कुल पेज दृश्य

बुधवार, 4 दिसंबर 2013

जरथुस्‍त्र--नाचता गाता मसीहा--(ओशो) सताईस्‍वां--प्रवचन

उच्चतर मानव से मुलाकात की बात—(सताईसवां—प्रवचन)  

प्यारे ओशो,  

महीने और बीतते हैं, और जरमुस्त्र के बाल सफेद होते हैं जबकि वह प्रतीक्षा करते हैं उस संकेत की कि यही समय है नीचे उतरकर मनुष्यों तक उनके फिर से जाने का। एक दिन जबकि वह अपनी गुफा के बाहर बैठे हैं जरमुस्त्र के पास वृद्ध पैगंबर आता है जो जरमुस्त्रू को सावधान करता है कि वह उनको उनके चरम पाप के प्रति फुसलाने के लिए आया है — दया खाने का पाप
'उच्चतर मानव' के लिए दया? जरमुस्त्र इससे दहल जाते हैं लेकिन अंतत: राजी होते हैं
उच्चतर मानव की चीख का जवाब देने के लिए उसे खोज निकालने और उसकी मदद करने के लिए

जरयुस्त्र तेजी से आगे बढ़ते हैं और अपने समस्त अभ्यागतों को वहां एकत्र पाते हैं —
राजे— महाराजे सदसद्विवेकी भावना का व्यक्ति जादूगर खा पोप इत्यादि : क्योकि वे ही उच्चतर मानव' हैं।

रथुस्त्र के पास उच्चतर मानव के लिए कोई सम्मान नहीं है, क्योंकि उच्चतर मानव अन्य कोई नहीं केवल पुराना मनुष्य है और भी बड़े अहंकार से युक्त। वह उच्चतम हो सकता है क्योंकि उसके पास शक्ति है, वह एक राजा है; वह उच्चतर हो सकता है क्योंकि उसके पास ज्ञानहै, जो सारा का सारा उधार है; वह उच्चतर हो सकता है क्योंकि उसके पास सद्गुण और एक नैतिक आचरण है, जो सब के सब सड़े—गले और पुरातनपंथी हैं जो समय के साथ जरा भी तालमेल में नहीं हैं। इस उच्चतर मानव को जरथुस्त्र का परमानव समझने के भ्रम में नहीं पड़ना है। परममानव एक सातत्यभंग है मनुष्य के साथ जैसा वह है। परममानव के देखे, उच्चतर मानव को मरना होगा — अपने समस्त ज्ञान सहित, समस्त सद्गुणों सहित, समस्त अहंकार सहित — और बच्चों जैसी शुद्ध चेतना के लिए जगह खाली करनी होगी। उच्चतर मानव एक सातत्य है। यह वही पुराना मनुष्य ही है, धन से आध्यात्मिकता से, धार्मिकता से, सम्माननीयता से, शक्ति और सत्ता से सुसज्जित — लेकिन मूलत: यह वही पुराना मनुष्य ही है। परममानव एक निपट सातत्यभंग है; वह पूर्णत: नया है। तो इस भेद को अपने मन में स्मरण रखना।
उच्चतर मानव से मुलाकातें परममानव से मुलाकातें नहीं हैं, यद्यपि उच्चतर मानव ने सदा स्वयं को परममानव समझा है। व्ह उसकी अहंकारी प्रवृत्ति है। परममानव को श्रेष्ठता का कुछ भी पता नहीं है — यही उसकी श्रेष्ठता है। वह केवल एक निर्दोष, बच्चों जैसी स्वतंत्रता को जानता है। उसके लिए संपूर्ण अस्तित्व ही एक रहस्य है और उसकी आखें विस्मयबोध से भरी हुई हैं, ज्ञान से भरी हुई नहीं। तो दोनों अवधारणाओं को अलग—अलग रखो। उच्चतर मानव निंदित है, क्योंकि वह परममानव होने का ढोंग कर रहा है। वह परममानव के आगमन की राह में रुकावट डाल रहा है। वह नकली है, मिथ्या।
परममानव के पास एक ही गुण है : वह इतना निर्दोष है जैसे कोई नवजात शिशु। और वह किसी भी प्रकार के बोझ से नितांत स्वतंत्र है, चाहे वह धन—दौलत का हो अथवा ज्ञान का हो अथवा सद्गुणों का हो अथवा संतत्व का हो। उसको पूरा आकाश ही उपलब्ध है, क्योंकि वह निर्भार है और वह सुदूरतम सितारों तक उड़ सकता है; पूरा अस्तित्व ही उसका क्षेत्र बन जाता है। एक अर्थों में कुछ भी उसका नहीं है, और एक दूसरे अर्थों में सब कुछ केवल उसका ही है। लेकिन वह मालिकियत का दावा नहीं करता — कोई जरूरत नहीं है, सब कुछ उसका है।
मालिकियतपना सदैव ही शक्ति की निशानी है, और शक्ति केवल गरीबी, हीनता सूचित करती है। केवल हीन व्यक्ति श्रेष्ठ होना चाहता है, क्योंकि हीनता के साथ जीना कठिन है। हीन व्यक्ति धन—दौलत पाना चाहता है, राज्य पाना चाहता है, ज्ञान पाना चाहता है, धार्मिक व्यक्ति बनना चाहता है, लेकिन किसी ढंग से वह अपनी हीनता को छिपाना चाहता है ताकि वह उसके बारे में सब कुछ भूल सके। वह एक खुली किताब नहीं है; खुली किताब होने की उसकी सामर्थ्य नहीं है। वह बहुत छिपाऊ है, क्योंकि वह जानता है कि वह क्या छिपा रहा है अपने भीतर।
जरथुस्त्र. नाचता—गाता मसीहा  परममानव बस एक खुली किताब है। कुछ भी छिपाने को नहीं है, और कुछ भी मालिक बनने को नहीं है। शिशुवत संत की उन विस्मयविमुग्ध आखों में सब कुछ पर मालिकियत है बिना किसी मालिकियत के। परममानव गरीब नहीं है — इतना गरीब नहीं कि मालिकियत करे, इतना गरीब नहीं कि अपनी श्रेष्ठता की अथवा अपनी पवित्रता की डींग हाके। डींग हाकने का उसे कुछ भी पता नहीं है। वह इतना भरा है हर्षोल्लास से — पक्षियों का, फूलों का, नदियों का सीधा—सादा हर्षोल्लास; हर्षोल्लास जिस पर कोई खर्च नहीं लगता; क्योंकि जरथुस्त्र के अनुसार कोई भी चीज जिस पर कीमत है किसी मूल्य की नहीं, केवलवे ही चीजें मूल्यवान हैं जिन पर कोई कीमत नहीं।
परममानव के पास समस्त मूल्य हैं, लेकिन उसके मूल्यों का क्रय—विक्रय नहीं हो सकता; वे वस्तुएं नहीं हैं। उसके पास अपरिसीम प्रेम है, विशाल स्पष्टता है; उसके पास आत्मा की शुद्धता है; वह चालबाजी, राजनीति, कूटनीति द्वारा अप्रदूषित है। वह बस वही है जो वह है, और वह सब के लिए उपलब्ध है।

रममानव के गुण क्या होंगे?
उसका मूलभूत गुण होगा परम चेतना। उसके कृत्य चैतन्य से निकलेंगे, किसी नैतिक विधान से नहीं। वह हर स्थिति को सहजस्फूर्त रूप से प्रतिसंवेदित करेगा। — किसी धर्मशास्त्र के अनुसार नहीं, बल्कि अपनी ही परम चेतना के अनुसार। वह परमात्मा की, स्वर्ग और नर्क की समस्त कल्पनाओं से नितांत मुक्त होगा। स्वतंत्रता ही उसके हृदय की धड़कन होगी, और चेतना उसे एक प्रसाद, सौंदर्य, आनदमयता, धन्यता का जीवन प्रदान करेगी। वह प्रेम से छलक रहा होगा। वह अतिशय रूप से शक्तिशाली होगा, लेकिन दूसरों के ऊपर नहीं। उसकी शक्ति उसका प्रेम होगा।
उसकी शक्ति उसका खजाना होगा जिसे वह बांट सके।
उसकी शक्ति उसका सतत बांटना होगा।
वह किसी व्यक्ति को भिखारी नहीं बना सकता; वह किसी व्यक्ति की गरिमा नहीं छीन सकता। वह एक मित्र के रूप में, एक सहयात्री के रूप में प्रेम व चेतना प्रदान करेगा, लेकिन वह कभी भी, सपने में भी, स्वयं को उच्चतर अथवा पवित्रतर नहीं समझेगा।
वह नितांत निर्दोष होगा।
अपनी निदाषिता में वह पवित्र होगा, और अपने प्रेम में वह धनी होगा, और अपनी परम चेतना में वह भगवत्ता के गुणवाला होगा। 

.......ऐसा जरथुस्‍त्र ने कहा।