कुल पेज दृश्य

मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

मराैै है जोगी मरौ-(प्रवचन-10)


ध्‍यान का सुगमतम उपाय : संगीत—प्रवचन—दसवां

दिनांक: 10 अक्टूबर, 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍न सार:

1—शिष्य गुरु के साथ गद्दारी क्यों करते हैं? विजयानंद और महेश अभी आपके विरोध में कहते हैं। और एक संन्यासी चिन्मय ने करंट में लिखा है कि जब मेरे गुरु राजनीति के विरुद्ध बोलते हैं, तब वे धर्म से नीचे गिरते हैं; और साथ—साथ कि मैं जीवित शिष्य हूं इसलिए अपने गुरु के विरुद्ध कह सकता हूं।

2—श्रद्धा क्या है?

3—प्रेम की अग्नि—परीक्षा क्यों ली जाती है?

4—मैं शास्त्रीय संगीत का शौक रखता हूं। यह न तो मेरे पड़ोसियों को पसंद है, ,. न मेरे पत्नी—बच्चों को, न परिवार के अन्य लोगों को ही। मैं क्या करूं?

5—मैं हर चीज से असंतुष्ट हूं। क्या पाऊं जिससे कि संतोष मिले?

मराैै है जोगी मरौ-(प्रवचन-14)

एक नया आकाश चाहिएप्रवचनचौदहवां

दिनांक: 14 नवंबर, 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍न सार:

1—मैं वर्षों से पूजा कर रहा हूं मगर हाथ कुछ नहीं आया। तीर्थ, व्रत, यात्रा सब ऊर चुका हूं पर निष्फल। क्या मैं ऐसे ही अकारण जीऊंगा और अकारण मर जाऊंगा?

2—संसार में सब क्षणभंगुर है, इसलिए पकड़े तो क्या पकड़े?

3—बंबई की किसी होटल के प्रांगण में स्थापित जैन तीर्थंकर की नग्न प्रतिमा को चड्डी पहनायी गई, ऐसा आपने बताया। मैं जानना चाहता हूं कि चड्डी पहनाने का कार्य किसने किया?

4—भगवान! आपके इस संन्यासी के जीवन में आपका प्रसाद हमेशा मिलता रहता है, जिसका अनुभव बयान नहीं कर सकता। और पहले—पहले घबड़ाहट भी होती थी। भगवान, यह मेरा भरम तो नहीं है, कृपया समझाएं।

5—भगवान! दिल्ली में जो चल रहा है, उसके संबंध में कुछ कहें।

रविवार, 9 अप्रैल 2017

रोम रोम रस पीजिए-(साधना-शिविर)-प्रवचन-04

रोम रोम रस पीजिए-(साधना-शिविर)
ओशो
चौथा प्रवचन

झूठे धर्मों की विदाई--सच्चे धर्म का जन्म

एक मित्र ने पूछा है कि क्या सभी धर्मों के समन्वय से वास्तविक धर्म का जन्म नहीं हो सकता है? क्या हिंदू, मुसलमान, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी, सिक्ख, और सभी धर्म इकट्ठे हो जाएं और इन सब धर्मों के बीच कोई समन्वय, कोई सिंथीसिस खोजी जा सके? तो क्या वह सच्चा धर्म नहीं होगा?

एक छोटी सी कहानी कहूं और फिर इस संबंध में कुछ कहूंगा।
डार्विन का नाम तो सुना ही होगा। डार्विन ने पशुओं-पक्षियों, कीड़ों-मकोड़ों के बाबत सारे जीवन अध्ययन किया था। और उसी अध्ययन से वह इस नतीजे पर भी पहुंच गया था कि मनुष्य भी पशुओं की ही एक जाति है और पशुओं से ही विकसित हुई है। उसकी जानकारी इतनी अदभुत थी कीड़े-मकोड़ों, पशुओं और पक्षियों के संबंध में कि वह किसी भी कीड़े और मकोड़े की जाति बता सकता था, उसके संबंध में सब कुछ बता सकता था।

रोम रोम रस पीजिए-(साधना-शिविर)-प्रवचन-03

रोम रोम रस पीजिए-(साधना-शिविर)
ओशो
तीसरा प्रवचन

बच्चों को विश्वास नहीं, जिज्ञासा सिखाएं

मेरे प्रिय आत्मन्!
क्या बच्चों को न बताएं कि ईश्वर है? क्या धर्म के संबंध में उन्हें कुछ भी न कहें? आत्मा के लिए कोई उन्हें विश्वास न दें? ऐसे कुछ प्रश्न पूछे हैं।

जिसे हम नहीं जानते हैं, उसे हम देना भी चाहेंगे तो क्या दे सकेंगे? और जो हमें ही ज्ञात नहीं है, क्या उस बात की शिक्षा, हमारे संबंध में, बच्चे के मन में आदर पैदा करेगी? क्या यह असत्य की शुरुआत न होगी? और क्या असत्य पर भी ईश्वर का ज्ञान कभी खड़ा हो सकता है? और क्या असत्य के ऊपर हम सोच सकते हैं कि बच्चा कभी धार्मिक हो जाएगा?

रोम रोम रस पीजिए-(साधना-शिविर)-प्रवचन-02

रोम रोम रस पीजिए-(साधना-शिविर)
ओशो
दूसरा प्रवचन
अज्ञान का बोध


एक बड़ी राजधानी में राजा की चोरी हो गई थी। सिपाही खोज-खोज कर थक गए थे और चोरी न पकड़ी जा सकी थी। जैसा कि अक्सर ही होता है, चोर हमेशा सिपाही से ज्यादा होशियार साबित होते हैं, वह चोर भी ज्यादा होशियार साबित हुआ। राजा परेशान हो गया, कुछ जरूरी चीज चोरी में चली गई थी, उसका वापस लौटना आवश्यक था। किसी वृद्ध ने कहा कि गांव में एक आदमी है, जो सभी कुछ जानता है।
गांव में एक शेखचिल्ली था, जो सब कुछ जानता था। शेखचिल्ली हमेशा ही सर्वज्ञ होते हैं। वह भी सर्वज्ञ था। ऐसी कोई बात न थी जो वह न जानता हो, ऐसा कोई प्रश्न न था जिसका उत्तर उसके पास न हो।

रोम रोम रस पीजिए-(साधना-शिविर)-प्रवचन-01

रोम रोम रस पीजिए-(साधना-शिविर)
ओशो
पहला प्रवचन


मेरे प्रिय आत्मन्!
एक छोटी सी घटना से आज की बात मैं आपसे कहना चाहूंगा।
एक बहुत बड़े सम्राट की मृत्यु हो गई थी। उसकी अरथी निकाली जा रही थी। लाखों लोग उस अरथी को देखने रास्तों पर इकट्ठे हुए थे। एक बड़ी अजीब बात थी, अरथी के बाहर दोनों हाथ बाहर निकले हुए थे। जो भी देखा उसी के मन में प्रश्न उठा, ऐसी अरथी तो कभी देखी नहीं गई जिसमें लाश के हाथ दोनों बाहर हों। और कोई साधारण आदमी भी नहीं मरा था, एक सम्राट की मृत्यु हो गई थी। हर कोई पूछने लगा, क्या बात है? अरथी के बाहर हाथ क्यों निकले हुए हैं?
और तब धीरे-धीरे पता चला, मरते वक्त उस सम्राट ने...उसका नाम सभी ने सुना होगा: अलेक्जेंडर महान, सिकंदर! मरते वक्त सिकंदर ने कहा था, मेरे हाथ अरथी के बाहर रखे जाएं, ताकि हर कोई यह देख ले कि मेरी मुट्ठियां भी खाली हैं।

शनिवार, 8 अप्रैल 2017

एस धम्मो सनंतनो-(भाग-07)- ओशो



                    एस धम्मो सनंतनो (भाग—7)
ओशो
  (ओशो द्वारा भगवान बुद्ध की सुललित वाणी धम्मपद पर दिए गए
                        दस अमृत प्रवचनों का संकलन)

तुम जिद्द करते हो कि हम अज्ञानी हैं। और बुद्धों का सारा प्रयास यही है समझाना कि तुम नहीं हो; तुम्हारी भ्रांति तोड़नी है। तुम मालिक हो, तुमने गुलाम समझा हुआ है। तुम विराट हो, तुमने छोटे के साथ अपना संबंध बना लिया। आंखें आकाश की तरफ उठाओ, सारा आकाश तुम्हारा है, तुम आंखें जमीन पर गड़ाए खड़े हो। इससे यह नहीं होता कि आकाश तुम्हारा नहीं रहा, सिर्फ तुम्हारी आंखें छोटे में उलझ गयी हैं। मगर आंखों  की क्षमता आकाश को भी समा लेने की है। कितने ही छोटे में उलझे रहो, जिस दिन आंख उठाओगे र उस दिन पूरा आकाश तुम्हारी आंखों में प्रतिबिंबित हो उठेगा।

ओशो
एस धम्‍मो सनंतनो

एस धम्मो सनंतनो-(प्रवचन-060)

एस धम्मो सनंतनो-(भाग-06)--ओशो
जीवित धर्म का उद्गम केंद्र: सदगुरु-(प्रवचन-साठवां) 
सारसूत्र:

हीनं धम्मं न सेवेय्य पमादेन न संवसे।
मिच्छदिट्ठिं न सेवेय्य न सिया लोकवङ्ढनो।।१४६।।

उत्तिट्ठे नप्पमज्जेय्य धम्मं सुचरितं चरे।
धम्मचारी सुखं सेति अस्मिं लोके परम्हि च।।१४७।।

यथा बुब्बुलकं पस्से यथा पस्से मरीचिकं।
एवं लोकं अवेक्खन्तं मच्चुराजा न पस्सति।।१४८।।

एस पस्सथिमं लोकं चित्त राजरथूपमं।
यत्थ बाला विसीदन्ति नत्थि संगो विजानतं।।१४९।।

एस धम्मो सनंतनो-(प्रवचन-059)

एस धम्मो सनंतनो-(भाग-06)-ओशो
प्रवचन-उन्नसठवां  (गुरु को द्वार बनाना दीवार नहीं)


पहला प्रश्न:

आपको मैं क्या कहूं--प्रभु कहूं, विभु कहूं या शंभु कहूं? यह भी इसलिए कि सतत मैं आपके चरणों में नमूं। बस वहां ही मैं त्रिकाल तक नमूं। अब तो मेरी प्रार्थना सुनें!

कहने की बहुत बात नहीं है। क्या तुम मुझे कहते हो, अप्रासंगिक है। मेरे निकट क्या तुम स्वयं को समझ लेते हो, वही महत्वपूर्ण है।
तुम मुझे अच्छे-अच्छे नाम दो, उससे कुछ लाभ न होगा। तुम स्वयं को पहचानो, उससे ही कुछ होने वाला है। मेरी स्तुति से नहीं कुछ, आत्मस्मरण से कुछ होगा। स्तुति में समय खराब मत करो। कितनी तो तुम स्तुति कर चुके, कितने द्वारों पर! कितने मंदिर-मस्जिदों में तुमने प्रार्थना नहीं की, नमाज नहीं पढ़े, झुके नहीं! क्या पाया? हाथ खाली के खाली हैं। अब भीतर झुको। अब जो तुम्हारे भीतर सोया है, उसे जगाओ। अब असली मंदिर में प्रवेश करो। मुझे क्या कहो, इसकी क्या चिंता करनी! कुछ भी कह लो। बिना नाम के भी चल जाएगा।

एस धम्मो सनंतनो-(प्रवचन-058)

एस धम्मो सनंतनो-(भाग-06)
प्रवचन-अट्ठठावनवांं--स्व से होकर राह सर्व को
सारसूत्र:
 
अत्तना' व कतं पापं अत्तजं अत्तसंभवं।
अभिमन्थति दुम्मेधं वजिरं व' स्ममयं मणिं।।१४०।।

यस्सच्चन्तदुस्सल्यिं मालुवा सोलमिवोततं।
करोति सो तथत्तानं यथा' नं इच्छति दिसो।।१४१।।

सुकरानि असाधूनि अत्तनो अहितानि च।
यं वे हितग्च साधुग्च तं वे परमदुक्करं।।१४२।।

यो सासनं अरहतं अरियानं धम्मजीविनं।
पटिक्कोसति दुम्मेधो दिट्ठिं निस्साय पापिकं।
फलानि कट्ठकस्सेव अत्तघग्भय फल्लति।।१४३।।


अत्तना' व कतं पापं अत्तना संकिलिस्सति।
अत्तना अकतं पापं अत्तता' व विसुज्झति।
सुद्धि असुद्धि पच्चतं नाग्भे अग्भ् विसोधये।।१४४।।

अत्तदत्थं परत्थेन बहुनापि न हापये।
अत्तदत्थमभिग्भय सदत्थ पसुतो सिया।।१४५।।

एस धम्मो सनंतनो-(प्रवचन-057)

एस धम्मो सनंतनो-(भाग-06)
न-होना' है जीवन-प्रवचन-सत्तावनवांं 

 पहला प्रशन: 
कल आपने कहा कि ईश्वर को अस्वीकार कर भगवान बुद्ध ने मनुष्य को बड़ी से बड़ी गरिमा से मंडित किया। यही दलील तो नास्तिक भी ईश्वर के खिलाफ पेश करते हैं। फिर दोनों में फर्क क्या है? और क्या ईश्वर को अस्वीकार कर मनुष्य का अहंकार और भी अंधा नहीं होगा?

फर्क बारीक है। समझना चाहोगे, तो ही समझ सकोगे। सहानुभूतिपूर्वक समझोगे, तो ही समझ सकोगे। फर्क मोटा और स्थूल नहीं है।
इसीलिए तो हिंदुओं ने बुद्ध को भी नास्तिक कहा। नास्तिक कहकर भी बुद्ध की महिमा को अस्वीकार करना कठिन था। इसलिए अवतार भी स्वीकार किया। फर्क बड़ा बारीक है। मान भी न सके, इंकार भी न कर सके। बुद्ध को स्वीकार भी न कर सके, क्योंकि बात प्रगट ही नास्तिकता की मालूम होती है। लेकिन बुद्ध की महिमा को, प्रतिभा को, उनकी गरिमा को, उनके प्रकाश को अस्वीकार भी कैसे करें! हिंदू इतने अंधे भी न थे। तो अवतार भी स्वीकार किया।

एस धम्मो सनंतनो-(प्रवचन-056)

एस धम्मो सनंतनो-(भाग-06)
अत्ताहि अत्तनो नाथो--प्रवचन-छप्पपनवां 
सारसूूत्र:
अत्तानं चे पियं अग्भ रक्खेय्य तं सुरक्खितं।
तिण्णमंग्भ्तरं यामं पटिजग्गेय्य पण्डितो।।१३६।।

अत्तानेमेव पठमं पतिरूपे निवेसये।
अथग्भ्मनुसासेय्य न किलिस्सेय्य पण्डितो।।१३७।।

अत्तानग्चे तथा कयिरा यथग्भ्मनुसासति।
सुदन्तो वत दम्मेथ अत्ताहि किर दुद्दमो।।१३८।।

अत्ताहि अत्तनो नाथो कोहि नाथो परो सिया।
अत्तना' व सुदन्तेन नाथं लभति दुल्लभं।।१३९।।

जो घर बारे आपना-(साधना-शिविर)-प्रवचन-08

जो घर बारे आपना-(साधना-शिविर)--ओशो
प्रवचन-आठवां-(योग: कर्म की कुशलता)


प्रश्न: क्या ध्यान का परिणाम केवल धर्म-जीवन के लिए ही उपयोगी है अथवा उसका परिणाम रोज के व्यावहारिक जीवन में भी उपयोगी है? कृपया यह समझाएं।

मूलतः तो धर्म के लिए ही उपयोगी है। लेकिन धर्म व्यक्ति की आत्मा है। और उस आत्मा में परिवर्तन हो, तो व्यवहार अपने आप बदलता ही है। भीतर बदले, तो बाहर बदलाहट आती है। वह बदलाहट लेकिन छाया की भांति है, परिणाम की भांति है। वह पीछे चलती है। जैसे हम किसी से पूछें कि कोई आदमी दौड़े, तो आदमी ही दौड़ेगा या उसकी छाया भी दौड़ेगी? ऐसा ही यह सवाल है। आदमी दौड़ेगा तो छाया तो दौड़ेगी ही। हां, इससे उलटा नहीं हो सकता कि छाया दौड़े तो आदमी दौड़ेगा क्या? पहली तो बात छाया दौड़ नहीं सकती। और अगर दौड़े भी, तो भी आदमी के उसके पीछे दौड़ने का उपाय नहीं है।

जो घर बारे आपना-(साधना-शिविर)-प्रवचन-07

जो घर बारे आपना-(साधना-शिविर)--ओशो
प्रवचन-सातवां-(शक्ति के साथ आनंद भी)


इसके पहले कि हम आज की आखिरी बैठक में प्रवेश करें, ध्यान के संबंध में दो-चार बातें पूछी गई हैं, वह समझ लेना उचित होगा।

एक मित्र ने पूछा है कि घर जाकर हम कैसे इस विधि का उपयोग कर सकेंगे? पास-पड़ोस के लोगों को आवाज, चिल्लाना अजीब सा मालूम होगा। घर के लोगों को भी अजीब सा मालूम होगा।

होगा ही। लेकिन घर के लोगों से भी प्रार्थना कर लें, पास-पड़ोस के लोगों से भी प्रार्थना कर आएं कि एक घंटा मैं ऐसी विधि कर रहा हूं। इस विधि से चिल्लाना, रोना, हंसना, नाचना होगा। आपको तकलीफ हो तो माफ करेंगे। और घर के लोगों को भी निवेदन कर दें। तो ज्यादा अड़चन नहीं होगी।
और एक-दो दिन में लोग परिचित हो जाते हैं, फिर कठिनाई नहीं होती।

जो घर बारे आपना-(साधना-शिविर)-प्रवचन-06

जो घर बारे आपना-(साधना-शिविर)--ओशो
प्रवचन-छट्ठवां-(यही है मार्ग प्रभु का)


मेरे प्रिय आत्मन्!
इसके पहले कि हम ध्यान के प्रयोग में संलग्न हों, एक-दो बातें आपसे कह देनी उचित हैं। आज शिविर का आखिरी दिन है। दो दिनों में बहुत से मित्रों ने पर्याप्त संकल्प का प्रमाण दिया है। शायद थोड़े से ही लोग हैं जो पीछे रह गए हैं। आशा करता हूं कि आज वे भी पीछे नहीं रह जाएंगे। एक-दो मित्र ऐसी स्थिति में आ गए हैं कि आपको परेशानी मालूम पड़ी होगी। लेकिन उससे परेशान न हों। मनुष्य के भीतर नई शक्तियों का जन्म होता है तो सब अस्तव्यस्त और अराजक हो जाता है। इसके पहले कि नई व्यवस्था उपलब्ध हो, बीच में एक संक्रमण का समय होता है, तब करीब-करीब उन्माद की अवस्था जैसी मालूम पड़ती है। लेकिन वह उन्माद नहीं है, वह शिविर के साथ ही विदा हो जाएगा। उससे कोई चिंता न लें।

जो घर बारे आपना-(साधना-शिविर)-प्रवचन-05

जो घर बारे आपना-(साधना-शिविर)--ओशो
प्रवचन-पांचवां-(ध्यान का अनिवार्य तत्व: होश)


बहुत से प्रश्न मित्रों ने पूछे हैं।
एक मित्र ने पूछा है कि रात्रि का ध्यान का प्रयोग क्या एकाग्रता का ही प्रयोग नहीं है? और इस प्रयोग के क्या परिणाम होंगे और क्या आधार हैं?

एकटक आंख को खुली रखना, पहले तो संकल्प का प्रयोग है, आंख को बंद नहीं होने देना। आंख को बंद नहीं होने देना, यह संकल्प का प्रयोग है, विल-पावर का प्रयोग है। और अगर चालीस मिनट तक आंख खुली रख सकते हैं, तो इसके बड़े व्यापक परिणाम होंगे। चालीस मिनट मनुष्य के मन की क्षमता का समय है। इसलिए हम स्कूल में, कालेज में चालीस मिनट का पीरिएड रखते हैं। चालीस मिनट जो काम हो सकता है पूरा, फिर वह कितना ही आगे किया जा सकता है। अगर आप चालीस मिनट तक आंख खुली रख सकते हैं, यह छोटा सा संकल्प पूरा हो सकता है, तो इसके बहुत परिणाम होंगे।

शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017

एस धम्मो सनंतनो-(प्रवचन-055)

मुझे शास्त्र नहीं, अनुभव बनाओ—प्रवचन—पच्चपनवां  

पहला प्रश्न


भगवान श्री, अर्थ तो कमाया, पर शुरूआत ही गलत हो गयी। कोई छह—सात साल का ही था जब कामवासना सक्रिय हो गयी। और दस से छत्तीस की उस तक इस कदर वीर्य स्‍खलितत किया कि कोई हिसाब नहीं! और यह भी बता दूं कि केवल सात महीने ही मां के गर्भ में रहकर मैं बाहर आ गया था। आपका स्वभाव कल से बेचैन है। जब वह वीर्य न बचा सका, तब प्रज्ञा कैसे पैदा हो? तभी तो मूड़ हूं और बिना जाने जानने का दावा करता हूं। संन्यास लेकर भी पलायन ही कर रहा हूं। क्रोध और अहंकार से बुरी तरह ग्रसित हूं। बस चमड़ी—मास ही बढ़ा है। स्वभाव खुद कर—करके हार गया, प्रभु! अब आप ही कछ करें।

हली बात, जो बीता सो बीता। जो हुआ उसे न तो अनहुआ किया जा सकता है, न करने की चेष्टा में व्यर्थ समय गंवाने की कोई जरूरत है। अतीत के लिए रोओ मत, भविष्य के लिए प्रार्थना करो।

एस धम्मो सनंतनो--(प्रवचन-054)

समष्टि से आलिंगन है धर्म—प्रवचन—54


सूत्र:

अप्‍पस्‍सुतायं पुरिसो बलिवद्दो व जीरति।
मंसनि तस्‍स बड्ढन्‍ति पज्‍जा तस्‍स न बड्ढ़ति ।।131।।

अनेक जाति संसार संधविस्‍सं अनिब्‍बिसं।
गहकारकं गवेसंतो दुक्‍खा जाति पुनप्‍पुनं ।।132।।

गहकारक! दिट्ठोसि पुन गेहं न काहसि।
सब्‍बा ते फासुका भग्‍गा गहकूटं विसंखिति।
विसंखारंगतं चितं तण्‍हानं खयमज्‍झगा ।।133।।

अचरित्‍वा ब्रह्मचरियं यलद्धा योब्‍बने धनं।
जण्‍णकोज्‍चा व झायन्‍ति खीनमच्‍छे व पल्‍लल ।।134।।

अचरित्‍वा ब्रह्मचरियं यलद्धा योब्‍बने धनं।
सेन्‍ति चापातिखित्‍ता व पुण्णानि अनुत्‍थनं ।।135।।

एस धम्मो सनंतनो-(प्रवचन-053)

साक्षीभाव : परम सूत्र—(प्रवचन-तरैपनवां)


पहला प्रश्न :


भगवान, आखिर आप कहते वही हैं जो आपको कहना है। फिर इतर बुद्धों की खूंटी का सहारा क्यों लेते हैं? अपनी बात सीधी ही हमसे क्यों नहीं कहते? हमें उलझाते क्यों हैं?

पूछा है स्‍वभाव ने।
बहुत सी बातें समझनी होंगी। पहली बात तो यह है—हजरत प्यार है, प्यार को प्रश्न मत बनाओ!
बुद्धों से लगाव है। लगाव के लिए कोई उत्तर नहीं। जैसे तुम्हें कोई स्त्री पसंद आ जाए, मन भा जाए, कहो कि सुंदर है, बहुत सुंदर है, सिद्ध न कर सकोगे।
प्रेम तर्क से गहरा है। कोई पूछेगा, क्यों प्रेम करते हो, उत्तर न दे सकोगे। जहां तक प्रश्न और उत्तर जाते हैं, उससे आगे की बात है।

बुद्धों से मुझे लगाव है। जब संसार से लगाव हट जाता है, तो लगाव मिट थोड़े ही जाता है। लगाव मिटेगा कैसे? लगाव तो जीवन की ऊर्जा है। संसार से हटता है तो बुद्धों पर लग जाता है। बाजार से हटता है तो मंदिर में खिल जाता है। कामवासना से मुक्त होता है, करुणा बन जाता है।

एस धम्मो सनंतनो-(प्रवचन-052)

सूरज ढलने से पहले दीए को सम्हाल लेना!—(प्रवचन—बावनवां) 


सूत्र:

कोनु हासो किमानंदो निच्‍चं पज्‍जलिते सति।


अंधकारेन ओनद्धा पदीपं न गवेस्‍सथ।।125।।

पस्‍स चित्‍त कतं अरूकायं समुस्‍सितं।
आतुरं बहुसंकप्‍पं यस्‍स नत्‍थि धुवं ठिति।।126।।

पिरजिण्‍णमिदं रूपं रोगनिड्डं पभंगुरं।
भिज्‍जति पूतिसंदेहो मरणन्‍तं हि जीवितं।।127।।

यानि मानि अपत्‍थानि अलाबूनेव सारदे।
कपोतकानिअट्ठीनि तानि दिस्‍वान का रति।।128।।

अट्ठीनं नगरं कतं मंसलोहित लेपनं।
यत्‍थ जरा च मच्‍चूच मानो मक्‍खो च ओहितो।।129।।

जीरंति वे राजस्‍था सुचित्‍ता अथो सरीरम्‍पि जरं उपेति।
सतं च धम्‍मो न जरं उपेति सन्‍तो हवे सब्‍भि पवेदयन्‍ति।।130।।

एस धम्मो सनंतनो-(भाग-06) ओशो


एस धम्मो सनंतनो (भाग—6) ओशो

 (ओशो द्वारा भगवान बुद्ध की सुललित वाणी धम्मपद पर दिए गए नौ अमृत प्रवचनों का संकलन)

 मैं तुम्हें अपने पर नहीं रोकना चाहता। मैं तुम्हारे लिए द्वार बनूं र दीवार न बनूं। तुम मुझसे प्रवेश करो, मुझ पर रुको मत। तुम मुझसे छलांग लो, तुम उड़ो आकाश में। मैं तुम्हें पंख देना चाहता हूं, तुम्हें बाध नहीं लेना चाहता। इसीलिए तुम्हें सारे बुद्धों का आकाश देता हूं। मैं तुम्हारे सारे बंधन तोड़ रहा हूं। इसलिए मेरे साथ तो अगर बहुत हिम्मत हो, तो ही चल पाओगे। अगर कमजोर हो, तो किसी कारागृह को पकड़ो, मेरे पास मत आओ।

वस्तुत: मैं तुम्हें कहीं ले जाना नहीं चाहता, उड़ना सिखाना चाहता हूं। ले जाने की बात ही ओछी है। मैं तुमसे कहता हूं? तुम पहुंचे हुए हो। जरा परों को तौलो, जरा तूफानों में उठो, जरा आंधियों के साथ खेलो, जरा खुले आकाश का आनंद लो। मैं तुमसे यह नहीं कहता कि सिद्धि कहीं भविष्य में है। अगर तुम उड़ सको तो अभी है, यहीं है।

जो घर बारे आपना-(साधना-शिविर)-प्रवचन-04

जो घर बारे आपना-(साधना-शिविर)--ओशो
प्रवचन-चौथा-(अमृत का सागर)


मनुष्य का जीवन बाहर अंधेरे से भरा हुआ है, लेकिन भीतर प्रकाश की कोई सीमा नहीं है। मनुष्य के जीवन की बाहर की परिधि पर मृत्यु है, लेकिन भीतर अमृत का सागर है। मनुष्य के जीवन के बाहर बंधन हैं, लेकिन भीतर मुक्ति है। और जो एक बार भीतर के आनंद को, आलोक को, अमृत को, मुक्ति को जान लेता है, उसके बाहर भी फिर बंधन, अंधकार नहीं रह जाते हैं। हम भीतर से अपरिचित हैं तभी तक जीवन एक अज्ञान है।
ध्यान भीतर से परिचित होने की प्रक्रिया है।
ध्यान मार्ग है स्वयं के भीतर उतरने का। ध्यान सीढ़ी है स्वयं के भीतर उतरने की।

जो घर बारे आपना-(साधना-शिविर)-प्रवचन-03

जो घर बारे आपना-(साधना-शिविर)ओशो
प्रवचन-तीसरा-(संकल्प : संघर्ष का विसर्जन)


मेरे प्रिय आत्मन्!
थोड़े से प्रश्न साधकों ने पूछे हैं, उस संबंध में हम बात करेंगे।

एक मित्र ने पूछा है कि संकल्प की साधना में क्या थोड़ा सा दमन, सप्रेशन नहीं आ जाता है? संकल्प की साधना में क्या थोड़ा काय-क्लेश नहीं आ जाता है?

इस संबंध में दो बातें समझ लेनी जरूरी हैं। एक, कि यदि किसी वृत्ति को दबाने के लिए संकल्प किया है, तब बात दूसरी है। जैसे किसी आदमी को ज्यादा भोजन की आदत है। इस आदत से छुटकारे के लिए अगर उसने उपवास का संकल्प किया है, तब दमन होगा। लेकिन ज्यादा भोजन की न कोई आदत है, न ज्यादा भोजन से लड़ने का कोई खयाल है। तब यदि उपवास का संकल्प किया है तो वह सिर्फ संकल्प है, उसमें दमन नहीं है।