दिनांक: 10 अक्टूबर, 1978;
श्री
रजनीश आश्रम,
पूना।
प्रश्न
सार:
1—शिष्य गुरु
के साथ
गद्दारी
क्यों करते
हैं? विजयानंद
और महेश अभी
आपके विरोध
में कहते हैं।
और एक
संन्यासी
चिन्मय ने
करंट में लिखा
है कि जब मेरे
गुरु राजनीति
के विरुद्ध
बोलते हैं, तब वे धर्म
से नीचे गिरते
हैं; और
साथ—साथ कि
मैं जीवित
शिष्य हूं इसलिए
अपने गुरु के
विरुद्ध कह
सकता हूं।
2—श्रद्धा
क्या है?
3—प्रेम
की
अग्नि—परीक्षा
क्यों ली जाती
है?
4—मैं
शास्त्रीय
संगीत का शौक
रखता हूं। यह
न तो मेरे
पड़ोसियों को
पसंद है, ,. न
मेरे
पत्नी—बच्चों
को, न
परिवार के
अन्य लोगों को
ही। मैं क्या
करूं?
5—मैं
हर चीज से
असंतुष्ट
हूं। क्या
पाऊं जिससे कि
संतोष मिले?






