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शनिवार, 8 अप्रैल 2017

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-57

एस धम्मो सनंतनो-(भाग-06)
ओशो
प्रवचन-057 ('न-होना' है जीवन)

 पहला प्रशन: 
कल आपने कहा कि ईश्वर को अस्वीकार कर भगवान बुद्ध ने मनुष्य को बड़ी से बड़ी गरिमा से मंडित किया। यही दलील तो नास्तिक भी ईश्वर के खिलाफ पेश करते हैं। फिर दोनों में फर्क क्या है? और क्या ईश्वर को अस्वीकार कर मनुष्य का अहंकार और भी अंधा नहीं होगा?

फर्क बारीक है। समझना चाहोगे, तो ही समझ सकोगे। सहानुभूतिपूर्वक समझोगे, तो ही समझ सकोगे। फर्क मोटा और स्थूल नहीं है।
इसीलिए तो हिंदुओं ने बुद्ध को भी नास्तिक कहा। नास्तिक कहकर भी बुद्ध की महिमा को अस्वीकार करना कठिन था। इसलिए अवतार भी स्वीकार किया। फर्क बड़ा बारीक है। मान भी न सके, इंकार भी न कर सके। बुद्ध को स्वीकार भी न कर सके, क्योंकि बात प्रगट ही नास्तिकता की मालूम होती है। लेकिन बुद्ध की महिमा को, प्रतिभा को, उनकी गरिमा को, उनके प्रकाश को अस्वीकार भी कैसे करें! हिंदू इतने अंधे भी न थे। तो अवतार भी स्वीकार किया।

बड़ी कठिनाई पड़ी होगी हिंदू-प्रतिभा को। सदा आसान होता है किसी को स्वीकार कर लेना, या अस्वीकार कर देना। लेकिन जब दोनों के बीच में कोई कड़ी आ जाती है, जहां अस्वीकार करते भी नहीं बनता, स्वीकार करते भी नहीं बनता, तो उसका अर्थ है कि बड़ी सूक्ष्म बात रही होगी। तय करना मुश्किल था कि बुद्ध हां कहते हैं कि नहीं कहते हैं। और हिंदू जैसी जाति को मुश्किल पड़ा, जो कि सूक्ष्म को समझने में सदियों से श्रम कर रही है।
नास्तिक जब कहता है, ईश्वर नहीं है, तो उसे मनुष्य से कोई प्रयोजन नहीं है। उसे इतना ही प्रयोजन है कि ईश्वर न हो। क्योंकि ईश्वर के होने से नियंत्रण पैदा होता है--वासना पर, तृष्णा पर, जीवन की अंधी दौड़ पर। स्वच्छंदता नहीं रह जाती। नास्तिक जब कहता है, ईश्वर नहीं है, तो वह यह कहता है, मनुष्य स्वच्छंद है। अब जो करना हो करो! न कोई पाप है, न कोई पुण्य है। न कोई नियंता है, न कहीं कोई है जिसके सामने किसी दिन उत्तर देना पड़े। उत्तरदायी होने का कोई सवाल नहीं है। मरने के बाद सभी मिट जाते हैं।
चार्वाक ने कहा है, घी भी उधार लेकर पी लो। पीने से मत चूको। चुकाना कहां है? चुकाना किसको है? मरने के बाद कोई हिसाब है किसी का? सब मिट्टी में मिल जाते हैं। और धर्म केवल पुरोहितों का पाखंड है। नासमझों को फंसाने को। नासमझों को चूसने को, शोषण करने को।
चार्वाक की यह भाषा नास्तिक बार-बार बोलते रहे। यही भाषा फिर कार्ल माक्र्स ने बोली--कि धर्म अफीम का नशा है। कोई ईश्वर नहीं है। लेकिन जोर ईश्वर के न होने पर है।
और ईश्वर नहीं है, तो फिर मनुष्य एक पशु है। परमात्मा को काट दो, तो मनुष्य पशु हो जाता है। फिर मनुष्य और पशु में फर्क क्या करोगे? फर्क इतना ही है कि पशु अपनी वृत्तियों में जीता है, मनुष्य वृत्तियों के पार उठता है।
मगर पार उठने की जगह न रही, जब ईश्वर न रहा। आकाश न रहा, जहां उड़ सको। फिर जमीन ही रही सरकने को कीड़े-मकोड़ों की तरह। फिर आदमी और कुत्ते में फर्क क्या है? कुत्ता कुत्ता है, आदमी आदमी है। अभी फर्क है, अगर ईश्वर है। ईश्वर है तो फर्क यह है कि कुत्ता कुत्ता ही रहेगा, आदमी ईश्वर हो सकता है। विकास की संभावना है।
जब नास्तिक कहता है, ईश्वर नहीं है, तो वह यह कहता है, हो चुकी बकवास, कोई विकास नहीं है, न कोई संभावना है। हमें शांति से जीने दो। हम जो करते हैं हमें करने दो। हटाओ यह पाप-पुण्य की बाधा। हम पर शर्तें मत लगाओ। हमारी पाशविकता को स्वच्छंद होने दो।
इसीलिए जब नीत्से ने कहा, ईश्वर मर गया है, तो तत्क्षण उसने दूसरा वाक्य भी उसमें जोड़ा कि अब मनुष्य स्वतंत्र है जो करना चाहे। गाड इज डेड एंड नाउ मैन इज फ्री टु डू व्हाट सो एवर ही लाइक्स टु डू। अब कोई ऊपर कोई आंख देखने वाली नहीं है। और कोई नहीं है जिसके सामने तुम्हें खड़े होकर उत्तर देना पड़े। कोई निर्णायक नहीं है। तुम अकेले हो। यह आकाश सूना है। घर का कोई मालिक नहीं है, करो जो करना है।
नास्तिक का जोर है, ईश्वर न हो, ताकि मनुष्य पशु हो सके स्वच्छंदता से।
बुद्ध ने भी कहा, ईश्वर नहीं है, पर उनका जोर ईश्वर के नहीं होने पर नहीं है। उनका जोर मनुष्य के ईश्वर होने पर है। वे यह कहते हैं कि ईश्वर हो कैसे सकता है, मनुष्य ही ईश्वर है--अत्ताहि अत्तनो नाथो--यह आदमी ही ईश्वर है। अब तुम और कहां ईश्वर खोजते हो? बुद्ध कहते हैं, यह कहीं और खोजना, बचने का उपाय है। मत रखो आकाश में ईश्वर। अंतर-आकाश में, भीतर तुम्हारे, तुम्हारे होने में छिपा है।
बुद्ध ईश्वर को इंकार करते हैं कि कहीं ऐसा न हो कि ईश्वर का होना तुम्हारा स्वयं के ईश्वरत्व का इंकार बन जाए। ऐसा बन गया है। बन गया था। रोज बनता रहा है। लोग ईश्वर को पूज आते हैं और छुटकारा पा जाते हैं। पूजा छुटकारा है कि चलो झुका लिया सिर, अब झंझट मिटी। अब जो करना है, करें। ईश्वर के सामने लोग जाकर वे ही प्रार्थनाएं कर आते हैं, जो करना चाहते हैं। उनकी ही आज्ञा मांग आते हैं। हिंसा करना हो तो हिंसा के लिए आशीर्वाद मांग आते हैं।
हिटलर को भी आशीर्वाद देने वाले चर्च थे, जिनमें उसके जनरल प्रार्थना करते। चर्चिल को भी इंग्लैंड का चर्च आशीर्वाद दे रहा था, प्रार्थना कर रहा था। भारत और पाकिस्तान में युद्ध हो जाए तो भारत के साधु-संन्यासी भी आशीर्वाद देने लगते हैं राज्य को।
युद्ध और हिंसा के लिए भी तुम्हारे परमात्मा से तुम प्रार्थना करने लगते हो। तुम्हारा परमात्मा झूठा है, तुम्हारी प्रार्थना झूठी है। तुम परमात्मा को भी स्वयं के शैतान बनने में सहारा बना लेते हो।
जब बुद्ध ने कहा, कोई ईश्वर नहीं है, तब बुद्ध ने तुमसे प्रार्थना छीनी, परमात्मा नहीं। इसे थोड़ा समझो।
बुद्ध ने तुमसे प्रार्थना छीनी कि बहुत हो चुकी बकवास, तुम परमात्मा को अपने ही काम में लगा रहे हो। नास्तिक परमात्मा को हटाना चाहता है, ताकि स्वच्छंद हो सके। तुम परमात्मा के आधार पर स्वच्छंद हो रहे हो।
क्या-क्या नहीं किया आदमी ने परमात्मा के नाम पर, सोचो तो जरा! ऐसा क्या है जो आस्तिकों ने नहीं किया परमात्मा के नाम पर? अगर गौर से देखोगे तो नास्तिकों के नाम पर पापों की कथा बहुत कम है। उन्होंने घी उधार मांगकर पी लिया होगा, लेकिन यह भी कोई बड़ा पाप हुआ! लोगों को आग में तो नहीं जलाया। उन्होंने मजा-मौज कर लिया होगा, नाच लिए होंगे शराब पी कर; जरा आस्तिकों के पाप का तो हिसाब रखो!
मुसलमानों ने कितने ईसाई मारे, कितने हिंदू मारे? ईसाइयों ने कितने मुसलमान मारे? हिंदू कैसे आग से भर जाते हैं, जब मारने का ज्वार आता है? कैसे अंधे हो जाते हैं? मंदिर-मस्जिद ने लड़ाया आदमी को। मंदिर-मस्जिद ने जोड़ा कहां? सब युद्ध मंदिर-मस्जिद के नाम पर हुए। पृथ्वी लाशों से पटी, खून से भर गयी। यह सब धर्म के नाम पर हुआ है और आस्तिकों ने किया है।
अगर नास्तिक और आस्तिक के पापों का हिसाब लगाया जाए, तो नास्तिक का पलड़ा हलका है। बहुत हलका है। हां, व्यक्तिगत रूप से उसने कभी घी उधार मांग लिया होगा, यह भी कोई बात हुई! इसका भी कोई हिसाब रखोगे? व्यक्तिगत रूप से किसी स्त्री के प्रेम में पड़ गया होगा, शराब पीकर नाच लिया होगा, ठीक है। मगर किसको दुख पहुंचाया? किसकी छाती में छुरा भोंका? अगर थोड़े-बहुत सुख उसने पा भी लिए होंगे, अगर परमात्मा कहीं है तो क्षमा करेगा। आस्तिक को क्षमा न कर पाएगा।
नास्तिक ने ईश्वर को इंकार करके थोड़ी सी स्वच्छंदता चाही। आस्तिक ज्यादा चालाक है। ज्यादा होशियार है। नास्तिक ईमानदार है। आस्तिक बेईमान है। उसने कहा कि छुटकारा क्या पाना, तुम्हीं से प्रार्थना कर लेते हैं। वहां से कोई उत्तर तो आता नहीं है, तुम्हीं अपना उत्तर बना लेते हो। वहां कोई बोलने वाला तो है नहीं, तुम्हीं जाकर मंदिर में प्रार्थना कर आते हो, तुम्हीं अपनी प्रार्थना पर सिर हिला लेते हो। तुम्हीं धूप-दीप जला लेते हो। तुम्हीं बलि के बकरे चढ़ा देते हो। आदमी तक चढ़ाए तुमने, मगर यज्ञ के नाम पर चढ़ाए, तो धार्मिक हो गयी बात। हत्याएं कीं, खून बहाया, लेकिन यज्ञ के नाम पर बहाया, तो कृत्य पवित्र हो गया।
आस्तिक ने ज्यादा चालाकी की बात की। उसने कहा, परमात्मा को क्यों हटाना, परमात्मा का सहारा ही ले लो। अपनी पाप की यात्रा में उसके कंधे का सहारा ले लो, उसके कंधे पर सवार हो जाओ। आस्तिक ने वही किया, जो उसे करना था।
बुद्ध ने ये दोनों बातें देखीं। बुद्ध ने नास्तिकता को हामी नहीं भरी। बुद्ध चार्वाक के उतने ही विपरीत हैं, जितने यज्ञवादी पुरोहितों के।
लेकिन बुद्ध ने देखा कि यह तो ईश्वर के नाम पर स्वच्छंदता चलती है। उन्होंने ईश्वर को इंकार किया। इंकार में जोर नहीं है। जोर इस बात में है कि मनुष्य की महिमा अपरिसीम है। उसके ऊपर किसी परमात्मा को भी रखने की जरूरत नहीं, परमात्मा मनुष्य के भीतर छिपा है। उसे प्रगट होना है।
बुद्ध ने एक नयी आस्तिकता की भाषा दी जगत को। उसे समझो। परमात्मा कहीं है नहीं रेडिमेड। तैयार बैठा नहीं तुम्हारे लिए कि गए और कब्जा कर लिया। परमात्मा कोई वस्तु नहीं है। तुम्हें निर्मित करना होगा, सृजन करना होगा। तुम्हारे ही अंतःगृह में, तुम्हारे ही अंतर्तम में जलाकर दीए को, प्रकाश को, रोशनी को, जागृति को, होश को, ध्यान को, तुम्हें परमात्मा को जन्म देना होगा। तुम्हें परमात्मा की मां बनना होगा। तुम्हें गर्भ बनना होगा।
यही मतलब है, जब बुद्ध कहते हैं, मनुष्य के ऊपर कोई भी नहीं। वे यह कहते हैं, मनुष्य के भीतर सब है, ऊपर नहीं। और मनुष्य को अगर ऊपर जाना है, तो भीतर जाना है। भीतर जाकर ही मनुष्य ऊपर जाएगा। स्वयं को पाकर ही मनुष्य सत्य को पाएगा। अपनी आत्यंतिक सचाई को पहचानकर ही परमात्मा से मिलन होगा। और यह मिलन, कहीं बाहर किसी मंदिर के द्वार पर होने को नहीं है। किसी स्वर्ग, किसी भौगोलिक-स्थिति में होने को नहीं है। यह एक अंतर-दशा में होगा, अंतर-आकाश में होगा।
बुद्ध ने बाहर से परमात्मा को इंकार दिया, भीतर रखने को। मंदिर से हटाया, ताकि तुम्हारे भीतर विराजमान कर सकें। बुद्ध से बड़ा आस्तिक संसार में कभी हुआ नहीं, होगा भी संदिग्ध है। बुद्ध की आस्तिकता इतनी गहन है, इतनी हिम्मत और साहस से भरी है कि उन्होंने ईश्वर को भी इंकार कर दिया। यह ईश्वर के विरोध में नहीं, यह ईश्वर के प्रेम में उठा कदम है। यह देखकर कि ईश्वर के नाम पर जो हो रहा है, वह ईश्वर को बिना हटाए न रुकेगा। ईश्वर को हटा लो, सब उपद्रव का जाल बंद हो जाएगा। और मनुष्य को उन्होंने विधि दी कि कैसे ईश्वर को निर्मित करो। ईश्वर सृजन है तुम्हारा।
इसे थोड़ा समझो। इसकी सूक्ष्मता का थोड़ा स्वाद लो। प्रत्येक व्यक्ति को अपने ईश्वर को निर्मित करना है। तुम्हीं हो मूर्तिकार, तुम्हीं हो मूर्ति, तुम्हीं हो वह पत्थर जिसकी मूर्ति बननी है। तुम्हीं हो वह छैनी जिससे मूर्ति बननी है। तुम्हारे अतिरिक्त कोई भी नहीं है। मनुष्य सब कुछ है। सितार भी वही, संगीतज्ञ भी वही, स्वर-ध्वनि भी वही। तुम्हारे भीतर सब है; संयोजन देना है, ठीक-ठीक व्यवस्था जुटानी है। टूटे खंडों को पास लाना है, अखंड बनाना है। मूर्ति छिपी है अनगढ़ पत्थर में, अनगढ़ को काटना-छांटना है, व्यर्थ को अलग करना है। असार से सार का भेद करना है। और परमात्मा प्रगट हो जाएगा। परमात्मा का आविर्भाव होगा।
और तुम्हारा परमात्मा जब प्रगट होगा, तब वह तुम्हारा होगा। और जो अपना नहीं, वह भी क्या है! वह तुम्हारी ही सांसों में रमा होगा। वह तुम्हारे ही हृदय की धक-धक होगा। वह तुम्हारे ही प्राणों की ज्योति होगा। जो अपना है, वही थिर है।
अगर तुमने परमात्मा को दूसरे की तरह पा लिया, छूट जाएगा। सब दूसरे छूट जाते हैं। सिर्फ अपना होना नहीं छूटता। इसलिए बुद्ध कहते हैं, अपने को ही पा लेना बस एकमात्र पा लेना है। धन पा लोगे, छूट जाएगा। मंदिर, मकान बना लोगे, छूट जाएगा। यश, प्रतिष्ठा, छूट जाएगी। सब छूट जाएगा। इसी तरह तुमने अगर परमात्मा को भी पर की तरह पाया, दूसरे की तरह पाया, छूट जाएगा। जो पर है, वह तुम्हारा स्वभाव नहीं हो सकता। बुद्ध ने परमात्मा को तुम्हारा स्वभाव कहा।
अब इसे समझो। नास्तिक चाहता है, ईश्वर न हो, ताकि तुम स्वच्छंद हो जाओ। बुद्ध चाहते हैं, ईश्वर हटे, ताकि तुम धार्मिक हो जाओ। ताकि तुम स्वतंत्र हो जाओ। ताकि तुम्हारी महिमा पर कोई सीमा न रह जाए, कोई बाधा न हो। सब पत्थर हट जाएं। तुम्हारी मुक्ति परिपूर्ण हो जाए।
तो बुद्ध ने हजारों लोगों को आस्तिक बना दिया, बिना ईश्वर के। और तुम ईश्वर को पकड़े बैठे हो और आस्तिक नहीं हो पाए। बड़ी गहरी कला बुद्ध ने मनुष्य को सिखायी।
फिर बुद्ध जब कहते हैं, ईश्वर नहीं है, तो वे किसी सिद्धांत की बात नहीं कह रहे हैं। वे यह नहीं कह रहे हैं कि ईश्वर नहीं है, ऐसा मेरा कोई सिद्धांत है। वे इतना ही कहते हैं, जब सत्य को जाना, तो स्वयं को देखा, ईश्वर को नहीं।
कुछ भी नहीं हैं ये कुफ्रो-ईमां दोनों
कुछ भी नहीं हैं ये गबरो-मुसलमां दोनों
जब राजे-हकीकत से उठाया पर्दा
रोने लगे हो-हो के पशेमां दोनों
न तो धार्मिक की बात सच है, न अधार्मिक की बात सच है। न हिंदू की, न मुसलमान की। जब पर्दा उठता है सत्य से, तो दोनों रोने लगते हैं। क्योंकि यह तो कुछ और ही है जो देखा। इसको तो कभी सोचा भी न था। सपने में भी इसकी झलक न मिली थी।
जब बुद्ध ने कहा, ईश्वर नहीं है, तो उन्होंने सिर्फ इतना ही कहा, जिस ईश्वर की तुम चर्चा कर रहे हो, वह तुम्हारी कल्पना का प्रक्षेपण है। वह तुमने ही बनाया है।
अगर घोड़े ईश्वर बनाएंगे तो घोड़े की शकल में बनाएंगे। आदमी की शकल में तो कभी नहीं बना सकते। अगर आदमी की शकल में बनाएंगे तो शैतान को बनाएंगे, क्योंकि आदमी ने घोड़ों को सिर्फ सताया। किया क्या है? अगर घोड़े ईश्वर बनाएंगे, तो घोड़े की शकल में बनाएंगे, सुंदरतम घोड़ा बनाएंगे, कोई चेतक। राणा प्रताप का घोड़ा। आदमी की शकल में तो नहीं बना सकते, राणा प्रताप को भी स्वीकार नहीं कर सकते। क्योंकि राणा प्रताप भी चेतक पर ही चढ़े रहे, छाती तो चेतक की ही रौंदी। आदमी तो घोड़े स्वीकार नहीं कर सकते।
इसीलिए तो दुनिया में इतनी ईश्वर की धारणाएं हैं, क्योंकि इतने तरह के आदमी हैं। अब तुम अगर नीग्रो से कहो कि तू गोरे भगवान को बना ले, कैसे बनाएगा? गोरा शैतान हो सकता है, भगवान कैसे हो सकता है! गोरे ने सिर्फ सताया है, छाती पर चढ़ा रहा। नीग्रो तो काला ही भगवान बनाएगा। गोरा तो नहीं बना सकता। जरा गोरे से कहो कि काला भगवान बना लो, वह सोच भी नहीं सकता। नीग्रो को तो पास नहीं बैठने देता, काले भगवान के चरण छुएगा? गोरे का भगवान गोरा होगा। काले का भगवान काला होगा।
इसीलिए तो श्याम बस गए भारत के मन में। श्याम भारत का रंग है। इसलिए श्याम ने जैसा लुभाया, किसी ने नहीं लुभाया। जैसी उनकी बांसुरी ने पास बुलाया, किसी ने नहीं बुलाया। वह भारत का रंग है। वह हमसे मेल खाता है, तालमेल खाता है। प्रत्येक जाति अपनी ही शकल में तो अपने भगवान को बनाती है। चीनी से कहो कि तुम जरा लंबी नाक वाले भगवान को बना लो, नहीं बना सकता। चपटी ही नाक होगी। गाल की हड्डियां उठी ही हुई होंगी। चीनी का भगवान चीनी होने को है।
इसे तुम जरा गौर से देखो तो तुम्हें यह समझ में आ जाएगा कि हमारा भगवान हमारी ही कल्पना का विस्तार है। उसे हम अपने ही रंग-रूप में बनाते हैं। वह हमारी ही सुंदरतम छबि है। जैसा हम चाहते हैं कि हम होते, वैसा हमारा भगवान होता है।
बुद्ध कहते हैं, जब सत्य का पर्दा उठता है, तब तुमने जितने भगवान सोचे थे, वे कोई भी नहीं पाए जाते। और अगर तुम्हारा ही कोई भगवान वहां मिल जाए, तो समझना कि अभी सत्य का पर्दा नहीं उठा, तुम किसी आत्म-सम्मोहन में खो गए हो। तुमने किसी निद्रा में स्वप्न देखा है। अगर राम बचें, कृष्ण बचें, तो समझ लेना, कोई सपना देख रहे हो। यह तो तुम्हारी ही धारणा है। यह तो तुम्हारा ही जाल है। पर्दा अभी उठा नहीं। जब पर्दा उठता है, तो मनुष्य ने जो भी सोचा है, वह कुछ भी काम नहीं आता। आ नहीं सकता। क्योंकि जिसे तुमने जाना नहीं, उसे तुम सोचोगे कैसे पहले से? और जान लेने के बाद तो सोच ही नहीं सकते, क्योंकि वह सोचने से बहुत बड़ा है। बहुत बड़ा है। सोचना बहुत छोटा है।
ऐसा ही समझो कि तुमने कहानी सुनी है मेंढक की, जो कुएं में था। और फिर सागर का एक मेंढक आ गया। उस कुएं के मेंढक ने स्वाभाविक पूछा, कहां से आते हो मित्र? सागर से आता हूं, उसने कहा। सागर? कितना बड़ा है? सागर के मेंढक ने चारों तरफ देखा, कैसे बताए! क्योंकि यह कुएं का मेंढक, कुएं में ही पैदा हुआ, कुएं में ही बड़ा हुआ। उसने कहा, जरा मुश्किल पड़ेगा समझाना। आप यहीं कुएं में ही रहे हैं सदा? उसने कहा, सदा से रहा हूं। इससे तो छोटा ही होगा सागर? उसने कहा कि नहीं।
तो कुएं का मेंढक छलांग लगाया। एक तिहाई कुएं में छलांग लगायी, इतना बड़ा? हंसने लगा सागर का मेंढक, उसने कहा कि नहीं। मुश्किल है बताना। उसने दो तिहाई कुएं में छलांग लगा दी; इतना बड़ा? उसने कहा कि नहीं, इतने से काम न चलेगा। उसने पूरे कुएं में छलांग लगा दी, लेकिन सागर के मेंढक ने कहा कि नहीं, इतना बड़ा, इससे भी काम न चलेगा, बहुत बड़ा है। इस कुएं से हम पैमाना न बना सकेंगे। हम इसके आधार पर, इसके मापदंड से नाप न सकेंगे।
तो फिर कुएं के मेंढक ने कहा, निकल झूठे, बाहर! इससे बड़ा कोई सागर न कभी हुआ है, न हो सकता है।
ऐसा आदमी का विचार का कुआं है। उसी में हम पैदा होते, उसी में बड़े होते। उसी में जीते। बुद्ध सागर से आते हैं। सागर को देखकर हमारे कुएं में आते हैं। हम उनसे पूछते हैं, हमारे ईश्वर जैसा ही है सत्य? बुद्ध कहते हैं, नहीं! इससे काम न चलेगा। बस इतना ही मतलब है बुद्ध जब ईश्वर को इंकार करते हैं। वे कहते हैं, इस कुएं से मापदंड न बनेगा। तुम जो कुछ भी कहोगे, तुम्हारी भाषा जो कहेगी, मुझे न ही कहना पड़ेगा। नहीं, नहीं, नहीं। नेति-नेति ही करते जाना पड़ेगा।
उपनिषदों ने नेति-नेति की प्रशंसा की है। लेकिन फिर उपनिषद के भक्त भी डर गए, जब किसी आदमी ने वस्तुतः नेति-नेति कहा। उपनिषद तो सिर्फ बात करके रह गए थे, बुद्ध ने वस्तुतः कहा, नेति-नेति। नहीं, नहीं। यह रूप भी नहीं। वह रूप भी नहीं। तुमने जितनी भी बातें परमात्मा के संबंध में कही हैं, सब नहीं।
स्वभावतः आदमी को धक्का लगा। हमको इतना तो इंकार मत करो। कुछ तो कहो। इससे हजार गुना बड़ा होगा, लाख गुना बड़ा होगा, करोड़ गुना बड़ा होगा, लेकिन कुछ तो कहो। हमारे मापदंड को स्वीकार तो करो। करोड़ गुना बड़ा होगा, तो भी आदमी निश्चिंत हो जाएगा। वह कहेगा, कोई हर्ज नहीं, मापदंड तो अपने हाथ में है। एक कदम चलना अपने हाथ में है। एक-एक कदम चलकर हजार मील की यात्रा पूरी हो जाती है।
लेकिन बुद्ध ने कहा, इस कदम से पहुंचना हो ही नहीं सकता, यह कदम ही गलत है। कल्पना का कदम ही गलत है। चाहे तुम उसे प्रार्थना कहो, चाहे भक्ति कहो। चाहे तुम उसे पूजा-अर्चना कहो। कल्पना का कदम गलत है।
कल्पना से जागना है। यह तो कल्पना में सो जाना है। यह कल्पना में सोने से तुम सपने देख लोगे, सुंदर सपने, मनभावन, खूब रस-भरे सपने, पर जब भी आंख खुलेगी--रोने लगे हो-हो के पशेमां दोनों।
कुछ भी नहीं हैं ये कुफ्रो-ईमां दोनों
धार्मिक, अधार्मिक; काफिर और मुसलमान।
कुछ भी नहीं हैं ये गबरो-मुसलमां दोनों
जब राजे-हकीकत से उठाया पर्दा
जब सत्य से पर्दा उठाया, घूंघट हटाया!
रोने लगे हो-हो के पशेमां दोनों
वे रोएंगे। सिर्फ बुद्ध नहीं रोएंगे। बुद्ध के पीछे चलने वाला नहीं रोएगा। क्योंकि वह कोई आकांक्षा लेकर ही नहीं चल रहा है। वह कोई अपेक्षा लेकर ही नहीं चल रहा है। वह तो शून्य का दर्शन करने चला है। उसने कोई आकार बनाया ही नहीं।
बुद्ध से ज्यादा बड़ा निराकारवादी नहीं हुआ। बुद्ध से बड़ा निर्गुणवादी नहीं हुआ। आस्तिक हैं, जो कहते हैं, परमात्मा है, निराकार है। वे गलत भाषा बोल रहे हैं। अगर है, तो आकार आ गया। सिर्फ नहीं ही निराकार हो सकती है।
इसलिए कहता हूं, बातें जरा सूक्ष्म हैं। बुद्ध ने कहा, परमात्मा नहीं है। अगर इसको हम आस्तिक की भाषा में रखें, इसका अर्थ होगा, परमात्मा निराकार है। लेकिन नहीं कहा निराकार, नहीं। क्योंकि अगर कहो परमात्मा निराकार है, और परमात्मा भी कहे चले जा रहे हो, तो निराकार और परमात्मा में मेल नहीं बैठता। परमात्मा का तो आकार हो गया, जैसे कहा, है।
तुमने कहा, वृक्ष है, आकार हो गया। तुम कहो, वृक्ष है और निराकार है, तब तुम मूढ़ता की बातें कर रहे हो। तुमने कहा, सूरज है, आकार हो गया। जहां है आया, वहां आकार आया। जहां है आया, वहां गुण आया। फिर तुम कहो कि परमात्मा है और निर्गुण है, तो तुम विरोधाभास बोल रहे हो। इधर हां कहते हो, इधर न कहते हो। इतना उपद्रव करने की क्या जरूरत?
बुद्ध की निष्ठा बड़ी साफ है। जब उन्हें परमात्मा को निराकार कहना है, वे कहते हैं, परमात्मा नहीं है। अब तुम समझ पाओगे। नहीं का अर्थ है, निराकार।
बुद्ध का नहीं और नास्तिक का नहीं बड़े अलग-अलग हैं। बुद्ध के नहीं में अस्वीकार नहीं है, बुद्ध के नहीं में निराकार है। नास्तिक के नहीं में अस्वीकार है। दो में से एक ही बच सकता है। यह वचन है, परमात्मा निराकार है। बुद्ध को लगता है, अगर परमात्मा को बचाते हैं, तो निराकार खोता है। अगर निराकार को बचाते हैं, तो परमात्मा खोता है। बुद्ध ने परमात्मा को खोना पसंद किया, निराकार को खोना पसंद नहीं किया। क्योंकि निराकार ही भगवत्ता का आत्यंतिक स्वरूप है। ऐसे बुद्ध ने परमात्मा को बचाया।
अब तुम्हें बात जरा उलझी मालूम पड़ने लगेगी। क्योंकि तुम तो दो और दो चार वाली दुनिया में रहते हो। काश, सत्य इतना गणित जैसा साफ-सुथरा होता। नहीं है इतना साफ-सुथरा। बुद्ध ने निराकार की घोषणा की है। न बुद्ध के अनुयायी समझ सके, न बुद्ध के विरोधी समझ सके ठीक-ठीक कि यह आदमी क्या कह रहा है! बुद्ध सिर्फ नेति-नेति की भाषा बोल रहे थे।
बुद्ध चाहते थे, प्रार्थना रुके। परमात्मा रुके तो प्रार्थना रुकती है। परमात्मा रहे, तो प्रार्थना जारी रहेगी। बुद्ध चाहते थे, ध्यान हो। परमात्मा रहे तो ध्यान होना मुश्किल। परमात्मा हटे तो ही ध्यान हो सकता है।
प्रार्थना और ध्यान का अंतर। प्रार्थना--सदा किसी के सामने। ध्यान--सदा एकांत में। प्रार्थना में हाथ जुड़े हैं किसी के चरणों में, ध्यान में कोई भी नहीं है। अकेले, अकेले तुम हो। परम एकाकी तुम हो। शुद्ध एकांत है। कोई भी नहीं और। कोई विचार नहीं, कोई तरंग नहीं। अगर परमात्मा का भी विचार है, तो बुद्ध कहते हैं, ध्यान खंडित हो गया।
मेरे पास लोग आते हैं, वे पूछते हैं, आप कहते हैं ध्यान करें, किस पर ध्यान करें? ये प्रार्थना की बात पूछ रहे हैं, ये ध्यान समझे ही नहीं। किस पर? तो तुम प्रार्थना की पूछ रहे हो। तुम पूछ रहे हो, किसकी प्रार्थना करें? माना, अगर प्रार्थना की मैं कहता, तो मुझे बताना चाहिए, किसके सामने प्रार्थना करो, किसकी प्रार्थना करो। ध्यान का अर्थ ही बड़ा अलग है।
ध्यान का अर्थ है, बस तुम अकेले रह जाओ, वहां कोई भी न हो। और यह मजा है, जब वहां कोई भी नहीं होता, तब तुम भी नहीं रह जाते। पहले तो ध्यान लगता है, अकेला होना। लेकिन मैं के बचने के लिए तू का बचना जरूरी है। वे एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। तुम तभी तक मैं कह सकते हो, जब तक किसी तरह पास में कगार पर तू बचा हो। किनारे पर तू खड़ा हो, तब तुम मैं कह सकते हो। जब कोई तू न बचे, उस घड़ी में मैं कैसे कहोगे? मैं बिलकुल अर्थहीन होगा। मैं का अर्थ होता है, जो तू नहीं। अब जब तू ही नहीं है, तो मैं कैसे होगा? पहले तू जाता है, फिर मैं चला जाता है।
ध्यान का मार्ग है, पहले तू को छोड़ दो। तू को छोड़ना है, तो परमात्मा छोड़ना पड़ेगा। फिर मैं अपने से छूट जाएगा। प्रार्थना का मार्ग है, पहले मैं को छोड़ दो, तू को पकड़ लो, परमात्मा को। और जब मैं छूट जाएगा, तो तू कैसे बचेगा?
वे अलग-अलग रास्ते हैं। बुद्ध का रास्ता ध्यान का है।
किब्रियाई तेरी बदनाम हुई जाती है
बंदगी तुझ पे इक इलजाम हुई जाती है
ऐ दुआ मांगने वाले! तेरी हरदम की दुआ
अब खुदा के लिए दुश्नाम हुई जाती है
प्रार्थना, पूजा, आदमी किए चला जाता है। यह आदमी की पूजा और प्रार्थना आदमी की ही पूजा और प्रार्थना है। तुम कहते हो, परमात्मा की पूजा करने गए थे। गए तो तुम थे। पूजा तुम्हारी ही होगी। तुमसे होगी, तुम्हारी होगी। तुम्हारा गुणधर्म तुम्हारी पूजा पर फैल जाएगा। तुम्हारी बीमारी के रोगाणु तुम्हारी पूजा में होंगे। तुम्हारी पूजा तुम्हारी पूजा है। तुम मंदिर तक अपने रोगाणु छोड़ आए। तुम जरा अपनी पूजा को भी देखो। तुम पूजा में मांगोगे क्या? तुम प्रार्थना में करोगे क्या? तुम वही करोगे जो तुम हो। स्वयं से अन्यथा तो कुछ किया नहीं जा सकता।
परमात्मा के सामने जब तुम हाथ फैलाते हो, तुम मांगते क्या हो? संसार ही मांगते हो। तुम्हारे हाथ ही संसारी हैं। तुम जब परमात्मा की प्रार्थना करने लगते हो, तुम्हारी प्रार्थना खुशामद जैसी होती है। इसलिए तो प्रार्थना को स्तुति कहते हैं--कि तू महान है, कि तू पतित-पावन है। यह तुम किस पर मक्खन लगा रहे हो!
तुमने मक्खन लगाना सीखा संसार में। यहां तुमने देखे लोग, जिनके अहंकार को जरा फुसलाओ--मक्खन लगाओ, मालिश करो--फिर जो भी तुम करवाना चाहो, करवा लो। गधों को घोड़े कहो, वे प्रसन्न हो जाते हैं। जब रास्ते पर तुम बिना प्रकाश की साइकिल से पकड़ जाओ, पुलिस वाले को इंस्पेक्टर कहो, वह छोड़ देता है।
वही आदमी भगवान की खुशामद कर रहा है, वह सोचता है कि ठीक है, समझा-बुझा लेंगे। लेकिन असली मंशा उसकी थोड़ी देर बाद जाहिर होती है, वह कहता है, नौकरी नहीं मिल रही। अब वह यह कह रहा है, इतनी प्रार्थना की तेरी और नौकरी नहीं मिल रही है, अब तेरी प्रार्थना में संदेह पैदा हुआ जा रहा है। अब तेरी इज्जत का सवाल है। अब बचा अपनी इज्जत, लगवा नौकरी। कि लड़का बीमार है, ठीक नहीं हो रहा है। और मैं इतनी तेरी पूजा कर रहा हूं। और तू क्या कर रहा है?
तुम्हारी प्रार्थना में भी शिकायत है। अगर शिकायत न हो, तो प्रार्थना ही नहीं होती। प्रार्थना की क्या जरूरत है?
किब्रियाई तेरी बदनाम हुई जाती है
बंदगी तुझ पे इक इलजाम हुई जाती है
तुम जब भी प्रार्थना करते हो, उसमें कहीं इलजाम होता है। शिकायत होती है। तुम ढांकते हो अच्छी भाषा में उसे, लेकिन अगर गौर से देखो, तो तुम यह कह रहे हो--लो, अब हम तो कर चुके स्तुति, अब तुम करके दिखाओ। अब हमने अपना कर दिया, अब तुम करो। अब अगर तुमसे न हो सके, तो कैसे तुम सर्वशक्तिमान! कैसे तुम सर्वज्ञाता! कैसे तुम सर्वव्यापक!
ऐ दुआ मांगने वाले! तेरी हरदम की दुआ
अब खुदा के लिए दुश्नाम हुई जाती है
तुम्हारी पूजा और प्रार्थना के शब्द अपशब्द हो जाते हैं। दुश्नाम हो जाते हैं।
बुद्ध ने कहा, प्रार्थना को हटाओ। बहुत हो चुकी प्रार्थना, कुछ होता नहीं। परमात्मा तो दूर, आदमी आदमी नहीं हो पाता। परमात्मा की खोज तो मुश्किल है, आदमी को आदमी ही नहीं मिल पाता। यह परमात्मा जोड़ना था। जोड़ता तो नहीं, बीच में तोड़ने की तरह खड़ा हो गया है, पत्थर की तरह खड़ा हो गया है।
क्या फर्क है हिंदू और मुसलमान में? कौन सा फर्क है? क्या फर्क है हिंदू और ईसाई में? बस परमात्मा की धारणा का फर्क है, और तो कोई फर्क नहीं है। कोई पूरब की तरफ हाथ जोड़ता है, कोई पश्चिम की तरफ हाथ जोड़ता है। ऐसी छोटी बातों पर सिर खुल जाते हैं। बड़ी क्षुद्र बातों में। धर्म ने क्षुद्र बातें सिखा दीं। यह तो परमात्मा के साए में बीमारियां पलीं।
बुद्ध ने कहा, हटाओ यह साया! आदमी को साफ-साफ होने दो। यह तो धर्म की आड़ में अधर्म पला। अगर आदमी की कोई ईश्वर की धारणा न हो, तो तुम्हारे और दूसरे के बीच क्या फासला होगा? तुमने कभी दो तरह के नास्तिक देखे? बुद्ध को यह बात समझ में आ गयी। दो तरह के तुमने नास्तिक देखे? तुमने नास्तिकों को कभी लड़ते देखा? तुमने नास्तिकों के कोई संप्रदाय देखे? क्या कारण है कि नास्तिक का कोई संप्रदाय नहीं?
नहीं पर संप्रदाय बन ही नहीं सकता। नहीं दो ढंग की तो हो ही नहीं सकती। तुम कहो मेरी नहीं अलग, तुम्हारी नहीं अलग। हमारी नहीं हिंदू, तुम्हारी नहीं मुसलमान। तो पागलपन मालूम होगा। हां में फर्क हो सकता है। रूप, आकार में फर्क हो सकता है, निराकार में तो फर्क नहीं हो सकता।
इसलिए नास्तिक तो सारी दुनिया में एक हैं। होना तो आस्तिक को एक चाहिए था। नास्तिक लड़ते, समझ में आता। ईश्वर-विहीन अंधकार में भटकते हुए लोग, वे तो लड़ते दिखायी नहीं पड़ते। आस्तिक लड़ता है। और एक आस्तिक दूसरे आस्तिक की पीठ में छुरा भोंकता है।
बुद्ध को यह बात दिखायी पड़ी। उन्होंने कहा, ईश्वर के नाम से भला नहीं हुआ। नुकसान हुआ। हटा लो। आदमी को आदमी नहीं मिल पा रहा।
बात इतनी सी है, ऐ वाइजे-अफलाकनशीं
क्या मिलेगा उसे यजदां जिसे इन्सां न मिला
भगवान कैसे मिलेगा? आदमी से मिलना नहीं हो पा रहा है! बस इतनी सी बात है। इसलिए बुद्ध ने ईश्वर को हटा लिया। और बुद्ध ने कहा, इस ईश्वर को हटाने से लाभ होगा। हानि तो कुछ भी नहीं। और फिर भीतर ईश्वर को प्रतिष्ठित किया। तुम्हारा मंदिर अगर तुम्हारे भीतर हो, तो लड़ाई-झगड़े पैदा नहीं होंगे। तुम्हारा मंदिर अगर बाहर बना तो मस्जिद से अलग हो जाएगा। लड़ाई-झगड़े शुरू हो जाएंगे।
बुद्ध ने कहा, अब वक्त आ गया है कि मंदिर आदमी के भीतर बने। वक्त आ गया है कि अब आदमी मंदिर बने। अब ईंट-पत्थर के मंदिर से काम न चलेगा।
'आपने कल कहा कि ईश्वर को अस्वीकार कर भगवान बुद्ध ने मनुष्य को बड़ी से बड़ी गरिमा से मंडित किया।'
निश्चित ही। मनुष्य को भगवान बनाया। मनुष्य को भगवान होने की संभावना दी। मनुष्य को कहा, भगवान कहीं और नहीं, तेरे ही बीज में छिपा है। उसे प्रगट होना है। ठीक भूमि दे, जल सींच, सुरक्षा कर, सूरज की किरणों को पड़ने दे, मेघ बरसें तो छिप मत, खुला रख--अनुकूल समय पर, सम्यक ऋतु में तेरा फूल खिलेगा। तू मिटेगा। भगवान होगा।
इसीलिए तो भगवान बुद्ध कहते रहे हैं कि भगवान नहीं है। फिर भी उनको प्रेम करने वाले लोग उन्हें भगवान कहते गए। और बुद्ध ने एक भी जगह इनकार नहीं किया कि मुझे भगवान मत कहो।
यह थोड़ा सोचने जैसा है। यह आदमी कहता है, कोई ईश्वर नहीं है, कोई भगवान नहीं है। और इसके शिष्य इसे भगवान कहकर बुलाते रहे और इसने एक बार भी न कहा कि मुझे भगवान मत कहो। बुद्ध ने भगवान को मनुष्य की अंतिम संभावना बनाया। वह मनुष्य का पूरा खिल जाना है, मनुष्य का प्रफुल्ल हो जाना है। छिपाओ मत आड़ों में।
चलीं इस चमन में आंधियां कि जमीन ता-ब-फलक गयी
मैं वह बदनसीब गुबार हूं, जो इक आस्तां में छिपा रहा
जब आंधियां आती हैं--और ऐसी आंधियां आती हैं, बुद्ध ऐसी ही आंधी हैं--जब कि जमीन आकाश को छू लेती है!
चलीं इस चमन में आंधियां कि जमीन ता-ब-फलक गयी
ऐसा तूफान उठा, ऐसा बवंडर उठा कि जमीन की धूल आकाश को छू ली।
मैं वह बदनसीब गुबार हूं, जो इक आस्तां में छिपा रहा
और मैं एक डयोढ़ी में छिपा रहा। एक जरा सी धूल का टुकड़ा, सीढ़ी की आड़ में पड़ा रहा। आंधी से बचा लिया।
जब बुद्ध जैसा व्यक्ति पृथ्वी पर आता है, तो आंधी लेकर आता है। उसके साथ तुम आकाश में उठ सकते थे। लेकिन बहुत थोड़े लोगों ने उस आंधी के प्रति अपने को खुला छोड़ा। और जब आंधी आती है, तो तुम्हारी सब धारणाओं को तोड़ जाती हैं। आंधी तुम्हारी धारणाओं की फिकर करती है? तुम्हारे घर-घूलों की? तुमने रेत के जो घर बना रखे हैं, उनकी चिंता करती है? आंधी आती है, सब पोंछ जाती है। आंधी ही क्या जो तुम्हारे रेत के घर-घूले न मिटा पाए! हिंदू, मुसलमान, ईसाई, सबको पोंछ जाती है। जब आंधी आती है, तो वेद, कुरान, बाइबिल, सबको उड़ा जाती है। जब आंधी आती है, तो सिर्फ थोड़े से हिम्मतवर उस आंधी के ऊपर सवार हो जाते हैं और आकाश को छू लेते हैं।
बुद्ध ने ईश्वर को इंकार किया, ताकि तुम ईश्वर हो सको। बुद्ध ने ईश्वर की बात नहीं उठायी। बात क्या करनी है! होने की बात है, करने की थोड़े ही बात है! होकर देख लो। बुद्ध ने द्वार खोला और कहा, आओ, भगवान होकर देख लो! आओ, आकाश होकर देख लो! बात कब तक करते रहोगे? बहुत हो चुकी बात।
यही मैं तुमसे कहता हूं, न भगवान की पूजा की जरूरत है, न भगवान का गुणगान करने की जरूरत है। कितना तो कर चुके। कब समझोगे? द्वार खोलता हूं, आओ, भगवान ही हो जाओ! इससे कम पर राजी भी क्या होना! क्या गिड़गिड़ाए चले जाना! उठो, अपनी गरिमा को सम्हालो! उठो, अपनी गरिमा की अभिव्यक्ति करो! उठो, अभिव्यंजना होने दो!
डर स्वाभाविक है। प्रश्न में पूछा गया है, 'यही दलील तो नास्तिक भी ईश्वर के खिलाफ पेश करते हैं।'
दलील के शब्द यही होंगे, दलील यही नहीं। शब्दों पर मत जाओ। शब्द तो कभी-कभी एक ही जैसे होते हैं, फिर भी अर्थ अलग हो जाता है। प्रेम में वही शब्द कहा जा सकता है, क्रोध में वही शब्द कहा जा सकता है। प्रशंसा में वही शब्द कहा जा सकता है, निंदा में वही शब्द कहा जा सकता है। सचाई से वही शब्द कहा जा सकता है, व्यंग्य में वही शब्द कहा जा सकता है।
शब्द पर मत जाओ। मूढ़ों को भी महापंडित कहते हैं! शब्द में व्यंग्य भी हो सकता है। शब्द वही है। शब्द पर मत जाओ। थोड़ा झांककर देखो, शब्द में अर्थ को तलाशो। चार्वाक ने कहे हैं वही शब्द। बुद्ध भी वही शब्द कहते हैं। माक्र्स भी वही शब्द कहते हैं। लेकिन बड़े फर्क हैं।
राहुल सांकृत्यायन ने--एक बौद्ध पंडित ने--जो कि साथ ही साथ कम्युनिस्ट भी थे, इस बात की पूरे जीवन चेष्टा की कि बुद्ध और माक्र्स में तालमेल है। बुद्ध वही कहते हैं जो माक्र्स। बुद्ध जैसे माक्र्स की भविष्यवाणी हैं। द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की पूर्वघोषणा। मगर राहुल सांकृत्यायन का दृष्टिकोण बुनियादी रूप से गलत है। गलत ही नहीं, खतरनाक है, भ्रामक है।
बुद्ध वही नहीं कहते हैं जो माक्र्स कह रहे हैं। माक्र्स का वक्तव्य सामान्य नास्तिकता का वक्तव्य है। बुद्ध का वक्तव्य परम आस्तिकता का वक्तव्य है। ऐसी आस्तिकता जहां परमात्मा के होने से भी बाधा पड़ती है। ऐसी आस्तिकता जहां आस्था ही काफी है, जहां आस्था के लिए कोई सीढ़ी नहीं चाहिए।
इसे खयाल में लो। अगर तुम परमात्मा है, इसलिए झुकते हो, तो तुम्हारा झुकना पूरा नहीं है। अगर परमात्मा न होगा तो फिर तुम न झुकोगे। अगर परमात्मा है, इसलिए झुकते हो, तो तुम्हारा झुकना वास्तविक नहीं है। यह ऐसे ही हुआ कि रास्ते से निकलते थे, देखा पुलिस वाला नहीं है, तो तुमने कार जहां चाही वहां मोड़ दी। पुलिस वाला होता, तो तुम बाएं चलते। पुलिस वाला नहीं, तो जहां चाहे वहां मोड़ दी।
मेरे एक मित्र हैं, कवि हैं। इंग्लैंड में कुछ शोध-कार्य करते थे। एक रात किसी मेहमान के घर से लौटते थे टैक्सी में। दो बजे रात की बात। सर्द रात, बर्फ पड़ रही। राहों पर कोई नहीं, दूर-दूर तक सब निर्जन। लेकिन वह टैक्सी-ड्राइवर एक चौराहे पर आकर रुक गया, क्योंकि अभी प्रकाश की बत्ती रुकने को कह रही थी।
तो मेरे मित्र ने कहा, यहां रुकने की क्या जरूरत है? ठिठुरे जा रहे हैं। चलो भी! न कोई पुलिस वाला है, न कोई देखने वाला है, न कोई है जिससे कि टक्कर हो जाए। उस टैक्सी वाले ने कहा, फिर आप कोई और टैक्सी पकड़ लें। यह सवाल पुलिस वाले का नहीं है, निष्ठा का है। यह सवाल इसका नहीं कि कोई है या नहीं, नियम का है।
तुम अगर परमात्मा के कारण नैतिक हो, तुम्हारी नीति बड़ी कमजोर है, लचर है। तुम अगर नैतिक हो, परमात्मा हो या न हो, तो तुम्हारी नीति बहुमूल्य है।
मजनू हैं, मगर ख्वाहिशे-लैला नहीं करते
हम इश्क तो करते हैं, तमन्ना नहीं करते
बुद्ध ने आस्था दी। आस्था के लिए कोई जगह न दी जहां तुम जगह पर रख लो उसे। बुद्ध ने सिर्फ आस्था का शुद्ध-भाव दिया। श्रद्धा दी। श्रद्धा के लिए कोई आधार न दिया। निराधार-श्रद्धा दी। बुद्ध ने कहा, झुको तो जरूर, लेकिन कोई है नहीं जिसके लिए झुको। झुकने में मजा है। बुद्ध ने कहा, झुकना इतना अहोभाव है, झुकना इतना परम आनंद है कि झुको, यह मत पूछो किसके लिए झुकते हो। अगर तुम किसी के लिए झुकते हो, तो तुमने झुकने का मजा जाना ही न। स्वाद न जाना। झुकना अपने आप में इतना पर्याप्त है, अब और किसी सहारे की जरूरत नहीं। सहारा क्यों मांगते हो? नाचो।
इसका अर्थ ठीक से समझना। इसका अर्थ हुआ कि बुद्ध ने साधन को साध्य बना दिया। बुद्ध ने कहा, मार्ग ही मंजिल है। यात्रा ही गंतव्य है। खोजी में ही खोज का आखिरी बिंदु छिपा है, कहीं और नहीं। यही क्षण शाश्वत है, सनातन है।
बुद्ध अपने को क्षणवादी कहते थे। वे कहते थे, क्षण ही बस है। अगले क्षण को मत मांगो। यह क्षण काफी है। इस क्षण का आनंद काफी है। इस क्षण का नृत्य, संगीत काफी है। तुम इसको जीओ, भोगो।
कठिन है। क्योंकि हमें लगता है कि बिना सहारे हम कैसे चलेंगे। हालांकि तुम बिना सहारे ही चलते रहे हो। सहारा सिर्फ भ्रांति है। बुद्ध ने सिर्फ भ्रांति छीनी है तुमसे। और अगर एक बार भ्रांति गिर जाए, तो तुम्हें अपने पैरों पर भरोसा आ जाए। और अपने पर भरोसा आया, तो परमात्मा पर भरोसा आया।
ऐसा समझो, जिसे अपने पर भरोसा न आया, उसे कैसे परमात्मा पर भरोसा आएगा। जिसने अभी अपने पर भी भरोसा नहीं लाया, वह जिस पर भी भरोसा लाएगा, उस पर भी संदेह बना रहेगा। तुम्हारे भीतर संदेह है, अपने पर संदेह है।
मेरे पास लोग आते हैं। वे कहते हैं, हमारी आप पर पूरी श्रद्धा है। मैं कहता हूं, ठहरो, जल्दी न करो। तुम्हारी अपने पर श्रद्धा है? वे कहते हैं, अपने पर तो नहीं है। तो फिर मैंने कहा, तुम मुझ पर कैसे करोगे? तुम्हीं करोगे न? तुम्हें अपने पर श्रद्धा नहीं है, तो अपनी श्रद्धा पर कैसे श्रद्धा होगी। वह तुम्हारी ही श्रद्धा है न! तुम भीतर डगमगा रहे हो, संदेह से भरे हो, तुम घबड़ाकर कहते हो, हम आप पर श्रद्धा करते हैं, पूरी श्रद्धा करते हैं। यह टिकेगी नहीं। यह ज्यादा देर न चलेगी। तुम गलत आश्वासन में पड़ जाओगे। व्यर्थ की उलझन पैदा होगी।
सत्य को देखो, सचाई को देखो। पहले वहां पैरों का डगमगाना समाप्त होना चाहिए। जिस दिन वहां तुम खड़े हो जाओगे--सुदृढ़--उस सुदृढ़ता से एक और ही तरह की श्रद्धा का जन्म होगा। उस श्रद्धा की जड़ें होंगी तुम्हारे जीवन में। उसमें बल होगा। सामर्थ्य होगा। उस श्रद्धा में आश्वासन होगा। कुछ हो सकता है।
अभी तुम जो श्रद्धा कर रहे हो, और कहते हो, मैं सब आपके ऊपर छोड़ता हूं, मेरी आप पर बड़ी श्रद्धा है, तुम आज नहीं कल मुझे दोष दोगे। तुम कहोगे, हमने तो सब छोड़ दिया था, कुछ हुआ नहीं। आपने कुछ किया नहीं। तुम छोड़ कैसे सकते हो पूरा? पूरा छोड़ने के लिए तो पूरी श्रद्धा चाहिए। और मजा यह है, जिसको अपने पर पूरी श्रद्धा है, छोड़ने की कोई जरूरत नहीं है। जहां श्रद्धा है, वहीं सत्य के सुमन खिलने लगते हैं।
बुद्ध ने तुम्हारे आसपास से जो भी सांयोगिक धर्म है, वह हटा दिया। जो बिलकुल सारभूत धर्म है, उतना ही बचाया। उन्होंने जो भी अनावश्यक था, वह हटा दिया। उन्होंने कहा, अनावश्यक का जंगल खड़ा हो गया है। उसमें तुम भटके चले जा रहे हो। अनावश्यक को हटा दो, आवश्यक को बचा लो। जिसको हटाया न जा सके, बस उसको बचा लो। जिसको काटना भी चाहो तो न काट सको, बस उसको बचा लो। जो तुम्हारा स्वभाव है, वही बच जाए तो सब बच गया।
फिर पूछा है, 'और क्या ईश्वर को अस्वीकार कर मनुष्य का अहंकार और भी अंधा नहीं होगा?'
हो सकता है। आदमी पर निर्भर है। तुम पर निर्भर है। तुम ईश्वर के होने को अहंकार बना सकते हो, तो ईश्वर के न होने को तो बना ही सकते हो। ईश्वर के होने से लोग अकड़कर चल रहे हैं कि हम ईश्वर पर भरोसा करते हैं, हम ईश्वर के मानने वाले। मंदिर जाते आदमी को देखो! दूसरों की तरफ ऐसे देखकर जाता है कि सब नरक जा रहे हैं। वह मंदिर जा रहा है!
कहते हैं, मोहम्मद एक युवक को लेकर मस्जिद गए। जब नमाज पढ़कर वापस लौटने लगे--अभी लोग सोए थे, गरमी के दिन थे, रात देर तक न सो सके थे, लोग बिस्तरों पर पड़े थे, राह पर--उस आदमी ने कहा कि देखो हजरत, ये पापी अभी तक सो रहे हैं!
ये पहली दफे गए थे खुद हजरत! मोहम्मद वहीं रुक गए। उन्होंने कहा, यह मुझसे भूल हो गयी कि मैं तुझे मस्जिद ले गया। तेरी नमाज तो बेकार गयी, मेरी नमाज खराब हो गयी। मुझे फिर जाना पड़ेगा।
उस युवक ने पूछा, मतलब? कहा, मतलब यह कि तू सोया रहता, जैसा तू रोज सोया रहता था, तो कम से कम इन लोगों को पापी तो नहीं समझता था। आज तूने एक दफा नमाज क्या पढ़ ली, सारा जगत पापी हो गया! तू मुझे छोड़, हाथ जोड़े तेरे। अब कल से मत उठना। कम से कम और लोग पापी तो नहीं दिखायी पड़ते थे। यह तो बड़ा अहंकार हो गया।
मोहम्मद--कहते हैं--वापस गए, रोए, फिर से प्रार्थना की और कहा, मुझे क्षमा कर दो, इस गलत आदमी को मैं उठा लाया। मैंने तो सोचा था प्रार्थना में डूबेगा, यह तो अहंकार में डूब गया।
तो तुम भगवान से जब अहंकार में डूब गए--ठीक है, प्रश्न बिलकुल ठीक है--भगवान न होगा, तो कहीं और अहंकार में न डूब जाओ। तुम पर निर्भर है। तुम औषधि को जहर बना लेते हो चाहो तो, चाहो तो जहर औषधि हो जाती है। सब तुम पर निर्भर है।
मैंने सुना, एक आदमी मरना चाहता था। तो रात जहर खरीदकर आ गया। पी लिया जहर। चिट्ठी लिखकर टेबिल पर रख दी कि मैं मर रहा हूं, क्षमा किया जाऊं। जो भला-बुरा किसी से कहा हो, माफ कर देना। सुबह घर के लोग इकट्ठे हुए, देखा चिट्ठी रखी है, छाती पीट-पीटकर रोने लगे। उनकी रोने की आवाज सुनी, वह आदमी जग गया।
तो पहले तो लोगों ने उसकी काफी लानत-मलामत की कि यह तुमने क्या करने की सोची? फिर खुश हुए कि चलो मिलावटी जहर था। जहर भी शुद्ध आज मिलना कहां संभव है! शुद्धता के दिन गए। तो जहर भी, मरना भी हो तो मुश्किल है। खैर, भागी पत्नी, पड़ोस की दुकान से मिठाई खरीद लायी--खुशी में कि पति बच गया, मिठाई खिला दी। वे हजरत मर गए। मिठाई में जहर था। मिलावट थी। मुराद पूरी हुई। जो जहर से न हो सकी, वह मिठाई से हो गयी।
करोगे क्या? आदमी सब चीज में मिलावट किए जाता है। औषधि का जहर बना लेता है, जहर की औषधि बना लेता है, करोगे क्या?
तुम्हारा प्रश्न उचित है। डर है। लेकिन डर बुद्ध के वचनों के कारण नहीं है, डर आदमी की बेईमानी के कारण है। अब इसके लिए बुद्ध क्या करें? बुद्ध ने तो अहंकार छोड़ने के लिए ही उपाय बताया। बुद्ध ने तो यह कहा, जब भगवान ही नहीं है, तो तुम क्या खाक होओगे? बुद्ध ने यह कहा कि भगवान तक को इंकार कर रहा हूं, अब तुम कहां बचोगे? तुम किस ओट में बचोगे? यहां भगवान भी नहीं है, तुम अपने होने के सपने छोड़ो। तुम्हारा होना क्या!
इसलिए बुद्ध ने आत्मा शब्द का उपयोग भी करने से अपने को रोका। अनात्मा! अनत्ता! वे कहते हैं, तुम भी नहीं हो। न भगवान है वहां ऊपर, न तुम हो यहां भीतर। वहां जाने दो भगवान को, यहां जाने दो तुमको। तब जो बच रहेगा, बुद्ध उसकी कोई बात नहीं करते। वे कहते हैं, उसका तो स्वाद ही लो, जो बच रहेगा। वहां तू न रहे, भगवान न रहे; यहां मैं न रहे, भक्त न रहे। यह मैंत्तू का झमेला न रहे। फिर जो बच रहेगा, वही निर्वाण है। वह परमशून्य अवस्था, जहां कोई शब्द नहीं उठता, कोई तरंग नहीं उठती, वह परम निर्विकार दशा, वही समाधि है।
बुद्ध ने तो अहंकार से छुटकारे के लिए ही कहा। बुद्ध ने तो कहा कि तुम्हारा अहंकार अगर भगवान के साथ बंध जाए, तो वह ऐसे ही है जैसे कि अपने डब्बे को रेलगाड़ी के पीछे जोड़ दिया। डब्बा शायद अपने आप न भी चल पाता हो, अब भगवान के नाम से चलेगा। वह तो ऐसे ही है जैसे कि कार बिगड़ जाती है तो बस के साथ अटका दी। तुम्हारा अहंकार तो जगह-जगह अटकता है। टूट-फूट जाता है। छोटा है--बड़ा छोटा है। उसको महा-अहंकार के साथ जोड़ दिया--भगवान के साथ। फिर तुम उसके ईंधन से चलने लगे।
बुद्ध ने कहा, छोड़ो। वह भी नहीं है। तुम भी नहीं हो। यहां होना असत्य है। यहां न-होना सत्य है। यहां है झूठा है। यहां नहीं सत्य है। यहां आकार भ्रांति है, निराकार यथार्थ है। इसलिए बुद्ध शून्यवादी हैं।
नहीं, अगर तुम बुद्ध को समझोगे, तो अहंकार को बचने का कोई उपाय नहीं है।

दूसरा प्रश्न:

जब मैं शुरू-शुरू आपके पास आयी थी तब ऐसा लगता था, मैं किसी विशेष पात्रता के कारण आपके पास पहुंच पायी हूं। लेकिन अब दिनों-दिन अपनी अपात्रता का बोध हो रहा है। और आपकी असीम करुणा का भी। भगवान, मेरा अहोभाव स्वीकार करें और मुझे आशीर्वाद दें।

पात्रता का बोध अपात्रता है। अपात्रता का बोध पात्रता है। जिसने समझा कि मैं पात्र हूं, उसका अहंकार सघन होगा। जिसने समझा कि मैं अपात्र हूं, उसका अहंकार पिघलेगा, बहेगा। इसलिए कभी-कभी पापी पहुंच जाते हैं और पुण्यात्मा नहीं पहुंच पाते। पुण्य भी पाप से बदतर हो जाता है, अगर उससे अहंकार सजने लगे। और अक्सर सजता है।
कल रात ही मैं एक कहानी कह रहा था। एक बूढ़ी औरत मरी। देवदूत आए। वह बड़ी घबड़ा रही थी और कंप रही थी मर कर। आत्मा उसकी सिकुड़ रही थी। और घबड़ा रही थी, क्योंकि उसको पक्का था कि नरक ले जाएंगे। कभी कुछ ऐसा किया ही नहीं था कि स्वर्ग ले जाने की कोई बात उठती। पाप की प्रतीति थी, अपात्रता का बोध था।
देवदूतों ने कहा, तू अपने को इतना अपात्र समझती है, तो हमें तुझे स्वर्ग ले जाना ही पड़ेगा। हम तुझसे यह पूछते हैं कि तूने जीवन में कोई भी एकाध अच्छा काम किया हो। उसने कहा कि कुछ याद नहीं आता कि मैंने कभी अच्छा काम किया हो। बुरे बहुत किए। उनकी तो शृंखला, मेरा पूरा जीवन भरा है। हां, एक बात है। एक दफे एक भिखारी को एक गाजर मैंने भेंट दी थी। उन्होंने कहा, कोई फिकर नहीं।
वह गाजर प्रगट हुई और देवदूतों ने कहा कि तू पकड़ ले गाजर को, यह तुझे स्वर्ग ले जाएगी। इतना काफी है। परमात्मा की कृपा अपार है। इतना काफी है। वह बूढ़ी चढ़ने लगी स्वर्ग की तरफ, गाजर उठने लगी ऊपर। और भी जो इधर-उधर छिपी खड़ी आत्माएं थीं, भूत-प्रेत थे, वे भी उसके पैर पकड़ लिए, वे भी चलने लगे। लेकिन गाजर का बल ऐसा था कि बूढ़ी को वजन का पता ही न चले। कतार बड़ी होने गली। उधर बूढ़ी स्वर्ग पहुंचने लगी, क्यू जमीन तक लग गया। जब वह स्वर्ग के दरवाजे पर पहुंची, उसको अकड़ आयी, पात्रता का खयाल आया। उसने कहा कि अरे, तो पहुंच गयी मैं भी स्वर्ग! उसने नीचे झांककर देखा, वहां कतार लगी हुई थी। उसने कहा, हटो, यह गाजर मेरी है। ऐसा कहने में हाथ छूट गए। धड़ाम से! वह तो गिरी ही, सत्संगी भी गिरे।
तो इसीलिए तो गुरु जरा सोचकर चुनना। जब गुरु गिरेगा, सब सत्संगी भी साथ गए। गाजर मेरी है! अपात्रता का बोध तो स्वर्ग की तरफ ले आया, पात्रता के बोध ने स्वर्ग के द्वार से भी लौटा दिया। आदमी इसी तरह जीता है।
मेरे पास लोग आते हैं, वे कहते हैं कि आपके पास आ गए, जरूर जन्मों-जन्मों में कोई पुण्यकर्म किए होंगे। आकर भी दूर जाने की कोशिश कर रहे हैं। कह रहे हैं, गाजर मेरी है। आकर भी अहंकार को भर रहे हैं। पर अनजाने चल रहा है यह सब खेल। यह होश में नहीं हो रहा है, नहीं तो कौन करे? यह बेहोशी में चल रहा है। शराब पीए हैं। अहंकार शराब है।
तो स्वभावतः जब मेरे पास कोई प्राथमिक रूप से आता है, तो वह यही सोचता हुआ आता है कि हम पात्र हैं, योग्य हैं। हमने यह किया, वह किया। और जब मैं तुम्हें स्वीकार कर लेता हूं संन्यासी की तरह, तब तो तुम्हारा अहंकार छलांगें भरने लगता है।
इस भ्रांति में मत पड़ना। मैं सभी को स्वीकार करता हूं। मैं अस्वीकार करता ही नहीं किसी को। इसलिए पात्रता-अपात्रता का भेद ही मत करना। तुम यह मत सोचना कि तुमको स्वीकार किया है। जो भी आता है उसी को स्वीकार करता हूं। इसलिए इस हिसाब में तो पड़ना ही मत। हां, और हैं गुरु, जो कहते हैं पहले पात्र होना चाहिए। मैं तुम्हें स्वीकार करता हूं, पात्रता-अपात्रता का हिसाब ही नहीं रखता। मेरा कोई गणित नहीं है, मैं कोई व्यवसायी नहीं हूं, कोई सौदा नहीं है। तुम आ गए, काफी है।
अगर तुम अपात्र हो और आ गए, और भी अच्छा। क्योंकि अपात्र का अर्थ है, अहंकार सघन नहीं है। बहुत कुछ हो सकता है। पात्रों से खतरा है।
तो मेरे पास कोई आ जाते हैं, वे कहते कि हम बीस साल से हठयोग कर रहे हैं। कोई कहता है, हम उपवास कर रहे हैं, प्राणायाम कर रहे हैं। तो उनकी आंखों में मैं देखता हूं कि पात्रता बहुत घनी है। मुझसे संबंध न हो पाएगा। उनकी गाजर बड़ी है। और उनका भाव भारी है। वे इस द्वार से खाली लौट जाएंगे।
मेरे पास आने का एक ही उपाय है और वह यही है कि तुम समझना शुरू करो कि तुम नहीं हो। क्योंकि इसी भांति तुम अपने पास आओगे। मेरे पास होने का प्रयोजन क्या है--कि तुम अपने पास आ सको। मेरा तो बहाना है। आना तो तुम्हें अपने पास है। जितना मैं मजबूत होगा, उतना ही तुम अपने से दूर रहोगे। मैं तुम नहीं हो। जहां तक मैं है, वहां तक तुम भटके हो। वहां तक तुमने किसी और को अपना होना समझा है। इधर मैं गिरा कि तुम्हें अपनी वास्तविकता से मिलन हुआ। पहली दफे तुम्हारा आमना-सामना होगा--अपने से। पहली दफा आंख में आंख डालकर देखोगे तुम स्वयं की।
तो ठीक है, 'जब शुरू में आना हुआ था, तो मैं किसी विशेष पात्रता के कारण आपके पास पहुंची हूं, ऐसा लगता था।'
वह भ्रांति थी। उसे मुझे तोड़ना ही पड़ेगा। और शुभ है कि वह टूटने लगी।
'लेकिन अब दिनों-दिन अपनी अपात्रता का बोध हो रहा है।'
शुभ हो रहा है। लेकिन मेरी ये बातें सुनकर कि अपात्रता पात्रता है, अब इस बोध से अकड़ मत जाना।
आदमी का मन बड़ा ही चालबाज है। अभी मैंने कहा कि अपात्रता पात्रता है, अब तुम अकड़कर मत बैठ जाना रीढ़ सीधी करके, कुंडलिनी जाग्रत मत कर लेना कि अरे, तो मैं पात्र हो गयी! तो अच्छा हुआ कि अपात्र अपने को समझ लिया, पात्र हो गयी। बस तो फिर स्वर्ग के द्वार से गाजर छूटी।
अब तुम सोच-समझकर चलना। मैं लाख कहूं कि तुम पात्र हो, तुम अपनी अपात्रता को और-और गहरा समझते जाना।
और पूछा है, 'अपात्रता का बोध हो रहा है। आपकी असीम करुणा का भी।'
जैसे-जैसे अपात्रता का बोध होगा, वैसे-वैसे मेरे प्रेम का और करुणा का बोध भी होगा। क्योंकि तुम भरने लगोगे। वहां तुम खाली हुए कि भरे। भरे रहे कि खाली रहे।
वर्षा होती है। मेघ बरसते हैं। पहाड़ों पर भी, खाई-खड्डों पर भी। पहाड़ तो खाली रह जाते हैं। सब पानी बरसता है, बह जाता है। खाई-खड्डे भर जाते हैं। जो खाली थे, वे भर जाते हैं। पहाड़ तो पहले ही से भरे हैं, अकड़कर खड़े हैं। पत्थर ही पत्थर भरे हैं। उनकी शान देखो! अकड़े खड़े हैं आकाश में। खाली रह जाते हैं, रिक्त रह जाते हैं। भीगते भी नहीं। और खाई-खड्डे, जिनकी कोई अकड़ नहीं, भर जाते हैं। झीलें बन जाती हैं।
तो तुम अगर खाई-खड्डे की तरह मेरे पास रहे, तो निश्चित भर जाओगे। और अगर तुम पहाड़ों की तरह अकड़े रहे और तुमने समझा कि हम भरे हुए हैं, तो तुम खाली रह जाओगे।
मैं बरसता रहूंगा। न मैं फिक्र करता खाइयों की, न पहाड़ों की। दोनों पर बरसता हूं। कोई हिसाब भी नहीं रखता। हिसाब रखकर कौन बादल कब बरसा है?
इसलिए खयाल रखना, कहीं अब ऐसा न हो, रीढ़ को जरा सीधी मत करना। झुके बैठे हो, झुके ही बैठे रहना, और झुक जाना कि सिर जमीन से लग जाए। तो और भी और, और भी और करुणा का, प्रेम का, प्रसाद का अनुभव होगा।
तुम झोली तो फैलाओ। तुम मांगते भी हो और झोली भी नहीं फैलाते। तुम जल के किनारे खड़े हो, अंजुली भी नहीं बनाते। झुकते भी नहीं। प्यासे के प्यासे रह जाते हो। अब नदी छलांग लगाकर तुम्हारे गले में न उतर जाएगी। थोड़ा झुको। जलधार के करीब आओ, अंजुली बनाओ। जितना झुकोगे, उतना पाओगे। अगर बिलकुल झुक जाओ तो नदी में डूब जाओगे। इतने डूब जाओगे कि नदी तुम्हारे ऊपर से बह जाएगी। लेकिन सब तुम्हारी शून्यता पर निर्भर है। इसलिए ऐसा कुछ भाव खड़ा मत करना जिससे तुम्हारी शून्यता मिटती हो।
मैं तुमसे यह कहना चाहता हूं कि तुम्हारे मिटने से जो संगीत पैदा होगा, वैसा संगीत, वैसा अनाहत नाद तुम्हारे होने से पैदा होने वाला नहीं है।
दिल मेरा तोड़कर कहा उसने जबाने-राज में
साज में नग्मे कहां हैं जो शिकस्ते-साज में
मेरे दिल को तोड़कर उसने बड़ी भेद भरी आवाज में कहा--
साज में नग्मे कहां हैं जो शिकस्ते-साज में
वीणा में वे स्वर कहां, जो वीणा के टूटने पर प्रगट होते हैं! निश्चित ही वीणा के टूटने पर जो स्वर प्रगट होते हैं, वे सुने नहीं जा सकते। वे इतने स्थूल नहीं हैं। वे केवल अनुभव किए जा सकते हैं। उसको झेन फकीरों ने एक हाथ की ताली कहा है। दो हाथ की ताली तो तुमने सुनी है। एक हाथ की ताली सुनी?
जब झेन फकीरों के पास, कोई गुरु के पास कोई शिष्य जाता है, पूछता है, क्या करूं? तो वह कहता है, एक हाथ की ताली सुनो। अनाहत नाद।
दो हाथ की ताली तो आहत नाद है। आहत का मतलब, दो की टक्कर से पैदा हुआ। टक्कर से जो पैदा हुआ, वह हिंसा से पैदा हुआ। जो टक्कर से पैदा हुआ, वह थोड़ी देर पहले नहीं था, थोड़ी देर बाद नहीं हो जाएगा। वह शाश्वत नहीं हो सकता। एक हाथ की ताली सुनो। अब एक हाथ की ताली जिसने सुन ली, वह बजती ही रहेगी। न उसका कोई प्रारंभ है, न कोई अंत है। वह शाश्वत है। उसको हमने अनाहत नाद कहा है।
मुझे मौका दो कि तुम्हारी वीणा को बिलकुल तोड़ दूं। मुझे मौका दो कि तारत्तार उखाड़ दूं। मुझे मौका दो कि तुम्हारी वीणा टुकड़े-टुकड़े हो जाए, क्षार-क्षार हो जाए। तुम उसे जोड़ भी न पाओ। तुम्हारा अहंकार गिर जाए।
दिल मेरा तोड़कर कहा उसने जबाने-राज में
साज में नग्मे कहां हैं जो शिकस्ते-साज में
और जिसे तुम अपना होना समझते हो, यह तो न-होने में डूब जाएगा। इसे बचाओ मत। इसे जिसने बचाया, उसने खोया। जिसने खोया, बस उसने बचाया। यह तो तुम्हारा होना, आज नहीं कल मौत ले जाएगी, बहा ले जाएगी, बाढ़ आ ही रही है। आ ही गयी है, घड़ीभर की देर है।
जिसे तुम जीवन कहते हो, यह तो हाथ से छूटा-छूटा है। मैं तुम्हें एक और जीवन बता रहा हूं। अभी तुमने होने को जीवन समझा है। मैं तुम्हें न-होने को जीवन बता रहा हूं। तुम मरने के पहले मरना सीख जाओ। इसके पहले कि मौत मिटाए, तुम मिट जाओ, स्वेच्छा से। तो फिर तुम्हें मौत न मिटा सकेगी।
जो मौत के आने के पहले मर गया, मिट गया, उसे मौत मिटा कैसे सकेगी? मौत आएगी, खड़ी रह जाएगी। कोई उपाय न पाएगी। यह साज तो पहले ही टूटा पड़ा है। इसे तो तुमने अपने हाथों तोड़ दिया है। और जो तुमने अपने हाथों तोड़ा है, तुम उस टूटने के पार बच जाओगे। तोड़ने वाला तो बच ही जाएगा। समस्त साधना न-हो जाने की साधना है।
जिंदगी यह है कि जिस रेत पर जलते थे कदम
अब वही बिस्तरे-आराम हुई जाती है
जिंदगी यह है कि सोया था मुसाफिर थककर
सो के उठा है तो अब शाम हुई जाती है
जिसको तुम जिंदगी कहते हो, वह ऐसे ही गुजरती है। और जिस रेत पर पैर जलते थे, जहां घबड़ाहट और बेचैनी होती थी, जिस मिट्टी से तुम बचकर चलते थे, जिस धूल से अपने को सम्हालकर चलते थे, कीचड़ पैर न लग जाए, उसी कीचड़ में बिस्तर हो जाएगा।
जिंदगी यह है कि जिस रेत पे जलते थे कदम
अब वही बिस्तरे-आराम हुई जाती है
मिट्टी में मिल जाना होगा।
जिंदगी यह है कि सोया था मुसाफिर थककर
सो के उठा है तो अब शाम हुई जाती है
थकान ही तुम्हारी पूरी जिंदगी की कहानी है। थक-थककर, थक-थककर मिट जाते हो। इससे जागो।
एक और होने का ढंग है, न-होना। बड़ा गहरा ढंग है। जैसे परमात्मा है, उस ढंग से हो जाओ। बुद्ध जिस ढंग से कहते हैं, परमात्मा नहीं है, तुम भी उसी ढंग से नहीं हो जाओ। नहीं परमात्मा के होने का ढंग है।
लोग मेरे पास आते हैं, वे पूछते हैं, परमात्मा कहां है? मैं कहता हूं, अनुपस्थिति उसके उपस्थित होने का ढंग है। उसने बड़ी होशियारी से बड़ी मतलब की बात चुन ली है। उपस्थित होता, तो कभी न कभी अनुपस्थित होना पड़ता। जो होता है, उसे मिटना पड़ता है। उसने पहले ही से हिसाब रखा। उसने न-होने को चुना। वह है, और ऐसे है जैसे न हो। उसकी मौजूदगी गैर-मौजूदगी है। वह तुम्हें सब तरफ से घेरे है, और फिर भी तुम्हें उसका स्पर्श पता नहीं चलता। बड़ा कुशल है। सब तरफ से छुआ है, सब तरफ से तुम्हें पिरोया है, सब तरफ से तुम्हारे भीतर-बाहर जा रहा है, श्वास-श्वास में आ-जा रहा है, फिर भी तुम्हें पता नहीं चलता। कैसे प्यारे कदम हैं, आवाज भी नहीं होती! अनाहत नाद है। एक हाथ की ताली है। तुम भी ऐसे ही हो रहो।
मेरे पास अगर तुम मिटना सीख लो, तो तुम सब पा लोगे। मेरे पास अगर तुम मर जाओ, तो तुम अनंत जीवन पा लोगे। सूली पर जो चढ़ा, सिंहासन उसका है।

आखिरी प्रश्न:

ना जानूं मैं आरती-वंदन, ना पूजा की रीत...
खुदाया मेरी ख्वाहिशों पर न जा तकाजा मेरा सख्त मायूब है
जो मर्जी हो तेरी वही खूब है।
अब स्वभाव निराश नहीं हो सकता, प्रभो!

स्वभाव का प्रश्न है।
'ना जानूं मैं आरती-वंदन, ना पूजा की रीत।'
जानने की जरूरत ही नहीं। जो जानते हैं, वे बड़ी मुश्किल में पड़ते हैं। रीति ही हाथ पड़ती है फिर। फिर विधि ही रह जाती है हाथ में। तकनीक ही रह जाता है। जानने वाले बड़ी बुरी तरह भटकते हैं।
मोजेज के जीवन में उल्लेख है। एक पहाड़ी रास्ते से गुजरते थे। एक गरीब आदमी को प्रार्थना करते देखा। फटे-पुराने कपड़े थे, धूल-धूसर थे, पसीने से लथपथ था--गड़रिया था। वह कह रहा था परमात्मा से कि हे प्रभु, अगर मुझे मौका दे, अगर मुझे अपने तू पास रख, तो रोज तुझे खूब घिस-घिसकर नहला दूंगा। तेरी जूंए भी निकाल दूंगा। पिस्सू इत्यादि तेरे शरीर पर आ जाते होंगे, एक न बचने दूंगा। तू देख मेरी भेड़ों को, कैसा साफ-सुथरा रखता हूं! तू जरा मुझे मौका तो दे। थक जाएगा, रात तेरे पैर दबा दूंगा। ऐसे दबाऊंगा कि गहरी नींद आ जाएगी।
मोजेज ने सुना तो बड़े घबड़ाए कि प्रार्थनाएं बहुत सुनीं, यह नालायक क्या कह रहा है? तेरी रोटी भी पका दूंगा। तू घर के बाहर जाएगा, घर भी साफ-सुथरा...एक जरा मौका तो दे।
उसको बीच में जाकर हिलाया और कहा, नासमझ! यह तू क्या बक रहा है? यह प्रार्थना है? वापस ले ये शब्द। यह तो परमात्मा का अपमान कर रहा है। जूंए। परमात्मा पर! तूने कोई भेड़ समझी है? तू नहलाएगा-धुलाएगा। तूने कोई परमात्मा को गंदा समझा है! तू पैर दबाएगा। परमात्मा कभी थकता है! वह गड़रिया तो बहुत घबड़ा गया। उसने कहा कि मुझे क्षमा करो, मुझे मालूम नहीं।
'ना जानूं मैं आरती-वंदन, ना पूजा की रीत।'
वह भाग गया गड़रिया तो अपनी भेड़ें सम्हालकर कि यह तो कहां की झंझट है! उसने कहा, अब कभी प्रार्थना न करेंगे। माफ करो, मैं जानता ही नहीं, मैं तो यही करता रहा सदा से। बड़ा पाप हुआ।
वह गया नहीं था कि परमात्मा की आवाज गूंजी कि मोजेज, मैंने तुझे भेजा था कि जो मुझसे भटके हों, मुझे उनसे जुड़ा देना। तूने तो मुझसे जो जुड़ा था, उसको अलग कर दिया। उसका प्यार तो देख! उसका भाव तो देख! उसका हृदय तो पहचान! तू तो रीति-नियम में खो गया। जा उससे माफी मांग, और उससे प्रार्थना सीख। बहुत मेरे प्यारे हैं, पर वैसा कोई भी नहीं।
मोजेज ने ढूंढ़ा उसे जंगल में, उसके पैर पर गिर पड़े कि मुझे क्षमा कर, तू अपनी प्रार्थना जारी रख। तुझे जितने जूं निकालने हों, निकाल। तुझे जितना नहलाना हो, नहला। वह खुश, तो मैं बीच में कौन? तू जान, तेरा काम जाने। मुझे अच्छा फंसाया!
ध्यान रखो, जीवन के परम सत्य रीति-नियम से नहीं मिलते। औपचारिक नहीं हैं। धर्म का जगत भाव का जगत है। वहां तुमने प्रार्थना कैसे की, इसका कोई संबंध नहीं है। प्रार्थना की, इसका संबंध है। भाव था, गहरा था, तुम डूबे थे, फिर ठीक है। ऊपर-ऊपर शब्द दोहरा रहे थे, रटी हुई प्रार्थना को दोहरा रहे थे, व्याकरण भी शुद्ध थी, भाषा भी शुद्ध थी, उससे क्या होगा? कोई परमात्मा को व्याकरण सीखनी है! कि परमात्मा को भाषा सीखनी है! कि परमात्मा को तुम वेद-उपनिषद और गीता सुनाकर कुछ नयी बात सुना रहे होओगे! नहीं, परमात्मा तुम्हारा हृदय मांगता है। तुम्हें मांगता है। रीति-नियम नहीं।
छोड़ो फिकर। नहीं जानते, शुभ है। सहज-स्फूर्त हो, सरलता से उठे, तुम्हारे जीवन के सत्य को लेकर आती हो; तुम्हारी मगनता, तुम्हारे उन्माद, तुम्हारे हर्ष को प्रगट करती हो; तुम्हारे नृत्य को, तुम्हारे आंसुओं को, तुम्हारे गीत को प्रगट करती हो, हो गयी बात। तुम परमात्मा का नाम भी मत लो, तो भी चलेगा। मगर तुम्हारा नाच हार्दिक हो। और तुम्हारे आंसू असली हों। नकली न हों। तुम बड़े कुशल हो गए हो नकली आंसू लाने में।
मैं एक घर में मेहमान था। कोई मर गया था घर में। वह घर की जो महिला थी--मैं बाहर बैठा रहता था धूप में--वह मुझसे कहती थी कि कोई आए बैठने, जरा मुझे इशारा कर दिया करें। मैंने कहा, तू क्या करेगी? वह एकदम घूंघट डाल कर, छाती पीटकर रोने लगती। मैं बड़ा चकित हुआ। वह बिलकुल ठीक-ठाक बैठी रहती। कोई आने वाला है--बैठने वाला है--मैं उसको इशारा करता कि आता है कोई, वह एकदम...।
मैंने एक दिन जाकर उसका घूंघट उठाकर देखा, आंसुओं की धार लगी थी। मैंने कहा, तूने भी गजब कर दिया। अभी तू हंस रही थी, बात कर रही थी, ये आंसू! उसने कहा, बड़ी मुश्किल से सीखे। कई अनुभव से सीखे।
आदमी झूठे आंसू बहाने में भी कुशल हो जाता है। बस झूठ से बचना। तुम्हारी प्रामाणिकता तुम्हारी प्रार्थना है। और निराश होने का तो कभी कोई कारण नहीं। निराशा तो इसलिए बार-बार घेर लेती है कि तुम गलत दिशा में खोजते हो। निराशा तो इसलिए बार-बार घेर लेती है कि तुम अहंकार से भरे खोजते हो। निराशा तो इसलिए बार-बार घेर लेती है कि तुमने अभी अपने को मिटाकर नहीं खोजा। अपेक्षा से खोजते हो, इसलिए विषाद पकड़ लेता है। कुछ पाने के लिए खोजते हो। जब नहीं मिलता, तो बेचैनी होती है। या जो भी मिलता है, तो इतना नहीं मालूम पड़ता, जितना तुम सोचते थे मिलना चाहिए। मिला तो बहुत है, पर तुम्हारी अपेक्षा बड़ी है।
मैं कलकत्ते में एक किसी के घर जा रहा था। एयरपोर्ट से मुझे लेकर जो सज्जन जा रहे थे, बड़े उदास थे। उनको कभी मैंने उदास नहीं देखा। उनकी पत्नी भी साथ थी। मैंने पत्नी से पूछा कि मामला क्या है? तो उन्होंने कहा, आप उन्हीं से पूछ लें। मैंने पूछा। वे कहने लगे, बड़ा नुकसान हो गया। पांच लाख का नुकसान लग गया। तो मैंने कहा, उदास होने की बात है। पत्नी हंसने लगी। उसने कहा, इनकी बात में मत जाना। पांच लाख का नुकसान नहीं, पांच लाख का फायदा हुआ है, मगर ये दस लाख की सोच रहे थे। सो इनके हिसाब में पांच लाख का नुकसान हो गया है। इनको मैं लाख कहती हूं कि पांच लाख का फायदा हुआ है, नुकसान कहां? मगर ये अपनी धुन लगाए रहते हैं कि दस मिलने चाहिए थे--कोई सौदा किया था--पांच ही मिले। उदासी, विषाद, खिन्नता अपेक्षाओं से घिरती हैं।
प्रार्थना करो, अपेक्षा मत करो। फिर तुम कभी उदास न होओगे। फिर जो मिलेगा, उससे तुम धन्यभागी होओगे। और बहुत मिलता है। बहुत मिल रहा है, बहुत मिला ही हुआ है। मिलता ही रहा है। और जितने तुम प्रसन्न होओगे, जितने तुम अहोभाव से भरोगे, उतने ज्यादा को पाने का द्वार खुल जाता है। और जितने तुम विषाद से भरोगे, उतने तुम सिकुड़ जाते हो, उतना ही द्वार-दरवाजे बंद हो जाते हैं। जो मिलने वाला था, वह भी चूक जाता है।
रात अंधेरी है माना, जरा तारों को देखो, कितने रोशन हैं। कोई सूरज की ही रोशनी होती है! तारों की भी रोशनी होती है। और तारों की रोशनी का अपना सौंदर्य है। सूरज की रोशनी का अपना सौंदर्य है। सूरज की रोशनी में बड़ी तपन है। चांदत्तारों की रोशनी में बड़ी शीतलता है। तपन के बाद शीतलता जरूरी है। रात का अंधेरा ही क्यों देखते हो, जरा चांदत्तारे देखो।
फिर अंधेरे में भी सिर्फ अंधेरा क्यों देखते हो? सुबह, छुपी हुई सुबह भी देखो। पास आती सुबह भी देखो। अंधेरा तो गर्भ है। रात तो मां है। सुबह को जन्म देने के करीब है।
फिर अंधेरे में आने वाली सुबह ही देखने की भी इतनी जरूरत नहीं है। जरा अंधेरे को ही गौर से देखो। उसकी शांति! उसका मखमली फैलाव! उसका असीम विस्तार! जरा उसे छुओ। तो तुम जहां हो वहीं तुम पाओगे इतना मिला है, इतना मिला है! और तुम जहां हो वहीं तुम पाओगे कि इतना और, इससे और ज्यादा मिलने के करीब आ रहा है। आदमी पर इतनी वर्षा होती है, फिर भी आदमी गीला नहीं हो पाता। अपनी ही नासमझी है।
आज कांटे हैं अगर तेरे मुकद्दर में तो क्या
कल तेरा भर जाएगा फूलों से दामन गम न कर
तू नजर आता है जिस जंजीरे-आहन में असीर
टूट जाने को है वो जंजीरे-आहन गम न कर
देखता है आज जिस गुलशन को वक्फे-खिजां
ताजा कैसा ताजातर होगा वो गुलशन गम न कर
गुल अगर एक शमा होती है हवाऐ-दहर से
सैकड़ों उसकी जगह होती हैं रोशन गम न कर
एक दीया बुझता नहीं, हजार जल जाते हैं। एक सूरज बुझता नहीं, हजार दीए जल जाते हैं। देखा रोज, फिर भी समझे नहीं। गणित बिलकुल साफ है। दिन का सूरज एक, रात के सूरज करोड़ हैं। एक सूरज बुझता नहीं, करोड़ जल जाते हैं। एक फूल गिरता नहीं, करोड़ खिल जाते हैं। एक द्वार बंद नहीं हुआ--अब बंद द्वार पर अटककर मत बैठे रहो। उसी को मत देखते रहो, उसमें ही आंखों को मत उलझाओ। जरा इधर-उधर देखो--कहीं दस द्वार खुल गए हैं। इधर कोई मरा, उधर जन्म हुआ। तुम मौत को ही लेकर सिर मत पीटते रहो। जन्म की खुशी मनाओ। फिर कोई जन्म गया है। फिर कहीं कोई नया पैदा हो गया है।
एक बार दृष्टि तुम्हारी सुधर जाए, एक बार ठीक दिशा में देखना आ जाए, तो जरा भी उदास होने का कोई कारण नहीं है। फिर खयाल रखना, ऐसी कसम मत लेना कि अब निराश न होंगे। कसम से काम न चलेगा। समझ से काम चलेगा। कसम मत ले लेना कि निराश न होंगे, अन्यथा दोहरी निराशा आ जाएगी--जब निराशा आएगी तो निराशा तो आएगी ही, और साथ में यह निराशा भी पकड़ेगी कि अरे, फिर निराश हो गए! कसम मत लेना। कसमों से नासमझ जीते हैं। समझ।
मुझे सुनो, समझो क्या कह रहा हूं। व्रत मत लो। कसमें मत खाओ। यह मत कहो कि अब कभी न होएंगे निराश। कल का पता है? क्षणभर के बाद का पता है? अभी एक रौ में हो, अभी मन प्रसन्न है, क्षणभर बाद शायद मन प्रसन्न न रह जाए। अभी गीत गुनगुना रहे हो, क्षणभर बाद आंख में आंसू आ जाएं। क्षणभर बाद का फिर क्या करोगे?
फिर यह तुमने जो वचन दे दिया कि अब कभी निराश न होंगे, यह कहीं बांधने वाला न हो जाए। फिर कहीं ऐसा न हो कि तुम आंसू छिपाओ कि अब कैसे प्रगट करें। एक दफे कह दिया अब कभी उदास न होंगे, फिर तुम झूठी प्रसन्नता प्रगट करो। झूठी प्रसन्नता से तो सच्ची उदासी सही है। कम से कम सच्ची तो है।
इसलिए इस बात को मैं तुमसे बहुत समझाकर कह देना चाहता हूं कि मेरे पास कभी कसमें लेने की कोई जरूरत नहीं है। मैं कसमें दिलाने वाला नहीं हूं। मैं तुम्हें कोई व्रत नहीं देता। सिर्फ बोध देता हूं। इस क्षण में प्रसन्न रहो, काफी है। इसी क्षण से तो अगला क्षण आएगा। इसी से तो बंधा, खिंचा आ रहा है। अगर यह क्षण प्रसन्नता से भरा है, तो अगला क्षण इसी से तो निकलेगा। सुबह इसी रात से तो पैदा होगी! अगर रात तुमने नाचकर बितायी है, तो सुबह का सूरज तुम्हें और नाच से भर जाएगा। लेकिन कसम मत खाओ। क्योंकि कसम में भय है, डर है।
तुम कह रहे हो, अभी प्रसन्न हूं, अभी कसम खा लूं, पता नहीं फिर क्षणभर बाद मौका चूक जाए और कसम न खा पाऊं। मैं उन मंदिरों-मस्जिदों के खिलाफ हूं, उन गुरुओं के खिलाफ हूं, जो लोगों को कसमें दिलाते हैं। वे शोषण कर लेते हैं। तुम गए मंदिर में, धूप-दीप जलता था, पूजा के थाल सजे थे, घंटनाद होता था, प्रार्थना-कीर्तन होता था, लोग नाचते थे, मगन थे, तुम भी मगन हो गए--बह गए। फिर तुमने कसम खा ली कि अब रोज प्रार्थना करूंगा।
जरा ठहरो! कहीं एक भावदशा में तुम जीवनभर को बांध तो नहीं रहे हो? कल पछताओगे तो न? कल ऐसा तो न होगा, कहोगे यह मैं क्या कह फंसा! फिर कहीं ऐसा न हो कि तोड़ना पड़े।
तोड़ोगे, तो आत्मग्लानि होगी, अपराध का भाव होगा। तोड़ोगे, तो हिम्मत छूट जाएगी, अपने पर भरोसा खो जाएगा। तोड़ोगे तो ऐसा लगेगा कि नहीं, मेरे किए कुछ भी नहीं हो सकता। एक छोटी सी बात भी न कर पाया। पूजा भी न कर पाया, प्रार्थना भी न कर पाया। फिर तुम मंदिर से बचोगे। मंदिर जाने में डरोगे, भय पकड़ने लगेगा।
नहीं, मैं तुम्हें कोई व्रत नहीं देता। तुम मेरे सामने कोई व्रत लो भी नहीं। मैं तुम्हें बांधता नहीं, बस मुक्त करता हूं। मैं तुमसे कहता हूं, तुम छोड़ो फिकर कि आगे तुम क्या करोगे। अभी तुम प्रसन्न हो, अभी पूरे प्रसन्न हो जाओ। बस काफी है। अगला क्षण इसी क्षण से पैदा होगा। वह इसी क्षण की संतति है। अगर तुम प्रसन्न हो, वह भी प्रसन्न होगा।
लेकिन तुम अभी भी डर रहे हो। तुम इस क्षण में भी घबड़ा गए हो। खुशी आयी है, तुम्हें भरोसा नहीं कि टिकेगी। तुम कहते हो, अब मैं कभी निराश न होऊंगा। तुम कहते हो, यह क्षण इसके पहले निकल जाए, कसम खा लूं। बंध जाऊं। कमिटमेंट हो जाए। तो फिर बंधा रहूंगा, फिर भाग न पाऊंगा।
लेकिन बंधन अगर बन जाए धर्म, तो धर्म ही न रहा। धर्म मुक्ति है। पहले कदम से लेकर अंतिम कदम तक मुक्ति है। मैं तुम्हें समस्त व्रतों और कसमों से मुक्ति दिलाता हूं।
स्वभाव ने कहा है, 'अब स्वभाव निराश नहीं होगा, नहीं हो सकता है।'
नहीं, स्वभाव! स्वभाव पर इतना भरोसा मत करो। कोई नियम मत बांधो। समझो। समझ पर्याप्त है। विवेकवान बनो। बोध को जगाओ। तुम्हारे भीतर का दीया जलता रहे। इस क्षण जला लो, बस। अगले क्षण की अगले क्षण देख लेंगे।
जीसस ने कहा है, कल की चिंता न करो। कल अपनी फिकर खुद कर लेगा। और जीसस ने कहा है, देखो खेतों में लगे लिली के फूलों को। सम्राट सोलोमन भी अपने सारे आयोजन और व्यवस्था के बाद इतना सुंदर न था। क्या कारण है? क्योंकि लिली के फूलों ने कोई आयोजन नहीं किया। बस खिल गए हैं। कोई व्यवस्था न जुटायी, कोई योजना न बनायी। न पांच दिवसीय, न पंचवर्षीय। बस खिल गए हैं। सहज हैं। इनके सौंदर्य को देखो, सोलोमन भी झेंप जाए। और जीसस ठीक कहते हैं, सोलोमन भी झेंप जाएगा।
नहीं, तुम कल का आयोजन मत करो, अन्यथा सोलोमन हो जाओगे। मैं चाहता हूं, तुम लिली के फूल रहो। खिलो। खिलने से और खिलना निकलेगा। निकलता रहेगा। जिसने आज दिया है, कल भी देगा। जिसने आज हंसाया है, कल भी हंसाएगा। जिसने आज श्वासें दी हैं, कल भी श्वासों से भरेगा। भरोसा करो।
जीवन पर भरोसा करो, व्रतों पर नहीं। जीवन पर श्रद्धा करो, नियमों पर नहीं। एस धम्मो सनंतनो। यही सनातन धर्म है। जीवन पर श्रद्धा।

आज इतना ही।