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रविवार, 9 अप्रैल 2017

रोम रोम रस पीजिए-(साधना-शिविर)-प्रवचन-02

रोम रोम रस पीजिए-(साधना-शिविर)
ओशो
दूसरा प्रवचन
अज्ञान का बोध


एक बड़ी राजधानी में राजा की चोरी हो गई थी। सिपाही खोज-खोज कर थक गए थे और चोरी न पकड़ी जा सकी थी। जैसा कि अक्सर ही होता है, चोर हमेशा सिपाही से ज्यादा होशियार साबित होते हैं, वह चोर भी ज्यादा होशियार साबित हुआ। राजा परेशान हो गया, कुछ जरूरी चीज चोरी में चली गई थी, उसका वापस लौटना आवश्यक था। किसी वृद्ध ने कहा कि गांव में एक आदमी है, जो सभी कुछ जानता है।
गांव में एक शेखचिल्ली था, जो सब कुछ जानता था। शेखचिल्ली हमेशा ही सर्वज्ञ होते हैं। वह भी सर्वज्ञ था। ऐसी कोई बात न थी जो वह न जानता हो, ऐसा कोई प्रश्न न था जिसका उत्तर उसके पास न हो।

अंततः शेखचिल्ली के पास आदमी भेजे गए। उसने कहा, इसमें कौन सी कठिन बात है! मैं बता सकूंगा। लेकिन राजा को ही बताऊंगा। वह भी एकांत में बताऊंगा, वह भी कान में ही बताऊंगा।
एकांत में राजा के पास शेखचिल्ली को ले जाया गया। उस राजा ने पूछा कि बताओ।
उसने कहा, मैं कान में ही बताऊंगा, क्योंकि राजा के मकान की दीवालों का भी कोई भरोसा नहीं, वे भी सुनती हैं।
राजा के कान में उसने कहा, जैसा कि सभी गुरु कान में मंत्र देते हैं, उसने भी कान में यह बात कही, कान के पास ले जाकर उसने कहा, सच में ही बता दूं?
राजा ने कहा, इसीलिए बुलाया है, इसीलिए आमंत्रित किया है।
तो शेखचिल्ली ने कहा कि मैं बताए देता हूं, किसी को तुम मत बताना, अन्यथा मुझ पर मुसीबत आ सकती है।
राजा ने कहा, बताओ भी! बात गुप्त रखी जाएगी।
उस शेखचिल्ली ने कहा, निश्चित ही कहता हूं, किसी चोर ने चोरी की है।
तो राजा बहुत हैरान हुआ, उसने कहा कि यह क्या बताते हो?
वह शेखचिल्ली हंसने लगा और उसने कहा कि अगर मेरी बात गलत है, तो दुनिया में जितने तत्वज्ञानी हुए, उन सबकी भी बात गलत हो गई।
राजा ने कहा, वह कैसे?
उसने कहा, लोग पूछते हैं संसार किसने बनाया है? वे कहते हैं, हम कान में बताएंगे। और कान में वे बताते हैं कि किसी बनाने वाले ने संसार बनाया। सो मैंने भी सोचा कि किसी चोर ने चोरी की है।
राजा ने कहा, चोर का नाम भी तो बताओ!
उसने कहा, चोर क्या काफी नाम नहीं! ऐसा ही वे तत्वज्ञानी कहते हैं कि ईश्वर ने इस दुनिया को बनाया है। किसी बनाने वाले ने दुनिया बनाई है। नाम पूछो तो वे कहते हैं ईश्वर।
उस शेखचिल्ली को वापस भेज दिया गया। लेकिन दुनिया से अभी भी तत्वज्ञानियों को वापस नहीं भेजा गया है।
यह कहानी इसलिए आज की सुबह मैं कह रहा हूं और इससे अपनी बात शुरू करना चाहता हूं, मनुष्य के जीवन में थोथे ज्ञान से ज्यादा खतरनाक और कुछ भी नहीं है। सत्य की उपलब्धि में, जिसे हम ज्ञान जानते हैं, वही बाधा है।
कल रात मैंने आपसे कहा कि जो रुक सकते हैं, वे जान सकेंगे कि सत्य क्या है; जो ठहर सकते हैं, वे जीवन की संपदा को उपलब्ध हो जाते हैं। उस ठहरने की दिशा में पहला चरण, यह जो ज्ञान है हमारा, इससे छुटकारा है।
सुनी होगी यह बात कि लोग कहते हैं, अज्ञान से छूट जाएं; लेकिन मैं आपसे कहना चाहूंगा, ज्ञान से छूट जाएं। और सुनी होगी यह बात कि लोग आपको ज्ञान सिखाने आते हैं और मैं आपको अज्ञान सिखाने के लिए ही यहां हूं। ज्ञान, यह सारा ज्ञान जो मनुष्य के मन में घर कर गया है, इस ज्ञान ने दो काम कर दिए हैं। एक तो उसके भीतर जो अज्ञान है उसे छिपा दिया है। और किसी भी बीमारी का छिप जाना बहुत खतरनाक होता है। क्योंकि तब बीमारी दिखाई नहीं पड़ती और भीतर-भीतर बढ़ती है। और किसी बीमारी का छिप जाना इसलिए भी खतरनाक होता कि उसके उपचार का खयाल भी भूल जाता है। जब बीमारी ही भूल जाती है, तो उसके उपचार का भी खयाल भूल जाता है।
इस ज्ञान ने हमारे अज्ञान को छिपा दिया है। क्या हम ईश्वर को जानते हैं? नहीं जानते। क्या हम स्वयं को जानते हैं? नहीं जानते। ये चारों तरफ जो वृक्ष लगे हैं, इनको हम जानते हैं? रास्ते पर जो पत्थर पड़े हैं, उनको हम जानते हैं? आकाश में जो तारे हैं, उनको हम जानते हैं? पड़ोस में जो हमारे बैठा हुआ प्राण भटक रहा है, उसको हम जानते हैं? क्या हम जानते हैं? पति पत्नी को जानता है? मां बेटे को जानती है? क्या हम जानते हैं?
अज्ञान है हमारा गहन। लेकिन उस अज्ञान को हमने बहुत सी ज्ञानपूर्ण बातों में ढांक लिया है और छिपा लिया है। यह छिपाना बहुत खतरनाक हो गया है। क्योंकि इसकी वजह से अज्ञान की जो पीड़ा, अज्ञान की जो अग्नि, अज्ञान की जो लपटें हमें जलानी चाहिए वे अब नहीं जलाती हैं। हम निश्चिंत हो गए हैं और संतुष्ट हो गए हैं। जो ज्ञान से संतुष्ट हो गया है वह सत्य तक कभी नहीं पहुंच पाएगा। क्योंकि ज्ञान का संतोष, उसके अज्ञान को समाप्त नहीं करता, केवल छिपा देता है।
हम सब अपने अज्ञान को छिपाए बैठे हैं। और इस अज्ञान के छिपाने को हम कहते हैं श्रद्धा; इस अज्ञान के छिपाने को हम कहते हैं विश्वास; इस अज्ञान के छिपाने को हम कहते हैं निष्ठा। हमने अच्छे शब्द खोज लिए हैं। मनुष्य बहुत होशियार है, बुरी बातों के लिए हमेशा अच्छे शब्द खोज लेता है। हमारी श्रद्धा, हमारे विश्वास, हमारी बिलीफ्स क्या हैं? अज्ञान को छिपाने के उपाय हैं। छिपा लिया हमने अपने अज्ञान को।
मैं आपसे पूछूं: ईश्वर को जानते हैं? आपका ज्ञान कहेगा: हां, ईश्वर है, उसी ने दुनिया को बनाया है। लेकिन थोड़ा भीतर देखें, सोचें, आप जानते हैं? नहीं; किसी ग्रंथ में पढ़ा है, किसी गुरु से सुना है, परंपरा कहती है; गीता, कुरान, बाइबिल कहते हैं; महावीर, बुद्ध, कृष्ण कहते हैं; कोई कहता है और उसको हमने स्वीकार कर लिया है।
यह जो इस भांति आया हुआ ज्ञान है, इसने अज्ञान को समाप्त किया है? या कि केवल ढंक दिया है, छिपा दिया है? छिपा दिया है।
अज्ञान छिप गया, यह एक काम किया है इस ज्ञान ने और दूसरा काम यह किया है कि जीवन से, जो रहस्य था, वह तिरोहित हो गया। जीवन में जो मिस्ट्री है, वह विलीन हो गई। जीवन में जो अज्ञात है, जो अननोन है, वह छिप गया, वह भी ढंक गया। जीवन है बिलकुल अज्ञात, कुछ भी उसमें हमें ज्ञात नहीं है। लेकिन हमने कुछ कल्पनाएं और कुछ विश्वास इकट्ठे कर लिए हैं और जीवन का वह जो अज्ञातपन है, वह जो अननोन मिस्ट्री है, वह समाप्त हो गई। हमें ऐसा लगने लगा, जैसे हम जानते हैं।
बुद्ध बारह वर्षों के बाद अपने गांव वापस लौटे थे। तो सारा गांव उन्हें लेने गया था, लेकिन बुद्ध की पत्नी उन्हें लेने नहीं गई। सोचा होगा उसने, जानती हूं भलीभांति इस व्यक्ति को, यही व्यक्ति बारह वर्ष पहले छोड़ कर भाग गया था। क्या था बुद्ध में जो वह जाती लेने? ज्ञात था, सब पता था, नहीं गई।
बुद्ध के पिता लेने गए थे। बुद्ध के पिता ने गांव के बाहर ही बुद्ध को कहा, मेरे द्वार अब भी खुले हैं, अगर वापस लौट आना हो। पिता का हृदय मेरे पास है। तूने जो दुख पहुंचाया, उसको भी क्षमा कर दूंगा। तूने जो पीड़ा दी है बुढ़ापे में, वह भी माफ कर दूंगा। मैंने अभी भी अपने द्वार बंद नहीं किए हैं, वापस लौट आओ। और यह शोभा नहीं देता है! हमारे परिवार में, हमारे वंश में कभी किसी ने भिक्षा नहीं मांगी। और तुम भिक्षा मांगोगे और रास्तों पर भिक्षापात्र लेकर चलोगे?
बुद्ध के पिता क्रोधित थे। लेकिन बुद्ध ने क्या कहा? बुद्ध ने कहा, क्या मैं निवेदन कर सकता हूं कि एक बार मुझे गौर से देखें! क्या मैं वही हूं जो आपके घर से गया था? और क्या आप निश्चित हैं कि जब मैं आपके घर से गया था, तब आप मुझे जानते थे? और अब तो जानने की बात बहुत दूर हो गई, बारह वर्ष में गंगा में बहुत पानी बह चुका है।
बुद्ध के पिता ने गौर से देखा होगा, कहा कि ठीक से जानता हूं! मेरे ही लड़के हो और मैं न जानूं? मेरे ही खून से बने हो और मैं न जानूं? मैंने ही जन्म दिया और मैं न जानूंगा?
तो बुद्ध ने कहा था, निश्चित ही जन्म दिया है आपने, फिर भी जिसे जन्म दिया है वह बहुत अज्ञात है। और निश्चित ही मैं आपसे होकर इस दुनिया में आया हूं, लेकिन केवल इस कारण क्या आप मुझे जान सकेंगे? जिन रास्तों पर से मैं निकला हूं, क्या वे रास्ते मुझे जानते हैं? आप भी एक रास्ता थे, एक मार्ग थे जिससे मैं आया। लेकिन इससे क्या आपने मुझे जान लिया? मैं तो खुद ही अपने को नहीं जानता था, तो आप मुझे कैसे जान पाए होंगे?
लेकिन पिता को लगता है वह पुत्र को जानता है; मां को लगता है वह अपने बेटे को जानती है; पति को लगता है वह अपनी पत्नी को जानता है। हम सारे लोग जानने के भ्रम में हैं। जब कि सच्चाई यह है कि हम अपने को भी नहीं जानते हैं, तो हम दूसरे को कैसे जान सकेंगे?
चारों तरफ जो जीवन विस्तीर्ण है, वह बिलकुल अज्ञात है, बिलकुल अननोन है। लेकिन हमने जानने के थेगड़े लगा लिए हैं, और हम सोचते हैं कि जानना हो गया। जिस आदमी को यह खयाल पैदा हो गया हो कि उसने जान लिया है कुछ, उसकी जानने की यात्रा आगे के लिए बंद हो जाती है। इसलिए मैं कहता हूं कि आज की सुबह तो मैं अज्ञान के संबंध में कुछ कहूंगा। जो आदमी यह जान लेता है कि मैं बिलकुल नहीं जानता हूं, उसकी जानने की यात्रा का द्वार खुल जाता है।
अज्ञान की सहज प्रतीति, वह जो इग्नोरेंस है हमारे भीतर, उसका सहज स्वीकार, उसका सहज अनुभव। और उस सारे ज्ञान को हटा देना जो उस अज्ञान को ढांकता हो। तो दो बातें घटित हो जाएंगी। एक तो ज्ञान से जो स्वयं के भीतर का अज्ञान ढंका है, वह उघड़ आएगा; और ज्ञान से बाहर का जो रहस्य ढंक गया है, वह फिर रहस्यपूर्ण हो जाएगा। जिन चीजों को भी हम जानते प्रतीत होने लगते हैं, वे हमारे लिए रहस्यमय नहीं रह जाती हैं।
यहां नये मित्र आए हैं, इस जगह को देख कर उन्हें आनंद होगा। क्यों? क्योंकि यह जगह बड़ी नई है और बड़ी रहस्यपूर्ण मालूम होगी। इसके वृक्ष नये हैं, इसकी हवाएं नई हैं। लेकिन जो यहां रहते हैं उनके लिए यह रहस्य समाप्त हो गया होगा। लोग कश्मीर देखने जाते हैं और हिमालय। लेकिन जो वहां रहता है, वहां उसे कुछ भी नहीं दिखाई पड़ता। उसे यह खयाल पैदा हो गया कि वह जानता है।
कवि बायरन ने अंतिम दिनों में शादी की थी। जिस स्त्री से उसने शादी की, उसके पीछे महीनों पागल रहा था। बड़ी कठिनाई थी विवाह के होने में। लेकिन अंततः वह जीत गया और विवाह हो सका। वह चर्च से अपनी नई-नई विवाहित पत्नी का हाथ पकड़ कर सीढ़ियां नीचे उतरता था। अभी चर्च की घंटियां बज रही थीं जो उसके विवाह की खुशी में बजाई गईं, और अभी वे मोमबत्तियां नहीं बुझी थीं जो जलाई गई थीं। सीढ़ियों पर हाथ पकड़े उतरता था, जाकर गाड़ी में अपनी पत्नी को हाथ पकड़ कर बिठाता था, और तभी एक दूसरी स्त्री सड़क पर उसे दिखाई पड़ी--और एक क्षण को उसकी पत्नी विलीन हो गई और दूसरी स्त्री ही उसकी आंखों में आ गई। वह भूल गया कि उसकी पत्नी का हाथ उसके हाथ में है--उस पत्नी का जिसके लिए वह वर्षों से पागल था और न मिलती तो शायद आत्महत्या कर लेता या पागल हो जाता या न मालूम क्या करता!
क्षण भर बाद उसे खयाल आया, वह दूसरी स्त्री निकल चुकी थी, उसने अपनी पत्नी से कहा कि बड़ी हैरानी की बात हो गई है! जैसे ही तुम से मेरा विवाह पूरा हो गया, मैं पाता हूं कि अब तुममें मेरा कोई, तुममें मुझे कुछ रसपूर्ण नहीं मालूम हो रहा है। तुम्हें पाने की सारी आकांक्षा विलीन हो गई है। और अभी एक क्षण मुझे कोई दूसरी स्त्री दिखाई पड़ी और एक क्षण में तुम मेरे लिए मिट गईं, और मेरे मन की एक कामना ने उसका पीछा किया, और मैंने एक क्षण में उसे पाने का सपना देखा, और तुम मेरे लिए नहीं थीं! और मैं जानता हूं, अगर तुम से मेरा विवाह न होता तो जीवन भर मैं तुम्हारे सपने देखता, शायद जी भी न सकता!
शायद बायरन को भी समझ में नहीं आया होगा कि क्या बात हो गई। बात यह हो गई थी कि जिसे हम पा लेते हैं और जिसके संबंध में खयाल होता है कि हमने जाना, उसके भीतर से सारी मिस्ट्री, सारा रहस्य विलीन हो जाता है। यही तो सारे जीवन की दौड़ है! जिस चीज को हम नहीं पाते हैं, उसमें रस मालूम होता है, अर्थ मालूम होता है। पा लेते हैं, रस विलीन हो जाता है, अर्थ भी विलीन हो जाता है। क्योंकि हमें लगता है कि पा लिया, जान लिया, हो गया।
लेकिन ऐसी चित्त की जो स्थिति है, जो इस भांति जान लेती है, महज परिचय को ज्ञान समझ लेती है, ऐसी चित्त की स्थिति जड़ हो जाती है, उसकी संवेदनशीलता खो जाती है, उसका रहस्य खो जाता है। और जिस व्यक्ति के जीवन में रहस्य खो जाता है, उसके जीवन में धर्म का कोई स्थान नहीं हो सकता है। वह कितना ही राम-राम जपे, उसके राम-राम जपने का कोई अर्थ नहीं है। वह कितनी ही गीता और कुरान पढ़े, उसका भी कोई अर्थ नहीं है। अगर समग्र जीवन उसे रहस्यपूर्ण नहीं प्रतीत होता है, तो उसकी इन सारी बातों का कोई अर्थ नहीं है।
जीवन की जो रहस्यात्मकता है, जीवन का जो अनजानापन है, जीवन का जो अपरिचय है वही, जीवन में जो अज्ञात है वही, उसको ही जब हृदय में द्वार मिलता है तो परमात्मा की या सत्य की प्रतीति होनी शुरू होती है। इसलिए मैं कहूं, ज्ञानी कभी परमात्मा को नहीं जान पाते हैं। पंडितों का परमात्मा से आज तक कोई संबंध नहीं हुआ और न आगे हो सकेगा। नहीं हुआ इसीलिए, न हो सकेगा इसीलिए क्योंकि वे इस भ्रम में हैं कि वे जानते हैं।
सुकरात के मरने के कुछ दो-चार महीने पहले की घटना है। एक व्यक्ति को आती थी देवी, वह आवेश में आकर व्यक्ति कुछ कहता था। लोग जो पूछते थे उसके उत्तर देता था। किसी ने यह पूछा कि एथेंस में सबसे बड़ा ज्ञानी कौन है? तो उस आविष्ट व्यक्ति ने कहा कि सुकरात। लोग सुकरात के पास गए और उन्होंने सुकरात से कहा कि घोषणा हुई है कि तुम ही सबसे बड़े ज्ञानी हो।
सुकरात ने कहा कि जाओ और कहना कि जरूर कोई भूल हो गई है। जब मैं छोटा बच्चा था तो मुझे लगता था कि मैं बहुत कुछ जानता हूं। जब मैं जवान हुआ तो मेरे जानने के भवन की बहुत सी ईंटें गिर गईं, बहुत सी दीवालें गिर गईं। जानने का भवन खंडहर हो गया। जवानी में मैंने जाना कि बहुत अल्प है जो मैं जानता हूं। लेकिन जब से मैं बूढ़ा होना शुरू हुआ, अब तो भवन बिलकुल गिर गया है और अब कोई भवन नहीं है। अब मैं जानता हूं कि कुछ भी नहीं जानता हूं। तो जाओ और कह देना कि सुकरात तो है महाअज्ञानी। भूल हो गई है कोई जो तुमने कहा कि एथेंस में सबसे बड़ा ज्ञानी वही है। वह तो है महाअज्ञानी।
वे लोग वापस लौटे और उस आविष्ट व्यक्ति को जाकर कहा कि भूल हो गई है कोई, सुकरात तो खुद कहता है कि मैं महाअज्ञानी हूं।
उस आविष्ट व्यक्ति ने कहा, इसीलिए! इसीलिए तो कहा कि उससे बड़ा और कोई ज्ञानी नहीं।
जिसे अपने अज्ञान का बोध होता है, पूरे अज्ञान का बोध होता है, उसके जीवन में एक क्रांति घटित हो जाती है। और उस क्रांति से जो वह जान पाता है, वही जानना है, वही ज्ञान है। बाकी सब झूठा है, बाकी सब अज्ञान है।
सत्य की खोज में या स्वयं की खोज में पहला बिंदु अज्ञान का बोध है। क्या अज्ञान का बोध हमें है?
न तो आस्तिक को होता है अज्ञान का बोध, न नास्तिक को होता है। आस्तिक कहता है, ईश्वर है। नास्तिक कहता है, ईश्वर नहीं है। दोनों जानते हुए मालूम पड़ते हैं। नहीं; उन्हें बोध नहीं होता। जिसे अज्ञान का बोध होता है वह तो न यह कह सकता है कि क्या है...
जो अत्यंत अज्ञात है, जीवन है उससे संबंधित ।
सुकरात ने जीवन भर जिस भवन को गिराया, हम तो उस भवन को मजबूत बनाते हैं, और बड़ा बनाते हैं। हम तो बचपन में अज्ञानी होते हैं, बूढ़े होते-होते ज्ञानी हो जाते हैं। सुकरात तो बड़ा गड़बड़ रहा होगा, बचपन में ज्ञानी था, बूढ़ा हुआ तो अज्ञानी हो गया।
लेकिन मुझे भी यही दिखाई पड़ता है। बचपन में ज्ञान हो तब तो ठीक। ज्ञानी होना चाइल्डिश होना है, बचकाना होना है। तो बचपन में तो शोभा देता है कि किसी को यह भ्रम हो कि मैं जानता हूं। लेकिन बुढ़ापे में यह शोभा नहीं देता। जो ठीक से बूढ़ा होता है, उसका ज्ञान विलीन होता जाता है उम्र के साथ ही साथ। बूढ़ा होते-होते वह निपट अज्ञानी हो जाता है। उसे कुछ भी ज्ञात नहीं होता कि मैं जानता हूं। यही ठीक और सम्यक विकास है। इसका अर्थ हुआ कि वह प्रौढ़ हो गया, वह वृद्ध हो गया, वह बच्चा नहीं रहा।
लाओत्से के संबंध में बड़ी प्रसिद्ध बात है कि वह बूढ़ा ही पैदा हुआ था। बड़ी अजीब बात है कि कोई आदमी बूढ़ा ही पैदा हो! क्या उसके लक्षण रहे होंगे बूढ़े पैदा होने के? बाद में जब किसी ने उससे पूछा कि यह अफवाह सुनी जाती है कि तुम बूढ़े ही पैदा हुए थे! तो लाओत्से ने कहा, हां, मुझे बचपन में भी यह भ्रम नहीं था कि मैं जानता हूं।
लेकिन ऐसे बच्चे खोजने तो कठिन हैं, जिनको यह भ्रम न हो कि मैं जानता हूं। दुर्भाग्य तो यह हो गया है, ऐसे बूढ़े खोजने भी कठिन हो गए हैं।
जैसे-जैसे जीवन का बोध विकसित होता है, वैसे-वैसे यह दिखाई पड़ेगा कि मनुष्य तो है बहुत छोटा और जीवन है बहुत बड़ा। हमारी बुद्धि तो है जरा सी और सत्य है बहुत विराट, असीम और अनंत। कैसे हम जान सकेंगे? कैसे हो सकेगा जानना? और यह जानना, क्या सिवाय हमारे अहंकार के कुछ और है?
नहीं; जानना नहीं हो सकता है इस भांति। लेकिन हम इकट्ठा करते रहते हैं। हम गीता कंठस्थ करते हैं और ज्ञानी हो जाते है। हम कुरान पढ़ लेते हैं और ज्ञानी हो जाते हैं। हम कुछ शब्द दोहराना सीख जाते हैं और ज्ञानी हो जाते हैं। हम कुछ रिपीट करना सीख जाते हैं--उपनिषद के वचन, और वेदों के वाक्य, और महावीर और बुद्ध की वाणी, और संतों के वचन हमें याद हो जाते हैं--और हम ज्ञानी हो जाते हैं। ज्ञानी हम इतने सस्ते में हो जाते हैं जिसका कोई हिसाब नहीं है। थोड़ा सा हम पढ़-लिख लेते हैं और हम जानने वाले हो जाते हैं। और जो नहीं पढ़े-लिखे होते हैं उनके हम गुरु हो जाते हैं। और उन्हें हम नीचा देखने लगते हैं और खुद को ऊंचा देखने लगते हैं।
यह सारा जानना अहंकार की सजावट है, और कुछ भी नहीं। और अहंकार जितना पुष्ट हो जाता है उतनी ही कठिनाई हो जाती है, उतनी ही कठिनाई हो जाती है। क्योंकि उतनी ही हमारे भीतर जड़ता हो जाती है, उतनी ही संवेदनशीलता क्षीण हो जाती है, उतनी ही जीवन से जुड़ने की क्षमता क्षीण हो जाती है, उतने ही हम अपात्र हो जाते हैं।
तो यह जो हमारा मन है, जो गीता को कंठस्थ करता है, उपनिषद सीखता है, बाइबिल और कुरान सीख लेता है, यह मन कभी परमात्मा को नहीं जान सकेगा, कभी नहीं जान सकेगा। क्योंकि यह जो भी जानने लगता है, जिससे खयाल पैदा हो जाता है कि मैं जान रहा हूं, वह खयाल बिलकुल झूठा है। शब्दों को जानने से सत्य नहीं जाना जाता है। शब्दों के जानने से प्रेम नहीं जाना जा सकता, शब्दों के जानने से परमात्मा नहीं जाना जा सकता। लेकिन शब्दों का बड़ा जाल है और वही हमारा ज्ञान है।
एक बाउल फकीर था बंगाल में। बाउल फकीर तो नाचते हैं, गीत गाते हैं और प्रेम की बातें करते हैं। बाउल फकीर ज्ञानी नहीं होते हैं। ऐसा कोई भी फकीर कभी ज्ञानी नहीं होता है। और अगर ज्ञानी हो तो जानना चाहिए वह फकीर नहीं है। उस बाउल फकीर के पास एक बहुत बड़ा पंडित पहुंचा। वैष्णव पंडित था। शास्त्र उसे कंठस्थ थे, दूर-दूर तक उसकी ख्याति थी। वह गया और उसने उस फकीर को कहा कि मैंने सुना है कि तुम प्रेम की बातें करते हो, लेकिन तुम्हें पता भी है कि प्रेम कितने प्रकार का होता है?
स्वभावतः, पंडित हमेशा प्रकार की भाषा में पूछता है। वह कहता है, प्रेम कितने प्रकार का होता है? कौन से वाले परमात्मा को मानते हो--हिंदू के कि मुसलमान के? कितने प्रकार के परमात्मा होते हैं? कौन से सत्य को मानते हो--गीता के कि कुरान के? वह तो हमेशा प्रकार में पूछता है। पंडित की भाषा प्रकार की भाषा होती है। तो उसने भी पूछा। इसमें नाराज होने की कोई भी बात नहीं, हंसने की भी कोई बात नहीं, पंडित हमेशा ऐसे ही पूछता रहा है।
उसने पूछा उस फकीर को कि प्रेम कितने प्रकार का होता है? प्रेम-प्रेम लगाए रहते हो दिन-रात! जानते हो प्रेम कितने प्रकार का होता है?
वह फकीर बड़ी मुश्किल में पड़ गया। उसने कहा कि प्रेम तो मैंने जाना, लेकिन प्रकार का मुझे आज तक पता नहीं चला। प्रेम तो मैंने जरूर जाना, लेकिन प्रकार मेरे रास्ते में नहीं आए। तुम ही मुझे ज्ञान दो! तुम ही मुझे बताओ!
उस पंडित ने अपने झोले में से एक किताब निकाली। और पंडित हमेशा किताब साथ रखते हैं। कुछ झोले में रखते हैं; जो बहुत मजबूत होते हैं, ताकतवर होते हैं, वे सिर में रखते हैं। कुछ झोले में, कमजोर जो होते हैं वे झोले में रखते हैं। कुछ जरा स्मृति जिनकी अच्छी होती है वे सिर में रख लेते हैं। लेकिन झोले पर वजन कम पड़ता है, सिर में वजन ज्यादा पड़ता है। क्योंकि सिर बड़ी छोटी जगह है और उसमें बहुत किताबें हो जाती हैं तो सिर बहुत बोझिल हो जाता है, भारी हो जाता है। इसलिए झोले में ही रखना अच्छा है। लेकिन झोले वाले पंडित को लोग छोटा पंडित समझते हैं। इसलिए असली पंडित सिर में रखते हैं।
उसने झोले से अपनी किताब निकाली। वह पूरा पंडित न रहा होगा, नहीं तो फकीर के पास जाता ही क्यों? थोड़ा कम रहा होगा, झोले में किताब रखता था, इसलिए गया था फकीर के पास। उसने किताब निकाली और कुछ सूत्र किताब में से पढ़ कर बताए और कहा कि प्रेम पांच प्रकार का होता है। और सूत्र पढ़ कर सुनाए, उनकी व्याख्या की और समझाया। और पीछे उस फकीर को पूछा कि कहो, कैसा लगा? ठीक है या कि गलत?
वह फकीर खड़े होकर नाचने लगा। बड़ी ठीक तो बात न थी यह। क्योंकि पंडित आया था विवाद को और नाच कर उत्तर देना किसी भी तरह उचित न था। लेकिन फकीरों के अपने रास्ते हैं उत्तर देने के। वह नाचने लगा और उसने एक गीत गाया। और उस गीत में उसने जो कहा वह बहुत अदभुत है। उसने उस गीत में कहा कि हे पंडित, हे ज्ञानी, तुम्हारी बातें सुन कर मुझे कैसा लगा, पूछते हो? मुझे वैसा लगा जैसा एक बार एक सर्राफ सोने के कसने के पत्थर को लेकर फूलों की बगिया में चला गया था और फूलों को पत्थर पर कस-कस कर देखने लगा था कि कौन सा फूल सच्चा, कौन सा फूल झूठा! तो बगीचे के माली को जैसा लगा था, वैसा ही मुझको भी लगा। जब तुम प्रेम के प्रकार बताने लगे और तर्क पर कस-कस कर समझाने लगे, तो मुझे वैसा ही लगा जैसे कोई सोने के कसने के पत्थर को ले जाए फूलों की बगिया में और फूलों को कस-कस कर देखने लगे, मुझे वैसे ही लगा।
उस पंडित ने समझा होगा--पागल है। पंडित हमेशा, जो प्रेम करते हैं, उनको पागल समझता रहा है। क्योंकि पंडित तो प्रेम को जानता नहीं। उठ कर चला गया होगा कि ऐसे आदमी से क्या बात करनी! लेकिन जो उस फकीर ने कहा था वह बहुत अदभुत था। प्रेम में प्रकार कहां! और जो प्रेम के प्रकारों को जानता है, वह प्रेम को कभी नहीं जानेगा! क्योंकि प्रेम के संबंध में उसने कुछ शब्द सीख लिए हैं। शब्दों का अपना गणित है, अपना जाल है। शब्दों की अपनी कुशलता है, अपनी कला है। और हम सारे लोग शब्दों को सीखे बैठे हुए हैं। और इन शब्दों को सीख लेने को ही हमने जाना है ज्ञान।
यही शब्द हमारी बाधा बन गए हैं, यही शब्द रुकावट बन गए हैं। यही है दीवाल जो हमें तोड़ती है, उससे जो चारों तरफ हमारे मौजूद है। शब्दों की इस दीवाल को गिरा देना होगा, शब्दों की इस दीवाल को मिटा देना होगा। सिद्धांतों और शब्दों की इस दीवाल ने तो हिंदू और मुसलमान खड़े किए हैं, जैन और ईसाई, बौद्ध और पारसी खड़े कर दिए हैं। क्योंकि सबकी शब्दों की दीवाल अलग-अलग है, इसलिए वे अलग-अलग हैं। और फासला क्या है? मेरे और आपके बीच शब्दों के अतिरिक्त और क्या फासला है? एक हिंदू और मुसलमान के बीच शब्दों के अलावा और कौन सी दीवाल है? एक ने कुरान के शब्द सीखे हैं, एक ने गीता के शब्द सीखे हैं। उनके शब्द अलग-अलग हैं, इसलिए दो आदमी अलग-अलग हो गए हैं। और शब्दों पर हजारों वर्ष से मनुष्यता लड़ रही है। आदमी की हत्या कर रही है शब्दों के लिए। कि वे कहते हैं, गीता के शब्द सच्चे हैं और कुरान के गलत। इस पर लड़ाई चल रही है, इस पर हत्याएं हो रही हैं। इस पर हत्याएं होती रही हैं, मंदिर और मस्जिद जलते रहे हैं और आदमी को मिटाया जाता रहा है। और ये शब्द जो मनुष्य को मनुष्य से तोड़ देते हों, ये शब्द मनुष्य को परमात्मा से कैसे जोड़ेंगे?
शब्द नहीं जोड़ सकता परमात्मा से मनुष्य को! शब्द तो आदमी को आदमी तक से तोड़ देता है! तो जो आदमी को आदमी से तोड़ देता है, वह मनुष्य और परमात्मा के बीच जोड़ने वाली कड़ी कभी नहीं बन सकेगा।
निःशब्द जोड़ता है मनुष्य को परमात्मा से। और निःशब्द ही जोड़ता है मनुष्य को मनुष्य से। जब भी हम किसी के प्रति निःशब्द और मौन हो जाते हैं तभी हम जुड़ते हैं। इसीलिए प्रेम में शब्द खोजने कठिन हो जाते हैं। जिसे हम प्रेम करते हैं उससे बात करनी कठिन हो जाती है कि क्या बात करें! उसके बीच, हमारे बीच शब्द खो जाते हैं। जिसे हम प्रेम करते हैं उसके-हमारे बीच शब्द गिर जाते हैं। और जब शब्द गिर जाते हैं तो हृदय हृदय तक पहुंचता है। शब्द तो केवल बुद्धि का व्यापार है। और बुद्धि तोड़ती है, जोड़ती कभी भी नहीं। हृदय जोड़ता है। हृदय के पास कोई शब्द नहीं है। पंडित सिर्फ बुद्धि रह जाता है, उसका हृदय खो जाता है।
तो यह जो दीवाल है शब्द की, सिद्धांत की, इसे खो देना होगा।
लेकिन हम तो इसी को सीखते फिरते हैं। हो सकता है कुछ मित्र यहां भी आए हों, कि यहां से भी कुछ शब्द सीख कर चले जाएं। तो फिर वे और दीवाल को मजबूत कर लेंगे।
यहां तो दीवाल को तोड़ने की कोशिश करनी है तीन दिनों में। अगर यहां से आप निपट अज्ञानी होकर चले जाएं तो काम पूरा हो गया। यहां से जाते वक्त अगर आपको ऐसा लगने लगे कि मैं कुछ भी नहीं जानता हूं, तो काम पूरा हो गया।
यह जो स्टेट ऑफ नॉट-नोइंग है, यह जो न जानने की भाव-दशा है, यह धार्मिक चित्त की पहली सीढ़ी है--न जानने की भाव-दशा। न जानने में आदमी एकदम सरल हो जाता है, जानने में जटिल हो जाता है। और जानना बिलकुल असत्य है और न जानना बिलकुल सत्य है। यह तथ्य है कि हम नहीं जानते और यह बिलकुल कल्पना है कि हम जानते हैं।
लेकिन बड़ी कठिनाई है इस दीवाल को तोड़ने में। सबसे बड़ी कठिनाई तो यह है कि कोई भी अपने को अज्ञानी नहीं मानना चाहता है, नहीं जानना चाहता है। हम सब अपने को ज्ञानी जानना चाहते हैं। हम सब अपने को ज्ञानी जानना चाहते हैं। कौन है राजी जो इस बात के लिए राजी हो कि मैं अज्ञानी हूं।
टॉल्सटॉय एक दिन सुबह-सुबह चर्च में गया। गांव का एक बहुत बड़ा पंडित, धनी और बहुत ख्यातिप्राप्त व्यक्ति भी चर्च में पहले से मौजूद था। रविवार का दिन था और वह सुबह ही चर्च में आकर भगवान से प्रार्थना कर रहा था। अंधेरा था। टॉल्सटॉय भी पीछे खड़ा हो गया। वह जो गांव का बहुत प्रसिद्ध व्यक्ति था, वह हाथ जोड़ कर परमात्मा से कह रहा था कि हे परम प्रभु, मैं तो बिलकुल अज्ञानी हूं; मैं तो कुछ भी नहीं जानता; मैं तो पापी हूं; मैंने तो बहुत पाप किए। वह ये सारी बातें कह रहा था।
टॉल्सटॉय ने सुना, टॉल्सटॉय बहुत प्रसन्न हुआ, बहुत हैरान भी हुआ। उसने कहा कि यह तो हमें पता ही नहीं था कि यह पंडित जो है यह भी अज्ञानी है! जाएं हम जल्दी और गांव में खबर कर दें कि हम भ्रम में पड़े थे कि यह आदमी पंडित है। यह आदमी चर्च में भगवान से कह रहा था कि मैं अज्ञानी हूं। और हम भ्रम में थे कि हम इसको समझते थे कि बड़ा पुण्यात्मा है। यह तो वहां कह रहा था कि मैं महापापी हूं।
वह आदमी निकला और टॉल्सटॉय भी उसके पीछे निकला। सुबह होने लगी थी, गांव जगने लगा था, लोग चलने लगे थे। चौरस्ते पर जब गांव के पहुंचे, तो टॉल्सटॉय ने कहा कि रुको भई! उस पंडित को कहा कि ठहरो! तुमने जो चर्च में कहा था, मैं यहां चौरस्ते पर इन लोगों को इकट्ठा करके बता दूं। पूरा गांव भ्रम में पड़ा हुआ है कि तुम ज्ञानी हो और तुम पुण्यात्मा हो।
उस आदमी ने कहा कि चुप! अगर उस बात को यहां कहा तो अदालत में मुकदमा चलवाऊंगा। वह मेरे और परमात्मा के बीच की बात है। उसे यहां सब के बीच कहने की जरूरत नहीं है।
हम सारे लोग भी अपने और परमात्मा के बीच भलीभांति जानते हैं कि अज्ञानी हैं, भलीभांति जानते हैं, भलीभांति जानते हैं कि बिलकुल अज्ञानी हैं। लेकिन सबके सामने कौन कहे? चौरस्ते पर कौन कहे? बाजार में कौन कहे? और इसीलिए दुनिया में झूठा ज्ञान बढ़ता चला जाता है। बाप अपने बेटे को दे देता है, जिन बातों को वह खुद नहीं जानता था, वह अपने बेटे को सम्हाल लेता है। बेटा पूछता है, दुनिया किसने बनाई? बाप कहता है, भगवान ने। और बेटा अगर शक करे, तो वह कहता है, बिगड़ गए हो, कलियुग आ गया है। हम जानते हैं और तुम शक करते हो! और वह खुद भी नहीं जानता! और इस भांति ज्ञान के नाम से महाअज्ञान पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता चला जाता है। अब यह सारी दुनिया परेशान हो गई है, पांच-छह हजार वर्ष का इसी तरह का अज्ञान सबके चित्त पर इकट्ठा हो गया है। बाप बेटे को दे देता है, बेटा फिर बेटों को दे देता है और देता चला जाता है। और कोई यह स्वीकार नहीं करता अपनी सरलता में कि मैं नहीं जानता हूं।
लेकिन जो इसको स्वीकार नहीं करता पूरी सरलता में, पूरी समग्रता में, वह कभी जानने में समर्थ नहीं हो सकेगा। इस जानने के अहंकार को तो खोना ही होगा। और इसे खोने में कुछ खोना नहीं है, यह केवल वहम है कि हम जानते हैं। थोड़ा इसे सोचें, थोड़ा विचार करें, तो दिखाई पड़ना शुरू हो जाएगा--नहीं जानते हैं, नहीं जानते हैं। विश्वास कर लिया है। और सैकड़ों वर्षों से समझाया गया है:विश्वास करो। और विश्वास के नीचे अंधेरा छिपा है, उसे मत देखो। विश्वास के पीछे संदेह छिपा है, उसे मत देखो। और इस भांति हमने एक अजीब अपने मन की स्थिति बना ली है। अंधकार को छिपा दिया, संदेह को छिपा दिया, विश्वास के वस्त्र ओढ़ लिए हैं और ज्ञान के वस्त्र ओढ़ लिए हैं।
यह स्थिति शुभ नहीं है। क्या करना होगा इसको छोड़ने को? कुछ करना नहीं होगा, सिर्फ इस सत्य को देख लेना पर्याप्त है इसके छूट जाने के लिए। और जब भी आप ज्ञान की बातें बोलने लगें तो थोड़ा सजग होना जरूरी है कि जिन बातों को आप नहीं जानते हैं उन्हें कह रहे हैं। जिन बातों से आपका कोई संबंध नहीं है, कोई नाता नहीं है, उन्हें आप इस भांति कह रहे हैं जैसे वे सत्य हों। सजग होना थोड़ा सा जरूरी है। और चित्त में अपने थोड़ा सा इसकी खोज कर लेनी जरूरी है कि मेरा ज्ञान कहां है? वहां कोई जड़ें न पाई जाएंगी, वहां ज्ञान की कोई जड़ें न होंगी। ऊपर से खोंसे हुए पत्ते हैं, ऊपर से लगाए हुए फूल हैं, कागज के हैं, झूठे हैं। इस ज्ञान को तो छोड़ देना जरूरी है।
तो मैं आपसे नहीं कहता आप संसार छोड़ दें; मैं आपसे नहीं कहता आप पत्नी को छोड़ दें, बच्चों को छोड़ दें; मैं आपसे नहीं कहता जीवन को छोड़ कर पहाड़ों पर चले जाएं। मैं आपसे कहता हूं, अहंकार के पहाड़ से थोड़ा नीचे उतर आएं। यह जानने के पहाड़ पर जहां बैठे हुए हैं उससे थोड़ा नीचे उतर आएं, यह जानने का पहाड़ बिलकुल झूठा है। जमीन पर आ जाएं। बहुत गहरी सच्चाई है यह सीधा-सीधा जानना--कि नहीं जानते हैं।
और अगर यह दिखाई पड़ना शुरू हो जाए तो यही जीवन, यही जीवन दूसरा हो जाएगा, क्योंकि आपकी दृष्टि दूसरी हो जाएगी। यही पौधे, यही पक्षियों की आवाज, किसी दूर के रहस्यपूर्ण संगीत को लाने लगेगी। यही हवाएं किसी परमात्मा की खबर बन जाएंगी। यही आसपास बैठे हुए लोग कुछ और ही दिखाई पड़ने लगेंगे। अभी जानने के खयाल से इनको देखा है, ये कुछ और दिखाई पड़ते हैं। न जानने के स्थान से इनको देखेंगे, ये कुछ और हो जाएंगे। यह सब कुछ रहस्यपूर्ण हो जाएगा। यह सारी एक मिस्ट्री हो जाएगी।
एडीसन एक गांव में गया था। उस गांव के बच्चों ने, छोटा स्कूल था, बिजली के कुछ छोटे-छोटे उपकरण बनाए थे। एडीसन को दिखाने वे ले गए। उन्हें पता भी नहीं था कि बिजली के संबंध में एडीसन जितना जानता है, उतना कोई भी जमीन पर नहीं जानता। गांव के छोटे बच्चे थे, उन्होंने एडीसन को कहा कि आप भी चलें। एडीसन गया। एडीसन ने यह नहीं कहा कि मैं तो विद्युत को भलीभांति जानता हूं, तुम मुझे क्या दिखाओगे!
एडीसन कोई पंडित नहीं था। गया। उनके छोटे-छोटे खिलौने, उन्होंने बिजली से चलने वाली गाड़ी बनाई थी, बिजली से चलने वाला पंखा बनाया था, कुछ और बनाया था, वे सब उसने देखे और बहुत खुश हुआ। और आखिर में उसने कहा कि मेरे बच्चो, तुमने बहुत गजब का काम किया, बड़ी अच्छी चीजें बनाईं। क्या मैं तुमसे पूछ सकता हूं, व्हाट इज़ इलेक्ट्रिसिटी? यह बिजली क्या है, क्या तुम मुझ बताओगे?
वे बच्चे ठगे रह गए, खड़े रह गए। उनके अध्यापक भी ठगे रह गए। बिजली क्या है? और बड़े दुखी हुए मन में कि हम बड़े अज्ञानी हैं, इतनी सी बात का उत्तर नहीं दे पा रहे। तो एडीसन ने कहा, चिंतित मत होओ, चिंतित मत होओ। शायद पूरी जमीन पर विद्युत के संबंध में जितना काम मैं करता रहा हूं, किसी ने भी नहीं किया, लेकिन मैं भी नहीं जानता कि विद्युत क्या है! मैं भी नहीं जानता हूं कि विद्युत क्या है! हां, हम विद्युत का उपयोग करना जान गए हैं। विद्युत क्या है, मुझे भी पता नहीं!
यह आदमी धार्मिक आदमी है, यह जो कह सका विद्युत के बाबत कि मैं नहीं जानता हूं कि विद्युत क्या है! यह विनम्रता केवल उसी में हो सकती है जिसे अपने अज्ञान का बोध हो। जिसे ज्ञान का बोध है वह तो कभी विनम्र हो ही नहीं सकता। जिसको गीता याद हो वह कहीं विनम्र हो सकता है? कभी नहीं, कभी नहीं, कोई गुंजाइश नहीं है। वह विनम्र हो ही नहीं सकता, उसे जानता है वह। इसीलिए तो पंडित विवाद करते रहे हैं। विनम्रता होती तो विवाद कैसे होता? शास्त्रार्थ करते रहे हैं, हारते रहे हैं, हराते रहे हैं। यह हारना और हराना, यह जीतने के लिए पूरे मुल्क में झंडा लेकर घूमना और यात्रा करना, और किसी को हराना और किसी से हार जाना, यह सब क्या पागलपन है? इनका कोई धार्मिक चित्त से संबंध है? इनका धार्मिक चित्त से जरा भी संबंध नहीं है। यह जानने वाले लोगों का सारा का सारा उपद्रव है।
फरीद नाम का एक फकीर यात्रा पर निकला हुआ था। बीच में कबीर का आश्रम भी पड़ता था मगहर में। तो फरीद के मित्रों ने कहा, उनके साथियों ने कहा कि आप रुक जाएं, कबीर का आश्रम है। दो दिन वहां रुकेंगे, आप दोनों की बातें होंगी तो बड़ा सुख होगा। उधर कबीर के मित्रों को पता चला था तो उन्होंने भी कहा कि फरीद यहां से निकलता है, उसे दो दिन को रोक लेंगे आश्रम में तो बड़ा अच्छा होगा।
लेकिन एक बड़ी अजीब बात हुई। जब फरीद के शिष्यों ने कहा कि रुक जाएं। तो फरीद ने कहा, रुक तो जरूर जाएं, लेकिन बात क्या करेंगे? मैं तो कुछ जानता नहीं। और कबीर के शिष्यों ने जब कहा कि रोक लें फरीद को, तो उसने कहा, रोक तो जरूर लूं, लेकिन बात क्या करेंगे? मैं तो कुछ जानता नहीं।
शिष्यों ने समझा कि ये तो इस तरह की उलटी बातें कहते ही रहते हैं संत। दो दिन रोक ही लिया। दो दिन फरीद और कबीर एक ही जगह रहे, मिले, एक-दूसरे के गले मिले, खूब हंसे, लेकिन बातचीत कोई भी न हो पाई। दो दिन बाद विदा भी कर आए कबीर जाकर गांव के बाहर फरीद को। शिष्य तो बहुत घबड़ा गए, बहुत परेशान हो गए दो दिन। अपेक्षा एकदम टूट गई और एक तरह की ऊब आ गई होगी कि यह क्या है! दोनों को बिठाल देते थे, वे दोनों बैठे रहते थे, कभी-कभी हंस भी लेते थे और बैठे रहते थे। फिर विदाई भी हो गई।
विदा होते से ही कबीर के शिष्यों ने कबीर को पूछा, फरीद के शिष्यों ने फरीद को कि यह क्या हुआ? तो उन्होंने कहा, हम तो पहले कहे थे, हम तो पहले कहे थे। हम वहां पहुंच गए हैं जहां हम कुछ भी नहीं जानते। अब क्या करें?
अगर हम खोजेंगे अपने चित्त में, तो हम भी वहां पहुंच जाएंगे जहां हम कुछ भी नहीं जानते। हम वहां हैं, पहुंचने की कोई बहुत देर नहीं है। तो ज्ञान की अगर यात्रा करनी हो तो शायद बहुत मुश्किल है--सीखो, सीखो, सीखो। तो मुझसे लोग पूछते हैं कि क्या हम इसी वक्त परमात्मा को जान सकते हैं? मैं कहता हूं, इसी वक्त! क्योंकि अगर सीखना हो तो समय लगेगा। लेकिन अगर अन-सीखना हो तो समय कैसे लगेगा? अगर ज्ञान इकट्ठा करना हो तो समय लगेगा, टाइम लगेगा, क्योंकि ज्ञान इकट्ठा करने में समय लगता है। मैट्रिक पास होता है एक लड़का तो सात वर्ष लग जाते हैं, और एम.ए. होता है तो और छह वर्ष लग जाते हैं, कोई पंद्रह-बीस वर्ष लगते हैं पढ़ता है तो। तो अगर हम शास्त्र पढ़ेंगे तो समय लगेगा, अगर ज्ञानी होना है तो समय लगेगा। लेकिन अगर यह जानना है कि मैं ज्ञानी नहीं हूं, तो समय कहां? सिर्फ अहंकार बाधा हो सकता है, और कोई बाधा नहीं है। समय का क्या सवाल है? इसी क्षण हो सकता है! अभी हो सकता है! यहीं हो सकता है! इसमें एक क्षण की भी देरी की कहां गुंजाइश है? यह दिखाई पड़ जाए, हो गया कि मैं नहीं जानता हूं। और सारा भवन गिर जाएगा ज्ञान का वैसे ही जैसे ताशों का भवन बनाया और गिर जाए; और कोई रेत का भवन बनाए और हवा का एक झोंका आए और गिर जाए।
सिर्फ अहंकार बाधा है। अगर अज्ञानी होने में डर लगता हो तो फिर कोई रास्ता नहीं है, फिर बहुत समय लगेगा, फिर जन्म-जन्म भी लग सकते हैं और फिर भी काम पूरा नहीं होगा। लेकिन अगर अज्ञानी होने का साहस हो--और इस जमीन पर सबसे बड़ा साहस अज्ञानी होने का साहस है--अगर यह करेज हो, तो इसी वक्त बात हो गई। बात होने में और क्षण का भी विलंब क्यों? क्या नहीं बात हो जाती है इसी वक्त? क्या बात नहीं हो गई?
नहीं लेकिन, भीतर कोई कहता है कि नहीं, मैंने जो किताबें जानीं और इतनी मेहनत की, वह सब बेकार छोड़ दूंगा क्या? और मैंने इतने शास्त्र याद किए, वह सब ऐसे ही छोड़ दूंगा? पानी में गए वे? वह जिंदगी मेरी मेहनत की और वह श्लोकों का स्मरण करना और सूत्रों का याद करना, कितनी तो मेहनत की, कितनी रातें खराब कीं, कितनी सुबह उठ आया, कितनी मुश्किल से तो यह सब इकट्ठा किया, और यह ऐसे ही चला जाएगा क्या?
अगर ऐसा मन में होता हो तो फिर रुकेगा वह। हम रोकेंगे तब तक रुकेगा। जिस दिन हम खोल देंगे, वह बिखर जाएगा और विलीन हो जाएगा।
और अदभुत घटना घटती है! जिस दिन ज्ञान बिखर जाता है और गिर जाता है, उस दिन हो जाता है चित्त अत्यंत सरल, उस दिन बुद्धि हो जाती है विलीन, रह जाता है शेष हृदय। उस दिन, वह जिसको हम बुद्धि कहते हैं, इंटलेक्ट कहते हैं, वह हो जाती है शून्य, और रह जाता है हृदय। वह हृदय जानता है, जीता है, पहचानता है, देखता है, समझता है और प्रवेश करता है कहीं विश्वसत्ता में।
तो आज की सुबह तो पहला सूत्र आपसे कहना चाहता हूं: आपका ज्ञान, आपका ज्ञान छीन लेना चाहता हूं। मैं तो कहता ही हूं कि मैं अज्ञान सिखाता हूं। धन्य हैं वे लोग जो ज्ञान को छोड़ने में समर्थ हो जाते हैं! बड़े साहस की बात है। परिवार छोड़ कर भाग जाना कोई बड़े साहस की बात नहीं है। क्योंकि सच्चाई तो यह है कि परिवार से सारे लोग इतने ऊबे-ऊबे हैं कि जिसको भी मौका मिल जाएगा वही छोड़ कर भाग जाएगा। इसलिए परिवार छोड़ कर भाग जाना कोई बड़े साहस की बात नहीं है। बल्कि सच यह है कि जो सबसे ज्यादा कमजोर होते हैं, वे परिवार को छोड़ कर सबसे पहले भाग जाते हैं। कमजोरी चाहिए परिवार को छोड़ने में, ताकत नहीं। ताकतवर तो झेलता रहता है, कमजोर भाग जाते हैं, वही संन्यासी हो जाते हैं। कमजोर, जो जीवन के संघर्ष में खड़े रहने का साहस नहीं पाते, वे पलायन कर लेते हैं, वे भाग जाते हैं। और अपने भागने को अच्छे शब्दों में सजा लेते हैं कि उन्होंने संसार छोड़ दिया, संसार असार था। वैसे ही जैसे किसी लोमड़ी ने एक दफा कहा था: अंगूर खट्टे हैं। भाग जाते हैं कमजोर लोग। कमजोरी हमेशा कहती है: भागो। भागना जो है वह हमेशा कमजोरी का नारा है। वीकनेस जो है वह हमेशा कहती है: भागो। सामर्थ्य कहता है: टिको। कमजोरी कहती है: भागो। इसलिए घर-द्वार छोड़ कर भाग जाना जरा भी कठिन नहीं है। और किसी दिन अगर आंकलन हो सकेगा मनुष्य का, तो दुनिया से भागे हुए लोग बीमार और कमजोर सिद्ध होंगे।
तो न तो परिवार को छोड़ कर भाग जाने का कोई प्रयोजन है, न जीवन से। और ये जो लोग परिवार छोड़ कर भाग जाते हैं, समाज छोड़ कर भाग जाते हैं, ये भी, समाज ने इनको जो ज्ञान दिया था, उसे कभी नहीं छोड़ते। अगर वे हिंदू थे तो समाज छोड़ने के बाद भी हिंदू बने रहते हैं, यह कैसा आश्चर्य है! अगर वे जैन थे तो वे समाज छोड़ने के बाद भी जैन बने रहते हैं, कैसा आश्चर्य है! वे जैन साधु कहलाते हैं, वे हिंदू साधु कहलाते हैं। ये समाज से कहां भागे? कहां छूटे? समाज ने इनके मस्तिष्क में जो रख दिया था, उसे अब भी पकड़े हुए हैं, उसको अब भी सजाए हुए हैं, अब भी जैन हैं, अब भी हिंदू हैं।
क्या कोई साधु हिंदू और जैन और मुसलमान हो सकता है? और अगर कोई होता हो तो निश्चित ही वह साधु नहीं होगा, कुछ और होगा। वह भागा हुआ गृहस्थ है; साधु नहीं है, संन्यासी नहीं है। संन्यास भी जरूर, साधुता भी जरूर छोड़ती है कुछ, लेकिन समाज नहीं, जीवन नहीं, बल्कि समाज जो ज्ञान दे देता है मस्तिष्क में, वह उसे छोड़ देता है। क्योंकि जो दूसरों से दिया हुआ ज्ञान है वह कभी मेरा ज्ञान नहीं हो सकता है। जो दूसरों ने मुझे दिया है वह कभी मेरा ज्ञान नहीं हो सकता है। वह हमेशा झूठा होगा, मिथ्या होगा, क्योंकि वह दूसरे का दिया हुआ है। ज्ञान हस्तांतरणीय नहीं है, ट्रांसफरेबल नहीं है, कि मैं उसे आपको दे दूं, आप मुझे दे दें, और कोई किसी को दे दे। ज्ञान कभी किसी को कोई नहीं दे सकता। ज्ञान पाया जा सकता है, लेकिन लिया-दिया नहीं जा सकता।
तो यह जो दूसरों से मिला हुआ ज्ञान है, इसे छोड़ना बहुत जरूरी है, ताकि वह उपलब्ध हो सके जो किसी से मिलता नहीं; जागता है प्राणों में, उठता है, विकसित होता है। लेकिन वह तभी विकसित होता है, जब हम दूसरों का सारा सहारा छोड़ देते हैं।
जीवन ऊर्जा का एक नियम है, कि वह तभी जगती है जब बेसहारा होती है। अगर आपको बिना पैर के चलने की सुविधा हो, तो धीरे-धीरे पैरों की ऊर्जा समाप्त हो जाएगी। अगर आपको निरंतर बिना हाथों के काम करने की सुविधा मिल जाए, हाथों की शक्ति वापस लौट जाएगी और सो जाएगी। अगर एक आदमी को हम आंख बंद करके दो वर्ष जीने को कह दें कि तुम आंख बंद करके जीयो, तो आंखों की शक्ति वापस सो जाएगी भीतर जाकर, उसकी कोई जरूरत न रही। अगर हम बोलना बंद कर दें, दो-चार वर्ष बाद तो फिर हम नहीं बोल सकेंगे, बोलना खो जाएगा, बोलने की ताकत वापस सो जाएगी।
जीवन शक्ति का एक नियम है: हम जिस शक्ति का उपयोग करते हैं और जिस शक्ति के लिए चुनौती देते हैं, वही शक्ति जगती है और सक्रिय हो जाती है। और जिस शक्ति को हम चुनौती देना बंद कर देते हैं, उपयोग बंद कर देते हैं, वह सो जाती है।
हमारे भीतर ज्ञान सोया हुआ है, क्योंकि हम दूसरे के ज्ञान पर विश्वास किए हैं। दूसरे का ज्ञान ही जब काम कर देता है तो खुद के ज्ञान के जगने की कोई जरूरत नहीं रह जाती, जीवन ऊर्जा सोई रह जाती है। अगर हम दूसरों के सारे ज्ञान को अस्वीकार कर दें, अगर दूसरों के ज्ञान को झाड़ दें अपने से, दूसरों के ज्ञान से खाली हो जाएं, तो जो चुनौती पैदा होगी, जो चैलेंज पैदा होगा, जो दबाव पैदा होगा, जो प्रेशर पैदा होगा जीवन में, वही हमारे भीतर जो सोए हुए ज्ञान के स्रोत हैं उनको जगा देगा।
दुनिया में केवल वे ही लोग सत्य की दिशा में जान पाते हैं, जो सत्य के संबंध में जो भी जाना है उसे छोड़ देते हैं। तब उनके अपने प्राण उस बात को सम्हाल लेते हैं, जो उन्होंने दूसरों के कंधों पर ली थी, जिसके लिए वे दूसरों का सहारा खोज रहे थे। सहारा खो देने पर उनके भीतर अपनी शक्ति जागनी शुरू होती है, जब कोई सहारा नहीं होता।
ज्ञान के लिए हम सहारे लिए हुए हैं, इसलिए ज्ञान कभी जगेगा नहीं। तो ज्ञान के लिए बेसहारा हो जाना जरूरी है। और बेसहारा होने का मतलब है, अज्ञान की स्थिति में खड़े हो जाना।
आज तो इतनी ही बात कहूंगा: अज्ञान की स्थिति में खड़े हो जाएं, यदि चाहते हों कि भीतर ज्ञान का जन्म हो। ज्ञात को छोड़ दें, अगर चाहते हों कि अज्ञात के लिए द्वार खुले। जो जानते हैं उसे भूल जाएं, अगर चाहते हों उसे जानना जिसे नहीं जानते हैं। वह जो अभी नहीं जाना है, अगर उसे जानना है, तो उसे छोड़ देना होगा जिसे हम जानते हैं, जिसे हमें खयाल है कि हम जान रहे हैं। ज्ञान से मुक्त हो जाना जरूरी है, अगर सचमुच ज्ञान को उपलब्ध करना है।
इस दिशा में दो सूत्र और कल और परसों सुबह आपसे बात करूंगा। अब हम सुबह के ध्यान के लिए बैठेंगे, तो थोड़ी सी दो-चार बातें सुबह के ध्यान के लिए आपसे कह दूं।
सबसे पहली बात तो यह ध्यान कोई एकाग्रता, कोई कनसनट्रेशन नहीं है। एकाग्रता ही ध्यान समझी जाती रही है। किसी से पूछें: ध्यान क्या है? तो वह कहेगा: चित्त का एकाग्र हो जाना ध्यान है। लेकिन चित्त का एकाग्र हो जाना ध्यान बिलकुल भी नहीं है। चित्त का चंचल होना भी ध्यान नहीं है और चित्त का एकाग्र होना भी ध्यान नहीं है। चंचलता और एकाग्रता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। ध्यान इन दोनों से ही अलग बात है। ध्यान तो वह स्थिति है जहां न तो चित्त चंचल होता है और न एकाग्र होता है।
चंचलता का अर्थ है: एक चीज से दूसरी, दूसरी से तीसरी पर मन का बदलते जाना। और एकाग्रता का अर्थ है: एक ही चीज पर मन का रुका रह जाना। लेकिन दोनों हालत में कोई चीज होती है। चंचलता में बदलती हुई चीजें होती हैं, एकाग्रता में ठहरी हुई कोई चीज होती है, लेकिन ऑब्जेक्ट दोनों में होता है। ध्यान का अर्थ है: जहां कोई ऑब्जेक्ट न हो, जहां कोई चीज न रह जाए, जहां हम ही रह गए अकेले और कोई ऑब्जेक्ट न रहा, कोई विषय न रहा।
चंचलता में विषय बदलते हैं, ऑब्जेक्ट बदलते हैं। एकाग्रता में ऑब्जेक्ट एक ही रह जाता है। ध्यान में कोई ऑब्जेक्ट नहीं रह जाता, वह ऑब्जेक्टलेसनेस है। वहां कोई विषय नहीं है। वहां केवल चेतना रह जाती है, और कोई नहीं रह जाता। तो क्या करें इस तरह की चेतना में जाने के लिए?........

आज इतना ही।