पउड़ी:
37
करम
खंड की वाणी
जोरु। तिथै
होरु न कोई
होरु।।
तिथै
जोध महाबल
सूर। तिन महि
राम रहिआ
भरपूर।।
तिथै
सीतो सीता
महिमा माहि।
ताके रूप न
कथने जाहि।।
न
ओहि मरहि न
ठागे जाहि।
जिनकै राम बसै
मन माहि।।
तिथै
भगत वसहि के
लोअ। करहि
अनंदु सचा मनि
सोइ।।
सच
खंडि वसै
निरंकारु।
करि करि वेखै
नदरि निहाल।।
तिथै
खंड मंडल
बरमंड। जे को
कथै त अंत न
अंत।।
तिथै
लोअ लोअ आकार।
जिव जिव हुकमु
तिवै तिव कार।।
वेखै
विगसे करि
वीचारु। 'नानक'
कथना करड़ा
सारु।।
मनुष्य
असहाय है।
लेकिन तभी तक, जब तक
परमात्मा से
दूर है।
मनुष्य
दुर्बल है, दरिद्र है, दीन है, लेकिन
तभी तक, जब
तक परमात्मा
से दूर है।
उससे हमारी
दूरी ही हमारी
दरिद्रता है।
और जितने हम
उससे दूर होते
जाते हैं, उतना
ही जीवन
अर्थहीन होता
जाता है।



