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सोमवार, 2 दिसंबर 2013

जरथुस्‍त्र--नाचाता गाता मसीहा-ओशो (पच्‍चीसवां-प्रवचन)

पुरानी व नयी नियम— तालिकाओं की बात भाग—2—(पच्‍चीसवां-प्रवचन)

 प्यारे ओशो ,
जब पानी पर पटरे बिछा दिये जाते हैं ताकि उस पर चला जा सके जब मार्ग और हस्तावलंब (रेलिंग्स ) धारा के आरपार फैल जाते हैं : सच में उस पर कोई विश्वास नहीं करता जो कहता है :  ' सब कुछ प्रवहमान है। '
उलटे बुद्ध भी उसका प्रतिवाद करते हैं। 'क्या? : बुद्ध कहते हैं 'सब कुछ प्रवहमान? लेकिन धारा के ऊपर पटरे और हस्तावलंब लगे हुए हैं!

'धारा के ऊपर सब कुछ सुदृढ़ रूप से जड़ दिया गया है सभी बातों के मूल्य सेतु
अवधारणाएं समस्त ''अच्छाई'' और ''बुराई'' : सब कुछ सुदृढ़ रूप से जड़ दिया गया है!'

..........ऐसा जरथुस्त्र ने कहा।

रथुस्त्र हेराक्लाइटस और गौतम बुद्ध के समकालीन थे। यह एक अजीब संयोग है कि इन तीनों ही महान शिक्षकों ने जीवन के प्रति मूलभूत रूप से एक ही रुख प्रदान किया है : जीवन एक प्रवाह है, सब कुछ सतत परिवर्तित हो रहा है, और जो परिवर्तित नहीं होता वह मृत है। परिवर्तन ही जींवन का प्राण है; स्थायित्व मृत्यु का अंग है।
यह समस्त पुरानी परंपराओं के खिलाफ था और उन समस्त अन्य परंपराओं के खिलाफ था जो जरथुस्त्र के बाद पैदा होने को थीं। वे सब की सब स्थायित्व में यकीन करने वाली थीं। उनके लिए, परिवर्तन स्वप्न का गुण था, और स्थायित्व यथार्थ का गुण था — जो परिवर्तित होता है वह अयथार्थ है और— जो हमेशा वही का वही रहता है वह यथार्थ है। इन तीनों शिक्षकों के खिलाफ दुनिया के समस्त शिक्षक — धार्मिक अथवा दार्शनिक — इस एक बात पर राजी हैं।
लेकिन मैं जरथुस्त्र के और गौतम बुद्ध के और हेराक्लाइटस के समर्थन में हूं — क्योंकि तीन सौ वर्षों की सारी वैज्ञानिक शोधों ने उन्हें सच सिद्ध किया है, न कि दुनिया के सारे दार्शनिकों की और सारे संतों की और सारे धर्मशास्त्रियों की भीड को।
जरथुस्त्र विज्ञान द्वारा मान्य होते हैं — ऐसे ही गौतम बुद्ध, ऐसे ही हेराक्लाइटस होते हैं। निश्चित ही स्वयं अपने दिनों में वे हंसी के पात्र बने थे। वे कुछ बात भीड़ के खिलाफ कह रहे थे, समूचे लंबे अतीत के खिलाफ, समस्त विचारकों के खिलाफ और मनुष्य की मानसिकता में छिपी एक इच्छा विशेष के खिलाफ : मनुष्य चाहता है कि चीजें स्थायी हों। और इस बात को याद रखना है, मनुष्य परिवर्तन से भयभीत है। वह परिवर्तन से भयभीत है क्योंकि कोई नहीं जानता कि परिवर्तन क्या सामने लाएगा।
तुम उससे परिचित हो जो स्थायी है; तुम जानते हो कि उससे कैसे व्यवहार करना। तुमने उसके संबंध में सब कुछ सीख लिया है। तुम उसके साथ चैन में होते हो, वह अनोखा, अपरिचित नहीं रह गया है। लेकिन यदि जीवन एक सतत प्रवाह होने वाला है, एक क्षण— क्षण परिवर्तन, तो उसका अर्थ है कि तुम सदाइही अज्ञात का सामना करनेवाले हो। वह एक गहन भय पैदा करता है, क्योंकि उसका सामना करने के लिए तुम पहले से तैयार नहीं रहोगे। तुम्हें सहजस्फूर्त रूप से ही व्यवहार करना होगा। यह है समस्या। सहजस्फूर्तता को सजगता की जरूरत है, चेतना की एक खास गहराई की जरूरत है — क्योंकि यदि हर क्षण जीवन बदल रहा है तो हर क्षण तुम्हें अज्ञात को, अपरिचित को, अजनबी को प्रसरित करने के लिए तैयार रहना होगा। तुम उसके लिए पहले से तैयार नहीं हो सकते क्योंकि तुम नहीं जानते कि कल क्या होने वाला है। तुम कोई पूर्वाभ्यास नहीं कर सकते; यह कोई नाटक नहीं है।

रथुस्त्र की अंतर्दृष्टि को समझना ही होगा, क्योंकि वही मनुष्य का भविष्य का धर्म होने जा रही है। विज्ञान की जड़ें अधिकाधिक मनुष्य की चेतना में अवस्थित होंगी। अब तक हम विज्ञान का उपयोग केवल वस्तुगत जगत की खोज में करने में सक्षम हुए हैं। वह दिन बहुत दूर नहीं है जब विज्ञान मनुष्य की आत्मपरकता की तरफ बढ़ने व गवेषणा करने लगेगा — उसके अतंर्जगत की।
कब तक तुम स्वयं से बच सकते हो?
कब तक वैज्ञानिक वस्तुओं पर काम करते और चेतना के संबंध में भूलते जा सकते हैं? कब तक वैज्ञानिक स्वयं का इनकार कर सकता है, और रसायनशास्त्र और भौतिकी और जीव—विज्ञान और भूगर्भशास्त्र के क्षेत्रों में काम करता जा सकता है? देर—अबेर उसे इसके संबंध में सोचना ही होगा। 'मेरे भीतर यह चेतना कौन है? मैं कौन हूं?' — वह पूछने ही वाला है। पहले ही काफी देर हो चुकी है; अब तक उसे पूछ ही लेना था।

रथुस्त्र की अंतर्दृष्टिया इतनी महान हैं कि यह लगभग अविश्वसनीय प्रतीत होता है कि कोई व्यक्ति पच्चीस सदियों पूर्व उसे देखने में समर्थ था जिसे वैज्ञानिक अब जान रहे हैं : कुछ भी, एक पल को भी, स्थिर नहीं है।
दुनिया में सब कुछ केवल एक प्रवाह है; कुछ भी स्थायी नहीं है। और जरथुस्त्र अथवा गौतम बुद्ध अथवा हेराक्लाइटस क्यों इस तथ्य पर जोर दे रहे हैं? — क्योंकि यह नैतिकता के प्रति, धर्म के प्रति, हमारे संबंधों के प्रति, हमारे जीवन के प्रति हमारे पूरे रुख को प्रभावित करेगा।
इसके निहितार्थ बहुत—बहुत सुदूरगामी होनेवाले हैं। यदि सब कुछ परिवर्तित हो रहा है तो अच्छाई और बुराई की कोई अवधारणा स्थायी के रूप में नहीं हो सकती, तब कोई परमात्मा स्थायी के रूप में नहीं हो सकता, तब कोई भी मूल्य लोगों पर सदा—सदा के लिए समस्त आने वाले युगों के लिए नहीं थोपे जा सकते। तब हमें स्वतंत्रता में जीना होगा और लोगों को स्थितियों को सहजस्फूर्त रूप से प्रस्थरित करने की अनुमति देनी होगी, क्योंकि तुम निर्धारित सिद्धात लेकर नहीं चल सकते।
निर्धारित सिद्धात बहुत—बहुत पीछे घिसट रहे होंगे, और तुम अस्तित्व के साथ सदा ही बेमेल  (मिसफिट ) रहोगे। सारे तुम्हारे धर्मग्रंथ निरर्थक हो जाते हैं, क्योंकि वे बदलते नहीं। सारे तुम्हारे दर्शनशास्त्र निरर्थक हो जाते हैं, क्योंकि जीवन बदलता जाता है।
कोई भी चीज जो अपरिवर्तित बनी रहती है वह समस्त सार्थकता खो देती है — वह जीवन के किसी काम की नहीं, उसे मार्ग से हटा देना होगा। केवल तब एक चीज उभरती है और वह है : सजगता। तुम्हें उन समस्त परिवर्तनों के प्रति सजग होना होगा जो तुम्हारे चारों तरफ जारी हैं, ताकि तुम पीछे न घिसटो। अपनी सजगता के रहते, हर परिवर्तन के साथ तुम भी परिवर्तित होते हो। तुम निर्धारित आदर्शों के वश होकर कृत्य नहीं करते, तुम क्षण की अपनी सबगतावश कृत्य करते हो। 
इसका मतलब है कि किसी धर्म के रहने के लिए कोई कारण नहीं है। इसका मतलब है कि किसी नैतिकता के रहने के लिए कोई वैधता नहीं है। इसका मतलब है कि केवल एक ही चीज है जो अर्थवान है, और वह है : कैसे अधिक होशुपूर्ण होना, ताकि तुम्हें जीवन के सुर—ताल से बाहर पड़ने की जरूरत न रह जाए ताकि तुम्हारे हृदय की धड़कन समूचे अस्तित्व के हृदय की धड़कन के साथ समस्वर रहे। यही एकमात्र आध्यात्मिकता है।
और यह तुम्हें हर रोज नयी अंतर्दृष्टियां, नये मूल्य लाएगा। यह तुम्हें सदैव संवेदनशील रखेगा, तुम्हारी अंतिम सांस तक तुम युवा बने रहोगे। तुम्हारा शरीर बूढ़ा हो सकता है, लेकिन तुम्हारी चेतना स्वयं को प्रतिपल नया कर रही होगी — जैसे कि नदी बढ़ती जाती है, बहती और स्वयं को तरोताजा करती; वह कभी गंदी नहीं होती।

..........ऐसा जरथुस्त्र ने कहा।