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सोमवार, 2 दिसंबर 2013

अंधा कुत्‍ता--कहानी

सेन्‍ट्रर्ल पार्क का जो एक मात्र पुराना लैम्प था,  अब उसकी रोशनी-रोशनी न रह कर मात्र जुगनू की चमक भर रह गई थी।  पर वह अपनी ऐतिहासिकता के एक मात्र कारण ही देखने की वस्‍तु बनकर रह गया। उसको देख कर अँग्रेजों की याद आये बिन आपको नहीं  रहेगी जो युग उसने जीया था। की ये कभी जलता था, आस पास के लोगो को आने जाने में सुविधा देता था। पर अब सरकार ने आधुनिक तरह की ऊंची लाईट लगा दी है। जिसकी रोशनी पूरे पार्क को ही नहीं आस पास की सड़क तक को रोशन कर रही होती है। वैसे तो स्‍ट्रीट लाईट सालों बाद भी जलती थी। पर उस विशाल रोशनी के आगे उस बेचारी की क्‍या बिसात, यूं कि आप सूरज के आगे दीप जलाये हो। वह तो मात्र उन दुकान चलाने वाले के लिए प्रतीकात्मक की वस्‍तु भर बन गया था। आज भी उसी के आस पास हाट बजार लगता था।
छोटी-छोटी दुकानों की रौनक श्‍याम के समय देखते ही बनती थी। उधर से आने जाने वाले ज्‍यादातर राहगीर वही से दैनिक इस्‍तेमाल का सामान खरीदते थे। फल-सब्‍जी वाला, एक पान वाला, एक पुराने कपड़े जो हर कपड़े 25रू दाम बोलता था। आज कल जामुन के पेड़ पास जो कोना था, उस के पास एक जूतों वाला भी बैठने लगा है। जो जूते और चपल का ढेर लगा कर आने-जाने वालों को आवज मार-मार कर रिझाने की कोशिश करता है, हर जूते का दाम सौ रूपये..लुट का माल है भाईयों लुट लो। पास ही झनकु चाय वाला था।
      जिस की चाय की चर्चा पूरे शहर में मशहूर थी। उसकी दुकान पर दस पाँच आदमियों की भीड़ हमेशा लगी ही रही थी। कहते है झनकु के पिता के हाथ में जादू था, एक बार आप उसके हाथ की चाय पी लो फिर आप गये काम से। पर हमने तो नहीं देखा, पर कुछ बुर्जग कहते है कि उस जमाने में मिटटी के सकोरो में ही चाय मिलती थी। आप अगर झनकु की दुकान पर चाय ले कर चाय मैं फूँक मार कर ठंडी करने की कोशिश की तो वह आपके हाथ से सकोरा छीन लेता था। की साहब चाय पीनी नहीं आता तो फिर नाहक क्‍यों परेशान होते हो। आप छाछ जाकर पीओ। अरे चाय का लुत्फ तो हलकी-हलकी चुस्‍की लगाने में है। देखा नहीं जापान के लोग कैसे चाय पीते है। उनके यहां तो एक मंदिर होता है चाय पीने का। ये तो पूजा का प्रसाद है। की ध्‍यानी का वरदान है। कहावत है की एक बार किसी झेन गुरु जब रात को ध्‍यान करते बार-बार नींद की झपकी आने लगी, कहते है उसने दुःखी हो कर अपनी दोनों पलकें उखाड़ कर फेंक दी, उन्‍हीं पलकों से ये  चाय का पौधा उगा। अब भला जेन गुरु को यहां कौन समझे, यहां ता ज़िंदगी की भागम-भाग में ही रूल जाती है पूरा जीवन। अब कहावत तो कहावत है। पर चाय का निकोटीन हमारा होश बढ़ता है।, ये बात वैज्ञानिक भी जान गये है। ये पौधा कोई साधारण पौधा नहीं है। कोई औषधि समाये है। जिस पर्वत पर चीज में चाये पाई गई थी। उस पर्वत का नाम था चाह और पूरी दूनियां में उसे इसी नाम से जाना जाता है।
      अब आप को अगर झनकु के हाथ की चाय की लत लग गई तो ये प्रवचन तो सुनने ही पड़ेंगे। वरना घर जाकर पत्नी के हाथ का काली धौण पीओ जनाब। झनकु की दूकान के दस कदम दूर एक बरसाती पानी की निकासी के लिए पुलिया है। बनी होगी वह कोई 80-90 साल पहले अंग्रेजों की जमाने की कारीगरी भी कमाल थी। इँट टुट जाये मजाल है, मसाले से आप उसे यूं ही अलग कर दो देश आजादी के बाद बनी कितनी की पुलिया, कोठीया अभी बनी नहीं कि आप देखें तो आपको बाबा आदमी के जमाने की लगेगी। पर इतनी पुरानी पुलिया आज भी अच्‍छी हालत में है। में अब उम्र के उस पड़ाव पर पहुंच गया था जब शरीर अपने उतार पर आ जाता हे। ज्‍यादा देर चलने से थक जाता था। इस लिए कुछ पल के लिए उस पुलिया पर में जरूर बैठता था। आस पास बरसाती पानी की नमी के कारण घास पात वहां काफी उगी रहता था। खास कर गाजर घास इसने तो अमरीका से आकर पूरे भारत पर अपना प्रभुत्‍व ही जमा लिया है। वहीं एक गड्ढे के पास काल सफेद चितके वाला कुत्‍ता अक्‍सर मुहँ को जमीन पर टेके बड़े ही शांत भाव से बैठा रहता था। इससे पहले भी मैंने उसे कई बार देखा। पर एक उड़ती सी नजर से। पर आज अचानक कुछ ऐसा हो गया कि मेरा ध्‍यान उसने अपनी और खींचा।     अचानक एक पुलिस वाल हाथ में डंडा लिए उसके पास से चला गया। पर वह शांत भाव से बैठा रहा, फिर एक महात्‍मा भी अपना भिक्षा पात्र हाथ में लिए भजन गात चला गया। अब मेरे कान कुछ खड़े हुए। हद तो जब हो गई जब पार्क में कुड़ा कचरा बीनने वाला, जो सरकार के पार्क की आधी सफाई तो यूं ही कर देते है। अपना पेट भरने के लिए, जिस के लिए भारत सरकार उन्‍हें धन्‍यवाद तक नहीं देती।
      वरना भारत के पूर्व में चाहे अनेक धर्म संप्रदाय जाती भेद रहे हो। पर अब उन सब को समेट सुकेड़ कर एक ही धर्म ने अपनी गोद में ले लिया है। ‘’कुडा कचरा’’ आप पूरे भारत में
घूम-फिर कर देख सकते है। और ये धार्मिकता धार्मिक स्‍थानों पर तो प्रचुर मात्रा पर मिलेगी ही। यहां वहां जहां तक आपकी नजरे जायेगी कोने कतरो, पार्क के अंदर, गली मोहलो में भी इस को देख सकते है। गंदगी के मामले में और जनसंख्‍या के मामले में हम नौबल प्राइज़ ले सकते है। पर कोई दे तब ना.....भारत का अब एक ही धर्म रह गया गंदगी फैलाऔ। अब वो कबाड़ी भी वहां सक गुजर गया। भई ये तो हद हो गई। आज तो चमत्‍कार पे चमत्‍कार दिखाई दे रहे है। कुत्तों के बारे में जो आज तक मैंने पढ़ा या सुना या समझा। या बेचारे खलील जिब्राहिम साहब भी अगर आज यहां होते तो अपने दांतों तले उँगली जरूरी दबा लेते या। कि ये क्‍या हो गया हजारों साल से सुनते आये है कुत्‍ते के भौंकने के बारे में आज वह दर्शन शस्‍त्र फैल हो गया। मुझे लगा ये हो न हो कुत्तों का कोई बुद्ध हो। ऐसा संत कुत्‍ता कभी किसी ने कहीं नहीं देखा होगा।
      मेरी जिज्ञासा और बढ़ी। मैं उठा और उसकी और बढ़ा....मेरे पैरो की आहट सून कर उसने भय के कारण अपनी गर्दन उठा कर मेरी और देखा। मैं रूक गया। अंदर से थोड़ा डरा भी हालांकि में कुत्तों से डरता नहीं। क्‍योंकि मेरा मानना है वह नाहक किसी को वे नहीं काटते। पर आज डर गया। उसने जहां में चलते-चलते रुका था, भय के कारण,  उससे कुछ भिन्‍न दिशा में देखा। मैं दबे पैर कुछ और आगे बढ़ा। और उस कुत्‍ते ने अपने बचाव का हथियार निकाल लिया। और पूछ हिलाने लगा। इससे मेरा भय गायब हो गया। क्‍योंकि कुत्ता जो पूछ हिलायेगा, और भौकेगा,वह काटेगा नहीं....पुरानी कहावत है, बिन भौंकने वाले कुत्‍ते से, गंभीर औरत से, और शांत जल से हमेशा बचना चाहिए। अब ये बातें यूं ही नहीं कह दि गई होंगी। इन बातों में एक-एक युग का अनुभव है।
      थोड़ा और पास जाकर मैंने देखा उसकी दोनों आंखों की पुतलियाँ एक दम सफेद थी। जैसे नीले आसमान को स्‍वेत बादलों ने ढक लिया हो। अब वहां कहां चाँद-तारे कहां बेचार सूरज झांक सकता था। एक सफेद धुंध फैल गई और चारों और। मैं जहां पर खड़ा था वह उस दिशा से थोड़ा भिन्‍न दिशा में गर्दन टेढ़ी कर के देखने की कोशिश कर शायद आवाज से समझने की कोशिश कर  रहा था। मैं समझ गया ये बेचार कुत्‍ता बुद्ध तो नहीं निकला पर मेरे अनुमान के आनुसार संत जरूर निकला। ये तो अंधा था बेचार सूरदास। सूना नहीं कभी किसी किताब में कि कोई अंधा कुत्‍ता भी होता है। पर साधारण सी बात है आंखे है तो खराब भी हो सकती है। इस में मुझे इतना अचरज करने की कोई जरूरत नहीं है। मैं पास ही जो झनकु चाचा की दुकान थी उस पर गया। और दो रूपये का एक बिस्‍कुट मांगा। पैसे देते हुए मेंने पूछा भैया वो जो कुत्ता बैठा है वो अंधा है क्‍या? उसने मुझे उपर से नीचे तक दो बाद देखा और बचे तीन रूपये और बिस्‍कुट मेरे हाथ पर रखते हुए कहने लगा। कपड़ों से तो पढ़ लिखे लगते हो। पर लगता है काले अक्षर ही पढ़े है, जीवन की पढ़ाई नहीं जानी। मैं उसके उत्‍तर से थोड़ा झेपा, क्‍योंकि हम जिस विषय को जानते है, उसी विषय के बारे में सामने वाले से क्‍यों पूछते है। जैसे किसी की शादी का टेंट लगा हो आप पूछेंगे आज यहां क्‍या हो रहा है। हालांकि आप जानते है। ये मनुष्‍य का बहुत बड़ा रोग है.... और हथेली पर रखे खुदरे पैसों को जोर से बंद किया और मुड़ गया। पीछे से झनकु के शब्‍द सुनाई देते रहे न जाने लोग इतने अखबार पढ़ते है, फिर भी सामान्‍य ग्‍यान में पिछड़ते क्‍यों जा रहे है......
      मेरा ज्ञान भी कितना था। घर से दफ्तर और कुछ चटपटी खबर, बलत्‍कार, या घोटालों के विषय में.....बस इतना ही पचा पाता था। एक प्रकार से सरकारी कर्मचारी कुएँ का मेंढ़क हो जाता है। मैं वहां से जल्‍दी दूर जाना चाहता था, ताकि मेरे कानों में उनकी आवज न आये। क्‍योंकि में जानता था ये छोटा मोटा काम करने वाले दूकान दार इतने वाक पट्टू हो जोत है कि अच्‍छे-अच्‍छों के कान कुतरते है। वरना इस तरह सड़क पर बैठ कर रोजी रोटी चलाना कोई आसान काम है। हम जैसे भोंदू को अगर यहां बैठा दिया जाये तो श्‍याम तक दस पैसे न कमा सके। भला हो भगवान का वह सब पर दया करता है। उसने हम सरकारी नौकरी दे दी वरना तो न जाने क्‍या होता अपना।
      मेरे पैरों की आहट सुन कर उसने मुझे पहचान लिया, और जौर-जौर से पूछ हिलाने लगा। मैंने पैकिट खोला और उसके सामने बिस्‍कुट रख दिये, उसने उन्‍हें एक बार सूंघा और फिर एक अदृष्‍य आसमान की और देखा और खाने लेगा। वह एक-एक बिस्‍कुट को बड़े चाव से खा रहा था इसका अंदाज मुझे उसके चेहरे और पूछ से लग रहा था। मैने इधर उधर देख कर एक बिस्‍कुट अपने मुख में डाल लिया। सोचा ये कोन यहां देख रहा है। अब मैं रोज वहां से आने लगा। और दिन में अपने टिफिन से उसके लिए एक रोटी और सब्‍जी रख लेता। पर जिस दिन मेरी छूटी होती या बरसात वगैरह आ जाती तो में वहां नहीं जा पाता था। उसकी याद जब मैं घर पर खाना खाने लगता तो आती। कि आज मेरा दोस्‍त मेरा इंतजार करता ही रह गया।
      मेरा घर बहुत छोटा था, दो कमरों का, सामने थोड़ा आँगन था। जहां पर हम कभी शारदी की धूप लेने के लिए बैठ जाते थे। वरना तो वह जगह उपेक्षित ही पड़ी रहती था। परिवार में इस समय हम दो ही प्राणी थे, पति-पत्‍नी मात्र। लड़का नौकरी के सिलसिले में बंगलोर चला गया। और लड़की की शादी कद दी वह पराये घर की हो गई। कभी आती भी है तो साल में एक दो घंटे भर के लिए। मैंने कितनी बार सोचा उस कुत्‍ते के विषय में पत्‍नी से बात करू। कि उसे अपने घर ले आया जाये। फिर सोचा पता नहीं अंधे कुत्‍ते को देख कर वह क्‍या सोचेगी। कि ये किस काम का न चौकिदारा कर सकेगा न ही आते जाते को देख कर भोंक सकेगी। वैसे भी चौकीदारा करवाने के लिए हमारे पास था ही क्‍या। ये शोक और जरूरत तो अमीरों के लिए ही है। पैसा हो तो आप चाहे चार कुत्‍ते पाल लो आज कल तो ये स्‍टेटस हो गया है। जिसके पास जितने कुत्‍ते उतना ही वह अमीर। फिर पड़ोसियों के बारे में भी कुछ शंका थी कि वो भी ऐतराज करेंगे। सो एक ओर इच्‍छा को में अपने मन में ही दबा कर रह गया। जहां हजारों अधूरी इच्‍छाएं पड़ी है वहां एक और किसी कोने में समा जायेगी। बात आई गई हो गई। पर मैं उस कुत्‍ते से रोज मिलता। वह भी मुझे देख कर बहुत खुश होता था।
      दीपावली के दिन थे, सारे बाजार सज रहे थे। पूरे भारत में दीवाली से एक माह पहले आपको शहर का माहोल बदला-बदला नजर आने लगेगा। पहले तो रामलीला की रौनक, और फिर दीवाली। इसी बीच मैं कई-कई दिन उस और जा नहीं पाया था। क्‍योंकि इन दिनों श्‍याम जल्‍दी ढलने लग जाती ओर अँधेरा बहुत पहले ही उतर आता है। तभी मैंने अखबार में उस अंधे कुत्ते का फोटो देख। मेंने फटा-फट सारी खबर पढ़ी तो मैं दंग रह गया। किसी सेठ की दूकान पर कुछ ज़ेवरों की चोरी हो गई। चोरों का कोई पता नहीं चल रहा था। पुलिस काफी परेशान थी। लेकिन अचानक उनकी पकड़ में चौर आ गये। हुआ यूं कि चोरों ने चोरी का सामन उस नाले में दबा दिया। ताकि कुछ मामला ठंडा हो जाये तो बाद में निकल ले। पर जब वह उस सामान को निकलने के लिए आये तो इस अंधे कुत्‍ते को न जाने क्‍या समझ आई की उन चोरों में से एक तो पैर पर काट लिया, एक को हाथ पर काट लिया, ओर एक की पैंट पकड़ ली, चारों और शोर मचा तो भीड़ इक्कठा हो गई। उधर से गश्त पर जो हवलदार साहब घूम रहे थे। वह भी उधर लपका ओर लोगो ने बताया की देखो गड्ढे में कुछ जेवर है, और इस अंधे कुत्‍ते ने एक चोर को पकड़ लिया। हवलदार साहब ने चोर को पकड़ा और जेवर की पोटली उठाई और थाने की और चल दिया। जनता भी पीछे-पीछे गई ताकी चोर भाग न जाये। बेचार रह गया अंध कुत्‍ता उसकी और किसी का ध्‍यान नहीं गया। लिखा कि बहादूर अंधे कुत्‍ते ने लाखों की चोरी का राज खोला और चोरों को पकड़वाया।
      मेरा सीना फूल कर कुप्‍पा हो गया। उस समय मुझे अपने दोस्‍त की बहुत याद आई। लगा की कब छूटी हो जाये और में आपने दोस्‍त के पास जाऊं और उसे शाबाशी जाकर दूँ। पर में जब उधर से गुजरा तो वहां पर एक दम सन्नाटा सा था। झनकु की चाय की दूकान पर भीड़ थी। पर झनकु की दूकान पर मेरा जाने का साहस नही हुआ। और मैं इधर उधर चोर नजरों से देखता हुआ घर चला आया। सोचा कल पुलिस स्‍टेशन पर ही जाकर पता करूंगा। उस रात मैंने पत्‍नी को अपने दोस्‍त अंधे कुत्‍ते की कथा सुनाई। की कैसे उसने लाखों की चोरी का माल बरामद करवाया और चौरों को भी पकड़वाया। और उत्‍साह में भर कर मैंने कह दिया कि मैं आपसे कहने वाला था कि इस कुत्‍ते को अपने घर ले आये। पर मैं कह नहीं सका। देखा इसने कितनी बहादुरी का काम किया है, अंधा होने पर भी कि आँख वालो को मात दे दी। पता है कुत्ता आदमी को सूंघ भर लेने से पहचान जाता है कि आपके विचार कैसे है। आपका स्‍वभाव कैसा है। मेरी पत्‍नी को इन बातों में कोई रस नहीं था। वो मुझे ऐसे देखने लगी मानों में सठिया गया हूं। और हंसती हुई दूसरें कामों में लग गई। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि इतनी चमत्‍कारी बात में भी किसी को रस नहीं हो ऐसा कैसे सकता है। पर मैं अपने उत्‍साह और जोश की गर्दन दबा कर बैठ गया।
      अगले दिन में दफ्तर से कुछ जल्‍दी निकला और उस पुलिस स्टेशन पर जाकर पूछा तो पता चला कि जिस सेठ के घर चौरी हुई है। वह इतना खुश हुआ की उस अंधे कुत्‍ते को अपनी कार में बिठा कर अपनी कोठी में ले गया। मैने पूछा आप मुझे उस सेठ की कोठी का पता बता सकते है। वहां खड़े सिपाही ने कहां ये हमारे बूते के बहार की बात है। इंस्पेक्टर साहब से बात कर के देख लो। मैं डरते हुए अंदर गया। शायद पहली बार पुलिस स्‍टेशन का मुखड़ा देखा था। पर मुझे देख कर इंस्‍पेक्‍टर साहब अच्‍छे से बोले और पूछने लगे आप इस अंधे कुत्‍ते को कैसे जानते हो। मैने सारी बात बताई ओर उस सेठ का पता चाहा। कि मैं एकबार उस से मिलना चाहता हूं। तब इंस्‍पेक्‍टर ने कहा छोड़ो भी अब तो वह कुत्‍ता अंधा भला हो पर अमीर हो गया। शायद उस की आंखे भी सेठ ठीक कर दे। पता है पाँच लाख की चौरी बरामद हुई है। अब वह आपके काम का नहीं है शायद वह आपको पहचाने भी नहीं। पर मैं जानता था ये बातें फिजूल है। मेरा दोस्‍त कोई मनुष्‍य थोड़ ही है जिस पर पैसे का रंग चढ़ जाये। वह तो एक प्‍यारा अंधा कुत्‍ता है.....पर मैं उससे मिलने का जो साहस लेकर गया वह चकना चुर हो गया। और मैं उस से मिलने नहीं गया।
      पर मुझे अंदर-अंदर एक खुशी थी,की मेरा दोस्‍त अब जहां भी है उसे कोई दूःख नहीं होगा। अब जब भी में वहां से गुजरता अब भी उस पुलिया पर कुछ देर जरूर दम लेता और उस दोस्‍त को याद करता। पता नहीं उसे मेरी याद आती होगी या नहीं। पर उसके बिना वह जगह सूनी-सूनी सी लगती थी। लगता था अभी पल में मेरा दोस्‍त आ जायेगा। और पूछ हिलाने लगेगा। पर ऐसा न हो तो ही अच्‍छा है। वो वहां आराम से होगा........इतना तो मुझे यकीन करना ही होगा।
      उसकी जिंदगी मजे से कट रही होगी यही सोच कर मैं अति प्रसन्‍न हो कार मंत्र मुग्‍ध सा वहां से भारी कदमों पर चल कर घर पहूंच जाता हूं।
      खुश रह मेरे दोस्‍त....
स्‍वामी आनंद प्रसाद ‘’मनसा’’