला है? यह सिर्फ कानूनी तरकीबें हुईं।
गांधी जी पढ़ने लंदन गये तो उनके समाज के लोगों ने कहा, उनको हम जाने न देंगे, क्योंकि वह जाति के बाहर कर दिये जायेंगे। और उनके समाज के लोगों ने फैसला किया कि जो उनकी सहायता करेगा, पैसे देगा उसको भी हम जाति के बाहर कर देंगे। उनके चचेरे भाई सब पैसा लेकर बंबई गांधी को पहुंचाने गये। उनके चचेरे भाई ने कहा--अगर मैं तुमको पैसा दूंगा तो मैं तो जाति के बाहर हो जाऊंगा तो मैं तो पैसा नहीं दे सकता। अब बड़ी मुश्किल हो गयी। वक्त आ गया जाने का, समय आ गया और वह भाई ही पैसा देने से इनकार करता है। वह कहता है--मैं पैसा दूंगा तो मैं भी जाति से बंद हो जाऊंगा। तब एक कानूनी तरकीब, लीगल तरकीब निकाली गयी। गांधी जी ने किसी और आदमी से जो जाति के बाहर है, उनकी जाति का नहीं, उससे रुपये ले लिए। उनके भाई ने उसके रुपये चुका दिये। उनके भाई ने गांधी जी को पैसे नहीं दिये इसलिए समाज उन पर मुकदमा नहीं चला सकता और उनके समाज के किसी आदमी ने गांधी जी की सहायता नहीं की। वह किसी बाहर के आदमी ने सहायता की, उसका आप कुछ बिगाड़ ही नहीं सकते क्योंकि वह समाज के बाहर ही है।
इसको मैं कहता हूं कानूनी तरकीबें। जो आदमी जिंदगी से भागेंगे वे इस तरह की कानूनी तरकीबें खोज लेंगे। सभी संन्यासी कानूनी तरकीबों से जी रहे हैं। सारा संन्यास कानूनी तरकीब से जी रहा है। क्योंकि जिंदगी छोड़कर जीना ही असंभव है। तो फिर तरकीबें निकालनी पड़ेंगी कि हम कैसे जीयें, उसका ढंग खोजना पड़ेगा।
जिंदगी से कोई भाग नहीं सकता। और जिंदगी से भागना उचित भी नहीं है क्योंकि भागकर जाइएगा कहां? आप भी तो जिंदगी हैं। मैं भी तो जिंदगी हूं। सबसे भाग जाऊंगा अपने से कहां भागूंगा।
मैंने सुना है, एक फकीर के पास कुछ युवक साधना के लिए आये थे कि हमें परमात्मा को खोजना है। तो उस फकीर ने कहा--तुम एक छोटा-सा काम कर लाओ। उसने उन चारों युवकों को एक-एक कबूतर दे दिया और कहा कि कहीं अंधेरे में मार लाओ जहां कोई देखता न हो। एक गया बाहर, उसने देखा चारों तरफ देखा, सड़क पर कोई नहीं था, दोपहर थी, लोग घरों में सोये थे, तो उसने जल्दी से गर्दन मरोड़ी। भीतर आकर उसने कहा कि यह रहा, सड़क पर कोई भी नहीं था। दूसरा युवक बड़ा परेशान हुआ, दिन था, दोपहरी थी। उसने कहा--मैं मारूं, तब तक कोई आ जाये, कोई खिड़की खोलकर झांक ले; कोई दरवाजा खोल दे, कोई सड़क पर निकल आये तो गलती हो जायेगी। उसने कहा रात तक रुक जाना जरूरी है। रात जब अंधेरा उतर आया तब वह गया और उसने गर्दन मरोड़ी और वापस लाकर गुरु को दे दिया और कहा यह रहा--कोई भी नहीं था, अंधेरा पूरा था। अगर होता भी तो भी दिखायी नहीं पड़ सकता था। तीसरे युवक ने सोचा कि रात तो है, अंधेरी है, सब ठीक है, लेकिन आकाश में तारों का प्रकाश है, और कोई निकल आये, कोई दरवाजे से झांक ले, किसी को थोड़ा भी दिखायी पड़ जाये तो खतरा है। तो वह एक तलघरे में गया, द्वार बंद कर लिया, ताला लगा लिया, गर्दन मरोड़ी, लाकर गुरु को दे दिया। उसने कहा, तलघरे में मारा, ताला बंद था, भीतर आने का उपाय न था, नजर की तो बात ही नहीं आनी थी।
चौथा युवक बहुत परेशान हुआ। पंद्रह दिन बीत गये, और महीना बीतने लगा। गुरु ने कहा, वह चौथा कहां है? क्या अभी तक जगह नहीं खोज पाया? आदमी खोजने भेजे। वह लड़का करीब-करीब पागल हो गया था। कबूतर को लिए गांव-गांव फिर रहा था, बिलकुल पागल हो गया था। लोगों से पूछता था ऐसी कोई जगह बता दो जहां कोई न हो। लोगों ने उसे पकड़ा, उसे गुरु के पास लाये और कहा कि पागल हो गये हो। तुम्हारे तीन साथी तो उसी दिन मारकर आ गये; रात होते-होते सब वापस लौट आये। तुम क्या कर रहे हो। उसने कहा, मैं बड़ी मुश्किल में पड़ गया हूं। मैं भी अंधेरे तलघरे में गया था लेकिन जब मैं कबूतर की गर्दन मरोड़ने लगा तो मैंने देखा, कबूतर मुझे देख रहा है। तो मैंने कबूतर की आंखों पर पट्टी बांध दी और मैं तब एक और अंधेरी गुफा में गया कि पट्टी में से ही किसी तरह दिखायी न पड़ जाये। लेकिन जब मैं गर्दन मरोड़ने को था तो मैंने देखा कि मैं तो देख ही रहा हूं। तब मैंने अपनी आंखों पर भी पट्टी बांध ली और पट्टियों पर पट्टी बांध ली, ताकि आंख कहीं से झांककर देख न ले। क्योंकि आदमी की आंख का कोई भरोसा नहीं। कितनी पट्टियां बंधी हों, थोड़ी तो झांककर देख ही सकती हैं। और जहां मना ही हो वहां तो झांककर देख ही सकती हैं। उसने कहा, मैंने काफी पट्टियां बांध लीं, सब तरफ से पट्टियां बांध लीं, कबूतर की आंखों पर पट्टियां बांध लीं। बस गर्दन दबाने को था कि मुझे यह खयाल आया, अगर परमात्मा कहीं है तो उसे दिखायी तो पड़ ही रहा होगा। और उसी की खोज में मैं निकला हूं। तबसे मैं पागल हुआ जा रहा हूं, और मुझे वह जगह ही नहीं मिल रही है जहां परमात्मा न हो। यह कबूतर सम्हालिये आप। यह काम नहीं होने का। उसके गुरु ने कहा कि बाकी तीन फौरन विदा हो जाओ, तुम्हारी यहां कोई जरूरत नहीं है। इस चौथे आदमी की यात्रा हो सकती है। इसे जीवन के चारों तरफ छिपे हुए का थोड़ा-सा बोध हुआ। इसने गहरे से गहरे खोज करने की कोशिश की। इसे कुछ बोध हुआ है कि कोई मौजूद है चारों तरफ।
यह चारों तरफ जो मौजूदगी है, जो प्रजेंस है उसका अनुभव, स्मरण--इसका स्मरण कैसे जगे? जिसे हम भूल गये हैं और खोया नहीं, उसे हम फिर कैसे स्मरण करें? इन चार दिनों में आपसे मैं बात ही नहीं करना चाहता; सच तो यह है कि बात मैं सिर्फ मजबूरी में करता हूं, बात करने में मुझे बहुत रस नहीं है। बात सिर्फ इसलिए करता हूं कि कुछ और करने को भी आपको राजी कर सकूं। हो सकता है, बात से आप राजी हो जायें, कुछ और किया जा सके, जिसका बात से कोई संबंध नहीं है। तो सांझ बात करूंगा और जिनको लगे कि हां, कहीं और यात्रा करनी है उनके लिए सुबह, बात नहीं, सुबह ध्यान का प्रयोग करेंगे और उस द्वार में प्रवेश की कोशिश करेंगे जहां से उस प्रभु का पता चलता है जो कि जीवन है। उसका पता चल सकता है। कठिन नहीं, क्योंकि वह बहुत निकट है। कठिन नहीं, क्योंकि वह दूर नहीं। और कठिन नहीं, क्योंकि हमने उसे सच में खोया नहीं है। और कठिन नहीं, क्योंकि हम चाहे उसे कितना ही भूल गये हों, वह हमें किसी भी हालत में और कभी भी नहीं भूलता है।
बच्चे बड़े हो जाते हैं और मां को भूल जाते हैं--स्वाभाविक है भूल जाना। जिंदगी भर बच्चे मां को याद रखें या जिंदगी में निकलें, या कुछ और खोजें। बच्चे मां को भूल जाते हैं। स्वाभाविक है, क्योंकि बच्चे भागेंगे जिंदगी की तरफ, वह मां को भूल जायेंगे। लेकिन मां, बच्चे कितना ही भूल जायें वह नहीं भूल पाती।
मैं एक छोटे से स्टेशन पर रुका हुआ था। गाड़ी चूक गया था और एक स्टेशन पर, प्लेटफार्म पर बैठा हुआ था। पास के गांव से एक बूढ़ी औरत को कुछ लोग लाये स्ट्रेचर पर, उसके सिर में पट्टियां बंधी थीं, सिर पर किसी ने चोट की थी संभवतः कुल्हाड़ी से सिर पर चोट की थी। कुछ औरतें रो रही थीं। अभी वह औरत जिंदा थी, कुछ उसके रिश्तेदार साथी वे सब थे। सब उदास थे। मैंने उनसे पूछा कि क्या हुआ? तो वह औरत जो स्ट्रेचर पर पड़ी थी, आधी बेहोश सी, कुछ कभी होश आता था, कभी बेहोश थी। उसे किसी बड़े नगर में ले जाते थे वे गाड़ी में बिठाकर, किसी बड़े अस्पताल में। पास की दूसरी औरतों ने मुझसे कहा कि मत पूछिये, एक ही बेटा है इसका, और ऐसे बेटे तो पैदा होते से मर जायें तो अच्छा। क्योंकि उस बेटे ने इसको यह कुल्हाड़ियां मार दी हैं। लेकिन वह औरत एकदम से चौंक गयी, जैसे ही उन पास की स्त्रियों ने कहा--वह मरती हुई औरत--जो शायद जिंदा नहीं रहेगी, घड़ी-दो-घड़ी बाद मर जायेगी। उसका बहुत खून बह गया है और गाड़ी में देर है और पता नहीं वह बड़े अस्पताल तक पहुंचेगी कि नहीं पहुंचेगी। वह मरती हुई बूढ़ी औरत एकदम चौंक गयी, उसने आंख खोली, उसने कहा--ऐसा मत कहो। आज मेरा बेटा है, तो उसने मारा है। अगर न होता तो मारने के लिए भी तरस जाती कि कोई मारे। मेरा बेटा है तो उसने मारा। लेकिन यह मत कहो कि ऐसा बेटा पैदा होते से ही मर जाता तो अच्छा होता। अगर मेरा बेटा न होता तो कोई मारे, इसके लिए भी तरस जाती। वह एक मरती हुई मां, उसके बेटे ने उसको कुल्हाड़ी मार दी है, मारने में कोई कमी नहीं छोड़ी, लेकिन वह नहीं भूल पाती, वह नहीं भूल पाती।
ईश्वर--मैं कह रहा हूं उस चेतना के सागर को--जहां से हम आते हैं और जहां हम चले जाते हैं। जब मां नहीं भूल पाती, जिससे हमारा केवल शरीर आता है, सिर्फ शरीर आता है। ध्यान रहे, ज्यादा बहुत कुछ नहीं आता मां से। और शरीर भी बड़ी छोटी व्यवस्था में आता है। वह मां नहीं भूल पाती, क्योंकि उससे शरीर आया हमारा। लेकिन जिससे हमारा सब कुछ आया है, सारा व्यक्तित्व, उसके भूलने का सवाल नहीं है। लेकिन ध्यान रहे, इसका यह मतलब नहीं है कि वह बैठकर आपकी याद कर रहा है। क्योंकि याद हम तभी करते हैं जब हम भूल भी जाते हैं। जिसे हम भूलते नहीं, उसकी याद का सवाल ही नहीं है। आप याद में हैं ही। और जिस दिन कोई व्यक्ति परमात्मा के निकट पहुंचता है उस दिन हैरान हो जाता है कि कितनी उसने याद की, कितनी प्रतीक्षा की। वह तो द्वार पर ही बैठा था। कितनी बार उसने द्वार खटखटाये; कितनी बार पुकारा कि खोलो, खोलो; लेकिन हम व्यस्त थे अपने कामों में। यह भी हो सकता है कि हम पूजा में व्यस्त रहे हों; कि हम अपनी घंटी हिला रहे हों, कि अपने भगवान के समाने आरती चला रहे हों और हमने सोचा हो, यह कौन बाधा दे रहा है दरवाजे पर? हवाएं दरवाजे पर धक्का दे रही हैं और हवाएं उसके हाथ हैं और हम अपने बनाये भगवान के सामने पूजा कर रहे हैं। वह जो द्वार पर दस्तक दे रहा है जीवन की, थकता नहीं है, दिये जाता है दस्तक, उसे हम कैसे याद कर सकते हैं।
सुबह ध्यान में हम उसकी स्मृति में ही प्रवेश करने का प्रयोग करने को हैं। इसलिए सुबह जो लोग आयें, वे वे ही लोग आयें जो सुनने में नहीं, जानने में, होने में, पहुंचने में, खोजने में, कुछ करने में उत्सुक हैं। एक घंटा सुबह हम गहरे से गहरे ध्यान का प्रयोग करने को आयेंगे। रोज सांझ उस संबंध में कुछ कहूंगा। उस कहने का केवल एक ही मतलब है कि सुबह आप आ सकें। जो भी आपके प्रश्न होंगे वे लिखकर दे देंगे, उनकी रोज सांझ की चर्चाओं में मैं बात कर लूंगा। लेकिन ध्यान रहे, जो मैं कह रहा हूं, उस संबंध में ही प्रश्न पूछेंगे तो अच्छा है। और सुबह जो लोग ध्यान करेंगे, ध्यान के संबंध में भी जो पूछना हो, वह भी लिखकर दे देंगे, उनकी भी रात हम बात कर लेंगे।
इधर मेरा इरादा बात करने का नहीं है। कभी भी नहीं था। बात सिर्फ मजबूरी है। कोई उपाय नहीं कि आपको वहां ले जाया जाये जहां बहुत फूल खिले हैं। कोई उपाय नहीं है कि आपको वहां ले जाया जाये जहां उसका मंदिर है। शायद आप सुन लें पुकार और उस तरफ चल पायें।
तो कल सुबह साढ़े आठ बजे जो लोग उसके मंदिर में प्रवेश करना चाहते हैं, वे सुबह आ जायें। आने के लिए दो तीन बातें खयाल में रखें--बिना स्नान किये कोई भी न आये, कपड़े ताजे पहनकर आयें और घर से ही चुप चलें। रास्ते पर बातचीत करते मत आयें और यहां तो आकर बिलकुल ही चुप बैठें। यहां कोई बातचीत नहीं करेगा। जो भी आये, चुपचाप बैठता चला जाये। चुपचाप पहले से ही आंख बंद करके बैठ जायें। कुछ भी न करें। मैं जब आऊंगा ठीक साढ़े आठ बजे, और ठीक साढ़े आठ के पहले ही आ जायें, बाद में कोई न आये। क्योंकि जब प्रयोग शुरू हो जायेगा तो फिर आपकी समझ में आना मुश्किल हो जायेगा कि क्या हो रहा है। ठीक साढ़े आठ के पहले आ जायें स्नान करके, और घर से चुप चलें। आंख भी नीची रखे हुए आयें। आंख से भी बहुत देखें मत चारों तरफ। आंख नीची करके आयें, बात बंद करके, चुपचाप मौन में यहां आकर बैठ जायें। ठीक साढ़े आठ बजे सुबह प्रयोग शुरू हो जायेगा और वह साढ़े नौ तक चलेगा।
मेरी बातों को इतने शांति और प्रेम से सुना, उसके लिए बहुत अनुगृहीत हूं और अंत में सबके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूं। मेरे प्रणाम स्वीकार करें।

साधना-शिविर, जूनागढ़; दिनांक ९ दिसंबर, १९६९; रात्रि.