कौन छूना चाहत है, पुष्प की
संवेदना को।
तोड़ पत्थरों पर चढ़ते, पुछते हो
वेदना को।
जीवन क्षणिक उसको मिला था,
किस तरह हंसता-खिला था।
शूल के लब पर पला था,
एक क्षण भी न वो मुसकुराया,
तोड़ कर उसको चढ़ा दिया
उन पाषाण के देवालय पर
तुम पूजते हो किस शिला को
क्यों सहलाते हो उस बंधना को.....
किसी अदा-अठखेलिया से
भ्रमरों ने गीत गया।
बैठे कर कोमल पात पर,
मधुरता का गान गा कर।
रंग और खुशियां लुटाई
पर कहां जग को सुहाई
छू सके उसके दर्द को
जग को बस ये ज्ञान देना...
और पीड़ा के मर्म को
कहां जगत की वह रित खो गई
क्या ये कुछ अनहोनी न हो गई
छीन कर उसकी ख़ुशी को
मुक्ति और अमृत का छल दे
कहां--शुभ और मुहूर्त है तुझसे
ऐसी ये हमने रित बनाई
झूठ के पर्दों को तुम
एक नया कोई नाम न देना....
शीश-अहं अपना चढ़ते
मुक्ति का अहसास पाते
फूल अपना ही खिलाते
पर कठिन स्वयं को खिलना
डाल से उसे तोड़ करके
देवालयों में शीशे पर धर के
कामना ख़ुशियों की करते
उसके जीवन का अंत करते
प्राण उसके लुट करके
पत्थरों से आस करते
खुद बना पाषाण मानव
फिर वीरता का दंभ भरते
इन बुझे दीपों को तुम फिर
एक नया तुम नाम न देना।
कौन छूना चाहत है, पुष्प की संवेदना को।
तोड़ पत्थरों पर चढ़ते, पुछते हो
वेदना को।
(ओशो की मधुशाला)
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