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शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017

जो घर बारे आपना-(साधना-शिविर)-प्रवचन-02

जो घर बारे आपना-(साधना-शिविर)--ओशो
प्रवचन-दूसरा-(ध्यान के संबंध में)


मेरे प्रिय आत्मन्!
ध्यान के संबंध में दोत्तीन बातें हम समझ लें, और फिर प्रयोग के लिए बैठेंगे।
एक बात तो यह समझ लेनी जरूरी है, ध्यान में हम सिर्फ तैयारी करते हैं, परिणाम सदा ही हमारे हाथ के बाहर है। लेकिन यदि तैयारी पूरी है, तो परिणाम भी सुनिश्चित रूप से घटित होता है। परिणाम की चिंता छोड़ कर श्रम की ही हम चिंता करें। और परिणाम की चिंता छोड़ कर पूरी चिंता हम अपने श्रम की कर सकें, तो परिणाम भी सुनिश्चित है। लेकिन परिणाम की चिंता में श्रम भी पूरा नहीं हो पाता और परिणाम भी अनिश्चित हो जाते हैं।

जो घर बारे आपना-(साधना-शिविर)-प्रवचन-01

जो घर बारे आपना-(साधना-शिविर)--ओशो
प्रवचन-पहला–(जीवन के रहस्य की कुंजी)


मेरे प्रिय आत्मन्!
जीवन एक रहस्य है। जिसे हम जीवन जानते हैं, जैसा जानते हैं, वैसा ही सब कुछ नहीं है। बहुत कुछ है जो अनजाना ही रह जाता है। शायद सब कुछ ही अनजाना रह जाता है। जो हम जान पाते हैं वह ऐसा ही है जैसे कोई लहरों को देख कर समझ ले कि सागर को जान लिया। लहरें भी सागर की हैं, लेकिन लहरों को देख कर सागर को नहीं समझा जा सकता। और जो लहरों में उलझ जाएगा वह सागर तक पहुंचने का शायद मार्ग भी न खोज सके। असल में जिसने लहरों को ही सागर समझ लिया, उसके लिए सागर की खोज का सवाल भी नहीं उठता।

गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

जीवन संगीत-(साधना-शिविर)-प्रवचन-09

जीवन संगीत-(साधना-शिविर)--ओशो
नौवां-प्रवचन


मेरे प्रिय आत्मन्!
तीन दिनों की चर्चाओं के संबंध में बहुत से प्रश्न मित्रों ने भेजे हैं। जितने प्रश्नों के उत्तर संभव हो सकेंगे, मैं देने की कोशिश करूंगा।

एक मित्र ने पूछा है कि आप नये विचारों की क्रांति की बात कहते हैं। क्या अब भी कभी हो सकता है जो पहले नहीं हुआ है? इस पृथ्वी पर सभी कुछ पुराना है, नया क्या है?

इस संबंध में जो पहली बात आपसे कहना चाहता हूं, वह यह कि इस पृथ्वी पर सभी कुछ नया है, पुराना क्या है? पुराना एक क्षण नहीं बचता, नया प्रतिक्षण जन्म लेता है। पुराने का जो भ्रम पैदा होता है, इसलिए पैदा होता है, कि हम दो के बीच जो अंतर है, उसे नहीं देख पाते।
कल सुबह भी सूरज ऊगा था, कल सुबह भी आकाश में बादल छाए थे, कल सुबह भी हवाएं चली थीं। और आज भी सूरज ऊगा और बादल छाए और हवाएं चली थीं। और हम कहते हैं, वही है! लेकिन जरा भी वही नहीं है।

जीवन संगीत-(साधना-शिविर)-प्रवचन-08

जीवन संगीत-(साधना-शिविर)--ओशो
आठवां-प्रवचन


मैंने कहा है कि क्रांति तो एक विस्फोट है। सडन एक्सप्लोजन है। और फिर मैं ध्यान की प्रक्रिया और अभ्यास के लिए कहता हूं कि इन दोनों में विरोध नहीं है? नहीं, इन दोनों में विरोध नहीं है।
यदि मैं कहूं कि पानी जब भाप बनता है, तो एक विस्फोट है, सौ डिग्री पर पानी भाप बन जाता है। और फिर मैं किसी से कहूं कि पानी को धीरे-धीरे गरम करो, ताकी वह भाप बन जाए। वह आदमी मुझसे कहे कि आप तो कहते हैं, पानी एकदम से भाप बन जाता है। फिर हम धीरे-धीरे गरम करने का अभ्यास क्यों करें?
इन दोनों में विरोध नहीं है? तो उस समय कहूंगा विरोध नहीं है। पानी को जब हम गरम करते हैं तो एक डिग्री गरम पानी भी भाप नहीं है। और निन्यानबे डिग्री पानी भी भाप नहीं है।

जीवन संगीत-(साधना-शिविर)-प्रवचन-07

जीवन संगीत-(साधना-शिविर)--ओशो
सातवां--प्रवचन

तीन दिन की चर्चाओं के संबंध में बहुत से प्रश्न मित्रों ने पूछे हैं।


एक मित्र ने पूछा है कि यदि आत्मा सब सुख-दुख के बाहर है, तो दूसरों की आत्माओं की शांति के लिए जो प्रार्थनाएं की जाती है, उनका क्या उपयोग है?

यह बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है और समझना उपयोगी होगा। पहली तो बात यह है कि आत्मा निश्चय ही सब सुख-दुखों सब शांतियों, अशांतियों, सब राग द्वेषों मूलतः सभी तरह के द्वंद्व और द्वैत के अतीत है।
न तो आत्मा अशांत होती है और न अशांत। क्योंकि शांत वही हो सकता है, जो अशांत हो सकता हो। मन ही शांत होता है, मन ही अशांत होता है।
और ठीक से समझें तो मन का होना ही अशांति है।
मन का न हो जाना शांति है। लेकिन आत्मा अपने में न कभी शांत है, न कभी अशांत है। न सुख में है, न दुख में है। आत्मा एक तीसरी ही अवस्था में है जिसका नाम आनंद है।

जीवन संगीत-(साधना-शिविर)-प्रवचन-06

जीवन संगीत-(साधना-शिविर)--ओशो
छठवां--प्रवचन


सत्य की खोज में, उसे जानने की दिशा में, जिसे जान कर फिर कुछ और जानने को शेष नहीं रह जाता है। और उसे पाने के लिए; जिसे पाए बिना हम ऐसे तड़फते हैं, जैसे कोई मछली पानी के बाहर, रेत पर फेंक दी गई हो। और जिसे पा लेने के बाद हम वैसे ही शांत और आनंदित हो जाएं, जैसे मछली सागर में वापस पहुंच गई हो। उस आनंद, उस अमृत की खोज में, एक और दिशा और द्वार की चर्चा आज की संध्या में करूंगा।
सत्य को खोजने का उपकरण क्या है? रास्ता क्या है? साधन क्या है? मनुष्य के पास एक ही साधन मालूम पड़ता है विचार। एक ही शक्ति मालूम पड़ती है कि मनुष्य सोचे और खोजे।
लेकिन सोचने और विचारने से कभी किसी को सत्य उपलब्ध नहीं हुआ है।

जीवन संगीत-(साधना-शिविर)-प्रवचन-05

जीवन संगीत-(साधना-शिविर)--ओशो
पांचवां-प्रवचन


...ताकि पूरे प्रश्नों के उत्तर हो सकें। सबसे पहले तो एक मित्र ने पूछा है कि कल मैंने कहा कि खोज छोड़ देनी है। और अगर खोज हम छोड़ दें, फिर तो विज्ञान का जन्म नहीं हो सकेगा।
मैंने जो कहा है, खोज छोड़ देनी है, वह कहा है उस सत्य को पाने के लिए जो हमारे भीतर है। खोज करनी व्यर्थ है, बाधा है। लेकिन हमारे बाहर भी सत्य है। और हम से बाहर जो सत्य है, उसे बिना तो खोज के कभी नहीं पाया जा सकता।
दुनिया में दो दिशाएं हैं। एक जो हम से बाहर जाती है। हम से बाहर जाने वाला जो जगत है, अगर उसके सत्य की खोज करनी हो, जो विज्ञान करता है, तो खोज करनी ही पड़ेगी। खोज के बिना बाहर के जगत का कोई सत्य उपलब्ध नहीं हो सकता।

जीवन संगीत-(साधना-शिविर)-प्रवचन-04

जीवन संगीत-(साधना-शिविर)--ओशो
चौथा-प्रवचन


प्रिय आत्मन्!
मनुष्य दुख में है और सुख की केवल कल्पना करता है। मनुष्य अज्ञान में है और ज्ञान की केवल कल्पना करता है। मनुष्य ठीक अर्थों में जीवित नहीं है। जीवन की केवल कल्पना करता है।
आज की सुबह की इस बैठक में इस संबंध में मैं कुछ कहना चाहूंगा कि हम जो कल्पना करते हैं, उसके कारण ही हम जो हो सकते हैं, वह नहीं हो पाते हैं।
जैसे कोई बीमार आदमी कल्पना कर ले कि वह स्वस्थ है, तो फिर स्वास्थ्य की दिशा में कदम उठाना बंद कर देगा। जब वह स्वस्थ है, तो स्वस्थ होने का कोई सवाल नहीं है। अगर कोई अंधा आदमी कल्पना करने लगे कि उसे प्रकाश का पता है--कि प्रकाश कैसा होता है, तो फिर वह अंधा आदमी आंख की खोज बंद कर देगा।

जीवन संगीत-(साधना-शिविर)-प्रवचन-03

जीवन संगीत-(साधना-शिविर)
ओशो
तीसरा-प्रवचन


एक अदभुत व्यक्ति हुआ, नाम था च्वांगत्सु। रात सोया, एक स्वप्न देखा। स्वप्न देखा कि एक तितली हो गया हूं, फूल-फूल उड़ रहा हूं। सुबह उठा तो बहुत उदास था। मित्र उसके पूछने लगे, कभी उदास नहीं देखा, इतने उदास क्यों हो? दूसरे उदास होते थे, तो पूछते थे राह च्वांगत्सु से, मार्ग पाते थे। और उसे तो कभी किसी ने उदास नहीं देखा था।
च्वांगत्सु ने कहा, क्या बताऊं, क्या फायदा है, एक बहुत उलझन में पड़ गया हूं। रात एक सपना देखा कि मैं तितली हो गया हूं!
मित्र कहने लगे, पागल हो गए हो, इसमें चिंता की क्या बात है?
च्वांगत्सु ने कहा, सपना देखा इसमें चिंता नहीं है, लेकिन सुबह उठ कर मुझे एक खयाल घेर लिया है और वह यह कि रात आदमी सपना देखता है कि तितली हो गया, तो कहीं ऐसा तो नहीं है कि अब तितली सो गई हो और सपना देखती हो कि आदमी हो गई है?

जीवन संगीत-(साधना-शिविर)-प्रवचन-02

जीवन संगीत-(साधना-शिविर)
ओशो
दूसरा-प्रवचन


उसे अनबंधा किया जा सकता है, जो कारागृह में हो, उसे मुक्त किया जा सकता है। जो सोया हो, उसे जगाया जा सकता है। लेकिन जो जागा हो और इस भ्रम में हो कि सो गया हूं, उसे जगाना बहुत मुश्किल है। और जो मुक्त हो और सोचता हो कि बंध गया हूं, उसे खोलना बहुत मुश्किल है। और जिसके आस-पास कोई जंजीरें न हों, और आंख बंद करके सपना देखता हो कि मैं जंजीरों में बंधा हूं और पूछता हो कैसे तोडूं इन जंजीरों को? कैसे मुक्त हो जाऊं? कैसे छुटूं? तो बहुत कठिनाई है।
रात्रि इस संबंध में पहले सूत्र पर मैंने आपसे कुछ कहा। मनुष्य की आत्मा परतंत्र नहीं है और हम उसे परतंत्र माने हुए बैठे हैं। मनुष्य की आत्मा को स्वतंत्र नहीं बनाना है। बस यही जानना है कि आत्मा स्वतंत्र है।

जीवन संगीत-(साधना-शिविर)-प्रवचन-01

जीवन संगीत-(साधना-शिविर)  ओशो
पहला-प्रवचन


मेरे प्रिय आत्मन्!
अंधकार का अपना आनंद है, लेकिन प्रकाश की हमारी चाह क्यों? प्रकाश के लिए हम इतने पीड़ित क्यों? यह शायद ही आपने सोचा हो कि प्रकाश के लिए हमारी चाह हमारे भीतर बैठे हुए भय का प्रतीक है। फियर का प्रतीक है।
हम प्रकाश इसलिए चाहते हैं, ताकि हम निर्भय हो सकें। अंधकार में मन भयभीत हो जाता है। प्रकाश की चाह कोई बहुत बड़ा गुण नहीं। सिर्फ अंतरात्मा में छाए हुए भय का सबूत है। भयभीत आदमी प्रकाश चाहता है। और जो अभय है, उसे अंधकार भी अंधकार नहीं रह जाता। अंधकार की जो पीड़ा है, जो द्वंद्व है, वह भय के कारण है। और जिस दिन मनुष्य निर्भय हो जाएगा, उस दिन प्रकाश की यह चाह भी विलीन हो जाएगी।

बुधवार, 5 अप्रैल 2017

जीवन ही है प्रभु-(साधना-शिविर) प्रवचन-05

जीवन ही है प्रभु-(साधना-शिविर)--ओशो
साधना-शिविर, जूनागढ़; दिनांक 12 दिसंबर, 1969; रात्रि.
प्रवचन-पांचवां  
मेरे प्रिय आत्मन् ,

जीवन ही है प्रभु, इस संबंध में और बहुत से प्रश्न मित्रों ने पूछे हैं।


एक मित्र ने पूछा है--बुराई को मिटाने के लिए, अशुभ को मिटाने के लिए, पाप को मिटाने के लिए विधायक मार्ग क्या है? पाजिटिव रास्ता क्या है? क्या ध्यान और आत्मलीनता में जाने से बुराई मिट सकेगी?
ध्यान और आत्मलीनता तो एक तरह का पलायन, एस्केप है, जिंदगी से भागना है। ऐसा कोई मार्ग, विधायक, सृजनात्मक, जो भागना न सिखाता हो, जीना सिखाता हो, उस संबंध में कुछ कहें?

पहली तो बात यह है कि ध्यान पलायन नहीं है और आत्मलीनता पलायन नहीं है। बल्कि, जो आत्मा से बचकर और सब तरफ भाग रहे हैं वे पलायन में हैं।

जीवन ही है प्रभु-(साधना-शिविर) प्रवचन-04

जीवन ही है प्रभु-(साधना-शिविर)--ओशो
साधना-शिविर, जूनागढ़; दिनांक 11 दिसंबर, 1969; रात्रि.

प्रवचन-चौथा

मेरे प्रिय आत्मन् ,
'जीवन ही है प्रभु' इस संबंध में एक मित्र ने पूछा है, कैसे दिखाई पड़े फिर हमें कि जीवन ही प्रभु है। क्योंकि हमें तो चारों ओर दोष ही दिखायी पड़ते हैं। सबमें दोष दिखायी पड़ते हैं। 'क्यों दिखाई पड़ते हैं सबमें दोष?' इस संबंध में उन्होंने पूछा है।
प्रभु की खोज में एक सूत्र यह भी है, इसलिए इसे समझ लेना जरूरी है। निश्चित ही दोष दिखायी पड़ते हैं दूसरों में। कारण क्या है? कारण है सिर्फ एक--अपने अहंकार की तृप्ति। दूसरे में दोष दिखायी पड़ता है। दूसरे में दोष की खोज चलती है। उसका राज छोटा-सा है।

जीवन ही है प्रभु-(साधना-शिविर) प्रवचन-03

जीवन ही है प्रभु-(साधना-शिविर)--ओशो
साधना-शिविर, जूनागढ़; दिनांक 10 दिसंबर, 1969; रात्रि.

प्रवचन-तीसरा

मेरे प्रिय आत्मन् ,

एक मित्र ने पूछा है कि यदि ध्यान से जीवन में शांति हो जाती है, तो फिर ध्यान सारे देश में फैल क्यों नहीं जाता है?

पहली बात तो यह कि बहुत कम लोग हैं पृथ्वी पर जो शांत होना चाहते हैं। शांत होना बहुत कठिन है। असल में शांति की आकांक्षा को उत्पन्न करना ही बहुत कठिन है। और कठिनाई शांति में नहीं है। कठिनाई इस बात में है कि जब तक कोई आदमी ठीक से अशांत न हो जाये तब तक शांति की आकांक्षा पैदा नहीं होती। पूरी तरह अशांत हुए बिना कोई शांत होने की यात्रा पर नहीं निकलता है। और हम पूरी तरह अशांत नहीं हैं। यदि हम पूरी तरह अशांत हो जायें तो हमें शांत होना ही पड़े। लेकिन हम इतने अधूरे जीते हैं कि शांति तो बहुत दूर, अशांति भी पूरी नहीं हो पाती।

जीवन ही है प्रभु-(साधना-शिविर) प्रवचन-02

जीवन ही है प्रभु-(साधना-शिविर)--ओशो
साधना-शिविर, जूनागढ़; दिनांक 10 दिसंबर, 1969; प्रात्य.

प्रवचन-दूसरा

ध्यान के संबंध में थोड़ी सी बातें समझ लेनी जरूरी हैं। क्योंकि बहुत गहरे में तो समझ का ही नाम ध्यान है।
ध्यान का अर्थ है--समर्पण। ध्यान का अर्थ है--अपने को पूरी तरह छोड़ देना परमात्मा के हाथों में। ध्यान कोई क्रिया नहीं है, जो आपको करनी है। ध्यान का अर्थ है--कुछ भी नहीं करना है और छोड़ देना है उसके हाथों में, जो कि सचमुच ही हमें सम्हाले हुए हैं।
जैसा मैंने कल रात कहा, परमात्मा का अर्थ है--मूल स्रोत, जिससे हम आते हैं और जिसमें हम लौट जाते हैं। लेकिन न तो आना हमारे हाथ में है और न लौटना हमारे हाथ में है। हमें पता नहीं चलता, कब हम आते हैं और कब लौट जाते हैं। ध्यान, जानते हुए लौटने का नाम है।

जीवन ही है प्रभु-(साधना-शिविर) प्रवचन-01

जीवन ही है प्रभु-(साधना-शिविर)--ओशो
साधना-शिविर, जूनागढ़; दिनांक 09 दिसंबर, 1969; रात्रि.

प्रवचन-पहला-(प्रभु की खोज)

मेरे प्रिय आत्मन् ,
जीवन के गणित के बहुत अदभुत सूत्र हैं। पहली अत्यंत रहस्य की बात तो यह है कि जो निकट है वह दिखायी नहीं पड़ता, जो और भी निकट है, उसका पता भी नहीं चलता। और मैं जो स्वयं हूं उसका तो स्मरण भी नहीं आता। जो दूर है वह दिखायी पड़ता है। जो और दूर है और साफ दिखायी पड़ता है। जो बहुत दूर है वह निमंत्रण भी देता है, बुलाता भी है, पुकारता भी है।
चांद बुला रहा है आदमी को, तारे बुला रहे हैं। जगत की सीमाएं बुला रही हैं, एवरेस्ट की चोटियां बुलाती हैं, प्रशांत महासागर की गहराइयां बुलाती हैं। लेकिन आदमी के भीतर जो है वहां की कोई पुकार सुनायी नहीं पड़ती।

ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)-प्रवचन-10

ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)
ओशो

प्रवचन-दसवां-(ध्यान: जीवन में  क्रांति)


जीसस ने कहा है: जो भारग्रस्त हैं, चिंता से भरे हैं, जिनका मन विक्षिप्तता का बोझ हो गया है, वे मेरे पास आएं, मैं उन्हें निर्भार कर दूंगा।
यही मैं तुमसे भी कहता हूं। चिंताएं, दुख, पीड़ाएं, संताप इसलिए हैं, क्योंकि तुमने इन्हें जोर से पकड़ रखा है। चिंताएं किसी को पकड़ती नहीं, दुख किसी को पकड़ते नहीं, आदमी ही उन्हें पकड़ लेता है।
ध्यान की सारी प्रक्रिया दुख छोड़ने की, पीड़ा छोड़ने की प्रक्रिया है। धन नहीं छोड़ना है, संसार नहीं छोड़ना है; छोड़ देना है दुख को पकड़ने की वृत्ति। और एक बार यह अनुभव हो जाए कि दुख ने आपको नहीं, आपने दुख को पकड़ा हुआ था, तो जीवन में क्रांति घटित हो जाती है। क्योंकि फिर कोई भी जान कर दुख को पकड़ नहीं सकता।

ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)-प्रवचन-09

ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)
ओशो
प्रवचन-नौवां-(ध्यान: चुनावरहित सजगता)


ध्यान के संबंध में थोड़े से प्रश्न हैं। एक मित्र ने पूछा है कि वृत्तियों का देखना, ऑब्जर्वेशन भी क्या एक तरह का दमन नहीं है? एक प्रकार का सप्रेशन नहीं है?

आपकी आंतरिक आकांक्षा पर निर्भर करता है कि वृत्तियों का देखना भी दमन बन जाए या न बने।
यदि कोई व्यक्ति वृत्तियों का ऑब्जर्वेशन, निरीक्षण, देखना, साक्षी होना, इसीलिए कर रहा है कि वृत्तियों से मुक्त कैसे हो जाए, तो यह देखना दमन बन जाएगा, सप्रेशन बन जाएगा। यदि आपकी आकांक्षा निरीक्षण में केवल इतनी ही है कि मैं वृत्तियों से मुक्त कैसे हो जाऊं? मुक्त होने की बात आपने पहले ही तय कर रखी है, वृत्तियों को देखने के पूर्व आप एक पक्ष लेकर ही वृत्तियों को देखने जा रहे हैं कि ये वृत्तियां बुरी हैं, इनसे छुटकारा चाहिए; ये वृत्तियां नरक हैं, इनसे मुक्ति चाहिए; ये वृत्तियां ही दुख हैं, इनसे पार होना है;

ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)-प्रवचन-08

ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)
ओशो
प्रवचन-आठवां-(ध्यान: मन की मृत्यु)


थोड़े से सवाल हैं। एक मित्र ने पूछा है कि सुबह के ध्यान में शरीर बिलकुल ही गायब हो जाता है। और जो बचता है वह बहुत विशाल, ओर-छोर से परे लगता है। पर ध्यान के बाद शेष दिन में शरीर का बोध फिर शुरू हो जाता है, फिर क्षुद्र शरीर का अनुभव होने लगता है। तो क्या यह सब अहंकार की ही लीला है?

इस संबंध में तीन बातें खयाल में लेनी चाहिए। एक तो ध्यान में जैसे ही गहराई बढ़ेगी, शरीर तिरोहित हो जाएगा। या कभी-कभी बहुत विशाल हो जाएगा। या कभी ऐसा भी हो सकता है कि बहुत क्षुद्र, बहुत छोटा भी हो जाएगा; जितना है उससे भी छोटा मालूम पड़ेगा। शरीर की प्रतीति मन पर निर्भर है। यदि मन बहुत फैल जाता है तो शरीर फैला हुआ मालूम पड़ने लगता है। मन अगर बहुत सिकुड़ जाता है तो छोटा मालूम पड़ने लगता है। शरीर की सीमा वस्तुतः मन की सीमा से ही प्रतीत होती है। यह अनुभव सिद्ध है। और अहंकार की लीला नहीं है, ध्यान का परिणाम है।

ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)-प्रवचन-07

ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)
ओशो
प्रवचन-सातवां-(ध्यान: प्रकाश का जगत)


एक मित्र ने पूछा है: जब आप ध्यान में कहते हैं कि प्रकाश के सागर में डूब जाएं, तो हमें तो यही पता चलता रहता है कि जमीन पर पड़े हैं, तो सागर में कैसे डूब जाएं?

निश्चित ही पता चलता रहेगा कि आप जमीन पर पड़े हैं, अगर आपने इससे पहले के दो चरणों में पूरा श्रम नहीं उठाया। यदि पहले चरण में आप अपने को बचा कर कीर्तन करते रहे हैं, अगर कीर्तन में पूरे नहीं डूबे; अगर कीर्तन के बाद पंद्रह मिनट में, जब आपको कहा है कि आप अब कीर्तन की धुन पर सवार हो जाएं, अगर उस पर सवार नहीं हुए, अगर उस लहर में बहे नहीं, तो तीसरे चरण में आप पाएंगे कि आप जमीन पर ही पड़े हैं।

ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)-प्रवचन-06

ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)
ओशो
प्रवचन-छट्ठवां-(ध्यान: प्रभु के द्वार में  प्रवेश)


प्रभु के द्वार में प्रवेश इतना कठिन नहीं है, जितना मालूम पड़ता है। सभी चीजें कठिन मालूम पड़ती हैं, जो न की गई हों। अपरिचित, अनजान कठिन मालूम पड़ता है। जिससे हम अब तक कभी संबंधित नहीं हुए हैं, उससे कैसे संबंध बनेगा, यह कल्पना में भी नहीं आता।
जो तैरना नहीं जानता है, वह दूसरे को पानी में तैरता देख कर चकित होता है। सोचता है बहुत कठिन है बात। जीवन-मरण का सवाल मालूम पड़ता है।
लेकिन तैरने से सरल और क्या हो सकता है! वस्तुतः तैरना कोई कला नहीं, सिर्फ पानी में गिरने के साहस का फल है। तैरना कोई कला नहीं है। पहली बार आदमी गिरता है तो भी हाथ-पैर तड़फड़ाता है, थोड़े अव्यवस्थित होते हैं।

ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)-प्रवचन-05

ध्यान के कमल-(साधना-शिविर)
ओशो
प्रवचन-पांचवां-(ध्यान: द्वैत से अद्वैत की ओर)


दोत्तीन मित्रों ने एक ही सवाल पूछा है कि ध्यान का प्रयोग करते समय, जब मैं कहता हूं कि आप अपने शरीर के बाहर निकल जाएं, छलांग लगा लें, और पीछे लौट कर देखें, तो उन्होंने पूछा है, यह हमारी समझ में नहीं आता कि कैसे निकल जाएं और कैसे पीछे लौट कर देखें?

जिनको छलांग लग जाती हो उनके लिए तो किसी विधि की जरूरत नहीं है। इसीलिए मैंने विधि की बात नहीं कही। क्योंकि कुछ लोग सहज ही बाहर निकल जाते हैं, किसी विधि की जरूरत नहीं है। निकलने का खयाल ही उन्हें बाहर ले जाता है। जिनको ऐसा न होता हो, उनके लिए मैं विधि कहता हूं। लेकिन जिनको होता हो उन्हें विधि करने की जरा भी जरूरत नहीं है। जिन्हें यह न होता हो आसानी से कि कैसे बाहर निकल जाएं, वे एक छोटा सा प्रयोग रात सोते समय घर पर करें। तो एक-दो दिन के भीतर आसान हो जाएगा।

मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-051)

 आत्‍मस्वीकार से तत्‍क्षण कांति--(प्रवचन—इक्यावानवां)

पहला प्रश्‍न:

अकारण जीने की कला का सूत्र क्या है? कृपा करके करें।


कारण से जीयो या अकारण जीयो, हर हालत में तुम अकारण ही जीते हो। कारण भला तुम खोज लो, कारण है नहीं। कारण तुम्हारा ही आरोपण है। इसे समझने की कोशिश करो।
जीवन कहीं जा नहीं रहा है, जीवन है। जीवन का कोई भविष्य नही है, बस वर्तमान है। वर्तमान ही एकमात्र अस्तित्व का ढंग है।
तुम जन्मे, क्या कारण है? पूछोगे, उलझोगे। पूछोगे तो कोई न कोई प्रश्न का उत्तर देने वाला भी मिल जाएगा; कोई न मिलेगा तो तुम खुद ही अपने मन को कोई उत्तर देकर समझा लोगे। ऐसे ही तो सारे दर्शनशास्त्र निर्मित हुए हैं। आदमी ने पूछा—उत्तर देने वाला कोई भी नहीं है—आदमी ने ही पूछा, आदमी ने ही उत्तर दे लिए। फिर प्रश्नों की पीड़ा से बचने के लिए उत्तरों को सम्हालकर रख लिया, संजोकर रख लिया, मंजूषाएं बना लीं—वेद बने, कुरान—बाइबिल बनी। आदमी की बेचैनी समझ में आती है। उसे लगता है, क्यों? कारण होना चाहिए!

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-050)

(अशांति की समझ ही शांति)--प्रवचन—पचासवां
सारसूत्र:

अथ पापानि कम्मानि करं वालो न बुज्‍झति।
सेहि कम्मेहि दुम्‍मेधो अग्‍निदड्ढ़ो' व तप्पति।।120।।

न नग्‍गचरिया न जटा न पंका
नाकसका थण्डिलसाकिका वा।
रज्जोवजल्लं उक्कुटिकपधानं
सोधेन्ति मच्चं अवितिण्णकंखं।।121।।

अलंकतो चेपि समं चरेथ्य
सन्तो दन्तो नियतो ब्रह्मचारी।
सब्‍बेसु भूतेसु' निधाय दण्ड
सो ब्राह्मणो सो समणो स भिक्‍खू ।।122।।


हिरीनिसधो पुरिसो कोचि लोकस्मि विज्जति।
यो निन्दं अप्पबोधति अस्सो भद्रो कसामिव ।।123।।

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-049)

 (महोत्सव से परमात्मा, महोत्सव में परमात्मा)--प्रवचन—उन्नचासवां 

पहला प्रश्‍न:


भगवान, मैं आपको वर्षों से सून रहा हूं, लंबे अर्से से मैं आपके पास हूं। मैंने समय—समय पर आयसे कई भिन्न—भिन्न वक्तव्य और परस्पर विरोधी वक्तव्य सुने, लेकिन उनके संबंध में कहीं कोई प्रश्न गै मन में नहीं उठा। और उनके बावजद आप मेरी दृष्टि में और मेरे हृदय में सदा—सर्वदा एक ओrर अखंड बने रहे। इस पर कुछ प्रकाश डालने की अनुकंपा करें।

मेरे पास दो ढंग से हो सकते हो। एक तो विचार से, बुद्धि से, और एक हृदय से और भाव से। बुद्धि और विचार से अगर मेरे पास हो, तो बड़ी अड़चन होगी। रोज—रोज विरोधी वक्तव्य होंगे। रोज—रोज तुम्हें सुलझाना पड़ेगा, फिर भी तुम सुलझा न पाओगे।
बुद्धि कभी कुछ सुलझा ही नहीं पाती। जहा सीधी—सीधी बात हो, वहा भी बुद्धिं उलझा लेती है। तो मेरी बातें तो बड़ी उलझी हैं। जहा सब साफ—सुथरा हो, वहा भी बुद्धि समस्याएं खड़ी कर लेती है। तो मैं तो उन रास्तों की बात कर रहा हूं जो बड़े धुंधलके से भरे हैं। एक ही रास्ते की बात हो, तो भी बुद्धि विरोध खोज लेती है। येतो अनंत रास्तों की बातें हैं।

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-048)

(आज बनकर जी!)--प्रवचन—अडतालिसवां 
सारसूत्र:

सब्‍बे तसन्‍ति दण्‍डस्‍स सब्‍बे भायंति मच्‍चुनो।
अत्‍तानं उपमं कत्‍वा न हन्‍नेय न घातये ।।115।।


सुखकामानि भूतानियो दण्‍डेन विहिंसति।
अत्‍तनो सुखमेसानो पेच्‍च सो न लभते सुखं।।116।।

सुखकामानि भूतानि यो दण्‍डेन न हिंसति।
अत्‍तनो सुखमेसानो पेच्‍च सो लभते सुखं।।117।।

मावोच्‍च फरूसं कज्‍जि वुत्‍ता पटिवदेय्युतं।
दुख्‍खा हि सारम्‍भकथा पटिदण्‍डा फुस्‍सेय्यु तं।।118।।

सचंनेरेसि अत्‍तानं कंसो उपहतो यथा।
एक पत्‍तोसि निब्‍बानं सारम्‍भो ते न विज्‍जति।।119।।

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-047)

(अकेलेपन की गहन प्रतीति है मुक्ति)-प्रवचन—सैतालिसवांं 

पहला प्रश्‍न:

हम तो जीते—जी और सोते—जागते भय और अपराध—भाव के द्वारा आशेष नारकीय पीड़ा से गुजर चकते हैं। क्या यह काफी नहीं है? कि मरने के बाद फिरे हमें नर्क भेजा जाए!



पहली बात, कोई भेजने वाल नहीं है, कोई भेजता नहीं है। तुम जाते हो इसे बहुत ठीक से समझ लो। अन्‍यथा बुद्ध के दृष्‍टिोण को पकड़ न पाओगे।
बुद्ध के दृष्टिकोण में जो अत्यंत आधारभूत बात है, वह यह है—धर्म, ईश्वर से शून्य। अगर तुम किसी भांति ईश्वर को पकड़े रहे, तो बुद्ध के धर्म को समझ न पाओगे। ईश्वर के बहाने तुमने किसी दूसरे पर दायित्व छोड़ा है।
तुम कहते हो, दुख तो हम भोग चुके बहुत, अब हमें नर्क न भेजा जाए—जैसे तुम्हें कोई भेजने वाला है! कि प्रार्थना और पूजा हमने इतनी की, अब हमें स्वर्ग भैजा जाए—जैसे कि कोई पुरस्कार बांट रहा है। वहां कोई भी नहीं है।