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शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

ताओ उपनिषाद (भाग-1) प्रवचन--13


अहंकार—विसर्जन और रहस्य में प्रवेश—(प्रवचन—तैरहवां) 


अध्याय 4 : सूत्र 2

इसकी तेज नोकों को घिस दें;
इसकी ग्रंथियों को सुलझा दें;
इसकी जगमगाहट मृदु हो जाए;
इसकी उद्वेलित तरंगें जलमग्न हो जाएं;
फिर भी यह अथाह जल की तरह तमोवृत्त सा रहता है।

र्म है रिक्त चेतना की अवस्था, खाली घड़े की भांति।
लेकिन कोई खाली घड़ा कैसे हो पाए? शून्य कोई होना भी चाहे तो कैसे शून्य हो? मिटना कोई चाहे भी तो मिटने की प्रक्रिया क्या है?
कल हमने समझने की कोशिश की कि पूर्ण होने की चेष्टा से ज्यादा कोई नासमझी की बात नहीं। लेकिन पूर्ण होने का विज्ञान उपलब्ध है। एक-एक कदम पूर्ण होने की सीढ़ियां उपलब्ध हैं। पूर्ण होने का शास्त्र है। और जिन्हें पूर्ण होना है, उनके लिए विद्यापीठ हैं, जहां वे शिक्षित हो सकते हैं कि किसी दिशा में पूर्ण कैसे हों। लेकिन शून्य होने का क्या शास्त्र है? और शून्य होने का विद्यापीठ कहां? और शून्य होने के लिए शिक्षक कहां मिलेगा? और कौन सा अनुशासन है जिससे व्यक्ति शून्य हो?

कुछ भी होना हो, तो प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा। तो पूर्ण होने की प्रक्रियाएं तो मनुष्य ने विकसित की हैं। अहंकार को मजबूत करने के मार्ग बनाए हैं, यात्रा-पथ निर्मित किए हैं, क्रमबद्ध सोच-विचार किया है। लेकिन शून्य! शून्य होने के लिए क्या किया जा सकता है?
तो लाओत्से कुछ बातें कहता है। वह कहता है, "तेज नोकों को घिस दें।'
व्यक्तित्व में तेज नोकें हैं बहुत। जहां-जहां आप किसी को चुभते हैं, वहां आप में तेज नोक होती है। लेकिन एक मजा है नोक का कि जब दूसरा आपको चुभता है, तब उसकी नोक आपको पता चलती है; लेकिन जब आप किसी दूसरे को चुभते हैं, तो आपको अपनी नोक पता नहीं चलती। अगर छुरे को मैं आपके शरीर में चुभाऊं, तो आपको पता चलता है, छुरे को पता नहीं चलता। मेरी तेज नोक किसी में गड़ती है, तो उसे पता चलता है, मुझे पता नहीं चलता। हां, किसी और की नोक मुझमें गड़ जाए, तो मुझे पता चलता है।
इससे जगत में बड़ी भ्रांति होती है, बहुत कनफ्यूजन है। जगत की सारी कलह इस कारण ही है कि हमें दूसरे की नोक ही पता चलती है, अपनी नोक कभी पता नहीं चलती। आपको कभी अपनी नोक पता चली है? इसलिए जीवन भर हम दूसरों की नोकों को झड़ाने में लगे रहते हैं।
तो पहली बात तो यह खयाल में ले लें कि हमें अपनी नोकों का पता नहीं चलता, दूसरे की नोकों का ही पता चलता है, क्योंकि वे हमें चुभती हैं। हमारी नोकें दूसरों को चुभती हैं, उनका हमें पता नहीं चलता। दूसरी बात, चूंकि उनका हमें पता ही नहीं चलता, इसलिए जाने-अनजाने हम उनकी जड़ों को मजबूत किए चले जाते हैं। और दूसरे की नोक हमें चुभती है, इसलिए दूसरे की नोक को तोड़ने की हम चेष्टा करते हैं।
और एक मजे की बात कि जितना हम दूसरे की नोक को तोड़ने की चेष्टा करते हैं, उतना ही हमें अपनी नोक मजबूत करनी पड़ती है। क्योंकि दूसरे की नोक तोड़नी हो, तो हमारी नोक के अलावा और कोई उपकरण नहीं है, जिससे हम उसे तोड़ें। तो दूसरे की नोक को तोड़ने की कोशिश गहरे में अपनी नोक को बढ़ाने की, चमकाने की, धार देने की कोशिश है। दूसरा भी यही कर रहा है। तब दुष्टचक्र खयाल में आ जाएगा, विसियस सर्किल खयाल में आ जाएगा। प्रत्येक यही कर रहा है: दूसरे की नोकें तोड़ने की कोशिश कर रहा है; दूसरों की नोकें तोड़ने में अपनी नोकों को धार दे रहा है। दूसरा भी यही कर रहा है: इसकी नोकें तोड़ने की कोशिश कर रहा है; इसकी नोकें तोड़ने के लिए अपनी नोकों को जहर पिला रहा है, पायज़न दे रहा है। हम नोकें ही नोकें रह जाते हैं। धीरे-धीरे हम में सिवाय इन नोकों के और कुछ भी नहीं बचता।
ज्यादा से ज्यादा हमारी नोकें हमें एक तरह से चुभती हैं सिर्फ। वह भी खयाल में ले लेना जरूरी है। अपनी ही नोक हमें सिर्फ एक तरफ से चुभती है। जब हमारी नोक दूसरों को बहुत चुभने लगती है, तब वे सभी हमें नोकें चुभाने को उत्सुक हो जाते हैं। बस, इसी तरह से नोक हमें पता चलती है। तब हम ज्यादा से ज्यादा जो करते हैं, वह यह करते हैं कि अपनी नोकों के ऊपर वस्त्र पहना देते हैं--स्किन डीप। एक पर्त चमड़ी की हमारी नोकों पर हो जाती है। मृदुता और विनम्रता और शिष्टता और सज्जनता, उसका हम अपने चारों तरफ एक लेप कर लेते हैं। लेकिन वह जरा सी ही चोट से उखड़ जाता है। हम करते ही उसे इतना हैं कि जरा सी चोट लगे और हमारी नोक बाहर आ जाए।
लाओत्से कहता है, सब नोकों को झड़ा दें।
तो करना क्या होगा? पहले तो यह जानना होगा कि हम में नोकें कहां-कहां हैं? और कहीं ऐसा तो नहीं कि हम जन्मों-जन्मों की यात्रा में सिर्फ नोकें ही रह गए हैं? हमने बाकी सब हिस्से काट डाले हैं अपने और सिर्फ उन हिस्सों को बचा लिया है। और हम में नोकें हैं, तब हमें उनका कैसे पता चले?
सदा दूसरे की जगह खड़े होकर देखें, तो पता चल सकता है। जब भी आपसे कोई पीड़ित होता है, तो हमारा मन कहता है कि उसकी भूल है कि वह पीड़ित हो रहा है। और जब हम किसी से पीड़ित होते हैं, तो हमारा मन कहता है कि किसी ने हमें सताया है, इसलिए हम पीड़ित होते हैं। डबल बाइंड है। अगर आप मुझ पर क्रोधित होते हैं, तो मैं कहता हूं, आपका स्वभाव खराब है। और अगर मैं क्रोधित होता हूं, तो मैं कहता हूं, स्थिति ऐसी है; स्थिति ही ऐसी है कि मुझे क्रोध करना पड़ेगा। और दूसरा क्रोध करता है, तो मैं कहता हूं, उसके स्वभाव की विकृति है; परिस्थिति तो जरा भी न थी कि क्रोध किया जाए, लेकिन वे आदमी ही विषाक्त थे। यह हमारा तर्क है। और इस तर्क में हमारी सारी नोकें छिप जाती हैं और उनका हमें कभी पता नहीं चलता।
जीसस ने कहा है, जो तुम चाहते हो कि तुम्हारे साथ किया जाए, वही तुम दूसरे के साथ करना। लेकिन यह तो दूर की बात है। जो तुम दूसरे के साथ सोचते हो, कम से कम उतना अपने साथ सोचना। या जो तर्क तुम अपने लिए देते हो, कम से कम दूसरे के साथ भी न्याय बरतना, उतना तर्क देना। अगर मैं कहता हूं कि जब मैं क्रोधित होता हूं तो परिस्थिति ऐसी होती है, तो कम से कम इतना न्याय करूं कि जब मुझ पर कोई क्रोधित हो तो मैं कहूं कि परिस्थिति ऐसी है कि तुम्हें क्रोधित होना पड़ रहा है। डबल बाइंड जो लॉजिक है हमारा, वह तोड़ना पड़ेगा। नहीं तो नोकों का कभी पता नहीं चलेगा।
वह डबल बाइंड लॉजिक जो है, दोहरा तर्क--अपने लिए और, दूसरे के लिए और--वह नोकों को बचाने के लिए है। उसमें हमें कभी पता ही नहीं चलता कि हम कौन हैं। हम क्या हैं, उसका हमें बोध ही नहीं हो पाता। और चीजें इस तरह आगे बढ़ती चली जाती हैं। और इसी एक तर्क के सहारे सारा जीवन नष्ट हो जाता है।
इसलिए अगर समस्त धर्मों का सार किसी वचन में आ जाता हो, तो वह जीसस के इस वचन में आ जाता है: डू अनटू अदर्स एज यू वुड लाइक टु बी डन विद यू। बस सारे धर्म का सार इस एक सूत्र में आ जाता है: दूसरे के साथ वही करो जो तुम चाहोगे कि दूसरे तुम्हारे साथ करें। यह एक वचन काफी है। सारे वेद और सारे शास्त्र और सारे पुराण और सारे कुरान और सारी बाइबिल, इस एक छोटे से वचन में समाहित हो जाते हैं।
इतना कोई कर ले तो और कुछ करने को बाकी नहीं रह जाता। लेकिन यह करना बहुत दुष्कर है। क्योंकि इसको करने के लिए सारी नोकें झड़ा देनी पड़ेंगी। और नोकें हममें हैं।
तो पहले तो यह जो दोहरा तर्क है, इसके प्रति सजग हो जाना चाहिए। एक-एक पल इसके प्रति सजग होना पड़ेगा कि मैं दूसरे को भी उतना ही मौका दूं, वही तर्क का लाभ दूं, जो मैं अपने को देता हूं। और तब आपको अपनी नोकें दिखाई पड़नी शुरू हो जाएंगी। तब बहुत मजेदार स्थिति बनती है। जिस दिन यह तर्क हम छोड़ देते हैं और दूसरे को भी वही मौका देते हैं, उस दिन स्थिति बिलकुल बदल जाती है। अभी हम कहते हैं कि दूसरे का स्वभाव विकृत है, इसलिए वह क्रोधी है; और मेरी तो परिस्थिति ऐसी थी, इसलिए मैंने क्रोध किया। जिस दिन यह तर्क बदल जाता है, उस दिन अनूठा अनुभव होता है। उस दिन पता चलता है कि मेरा स्वभाव ऐसा है कि मैंने क्रोध किया और दूसरे की परिस्थिति ऐसी थी कि उसने क्रोध किया। जिस दिन यह तर्क बदलता है, उस दिन यह पूरी स्थिति उलटी हो जाती है।
और जब आपको यह दिखाई पड़ने लगता है कि मेरा स्वभाव ऐसा है कि मैंने क्रोध किया, मेरी आदत ऐसी है कि मैंने क्रोध किया, दूसरे की परिस्थिति ऐसी थी कि उसने क्रोध किया, तो आप दूसरे को न क्षमा करने में और अपने को क्षमा करने में असमर्थ हो जाते हैं। और जो अपने को क्षमा करने में बहुत सुगमता पाता है, वह नोकों को कभी भी न झड़ा पाएगा।
लेकिन हम बड़े कुशल हैं स्वयं को क्षमा कर देने में। स्वयं के प्रति हमारी क्षमा का कोई अंत ही नहीं है। अगर कभी मैं पूछूं या कभी हम ऐसा सोचें कि क्या आपके जैसा ही ठीक आदमी आपको साथ रहने के लिए दे दिया जाए, कितने दिन उसके साथ रह पाइएगा? जस्ट ए कॉपी ऑफ यू, ठीक आपकी ही नकल एक आदमी आपको दे दिया जाए, कितने दिन उसके साथ रह पाइएगा? चौबीस घंटे भी रहना मुश्किल हो जाएगा। लेकिन आप अपने साथ तो कई जन्मों से रह रहे हैं। जरूर कोई तर्क होगा ऐसा, जिससे आप अपने को जानने से बचे रहते हैं। खयाल ही नहीं आता कि मैं क्या हूं; पता ही नहीं चलता कि मैं क्या हूं; होश ही नहीं आता कि मैं क्या हूं।
तो पहले तो नोकों का बोध--वे जो हममें चारों तरफ भाले लगे हैं, भालों के फलक लगे हैं। कहीं से हम निकलें, तो किसी न किसी को जरूर कुछ न कुछ चोट पहुंच जाती है। और अगर आप बिना चोट पहुंचाए निकल जाएं, तो आपको लगता है, आप निकले ही नहीं। ऐसा लगता है कि आपकी तरफ किसी ने कोई ध्यान ही नहीं दिया। ध्यान ही कोई तभी आपको देता हुआ मालूम पड़ता है, जब उसको किसी तरह आप चोट पहुंचाना शुरू करते हैं।
चोटों के बहुत ढंग हैं, उन पर हम बात करेंगे, कि हम कितनी तरह से चोटें पहुंचा सकते हैं, और हम कितने तर्क निकाल सकते हैं।
एक सुबह नसरुद्दीन की बैठक में कुछ मित्र इकट्ठे हैं। और नसरुद्दीन ने अपने एक शिष्य से कहा कि जा, यह मिट्टी का घड़ा है, कुएं से पानी भर ला। लेकिन ध्यान रख, घड़ा मिट्टी का है, टूट न जाए। जरा मेरे पास आ। उसे पास बुला कर उसने दो चांटे रसीद किए। वह युवक तो तिलमिला गया; वे बैठे लोग भी घबड़ा गए। एक बूढ़े ने कहा भी कि मुल्ला, बेकसूर को मारना, कुछ समझ में नहीं आता। अभी तो घड़ा टूटा भी नहीं, तोड़ा भी नहीं, और सजा दे दी! नसरुद्दीन ने कहा कि मैं उन नासमझों में से नहीं हूं कि घड़ा टूट जाए, फिर चांटा मारूं। फिर फायदा क्या? फिर फायदा ही क्या है? जब घड़ा ही टूट जाएगा, तो मारने से क्या फायदा है?
नसरुद्दीन को आप जवाब न दे पाएंगे। बात तो बड़ी मतलब की कह रहा है। कि मारना है तो अभी, तो कुछ अर्थ भी है। पीछे तो कोई अर्थ भी न रह जाएगा। आदमी इतना कुशल है, कसूर के पहले भी दंड दे सकता है। नसरुद्दीन की मजाक में वही बात है। और उसके लिए भी रेशनलाइजेशन खोज सकता है; उसके लिए भी तर्क खोज सकता है। तर्क खोजने की कुशलता हम में है।
लेकिन तर्क की कुशलता से कभी भी कोई आत्म-अनुभव को उपलब्ध नहीं होता, क्योंकि तर्क की सारी व्यवस्था स्वयं को छिपाने के काम आती है। तर्क से नहीं चलेगा काम, अंतर्दृष्टि से चलेगा। और अंतर्दृष्टि का अर्थ है कि अपने को दूसरे की जगह में रखने की क्षमता होनी चाहिए। रोज ऐसा होता है, लेकिन कभी हमें यह खयाल नहीं आता। रोज हममें से हरेक को लगता है कि दूसरे ने हम पर जो क्रोध किया, वह बिलकुल अनजस्टीफाइड था, वह बिलकुल न्यायसंगत नहीं था। प्रत्येक को लगता है। ऐसा आदमी खोजना मुश्किल है--और अगर कहीं मिल जाए, तो वह बहुत अनूठा फूल है--ऐसा आदमी खोजना मुश्किल है, जिसे दिन में पच्चीसों बार ऐसा नहीं लगता कि उसके साथ अन्याय हो रहा है। उसने तो कुछ ऐसा किया ही नहीं जिस पर क्रोध हो!
हम सब की प्रतीति यह है कि हम सब अन्याय से पीड़ित हैं, विक्टिम हैं, शिकार हैं अन्याय के चौबीस घंटे। लेकिन क्या हमने कभी, जब दूसरे पर क्रोध किया है, तो ऐसा सोचा है कि वह अन्याय का शिकार तो नहीं होगा? जब हम पर क्रोध करते वक्त किसी आदमी को पता नहीं चलता कि वह हम पर अन्याय कर रहा है, तो क्या हमें यह खयाल नहीं आ सकता कि हम भी जब दूसरे पर क्रोध करते हों, हमें पता ही न चलता हो कि हम अन्याय कर रहे हैं!
यह इनसाइट है, यह अंतर्दृष्टि है। यह तर्क नहीं है, यह एक प्रतीति है। मनुष्य का स्वभाव करीब-करीब एक जैसा है। और जो मैं सोचता हूं, करीब-करीब वैसे ही सारे लोग सोचते हैं। जैसा मैं अनुभव करता हूं, करीब-करीब सारे लोग वैसा ही अनुभव करते हैं। इसलिए बहुत कठिनाई नहीं है इस बात में कि मैं अपने को दूसरे की जगह रख कर देख लूं। इसमें भी बहुत कठिनाई नहीं है कि दूसरे को अपनी जगह रख कर देख लूं। और जो व्यक्ति दूसरे की जगह अपने को रखने में या दूसरे को अपनी जगह रखने में सफल हो जाता है, उसको अंतर्दृष्टि मिलनी शुरू होती है, उसको इनसाइट मिलनी शुरू होती है। और तब उसे दिखाई पड़ता है कि कितनी नोकें हैं! कितनी नोकें हैं!
महावीर परम ज्ञान को उपलब्ध हो गए, या बुद्ध परम ज्ञान को उपलब्ध हो गए, लेकिन बुद्ध सुबह प्रार्थना करते हैं, तो रोज तो वे क्षमा मांगते हैं समस्त जगत से। एक दिन बुद्ध से किसी ने पूछा कि आप परम ज्ञान को उपलब्ध हो गए, आपसे अब किसी को चोट नहीं पहुंचती, पहुंच ही नहीं सकती, आप क्षमा किस बात की मांगते हैं?
बुद्ध ने कहा कि मुझे अपने अज्ञान के दिनों की याद है। कोई मुझे चोट नहीं भी पहुंचाता था, तो पहुंच जाती थी। यद्यपि मैं किसी को चोट नहीं पहुंचा रहा, लेकिन बहुतों को पहुंच रही होगी। मुझे अपने अज्ञान की अवस्था का ज्ञान है। कोई मुझे चोट नहीं पहुंचाता था, तो भी पहुंच जाती थी। तो मैं जानता हूं कि वह जो अज्ञान चारों तरफ मेरे है, वह जो अज्ञानियों का समूह है चारों तरफ, मेरे बिना पहुंचाए भी अनेकों को चोट पहुंच रही होगी। फिर मैंने पहुंचाई या नहीं पहुंचाई, इससे क्या फर्क पड़ता है? उनको तो पहुंच ही रही है। उसकी क्षमा तो मांगनी ही चाहिए।
पर जिसने पूछा था, उसने कहा, आप तो कारण नहीं हैं पहुंचाने वाले!
बुद्ध ने कहा, कारण तो नहीं, लेकिन निमित्त तो हूं। अगर मैं न रहूं, तो मुझसे तो नहीं पहुंचेगी। मेरा होना तो काफी है न, इतना तो जरूरी है, उनको चोट पहुंचे। तो मैं क्षमा मांगता रहूंगा। यह क्षमा किसी किए गए अपराध के लिए नहीं, हो गए अपराध के लिए है। और हो गए अपराध में मेरा कोई हाथ न हो, तो भी।
हमारी स्थिति ऐसी है कि लगता है कि सारी दुनिया हमें सता रही है। एक हम इनोसेंट, निर्दोष हैं; और सारी दुनिया शरारतियों से भरी हुई है। वे सब सता रहे हैं। जैसे सारा षडयंत्र आपके खिलाफ चल रहा है। आप अकेले और यह इतना बड़ा जाल संसार का आपको परेशान करने को चारों तरफ से खड़ा है।
यह हमारी दृष्टि है। इस दृष्टि में आपको अपनी नोकें कभी दिखाई न पड़ेंगी। इसमें आप सदा ही अपने को बचाते रहेंगे। और जो अपने को बचाएगा, वह अपने को नहीं जान पाएगा। और बचा तो पाएगा ही नहीं। क्योंकि जो अपने को जानता ही नहीं, वह बचाएगा कैसे?
तो पहली बात तो यह है कि देखें कि चौबीस घंटे में कितनी चोटें आप अपने चारों तरफ फैला रहे हैं--बोल कर, न बोल कर, उठ कर, बैठ कर, इशारे से, आंख से, मुस्कुरा कर, ओंठ से--कितनी चोटें आप अपने चारों तरफ फैला रहे हैं! अकारण भी! तब आपको लगेगा कि यह आपका स्वभाव है।
मुल्ला नसरुद्दीन एक रास्ते से गुजर रहा है। एक आदमी केले के छिलके पर फिसल पड़ा और गिर पड़ा। नसरुद्दीन खिलखिला कर हंसा। हंसने में भूल गया और उसका पैर भी दूसरे छिलके पर पड़ा और वह भी गिर पड़ा। गिर कर उठ कर खड़ा हुआ और उसने कहा, परमात्मा, तेरा धन्यवाद! अगर हम पहले ही न हंस लिए होते, तो हंसने का मौका ही न मिलता। अगर हम पहले ही न हंस लिए होते, एक-दो क्षण चूक गए होते, तो चूक गए थे। क्योंकि अब तो दूसरे हंस रहे हैं, अब तो कोई अपने हंसने की बात न रही।
हम सब जब दूसरे पर हंस रहे हैं, तब हमें खयाल नहीं है; जब हम दूसरे पर क्रोधित हो रहे हैं, तब भी खयाल नहीं है; जब हम दूसरे की निंदा कर रहे हैं, तब भी हमें खयाल नहीं है कि हम क्या कर रहे हैं। थोड़ी ही देर में हम उस जगह हो जा सकते हैं। लेकिन नसरुद्दीन तो आदमी के प्राणों से बोलता है। वह यह कह रहा है कि अच्छा ही किया कि हंस लिए, नहीं तो फिर मौका ही न मिलता। वह खुश है। वह पूरी आदमियत का व्यंग्य है; वह जैसे हम सब का सार-निचोड़ है।
एक-एक इशारे को जांचना पड़ेगा कि उसमें धार तो नहीं है? जहर तो नहीं है? आप किसी को चुभते तो नहीं हैं, चुभते तो नहीं चले जाते हैं? आप दूसरे को चुभें, इसमें रस तो नहीं लेते? सुखद तो नहीं मालूम होता? डामिनेट करें किसी की, मालकियत करें किसी की, किसी के ऊपर कब्जा दिखाएं, किसी को आज्ञा दें, इसमें रस तो नहीं आता?
नसरुद्दीन अपने बेटे पर नाराज है। और वह बेटा बहुत खड़े होकर शोरगुल कर रहा है। वह उससे कहता है, बैठ जा बदमाश! वह लड़का है नसरुद्दीन का, वह कहता है, नहीं बैठते! तो नसरुद्दीन कहता है, खड़ा रह, लेकिन आज्ञा मेरी माननी ही पड़ेगी। या तो बैठ या खड़ा रह, लेकिन आज्ञा मेरी माननी ही पड़ेगी। मेरी आज्ञा से तू नहीं बच सकता।
हमारा मन पूरे समय इस कोशिश में है कि हम किसी को दबा पाएं। क्यों? क्योंकि जब हम किसी को दबाते हैं, तभी हमको लगता है कि हम कुछ हैं। हमें पता ही नहीं चलता अपने होने का तब तक, जब तक हम किसी को दबाते नहीं हैं। तो मेरी मुट्ठी में जितने लोगों की गर्दन हो, तो उतना ही मैं बड़ा आदमी हो जाता हूं। बड़े आदमी का और कोई नापने का हिसाब नहीं है। कितने आदमियों की गर्दन उस आदमी के हाथ में है? अगर वह जोर से मुट्ठी कस दे, तो कितने लोगों की गर्दन दब जाएगी?
हम सब इस कोशिश में हैं कि कितनी गर्दनें हमारे हाथ में हो जाएं। और ऐसा नहीं कि दुश्मन ही गर्दन हाथ में डालता है; जिनको हम मित्र कहते हैं, वे भी गर्दन पर हाथ कसे रहते हैं। एक बार दुश्मन का हाथ तो दूर भी होता है, मित्र का हाथ बिलकुल गर्दन पर होता है। जिनको हम संबंधी कहते हैं, वे भी एक-दूसरे की गर्दन पर हाथ कसे रहते हैं। वे भी जांच-पड़ताल करते रहते हैं कि गर्दन दूर तो नहीं कर रहे हो! जरा गर्दन दूर हुई तो चिंता शुरू हो जाती है कि कहीं मेरे हाथ से बाहर तो नहीं हो जाएगा! ये सब हमारी नोकें हैं। यह हमारी हिंसा है।
लाओत्से कहता है, इनकी तेज नोकों को घिस डालें। अगर शून्य की तरफ जाना है, तो ये सब नोकें घिस डालें, ये गिरा दें, ये हटा दें।
लेकिन कौन हटा पाएगा नोकों को? नोकों को वही हटा पाएगा, जो इनसिक्योरिटी में रहने को राजी है, जो असुरक्षा में रहने को राजी है। दरवाजे पर हम एक बंदूक रखे हुए आदमी को खड़ा करते हैं, इसलिए कि सुरक्षा चाहिए। वह जो बंदूक पर लगी हुई संगीन है, वह जो हाथ में तलवार लिए हुए खड़ा हुआ पहरेदार है, वह ऐसे ही नहीं खड़ा है। वह सुरक्षा के लिए है। सूक्ष्म रूप में हम अपने व्यक्तित्व के चारों तरफ नोकें रख लेते हैं।
मैं एक मित्र के घर में कोई आठ साल तक रहता था। मैं बहुत हैरान हुआ। वह आदमी बहुत भले थे। मुझे जब भी मिलते, बड़े प्रेम से मिलते। जब भी मिलते, उनके चेहरे पर मुस्कुराहट होती। लेकिन न तो मैंने उनको पत्नी के सामने उनकी मुस्कुराते देखा, न उनके बेटे के सामने मुस्कुराते देखा, न उनके नौकरों के सामने मैंने उन्हें कभी मुस्कुराते देखा। मैं थोड़े दिन में चिंतित हुआ। जब वह अपने नौकरों के सामने निकलते, तो उनकी चाल देखने जैसी होती थी। वह ऐसे जाते थे, जैसे कोई है ही नहीं आस-पास।
मैंने उनसे पूछा कि बात क्या है?
उन्होंने कहा कि सजग रहना पड़ता है। अगर नौकर के सामने मुस्कुराओ, कल ही वह कहता है तनख्वाह बढ़ाओ; पत्नी के सामने मुस्कुराए कि झंझट में पड़े, कि वह कहती है एक साड़ी आ गई। चेहरे को सख्त रखना पड़ता है, पहरे पर रहना पड़ता है। उन्होंने कहा कि मुस्कुरा कर मैं बहुत नुकसान उठा चुका हूं। जब मुस्कुराए, तभी झंझट खड़ी हो जाती है। बेटा भी देख ले कि बाप मुस्कुरा रहा है, तो उसका हाथ जेब में चला जाता है।
तो उन्होंने कहा, मैंने तो एक पूरा चेहरा बना रखा है सख्ती का। यह मजबूरी है, इसमें बहुत कष्ट होता है, लेकिन यह सुरक्षा है। बेटा पास आने में डरता है; कमरे में बैठे होते हैं, तो नौकर नहीं गुजरता; किसी की हिम्मत नहीं है कि उनके सामने कोई खड़ा हो जाए।
पर मैंने कहा, इस सुरक्षा से क्या बचेगा और खोएगा क्या, इसका कुछ हिसाब किया? यह सुरक्षा हो गई, मान लिया। मर जाओ बिलकुल, फिर नौकर बिलकुल नहीं घुसेगा कमरे में। और मर जाओ, पत्नी को कितनी ही साड़ी की जरूरत हो, तो भी नहीं कहेगी कि साड़ी चाहिए। और मर जाओ, और बेटे को कितनी ही इच्छा हो, जेब में हाथ नहीं डालेगा। आपकी लाश को घर के बाहर फेंक आएगा। जिंदा रहोगे, तो असुरक्षित रहोगे; मर जाओगे, तो सुरक्षित हो जाओगे। मुर्दे से ज्यादा सुरक्षित और कोई भी नहीं, क्योंकि अब मौत भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। बीमारियां नहीं आ सकतीं, कुछ नहीं किया जा सकता अब। अब आप उसके साथ कुछ कर ही नहीं सकते; वह आपके करने के बाहर हो गया।
जितने हम सुरक्षित होते हैं, उतनी हमें नोकें बनानी पड़ती हैं। नोकें जो हैं, वह हमारे चारों तरफ सिक्योरिटी अरेंजमेंट है, व्यवस्था है। डर है, आक्रमण है चारों तरफ; हमलावर हैं इकट्ठे। आदमी नहीं, दुश्मन हैं चारों तरफ। उन दुश्मनों से अपने को बचाना है।
नसरुद्दीन अपनी पत्नी से बचने के लिए शराब पीने लगा। इतनी ज्यादा, कि मित्र चिंतित हो गए। मित्र इतने चिंतित हो गए कि वह आदमी अब बच नहीं सकेगा। नसरुद्दीन से जब भी उन्होंने कहा, तो उसने कहा कि लेकिन जब मैं शराब पीकर घर जाता हूं, तभी घर जा पाता हूं। दरवाजे पर मेरा पैर कंपने लगता है, अगर मैं होश में जाऊं। और ऐसे-ऐसे प्रश्नों के उत्तर मैं तैयार करने लगता हूं, जो कभी किसी ने किसी से नहीं पूछे होंगे; लेकिन मेरी पत्नी पूछ सकती है। शराब पीकर जाता हूं, तो निश्चिंत प्रवेश कर जाता हूं। यह मेरी सुरक्षा है।
पर बात इतनी बढ़ गई कि मित्रों ने कहा, कुछ करना पड़ेगा, अन्यथा यह मौत आ जाएगी। एक मित्र ने सुझाव दिया कि जब यह पत्नी से इतना डरता है और डरने की वजह से ही शराब पीता है, तो और बड़ा डर अगर लाया जाए तो शायद यह शराब छोड़ दे। अब पत्नी से बड़ा और डर क्या हो? एक मित्र ने कहा, एक काम करो कि आज रात जब यह लौटे, वह आधी रात जब घर लौटने लगे, तो झाड़ पर एक आदमी शैतान बन कर बैठ जाए, डेविल बन जाए। सींग लगा ले, काले कपड़े पहन ले, नकाब पहन ले, घबड़ाने की हालत कर दे और चिल्ला कर कूद पड़े नीचे। तो यह कंपेगा, हाथ-पैर जोड़ेगा। तो उस वक्त इससे वचन करवा ले कि शराब नहीं पीना, नहीं तो मैं तेरा पीछा करूंगा, छोडूंगा नहीं। मित्र बाकी छिप गए। एक मित्र डेविल बन कर ऊपर झाड़ पर चढ़ गया। नसरुद्दीन बेचारा लौट रहा है कोई दो बजे रात। आहिस्ता से चला आ रहा है। ऊपर से वह आदमी कूदा। सब इंतजाम पूरा था। बड़ी चीख-पुकार बाकी मित्रों ने जो झाड़ियों में छिपे थे लगाई, जैसे भयंकर खतरा आ गया। और वह आदमी नीचे उतरा, सामने नसरुद्दीन के खड़ा हो गया, नसरुद्दीन की गर्दन पकड़ ली।
नसरुद्दीन ने उसकी तरफ देखा। उस आदमी ने कहा कि वचन दो कि शराब छोड़ दोगे!
नसरुद्दीन ने कहा, पहले यह तो बताओ महानुभाव कि आप हो कौन? हू आर यू?
इसके यह पूछने से उसको थोड़ी गड़बड़ तो हो ही गई, क्योंकि यह डरा नहीं ज्यादा। उसने पूछा, हू आर यू?
उसने कहा, मैं शैतान हूं! आई एम दि डेविल!
तो नसरुद्दीन ने कहा, बड़ी खुशी हुई मिल कर, आई एम दि गाय हू हैज मैरीड योर सिस्टर। मैं वह आदमी हूं जिसने आपकी बहन से शादी की है। बड़ा अच्छा हुआ, चलिए आपकी बहन से मुलाकात करवा दें।
सब मामला खराब हो गया। सब मामला पूरा खराब हो गया। वे मित्र बाहर आ गए। उसने मित्रों से कहा कि देखिए, बहुत मुश्किल से मिले हैं, इनको मैं इनकी बहन से मिला दूं। इनकी भी हिम्मत नहीं पड़ रही है जाने की, ये भागने की कोशिश कर रहे हैं।
हमारी सारी की सारी योजना, हमारे शब्द, हमारी भाषा, हमारे सिद्धांत, हमारी शराबें, हमारे सिनेमागृह, हमारे नाचघर, हमारे मनोरंजन, बहुत गहरे में सुरक्षा के आयोजन हैं। सब तरह से। हमारे मंदिर, हमारी मस्जिदें, गुरुद्वारे, वह सब हमारे सुरक्षा के आयोजन हैं। डरे हैं, कहीं कोई इंतजाम कर लिया है। और जब भी कोई डरता है, तो उसको धारें रखनी पड़ती हैं अपने चारों तरफ कई तरह की।
इन नोकों को कौन तोड़ सकता है? इन नोकों को वही तोड़ सकता है, जो इनसिक्योरिटी में रहने को राजी है।
लाओत्से की दृष्टि को समझ कर अलेन वाट ने एक किताब लिखी है। किताब का नाम है: विजडम ऑफ इनसिक्योरिटी, असुरक्षा की बुद्धिमत्ता। सुरक्षा बड़ी मूढ़तापूर्ण बात है। क्योंकि हम सुरक्षित कुछ नहीं कर पाते; कोशिश में खुद मर जाते हैं और मिट जाते हैं। असुरक्षित रहने की बुद्धिमत्ता! नहीं, हम कोई नोक खड़ी न करेंगे, हम कोई पहरा न बनाएंगे। और जिंदगी आक्रमण करेगी, तो हम स्वागत कर लेंगे।
और बड़ा मजा यह है कि जो आदमी इस भांति राजी हो जाता है कि जो भी आक्रमण होगा, हम पी जाएंगे, स्वीकार कर लेंगे, एक्सेप्ट कर लेंगे, राजी हो जाएंगे, कहेंगे यही नियति है, नहीं कोई उपाय करेंगे, उस आदमी पर आक्रमण होना असंभव हो जाता है। क्योंकि आक्रमण का भी अपना तर्क है।
अगर आपका पड़ोसी आपको देखता है कि आप दंड-बैठक लगा रहे हैं, तो वह डरता है। वह सोचता है, पता नहीं, क्या करे! वह भी दंड-बैठक लगाना शुरू करता है। और जब आप देखते हैं अपनी खिड़की से कि अरे, मामला पक्का है। तो आप एक तलवार ले आते हैं। और फिर ऐसा चलता है। और ऐसा नहीं कि छोटे-मोटे पड़ोसियों में चलता है। रूस और अमरीका और चीन और हिंदुस्तान और पाकिस्तान, सब में ऐसा चलता है। एक की सेनाएं सीमा पर गश्त लगाने लगती हैं, दूसरे के प्राण कंप जाते हैं। वह दुगुनी सेनाएं गश्त करने के लिए लगा देता है। और जब यह दुगुनी खड़ी करता है, तो निश्चित जो तर्क तुम्हारा है, वही पड़ोस वाले का भी है। वह भी सोचता है, कुछ गड़बड़ हो रही है।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि अब तक के युद्ध निन्यानबे प्रतिशत मिसइंटरप्रिटेशन से हुए हैं, सिर्फ गलत व्याख्या से कि दूसरा तैयारी कर रहा है हमें मारने की; अगर हमने तैयारी न की, तो मर जाएंगे। और जब आप तैयारी करते हैं, तो यही दूसरे का भी तर्क है कि अब तैयारी यह कर रहा है, किसलिए कर रहा होगा? अगर पाकिस्तान अमरीका से अस्त्र-शस्त्र लाता है, तो किसलिए लाता होगा? हमीं को मारने के लिए। और आप अगर एटामिक कमीशन बनाते हैं, तो किसलिए बनाते हैं? पाकिस्तान को मारने के लिए। सब की हमारी बुद्धि इस भांति चलती है कि दूसरा क्या कर रहा है, वही हम और जोर से करें। और दोनों तरफ एक जैसी बुद्धियां हैं। इस प्रतिफलन में, एक-दूसरे के बीच जो बिंब-प्रतिबिंब बनते हैं, इनका जो अंतिम परिणाम होता है, उसमें आदमी का कुछ बस ही नहीं रह जाता, ऐसा लगता है कि करीब-करीब सब यांत्रिक घटित हो रहा है।
लाओत्से कहता है कि असुरक्षित हो जाओ। और ऐसे भी सुरक्षा क्या कर पाओगे? अगर यह पृथ्वी आज टूट जाए, तो कौन सा इंतजाम है? और यह सूरज आज ठंडा हो जाए, तो क्या करोगे? और यह सूरज आज दूर निकल जाए इस पृथ्वी से, तो कौन सा उपाय है इसे पास ले आने का? कभी यह पृथ्वी बिलकुल शून्य थी, कोई आदमी न था। कभी यह फिर सूनी हो जाएगी। जिस दिन सूनी हो जाएगी, उस दिन क्या करिएगा? किससे शिकायत करने जाइएगा? अनंत-अनंत ग्रहों पर जीवन रहा है और नष्ट हो गया। यह पृथ्वी भी सदा हरी-भरी नहीं रहेगी; यह नष्ट हो जाएगी। इंतजाम क्या है आपके पास? क्या बचाव कर लेंगे?
लेकिन ऐसा ही है कि एक चींटी है और मुंह में एक शक्कर का दाना लिए वर्षा का इंतजाम करने अपने घर की तरफ लौटी चली जा रही है, और आपका पैर उसके ऊपर पड़ जाता है। आपको तो पता ही नहीं चलता। सब व्यवस्था, सब सुविधा--न मालूम कितने सपने होंगे, न मालूम क्या-क्या सोच कर चली होगी, घर न मालूम किन-किन बच्चों को वायदा कर आई होगी कि अभी आती हूं--वह सब नष्ट हो गया! अब चींटी उपाय भी क्या करेगी आपके पैर से बचने का? सोच सकते हैं कुछ उपाय, क्या करेगी?
आप क्या सोचते हैं, आपकी कोई बड़ी हैसियत है? चींटी को दबा लेते हैं, इसलिए सोचते हैं कोई बड़ी हैसियत है? इस विराट जगत में कौन सी स्थिति है मनुष्य की?
एक महासूर्य पास से गुजर जाए, सब राख हो जाए। वैज्ञानिक कहते हैं कि कोई तीन अरब वर्ष पहले कोई महासूर्य पास से निकलने का मतलब है, कई अरब मील के फासले से निकल गया--उसी वक्त, उसके धक्के में, उसके आकर्षण में चांद जमीन से टूट कर अलग हुआ। ये जो पैसिफिक और हिंद महासागर के जो गङ्ढे हैं, यह चांद जो हिस्सा टूट गया जमीन से, उसकी खाली जगह हैं।
कभी भी निकल सकता है। इस विराट जगत में जहां कोई चार अरब सूर्यों का वास है, वहां सब कुछ हो रहा है। वहां कोई हम से पूछने आएगा? कोई आपकी सलाह लेगा? जरा सा कोई अंतर, और जीवन इस पृथ्वी पर विदा हो जाएगा। जीवन! आप नहीं, जीवन ही विदा हो जाएगा। करोड़ों जातियों के पशु मिले हैं, जो कभी थे और अब उनका एक भी वंशज नहीं है। कोई मनुष्य के साथ कोई विशेष नियम लागू नहीं होता।
लेकिन हम बड़ा इंतजाम करते हैं। हमारा इंतजाम चींटी जैसा इंतजाम है। मैं नहीं कहता, इंतजाम न करें। न लाओत्से कहता है, इंतजाम न करें। यह नहीं कहता कि वर्षा के लिए घर में दो दाने न रखें; जरूर रख लें। लेकिन जान लें भलीभांति कि हमारा सब इंतजाम चींटी जैसा इंतजाम है। और जिंदगी के विराट नियम का जो पहिया घूम रहा है, उस पर हमारा कोई वश नहीं है।
यह खयाल में आ जाए, तो फिर सुरक्षा की चिंता छूट जाती है। सुरक्षा जारी रहे, सुरक्षा की चिंता टूट जाए, सुरक्षा का पागलपन छूट जाए, तो फिर नोकें गिराने में कोई कठिनाई नहीं पड़ती; क्योंकि नोकें तो हैं इसलिए कि हम अपने को बचा सकें। बचाने की कोई जरूरत न रही; हम राजी हैं, जो हो जाएगा। मौत आएगी, तो मौत के लिए राजी हो जाएंगे। इस राजीपन में फिर आपको क्रोध की और हिंसा की और घृणा की और शत्रुता की और वैमनस्य की औरर् ईष्या की कोई भी जरूरत नहीं रह जाती। तो ही टूट सकती हैं नोकें।
"उसकी ग्रंथियों को सुलझा दें।'
वह जो हमारा चित्त है, वह जो हमारा व्यक्तित्व है, वह एक ग्रंथि ही हो गया है, एक कांप्लेक्स। जैसे कि धागे उलझ गए हों; और कहीं से भी खींचो, और उलझ जाते हों; ऐसी हमारी चित्त की दशा है। एक तरफ से सुलझाओ, तो दूसरी तरफ से उलझन हो जाती है, ऐसा लगता है। कितना ही सुलझाओ, लगता है, सुलझाना मुश्किल है।
लाओत्से कहता है, "इसकी ग्रंथियों को सुलझा दें।'
कैसे सुलझाएंगे इसकी ग्रंथियों को? हम सब सुलझाने की कोशिश करते हैं। एक आदमी आता है, वह कहता है, मैं क्रोध नहीं करना चाहता, खुद नहीं चाहता करना; मुझे कोई बताएं कि मैं कैसे क्रोध न करूं।
हैरानी होती है कि अगर आप क्रोध नहीं करना चाहते, तो फिर करने का सवाल ही क्या है? मत करें।
वह कहता है कि यह नहीं है सवाल; क्रोध नहीं करना चाहता, लेकिन क्रोध आता है।
तो इसका मतलब यह हुआ कि क्रोध तो सिर्फ एक धागा है, और भी धागे जुड़े हैं आस-पास। यह इस धागे से तो मुक्त होना चाहता है, लेकिन इसी धागे से जुड़े किसी दूसरे धागे को जोर से पकड़े हुए है। जैसे इस आदमी से कहें कि ठीक है, अगर क्रोध नहीं करना चाहते, तो अपमान में आनंद लो, सम्मान की चिंता मत करो। तो वह कहेगा, यह कैसे हो सकता है? स्वाभिमान तो होना ही चाहिए।
आदमी बड़ा कुशल है। हम अभिमान थोड़े ही करते हैं, स्वाभिमान! अभिमान दूसरे करते हैं। तो सेल्फ रिस्पेक्ट तो होनी ही चाहिए। नहीं तो आदमी क्या कीड़ा-मकोड़ा हो जाएगा! अब वह कहता है, क्रोध मुझे करना नहीं और अभिमान मुझे बचाना है। और अभिमान के साथ क्रोध का धागा सिर्फ जुड़ा ही हुआ हिस्सा है; वह अभिमान से अलग हो नहीं सकता। स्वाभिमान तो दूर, स्व को भी जो बचाएगा, उसका भी क्रोध बच जाएगा।
स्व भी खो जाए, सेल्फलेसनेस हो--सेल्फिशलेसनेस नहीं, सेल्फलेसनेस--स्वार्थ का अभाव नहीं, स्व का ही अभाव हो, तो ही क्रोध जाता है। हमारी हालतें कुछ ऐसी हैं कि हम एक डंडे के एक छोर को बचाना चाहते हैं और दूसरे को हटाना चाहते हैं। बड़ी मुश्किल में जिंदगी बीत जाती है; कुछ हटता नहीं। और इस जाल को कभी हम देखते नहीं कि सब चीजें भीतर जुड़ी हैं।
अब एक आदमी कहता है कि मुझे, शत्रु तो बिलकुल मुझे चाहिए नहीं; मैं तो सभी से मित्रता चाहता हूं।
लेकिन ध्यान रहे, मित्रता बनाने में ही शत्रुताएं पैदा होती हैं। खैर, क्रोध और अभिमान तो खयाल में आ जाता है, लेकिन मित्रता बनाने में ही शत्रुताएं निर्मित होती हैं, यह खयाल में नहीं आता। जो आदमी मित्रता बनाने को उत्सुक है, वह शत्रुता बना ही लेगा। क्योंकि मित्रता बनाने का जो ढंग है, जो प्रक्रिया है, उसी की बाइ-प्रॉडक्ट...। जैसे कि कोई कारखाने में बाइ-प्रॉडक्ट हो जाती है। अब आप लकड़ी जलाएंगे, तो कोयला घर में बच जाएगा, राख घर में बच जाएगी। आप कहेंगे, आग तो हम जलाना चाहते हैं, ईंधन जलाने की तो बहुत जरूरत है, लेकिन राख न बचे घर में। वह राख बाइ-प्रॉडक्ट है, वह बचेगी ही। जिससे भी मित्रता करेंगे, उससे शत्रुता निर्मित हो जाएगी। और मित्रता बनाने के लिए उत्सुक आदमी अनेक तरह की शत्रुताओं के चारों तरफ अड्डे खड़े कर देगा।
सच तो यह है कि आप मित्रता बनाना ही क्यों चाहते हैं? अगर गहरे में खोजें, तो आप मित्रता इसलिए बनाना चाहते हैं कि आप शत्रुता से भयभीत हैं। वह भी इंतजाम है। मित्र होने चाहिए।
नसरुद्दीन बहुत मुसीबत में है। उसका घाटा लगा है बड़ा। एक मित्र उसे कहता है कि दस हजार मैं तुम्हें देता हूं, ले जाओ। नसरुद्दीन सोच में पड़ जाता है, आंख बंद कर लेता है। वह मित्र कहता है, इसमें सोचने की क्या बात है! ले जाओ; जब हों, तब लौटा देना। नसरुद्दीन सोच ही रहा है। मित्र थोड़ा हैरान हुआ कि वह इतनी तकलीफ में है कि दस हजार उसके काम पड़ेंगे। नसरुद्दीन ने कहा कि नहीं, रहने दो। उसने कहा, लेकिन बात क्या है?
नसरुद्दीन ने कहा कि ये रुपए ले-लेकर ही मैंने बाकी मित्र खोए। तुमसे लिया कि तुम भी गए। और तुम्हीं अकेले बचे हो। और मित्रता तुम्हारी कीमती है, और दस हजार में न खोना चाहूंगा। दस हजार में न खोना चाहूंगा!
मित्र और शत्रु एक ही, एक ही चीज के छोर हैं। जो मित्र है, वह कभी भी शत्रु हो सकता है। जो शत्रु है, वह कभी भी मित्र हो सकता है। मैंने पीछे कहा कि मैक्यावेली दूसरा छोर है लाओत्से का। दोनों छोरों पर बड़ी बुद्धिमानी है। मैक्यावेली ने अपनी किताब में लिखा है, मित्रों से भी वह बात मत कहना, जो तुम शत्रुओं से न कहना चाहो। क्योंकि कोई भी मित्र कभी भी शत्रु हो सकता है। और शत्रु के खिलाफ भी वे शब्द मत बोलना, जो तुम मित्र के खिलाफ न बोलना चाहो। क्योंकि कोई भी शत्रु कभी भी मित्र हो सकता है।
मैक्यावेली होशियारी की बात कह रहा है। होश से बोलना! मित्र से भी वह बात मत बताना, जो तुम शत्रु को बताने से डरते हो। क्योंकि कोई भरोसा है, मित्र कभी भी शत्रु हो सकता है। और तब मंहगा पड़ जाएगा। और शत्रु के संबंध में भी वे बातें मत कहना, जो तुम मित्र के संबंध में न कहना चाहो। क्योंकि वे कभी भी मंहगी पड़ सकती हैं; शत्रु कभी भी मित्र हो सकता है।
हम चाहते हैं, मित्र तो बहुत हों, शत्रु कोई भी न हो। बस, जाल भारी है।
लाओत्से कहता है, सब ग्रंथियां सुलझा लो। लेकिन कैसे सुलझेंगी ये ग्रंथियां? जब भी हम सुलझाने चलते हैं, तो एक छोर सुलझाते हैं, दूसरा उलझ जाता है। हमें सिखाया जाता है कि क्रोध मत करो, क्षमा करो। उलझन खड़ी हो जाएगी। हमें कहा जाता है, घृणा मत करो, प्रेम करो। हमें कहा जाता है, हिंसा मत करो, अहिंसा करो। हमें कहा जाता है, झूठ मत बोलो, सच बोलो। लेकिन इन सब में ग्रंथियां उलझेंगी। एकदम दिखाई नहीं पड़ता ऊपर से सतह पर से खोजने पर कि कैसे ग्रंथियां उलझेंगी! जो आदमी सच बोलने के लिए पक्का किए हुए है, उसमें क्या ग्रंथि उलझेगी?
बहुत ग्रंथियां उलझेंगी। जिस आदमी ने तय किया कि सच बोलूंगा, उलझन शुरू हुई। एक तो उसे प्रतिपल झूठ का स्मरण करना पड़ेगा; झूठ क्या है, इसका प्रतिपल खयाल रखना पड़ेगा। अगर झूठ का उसे खयाल मिट जाए, तो सच को बांध कर रखना मुश्किल हो जाएगा। बच्चे इसीलिए झूठ बोल देते हैं, क्योंकि अभी उन्हें झूठ का खयाल नहीं है। इतने सरल हैं कि अभी उन्हें डिस्टिंकशन नहीं है, क्या सच है और क्या झूठ है।
सुना है मैंने, एक छोटा बच्चा अपने घर लौटा है। और अपनी मां से कह रहा है कि गजब हो गया, रास्ते पर इतना बड़ा कुत्ता देखा, जैसे हाथी हो! उसकी मां ने कहा, बबलू, करोड़ बार तुम से कह चुकी हूं कि अतिशयोक्ति मत किया करो; डोंट इग्जैजरेटकरोड़ बार! मां कहती है, करोड़ बार तुम से कह चुकी हूं कि अतिशयोक्ति मत किया करो। लेकिन तुम सुनते ही नहीं।
अब इसमें जो बच्चा कह रहा है, वह झूठ नहीं है। क्यों? क्योंकि हमें कभी खयाल ही नहीं होता कि बच्चे के प्रपोरशन अलग होते हैं। बच्चे के प्रपोरशन आपके प्रपोरशन नहीं हैं। बच्चे को एक छोटा कुत्ता, जो आपको छोटा लगता है, हाथी की तरह लग सकता है। अभी उसके गणित दूसरे हैं। जो बच्चे को दिखाई पड़ता है, वह आपको दिखाई नहीं पड़ता। जो आपको दिखाई पड़ता है, वह बच्चे को नहीं दिखाई पड़ता।
किसी भी बच्चे से आदमी की तस्वीर बनवाएं, तो पेट छोड़ देगा। दो टांगें लगा देगा, दो हाथ लगा देगा, सिर लगा देगा, बीच का हिस्सा बिलकुल छोड़ देगा। सारी दुनिया में! तो यह एक-आध बच्चे की भूल नहीं हो सकती। मनोवैज्ञानिक पीछे इसमें उत्सुक हुए कि एक-आध बच्चा यह भूल करे, लेकिन सारी दुनिया में, चाहे वह चीन में पैदा हो, और चाहे अफ्रीका में पैदा हो, और चाहे अमरीका में पैदा हो, बच्चा क्या गड़बड़ करता है? यह बीच का हिस्सा क्यों छोड़ जाता है? कुछ तो बनाए। बीच का हिस्सा छोड़ ही देता है। दो टांगें लगा देता है, दो हाथ लगा देता है, सिर बना देता है, इसमें भूल-चूक नहीं करता है।
तब अध्ययन किए गए और पता चला कि बच्चे को बीच के हिस्से का बोध ही नहीं है। उसके लिए आदमी का मतलब दो हाथ, दो पैर, सिर; बाकी बीच का हिस्सा उसके बोध में नहीं है, उसकी अवेयरनेस में नहीं है। उसमें उसका कोई ध्यान नहीं गया। उस पर उसका ध्यान ही नहीं है।
तो एक बच्चे को कुत्ता हाथी जैसा दिख सकता है। लेकिन एक मां कह रही है कि एक करोड़ बार तुझसे कह चुकी! अब यह एक करोड़ बार अतिशयोक्ति है स्पष्ट। और यह जो अतिशयोक्ति है, यह है अतिशयोक्ति। वह बच्चा जो कह रहा है, वह नहीं है।
उसकी मां ने उसे बहुत डांटा और उससे कहा, जाओ, भगवान से प्रार्थना करके माफी मांगो कि ऐसा झूठ अब कभी नहीं बोलोगे। वह बच्चा गया, उसने भगवान से प्रार्थना की। वह थोड़ी देर बाद बाहर आया। उसकी मां ने कहा कि माफ कर दिया? उस बच्चे ने कहा, माफ क्या, भगवान ने कहा जब पहली दफे मैंने उस कुत्ते को देखा था, तो मुझे भी हाथी जैसा मालूम पड़ा था; इसमें बबलू, तेरी कोई गलती नहीं है। लुक सेकेंड टाइम, दुबारा देख जाकर, फिर वह तुझे कुत्ते जैसा दिखाई पड़ेगा।
अब यह जो बच्चा है, यह कोई झूठ नहीं गढ़ रहा है। हमें लगेगा कि यह तो बिलकुल सरासर झूठ है। कौन भगवान इससे कहेगा? लेकिन हमें बच्चे के माइंड का कुछ पता नहीं है। क्योंकि बच्चा खुद सवाल उठा सकता है और दूसरी तरफ से जवाब भी दे सकता है। इसका हमें पता नहीं है, इसका हमें पता नहीं है कि बच्चा सवाल भी उठा सकता है और दूसरी तरफ से जवाब भी दे सकता है। उसने कहा होगा कि यह क्या मामला है, मुझे दिखाई पड़ा! और भगवान की तरफ से उसने ही जवाब दिया है कि मुझे भी ऐसा ही दिखाई पड़ा था। पहली दफे ऐसा ही होता है। मैं खुद ही भूल में पड़ गया था कि यह कुत्ता है या हाथी!
यह झूठ जरा भी नहीं बोल रहा है, क्योंकि इसे झूठ का अभी बोध ही नहीं है। यह सच भी नहीं बोल रहा है, इसे सच का भी बोध नहीं है। इसे जो हो रहा है, यह बोल रहा है। अगर ठीक से समझें, तो जो हो रहा है, वही बोलना सच है। लेकिन आपका सत्य नहीं, जिसमें कि झूठ का बोध है। इसे जो हो रहा है, वही बोल रहा है। इसे कुत्ता हाथी की तरह दिखाई पड़ा, यह वही बोल रहा है। यह कोई बना कर नहीं आ गया है कहानी बीच में से; इसको दिखाई पड़ा है। यह वही बोल रहा है, जो दिखाई पड़ा है। इसे सुनाई पड़ा कि परमात्मा ने कहा कि मुझे भी पहली बार ऐसा ही हुआ था। यह वही बोल रहा है।
सत्य का एक और आयाम है, जहां न सच रहता है, न झूठ; जहां जो है, है। लेकिन वहां असत्य का बोध भी नहीं है। और इसलिए कई बार सच और झूठ में रहने वाले लोगों को उसमें कई बातें असत्य मालूम पड़ेंगी। कई बातें! जैसे हमको मालूम पड़ेगी कि सरासर झूठ है कि हाथी के बराबर दिखाई पड़े कुत्ता। कैसे दिखाई पड़ सकता है? झूठ है! यह झूठ की हमारी व्याख्या है और हमारे बाबत खबर है; यह बच्चे के मन के बाबत कोई सूचना नहीं है इसमें। और सच पूछा जाए तो जब हम बच्चे से यह कह रहे हैं कि यह झूठ है, तब हम उसे पहली दफे झूठ सिखा रहे हैं।
नसरुद्दीन के गांव में एक नया पुरोहित आया है। मस्जिद में वह बोला है पहले ही दिन। बूढ़ा नसरुद्दीन है, लौटते वक्त मस्जिद से उसने सोचा, इस बूढ़े से पूछे लें कि कैसा लगा प्रवचन। पूछा उसने कि मुल्ला, कैसा लगा प्रवचन? तो मुल्ला ने कहा, बहुत अदभुत था, वंडरफुल! वी नेवर न्यू व्हाट सिन इज़ बिफोर यू केम! हमें पता ही नहीं था कि पाप क्या है। तुम्हारे आने के पहले हमें पता ही नहीं था कि पाप क्या है। जब से तुम आए, पाप का पता चला। पाप का पता चलने के लिए भी तो पाप की व्याख्या साफ होनी चाहिए!
नसरुद्दीन एक दिन अदालत के बाहर अपने वकील को पकड़ा है और जाकर कहा कि सुनो, तलाक का क्या नियम है? डायवोर्स कैसे किया जाए? उस वकील ने कहा, क्या मतलब नसरुद्दीन, क्या हो गया? नसरुद्दीन ने कहा, मेरी पत्नी को कोई शिष्टाचार नहीं आता; टेबल मैनर्स तो बिलकुल ही नहीं हैं। सारे घर की बदनामी हो रही है। गांव भर में प्रतिष्ठा धूल में मिली जा रही है। तलाक लेना जरूरी है। वकील ने पूछा, शादी हुए कितने दिन हुए? नसरुद्दीन ने कहा, कोई तीस साल हुए। उस वकील ने कहा, तीस साल से...। तो तीस साल से तुम यह अशिष्टाचार सह रहे हो, तो अब क्यों परेशान हो गए? नसरुद्दीन ने कहा, तीस साल से पता नहीं था; आज ही एक किताब में पढ़ा। आज ही एक किताब में पढ़ा, एक एटीकेट की किताब हाथ में लग गई; उसमें देखा कि सब बर्बाद हो गया, पत्नी में बिलकुल टेबल मैनर्स ही नहीं हैं।
हमें पता कब चलता है? व्याख्याएं! लाओत्से ने कहा है, ए इंच डिस्टिंक्शन, एंड हेवन एंड हेल आर सेट एपार्ट। एक इंच भर का फासला किया तुमने विचार में, और स्वर्ग और नर्क की दूरी पैदा हो जाती है। लाओत्से कहता था, डिस्टिंक्शन ही मत बनाना। लाओत्से कहता था, मत कहना कि यह ठीक है और यह गलत है। क्योंकि तुमने जैसे ही भेद किया, वैसे ही सब नष्ट हो जाता है। अभेद में जीना।
ये ग्रंथियां कैसे सुलझेंगी?
हमारा ढंग है सुलझाने का कि एक-एक ग्रंथि को बदलें, उसकी विपरीत चीज लाएं। अगर क्रोध ज्यादा है, तो क्षमा लाओ पकड़ कर। अगर हिंसा ज्यादा है, तो अहिंसा की प्रतिज्ञा ले लो। अगर लोभ ज्यादा है, तो त्याग करो, थोड़ा दान कर दो। हम इस तरह सुलझाते हैं। इस तरह कुछ भी नहीं सुलझता।
लाओत्से की दृष्टि में सुलझाव का अर्थ है, इस पूरी स्थिति को देखो। ये सब उलझाव तुम्हारे डिस्टिंकशन से बने हैं। यह तुमने जो भेद किया है पाप और पुण्य का, यह तुमने भेद किया है सत्य और असत्य का, यह तुमने भेद किया है प्रेम और घृणा का, इससे सारे के सारे उलझाव हैं। सारा भेद छोड़ दो और सरलता में जीओ, स्वभाव में जीओ, जो हो। स्वभाव में जीओ, बहो; कोई भेद मत करो। फिर कोई उलझन नहीं है।
लाओत्से से कोई पूछे अगर कि तूने कभी किसी पाप का प्रायश्चित्त किया? तो लाओत्से कहेगा, नहीं, क्योंकि मुझे पता नहीं पाप क्या है। यह नहीं कि मैंने पाप न किया हो। लाओत्से कहता है, मुझे पता नहीं कि पाप क्या है। कोई लाओत्से से पूछे कि तूने पुण्य किए, बहुत उसके फल पाएगा! लाओत्से कहता है कि नहीं, मुझे पता नहीं कि पुण्य क्या है; फल मिल भी सकते हैं, मुझे पता नहीं। मैंने लेखा-जोखा नहीं रखा, मैंने हिसाब नहीं रखा। जो सहज मुझसे हुआ है, वह मैंने किया है। न कभी पछताया और न कभी आत्म-प्रशंसा में अपनी पीठ ठोंकी। वे दोनों काम मैंने नहीं किए हैं।
गुत्थियां सुलझेंगी, अगर हम गुत्थियों को पैदा करने की कीमिया जो है हमारे भीतर, वह समझ जाएं। कीमिया क्या है? हर चीज को हम दो में तोड़ कर चलते हैं। पहले तोड़ते हैं, फिर कदम उठाते हैं। और तब हमारी दिक्कतें वैसी हो जाती हैं, जैसे यूनान में एक विचारक हुआ, झेनो। एक कीमती विचारक हुआ ग्रीक। और यूनान ने कुछ थोड़े से जो बहुत बुद्धिमान आदमी दिए हैं, झेनो उनमें एक है। झेनो के पैराडॉक्सेस बहुत प्रसिद्ध हैं।
झेनो कहता है, एक मील का रास्ता है; पहले तुम आधा मील चलो, और हर बार आधा-आधा चलो, तो तुम कभी एक मील का रास्ता पूरा न कर पाओगे। कभी! अनंत काल में भी!
एक मील का रास्ता कोई बड़ा रास्ता नहीं है। पंद्रह मिनट में आप पार कर जाएंगे, पैदल घसिटते हुए चलें तो भी। झेनो कहता है, पहले आधा पार करो। क्योंकि बुद्धि बांट कर चलती है; इट डिवाइड्स। पहले आधा बांटो, आधा पार करो। फिर जो बचे, उसको आधा बांटो, उसको पार करो। फिर जो बचे, उसको आधा बांटो। और हमेशा कुछ बचेगा, उसको आधा बांटते चले जाना। और हमेशा कुछ बचेगा, उसको आधा बांटते चले जाना। तुम अनंत काल में एक मील का रास्ता पार न कर पाओगे।
गणित के हिसाब से बात ठीक है। गणितज्ञ इसका जवाब नहीं दे सकता। यह पार हो नहीं सकता।
झेनो कहता है, एक तीर तुमने अपनी प्रत्यंचा पर खींचा और चलाया। तीर के चलने के लिए जरूरी है...समझें कि बारह बजे तीर चला। तो बारह बजे अ नाम की जगह पर तीर है; बारह बज कर एक मिनट पर उसे कहां होना चाहिए? ब नाम की जगह पर होना चाहिए। बारह बज कर दो मिनट पर स नाम की जगह पर होना चाहिए। तभी तो चल पाएगा। झेनो कहता है कि बारह बजे अ नाम की जगह पर है, तो ठहरा हुआ है। बारह बजे अ नाम की जगह पर ठहरा हुआ है, बारह बज कर एक मिनट पर ब नाम की जगह पर ठहरेगा। बीच का फासला पार कैसे करेगा? अ से ब तक जाएगा कैसे? झेनो कहता है, जा नहीं सकता। झेनो कहता है, गणित के हिसाब से कोई तीर कहीं नहीं गया।
झेनो चलता है, झेनो तीर भी चलाता है। झेनो से लोग पूछते हैं कि तुम चलते भी हो, पहुंच भी जाते हो, तीर भी चलाते हो। झेनो कहता है, पता नहीं; लेकिन गणित में तो कोई तीर चल नहीं सकता। क्योंकि चलने का मतलब है, उसे एक बार तो अ पर होना पड़ेगा। जब वह अ पर होगा, तब ब पर नहीं होगा। फिर ब पर होना पड़ेगा। और जब तक वह अ पर है, ब पर कैसे जाएगा? और या फिर ऐसा मानो कि उसी समय अ पर भी रहेगा और ब पर भी रहेगा, तो सब गड़बड़ हो जाएगी।
तो झेनो ने पैराडॉक्सेस लिखे हैं। और दो हजार साल लग गए, झेनो के पैराडॉक्सेस का उत्तर देने की बहुत कोशिश की गई, बहुत लोगों ने उत्तर दिए; लेकिन उत्तर नहीं हो पाते। क्योंकि उत्तर हो नहीं सकते। उत्तर हो नहीं सकते, क्योंकि बुद्धि तोड़ कर सोचती है और तीर तो बिना तोड़े चला जाता है। दिक्कत जो है, वह यह है, तीर पता ही नहीं रखता कि अ कहां है और ब कहां है! बुद्धि तोड़ कर चलती है, पैर तो बिना तोड़े चले जाते हैं। पैर तोड़ते थोड़े ही हैं कि यह आधा मील, फिर यह आधा मील, फिर यह आधा मील; पैर तो बिना तोड़े चले जाते हैं। और बुद्धि तोड़ कर जाती है। पैर और बुद्धि में तालमेल नहीं रह जाता।
बुद्धि का नियम है, तोड़ो। तोड़ने का परिणाम है, उलझो। अगर उलझाव से बचना है, तो पीछे लौटो, तोड़ो मत। तोड़ना नहीं है, तो बुद्धि को छोड़ो। और बुद्धि छूटी कि अभेद निर्मित हो जाता है और सब गुत्थियां गिर जाती हैं; सब ग्रंथियां गिर जाती हैं।
महावीर के नामों में से एक नाम है निर्ग्रंथ। उसका अर्थ है, वह आदमी जिसकी सब ग्रंथियां गिर गईं, वह आदमी जिसके सब उलझाव गिर गए।
ध्यान रहे, उलझाव के गिरने पर जोर है, सुलझाव के होने पर नहीं है जोर। मेरे हाथ में एक उलझी हुई गुत्थी है धागों की। सुलझाने का मतलब है, इन धागों को मैं सुलझा-सुलझा कर, लपेट कर एक रेखाबद्ध कर लूं। उलझाव के गिर जाने का अर्थ है, ये धागे मेरे हाथ से गिर जाएं, मैं इस उलझाव को ही भूल जाऊं। यह बात ही खतम हो गई। मेरे हाथ खाली हो गए। जोर उलझाव के गिर जाने पर है।
लाओत्से कहता है, सारे उलझावों को हटा दो। महावीर कहते हैं, निर्ग्रंथ हो जाओ, सब ग्रंथियां छोड़ दो।
अभी मनोविज्ञान ने कांप्लेक्स शब्द पर बहुत काम करना शुरू किया है। क्योंकि पूरब में तो ग्रंथि शब्द बहुत पुराना है। मन के जो उलझाव हैं, उनको हम ग्रंथि कहते रहे हैं। पश्चिम ने अभी पिछले पचास-साठ वर्षों में कांप्लेक्स शब्द का उपयोग करना शुरू किया है। उसका अर्थ है ग्रंथि। और मन में बड़े कांप्लेक्स हैं। और मनोविज्ञान बहुत कोशिश करता है कि इनसे सुलझाव हो जाए। लेकिन अभी पचास साल की निरंतर कोशिश से यह अनुभव में आया कि चाहे वर्षों की साइको एनालिसिस कोई करवाए, तो भी कांप्लेक्स सुलझते नहीं हैं। केवल वह आदमी उनके साथ रहने को राजी हो जाता है, बस।
एक आदमी में क्रोध है। वह परेशान है कि क्रोध को कैसे हटाऊं! अगर मनोवैज्ञानिक के पास जाएगा, तो दोत्तीन साल की लंबी प्रक्रिया के बाद वह इस स्थिति में आ जाएगा कि वह राजी हो जाएगा कि नहीं हटता है, रहने दो। राजी हैं, अब हटाने की भी कोशिश नहीं करते। इससे ज्यादा कहीं पहुंचते नहीं हैं वे। सुलझाने की कोशिश में आप यहीं तक पहुंच सकते हैं कि उलझी हुई ग्रंथि को ही सुलझा हुआ समझ कर, दबा कर सो जाएं। वह सुलझने वाली नहीं है। उसका स्वभाव उलझा होना है।
मन ग्रंथि है। माइंड इज़ दि कांप्लेक्स। ऐसा नहीं है कि कुछ और कांप्लेक्स हैं जिनको हल कर दिया, तो पीछे माइंड बचेगा। वह मन ही गांठ है। उसको सुलझाने का जो उपाय लाओत्से जैसे लोग सुझाते हैं, वह यह है कि इस मन की जो आधारशिला है, भेद--अपना-पराया, अंधेरा-उजाला, मित्र-शत्रु, जीवन-मृत्यु, शरीर-आत्मा, स्वर्ग-संसार--ये जो भेद हैं, इनको गिरा दो।
नसरुद्दीन एक कार से टकरा गया। उसको भारी चोट पहुंची है, जितनी पहुंच सकती है। दोनों पैर की हड्डियां टूट गई हैं, एक हाथ टूट गया है, गर्दन टूट गई है, कई पसलियां टूट गई हैं। सिर पर बहुत चोट हैं। सब पर पट्टियां बंधी हैं। वह अस्पताल में पड़ा है।
सुलतान नगर से गुजर रहा है। खबर मिली कि गांव का सबसे बूढ़ा आदमी और बड़ा जाहिर आदमी अस्पताल में है, तो वह देखने गया है। देख कर उसकी समझ में न आया, क्या कहे। क्योंकि सिर्फ नसरुद्दीन का मुंह दिखाई पड़ता है और दो आंखें दिखाई पड़ती हैं, बाकी सब पट्टियां बंधी हैं। भारी चोट पहुंची है। आदमी बचेगा भी कि नहीं बचेगा! सुलतान कुछ कहना चाहता है, लेकिन कहां से शुरू करे, यह ही समझ में नहीं आता। सहानुभूति भी क्या बताए, मामला ही बिलकुल गड़बड़ है। सहानुभूति बताने लायक भी नहीं है। फिर भी कुछ कहना चाहिए, तो वह कहता है कि बहुत ज्यादा चोट पहुंची; पैर टूट गया, हाथ टूट गया, सिर पर चोट पहुंची, मुंह पर चोट पहुंची, पसलियां टूट गईं, बड़ी पीड़ा होती होगी नसरुद्दीन! बहुत ज्यादा दुख, बहुत ज्यादा दर्द होता होगा! नसरुद्दीन कहता है, नहीं, वैसे तो नहीं होता; होता है, व्हेन आई लाफ। उसने कहा कि जब मैं हंसता हूं, तब थोड़ा होता है, ऐसे नहीं होता। वह सुलतान तो समझ ही नहीं सका कि ऐसी हालत में कोई आदमी हंसेगा काहे के लिए। उसको खयाल में ही नहीं आया, कल्पना ही के बाहर था कि यह हंसेगा। वह नसरुद्दीन बोला, नहीं, ऐसे कोई तकलीफ नहीं हो रही; जरा हंसता हूं, तो थोड़ी तकलीफ होती है। सुलतान की हिम्मत न पड़ी कि अब और कुछ आगे क्या कहे। फिर भी उसने कहा, आ ही गया हूं तो अच्छा ही हुआ, एक सवाल पूछ कर चला जाऊं। क्या नसरुद्दीन, ऐसी हालत में भी हंस पाते हो? नसरुद्दीन ने कहा, अगर ऐसी हालत में न हंस पाऊं, तो हंसना सीखा ही नहीं। यानी और हंसने का क्या मतलब हो सकता है! और हंसने का मौका क्या हो सकता है! और हंसता हूं इसलिए कि अब तक कई बार ऐसा भ्रम होता था, लेकिन पक्का पता नहीं था, सोचा बहुत बार था, अब पता चला कि नसरुद्दीन हड्डियां कितनी ही टूट जाएं, नसरुद्दीन नहीं टूटता। इधर भीतर हंस लेता हूं कि बड़ा मजा है! सब टूट गया है। जो आ रहा है, वही दया दिखला रहा है; लेकिन मुझको खुद दया नहीं आ रही है। सब टूट गया है, सब फूट गया है; अब इसमें कुछ है नहीं ज्यादा बचने वाला। हंसी आ रही है इससे। और लोग मुझसे आकर पूछते हैं, कैसे हो नसरुद्दीन? नसरुद्दीन बिलकुल ठीक है; नसरुद्दीन बिलकुल ठीक है। ये जो ग्रंथियां हैं मन की, इनके बीच में अगर आप अलग दिख जाएं, तो ग्रंथियां तत्काल गिर जाती हैं। फिर आप बिलकुल ठीक हैं। वे सारी पट्टियां बंधी रहेंगी, आपकी सब ग्रंथियां उलझी रहेंगी, चारों तरफ सब उपद्रव बना रहेगा, सब बाजार खड़ा रहेगा; आप अचानक बाहर हो जाते हैं। यू ट्रांसेंड इट। अतिक्रमण है। अतिक्रमण में ही सुलझाव है। गुत्थियां सुलझाई नहीं जा सकतीं, इन गुत्थियों के पार होने में सुलझाव है।
घाटी में रह कर अंधेरा नहीं मिटाया जा सकता, लेकिन शिखर पर चढ़ जाता है एक आदमी, सूरज पर पहुंच जाता है; खुली रोशनी है, धूप है। घाटी में अंधेरा है; है वह घाटी में, पड़ा है। लेकिन अब यह आदमी घाटी में नहीं है।
हमारी सब की कोशिश यह है कि दीया जलाओ, आग जलाओ, घाटी को उजाला करो; मगर रहो घाटी में, वहां से हटो मत। जहां बीमारी है, वहीं रहो, वहीं उलझे रहो और वहीं सुलझाने की कोशिश करते रहो; बीमारी के पार न जाओ। लाओत्से की कीमिया, लाओत्से जैसे सभी लोगों का दर्शन पार का दर्शन है। अतीत हो जाओ, हट जाओ। जहां है उपद्रव, वहां से थोड़ा दूर हो जाओ। फासला करो बीच में, देखो जरा दूर होकर, तो हंसी आ जाती है। फिर कोई उलझाव बांधता नहीं है।
लाओत्से जब कहता है कि गुत्थियों को हटा दो, ग्रंथियों को सुलझा दो, इसकी जगमगाहट मृदु हो जाए...।
यह जो हमारे भीतर अस्मिता है, जो अहंकार है, यह अभी एक लपट की तरह है, जलाती है। इसकी जो जगमगाहट है, वह आंखों को पीड़ा देने वाली है। आभा नहीं है इसमें, आग है।
लाओत्से कहता है, "इसकी जगमगाहट मृदु हो जाए।'
तुम जरा सुलझाओ अपनी ग्रंथियों को, तुम जरा घिस दो अपनी नोकों को, और तुम पाओगे कि तुम्हारा अहंकार अहंकार नहीं हुआ, अस्मिता हो गया। इन दो शब्दों को थोड़ा समझना अच्छा होगा।
संस्कृत के पास बड़े समृद्ध शब्द हैं। जैसे अहंकार, ईगो; लेकिन एक और शब्द है संस्कृत के पास, अस्मिता। उसके लिए अंग्रेजी में अनुवाद करना असंभव है। उसको हिंदी में भी अनुवाद करना असंभव है। अहंकार का अर्थ है ऐसा मैं, जिससे दूसरों को चोट पहुंचती है; अस्मिता का अर्थ है ऐसा मैं, जिससे किसी को चोट नहीं पहुंचती। इतना मृदु, जिसमें कोई नोक न रह गई! शब्द की ध्वनि भी चोट वाली है--अहंकार! अस्मिता। अस्मिता में एक भाव है, कोई तूफान शांत हो गया, लहरें गिर गईं। झील अब भी है। लेकिन तूफानों का, आंधियों का, लहरों का विक्षिप्त रूप नहीं है। झील अब भी है। झील में वे ही लहरें अब भी सो रही हैं, जो कल उठ गई थीं और तूफान में नाचने लगी थीं और विकराल हो गई थीं। और जिन्हें देख कर प्राण कंप जाते, और नौकाएं डगमगातीं और डूब जातीं। तट कंपते, घबड़ाते। वह अब नहीं है। लेकिन वही लहरें अभी भी हैं, सो गई हैं, शांत हो गई हैं।
अस्मिता का अर्थ है ऐसा अहंकार, जिसमें से दंश चला गया, जिसमें ज्वाला न रही, आभा रह गई। आभा! सुबह सूरज निकलता है, उसके पहले जो प्रकाश होता है, वह आभा है। सूरज निकल आया, फिर तो ज्वाला शुरू हो जाती है। सूरज नहीं निकला अभी, क्षितिज के नीचे पड़ा है। सुबह हो गई, रात अब नहीं है, दिन अभी नहीं आया। बीच का क्षण है। वह बीच की संधि में आभा फैल गई है, जिसको हम भोर कहते हैं। अभी सूरज उपस्थित नहीं है।
अहंकार जब ढल जाता है, तो मैं की वह जो आंखों को चुभने वाली ज्वाला है, वह मिट जाती है, अहंकार डूब जाता है। तब एक आभा रह जाती है भीतर--होने की। तब भी मैं होता हूं; ऐसा नहीं कि मैं नहीं होता हूं। तब भी मैं होता हूं; लेकिन उसमें मैं-पन कहीं नहीं होता। तब भी मैं होता हूं; लेकिन बस होता हूं, उसमें आई का, मैं का कोई तूफान नहीं होता। कहीं कोई शोरगुल नहीं होता, कहीं कोई घोषणा नहीं होती। कोई मुझसे पूछेगा, तो कहूंगा, मैं हूं; लेकिन कोई अगर न पूछेगा, तो मुझे पता ही नहीं चलेगा कि मैं हूं। यह मैं किसी के प्रश्न का उत्तर होगा। यह किसी ने पूछा होगा, तो यह मैं शब्द काम में आएगा। अन्यथा कोई नहीं पूछेगा, तो यह मैं कहीं नहीं बनेगा।
लेकिन आपने देखा, अहंकार, कोई पूछे या न पूछे, कोई हो या न हो, होता है। आप अकेले में खड़े हैं, तो भी अहंकार होता है। कोई नहीं है, तो भी होता है।
सुना है मैंने कि एक जहाज डूब गया। और उस पर एक बहुत बड़ा समृद्ध व्यापारी था, वह किसी तरह एक निर्जन द्वीप पर लग गया। वह न केवल बड़ा व्यापारी था, एक बड़ा मूर्तिकार, एक बड़ा आर्किटेक्ट, एक बड़ा स्थापत्य का जानकार भी था। अकेला क्या करेगा? तो उसने मूर्तियां बनानी शुरू कीं; उसने मकान बनाने शुरू किए। लकड़ियां काटीं, पत्थर जमाए; उसने अपने को व्यस्त कर लिया। वर्षों पर वर्ष बीतने लगे, उसकी बस्ती बसने लगी। अकेला था। पत्थरों पर पत्थर जमा कर, लकड़ियां काट कर, वृक्षों को काट कर रास्ते बनाए। करीब-करीब बिलकुल गैर-जरूरी, लेकिन जो-जो उसकी जरूरत की चीजें थीं, सब उसने बनाईं--गैर-जरूरी।
उसने वह दूकान बनाई जो उसके गांव में थी, जिससे वह सामान खरीदा करता था। उसने वह होटल बनाई, जिसमें वह भोजन किया करता था। उसने वह स्टेशन बनाया, जहां से वह ट्रेन पकड़ा करता था। हालांकि यहां कोई ट्रेन न थी; और यहां कोई, इस होटल में कोई चलाने वाला न था; और इस दूकान पर कोई दूकानदार न था और न कोई चीजें बिकने को थीं। लेकिन सुबह वह निकलता और दूकानदार को नमस्कार करता, कभी-कभी जाकर होटल में विश्राम करता। वह अकेला ही था। उसने मंदिर बनाया। उसने सारा इंतजाम किया।
कोई बीस वर्ष बाद एक जहाज आकर लगा। और जहाज के लोगों ने उससे उतर कर कहा कि हम तो सोचते थे तुम समाप्त हो गए, लेकिन तुम हो तो चलो। पर उसने कहा, इसके पहले कि मैं चलूं, मैं तुम्हें अपनी बस्ती बता दूं। यह जो बस्ती मैंने इन बीस सालों में बना ली। उसने बताया कि देखो यह दूकान है, जहां से मैं सामान वगैरह खरीदता था। यह होटल है, जहां कभी-कभी थक जाता, तो विश्राम के लिए जाता था। वह जो दूर तुम्हें दिखाई पड़ता है शिखर, वह मेरे चर्च का है, जिसमें मैं जाता था।
पर उन लोगों ने कहा कि लेकिन चर्च दो दिखाई पड़ते हैं; एक उसके सामने भी है।
उसने कहा, हां, वह वह चर्च है, जिसमें मैं नहीं जाता था। गांव में दो चर्च थे; एक में मैं जाता था और एक में नहीं जाता था। यानी एक मेरा चर्च था और एक दुश्मन का चर्च था। यह मेरा चर्च है, जिसमें मैं जाता हूं; और वह वह चर्च है, जिसमें मैं नहीं जाता हूं।
यह तो कुछ समझ में नहीं आया कि तुमने वह चर्च किसलिए बनाया? जिसमें तुम्हें जाना ही नहीं है, जिस चर्च में तुम जाते ही नहीं हो, वह तुमने किसलिए बनाया?
उसने कहा कि उसके बिना अपने चर्च का कोई मजा ही न था। यानी उसको होना चाहिए। वह उसके कंट्रास्ट में ही तो...। और देखते हो अपने चर्च की शान और उसकी हालत! देखते हो अपने चर्च की शान! और उसकी हालत देखते हो, वर्षों से रंग-रोगन भी नहीं हुआ है! और मैंने तो कभी नहीं देखा कि कोई वहां जाता हो। अक्सर लोग इसी में जाते हैं।
वह अकेला ही है। अहंकार अकेला भी होगा, तो अपने पास एक दुनिया निर्मित करेगा। वह उस चर्च को भी बना लेगा, जिसमें नहीं जाता। अहंकार अकेला नहीं हो सकता; उसके लिए दूसरे की जरूरत है। वह अदर ओरिएंटेड है। दूसरे के बिना उसका कोई मतलब नहीं है। अस्मिता अकेली ही है; उसे दूसरे का कोई लेना-देना नहीं है। वह मेरा होना है, माई बीइंग। अहंकार आपके खिलाफ मेरी लड़ाई है। अस्मिता मेरा अस्तित्व है; आपसे कुछ लेना-देना नहीं है। और जब अहंकार मजबूत होता है, तो अस्मिता भीतर दब जाती है। और जब अहंकार विदा हो जाता है, तो अस्मिता प्रकट हो जाती है। अहंकार में जलन है, क्योंकि वह दूसरे को जलाने की ही उत्सुकता में पैदा होता है। अस्मिता मृदु है।
तो लाओत्से कहता है, जगमगाहट को मृदु हो जाए ऐसा कुछ करो; कि यह तुम्हारे जो मैं की जगमगाहट है, यह तुम्हारे होने का जो तीव्र और कटु और विषाक्त रूप है, यह हलका हो जाए, मृदु हो जाए, शांत हो जाए। आभा रह जाए, प्रकाश मात्र रह जाए; कहीं कोई आग न बचे।
ध्यान रहे, आग और प्रकाश एक ही चीज हैं; लेकिन आग जलाती है, प्रकाश जलाता नहीं। एक ही चीज हैं; आग जलाती है, प्रकाश जलाता नहीं। आग मौत को ला सकती है; प्रकाश जीवन को लाता है। और एक ही चीज हैं। आग में एक जलन है, एक त्वरा है, और प्रकाश में एक मृदुता है। हौले-हौले, पगध्वनि भी नहीं सुनाई पड़ती है प्रकाश की।
"इसकी उद्वेलित तरंगें जलमग्न हो जाएं।'
यह जो विक्षिप्त अहंकार है, यह जो पूर्ण होने की विक्षिप्त आकांक्षा है, इसकी उद्वेलित तरंगें, इसकी विक्षिप्त तरंगें, इसकी पागल हो गई लहरें जलमग्न हो जाएं! झील में सो जाएं!
"और फिर भी यह अथाह जल की तरह तमोवृत्त सा रहता है।'
और जब यह सब हो जाएगा, तब भी सब एक रहस्य है। तब भी सब हल हो जाएगा, यह मत समझना। तब भी सब उत्तर मिल जाएंगे...यह बहुत कीमती है, अंतिम जो पंक्ति है।
"फिर भी यह अथाह जल की तरह तमोवृत्त सा रहता है।'
जैसे अथाह हो जल! जल जितना कम हो, उतना शुभ्र मालूम होता है; जितना ज्यादा हो जाए, उतना नीलवर्ण का हो जाता है। और अथाह हो जाए, तो काला हो जाता है। अगर ठीक से समझें, तो डार्कनेस जो है, वह रहस्य का सिंबल है। ध्यान रहे, प्रकाश में रहस्य नहीं है, रहस्य तो अंधकार में है। प्रकाश एक अर्थ में छिछला है। अंधेरे में बड़ी गहराई है, बड़ी डेप्थ है, एबिसिमल डेप्थ है, ओर-छोर नहीं है। पूरी पृथ्वी प्रकाश से भरी हो, तो भी प्रकाश का दायरा छोटा है; और एक छोटा सा कमरा भी अंधकार से भरा हो, तो अनंत है।
इसको थोड़ा खयाल में ले लें। यह पूरी पृथ्वी प्रकाश से भरी हो, तो भी सीमित है। सीमा बनाता है प्रकाश। यह छोटा सा कमरा अंधकार से भरा हो, तो कमरे की कोई सीमा नहीं है; असीम है। छोटा सा अंधकार भी असीम है; बड़े से बड़ा प्रकाश भी असीम नहीं है।
लाओत्से कहता है, यह सब हो जाएगा, फिर भी यह अथाह जल की तरह तमोवृत्त सा रहता है।
यह जो अस्तित्व है, यह अथाह जल जैसे अंधकार में डूबा हो, असीम, रहस्य से आवृत, कहीं ओर-छोर का कोई पता न चलता हो।
ईसाई फकीर हुए हैं। और सिर्फ दुनिया में ईसाई फकीरों ने ही परमात्मा को डार्कनेस, अंधकार का प्रतीक दिया है, एक खास ईसाइयों के फिरके ने। ईसा से भी पुराना वह फिरका है। ईसा से भी पहले इजिप्त में इसेन फकीरों का एक समूह था, जिसके बीच ईसा ने शिक्षा ली।
इसेन फकीर कहते हैं, हे परमात्मा, तू परम अंधकार है! दि एब्सोल्यूट डार्कनेस! दुनिया में बहुत लोगों ने परमात्मा के लिए प्रतीक खोजे हैं। और प्रकाश के प्रतीक तो आम हैं। वेद कहते हैं, उपनिषद कहते हैं, कुरान कहती है, परमात्मा प्रकाश है। लेकिन बड़े अदभुत लोग रहे होंगे इसेन फकीर! कहते हैं, परमात्मा, तू परम अंधकार है। और प्रयोजन केवल इतना है कि अंधकार असीम है। प्रकाश की कितनी ही कल्पना करो, सीमा आ जाती है।
और एक मजा है कि प्रकाश को जलाओ, बुझाओ, प्रकाश क्षणभंगुर है। अंधेरा शाश्वत है। न जलाओ, बुझाओ। आपके करने का कोई प्रयोजन नहीं है। आप आओ, जाओ, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। दीया जले, बुझे; सूरज निकले, डूबे; अंधकार अपनी जगह है--अछूता, अस्पर्शित, कुंवारा। प्रकाश को गंदा किया जा सकता है; अंधेरे को गंदा नहीं किया जा सकता। उसको छुआ ही नहीं जा सकता।
लाओत्से कहता है, अथाह जल, अंधकार में डूबा हो, रहस्य में डूबा हो!
रहस्य का अर्थ है, जिसे हम जानते भी हों और जानते हों कि नहीं जानते हैं। रहस्य का अर्थ है--खयाल ले लें--रहस्य का इतना ही अर्थ नहीं है कि जिसे हम न जानते हों। जिसे हम न जानते हों, वह अज्ञान है, रहस्य नहीं। जिसे हम जानते हों, वह ज्ञान है। ज्ञान में भी कोई रहस्य नहीं है; अज्ञान में भी कोई रहस्य नहीं है। अज्ञानी कहता है, मैं नहीं जानता। रहस्य जैसा कुछ भी नहीं है, न जानना बिलकुल साफ है। ज्ञानी कहता है, मैं जानता हूं। रहस्य कुछ भी नहीं बचता, जानना बिलकुल साफ है।
रहस्य का अर्थ है, जानता हूं कि नहीं जानता। जानता भी हूं किसी अर्थ में और किसी अर्थ में कह भी नहीं सकता कि जानता हूं। कोई अर्थ में लगता है मुझे, प्रतीत होता है, कि पहचाना, जाना, निकट आया। और तत्काल लगता है कि जितना निकट आता हूं, उतना दूर हुआ जाता हूं। जितना हाथ रखता हूं, लगता है, हाथ में आ गई बात, उतना ही पाता हूं कि हाथ ही उस बात में चला गया। सागर में कूद पड़ता हूं; लगता है, मिल गया सागर, पा लिया; लेकिन जब गौर करता हूं, तो पाता हूं, सागर के एक क्षुद्र से किनारे पर हूं। अनंत पड़ा है सागर, अनजाना, अछूता; उसे कभी पा न सकूंगा।
अज्ञानी स्पष्ट है, नहीं जानता है। ज्ञानी स्पष्ट है कि जानता है। इसलिए ज्ञानी और अज्ञानी में एक कॉमन एलीमेंट है--स्पष्टता का। रहस्यवादी अलग; न वह ज्ञानी से मेल खाता, न अज्ञानी से, या वह दोनों से एक साथ मेल खाता है। वह कहता है, किसी अर्थ में जानता भी हूं और किसी अर्थ में नहीं भी जानता। मेरे ज्ञान ने मेरे अज्ञान को प्रकट किया है। जितना मैंने जाना, उतना मैंने पाया कि जानने को बाकी है।
लाओत्से कहता है, सब हल हो जाएगा, उसी दिन तुम पाओगे कि कुछ भी हल नहीं हुआ। सब तमोवृत्त, गहन अथाह जल है अंधकार में डूबा हुआ!
इस बात से, जो चिंतक तरह के लोग हैं, सोच-विचार वाले लोग हैं, उनको अड़चन होती है। उनको अड़चन होती है, इतना श्रम शून्य होने का, इतना श्रम ग्रंथियां काट डालने का, इतना श्रम सब! और अंत में, अंत में कुछ स्पष्ट बात हाथ न लगे, तो बेकार गई मेहनत। लेकिन उन्हें पता नहीं है कि जब भी स्पष्ट बात हाथ में लगती है, तभी यात्रा बेकार जाती है। क्योंकि जब भी आप सुनिश्चित होकर कुछ पा लेते हैं, तभी वह बेकार हो जाता है। दैट व्हिच इज़ एचीव्ड कंप्लीटली एंड टोटली बिकम्स यूजलेस, मीनिंगलेस।
जब आप पाकर भी पाते हैं कि नहीं पाया जा सका, जब पहुंच कर भी पाते हैं कि मंजिल शेष है, जब डूब कर भी पाते हैं कि अभी ऊपर ही हैं, सतह पर ही हैं, जब तलहटी में भी बैठ कर पाते हैं कि अभी तो यात्रा शुरू हुई, तब किसी ऐसी जगह पहुंचे हैं, जहां से अर्थ कभी भी रिक्त न होगा, जहां से अर्थ कभी खोएगा, जहां का काव्य कभी समाप्त न होगा, और जहां का रोमांस शाश्वत है।
तो रिलीजन जो है, धर्म जो है, वह शाश्वत रोमांस है, इटरनल रोमांस। हम जितने ही उस प्रेमी के पास पहुंचते हैं, उतने ही हम पाते हैं कि पर्दों पर पर्दे हैं, द्वार पर द्वार हैं। जितने पास जाते हैं, पाते हैं, और द्वार हैं। अंतहीन मालूम होते हैं द्वार। और इसलिए यह यात्रा अनंत रूप से सार्थक है। और यात्रा के हर कदम पर रहस्य और विस्मय है। और यात्रा के हर कदम को मंजिल भी माना जा सकता है और यात्रा की हर मंजिल को नया यात्रा का कदम और पड़ाव भी माना जा सकता है।
इसलिए लाओत्से कहता है, यह सब हो जाए, फिर भी--यह फिर भी बहुत अर्थपूर्ण है--फिर भी ऐसा नहीं कि मंजिल आ ही जाती है और कोई कह देता है कि बस पहुंच गए।
सिर्फ उथले लोग पहुंचते हैं। नहीं पहुंचते, वही पहुंचने की बात करते हुए मालूम पड़ते हैं। यह जीवन इतना गहन है कि कोई कह न पाएगा कि पहुंच गए।
उपनिषदों में कथा है कि एक पिता ने अपने पांच बेटों को भेजा सत्य की खोज पर। वे गए। वर्षों बाद वे लौटे। पिता मरणासन्न है। वह पूछता है अपने बेटों से, सत्य मिल गया? ले आए? जान लिया?
पहला बेटा जवाब देता है, वेद की ऋचाएं दोहराता है। दूसरा बेटा जवाब देता है, उपनिषद के सूत्र बोलता है। तीसरा बेटा जवाब देता है, वेदांत की गहन बातें कहता है। चौथा बेटा बोलता है, जो भी सारभूत धर्मों ने पाया है, सब कहता है।
लेकिन जैसे-जैसे बेटे जवाब देते हैं, वैसे-वैसे बाप उदास होता चला जाता है। चौथे के जवाब देते-देते वह वापस बिस्तर पर लेट जाता है। लेकिन पांचवां चुप ही रह गया। बाप फिर उठ आया है। और उसने पूछा कि तूने जवाब नहीं दिया? शायद सोचा हो कि मैं लेट गया, थक गया। तेरा जवाब और दे दे; क्योंकि मैं तुम्हारी ही प्रतीक्षा में जी रहा हूं। वह बेटा फिर चुप है। बाप कहता है, तू बोल। वह बेटा फिर चुप है। उसने आंख बंद कर ली हैं। वह बाप कहता है, तो मैं फिर निश्चिंतता से मर सकता हूं। कम से कम एक जान कर लौटा है, जो चुप है।
बोधिधर्म वापस लौटता है--चीन दस वर्ष काम करके। अपने शिष्यों को इकट्ठा करता है और पूछता है, मुझे बताओ, धर्म का राज क्या है? रहस्य क्या है? संदेश क्या है बुद्ध का? मैंने तुम्हें क्या दिया?
वह जांच कर लेना चाहता है जाने के पहले।
एक शिष्य उत्तर देता है कि संसार और निर्वाण एक हैं, सब अद्वैत है।
बोधिधर्म उसकी तरफ देखता है और कहता है, तेरे पास मेरी चमड़ी है।
वह युवक बहुत हैरान हो जाता है, चमड़ी? अद्वैत की बात, और कहता है चमड़ी! बात जब सिर्फ अद्वैत की होती है, बात ही जब अद्वैत की होती है, तो चमड़ी ही होती है, कुछ और नहीं होता। बात तो उसने बड़ी ऊंची कही थी, पूरे अद्वैत की, कि संसार और ब्रह्म एक, संसार और मोक्ष एक, द्वैत है ही नहीं।
दूसरे से पूछता है। वह दूसरा कहता है, कठिन है कहना, अनिर्वचनीय है। बहुत मुश्किल है।
बोधिधर्म कहता है, तेरे पास मेरी हड्डियां हैं।
पूछता है युवक, सिर्फ हड्डियां?
बोधिधर्म कहता है, हां! क्योंकि तू कहता तो है अनिर्वचनीय, लेकिन कहता जरूर है। तू कहता है अनिर्वचनीय, नहीं कहा जा सकता, फिर भी कहता है। हड्डियां ही तेरे पास हैं।
और तीसरा युवक कहता है, न तो कहा जा सकता अनिर्वचनीय उसे, न कहा जा सकता अद्वैत उसे, शब्द नहीं वहां काम करते, वहां तो मौन ही सार्थक है।
बोधिधर्म कहता है, तेरे पास मेरी मज्जा है। मस्तिष्क में खोपड़ी को घेरे हुए जो है, वह तेरे पास है।
पर और इससे गहरी क्या बात होगी?
वह चौथे युवक की तरफ देखता है। वह चौथा युवक उसके पैरों में गिर पड़ता है और सिर उसके पैरों में रख देता है। वह उसे उठाता है। उसकी आंखें शून्य हैं, उसकी आंखों में जैसे कोई प्रतिबिंब नहीं दौड़ता; जैसे आकाश में कभी कोई बादल न चलता हो, ऐसा खाली।
वह उसे हिलाता है कि तूने मेरा प्रश्न सुना या नहीं? मैं तुझसे कुछ पूछता हूं, तुझ तक पहुंचा या नहीं?
शून्य आंखें शून्य ही बनी रहती हैं, बंद ओंठ बंद ही बने रहते हैं, वह दुबारा झुक कर सिर चरणों पर बोधिधर्म के रख देता है। वह उसे फिर उठाता है; वह कहता है, मुझे तू बोल!
नहीं बोलता, वह चुप है।
और बोधिधर्म कहता है, तेरे पास मैं हूं; अब मैं जाता हूं। वह वापस लौट आता है। तेरे पास मैं हूं!
रहस्य का अर्थ है, उसे कभी पाया हुआ नहीं कहा जा सकता, जाना हुआ नहीं कहा जा सकता; न जाना हुआ भी नहीं कहा जा सकता। ज्ञात नहीं, अज्ञात नहीं। इतना बड़ा है सब कि हमारा कुछ भी कहना सार्थक नहीं होता।
इसलिए लाओत्से कहता है, फिर भी, स्टिल, तुम सब हल कर लोगे, तुम सब राज खोल लोगे, तुम सब ग्रंथियां सुलझा लोगे, तुम्हारी सब बीमारियां गिर जाएंगी, फिर भी जगत का रहस्य नहीं खुल जाएगा। रहस्य और सघन हो जाएगा, जैसे अथाह जल तमोवृत्त सा!

अगला सूत्र कल बात करेंगे।