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गुरुवार, 25 सितंबर 2014

ताओ उपनिषाद (भाग--1) प्रवचन--22


लाओत्से सर्वाधिक सार्थक--वर्तमान विश्व-स्थिति में—(प्रवचन—बाईसवां)

प्रश्न-सार

लाओत्से पर बोलने के पीछे प्रेरणा क्या है?

लाओत्से ऊर्ध्वगमन के विपरीत निम्नगमन की बात क्यों करते हैं?

अहंकार भी यदि प्राकृतिक है तो उसे हटाएं क्यों?

कोई स्त्री अब तक धर्म-प्रणेता क्यों नहीं हुई?

यदि ज्ञानी स्त्रैण-चित्त हैं तो मोहम्मद और कृष्ण युद्ध में क्यों गए?

क्या साधारण आदमी भी निरहंकार को प्राप्त हो सकता है?


प्रश्न:

एक मित्र पूछते हैं: भगवान श्री, वे क्या आशाएं व दूर-दृष्टियां हैं, जिनके कारण लाओत्से की पच्चीस सौ वर्ष पुरानी धर्मशिक्षाओं को आज पुनर्जीवित करने की प्रेरणा आपको हुई है?

दूसरे मित्र ने पूछा है: पच्चीस सौ वर्ष पहले दी गई लाओत्से की प्रकृतिवादी, सहज, सरल जीवन में लागू होने वाली साधना-पद्धति का उपयोग आज के जटिल और असहज हो गए व्यक्ति के लिए किन दिशाओं में उपयोगी होगा, इस पर कृपया प्रकाश डालें।

एक और मित्र ने पूछा है कि सदा ही सभी साधकों की ऊर्ध्वगमन की अभीप्सा रही है; लेकिन लाओत्से ने साधना के लिए अधोगमन के प्रतीक जल को आदर्श कहा है। और धर्म है जीवन का ऊर्ध्व विकास। इसलिए जल के प्रतीक से होने वाले आध्यात्मिक ऊर्ध्वगमन को अधिक स्पष्ट करने की कृपा करें!

एक चौथा प्रश्न है: प्रथम दिन के प्रवचन में आपने कहा है कि मनुष्य का अहंकार एक रोग है और प्रकृति तथा संत हमारे अहंकार से घास के कुत्ते जैसा व्यवहार करते हैं। कृपया समझाएं कि अहंकार भी तो प्रकृति का ही हिस्सा है। फिर अस्तित्व तथा संत उसके साथ घास के कुत्ते जैसा, अस्तित्व से भिन्न जैसा व्यवहार क्यों करते हैं?

लाओत्से ने जो भी कहा है, वह पच्चीस सौ साल पुराना जरूर है, लेकिन एक अर्थों में इतना ही नया है, जैसे सुबह की ओस की बूंद नई होती है। नया इसलिए है कि उस पर अब तक प्रयोग नहीं हुआ। नया इसलिए है कि मनुष्य की आत्मा उस रास्ते पर एक कदम भी अभी नहीं चली। रास्ता बिलकुल अछूता और कुंवारा है।
पुराना इसलिए है कि पच्चीस सौ साल पहले लाओत्से ने उसके संबंध में खबर दी। लेकिन नया इसलिए है कि उस खबर को अब तक सुना नहीं गया है। और आज उस खबर को सुनने की सर्वाधिक जरूरत आ गई है, जितनी कि कभी भी नहीं थी। क्योंकि मनुष्य ने पुरुष-चित्त का प्रयोग करके देख लिया है। यह पच्चीस सौ वर्ष का पिछला इतिहास पुरुष-चित्त के प्रयोग का इतिहास है--तर्क का, संघर्ष का, हिंसा का, आक्रमण का, विजय की आकांक्षा का। यह पच्चीस सौ वर्ष में हमने प्रयोग करके देखा है। आदमी रोज-रोज ज्यादा से ज्यादा दुखी हुआ है। जो हम पाना चाहते थे, वह मिला नहीं; जो हमारे पास था, वह भी खो गया है। यह पुरुष-चित्त के आधार पर हमने प्रयोग करके देख लिया, और हम असफल हो गए हैं।
लाओत्से ने जब कहा था, तब पुरुष-चित्त पर इतनी बड़ी असफलता नहीं हुई थी। इसलिए लाओत्से को सुना नहीं गया। अच्छा हो कि हम ऐसा कहें कि लाओत्से अपने समय के पच्चीस सौ वर्ष पहले पैदा हो गया। यह उसकी भूल थी। उसे आज पैदा होना चाहिए था। आज उसकी बात सुनी जा सकती थी।
ऐसा समझें कि जैसे बीमारी पैदा न हुई हो और चिकित्सक पैदा हो गया हो। और उसने औषधि की बात की हो, लेकिन किसी ने ध्यान न दिया हो! क्योंकि अभी वह बीमारी ही पैदा नहीं हुई है, जिसके लिए वह औषधि बता रहा है। लेकिन पच्चीस सौ साल में हमने वह बीमारी पैदा कर ली है, जिसकी औषधि लाओत्से है। पुरुष-चित्त का प्रयोग असफल हो गया। उसने लेकर हमें पहुंचा दिया है टोटल वार पर, पूर्ण युद्ध पर। और उसके आगे कोई गति दिखाई नहीं पड़ती। उसके आगे कोई मार्ग नहीं है। या तो मनुष्य-जाति समाप्त हो और या मनुष्य-जाति किसी नए मार्ग पर चलना शुरू करे। इसलिए आज लाओत्से की बात करने की सार्थकता है। आज लाओत्से चुना जा सकता है; चुनना ही पड़ेगा। अगर आदमी को बचना है, तो स्त्रैण-चित्त की जो खूबियां हैं, उनको स्थापित किए बिना बचने का अब कोई उपाय नहीं है।
पुरुष हार चुका यह कोशिश करके कि हम सिर्फ पुरुष के आधार पर दुनिया को निर्मित कर लें। लेकिन पुरुष से ज्यादा गहरा तत्व स्त्री है; और उसे हम काट कर जीवन को निर्मित नहीं कर पाए। हमने सारी जमीन को एक पागलखाना जरूर बना लिया है; हम उसे एक परिवार नहीं बना पाए। वह स्त्री केंद्र पर न हो, तो कोई भी घर पागलखाना हो जाएगा। वह स्त्री केंद्र पर हो, तो हमारे हजार तरह के तनावों को विसर्जित करने का काम करती है। अगर संस्कृति के केंद्र पर भी स्त्री हो, तो हमारे हजार तरह के तनाव विसर्जित हो जाते हैं। स्त्रैण-चित्त को हमें संस्कृति के निर्माण में बुनियादी आधार देना पड़ेगा। और वक्त आ गया है कि हमें आने वाले तीस-चालीस वर्षों में निर्णय करना है। इसलिए मैंने लाओत्से पर बात शुरू करनी उचित समझी।
निश्चित ही, आज लाओत्से बिलकुल उलटा दिखाई पड़ता है। आदमी बहुत जटिल है, और लाओत्से सरलता की बात करता है। और आदमी बहुत अहंकारी है, और लाओत्से विनम्रता की बात करता है। और आदमी शिखर चढ़ना चाहता है चांदत्तारों के, और लाओत्से खाइयों और गङ्ढों के नियम की बात करता है। आदमी प्रथम होना चाहता है, और लाओत्से कहता है, अंतिम हुए बिना कोई और जीवन के आनंद को पाने का उपाय नहीं है। तो लग सकता है कि ऐसे उलटे युग में लाओत्से की बात कौन सुनेगा?
लेकिन मैं आपसे कहूं, जब हम एक अति पर पहुंच जाते हैं, तभी दूसरी अति पर बदलने की हमारी तैयारी शुरू होती है। जटिलता की हम अति पर पहुंच गए हैं। अब उसके आगे कोई उपाय नहीं है। और विपरीत बात हमारी समझ में आ सकती है। जैसे कोई आदमी बहुत श्रम करके थक गया हो, तभी उसे नींद की बात समझ में आ सकती है। निद्रा श्रम के बिलकुल विपरीत है।
लेकिन कोई थका ही न हो, जैसा कि अक्सर होता है। जिनके पास सुविधा है, वे दिन में श्रम करने से बच जाते हैं और फिर शिकायत करते हैं कि रात उन्हें नींद नहीं आती। सुविधा है, श्रम करने से बच जाते हैं, तो वे सोचते हैं कि उन्हें और भी गहरा विश्राम उपलब्ध होना चाहिए। लेकिन वे गलती में हैं। क्योंकि विश्राम केवल उसी को उपलब्ध होता है, जो गहरे श्रम में गया हो। गहरे श्रम में जाने के बाद ही विश्राम में जाने की सुविधा बनती है। और गहरे विश्राम में जाने के बाद ही पुनः श्रम में उतरने की शक्ति अर्जित होती है। जीवन सदा ही विपरीत तटों के बीच में बहती हुई नदी की धार जैसा है।
हमने पुरुष के किनारे पर काफी जी लिया। और अब वक्त आ गया है कि हम स्त्री के किनारे पर सरक जाएं। और उस सरकने से एक संतुलन और एक बैलेंस और एक सम्यक स्थिति निर्मित हो सकती है। यह बदलाहट का वक्त है। इसलिए मैं ऐसा नहीं देखता कि जटिल आदमी हैं, इसलिए कैसे हम लाओत्से की बात समझेंगे! मैं ऐसा देखता हूं कि चूंकि आदमी इतना जटिल हो गया है कि अब और जटिलता की बात उसकी समझ में नहीं आ सकेगी, अब विश्राम की बात ही समझ में आ सकती है।
असल में, आदमी वहां पहुंच गया है, जहां पुरुष-चित्त अपनी पूरी अभिव्यक्ति में है। अब और आगे उपाय नहीं है। तनाव पूरा हो जाए, तो विश्राम उपलब्ध हो जाता है। और आदमी दौड़ता रहे, दौड़ता रहे, और पूरी तरह दौड़ ले, तो गिर जाता है और रुक जाता है। कभी आपने सोचा कि दौड़ने की अंतिम मंजिल क्या होती है? दौड़ने की अंतिम मंजिल गिरने के सिवाय और कुछ भी नहीं होती। विपरीत आ जाता है अंत में हाथ।
लाओत्से अभी हाथ में आया जा सकता है। अपने समय में लाओत्से की बात लोगों की समझ में नहीं आई, क्योंकि लोग इतने जटिल नहीं थे कि लाओत्से उनके लिए चिकित्सक बन सकता। लोग इतने परेशान भी नहीं थे कि लाओत्से की बात उनके खयाल में आती। लोग अभी प्रथम खड़े ही नहीं हुए थे कि अंतिम खड़े होने का सूत्र समझ पाते। लेकिन हम प्रथम खड़े हो गए हैं। लोगों के पास इतना धन भी नहीं था कि निर्धनता की मौज, निर्धनता का आनंद भी उनके खयाल में आ सकता। लेकिन अब इतना धन जमीन पर इकट्ठा हुआ जा रहा है कि निर्धनता, स्वतंत्रता किसी भी दिन मालूम पड़ सकती है।
एक घटना मुझे याद आती है। कनफ्यूशियस एक गांव से गुजरता है; और देखता है, एक बूढ़ा आदमी अपने बगीचे में अपने बेटे को अपने साथ जोते हुए कुएं से पानी खींच रहा है। कनफ्यूशियस चकित हुआ। और कनफ्यूशियस ने बूढ़े आदमी के पास जाकर कहा कि क्या तुम्हें पता नहीं है कि अब लोग घोड़ों या बैलों से पानी खींचने लगे हैं! और राजधानी में तो कुछ मशीनें भी बना ली गई हैं, जिनके द्वारा पानी खींचा जाता है! उस बूढ़े आदमी ने कनफ्यूशियस को कहा कि जरा धीरे बोलो, कहीं मेरा बेटा न सुन ले। तुम थोड़ी देर से आना।
कनफ्यूशियस बहुत हैरान हुआ। जब वह थोड़ी देर बाद पहुंचा, तो उस बूढ़े ने, जो वृक्ष के नीचे लेटा था, कनफ्यूशियस से कहा कि ये बातें यहां मत लाओ। यह तो मुझे पता है कि अब घोड़े जोते जाने लगे हैं। घोड़ा जोत कर मैं बेटे का समय तो बचा दूंगा; लेकिन फिर बेटे के उस समय का मैं क्या करूंगा? और घोड़ा जोत कर मैं बेटे की शक्ति भी बचा दूंगा; लेकिन उस शक्ति का मेरे पास कोई उपयोग नहीं है। तुम अपनी मशीन और अपने घोड़े को शहर में रखो, यहां उसकी खबर मत लाओ।
लेकिन यह खबर रुक नहीं सकती थी। यह पहुंच गई। एक बाप के पास नहीं, दूसरे बाप के पास पहुंच गई होगी। और धीरे-धीरे सब जगह आदमी को हटा कर मशीन आ गई। यह जो बूढ़ा था, यह लाओत्से का अनुयायी था। लेकिन कनफ्यूशियस जीत गया। लेकिन आज फिर लाओत्से वापस जीत सकता है। क्योंकि जहां-जहां मशीन पूरी तरह आ जाएगी, वहीं-वहीं सवाल उठेगा कि आदमी समय का अब क्या करे? शक्ति का क्या करे? और जिस शक्ति और समय का हम उपयोग नहीं कर पाते, उसका हमें दुरुपयोग करना पड़ता है; क्योंकि बिना किए हम नहीं रह सकते। करना तो कुछ पड़ेगा ही। जां पाल सार्त्र ने कहा है कि चुनाव तुम कर सकते हो, लेकिन न चुनाव करने के चुनाव की कोई स्वतंत्रता नहीं है। यू कैन चूज, बट यू कैन नॉट चूज नॉट चूजिंग। चुनना तो पड़ेगा ही। करना तो कुछ पड़ेगा ही। अगर ठीक नहीं करोगे, तो गलत करना पड़ेगा। शक्ति का तो उपयोग करना ही पड़ेगा। अगर सृजनात्मक न हुआ, तो विध्वंस में हो जाएगा।
पच्चीस सौ साल तक लाओत्से की बात बीज की तरह पड़ी रही कि ठीक वक्त आए, तो उसमें अंकुर आ जाएं। वह वक्त आ गया है। अब हम लाओत्से की बात समझ सकते हैं कि इसके पहले कि तुम आदमी को मशीन दो, आदमी की शक्ति का सृजनात्मक उपयोग पहले बता दो। और इसके पहले कि तुम आदमी के हाथ में एटम बम रखो, आदमी की आत्मा इतनी बड़ी बना दो कि एटम बम उसके हाथ में रखा जा सके। अन्यथा एटम बम उसके हाथ में मत रखो। छोटे आदमी के हाथ में एटम बम खतरनाक होगा। अज्ञानी के हाथ में शक्ति खतरनाक हो जाती है। अच्छा है कि अज्ञानी अशक्त हो। तो कम से कम कोई दुरुपयोग नहीं होता है।
लाओत्से अब समझा जा सकता है, क्योंकि हम वह सारा रास्ता चल कर देख लिए, जिसके लिए लाओत्से कहता है कि अंत में सिर्फ बीमारियां पैदा होती हैं। इसलिए मैंने लाओत्से को चुना कि हम पच्चीस सौ साल पुरानी उसकी बात--लेकिन बिलकुल कुंवारी, क्योंकि उस पर कभी नहीं चला गया--उसकी फिर चर्चा चलाएं, शायद आदमी अब राजी हो जाए।
कहता हूं, शायद! क्योंकि कई बार ऐसा होता है कि हम मरने को राजी हो जाते हैं, लेकिन बदलने को नहीं। क्योंकि मरना ज्यादा आसान मालूम पड़ता है बजाए बदलने के। इसलिए कहता हूं, शायद आदमी राजी हो जाए। जरूरी नहीं है कि आदमी राजी हो ही। आदमी मरने को भी राजी हो सकता है। बदलाहट में बड़ा कष्ट होता है। और मरने को हम शहीदगी भी समझ सकते हैं कि हम शहीद हुए जा रहे हैं। और बदलाहट में अहंकार को चोट लगती है कि हमें बदलना पड़ा। आदमी एक कदम रख ले जिस दिशा में, पीछे लौटने में संकोच करता है कि लोग क्या कहेंगे!
सुना है मैंने कि एक रात मुल्ला नसरुद्दीन शराबघर से बाहर निकला--पीया हुआ, डूबा हुआ। सुनसान निर्जन रास्ता है। अंधेरी रात में सिर्फ बिजली का खंभा ही एकमात्र रास्ते पर उसका गवाह है। चला रास्ते पर सोच कर कि कहीं बिजली के खंभे से न टकरा जाऊं। बिजली के खंभे से टकरा गया। क्योंकि जो आदमी किसी चीज से टकराने से बचेगा, वह उससे जरूर टकरा जाएगा। क्योंकि बचने के लिए उसे उसी का ध्यान रखना पड़ता है। देखता रहा बिजली के खंभे को कि कहीं टकरा न जाऊं, देखता रहा कि कहीं भूल-चूक न हो जाए। जिसको देखता था, उसी तरफ चलता चला गया और खंभे से टकरा गया। टकरा तो गया, उठा; पांच कदम फिर पीछे गया। और फिर उसने वही किया कि अब दुबारा न टकरा जाऊं, तो अब उसने और भी बिजली के खंभे पर ध्यान रखा। क्योंकि तर्क सीधा यही कहता है कि अगर बचना हो, तो अब पूरा ध्यान रखो। मालूम होता है, पिछली बार थोड़ा तुमने कम ध्यान रखा। अब वह पूरे रास्ते को भूल गया। अब वह बिजली का खंभा ही बस उसकी दृष्टि में रह गया, एकदम एकाग्र कि कहीं टकरा न जाऊं! और उसके कदम फिर चले और वह फिर जाकर टकराया। सिर फूट गया, लहूलुहान हो गया।
उठा और बोला कि बड़ी मुश्किल में हूं। आंख में आंसू आ गए। फिर तीसरी बार कोशिश की। लेकिन रास्ता नहीं बदला। इतना बड़ा रास्ता था। उस पर कहीं और भी जा सकता था। वह नहीं किया। किया उसने वही जो दो बार किया था। तीसरी बार फिर किया, अब की बार और ताकत लगा कर किया। अब जब जाकर वह सिर के बल गिरा, तो सिर उसका घूम गया और एक बिजली के खंभे कई बिजली के खंभे मालूम होने लगे। अब वह और भी घबड़ाया। आखिरी समय उसने ताकत लगा कर अपने को इकट्ठा किया और भगवान के भरोसे उसने कहा, एक और कोशिश करके देखूं। फिर उसने वही किया पूरी ताकत लगा कर। और जब वह चौथी बार जाकर गिरा, तो उसने कहा, हे भगवान! निकलने का कोई रास्ता नहीं मालूम होता। ऐसा मालूम होता है कि चारों तरफ बिजली के खंभों से घेर दिया गया हूं। जहां जाता हूं, वहीं बिजली का खंभा मिल जाता है।
वह कहीं जा नहीं रहा है, वह एक ही जगह जा रहा है। और बिजली का खंभा एक ही है। और अंधा आदमी भी बिना टकराए निकल सकता है। लेकिन वह आंख वाला आदमी, लेकिन बेहोश, नहीं निकल पाता है।
हम सब आंख वाले आदमी हैं, लेकिन बेहोश। और हमारी बड़ी से बड़ी बेहोशी को लाओत्से जो नाम देता है, वह अहंकार है। वह कहता है, अहंकार हमारी बेहोशी है, क्योंकि वह हमें जगत के प्रति तथ्यात्मक नहीं होने देती। हमारे प्रोजेक्शंस को ही वह जगत पर थोप देती है। हमको नहीं देखने देती कि जगत कैसा है। हम अपने को ही जगत पर थोप लेते हैं। हम सब वही देखते रहते हैं, जो हमारा अहंकार हमें दिखलाता है। वही सोचते रहते हैं, जो सोचने के लिए मजबूर करता है। वही मान लेते हैं, जो अहंकार हमसे कहता है, मान लो। तथ्य को हम देखने नहीं जाते। और तथ्य को केवल वही देख सकता है, जिसके भीतर अहंकार का प्रोजेक्टर विदा हो गया हो।
एक मित्र ने पूछा है कि यह अहंकार भी तो प्रकृति से ही पैदा होता है, तो इसको हटाने की क्या जरूरत है?

लाओत्से नहीं कहता कि हटाओ। और लाओत्से यह भी नहीं कहता कि अहंकार प्रकृति से पैदा नहीं होता है। सब बीमारियां भी प्रकृति से ही पैदा होती हैं। जो कुछ भी पैदा होता है, प्रकृति से पैदा होता है। लाओत्से इतना ही कहता है कि अगर अहंकार की बीमारी को पकड़ोगे, तो दुख पाओगे। अगर दुख पाना हो, तो मजे से पकड़ो।
लेकिन आदमी अदभुत है। वह पकड़ता अहंकार को है और पाना चाहता है आनंद। तब लाओत्से कहता है, तुम गलत बात कर रहे हो। एक आदमी को मरना है, तो जहर पी ले। जहर भी प्रकृति से ही पैदा होता है। लेकिन वह आदमी कहे कि जहर प्रकृति से पैदा होता है, जहर तो मैं पीऊंगा, क्योंकि प्रकृति से पैदा होता है; लेकिन मरना मैं नहीं चाहता। तब फिर वह कठिनाई में पड़ेगा।
लाओत्से कहता है, मरना हो, तो मजे से जहर पी लो और मर जाओ। न मरना हो, तो फिर जहर मत पीओ। मरने की घटना भी प्राकृतिक है, जहर का पीना भी प्राकृतिक है। लेकिन निर्णय तुम्हारे हाथ में है कि तुम मरना चाहते हो कि नहीं मरना चाहते।
अहंकार प्राकृतिक है। लेकिन उसकी पीड़ा, उसके नर्क को भोगना हो, तो आदमी भोग सकता है। न भोगना हो, न भोगे। आदमी के हाथ में है कि वह अहंकार के प्राकृतिक बीज को वृक्ष बनाए या न बनाए। लाओत्से नहीं कहता कि अहंकार को हटा दो। वह आपसे कहता है कि अगर दुख न चाहते हो, तो अहंकार से हटना होगा। अगर दुख चाहते हैं, तो अहंकार को और बढ़ाओ। हम उलटे हैं। हम चाहते वह हैं जो अहंकार से नहीं मिलेगा और अहंकार को भी नहीं हटाना चाहते हैं। इस दुविधा में हमारे प्राण संतापग्रस्त हो जाते हैं।

एक दूसरे मित्र ने पूछा है कि सदा ही साधकों ने ऊर्ध्वगमन की बात कही है, ऊपर जाने की। और लाओत्से नीचे जाने की बात करता है!

लाओत्से नीचे जाने की बात इसीलिए करता है कि नीचे जाए बिना कोई ऊपर नहीं जाता। जिन्होंने ऊपर जाने की बात कही है, उन्होंने लक्ष्य की बात कही है, साध्य की। और लाओत्से नीचे जाने की बात करके साधन की बात कर रहा है। ऊपर जाना हो, तो नीचे जाना पड़ेगा। यह उलटा दिखता है। नीत्से ने लिखा है कहीं कि जिस वृक्ष को बहुत ऊपर जाना हो, उसको अपनी जड? नीचे जमीन में गहरे पहुंचानी पड़ती हैं। जिस वृक्ष को आकाश में जितना ऊंचा उठना हो, उसे पाताल की तरफ अपनी जड़ों को उतना ही गहरा पहुंचाना पड़ता है।
अब वृक्ष से हम दो बातें कह सकते हैं। हम कह सकते हैं कि तुझे ऊपर जाना है, तो जड़ों को नीचे फैला! हम उसे यह भी कह सकते हैं कि तू जड़ों को नीचे फैला, ऊपर जाने की घटना घट जाएगी। लेकिन अगर कोई वृक्ष ऊपर ही जाने की कोशिश में लग जाए और नीचे जाने की कोशिश बंद कर दे, जड़ों को नीचे जाने की कोशिश बंद कर दे, तो ऊपर तो जा ही नहीं पाएगा। कोई उपाय नहीं ऊपर जाने का।
लाओत्से कहता है, ऊपर जाना हो, तो नीचे जाने की व्यवस्था तुम्हें करनी पड़ेगी। ऊपर को तुम भूल ही जाओ। वह प्रकृति के ऊपर छोड़ दो। तुम सिर्फ अपनी जड़ों को नीचे पहुंचा दो। प्रकृति तुम्हारे फूलों को आकाश में खिला देगी। उसकी तुम्हें चिंता भी करने की जरूरत नहीं; क्योंकि उतनी चिंता करने से भी तुम्हारी जड़ें कमजोर रह जाएंगी। तुम अपनी सारी चिंता ही जड़ों पर लगा दो; फूल अपने आप खिल जाएंगे। जहां जड़ें होती हैं, वहां फूल खिल ही जाते हैं। जड़ें जितनी मजबूत हों, उतने ही बड़े फूल खिल जाते हैं।
लाओत्से कहता है, अंतिम जगह खोज लो, जैसे पानी अंतिम जगह खोज लेता है। और तुम्हारे शिखर तुम्हारे पास चले आएंगे। तुम झील बन जाओ, और तुम गौरीशंकर बने हुए पाओगे अपने को। तुम गौरीशंकर होने की फिक्र ही छोड़ दो। क्योंकि लाओत्से कहता है, नियम ऐसा है, जो ऊपर पहुंचना चाहता है, वह नीचे पहुंचा दिया जाता है; और जो नीचे पहुंचने को राजी हो जाता है, उसकी ऊंचाई के लिए कोई प्रतिस्पर्धा नहीं होती।
नियम उसका समझ लें। कठिनाई क्या है कि कुछ नियम जो विपरीत होते हैं, हमारी समझ में नहीं आते। क्योंकि हम स्ट्रेट लॉजिक में भरोसा करते रहे हैं। वही पुरुष का चित्त है। सीधे तर्क में हमारा भरोसा है। हमें पता नहीं कि जिंदगी सीधे तर्क नहीं मानती। जिंदगी उलटे तर्क मानती है। हमारा भरोसा सीधे तर्क में है। हम ऐसे चलते हैं, जैसे कोई आदमी एक हाई-वे पर चलता है। सीधा रास्ता है। लेकिन जिंदगी पर कोई हाई-वे नहीं होते। जिंदगी पहाड़ पर चढ़ने वाले रास्तों जैसी है। सब गोल घुमावदार रास्ते होते हैं। अभी मैं जिस रास्ते पर खड़ा हूं पहाड़ के, ऐसा लगता है कि अगर इस पर सीधा चला जाऊं, तो चांद पर पहुंच जाऊंगा। चांद सामने दिखाई पड़ रहा है। लेकिन दो घड़ी बाद पता चलता है, रास्ता घूम गया और चांद की तरफ पीठ हो गई। जिंदगी गोल रास्ते हैं, घुमावदार रास्ते हैं। उसमें कोई चीज सीधी नहीं है। और हम सब सीधे होते हैं।
जैसे उदाहरण के लिए, अगर कोई आपसे कहे कि मैं सुबह घूमने जाता हूं और मुझे बहुत आनंद मिलता है, तो आप कहें, आनंद तो मैं भी चाहता हूं, तो मैं भी कल सुबह से घूमने जाऊंगा
अगर आप आनंद पाने ही घूमने गए, तो आप सिर्फ थक कर वापस लौटेंगे, आनंद आपको मिलेगा ही नहीं। क्योंकि पूरे वक्त, एक-एक कदम चल कर आप नजर रखेंगे कि अभी तक आनंद मिला नहीं! अभी तक मिला नहीं! पता नहीं कब मिलेगा? दो मील हो गए चलते हुए, अब तक आनंद मिला नहीं! आपका ध्यान आनंद मिलने पर रहेगा, चलने पर नहीं। चलना तो जबरदस्ती रहेगा। जल्दी आनंद मिल जाए, तो घर वापस लौट जाएं। चलना तो एक मजबूरी रहेगी। अगर आनंद घर ही बैठे मिलता, तो आप न चले होते। चले हैं आप इसलिए कि किसी ने कहा कि आनंद चलने से मिलेगा। आप लौट कर कहेंगे कि गलत बात कही है। आनंद चलने से मुझे जरा भी नहीं मिला। चार मील भटक कर आ गया हूं, आनंद की कोई खबर नहीं है।
लेकिन जिसने खबर दी है, गलत खबर नहीं दी। चलने से आनंद मिल सकता है; लेकिन उसको ही, जिसे आनंद की फिक्र ही न हो। चलने का ही जिसे ध्यान हो, आनंद की फिक्र ही न हो। आनंद बाइ-प्रॉडक्ट है। जब कोई चलने में इतना तल्लीन हो जाता है कि चलने वाला मिट जाता है और चलने की क्रिया ही रह जाती है, तब आनंद का फूल खिलता है।
जीवन घुमावदार है। अगर आप सोचते हैं कि किसी को प्रेम करने से आनंद मिलेगा, तो आपको कभी न मिल सकेगा। यद्यपि प्रेम करने से आनंद मिलता है। लेकिन वह उसे ही मिलता है जो प्रेम में डूब जाता है और आनंद की जिसे चिंता ही नहीं है। जिसे आनंद की चिंता है, वह प्रेम तो करता है, लेकिन ध्यान आनंद पर रखता है। पाता है कि प्रेयसी का हाथ भी हाथ में ले लिया, अब तक आनंद मिला नहीं। वह कहीं नहीं मिलने वाला है। फिर भी जो कहते हैं कि प्रेम से आनंद मिलता है, वे ठीक ही कहते हैं। असल में, प्रेम और आनंद में संबंध ऐसा नहीं है, जैसे हम पानी को गर्म करते हैं और वह भाप हो जाता है। कॉजल लिंक नहीं है। पानी को गर्म करिएगा, तो पानी भाप बनेगा ही। जीवन में जितने गहरे उतरिएगा, उतनी ही कॉजेलिटी, कार्य-कारण कम हो जाते हैं और उतने ही ज्यादा सहज परिणाम सघन हो जाते हैं। जीवन की जितनी गहरी बातें हैं, वे सब सहज परिणाम हैं।
आप कहीं संगीत सुनने गए हैं। अब आप बैठे हैं बिलकुल रीढ़ को उठा कर, आसन साधे हुए कि आनंद मिलना चाहिए। आप सिर्फ थक जाएंगे, कोई आनंद नहीं मिलेगा।
विश्राम को उपलब्ध हो जाइए, आंख बंद कर लीजिए, आनंद की बात ही छोड़ दीजिए, संगीत में डूबिए। अगर आप संगीत में इतने डूब गए कि आपको आनंद का भी खयाल न रहा, आप आनंद से भरे हुए घर लौट जाएंगे। यह आनंद का जो फूल है, आपके तनाव में नहीं खिलता, आपके विश्राम में खिलता है। और जो लोग भी साध्य के प्रति बहुत उत्सुक होते हैं, वे कभी विश्राम को उपलब्ध नहीं होते।
इसलिए लाओत्से कहता है, ऊपर की तुम फिक्र छोड़ो, तुम पानी की तरह हो जाओ। तुम नीचे बह जाओ, तुम गङ्ढों में भर जाओ। शिखर तो उपलब्ध हो ही जाते हैं। वह उनकी बात ही नहीं करता। वे हो ही जाते हैं, उनकी चर्चा की भी जरूरत नहीं है।
लेकिन हम उलटे लोग हैं। अगर हम लाओत्से की बात भी सुनेंगे, तो भी हम इसीलिए सुनेंगे कि लाओत्से कहता है कि पहुंच जाओगे ऊपर, अगर नीचे गए। तो हम भरोसा कर लेना चाहते हैं कि पक्का है यह गणित कि हम नीचे चले जाएं और ऊपर न पहुंचें! तो उलटे और नीचे चले गए और ऊपर पहुंचने से वंचित हुए। पक्का है कि नीचे जाएंगे, तो ऊपर पहुंचेंगे! हम बिलकुल पक्का करके जाते हैं।
हम नीचे तो पहुंच जाएंगे, ऊपर हम नहीं पहुंचेंगे। क्योंकि वह ऊपर पहुंचना जो था, वह पक्का करके जाने वालों के हाथ की बात नहीं है। उसके लिए कोई गारंटी नहीं है। और जहां गारंटी है, वहां वह नहीं होगा। वह घटना ही नहीं घटेगी। इस जीवन के विपरीत तर्क को समझ लेने की जरूरत है।
मेरे पास लोग आते हैं, वे कहते हैं, शांति चाहिए। मैं उनसे कहता हूं, शांति को भूल जाओ, तुम सिर्फ ध्यान करो। वे कहते हैं कि ध्यान करेंगे, तो शांति मिल जाएगी? मैं उनसे कह रहा हूं, शांति को तुम भूल जाओ, तुम सिर्फ ध्यान करो। वे कहते हैं कि अगर ध्यान करेंगे, तो शांति मिल जाएगी? मैं उनसे कहता हूं, तुम शांति को छोड़ो। क्योंकि तुम इतने दिन से शांति पाने की कोशिश कर रहे हो, नहीं मिली। अब तुम इसको छोड़ दो, अब तुम ध्यान करो। वे कहते हैं, क्या शांति का खयाल छोड़ देने से शांति मिल जाएगी? वह बात वहीं अटकी रहती है।
सुना है मैंने कि मुल्ला नसरुद्दीन जब सौ वर्ष का हुआ, तो अचानक गांव के लोगों ने देखा कि वह इतना संतुष्ट, इतना आनंदित, इतना कंटेंटेड हो गया है कि लोग चकित हुए। क्योंकि उससे ज्यादा डिसकंटेंटेड आदमी खोजना मुश्किल था। बहुत असंतुष्ट आदमी था। हर चीज से परेशान आदमी था। हर चीज की शिकायत थी। एकदम आनंदित हो गया है।
तो गांव के लोग इकट्ठे हो गए। और सारे गांव के लोगों ने कहा कि नसरुद्दीन, चमत्कार है! तुम और शांत हो गए! हम कभी सोच ही नहीं सकते थे। यह चमत्कार हो गया। इसका राज क्या है?
नसरुद्दीन ने कहा कि मैंने निन्यानबे साल गंवाए शांत होने की कोशिश में। आज मैंने तय किया कि अब अशांति के साथ ही जी लेंगे। इतना ही राज है। आज मैंने तय कर लिया कि अब शांति नहीं चाहिए, अब अशांति के साथ ही जी लेंगे। हो गया बहुत। निन्यानबे साल कोशिश कर ली। शांति नहीं मिली। अब हम छोड़ते हैं। और सच, मैं एकदम शांत हो गया हूं।
क्योंकि जो अशांति के साथ जीने को राजी है, उसकी शांति में क्या कमी रह जाएगी? जो दुख के साथ जीने को राजी है, उसके सुख को कौन छीन सकता है? और जो नीचे उतर कर आखिरी गङ्ढे में पड़े रहने को तैयार है, उसके शिखर के छीनने का किसी के हाथ में कोई शक्ति नहीं है। जो ना-कुछ होने को तैयार है, वह सब कुछ हो जाएगा। और जो मिटने को राजी है, परमात्मा की संपदा, सारी संपदा उसकी है।
तो लाओत्से इस सूत्र की बात कर रहा है। उसका यह मतलब नहीं है कि लाओत्से कहता है, अधोगामी हो जाओ। लाओत्से यह कहता है, ऊर्ध्वगामी होने का एक ही उपाय है कि तुम अंतिम खड़े होने को तैयार हो जाओ।

एक मित्र ने पूछा है कि लाओत्से स्त्रैण-चित्त की इतनी गहराई की बात करता है, लेकिन स्त्रैण-चित्त से अब तक एक तीर्थंकर, एक अवतार, एक पैगंबर, कोई एक जीसस, कोई बुद्ध, कोई महावीर, कोई कृष्ण पैदा नहीं हुआ। होना तो उलटा ही चाहिए था। अगर स्त्रैण-चित्त की ऐसी गरिमा है, तो इस जगत के सारे धर्म स्त्रैण-चित्त से निकलने चाहिए थे। लेकिन सभी धर्म पुरुषों से निकले हैं। ऐसा क्यों है? उन्होंने पूछा है।

ह जरूर समझ लेने जैसी बात है। ऐसा होने का कारण है। जैसा मैंने आपसे कहा है, बायोलॉजिकल स्त्री और पुरुष का जो संबंध है, जगत में जो चीज भी पैदा होती है, उसमें भी स्त्री-पुरुष का वैसा ही संबंध है। जब बच्चा पैदा होता है, तो पुरुष सिर्फ एक्सीडेंटल, सांयोगिक काम करता है। क्षण भर का उसका सहयोग है बच्चे को पैदा करने में। लेकिन शुरुआत वही करता है, इनीशिएट वही करता है, प्रारंभ वही करता है। क्षण भर का उसका काम है, लेकिन बच्चे के जन्म की यात्रा उसी से शुरू होती है। शेष सारा काम मां करती है। उस बच्चे को नौ महीने पेट में रखेगी, उसे खून देगी, उसे जीवन देगी, उसे श्वास देगी। फिर नौ महीने पर भी समाप्त नहीं हो जाता सब कुछ। फिर उसे बड़ा करेगी, पालेगी-पोसेगी, वह सब करेगी।
इस जगत में और चीजें भी जो पैदा होती हैं, वे भी ऐसे ही पैदा होती हैं। आप चकित होंगे जान कर कि महावीर जरूर धर्म को जन्म देते हैं, जीसस धर्म को जन्म देते हैं, बुद्ध...। लेकिन इस जगत में कोई भी धर्म बिना स्त्रियों के बचता नहीं। स्त्रियां ही उसे बचाती हैं, बड़ा करती हैं और फैलाती हैं। यह आपके खयाल में नहीं होगा; यह आपके खयाल में नहीं होगा। जाकर मंदिर में, मस्जिद में, चर्च में झांक कर देखें। वहां कौन है? वहां पुरुष नदारद हैं। और अगर कोई पुरुष पहुंच भी गया है, तो सिर्फ अपनी पत्नी के भय की वजह से वहां हाजिर है। ये सारे मंदिर, सारे चर्च, सारे गिरजे स्त्रियां चला रही हैं।
धर्म को जन्म तो पुरुष दे जाता है, लेकिन उसकी देख-भाल, उसकी सम्हाल, उसको गर्भ में रखना और सम्हालना, और उसको बड़ा करना, स्त्रियां करती हैं। मनसविद कहते हैं कि दुनिया में कोई भी धर्म बच नहीं सकता, जिस धर्म में स्त्रियां दीक्षित न हों। वह धर्म बच नहीं सकता, क्योंकि उस धर्म को गर्भ नहीं मिलेगा।
क्या आपको पता है कि महावीर ने जब लोगों को दीक्षा दी, तो हर एक पुरुष के मुकाबले चार स्त्रियों ने दीक्षा ली? और महावीर के भिक्षुओं में, संन्यासियों में, साधुओं में, तेरह हजार पुरुष थे, तो चालीस हजार स्त्रियां थीं। जीसस को पुरुषों ने सूली लगाई; लेकिन जिसने सूली से नीचे उतारा था, वह एक वेश्या थी। जब जीसस के सारे शिष्य, पुरुष शिष्य भाग गए थे भीड़ में, तब भी तीन स्त्रियां उनकी लाश के पास खड़ी थीं। अंतिम सांस जीसस ने स्त्रियों के बीच छोड़ी। और जिन्होंने उन्हें सूली से उतारा, वे स्त्रियां थीं। और जब पुरुष भाग गए थे, तब भी स्त्रियां वहां तैयार थीं। खतरा था उनकी भी मौत का।
जन्म तो सब पुरुषों ने दिया; क्योंकि बायोलॉजिकल जो है, वही साइकोलॉजिकल भी है। सब धर्मों को जन्म पुरुषों ने दिया है, लेकिन सब धर्मों को गर्भ स्त्रियों ने दिया है। यह अगर खयाल में आ जाएगा, तो यह शिकायत आपके मन में नहीं उठेगी। और आज भी अगर जमीन पर धर्म जिंदा हैं, तो वह पुरुषों की वजह से नहीं। जन्म भला वे देते हों, लेकिन उनको जिंदा रखने के लिए स्त्रियों के सिवाय कोई उपाय नहीं है। किसी भी चीज को जन्म पुरुष देने की पहल कर सकता है, लेकिन उसको गर्भ नहीं दे सकता। और जन्म देने ही से किसी चीज को जन्म नहीं मिलता, गर्भ देने से ही वस्तुतः जन्म मिलता है। क्योंकि हाड़-मांस, खून-मांस-मज्जा, वह स्त्रियां देती हैं। इसलिए खयाल में नहीं आता। इसलिए खयाल में नहीं आता। सुरक्षा, विस्तार, संरक्षण, स्त्रैण-चित्त का हिस्सा है। पहल, प्रारंभ, पुरुष-चित्त का हिस्सा है। लेकिन पुरुष पहल करने के बाद ऊब जाता है, दूसरे काम में लग जाता है।
अगर महावीर को फिर से जन्म मिले, तो एक बात पक्की है कि वे जैन धर्म की बात अब नहीं करेंगे। वे किसी दूसरे धर्म को जन्म दे देंगे। पुरुष रोज नए को जन्म देने के लिए उत्सुक होता है। स्त्री पुराने को सम्हालने के लिए आतुर होती है। एक अर्थ में प्रकृति इन दोनों से जीवन को स्थिर करती है। क्योंकि सिर्फ नए को जन्म देना काफी नहीं है, पुराने को सम्हालना भी उतना ही जरूरी है। अन्यथा जन्म देने का कोई अर्थ ही न रह जाएगा।
इसलिए पुरुष अगर ठीक पुरुष-चित्त का हो, तो सदा ही प्रगतिशील होता है। पुरुष अगर ठीक पुरुष-चित्त का हो, तो सदा ही प्रगतिशील होता है। स्त्री अगर ठीक स्त्री-चित्त की हो, तो सदा ही परंपरावादी होती है। परंपरा का इतना ही अर्थ है: जिसको जन्म दिया जा चुका है, उसको सम्हालना है। और प्रगतिशीलता का इतना ही अर्थ है कि जिसको जन्म नहीं दिया गया है, उसे जन्म देना है। लेकिन जन्म देकर क्या करोगे, अगर कोई सम्हालने वाला उपलब्ध न हो! तो गर्भपात ही होंगे, और कुछ न होगा। एबॉर्शन्स हो जाएंगे। अगर पुरुष के ही हाथ में कोई चीज हो, तो एबॉर्शन ही होगा, और कुछ नहीं हो सकता। उसकी उत्सुकता उतनी ही देर तक है, जब तक उसने जन्म की प्रक्रिया को जारी नहीं कर दिया। प्रक्रिया जारी हो गई, वह दूसरे जन्म की प्रक्रिया पर हट जाता है। लेकिन वहीं से जीवन की असली बात शुरू होती है। वहां से स्त्री उसे सम्हाल लेती है।
पुरुष-चित्त और स्त्री-चित्त दोनों एक ही गाड़ी के दो पहिए हैं। इसलिए स्त्रियों ने कोई धर्म को जन्म नहीं दिया; लेकिन स्त्रियों ने ही सारे धर्मों को बचा कर रखा है।

एक मित्र ने पूछा है कि क्या जितने भी ज्ञानी हैं, उनका चित्त स्त्रैण हो जाएगा?

हो ही जाएगा। लेकिन स्त्रैण से मतलब नहीं है यह कि वे स्त्रियां हो जाएंगे। स्त्रैण से मतलब यह है कि उनका चित्त एग्रेसिव की जगह रिसेप्टिव हो जाएगा, आक्रामक की जगह ग्राहक हो जाएगा। यह ग्राहकता ही जब होती है पैदा, तभी कोई व्यक्ति परमात्मा के लिए अपने भीतर द्वार खोल पाता है।

उन्होंने पूछा है, इसका अर्थ यह हुआ कि मोहम्मद तो ज्ञान के बाद भी तलवार लेकर लड़ने जाते हैं?

निश्चित ही जाते हैं। लेकिन मोहम्मद की तलवार पर आपको पता है, क्या लिखा है? मोहम्मद की तलवार पर लिखा है: शांति के अतिरिक्त यह तलवार और कहीं नहीं उठेगी। तलवार पर खुदा है यह। आपको पता है, इसलाम शब्द का अर्थ ही होता है शांति! अगर मोहम्मद को तलवार भी उठानी पड़ती है, तो मोहम्मद के कारण नहीं, आस-पास की परिस्थितियों के कारण। लेकिन मोहम्मद जिन पर तलवार उठाते हैं, उन पर भी क्रोध और आक्रमण और हिंसा नहीं है। उन पर भी दया है।
मोहम्मद को बहुत कम समझा जा सका है। इस जगत में जिन लोगों के साथ बहुत अनाचार हुआ है, उनमें एक मोहम्मद हैं। और उनकी तलवार की वजह से बहुत अनाचार हो गया। लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि मोहम्मद की तलवार ठीक सर्जिकल है, ठीक सर्जन के हाथ में जैसे तलवार हो, ऐसी है! और कभी ऐसी जरूरत निश्चित हो जाती है कि किसी ऐसे व्यक्ति को भी तलवार उठानी पड़ती है, जिसके हाथ में तलवार की हम कल्पना भी नहीं कर सकते। मोहम्मद के हाथ में तलवार की कोई कल्पना करने की जरूरत नहीं है। मोहम्मद के पास जो हृदय है, वह अत्यंत कोमल से कोमल हृदय है। लेकिन मोहम्मद के चारों तरफ जो स्थिति है, अगर इस कोमल हृदय को कुछ भी काम करना है, तो इसे हाथ में तलवार लेनी पड़ेगी।
लेकिन इसका दुष्परिणाम होता है। वह मोहम्मद के हाथ में तलवार लेने से नहीं होता, वह पीछे होता है; क्योंकि तब बहुत से ऐसे लोग मोहम्मद के पीछे खड़े हो जाते हैं, जिनका मजा केवल तलवार हाथ में लेने का है। वे उपद्रव खड़ा करते हैं। उन्होंने मोहम्मद को बदनाम किया। उन्होंने इसलाम को भी विकृत किया।
मोहम्मद तलवार लेते हैं, क्योंकि जरूरत है। कृष्ण युद्ध की सहायता में खड़े हो जाते हैं, युद्ध करवाते हैं; क्योंकि उसकी जरूरत है। असल में, इस जगत में चुनाव जो है, वह एक बात समझ लेंगे, तो खयाल में आ जाएगा। हम जगत में सब चीजों को दो में तोड़ देते हैं: अंधेरी और सफेद, व्हाइट एंड ब्लैक। जब कि वस्तुतः जगत में कोई चीज व्हाइट और ब्लैक नहीं होती, सभी चीजें ग्रे होती हैं; डिग्रीज होती हैं, डिग्रीज ऑफ ग्रे। थोड़ी ज्यादा सफेद और थोड़ी कम सफेद, थोड़ी ज्यादा काली और थोड़ी ज्यादा काली। जब भी हम कहते हैं कि यह ठीक और यह गलत, तो हम भूल जाते हैं कि हम जिंदगी की बात नहीं कर रहे हैं।
मोहम्मद तलवार उठाते हैं इसलिए कि उनका न उठाना और भी बुरा होगा। इसको ठीक से समझ लें। लेसर ईविल यही है कि मोहम्मद तलवार उठा लें। क्योंकि तलवार तो उठेगी ही। और मोहम्मद नहीं उठाएंगे, तो जिसके हाथ में भी तलवार उठेगी, वह ग्रेटर ईविल होगा। मोहम्मद जिस स्थिति में हैं, उसमें उन्हें प्रतीत होता है कि उन्हें ही तलवार उठा लेना उचित होगा।
कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि तू लड़! इसलिए नहीं कि कृष्ण की लड़ने में कोई उत्सुकता है। कृष्ण से ज्यादा स्त्रैण-चित्त का आदमी खोजना तो बहुत मुश्किल होगा। इसलिए हमने तो उनका चित्र भी बिलकुल स्त्रियों जैसा बनाया है। इतना स्त्रैण चित्र हमने किसी का नहीं बनाया। कृष्ण को जितना हमने स्त्री जैसा चित्रित किया है, वैसा हमने बुद्ध-महावीर को भी नहीं किया, लाओत्से को भी नहीं किया। कृष्ण को तो हमने बिलकुल स्त्रैण बनाया है। सब साज-संवार उनका स्त्रियों जैसा है। कपड़े-लत्ते स्त्रियों जैसे हैं। सारा ढंग उनका स्त्रियों जैसा है। उनका नाच, उनका गीत, सब स्त्रियों जैसा है। यह आदमी, जो इतना स्त्रैण हमने चित्रित किया है, यह अर्जुन को, जो कि बहुत बहादुर पुरुष था, भाग रहा था, उसको लड़वाने के लिए प्रेरणा देने वाला बना। आखिर कृष्ण को इतनी-इतनी-इतनी आग्रह करने की क्या जरूरत है कि अर्जुन लड़े?
जरूरत इसलिए है कि कृष्ण को एक बात साफ है: अर्जुन नहीं लड़ता है, तो भी जो बुराई है, वह होकर रहेगी; लेकिन बहुत बुरे हाथों से होकर रहेगी। अर्जुन उन सबसे बेहतर है। और अर्जुन युद्ध से भागना चाहता है, इस वजह से कृष्ण को और भी स्पष्ट हो गया कि यह आदमी बेहतर है और युद्ध इसी के द्वारा करवा लेना ठीक होगा। युद्ध तो होकर रहेगा। युद्धखोर करेंगे। कभी-कभी मैं सोचता हूं कि अगर अर्जुन की जगह भीम के रथ पर कृष्ण बैठे होते, तो शायद गीता पैदा न होती। क्योंकि भीम इतना आतुर होता कि जल्दी बढ़ाओ, आगे ले चलो। हो सकता है, कृष्ण खुद ही कहते कि क्षमा कर, यह युद्ध ठीक नहीं है। यह अर्जुन इसमें कारगर है, अर्जुन भागने की कहने लगा। उसने सिद्ध कर दी एक बात तो कि वह आदमी भला है, एकदम भला है। कृष्ण को पक्का हो गया कि इस भले आदमी के हाथ में तलवार दी जा सकती है।
असल जो सारी-सारी बात है, वह यह है कि तलवार भले आदमी के हाथ में ही दी जा सकती है। और तलवार अक्सर बुरे आदमी के हाथ में होती है। और भला आदमी तलवार छोड़ देता है और बुरा आदमी तलवार उठा लेता है। इसलिए भला आदमी बुराई को करवाने का कारण बन जाता है। जगत में जब चुनाव करना पड़ता है, तो विकल्प ऐसा नहीं होता कि यह अच्छा है और यह बुरा है। विकल्प ऐसा होता है कि यह कम बुरा है, यह ज्यादा बुरा है। जीवन में सब चुनाव ऐसे ही हैं। यहां ऐसा नहीं है कि यह अमृत है और यह जहर है। यहां ऐसा है कि यह कम जहर है और यह ज्यादा जहर है। कम जहर को चुनना पड़ता है। यही अमृत का चुनाव है।
मोहम्मद और कृष्ण उस कम जहर को चुनते हैं। परिस्थितियां उनकी भिन्न हैं।
थोड़ा सोचें कि कृष्ण मर गए होते पहले ही इस महाभारत के युद्ध के, तो हमारी कल्पना में कभी खयाल ही न आता कि कृष्ण भी युद्ध करवा सकते हैं। आता? कभी खयाल न आता। जरा और इस तरह सोचें कि बुद्ध और जीए होते बीस वर्ष और महाभारत जैसी स्थिति आ गई होती, तो हमारी कल्पना में भी नहीं आता कि बुद्ध भी युद्ध के लिए हां कह सकते थे। हमारे देखने के पर्सपेक्टिव सीमित होते हैं। जो हो गया, वही हम देखते हैं। जो हो सकता था, वह हम नहीं देखते हैं। अगर कृष्ण मर जाते दस साल पहले महाभारत के, तो हमें कभी भी खयाल न आता कि यह आदमी, जो बांसुरी बजाता था, जो प्रेम के गीत गाता था, जो इतना माधुर्य से भरा था, यह युद्ध के लिए गीता जैसा संदेश दे सकता है!
मेरी दृष्टि में गीता से ज्यादा युद्ध के लिए प्रेरणा देने वाली और कोई धर्म-पुस्तक जगत में नहीं है।
लेकिन इसका कारण यह नहीं है कि ये पुरुष-चित्त हैं। इसका कारण, इसका कारण यह है कि चित्त तो बिलकुल स्त्रैण हैं, बहुत रिसेप्टिव हैं, बहुत ग्राहक हैं, लेकिन जिस स्थिति में ये खड़े हैं, उस स्थिति में इनका ग्रहणशील चित्त परमात्मा को पूरी तरह ग्रहण करके जो कहता है, उसी को करने में ये संलग्न हो जाते हैं।
यह मोहम्मद की तलवार परमात्मा के लिए उठी तलवार है। एग्रेसिव मोहम्मद बिलकुल नहीं हैं, आक्रामक बिलकुल नहीं हैं। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि मोहम्मद के पीछे आक्रामक लोग इकट्ठे नहीं हुए। लेकिन पीछे इकट्ठे होने वालों की जिम्मेवारी मोहम्मद पर नहीं जाती, किसी पर भी नहीं जाती।
महावीर जितना साहस का आदमी खोजना मुश्किल है। लेकिन कोई सोच भी नहीं सकता था कि महावीर के पीछे कमजोर और कायर इकट्ठे हो जाएंगे। वे इकट्ठे हुए। क्योंकि उनको आड़ मिल गई। जीवन बड़ा अजीब है। महावीर ने अहिंसा की बात की और महावीर ने कहा, अहिंसा को वही उपलब्ध हो सकता है, जिसके चित्त में भय बिलकुल नहीं रहा। लेकिन भयभीत आदमी ने सोचा कि अहिंसा अच्छा धर्म है, इसमें कोई किसी को मारता-पीटता नहीं। न हम किसी को मारेंगे, न कोई हमें मारेगा। वह जो भयभीत आदमी था, उसको अहिंसा परम धर्म मालूम पड़ा। इसलिए नहीं कि अहिंसा परम धर्म था, बल्कि इसलिए कि उसके भय को लगा कि अगर सारी दुनिया अहिंसा मान ले, तो बड़ी निर्भयता से रहने का मजा आ जाए। तो जितने भयभीत आदमी थे, वे महावीर के पीछे इकट्ठे हो गए।
इसलिए यह आकस्मिक नहीं है कि महावीर के पीछे जो वर्ग इकट्ठा हुआ, वह एकदम इंपोटेंट, एकदम नपुंसक है। उसने जिंदगी में सब तरफ से अपने को सिकोड़ लिया। वह सिर्फ केवल बनिए के धंधे को पकड़ कर जी रहा है पच्चीस सौ साल से। क्या कारण है? उसको कोई धंधा नहीं समझ में आया; क्योंकि सब धंधे में खतरा लगा। सिर्फ एक धंधा उसको लगा कि यह ठीक है। इसमें ज्यादा झंझट नहीं, झगड़ा नहीं। और न कुछ पैदा करता है, न कहीं जाता है। बीच के मध्यस्थ का काम करता है, दलाल का काम कर रहा है। कोई सोच ही नहीं सकता कि महावीर जैसे हिम्मतवर आदमी के पीछे इतने गैर-हिम्मतवर लोग इकट्ठे होंगे, जो कुछ न कर सकें सिवाय दलाली के। दलाली भी कोई धंधा है? दलाली से भी कोई इनर पोटेंशियल, जो भीतर छिपी हुई शक्तियां हैं, वे जग सकती हैं? लेकिन यह सब से ज्यादा सुविधापूर्ण मालूम पड़ा भयभीत आदमी को। अजीब बात है, महावीर के पीछे कायर लोग इकट्ठे हो गए।
मोहम्मद अत्यंत दयालु व्यक्ति हैं। और दया के कारण ही तलवार उठाई। अगर दया थोड़ी भी कम होती, तो यह आदमी तलवार नहीं उठाता। लेकिन उनके पीछे खूंखार और जंगली आदमी इकट्ठे हो गए। क्योंकि तलवार दिखी, उन्होंने कहा, बड़े मजे की बात है, धर्म और तलवार दोनों का जोड़ हो गया, सोने में सुगंध आ गई। अब हमसे कोई यह भी नहीं कह सकता कि तुम मार रहे हो। अब हम धर्म के नाम पर मारेंगे और काटेंगे। तो मध्य एशिया की जितनी बर्बर कौमें थीं, तातार थे, हूण थे, तुर्क थे, वे सब इसलाम में सम्मिलित हो गए। क्योंकि तलवार को पहली दफा अपराधी के जगह से हटा कर मंदिर का रुतबा मिला। वे सब पीछे खड़े हो गए तलवार लेकर। उन्होंने सारी दुनिया रौंद डाली। आज जो दुनिया में इसलाम का इतना प्रभाव है, यह मोहम्मद की वजह से नहीं है; यह जो इतनी संख्या है, मोहम्मद की वजह से नहीं है। यह इन दुष्टों की वजह से है, जो पीछे इकट्ठे हो गए। इन्होंने रौंद डाली सारी दुनिया। लेकिन इसलाम मार डाला इन्होंने। शांति का धर्म सबसे ज्यादा अशांति का धर्म बन गया।
लेकिन मोहम्मद जिम्मेवार नहीं हैं। मोहम्मद क्या कर सकते हैं? महावीर क्या कर सकते हैं? महावीर सोच ही नहीं सकते कि मेरे पीछे वणिकों की एक कतार खड़ी हो जाएगी। कल्पना भी नहीं कर सकते। लेकिन जीवन के तर्क बड़े अजीब हैं, बहुत अजीब हैं। कुछ कहा नहीं जा सकता। और एक तर्क, जो कि लाओत्से को समझने में भी उपयोगी होगा, वह यह है कि अक्सर आप विरोधी आदमी से प्रभावित होते हैं, दि अपोजिट। जैसा सेक्स में होता है, वैसा ही सब चीजों में होता है। आप अपने से विपरीत आदमी से प्रभावित होते हैं। यह बड़ी खतरनाक बात है; लेकिन यह होता है। महावीर बहादुर से बहादुर हैं; इसीलिए उनको महावीर नाम मिला। यह उनका नाम तो नहीं है। नाम तो उनका वर्द्धमान है। महावीर का नाम दिया, क्योंकि उनकी वीरता का कोई मुकाबला ही नहीं है। सच में नहीं है। ये महावीर के पीछे जो लोग प्रभावित हुए, वे कायर होंगे, यह सोचा भी नहीं जा सकता।
लेकिन हमेशा ऐसा होता है। वीरता से कायर ही प्रभावित होते हैं, वीर प्रभावित नहीं होते। वीर क्या प्रभावित होंगे! कि होओगे वीर, तो ठीक है, अपने घर के होओगे। लेकिन कायर एकदम प्रभावित हो जाता है कि यह रहा महावीर! इसके चरणों में सिर रखें! यह है आदमी असल में! क्यों? क्योंकि यह कायर भी सोचता रहा है, कभी हम भी ऐसे हो जाएं। हो तो नहीं सकते। यह आइडियल है, यह आदर्श है। लेकिन इसके चरणों में सिर तो रख सकते हैं। इसका यशगान तो कर सकते हैं! इसकी जय-जयकार तो बोल सकते हैं। यह उनका आदर्श बन जाता है; क्योंकि भीतर इससे विपरीत उनके आदमी छिपा है। वे इकट्ठे हो जाते हैं। वे अड़चन डाल देते हैं।
सदा ऐसा होता है कि हम अपने से विपरीत से आकर्षित हो जाते हैं। और तब बड़ी कठिनाई होती है। हम जिस वजह से आकर्षित होते हैं, हम उससे उलटे होते हैं। और फिर ये आकर्षित हुए लोग ही पीछे संप्रदाय निर्मित करेंगे, संस्था चलाएंगे, संगठन बनाएंगे। संप्रदाय होगा, वह इनके हाथ में होगा। फिर ये सारी व्याख्या बदलेंगे, फिर ये रि-इंटरप्रीट करेंगे, नई व्याख्याएं करेंगे। और सारी चीज और ही हो जाएगी। सारी चीज और ही हो जाएगी।
अगर इतिहास का यह ढंग हमारे खयाल में आ जाए, तो शायद भविष्य में हम आदमी को सचेत कर सकें कि तुम जरा सोच-समझ कर...। अभी मनसविद कहते हैं कि जब भी कोई पुरुष किसी स्त्री से प्रभावित होता है, तो वह उन गुणों से प्रभावित होता है, जो उसमें नहीं हैं। स्त्री उन गुणों से प्रभावित होती है, जो उसमें नहीं हैं। जो हममें नहीं है, उससे हम प्रभावित होते हैं। जो हममें है, उससे हम कभी प्रभावित नहीं होते। क्योंकि वह तो हममें है ही। उससे प्रभावित होने का कोई कारण नहीं है। चूंकि विपरीत गुणों से लोग प्रभावित होते हैं, और विपरीत जितने गुण होते हैं, उतना ज्यादा रोमांच, उतना ज्यादा रोमांस, उतना प्रेम पैदा होता है। लेकिन फिर विवाह में वे ही विपरीत गुण कलह का कारण भी बनते हैं। अब यह मुश्किल है।
इसलिए मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि जितने बड़े प्रेम से विवाह होगा, उतने ही खतरे में ले जा सकता है। क्योंकि प्रेम का मतलब यह होता है कि बड़ा ही विपरीत आकर्षण था। जो बहुत कठोर आदमी है, वह नाजुक से प्रभावित होगा। लेकिन जब दोनों साथ रहेंगे, तो नाजुक और कठोर में कोई तालमेल पड़ेगा नहीं। झंझट रोज आएगी। अगर कोई बहुत इंटलेक्चुअल, बहुत बुद्धिमान आदमी है, तो वह बुद्धिमान स्त्री से प्रभावित नहीं होगा, कभी नहीं होगा। वह एक ऐसी स्त्री खोजेगा, जिसमें बुद्धि नाम मात्र को न हो। वह उससे प्रभावित होगा। लेकिन फिर अड़चन आएगी। क्योंकि जब दोनों साथ रहेंगे, तो वह पाएगा, कहां की जड़बुद्धि से पाला पड़ गया।
अब इसमें किसी का कसूर नहीं है। यह सिर्फ जीवन का विपरीत का तर्क दिक्कत डालता है। विपरीत से हम प्रभावित होते हैं, लेकिन विपरीत के साथ रह नहीं सकते। इसलिए हमारी आखिरी दिक्कत यह होती है कि जिससे हम प्रभावित होते हैं, उसके साथ रह नहीं सकते; और जिसके साथ हम रह सकते हैं, उससे हम कभी प्रभावित नहीं होते।
इसलिए पुराने लोग ज्यादा होशियार थे, या कहें, चालाक थे। तो वे कहते थे, विवाह किसी और से करना और प्रेम किसी और से करना। ये दोनों काम कभी एक साथ मत करना। विवाह उससे करना, जिसके साथ रह सको। और प्रेम उससे करना, जिससे प्रभावित हो। और इनको कभी घोल-मेल मत करना, इनको कभी एक साथ मत लाना।
अभी अमरीका के जो श्रेष्ठतम चिंतनशील लोग हैं, वे कहते हैं कि अमरीका को अगर बचाना है, तो हमें यह पुरानी चालाकी वापस लौटानी पड़ेगी। क्योंकि अमरीका ने एक गलती कर ली है--गलती अब लगती है--कि वे कहते हैं कि जिससे प्रेम हो, उससे ही विवाह करना। वह है तो बात बहुत अदभुत, लेकिन वह घट नहीं पाती। क्योंकि प्रेम उससे हो जाता है, जो विपरीत है। फिर उसके साथ रहने में मुसीबत खड़ी हो जाती है। जिन-जिन चीजों ने प्रभावित किया था, वे ही कलह का कारण बन जाएंगी। क्योंकि उनसे आपका तालमेल तो बैठ नहीं सकता।
ठीक जैसा पति-पत्नी के बीच घटता है, वैसा ही गुरु-शिष्य के बीच घटता है। यह गुरु-शिष्य का भी बड़ा रोमांस है! विपरीत से प्रभावित होकर लोग चले आते हैं; फिर साथ रहना भी मुश्किल हो जाता है। इसलिए जिंदा गुरु के साथ रहना बहुत कठिन पड़ता है; मरे गुरु के साथ दिक्कत नहीं आती। क्योंकि दूसरा मौजूद ही नहीं होता; आपकी जो मर्जी हो, माने चले जाओ।
अब जीसस ने तो कहा है कि जो तुम्हारे गाल पर चांटा मारे, दूसरा गाल उसके सामने कर देना। और ईसाइयत ने इतनी हत्याएं की हैं, जिसका हिसाब लगाना मुश्किल है। यह क्या बात है? यह जीसस जैसे आदमी के पास ये लोग कैसे इकट्ठे हो गए? ये प्रभावित हुए, यह दुष्ट वर्ग प्रभावित हुआ एकदम। इसने कहा कि बात तो यही सच है। हम नहीं कर पाते, कोई हर्ज नहीं। लेकिन कम से कम हम जय-जय जीसस की तो कर ही सकते हैं, जयकार तो कर ही सकते हैं। वह इकट्ठा हो गया। उसने लोगों की गर्दनें काट दीं, यह शिक्षा समझाने के लिए कि जो तुम्हारे गाल पर एक चांटा मारे, दूसरा उसके सामने कर देना। उसने लाखों लोगों की गर्दनें काट दीं। क्योंकि यह सिद्धांत समझाना बिलकुल जरूरी है, इस सिद्धांत के बिना दुनिया का हित नहीं होगा।
ऐसा विपरीत हो जाता है। इसलिए मोहम्मद आक्रामक नहीं हैं, न कृष्ण आक्रामक हैं। और मोहम्मद या कृष्ण के पास जैसे ही अनुभूति का सागर खुलता है, वैसे ही स्त्रैण-चित्त के द्वार खुल जाते हैं। स्त्रैण-चित्त से अर्थ केवल इतना ही है कि उस क्षण में आदमी जीवन के प्रति आक्रामक न होकर, जीवन की धाराओं के प्रति ग्राहक हो जाता है। वह एक गर्भ बन जाता है और जीवन को अपने भीतर समा लेने को तैयार हो जाता है। वह स्वीकार करने लगता है, अस्वीकार करना बंद कर देता है। उसकी स्थिति टोटल एक्सेप्टबिलिटी की, तथाता की हो जाती है। वह राजी हो जाता है। यह राजीपन, परिपूर्ण राजीपन ही स्त्रैण-चित्त का लक्षण है।

एक आखिरी सवाल।

आखिरी सवाल एक छोटा सा, एक मित्र ने पूछा है कि क्या निरहंकारिता की क्षमता साधारण आदमी को भी मिल सकती है?

नके प्रश्न से ऐसा लगता है कि बेचारे साधारण आदमी को कैसे मिलेगी? जब कि सच्चाई यह है कि असाधारण को मिलनी बहुत कठिन है। क्योंकि असाधारण का मतलब ही अहंकारी होता है। साधारण को ही मिल सकती है। लेकिन साधारण साधारण को नहीं; एक्स्ट्राआर्डिनरिली आर्डिनरी, असाधारण रूप से जो साधारण होता है।
साधारण साधारण मैं किसको कहता हूं? साधारण साधारण उसको कहता हूं, जिसको सब तो साधारण कहते हैं, लेकिन वह खुद साधारण नहीं मानता। असाधारण रूप से साधारण मैं उसको कहता हूं, जिसको दुनिया चाहे असाधारण कहती हो, लेकिन वह अपने को साधारण मानता है।
मैं दस-बारह वर्ष पूरे मुल्क में घूमा। लाखों लोग मुझे मिले। सैकड़ों लोगों ने मुझसे आकर कहा कि आप जो बातें कहते हैं, वह साधारण आदमी की समझ में कैसे आएंगी?
मैंने उनसे पूछा, आपकी समझ में आती हैं?
उन्होंने कहा, मेरी तो समझ में आती हैं; लेकिन साधारण आदमी की समझ में कैसे आएंगी?
मैंने कहा, मुझे घूमते बारह साल हो गए, लाखों लोग मैंने देखे, सैकड़ों लोगों ने यह सवाल मुझसे किया, अब तक मुझे साधारण आदमी नहीं मिला, जिसने कहा हो कि मैं साधारण आदमी हूं, मेरी समझ में यह कैसे आएगा। तो मैंने उनसे कहा कि वह साधारण आदमी कहां है? मुझे उससे मिला दो, एक दफा उसके दर्शन करने जैसे हैं।
कोई आदमी अपने को साधारण नहीं मानता। सभी आदमी अपने को असाधारण मानते हैं। यही अहंकार है। और आदमी अपने को साधारण जान ले और मान ले, तो अहंकार विदा हो गया। और सभी आदमी साधारण हैं। सभी आदमी साधारण हैं। असाधारण कोई भी नहीं है। सिर्फ एक ही आदमी को असाधारण हम कह सकते हैं, जो इस साधारणता को जान ले; बस। और किसी को असाधारण नहीं कह सकते।
मन हमारा करता नहीं यह मानने को कि मैं और साधारण! कितने-कितने उपाय से हम समझाते हैं कि मेरा जैसा आदमी कभी नहीं हुआ, कभी नहीं होगा। हालांकि कभी इस पर सोचते नहीं कि ऐसा कहने का क्या कारण है? क्या ऐसी विशेषता है? क्या ऐसी खूबी है? कुछ भी ऐसी खूबी नहीं, कुछ भी ऐसी विशेषता नहीं। लेकिन मन यह मानने को नहीं करता कि मैं साधारण हूं। क्योंकि जैसे ही हम यह मानें कि मैं साधारण हूं, वैसे ही ऊपर चढ़ने की यात्रा बंद होती है।
असल में, असाधारण मानने का कारण है। जब मैं मानता हूं कि मैं असाधारण हूं, तो मैं जहां भी हूं, वह जगह मेरे योग्य नहीं रहती। मेरे योग्य जगह तो ऊपर है, जहां मैं नहीं हूं। दुनिया को पता नहीं है और दुनिया बाधाएं डाल रही है। अन्यथा मैं ठीक जगह पर अपनी पहुंच जाऊं। पहुंच कर मैं रहूंगा। ठीक जगह मेरी सदा मुझ से ऊपर है। जहां मैं हूं, वह मेरे योग्य जगह नहीं है। इसलिए मैं अपने को असाधारण मानता हूं कि मैं अपनी ठीक जगह को पा लूं। वह ठीक जगह मुझे कभी नहीं मिलेगी, क्योंकि जहां मैं पहुंच जाऊंगा, वह जगह साधारण हो जाएगी; और मेरी असाधारण जगह और ऊपर उठ जाएगी। अहंकार अगर चढ़ता है ऊपर, तो तभी चढ़ पाता है, जब वह मानता है कि ऊपर ही मेरी जगह है, नीचे मेरी जगह नहीं है। यह अहंकार की दौड़ की कीमिया है, केमिस्ट्री है।
लाओत्से कहता है कि अगर तुम जान लो कि तुम साधारण हो, नोबडी हो, ना-कुछ हो, तो फिर ऊपर न चढ़ सकोगे। साधारण का खयाल आते ही तुम्हें लगेगा कि शायद जिस जगह मैं खड़ा हूं, यह भी तो अनधिकार चेष्टा नहीं है। शायद यह भी मेरी योग्यता न हो। तुम और पीछे हट जाओगे। तुम एक दिन वहां हट जाओगे, जहां और आगे हटने को कोई जगह नहीं बचती। तुम एक दिन वहां हट जाओगे, जहां हटने को कोई भी राजी नहीं होता। तुम एक दिन वहां हट जाओगे, जहां कोई प्रतिस्पर्धा नहीं करता कि यहां से हटो। लाओत्से कहता है, उसी दिन तुम असाधारण जीवन को उपलब्ध हो जाओगे। क्योंकि इतना जो विनम्र हो गया, अगर उसको भी परमात्मा नहीं मिलता, तो फिर परमात्मा की सारी बातचीत बकवास है। इतना जो शून्य हो गया, अगर उसको भी पूर्ण का साक्षात्कार नहीं होता, तो फिर पूर्ण का साक्षात्कार होता ही नहीं होगा।
यह जो साधारण हो जाने की अपनी तरफ से चेष्टा है--समझ, साधना, जो भी हम कहें--ऐसा मत सोचें कि साधारण आदमी यह कैसे करेगा? प्रत्येक आदमी साधारण है और प्रत्येक यह कर सकता है। लेकिन प्रत्येक को वहम है कि वह असाधारण है। उस वहम को तोड़ना जरूरी है।
लाओत्से यह नहीं कहता कि आप तोड़िए ही। वह यह कहता है कि अगर नहीं तोड़िएगा, तो दुख पाइएगा। और दुख आप पाना नहीं चाहते। लेकिन जिस चीज से दुख पाते हैं, उसको सम्हाल कर चलते हैं। करीब-करीब ऐसा मामला है कि हम अपनी बीमारियों को सम्हाल कर चलते हैं, कहीं बीमारी छूट न जाए। और दुख पाते हैं। और शोरगुल मचाते रहते हैं कि बहुत दुख है, बहुत दुख है। लेकिन जिस चीज से दुख मिल रहा है, उसे हम छोड़ना नहीं चाहते। अहंकार की गांठ हमारे सब दुखों की जड़ है। और अपने को साधारण जान लेना सब दुखों की औषधि है।
चौबीस घंटे के लिए कभी प्रयोग करके देखें--छोड़ें, ज्यादा की फिक्र नहीं करें--चौबीस घंटे के लिए साधारण हो जाएं। चौबीस घंटे एक ही स्मरण रख लें एक बार चौबीस घंटे कि मैं साधारण आदमी हूं, ना-कुछ। और चौबीस घंटे के बाद आप फिर कभी असाधारण न हो सकेंगे, न होना चाहेंगे। क्योंकि साधारण होने में आपको ऐसे आनंद की झलक मिल जाएगी, जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।
लेकिन वह झलक मिलती नहीं, क्योंकि ऐसे अकड़े हुए हैं असाधारण होने में कि वह झलक मिले कैसे? द्वार-दरवाजे बंद करके बैठे हैं असाधारण होने में। अपने सिंहासन से नीचे उतरें। स्वर्ण-सिंहासनों पर, अहंकार के, जीवन का रहस्य नहीं है। विनम्रता के साधारण धूल-धूसरित मार्गों पर भी बैठ जाने से जो मिल जाएगा, वह भी अहंकार के स्वर्ण-मंडित शिखरों पर बैठने से नहीं मिलता है।

इतना ही। कोई जाएगा नहीं। आज आखिरी दिन है, तो दस मिनट पूरे कीर्तन में डूब कर जाएं। शायद कीर्तन आपको साधारण बना दे। लेकिन उसमें भी आप अकड़े बैठे रहते हैं कि कोई देख न ले कि इतना असाधारण आदमी और ताली बजा रहा है! जिनको नाचना हो, वे बीच में खड़े हो जाएं। बीच में भी नाचने का खयाल आ जाए, बाहर आ जाएं। बिलकुल साधारण हैं। पंद्रह मिनट के लिए तो कम से कम साधारण हो जाएं। और देखें कि साधारण कोई भी हो सकता है।