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शनिवार, 8 अप्रैल 2017

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-60

एस धम्मो सनंतनो-(भाग-06)
ओशो
प्रवचन-060 (जीवित धर्म का उद्गम केंद्र: सदगुरु)

सारसूत्र:

हीनं धम्मं न सेवेय्य पमादेन न संवसे।
मिच्छदिट्ठिं न सेवेय्य न सिया लोकवङ्ढनो।।१४६।।

उत्तिट्ठे नप्पमज्जेय्य धम्मं सुचरितं चरे।
धम्मचारी सुखं सेति अस्मिं लोके परम्हि च।।१४७।।

यथा बुब्बुलकं पस्से यथा पस्से मरीचिकं।
एवं लोकं अवेक्खन्तं मच्चुराजा न पस्सति।।१४८।।

एस पस्सथिमं लोकं चित्त राजरथूपमं।
यत्थ बाला विसीदन्ति नत्थि संगो विजानतं।।१४९।।


पहला सूत्र; और अत्यंत क्रांतिकारी।

बुद्ध के ऐसे तो सभी वचन क्रांतिकारी हैं। बुद्ध के लिए धर्म कोई रूढ़ि नहीं, जीवन-रूपांतरण की कीमिया है। धर्म कोई परंपरा नहीं। धर्म का अतीत से कोई संबंध नहीं। धर्म नया जन्म है।
इसलिए साधारणतः धर्म से तुमने जो जाना है, उसे बुद्ध ने हीन-धर्म कहा है। वह कोई श्रेष्ठ-धर्म नहीं। वह कोई आर्य-धर्म नहीं।
पहला सूत्र है--

हीनं धम्मं न सेवेय्य।

'हीन-धर्म का सेवन न करे।'
क्या है हीन-धर्म? जो तुमने उधार पा लिया, जो तुमने सुनकर पा लिया, जो तुमने औरों से पा लिया--परिवार से, समाज से, संप्रदाय से--जो तुमने स्वयं न खोजा, वह हीन-धर्म है। वह धर्म जैसा मालूम होता है, धर्म है नहीं।
और उससे तुम कहीं पहुंचोगे न; भटक भला जाओ। उससे तुम और गुत्थियों में उलझ जाओगे। और गुंजलकें तुम्हें घेर लेंगी। अंधेरे का सांप और भी कुंडली मारकर तुम्हारे चारों तरफ बैठ जाएगा। क्योंकि धर्म का संबंध परंपरा से नहीं है। धर्म का संबंध तुमसे है। अपने आविष्कार से है। स्वयं की खोज से है। वेदों से नहीं, उपनिषदों से नहीं, कुरान-बाइबिल से नहीं।
तुम्हारा ही जीवन वह शास्त्र है, जिसे वेद कहा जा सकता है, कुरान कहा जा सकता है। इसे न पढ़कर तुम कुछ और पढ़ते रहे, तो हीन-धर्म में पड़ जाओगे। उस किताब को तुम अपने साथ ही लाए हो। वह किताब तुम्हारे भीतर ही छिपी है। अब और किताबों से बचना। और किताबों को पकड़कर मत बैठ जाना। कहीं ऐसा न हो कि हीरा तुम्हारे पास हो और तुम कंकड़-पत्थर बीनते हुए समय गंवा दो।
बुद्ध परंपरा से चले आए धर्म को हीन-धर्म कहते हैं। भीड़ के धर्म को हीन-धर्म कहते हैं। ठीक कहते हैं और। क्योंकि भीड़ से राजनीति ली जा सकती है, धर्म कैसे लोगे? भीड़ से पागलपन लिया जा सकता है, स्वास्थ्य कैसे लोगे? जो भीड़ के पास नहीं है, उसे तुम भीड़ से कैसे लोगे? भीड़ से पाप सीख सकते हो, पुण्य का बीजारोपण न होगा। वह भीड़ के पास नहीं है।
साधारणतः समाज और राजनीति की आकांक्षा है कि तुम भीड़ के एक हिस्से हो जाओ। तुम पगडंडियां न खोजो। क्योंकि जो व्यक्ति अकेला चलता है, समाज उससे नाराज होता है। समाज सिंहों को पसंद नहीं करता, भेड़ों को पसंद करता है। क्योंकि भेड़ों पर कब्जा किया जा सकता है, मालकियत की जा सकती है। राजनेता सिंहों पर मालकियत न कर सकेंगे; और न समाज के ठेकेदार, न पंडित-पुरोहित। सिंहों का कोई भी नियंत्रण नहीं कर सकता।
इसलिए इसके पहले कि तुम्हारा सिंहनाद हो, इसके पहले कि तुम्हारा व्यक्ति जागे, तुम्हें मार ही डाला जाता है, काट ही डाला जाता है। कोई हिंदू बनकर रह जाता है, कोई मुसलमान बनकर रह जाता है, कोई जैन बनकर, कोई बौद्ध बनकर। आदमी पैदा ही नहीं हो पाता। इसके पहले कि स्वभाव अंकुरित हो, तुम्हारे चारों तरफ इतनी बागुड़ लगा दी जाती है, तुम्हारी शाखा-शाखा पर इतने प्रतिबंध लगा दिए जाते हैं, तुम्हारी जड़ों पर इतनी परतंत्रता थोप दी जाती है कि तुम कुछ के कुछ हो जाते हो, जो तुम होने को न आए थे, जो तुम्हारी नियति न थी, और तब अगर तुम दुखी हो, तो कुछ आश्चर्य नहीं। हीन-धर्म ने तुम्हें दुखी किया है।
जब तक तुम वही न हो जाओ जो तुम होने को हो, जब तक तुम्हारा स्वभाव न खिले, फूल न बने, तब तक तुम रोते ही रहोगे। तुम्हारे आंखों के आंसू सिर्फ इतना ही कहते हैं कि तुम जो बनने को आए थे, वह न बन पाए। तुम वह गीत न गा पाए जो तुम्हारे प्राणों में छिपा था। वह अब भी कसमसाता है। लेकिन तुमने अपने को सस्ती चीजों में बेच दिया। तुमने सुविधा खोजी, सत्य नहीं। तुमने सांत्वना खोजी, सत्य नहीं। तुमने संतोष खोजा, सत्य नहीं।
हीन-धर्र्म सांत्वना देता है। श्रेष्ठ-धर्म सत्य देता है। सत्य से जो संतोष मिलता है, वह बात ही और! संतोष से जो सत्य को मानकर बैठ जाता है, उसने झूठ को पकड़ लिया। इसलिए तो तुमने इतने झूठ पकड़े हैं। उनसे संतोष मिलता है। कोई मर गया, दुख हुआ, पीड़ा उठी, डूब गए तुम एक अंधकार में। चाहते हो कोई कहे, आत्मा अमर है। चाहते हो जो मरा, वह मरा नहीं। चाहते हो कि यह सिर्फ शरीर ही बदला है, मेरा प्यारा जीएगा। लोग तुम्हें समझाने मिल जाते हैं। उससे सांत्वना मिलती है। वे तुम्हारे घावों पर मलहम के फाहे रख देते हैं। घाव मिटता नहीं। न ही जीवन में ज्ञान होता है। न तुम्हें पता चलता कि सच में आत्मा अमर है। क्योंकि यह पता तो अपने भीतर जाने से चलेगा। यह किसी के मरने से पता न चलेगा। यह तो तुम स्वयं ही जीओगे और मरोगे, तो पता चलेगा।
हीन-धर्म सांत्वना की तलाश है। तुम पूछते हो, अंधेरा है, अकेला हूं; कोई मिल जाता है, वह कहता है, प्रभु के गीत गाओ, गुनगुनाओ भजन, मंत्रोच्चार करो, भय मिट जाएगा। ऐसे तुम्हें झूठे गंडे और ताबीज मिल जाते हैं। इनको तुम बांध लेते हो। थोड़ी देर को अकेलापन मिटता सा लगता भी है, फिर-फिर उभरेगा, फिर-फिर लौटेगा। झूठ ज्यादा देर काम नहीं आ सकता।

हीनं धम्मं न सेवेय्य पमादेन न संवसे।
मिच्छदिट्ठिं न सेवेय्य न सिया लोकवङ्ढनो।।
'हीन-धर्म का सेवन न करे। प्रमाद से न रहे। मिथ्या-दृष्टि न रखे। आवागमन को न बढ़ाए।'
एक-एक वचन को गौर से समझो।
जिधर से आ रही है लहर
अपना रुख
उधर को मोड़ दो
वक्ष सागर का नहीं है राजपथ:
लीक पकड़े चल सकोगे तुम उसे
धीमे पदों से रौंदते,
यह दुराशा छोड़ दो
राजपथ नहीं है जीवन के सागर पर। यहां तो पगडंडियां हैं। पगडंडियां भी कहना ठीक नहीं। ऐसा ही है जैसे पक्षी आकाश में उड़ते हैं और पीछे कोई पदचिह्न नहीं छोड़ जाते। रास्ते तैयार होते, बड़ी सुगमता हो जाती, तुम उन पर चल लेते। रास्ते तैयार नहीं हैं। अपने ही चलने से रास्ता बनाना होता है। धर्म-पथ कहीं मौजूद नहीं, कहीं रेडीमेड नहीं कि बस तुम उस पर चल जाओ। कि जब मर्जी हुई तब चल लोगे, राजपथ तुम्हारी प्रतीक्षा करता है। तुम्हीं बनाओगे, तो तुम्हीं चलोगे।
कभी जंगल में गए हो? कभी जंगल में भटके हो? झाड़-झंखाड़ में, जहां से निकलना भी मुश्किल हो जाता है। वहां क्या करते हो? वहां कोई पथ तो तैयार नहीं है। हाथ से ही झाड़ियों को हटाते हो, सम्हाल-सम्हालकर पैर रखते हो। चलने के पहले रास्ता बनाते हो। या ऐसा कहो कि चल-चलकर रास्ता बनाते हो। वैसा ही है जीवन भी। और अच्छा है कि वैसा है। कहीं राजपथ होते बंधे-बंधाए, ट्रेनें छूटती होतीं परमात्मा की तरफ, बसें जाती होतीं एस.टी.सी. की, सब खराब हो जाता। परमात्मा भी दो कौड़ी का हो जाता। सत्य भी पाने योग्य न रह जाता। बहुत सस्ता मिल जाए, इतना सस्ता मिल जाए, तो उससे मुक्ति नहीं हो सकती थी।
अच्छा है कि कोई राजपथ नहीं, अच्छा है कि बुद्ध चलते हैं और उनका पथ खो जाता है। ताकि दूसरे पुनः बुद्ध हो सकें। अगर बुद्धों का रास्ता पकड़कर तुम चल लेते, तुम बुद्ध कभी भी न हो पाते।
पर यही तुमने किया है। यही सारा संसार कर रहा है। किसी ने महावीर का रास्ता पकड़ा है, जो कि है नहीं, जो कि हो नहीं सकता। महावीर चले थे जरूर, लेकिन अब कोई तय नहीं कर सकता कि कहां उनके पैर पड़े थे। वे पैर तो मिट गए। वे तो बनते ही नहीं, आकाश में पक्षियों की उड़ान है। लोग अनुमान से बना लेते हैं। लोग सोच-सोचकर बना लेते हैं।
बुद्ध के पीछे लोग चल रहे हैं, कृष्ण के पीछे लोग चल रहे हैं, राम के पीछे लोग चल रहे हैं, जीसस के पीछे लोग चल रहे हैं, वह लोगों ने ही बना लिए हैं। वह लोगों की ही धारणाएं हैं, उनकी ही व्याख्याएं हैं। इनसे बुद्धों का कोई लेना-देना नहीं है।
इसलिए संप्रदाय को धर्र्म मत समझना। संप्रदाय तुम्हारा अनुमान है कि यहां से बुद्ध चले होंगे, शायद। संप्रदाय अंधे का अनुमान है कि आंख वाले कहां से चले होंगे। संप्रदाय बहरों का अनुमान है कि जानने वालों ने क्या कहा होगा। संप्रदाय अंधेरे में भटके लोगों की धारणा है कि जिनके हाथ में प्रकाश है, वे कैसे चलते होंगे। लेकिन तुम्हारी सब धारणाएं व्यर्र्थ हैं। अच्छा हो कि तुम धारणाएं छोड़ दो। अच्छा हो कि तुम अपने अंधेरे को स्वीकार कर लो। तो शायद राह मिल भी जाए। क्योंकि राह फिर तुम खोजोगे।
अभी तुम्हें खयाल है कि राह तैयार है। तुम जैन-घर में पैदा हुए, राह तैयार है। तुम राजपथ पर ही पैदा हुए। तुम घर में थोड़े ही पैदा हुए। तुम तो राजपथ पर, सुपर हाइवे पर पैदा हुए हो। जन्म से आंख खोली, राजपथ पर ही अपने को पाया। ये सब राजपथ झूठे हैं।
संप्रदाय को बुद्ध कहते हैं हीन-धर्म। संप्रदाय का अर्थ है, भीड़ ने तुम्हें जो दे दिया, दूसरों ने तुम्हें जो बता दिया। धर्म का अर्र्थ है, तुमने जो खोजा।
खोज स्वभावतः दुष्कर है, दूभर है, कठिन है। इसीलिए तो लोग सस्ते पर राजी हो गए हैं। असली फूल मुश्किल है। लोगों ने कागज के फूल खरीद लिए हैं। जीवन को बदलना कठिन है, लोगों ने ऊपर से राम-चदरिया ओढ़ ली है। सोचते हैं कि ठीक है। राम को भीतर ले जाना तो बड़ा कठिन है। श्वास-श्वास में पिरो जाए, हृदय की धड़कन-धड़कन में बस जाए, बड़ा कठिन है। राम-चदरिया बड़ी सस्ती है, बाजार में मिलती है। ओढ़ लो। किस को धोखा दे रहे हो लेकिन? संप्रदाय राम-चदरिया है। और धर्म है राम का भीतर आविष्कार। कठिन है मार्ग। इसलिए धर्र्म केवल साहसियों के लिए है। संप्रदाय कायरों के लिए।
वक्ष सागर का नहीं है राजपथ:
लीक पकड़े चल सकोगे तुम उसे
धीमे पदों से रौंदते,
यह दुराशा छोड़ दो
धक्का लगेगा। यही तो बुद्धों का धक्का है। चौंकोगे तुम। तुम कहोगे, परंपरा से नहीं, शास्त्र से नहीं, आगम से नहीं! अपने ही ऊपर खोजना है, अपने ही हाथ से, अपने ही द्वारा--तब तो बड़ा असंभव है। मैं और खोज पाऊंगा? तुम्हें अपने पर आस्था तो नहीं है, आस्था होगी भी कैसे? तुम्हें सदा सिखाया गया है किसी और पर आस्था करो। जैन-घर में पैदा हुए, महावीर पर आस्था करो। हिंदू-घर में पैदा हुए, कृष्ण पर आस्था करो। अपना गीत मत खोजो, भगवदगीता काफी है। अपने जीवन की रोशनी को मत जलाओ, वेद में काफी प्रकाश है, यह तुम क्या कर रहे हो फिजूल? क्यों अपने-अपने दीए जलाने की चेष्टा कर रहे हो? दीए तो ऋषि-मुनि जला गए हैं। बस तुम उनके अंधे लीक पकड़कर चल पड़ो।
तुम्हें सदा सिखाया गया है, किसी और पर आस्था करो। कोई दूर आकाश में बैठे परमात्मा पर, सदियों पहले हुए वेद के ऋषियों पर, पुराणों पर, कथाओं पर। बस एक बात तुम्हें नहीं सिखायी गयी--अपने पर भरोसा। वह तुम्हें नहीं बताया गया। क्योंकि सारा संप्रदाय उससे डरता है।
तुमने अपने पर भरोसा किया तो वेदों का क्या होगा? वेदों के पीछे चलते पंडितों का क्या होगा? मंदिर-मस्जिदों का क्या होगा? यह सारा जाल जो हीन-धर्म का फैला हुआ है, इसका क्या होगा? अगर तुमने अपनी ही ज्योति पा ली तो तुम फिर उधार ज्योतियां क्यों मांगोगे? इस बड़े बाजार का क्या होगा? ये बाजार में बैठे हुए सौदागरों का क्या होगा? इनकी दुकानें बड़ी पुरानी हैं, इनका क्या होगा? इनके बड़े न्यस्त स्वार्थ हैं। ये तुम्हें एक बात भर नहीं सिखाते, स्वयं पर श्रद्धा। ये सब तरह की श्रद्धाएं सिखाते हैं।
और मजा यह है कि इनकी सब तरह की श्रद्धाओं के बाद भी आदमी में कोई श्रद्धा नहीं है। हो नहीं सकती। क्योंकि बुनियादी श्रद्धा ही ये नहीं सिखाते। बुनियादी श्रद्धा है, आत्मश्रद्धा। बुद्ध उस बुनियाद पर अपने सारे भवन को खड़ा करते हैं।
'हीन-धर्म का सेवन न करे।'
हीन-धर्म का अर्थ है, तुमने उनसे सीख लिया जिन्हें खुद भी पता नहीं। तुम्हारी मां ने, तुम्हारे पिता ने तुम्हें परमात्मा की भी खबर दे दी। उन्हें खुद ही पता नहीं। उनसे पूछो तो वे कहेंगे, हमारे माता-पिता ने हमें दे दी थी। उनसे पूछो तो वे कहेंगे, उनके माता-पिता ने उन्हें दे दी थी। यह सब उधार चल रहा है। शायद इस शृंखला में तुम कभी भी उस आदमी को न पाओ जिसे खुद मिली थी, जिसने खुद जाना था। शायद बस ऐसे ही उधार चलता रहा। यह अफवाह मालूम होती है। यह धर्म नहीं। यह अनुभव नहीं मालूम होता। इसकी कोई जड़ें नहीं मालूम होतीं। इसे बुद्ध हीन-धर्म कहते हैं।
तुम्हारा वअज राज-ए-इश्क क्या खोलेगा वाइज
जबां की ये नहीं हजरत ये चश्म-ओ-दिल की बातें हैं
वह जो पंडित तुम्हें समझा रहा है मंदिर में, मस्जिद में, उसका उपदेश प्रेम की इन गहरी बातों को न खोलेगा।
तुम्हारा वअज राज-ए-इश्क क्या खोलेगा वाइज
हे धर्मगुरु! तुम्हारे उपदेश हृदय की इस गहरी रहस्य भरी बात को न खोल सकेंगे।
जबां की ये नहीं हजरत ये चश्म-ओ-दिल की बातें हैं
ये आंख वालों की बातें हैं, हृदय वालों की बातें हैं, सिर्फ जबान होने से कुछ भी नहीं होता।
लेकिन तुमने कभी पूछा कि जिनसे तुमने सीखा, उन्हें मिला था? डर के मारे तुम यह पूछते भी नहीं। क्योंकि फिर तुम्हें खोजना पड़ेगा आंख वाला कोई। सदगुरु खोजना पड़ेगा। उससे बचने के लिए तुम...वह तो खोज लंबी है। फिर कैसे मिलेगा, कहां मिलेगा? कुछ दांव पर भी लगाना पड़ेगा। दांव पर लगाने को तुम राजी नहीं। तुम कहते हो, मैं जैसा हूं, मुझे ऐसा ही रहने दो और कोई मिल जाए। तो फिर ठीक है, कोई तुम्हारे घर आ जाता है।
धर्मगुरु धर्म को बिना जाने धर्म दे रहा है। उसने भी किसी से पाया है। सुशिक्षित है। सुदीक्षित नहीं। सुना है, समझा नहीं। जो तुम्हें समझा रहा है, उसे तुम उसके जीवन में भी न पाओगे। जो पुजारी तुम्हारे घर आकर पूजा करवा जाता है, तुमने उसे कभी पूजा करते देखा? उसे तुमने कभी पूजा में देखा, प्रार्थना में देखा? वक्त बे वक्त जब तुम्हें जरूरत पड़ती है, जो पंडित आकर तुम्हारे घर में मंत्रोच्चार कर जाता है, जरा उसके घर में जाकर भी तो देखो, उसने कभी मंत्रोच्चार किए?
नीत्से ने कहा है--और बिलकुल ठीक कहा है--कि अगर धर्म से छुटकारा पाना हो तो थोड़े दिन धर्मगुरुओं के पास रह लो। धर्म से छुटकारा पाना हो, तो थोड़ी देर धर्मगुरुओं के पास रह लो। तो तुम्हें पता चल जाएगा कि सब धोखाधड़ी है। यह सब बातचीत है। जो वे दूसरों को कह रहे हैं होना चाहिए, वह उनके जीवन में भी नहीं हुआ है। उसे तुम वहां भी न पा सकोगे। यह हीन-धर्म है।
'हीन-धर्म का सेवन न करे।'
सेवन शब्द बड़ा अदभुत है। सेवन का अर्थ है, भोजन न करे। हीन-धर्म को अपने भीतर न ले जाए। क्योंकि जो तुम भीतर ले जाओगे वह तुम्हारा रक्त-मांस- मज्जा बनेगा। जो तुम भीतर ले जाओगे, जो तुम आहार लोगे, वही तो तुम बन जाओगे। अगर हीन-धर्म का सेवन किया तो तुम हीन बन जाओगे। अगर पंडितों से तुमने सीखा, वे खुद ही तोते थे, तुम भी तोते हो जाओगे।
तुमने देखा, तोते बड़े बेईमान होते हैं। तोते को घर में रखो, पिंजरे में रखो, सोने का पिंजरा बनाओ, हीरे-जवाहरात लगाओ, सेवा करो, वह जब तक पिंजरे में है तुम्हारी बात दोहराएगा। तुम जो कहोगे वही दोहराएगा। तुम जयरामजी सिखाओगे तो जयरामजी दोहराएगा। तुम अल्लाह का नाम सिखाओगे तो अल्लाह का नाम दोहराएगा। तुम जो कहोगे वही कहेगा। जरा पिंजरा खुला छोड़ देना एक दिन, उड़ जाएगा। फिर तुम लाख चिल्लाओ, झाड़ पर बैठा रहेगा, फिर नहीं दोहराएगा। फिर तुम लाख बुलाओ, फिर नहीं आएगा। बड़ा दगाबाज है।
इसलिए दगाबाज को कहते हैं, तोताचश्म। धोखेबाज को कहते हैं, तोताचश्म। तोते जैसा। वफादार को कहते हैं, कुत्ते जैसा। एक दफा तुम उसे धक्का भी मार दो, नाराज भी हो जाओ, तो भी भूलेगा नहीं। तो भी याद रखेगा तुम्हारे प्रेम को। आस्था उसकी टूटेगी न। तुम दूर जंगल में कुत्ते को छोड़ आओ--कभी-कभी तो ऐसा हुआ है कि कोई कुत्ते को छोड़ने, छुटकारा पाने जंगल में गया, फिर रास्ता भूल गया, फिर अपने ही कुत्ते के पीछे घर लौटना पड़ा--लेकिन कुत्ता घर आ जाएगा। वर्षों बाद मिलोगे तो पहचान लेगा। दूर से तुम्हारी बास को पहचान लेगा, तुम्हारी गंध को पहचान लेगा। भूलता ही नहीं। याददाश्त जैसे हृदय में बैठ गयी।
पंडित को तुम जब तक पैसे देते हो, धर्म की बातें दोहराता रहेगा। तुम पैसे देना बंद करो, अधर्म पर उतर आएगा। वहीं छीना-झपटी और फजीहत शुरू कर देगा।
बुद्ध ने कहा है, जो तुमने पंडितों से लिया वह हीन-धर्म है। इसलिए स्वाभाविक है, अगर पंडित बुद्ध के विरोध में हो गए और उन्होंने बुद्ध के पैर न जमने दिए इस देश में तो कुछ आश्चर्य नहीं। क्योंकि बुद्ध के पैर जमते, तो पंडितों का क्या होता?
इसलिए पंडित सदा ही बुद्धपुरुषों के विपरीत रहे हैं। रहना ही पड़ेगा। क्योंकि बुद्धपुरुष तो उनके सारे व्यवसाय को डांवाडोल कर देते हैं। वे तो लोगों को कहते हैं, यह कुछ बात ऐसी है कि किसी मंदिर में न मिलेगी, किसी मस्जिद में न मिलेगी, अपने भीतर खोजोगे तो ही मिलेगी।
'हीन-धर्म का सेवन न करे।'
आहार न ले। क्योंकि शब्द जो तुम सुनते हो, वह भी आहार है। तुम भोजन में तो बड़ा विचार करते हो कि शुद्ध है या नहीं। पानी पीते हो तो देख लेते हो साफ-सुथरा है या नहीं। धर्म पीते हो, देखते ही नहीं। देखते ही नहीं, किसी स्वच्छ झरने से आता है कि सारे नगर का मल-मूत्र जहां बहता है उस गंदे डबरे से आता है। भीड़ से जो धर्म तुमने लिया है, वह नगर के बीच से बहते हुए नाले से पीया है। उसे बुद्ध हीन कहते हैं तो ठीक ही कहते हैं।
तुम्हारे भीतर के हिमालयों में वह झरना छिपा है, जहां से तुम स्वच्छतम स्फटिक मणि जैसा स्वच्छ धर्म पाओगे। जहां उस पर कोई धूल नहीं पड़ी। जहां वह झूठा नहीं किया गया है। जहां स्रोत उसका ताजा है। वहीं पाओगे तुम गंगोत्री अपने भीतर। बाहर तुम खोजने गए, तो तुम किसी भी घाट पर जाओ, वह बासा होगा। काफी लोग उस पर चल चुके हैं। काफी लोग वहां से पानी पी चुके हैं। तुम्हें दिखायी भी नहीं पड़ता, क्योंकि आदत हो जाती है।
पश्चिम से जो लोग आते हैं, उनके डाक्टर उनसे कहते हैं, एक बात भर खयाल रखना--भारत में पानी मत पीना। सोडा पी लेना, कोका कोला पी लेना, फेन्टा पी लेना, जो पीना हो पी लेना, शराब भी पी लेना--मगर पानी मत पीना। क्यों? हम तो यहां मजे से नदी-नालियों में पी रहे हैं, कोई हमें अड़चन नहीं है। आदत।
हमें खयाल ही नहीं कि उन्हीं नदियों में, उन्हीं डबरों में भैंसें भी नहा रही हैं। घोड़े भी पानी पी रहे हैं। आदमी भी स्नान कर रहे हैं। लोग नदियों के किनारे पाखाना भी कर रहे हैं, वह सब पाखाना भी नदियों में बह रहा है, हम मजे से पी रहे हैं, हमें याद ही नहीं, पुरानी आदत हो गयी है। पश्चिम के आदमी को देखकर बड़ी घबड़ाहट होती है कि यह तुम क्या कर रहे हो? यहीं भैंसें खड़ी हैं, यहीं घोड़े खड़े हैं, यहीं बैलगाड़ियां निकल रही हैं, वहीं तुम मजे से सूर्य-नमस्कार कर रहे हो। तैयार हो बिलकुल जल पीने को, स्नान करने को।
जिस घाट पर हम बहुत दिन रह जाते हैं, हम भूल ही जाते हैं। ऐसा ही धर्म के संबंध में हुआ है।
तुम जरा सोचो तो, तुमने कहां से धर्म का जल पीया है? किससे पीया है? उनके जीवन में कोई चमक देखी थी, कोई रोशनी देखी थी? उनके आसपास कुछ देखा था प्रभामंडल? उनके चरणों में तुमने प्रभु की पगध्वनि सुनी थी? उनकी श्वासों में तुम्हें कुछ सुवास मिली थी परलोक की? उनके पास तुमने कोई स्वर्ग का सपना देखा था? कहां से लिया है, किससे लिया है?
सोचा ही नहीं। पैदा हुए थे उसी डबरे में, पीते रहे, पीते रहे, जैन हो गए, हिंदू हो गए, बौद्ध हो गए, ईसाई हो गए, मुसलमान हो गए। हो क्या गए? तुमने सोचा ही नहीं, संकल्प कभी लिया ही नहीं। निर्णय किया ही नहीं। और यह भोजन है। और यह शरीर का भोजन नहीं, आत्मा का भोजन है।
शरीर के लिए तो तुम इतनी होशियारी रखते हो। उस दुकान से लेते हो जहां साफ-सुथरा है। जहां मक्खियां नहीं भिनभिनातीं। या जो बहुत साफ-सुथरे रहना चाहते हैं, वे तो दुकान से लेते ही नहीं। वे अपने घर तैयार करते हैं। जो और भी साफ-सुथरा रहना चाहते हैं, वे तो अपने हाथ से ही तैयार करते हैं। वे तो स्वयं-पाकी होते हैं। वे तो अपनी पत्नी को भी हाथ नहीं लगाने देंगे। वे तो खुद ही अपना बना लेंगे। शरीर के संबंध में तुम इतना हिसाब रखते हो! उस शरीर के संबंध में, जो आज नहीं कल चला ही जाएगा।
लेकिन आत्मा का भोजन है धर्म। उसके संबंध में तुम कुछ हिसाब नहीं रखते। तुम किसी से भी ले लेते हो, तुम जहां पाते हो संयोग से, वहीं ले लेते हो। धर्म तुम्हारे लिए दुर्घटना है। तुम्हारे जीवन का सुविचारित चुनाव नहीं।
इसलिए मेरे देखे, अगर आर्य-धर्म, जिसको बुद्ध श्रेष्ठ-धर्म कहते हैं, उसे अगर दुनिया में प्रतिस्थापित करना हो, तो उसका एक ही अर्थ होगा कि प्रत्येक व्यक्ति होशपूर्वक अपना धर्म चुने। अपनी तरफ से खोजे। फिर जहां उसकी खोज उसे ले जाए, जाने को मुक्त रहे। किसी घर में पैदा होने से न कोई हिंदू हो, न कोई मुसलमान हो।
हां, किसी को खोजने से लगे कि कुरान से उसका तालमेल बैठ जाता है, कि कुरान पढ़ते वक्त, कुरान की आयतें दोहराते वक्त उसके भीतर कोई तार छिड़ जाते हैं, कि उसके भीतर कोई गूंज होने लगती है, जो कभी भी वेद पढ़ने से नहीं हुई, तो ठीक है, वह हो जाए मुसलमान। या कोई मुसलमान अगर पाए कि गीता पढ़ने से और उसके भीतर का गीत सजग हो उठता है, सोए प्र्राण जागने लगते हैं--जैसे कोई अंगड़ाई लेता हो, जैसे नींद उतरती हो, खुमार जाता हो नींद का--तो फिर कोई हर्जा नहीं, वह हो जाए गीता का भक्त। लगे कृष्ण के पीछे। लेकिन यह खोज अपनी हो। तुम्हारे कृष्ण तुम्हारी आत्मश्रद्धा से आएं। तुम्हारे बुद्ध भी तुम्हारी आत्मश्रद्धा से आएं। तुम्हारी आत्मश्रद्धा प्राथमिक हो, फिर कुछ भी हो।
'प्र्रमाद से न रहे।'
अभी तुम जो जी रहे हो जीवन, वह मूर्च्छा का है। इसीलिए तो हीन-धर्म में उलझ गए हो। सोए-सोए हो। धक्के खा रहे हो। जहां पाते हो, सोचते हो यहीं के लिए भेजे गए हैं। जहां लहर ले जाती है, वहीं चले जाते हो। न कोई गंतव्य है, न कोई दिशा का बोध है। न प्राणों की कोई आतुरता है कहीं पहुंचने की, कहीं जाने की, कुछ होने की।
'प्रमाद से न रहे।'
मूर्च्छा छोड़े। होश से भरे।
'मिथ्या-दृष्टि न रखे।'
कौन सी दृष्टि मिथ्या है? किस दृष्टि को बुद्ध सम्यक कहते हैं और किस दृष्टि को मिथ्या कहते हैं? जो तुम्हारी नहीं, वह मिथ्या है। जो तुम्हारी है वह सम्यक है। जो निज की है, वह सम्यक है। आंख तो अपनी हो, तो ही ठीक होती है, दूसरे की आंख तो कैसे ठीक हो सकती है?
बहुत वर्षों पहले की बात है। मैं हिंदू विश्वविद्यालय बनारस पढ़ने गया। वहां कभी पढ़ा नहीं। बनारस मुझे रास न आया। न गर्मी जंची, न वहां का रूखा-सूखापन जंचा। लौट आया। लेकिन जब गया, तो जिनके घर मेहमान था, सुबह-सुबह पांच बजे उठा तो सोचा कि एक चक्कर विश्वविद्यालय का लगा आऊं, सुबह-सुबह देख आऊं, थोड़ी पहचान हो ले कि किस जगह चुनने के लिए...कहां रहने के लिए मैं चुन रहा हूं।
चल तो पड़ा। सुबह थी, धुंधलका था। एक आदमी से मैंने पूछा--एक भले बुजुर्ग आदमी से, जो घूमते जाते मालूम पड़ते थे--कि विश्वविद्यालय कहां? तो उन्होंने कहा--चौरस्ते पर हम खड़े थे--कि अगर इस बाएं रास्ते से जाएं तो आगे चलकर एक पुल पड़ेगा, पुल के बाद एक टाकीज पड़ेगी। मैंने कहा, बस इतना ठीक है, फिर आगे मैं पूछ लूंगा। उन्होंने कहा, समझे नहीं, इस रास्ते से तो जाना ही मत। यह तो जिस रास्ते से नहीं जाना है, उसकी मैंने बात कही। तो मैं थोड़ा चौंका कि यह आदमी भी अजीब है! मैं पूछ रहा हूं विश्वविद्यालय जाने की बात!
फिर उसने कहा, और यह जो सामने रास्ता है...। तो मैंने कहा, इससे जाना है कि नहीं? उसने कहा, जाना तो इससे भी नहीं है। तो मुझे लगा कि कुछ पागल है, कुछ झक्की है। तो मैंने कहा, तुम मुझे उतना ही बता दो, जिससे जाना है। अब तो मुझे उसके रास्ते पर जाने में भी थोड़ा संदेह होने लगा। उसने कहा, इस रास्ते से जाना है, लेकिन उस पर मैं खुद ही जा रहा हूं, तो थोड़ी दूर तो मैं ही तुम्हारा साथ दे दूंगा। चलो, बताने की कोई जरूरत नहीं। अब मुझे शिष्टाचारवश इंकार करना भी ठीक न मालूम पड़ा। लेकिन अब जाने का कोई अर्थ नहीं दिखायी पड़ा कि इसके साथ जाना...!
कोई पंद्रह-बीस मिनट चलने के बाद मैंने कहा कि कब तक पहुंचेंगे? उसने कहा, अब सच्ची बात पूछते हो, तो मैं खुद ही यहां अजनबी हूं। तो मैंने कहा, भलेमानुस, तुमने पहले ही क्यों न कहा? उसने कहा कि जितनी मुझसे सहायता हो सके उतनी तो कर दूं। फिर दूसरा कोई था भी नहीं, जिससे तुम पूछ लेते। मैंने कहा, यह बात भी ठीक है!
तो मैंने कहा कि अब क्या करना है? मैं किसी से पूछूं कि तुम्हारी मानकर चलूं? उसने कहा, वैसे तुम्हें किसी से पूछना हो तो अब तो रास्ता चलने भी लगा, पूछ सकते हो, लेकिन मैं यह कहता हूं कि विश्वविद्यालय जाकर करोगे क्या? तब तो उसने और बड़ी मजे की बात कही। फायदा भी क्या है? जो पहुंच गए हैं उनको क्या मिला है? तब तो वह आदमी पागल ही नहीं मालूम पड़ा, परमहंस भी मालूम पड़ा। ठीक ही कह रहा है।
फिर तो दूसरे विश्वविद्यालयों में रहा, लेकिन जब भी विश्वविद्यालय जाता नए वर्ष के प्रारंभ में, और वर्ष के पूरे होने पर लौटता, तो उस आदमी की बात मुझे न भूलती। क्योंकि हर वर्ष वह आदमी सही साबित होने लगा कि जो पहुंच गए हैं, उन्होंने क्या पा लिया है? फिर जब विश्वविद्यालय की सब परीक्षाएं भी पूरी हो गयीं, सामान लादकर तांगे पर मैं स्टेशन की तरफ वापस लौटने लगा, तब फिर उसकी मुझे याद आयी। छह साल पहले उसने यह कहा था। तब मैं सोचने लगा कि वह आदमी ठीक ही कह रहा था कि जाकर भी क्या करोगे? वहां जाने से कभी किसी को कुछ मिला है? तब मेरे मन में दुख भी हुआ कि मैंने एक क्षणभर को सोचा कि वह आदमी पागल था, यह उचित नहीं था।
नहीं, वह पागल नहीं था, परमहंस ही था। तुम जहां जा रहे हो, वहां दूसरे अगर पहुंच गए हैं और उनको कुछ नहीं मिला, तो तुम किसलिए जा रहे हो--उसकी बात तो ठीक लगती है। और एक ज्ञान है जो विश्वविद्यालय में मिलता है, जो कि सच्चा नहीं है। जो कि किताबी है। जो कि शास्त्रीय है। जिससे सूचना मिलती है, लेकिन भीतर का दीया नहीं जलता। जिससे मूर्च्छा नहीं टूटती। मूर्च्छा शायद और घनी हो जाती है, और अकड़ आ जाती है।
कल रात मैं एक गीत पढ़ता था--
हां, अभी कुछ और है जो कहा नहीं गया
निर्विकार मस्तक को सींचा है,
तो क्या?
नदी, नाले, ताल, कुएं से पानी उलीचा है
तो क्या?
उड़ा हूं, दौड़ा हूं, तैरा हूं, पारंगत हूं,
इसी अहंकार के मारे
अंधकार में सागर के किनारे
ठिठक गया: नत हूं
उस विशाल में मुझसे बहा नहीं गया।
हां, अभी कुछ और है जो कहा नहीं गया
निर्विकार मस्तक को सींचा है
तो क्या?
भर लिया मस्तक, खूब भर लिया, दिल भरकर भर लिया, लबालब भर लिया, तो क्या?
नदी, नाले, ताल, कुएं से पानी उलीचा है
तो क्या?
उड़ा हूं, दौड़ा हूं, तैरा हूं, पारंगत हूं
तो क्या?
लेकिन जैसे-जैसे मस्तिष्क भर जाता है, एक अहंकार उठता है कि मैं जानता हूं।
इसी अहंकार के मारे
अंधकार में सागर के किनारे
ठिठक गया: नत हूं
उस विशाल में मुझसे बहा नहीं गया।
ज्ञान तुम्हें अज्ञान से छुटकारा तो नहीं दिलाता, सरलता से छुटकारा दिला देता है। ज्ञान तुम्हें ज्ञानी तो नहीं बनाता, ज्ञानी होने की अकड़ दे देता है। फिर उस अकड़ के कारण ही असीम में उतरना मुश्किल हो जाता है।
इसी अहंकार के मारे,
अंधकार में सागर के किनारे
ठिठक गया: नत हूं
उस विशाल में मुझसे बहा नहीं गया।
इसीलिए जो और रहा,
वह कहा नहीं गया।
शब्द, यह सही है, सब व्यर्थ हैं
पर इसीलिए कि शब्दातीत कुछ अर्थ हैं
शायद केवल इतना ही: जो दर्द है
वह बड़ा है मुझी से
सहा नहीं गया।
तभी तो, जो अभी और रहा, वह
कहा नहीं गया।
पंडित जो कह रहा है, ज्ञान के आधार पर जो कह रहा है, शास्त्र के आधार पर जो कह रहा है, उसमें असली तो छूट ही गया, जो कहा ही नहीं गया। उसमें तो वस्त्रों की बात हो गयी, देहों की बात हो गयी, प्राण तो छूट ही गए। प्राण तो उसने भी नहीं जाने।
मिथ्या-दृष्टि कहते हैं बुद्ध। अगर तुम्हारी जानकारी सिर्फ जानकारी है, तो मिथ्या-दृष्टि। अगर तुम्हारी जानकारी जानना है, अगर तुम्हारी जानकारी जागना है, अगर तुमने ही अनुभव किया है, तुमने ही स्वाद लिया है, तो ही सम्यक-दृष्टि। तो दर्शन स्वच्छ हुआ, तो आंखें साफ हुईं। अन्यथा दृष्टि पर और पर्दे पड़ जाते हैं। इसलिए मिथ्या-दृष्टि।
इसे तुम समझना। मिथ्या-दृष्टि बुद्ध अज्ञानी को नहीं कहते। बहुत लोग ऐसा ही समझते हैं। धम्मपद की बहुत सी व्याख्याओं में यही लिखा है--मिथ्या-दृष्टि यानी अज्ञानी।
नहीं, कोई बच्चा मिथ्या-दृष्टि नहीं है। बच्चा अज्ञानी है, पर मिथ्या-दृष्टि नहीं है। मिथ्या-दृष्टि तो वह है, जिसके पास दृष्टि नहीं है और जिसे खयाल है कि दृष्टि है। दृष्टि के न होने का रूप अलग है। पता ही नहीं मुझे। एक आदमी कहता है, मुझे मालूम नहीं। इसको तुम मिथ्या-दृष्टि नहीं कह सकते। यह कहता है, मेरी कोई दृष्टि ही नहीं। मैं अंधा हूं।
नहीं, मिथ्या-दृष्टि वह है, जो है तो अंधा, टटोल तो रहा है लकड़ी से, लेकिन अगर तुम उसे अंधा कहो तो नाराज हो जाए, क्रोध से भर जाए, और सिद्ध करने लगे कि मेरे पास आंखें हैं, वह मिथ्या-दृष्टि। मिथ्या-दृष्टि का अर्थ है, जिसके पास सही दृष्टि तो नहीं है, लेकिन फिर भी भ्रांति है कि सही दृष्टि है, दावा है कि सही दृष्टि है।
'मिथ्या-दृष्टि न रखे।'

मिच्छदिट्ठिं न सेवेय्य।

और बुद्ध कहते हैं, उसका भी सेवन न करे। नहीं तो बढ़ता जाएगा। तुम जिसको सहारा दोगे, वही बढ़ जाएगा। अगर मिथ्या-दृष्टि को सहारा दिया, तो धीरे-धीरे वही जड़ें जमा लेगी, चूस लेगी तुम्हें। प्राणों को दीन, जर्जर कर देगी। फिर तो छूटना भी मुश्किल हो जाएगा।
जैसे कभी देखा खंडहरों के मकानों में वृक्ष जड़ें जमा लेते हैं? फिर तो वृक्षों को हटाओ तो मकान भी गिरे। फिर तो हटाना मुश्किल हो जाता है।
नहीं, सेवन ही मत करना। इससे तो भूखे रह जाना बेहतर है। अगर शुद्ध जल न मिले, तो थोड़े प्यासे रह जाना, हर्जा नहीं। थोड़ी प्यास ही बढ़ेगी, कुछ हर्जा नहीं। लेकिन गंदा जल मत पी लेना। कहीं ऐसा न हो कि गंदा जल पीते-पीते गंदा जल पीने की आदत बन जाए। फिर स्वच्छ जल में बास आने लगे। फिर स्वच्छ जल जंचे न, बेस्वाद मालूम होने लगे, क्योंकि गंदगी का स्वाद पकड़ जाए।
लोग शराब पीते हैं, तो शुरू-शुरू में तो तिक्त मालूम पड़ती है, बेस्वाद मालूम पड़ती है, सुख नहीं देती। तो फिर धीरे-धीरे अभ्यास से होता है। धीरे-धीरे पीते-पीते उसी में सुख आने लगता है। लोग मछलियां खाते हैं। जो नहीं खाते, वे सोच भी नहीं सकते। मरी एक मछली पड़ी हो, तो ऐसी बास आती है। लेकिन जो खाते हैं, उन्हें बास तो खो ही जाती है, शायद बड़ा सुख आने लगता है।
बंगाली कहते हैं, जलडांडी। वे मछली कहते ही नहीं। वह शब्द ही गलत है। जलडांडी। जैसे कमल की नाल हो। मछली बिना खाए आदमी हो ही नहीं सकता। तो घर-घर में पोखरे बनाकर अपनी-अपनी मछली पाल लेते हैं। बंगाली के शरीर से भी मछली की बास आने लगती है। बंगाली को पहचानना मुश्किल नहीं है। आंख पर पट्टी बांधकर घूम जाओ, बंगाली मिल जाए, फौरन पहचान जाओगे। जलडांडी की बास आएगी। लेकिन उसे नहीं आती। वह तो रम गया। वह तो पक गया।
गंदगी की आदत मत डाल लेना। दुर्गंध की आदत मत डाल लेना।
तो बुद्ध कहते हैं, 'मिथ्या-दृष्टि न रखे।'
क्योंकि इन सब से आवागमन बढ़ेगा। उधार धर्म, हीन-धर्म, मूर्च्छा का जीवन, मिथ्या-दृष्टि पर भरोसा, इससे आवागमन बढ़ेगा, बार-बार आओगे। इसी चाक में बार-बार उलझोगे, पेरे जाओगे, परेशान किए जाओगे। फिर जन्मोगे, फिर मरोगे, फिर जन्मोगे।
जागो रे जागो,
डूबे प्रकाश में दिशा छोर
अब हुआ भोर, अब हुआ भोर
आयी सोने की नयी प्र्रात
तुम रहो स्वच्छ मन, स्वच्छ गात
निद्रा छोड़ो रे गयी रात
तुम रहो स्वच्छ मन, स्वच्छ गात
अगर स्वच्छ मन हो, स्वच्छ मन का अर्थ है, अगर व्यर्थ को संजोया-संवारा न हो, कूड़ा-करकट इकट्ठा न किया हो। स्वच्छ गात हो, अगर तुमने वही आहार किया हो जो करने योग्य था, शुद्धतम, श्रेष्ठतम आहार किया हो।
बुद्ध ने, महावीर ने, दोनों ने पशु-हिंसा को इनकार किया। सिर्र्फ इसलिए नहीं कि पशुओं को दुख होता है, इसलिए। नहीं, इससे भी ज्यादा इसलिए कि तुम जो भोजन करते हो वह तुम्हें निर्मित करता है। तुम जितना निम्न भोजन करते हो, उतना निम्न तल का तुम्हारा जीवन हो जाता है।
तुम जब भोजन करते हो तो जरा खयाल करना! तुमने अगर एक मरे हुए जानवर का मांस खाया, तो तुम खयाल करना, यह मरा हुआ जानवर, इसका मांस थोड़ी देर में ही तुम्हारे मांस का हिस्सा हो जाएगा। यह लाश जो बाहर पड़ी है, थोड़ी देर में तुम्हारे भीतर जीवित हो उठेगी। यह तुम्हारे खून में बहेगा। यह तुम्हारे प्राणों में संचारित होगा। इससे तुम्हारा मस्तिष्क भी निर्मित होगा। क्योंकि तुम्हारा भोजन ही तुम्हें बनाता है। तुम नीचे गिर रहे हो। तुम अपनी गर्दन के चारों तरफ पत्थर इकट्ठे कर रहे हो।
फिर तुमने एक स्वच्छ फल का भोजन किया। महावीर तो, बुद्ध तो कहते थे, जो फल पककर अपने से गिर गया, उसका भोजन किया। तोड़ा भी नहीं, कच्चा भी नहीं, जो अपने से गिर गया। जो वृक्ष ने खुद ही दान कर दिया। जो वृक्ष ने कहा, अब तैयार है, कोई ले जाए। जो वृक्ष ने छोड़ दिया। उस फल के हल्के भोजन को करके तुम भी हल्के हो जाओगे। तुम पर गुरुत्वाकर्षण का असर कम होगा। तुम आकाश में उड़ सकोगे। विराट आकाश है चैतन्य का, वहां जितने हल्के हो जाओगे उतना अच्छा।
तुम रहो स्वच्छ मन, स्वच्छ गात
निद्रा छोड़ो रे गयी रात
'उठे'--दूसरा सूत्र--'प्रमाद न करे। सुचरित धर्म का आचरण करे। धर्मचारी इस लोक में तथा परलोक में सुख की नींद सोता है।'
'उत्तिट्ठे--उठे।'
किस उठने की बात करते हैं। उपनिषद कहते हैं: उत्तिष्ठत जाग्रत वराण्यबोधत। उठो, जागो बोध में।
'उठे।'
यह तुम्हारे शारीरिक उठने की बात नहीं है। तुम्हारी चेतना उठे। तुम्हारी आत्मा उठे। तुम वहां भीतर सोए न रह जाओ। झाड़ो, साफ करो, बोझ को हटाओ। उठो भीतर।
'उठे। प्रमाद न करे।'
प्रमाद न करना उठने का सूत्र है। प्रमाद शब्द को समझो। वह बुद्ध का बड़ा बहुमूल्य शब्द है। बुद्ध-महावीर दोनों का। प्रमाद का अर्थ होता है, ऐसा जीना जैसे कोई शराब पीए जी रहा हो। एक शराबी को राह पर चलते देखो--चलता है, डगमगाता है। पैर कहीं के कहीं पड़ते हैं।
एक शराबी को मैंने देखा। कुछ दिनों तक एक मोहल्ले में मैं रहता था जबलपुर में। पास ही वहां एक शराबी था। काफी धनी व्यक्ति। समृद्ध। कुछ करने को नहीं था, खूब था पैसा, शराब ही एकमात्र करने जैसी बात रह गयी थी।
एक रात मैं लौट रहा था--कोई ग्यारह बजे होंगे--किसी मित्र के घर से। उस आदमी को मैंने देखा कि वह एक पैर तो नाली में रखे है और एक नाली के पास फुटपाथ पर रखे है, चल रहा है। चलना कठिन हो रहा है। क्योंकि एक पैर ऊंचा है और एक नीचा है और शराब पीए है। मैंने उसको पूछा भी कि राह पर नहीं चलते? उसने कहा, मैं भी सोच रहा हूं कि रास्ते का हुआ क्या यह? इरछा-तिरछा क्यों हो गया है? बड़ी मुश्किल हो रही है चलने की।
प्रमाद का अर्थ है, तुम चल भी रहे हो, तुम्हें ठीक-ठीक पता भी नहीं, कहां चल रहे हो, क्या रास्ता है, कौन तुम हो, कहां जा रहे हो, किसलिए जा रहे हो, कहां से जा रहे हो, जाने की जरूरत भी है या नहीं? चले जा रहे हो। एक धक्कम-धुक्की है। सब जा रहे हैं, इसलिए तुम भी जा रहे हो। सब चल रहे हैं, इसलिए तुम भी चल रहे हो। सब काम कर रहे हैं, इसलिए तुम भी काम कर रहे हो। एक अनुकरण है। एक अंधानुकरण है।
प्रमाद छोड़ने का अर्थ है, थोड़ा झकझोरो अपने को। जो भी करो, होशपूर्वक करो। पैर भी उठाओ तो होशपूर्वक उठाओ। बुद्ध ने तो इतना कहा है कि श्वास भी भीतर जाए, तो तुम्हें होश रहे कि श्वास भीतर गयी। अब पहुंच गयी भीतर। रुकी क्षण भर। अब चली वापस। अब बाहर गयी। अब बाहर पूरी चली गयी। रुकी क्षण भर। अब फिर भीतर आने लगी।
बुद्ध ने कहा है, भिक्षु तो वही है जो श्वास तक को अनजाना न चलने दे। जो श्वास जैसी सूक्ष्म-प्रक्रिया पर भी होश को जमा दे, बिठा दे। राह पर चले, बुद्ध कहते हैं, तो बायां पैर उठे तो भीतर पता रहे कि बायां उठा। अब बायां नीचे गया, दायां उठा।
मतलब यह नहीं है कि तुम भीतर कहो कि बायां उठा, दायां उठा--पागल हो जाओगे। ऐसा बोध रहे। शब्द नहीं बनाने हैं। ऐसा कहना नहीं है कि अब बायां उठा, अब दायां उठा, नहीं तो थोड़े दिन में जोर-जोर से कहने लगोगे कि अब बायां उठा, अब दायां उठा। फिर तो बहुत मुश्किल हो जाएगी, जिंदगी बड़ी जटिल है। क्या-क्या सम्हालोगे? बायां पैर उठ रहा है, श्वास भीतर जा रही है, हाथ इस तरफ जा रहा है, क्या-क्या सम्हालोगे? क्या-क्या होश रखोगे?
होश रखने का मतलब इतना ही है कि तुम जागे रहो, जो भी हो रहा है। जो भी हो रहा है। ऐसा न हो कि तुम कहो, मुझे पता नहीं था कब हो गया। अगर इतने जागकर तुम जीयोगे, कैसे क्रोध कर पाओगे? कैसे कामवासना में उतर पाओगे? कैसे घृणा कर पाओगे? कैसेर् ईष्या करोगे? असंभव है।
बुद्ध ने बड़ा गहरा सूत्र दिया है। जो जागा हुआ जीता है, उसके जीवन में जो पाप है, वह अपने से गिर जाता है। बुद्ध की परिभाषा यही है कि पाप का अर्थ है, सोए-सोए जीना। और पुण्य का अर्थ है, जागे-जागे जीना। पुण्य का कोई संबंध कृत्य से नहीं है, कर्ता के जागे होने से है। और पाप का भी कोई संबंध कृत्य से नहीं है, करर्‌ता के सोए होने से है। अगर तुम जागने लगो भीतर, उठने लगोगे भीतर--उत्तिट्ठे।
'सुचरित धर्र्म का आचरण करे।'

धम्मं सुचरितं चरे।

सुचरित--किसी ऐसे आदमी के पास जाओ, जिसके पास तुम्हें धर्म का कोई साकार-रूप उतरता हुआ मालूम पड़ता हो। शास्त्र तो मुर्दा हैं। उनमें सब सुंदर बातें लिखी हैं, लेकिन बस ऐसे ही है जैसे फूलों को तुमने किताबों में दबाकर बहुत दिन रख दिया हो, सूख जाते हैं, गंध भी खो जाती है, सौंदर्य भी खो जाता है। शास्त्रों में रखे हुए शब्द तो किताबों में दबाए गए फूलों की तरह हैं। मर चुके। बहुत पहले मर चुके। अब तो तुम किसे बगीचे में जाओ, किसी माली को पूछो, किसी बगीचे के जीवित, जिंदा फूल को देखो।
सुचरित का अर्र्थ है, अगर गुलाब को जानना है तो खिले हुए गुलाब के पास जाओ। किसी बुद्धपुरुष को खोजो, जहां तुम्हें गंध मिले, जहां तुम्हें जीवित का साक्षात्कार मिले। जहां तुम अपने भविष्य को वर्तमान में खड़ा हुआ देख पाओ। जहां तुम्हें कोई दीया जला हुआ मिले। ताकि भरोसा बढ़े, हिम्मत बढ़े कि जो इस व्यक्ति को हो सका, वह मुझे भी हो सकेगा।
सदगुरु का इतना ही अर्थ है। सदगुरु तुम्हें ले नहीं जाता। कोई किसको कहां ले जा सकता है! सदगुरु को देखकर तुम्हें इतना भरोसा आ जाता है, आत्मविश्वास आ जाता है कि तो हम यूं ही नहीं भटक रहे! तो हो सकता है! हुआ है! आंख के सामने है। सुचरित है। छूकर देख लें, पास रहकर देख लें, सत्संग करके देख लें, कहीं हुआ है।
इस पृथ्वी पर धर्म धीरे-धीरे विनष्ट होता चला गया, क्योंकि हम फिकर करने लगे किताब से, हमने बुद्धों की तलाश छोड़ दी। ऐसा नहीं कि बुद्ध होने बंद हो गए। बुद्ध सदा होते रहे हैं, होते रहते हैं, हो रहे हैं, सदा होते रहेंगे। पृथ्वी बड़ी है। लेकिन हमने खोज छोड़ दी।
इसका परिणाम यह हुआ कि हमें अब ईश्वर पर भी आस्था नहीं आती कि ईश्वर हो सकता है। ईश्वर जैसा कोई देखा हो, तो ही तो आस्था आ सकती थी, आस्था आए कैसे? शक होता है कि कहीं कल्पना का जाल ही न हो।
तुम्हें कृष्ण पर भरोसा कैसे आ सकता है! शक बना ही रहेगा कि कहीं कहानी ही न हो। क्योंकि कहीं तुम्हें जीवन में जब तक कोई जीवित व्यक्ति न मिल जाए जिसकी बांसुरी में फिर वही स्वर हों, न सही ठीक कृष्ण जैसे--क्योंकि ठीक कृष्ण जैसे तो फिर दुबारा नहीं होंगे--लेकिन स्वाद वही हो, धुन वही हो, तुम्हें फिर कभी कोई व्यक्ति मिल जाए जिसके चरणों में बैठकर फिर तुम पर वैसी ही शांति की वर्षा हो जाए जैसे कभी बुद्ध के चरणों में किसी को हुई थी, तो तुम्हें भरोसा आएगा। अपने पर भरोसा आएगा, भगवत्ता पर भरोसा आएगा। तब तुम्हें पता चलेगा कि यह आत्मा ही परमात्मा है। यह हो सकता है, मेरे भीतर भी हो सकता है।
छोटे पक्षियों के बच्चे जब अपनी मां को आकाश में उड़ते देख लेते हैं, तब हिम्मत आती है। तब वे भी घोंसले के किनारों पर बैठकर डरते-डरते, संकोच करते-करते पंख फैलाते हैं। कभी-कभी तो मां को उन्हें धक्का देना पड़ता है। उसमें भी तरहत्तरह के बच्चे होते हैं। कोई बच्चा हिम्मतवर होता है, उड़ जाता है। कोई बच्चा थोड़ा डरा होता है, नाजुक होता है, पकड़े ही घोंसले को रह जाता है। उड़ता ही नहीं। तो फिर मां को धक्का भी देना पड़ता है। लेकिन धक्का देने के पहले वह उड़ती है। घोंसले के चारों तरफ चक्कर मारती है। उनको भी एक खबर देती है कि आकाश है। देखो। और मेरे जैसे पंख तुम्हारे पास भी हैं। माना कि तुम अभी छोटे हो, नए हो, पर क्या हर्ज? तुम्हारे पास छोटे पंख हैं, पर तुम्हारे बोझ को झेलने के लिए काफी हैं। फिर बड़े भी हो जाएंगे। उड़ोगे, तो बड़े हो जाएंगे; उपयोग करोगे, तो बड़े हो जाएंगे। जिसका उपयोग किया जाता है, वह बढ़ जाता है; जिसका हम उपयोग नहीं करते, वह धीरे-धीरे सिकुड़ जाता है, खो जाता है।
तुमने अपनी भगवत्ता का उपयोग नहीं किया, तो सिकुड़ गयी, खो गयी। भगवत्ता पंखों की तरह है। तुम अपने पैरों का उपयोग न करोगे तो धीरे-धीरे जड़ हो जाएंगे। एक दिन चल न पाओगे। रोज उपयोग करते रहो तो चलने के योग्य रहोगे। दौड़ो तो दौड़ने के योग्य रहोगे।
किसी बुद्धपुरुष के पास तुम्हें अपने पर भरोसा आता है, यह खयाल रखना। यहीं भूल न हो जाए। कहीं ऐसा न हो कि तुम बुद्धपुरुष पर भरोसा ले आओ। बुद्धपुरुष की सन्निधि में तुम्हें अपने पर भरोसा आ जाए तो सार्थक हुआ। तुम्हें बुद्धपुरुष के प्रति जो श्रद्धा पैदा हो, वह तुम्हारी आत्मश्रद्धा में रूपांतरित हो जाए। कहीं ऐसा न हो कि छोटा बच्चा कहे कि ठीक मां, तुझ पर मुझे भरोसा आ गया, तू उड़ सकती है, लेकिन मैं? मैं नहीं उड़ सकता। कहां तू, कहां मैं! तो मां के उड़ने से कुछ सार न हुआ। लेकिन बच्चा फड़फड़ाए, थोड़ा पंखों को देखे कि अरे, मेरे पास भी हैं! फिर मां तो उड़ ही रही है! फिर चलो इसकी छत्र-छाया में थोड़ा हम भी उड़ लें।
तो पहले बच्चा मां के साथ-साथ उड़ता है। बहुत दूर नहीं जाते, वृक्ष के एक-दो चक्कर लगाते हैं, बैठ जाते हैं। थक जाता है, छोटा है। फिर थोड़ी दूर की यात्राओं पर निकलता है, एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष तक जाता है। पर अभी भी मां के पीछे लगा रहता है। देखा तुमने कभी पक्षियों को अपने छोटे बच्चों को उड़ाते? देखना चाहिए।
जैसे छोटा बच्चा मां का पल्लू पकड़े-पकड़े चलता रहता है घर में। अभी अपने पैर से नहीं चल सकता, जानता है कि पैर हैं, चलता भी है, लेकिन फिर भी पल्लू पकड़े रहता है। मां जा रही चौके में, तो वह चौके में चला जा रहा है। मां जा रही है बाथरूम में, तो वह वहां भी घुसने की कोशिश कर रहा है। वह पल्लू पकड़े हुए है, क्योंकि वह यह नहीं मान सकता अभी कि मैं अपने से चल सकूंगा। धीरे-धीरे चलने लगेगा। फिर तुम पल्लू पकड़ाओ तो छुड़ा देगा कि यह क्या बात है? हटाओ भी!
कल ही एक मां मेरे पास आयी, वह कहती है, मेरा बेटा आपका संन्यासी हो गया। अब वह हमसे मुक्त होना चाहता है। होना ही चाहेगा। हर बेटे को एक दिन होना ही पड़ता है। मां समझदार है। उसको समझ में आया। उसने कहा, यह बात तो ठीक है। होना ही पड़ेगा, एक दिन तेरा दामन छोड़ दिया था, एक दिन तेरा गर्भ छोड़ दिया था, फिर एक दिन घर भी छोड़ा, फिर एक दिन यह किसी और स्त्री के प्रेम में पड़ेगा, फिर तुझे भूलने भी लगेगा, यह बिलकुल स्वाभाविक है। और फिर कभी अगर यह मेरे जैसे किसी व्यक्ति के प्रेम में पड़ गया, तो तू खुद ही कह देगी, जा। तो अब तू ही इसको कह दे कि जा, अब कंजूसी मत कर। तेरे कहने में ही अब सौरभ है। तेरे कहने में ही अब रस है। और मां हिम्मतवर है, उसने कहा कि ठीक। तो शायद तू इसे अपने हाथ से छोड़ दे और कहे कि जा तू मुक्त है, तो यह तुझसे छूट भी न पाए। क्योंकि उससे, जो तुम्हें छोड़ने को भी राजी है, कौन छूट पाता है! जो तुम्हें स्वतंत्रता देने को राजी है, उसके बंधन से छूटना असंभव है।
पक्षियों के बच्चे पहले पक्षी के साथ उड़ते हैं, थोड़ी दूर-दूर। फिर एक दिन अपने पर तौलने लगते हैं। फिर मां कहेगी कि चलो इधर, तो वे कहते हैं, जाओ भी तुम्हें जहां जाना है! अब हमारे पर हैं। अब हम खुद सीधे-सीधे आकाश का साक्षात्कार करना चाहते हैं।
उस दिन गुरु प्रसन्न होता है, जिस दिन शिष्य कहता है, अब मेरे पंख हैं, आशीर्वाद दो कि मैं सीधा-सीधा आकाश का साक्षात्कार करूं। अब जरूरत नहीं कि तुम्हें कष्ट दूं, कि तुम मेरे साथ उड़ो। अब मैं उड़ सकूंगा। अब मैं जाता हूं सूरज की तरफ। अब मैं भरता हूं अपनी उड़ान, आशीर्वाद दो।
बुद्ध जब कहते हैं, सुचरित धर्म का आचरण करे, सुचरित का अर्थ हुआ, जहां अभी आचरण में हो। जहां अभी धर्म जीया जा रहा हो। जहां धर्म अभी किताब में दबा हुआ सूखा गुलाब का फूल न हो गया हो, जहां अभी वृक्ष पर लगा हो। जहां अभी जड़ें जमीन में फैली हों। जहां अभी रसधार बहती हो। जहां अभी झरना जीवित हो, सिर्फ याददाश्त न रह गयी हो।
इसलिए सदगुरु की खोज अत्यंत जरूरी है। सदग्रंथ सदगुरु तक ले जाएं, बस, इतना बहुत। सत्य तक तो सदगुरु के पास ही पहुंचना होता है। नहीं तो अपने पैरों पर भरोसा नहीं आता, और यात्रा लंबी है, और पहाड़ ऊंचा है, और चढ़ाई भारी है। जब तक तुम किसी ऐसे आदमी को न देख लो जो चढ़ गया है, तब तक तुम न चढ़ सकोगे।
तुमने देखा, हिलेरी एवरेस्ट पर चढ़ा। उसके पहले तक सैकड़ों लोग कोशिश कर चुके और न चढ़ सके। हिलेरी के बाद बहुत लोग चढ़ गए। अब तो हर साल कोई जाता है। अब तो कोई बात ही खास न रही। स्त्रियां भी चढ़ गयीं। क्या मामला हुआ? आखिर हिलेरी के पहले क्यों न चढ़ सके लोग? करीब पचास साल से कोशिश चलती थी चढ़ने की एवरेस्ट पर, सैकड़ों लोग मर गए, गिर गए, खो गए, कभी लौटे न वापस, पहाड़ दुर्गम से दुर्गमतर होता चला गया। फिर एक दिन हिलेरी चढ़ गया। पर एक आदमी चढ़ गया, भरोसा आ गया, बात खतम हो गयी। अब तो बच्चे चढ़ जाएंगे। अभी स्त्रियां चढ़ीं।
तुम देखना दो-चार-पांच साल में कोई स्कूल के छोटे बच्चे चढ़ जाएंगे। क्योंकि यह तो मामला अब गया। एक दफा एक आदमी चढ़ गया, सारी आदमियत चढ़ गयी। अब कोई जाए चढ़ने, या न जाए, लेकिन हर आदमी जानता है कि थोड़ी-बहुत व्यवस्था की बात होगी, थोड़ा प्रशिक्षण की बात होगी, लेकिन चढ़ जाएंगे। जब हिलेरी चढ़ गया, हम जैसा आदमी, तो हम क्यों न चढ़ पाएंगे? कोई कारण न रहा। एक आदमी चढ़ा तो पूरी आदमियत चढ़ गयी। चांद पर एक आदमी जिस दिन चला, उस दिन सारी आदमियत चल गयी। अब कोई अड़चन न रही।
ये पहाड़ तो छोटे-छोटे हैं। सत्य का पहाड़ अति दुर्गम है। वह शिखर आंख में दिखायी भी नहीं पड़ता। तुम कितना ही सिर उठाओ, कितना ही सिर उठाओ, वह शिखर बड़ा दूर है--दूर आकाश में धुंधलके में खोया है। लेकिन जब तुम देख लेते हो, एक आदमी चढ़ गया...।
जापान में कहावत है, झेन फकीर कहते हैं कि अगर पहाड़ पर जाना हो तो उस आदमी से पूछो जो बहुत बार आता-जाता हो। ठीक है। आस्क द अवेकंड। जो जाग गए, उनसे पूछो। अगर जागना है। तुम किताबें खोलकर बैठे हो। उन किताबों से तुम चढ़ न पाओगे। हां, चढ़े हुओं की बातें तुम्हें याद हो जाएंगी, कंठस्थ हो जाएंगी, हृदयस्थ नहीं। हीन-धर्र्म तो तुम्हें मिल जाएगा, आर्य-धर्म तुम कहां पाओगे? खोजो कहीं जीवंत को।
'सुचरित धर्म का आचरण करे। धर्माचारी इस लोक में तथा परलोक में सुख की नींद सोता है।'
तुम तो सुख से जागते भी नहीं, नींद तो बड़ी दूर। तुम तो सुख से जीते भी नहीं, मृत्यु तो बड़ी दूर। जिसने धर्म का आचरण किया है, सुख से जीता है, यह तो ठीक ही है, इसकी तो बुद्ध बात ही नहीं करते, सुख से मरता है। सुख से जागता है, इसकी तो बात ही नहीं करते, सुख से सोता है। सोने में जब होता नहीं, तब भी सुख की धारा बहती रहती है--जागने में तो होता है, तब तो बहती ही है। असल में जो जाग गया, वह सोने में भी जागा ही रहता है। असल में जो जी लिया, वह मरकर भी जीता ही चला जाता है।
साधारण जन, सोए हुए जन, कभी सुखी नहीं। सुख के सपने भला देखते हों। आशा भला करते हों, उम्मीदें बांधते हों, लेकिन कभी सुख उन्हें मिलता नहीं। तुम जरा लोगों की आंखों में झांको, जरा लोगों के चेहरे को गौर से देखो, कैसे कुम्हलाए हो गए हैं! आंखों ने झीलों की शांति खो दी है। झीलों की गहराई खो दी है। लोगों के प्र्राणों को जरा देखो। कैसे थके-मांदे हैं, बोझिल हैं। जैसे बस मरने की प्रतीक्षा कर रहे हों। जैसे और कुछ करने को नहीं बचा है।
तुम लोगों में जीवन की गुनगुनाहट न पाओगे। न जीवन के झरने का कलकल नाद सुनोगे। तुम उनके पास बैठकर कितना ही कान लगाकर सुनो, कुछ भी तुम्हें सुनायी न पड़ेगा, कभी-कभी आंसू की टप-टप हो सकता है सुनायी पड़े। कभी हो सकता है कि उनकी उदासी तुम्हें भी छू ले। मगर कुछ और तुम न सुनोगे।
मैंने सुना है, मुल्ला नसरुद्दीन दीवाल से कान लगाकर बैठा था। एक मित्र मिलने आया था। उसने पूछा, क्या सुन रहे हो, बड़े मियां? उसने कहा, तुम भी सुनो। वह आदमी भी कान लगाकर सुनने लगा। कोई पांच-सात मिनट बीते, उसे कुछ सुनायी नहीं पड़ा। उसने कहा, कुछ सुनायी नहीं पड़ता। उसने कहा, क्या खाक पड़ेगा, तीस साल से हम सुन रहे हैं, हमीं को नहीं सुनायी पड़ा। तुमको क्या पांच मिनट में सुनायी पड़ जाएगा!
तुम आदमियों के पास कान लगाकर बैठो, कुछ भी सुनायी न पड़ेगा। कोई संगीत नहीं। जीवित भी हैं, इसका भी भरोसा न होगा।
हां, थोड़ी खटर-पटर कारखाने की चलती है, वह चलती है। हृदय की आवाज चलती है, श्वास चलती है--खटर-पटर कारखाने की। मगर मालिक घर में है? कुछ पता नहीं चलता। मुर्दे के पास बैठो कि जिंदा के पास बैठो, तुम दोनों को मुर्दा पाओगे।
इसलिए तो जीसस ने कहा है...। एक शिष्य का बाप मर गया। किसी ने आकर खबर दी। और शिष्य ने कहा कि मुझे जाने दें। जाऊं मैं अपने पिता को दफना आऊं। जीसस ने कहा, छोड़ भी, तू फिकर छोड़, गांव में बहुत मुर्दे हैं, वे दफना लेंगे। इस काम के लिए जिंदा आदमी को जाने की जरूरत नहीं, यह तो काम मुर्दे ही कर लेंगे। गांव में बहुत मुर्दे हैं। लेट द डेड बरी द डेड। मुर्दों को ही दफना लेने दे, तू क्यों फिकर करता है। बड़ी हिम्मत का युवक रहा होगा। हंसा, उसने कहा कि बात तो ठीक है। और यह काम तो वे ही लोग कर लेंगे। नहीं गया। जीसस ने कहा, तू मेरे पीछे आ, छोड़ मौत की बातें, हम परम जीवन को खोजने चले हैं।
जो न देखा था आज तक हमने
दिल की बातों में आ के देख लिया
जिंदगी हर तरह बवाल रही
सब्र भी आजमा के देख लिया
कोई अपना नहीं है यहां ऐ अर्श
सबको अपना बना के देख लिया
जिंदगी हर तरह बवाल रही। तुम जरा गौर से तो देखो, तुम्हारी जिंदगी सिवाय बवाल के और क्या है? सोचने का मौका नहीं मिलता, यह और बात है! फुरसत कहां कि लौटकर देखें कि जिंदगी बवाल है। चले चले जाते हैं। एक रौ में बहे चले जाते हैं। समय नहीं मिलता, उठते हैं सुबह, भागे, दौड़े, आपा-धापी, सांझ थके-मांदे आए, सो गए, फिर सुबह उठे, फिर भागे। ऐसे ही भागते-भागते एक दिन गिरते हैं और खो जाते हैं। लेकिन जरा सोचो तो, सिवाय बवाल के जिंदगी में कुछ और है? ये अर्श की पंक्ति बड़ी प्यारी है--
जिंदगी हर तरह बवाल रही
सब्र भी आजमा के देख लिया
वह यह कहता है कि सब तरह से शांति भी रखकर देख ली। सब तरह का धीरज भी रखकर देख लिया। सब तरह की सांत्वना भी अपने को देकर देख ली, फिर भी बवाल ही रही।
जो न देखा था आज तक हमने
दिल की बातों में आ के देख लिया
और फिर दिल ने जो-जो आशाएं बंधायीं, उनके पीछे दौड़कर देखा। जो-जो सपने दिए, उनके पीछे दौड़कर देखा। जो-जो इंद्रधनुष दिखाए, उनके पीछे दौड़कर देखा। सब देख लिया। जिसने इस बात की प्रतीति कर ली कि इस जिंदगी में सिवाय उपद्रव, दौड़-धूप, बेचैनी के और कुछ भी नहीं, यहां कोई वृक्ष की छाया भी नहीं--एक बड़ा मरुस्थल है--उसकी जिंदगी में क्रांति घटती है। तब फिर वह भीतर खोजना शुरू करता है। बाहर देख लिया, नहीं कुछ मिलता। अब भीतर देख लें। क्योंकि दो ही आयाम हैं। कहीं ऐसा न हो कि हम बाहर खोज रहे हों और वह भीतर हो। और ऐसा ही है। क्योंकि जिन्होंने भीतर खोजा, उन्होंने पा लिया।
'जो इस संसार को पानी के बुलबुले की तरह और मरीचिका की तरह देखता है, उस ऐसे देखने वाले को यमराज नहीं देखता।'
बड़ी गजब की बात बुद्ध कहते हैं। कहते हैं, अगर तुमने जिंदगी को मौत समझ लिया, अगर तुमने जिंदगी में मौत देख ली, तो फिर मौत तुम्हें न देख सकेगी। तुम मौत के लिए अदृश्य हो जाओगे। अभी मौत तुम्हारे लिए अदृश्य है। बड़ी प्यारी बात कहते हैं। वे कहते हैं, अभी तुम्हें मौत दिखायी नहीं पड़ती, जीवन-जीवन दिखायी पड़ता है। अभी तुम्हें सब तरफ हरा-हरा सूझता है। अभी तुम्हें मौत दिखायी नहीं पड़ती। अभी तुम बबूलों में भी खो जाते हो।

यथा बुब्बुलकं पस्से यथा पस्से मरीचिकं।

अभी तो तुम मरीचिकाओं में भी भटक जाते हो। अभी तो दूर के दृश्य बड़े सुहावने मालूम पड़ते हैं। और बहुत बार पास जाकर भी देखा है, कुछ न पाया। बहुत बार पास जाकर भी इतना ही पाया कि दूर के ढोल सुहावने होते हैं, पास इतने सुहावने सिद्ध नहीं होते। सच तो यह है कि और पास जाओ तो ढोल ही सिद्ध नहीं होते। सब खो ही जाता है। कोरे सपने सिद्ध होते हैं। तुम्हारा प्रक्षेपण था। तुमने ही सोच लिया था। तुमने ही मान लिया था। हाथ में कुछ लगता नहीं, राख ही लगती है। लेकिन बुद्ध कहते हैं, जिसने जिंदगी में यह देख लिया कि सब पानी का बबूला है, अभी गया, अभी गया...।
क्या सत्य असत्य नहीं मैंने कुछ भी सोचा
मन शांत हुआ जिसको पा, उसको सत्य कहा
जो आकर जीवन में आंसू-सा चला गया
मेरी आस्था ने केवल उसे असत्य कहा
फिर और दूसरा भी मेरा यह अनुभव है
जो सत्य, वही जीवन में थिर रह पाता है
जो मिथ्या है, भ्रम है, असत्य है, क्षणभर में
हलचल-सा आता है, जल-सा बह जाता है
जो मिथ्या है, भ्रम है, असत्य है, क्षणभर में
हलचल-सा आता है, जल-सा बह जाता है
सूरज से प्राण, धरा से पाया है शरीर
ऋण लिया वायु से हमने इन श्वासों का
सागर ने दान दिया है आंसू का प्रवाह
नभ ने सूनापन विकल मधुर उच्छवासों का
जो जिसका है उसको उसका धन लौटाकर
मृत्यु के बहाने हम ऋण यही चुकाते हैं
इसको ही कोई कहता है अभिशापत्ताप
वरदान समझ कुछ इस पर खुशी मनाते हैं
दृष्टि की बात है। अगर तुमने जिंदगी में मौत देख ली, तो तुम्हें मौत में जिंदगी दिखायी पड़ जाएगी। अगर तुम्हें जिंदगी में जिंदगी ही दिखायी पड़ती रही, तो मौत में मौत दिखायी पड़ती रहेगी। अगर तुमने झूठ को सच समझा, तो सच में तुम्हें झूठ दिखायी पड़ता रहेगा। अगर तुमने झूठ को झूठ समझा, तो तुम्हें सच में सच दिखायी पड़ जाएगा।
कृष्णमूर्ति बार-बार कहते हैं, असत्य को असत्य जान लेना सत्य के जानने की भूमिका पैदा कर लेना है। टू नो द फाल्स एज फाल्स। असार को असार जान लेना, बस सार को जानने की भूमिका पैदा हो गयी। जो नहीं है उसे जान लेना नहीं है, तो फिर जो है उसके लिए तुम्हारे द्वार खुले। जब तक तुम भ्रम में भटके हो, जब तक पानी के बबूलों में तुम अपनी उम्मीदें सजाए हो, जब तक तुम उन पर फूले नहीं समाते, जिनको पाकर तुम कुछ भी न पा सकोगे, तब तक तुम भटकोगे; जो है वह तुम्हें दिखायी न पड़ सकेगा।
अर्श कहां तक आखिर ये पुरलुफ्त सुहानी उम्मीदें
खुशफहमी पर फूल न इतना कैसे हैं आसार तो देख
यहां सभी चला जा रहा है, बहा जा रहा है।
कैसे हैं आसार तो देख, खुशफहमी पर फूल न इतना
आज जिंदगी है, कल नहीं होगी। अभी फूल खिले हैं, कल झर जाएंगे। अभी वीणा बजती थी, कल टूट जाएगी।
कैसे हैं आसार तो देख
अर्श कहां तक आखिर ये पुरलुत्फ सुहानी उम्मीदें
कब तक सपने संजोता रहेगा? कब तक?
खुशफहमी पर फूल न इतना कैसे हैं आसार तो देख
'जो इस संसार को पानी के बुलबुले की तरह और मरीचिका की तरह देखता है, उस ऐसे देखने वाले को यमराज नहीं देखता।'
मौत आएगी और तुम्हें पकड़ न पाएगी। तुम मौत के हाथ के बाहर हो जाओगे। मौत के पहले मौत को देख लो। मौत के पहले मर जाओ। फिर तुम्हें मौत न ले जा सकेगी। बहुत कम ऐसा होता है कि मौत आती है और जिसे ले जाना है उसे नहीं देख पाती।
बड़ी पुरानी यूनानी कथा है, मुझे बड़ी प्यारी रही है। एक बड़ा चित्रकार था, बड़ा मूर्तिकार था। जब उसकी मौत आने के करीब आयी, तो उसने अपनी ही दस मूर्तियां बना लीं। और वह इतना बड़ा मूर्तिकार था कि कहते थे कि वह जब किसी की मूर्ति बनाता था, तो जिसकी मूर्ति बनायी उसको उसके पास खड़ा कर दे, और अगर वह आदमी सांस साधकर खड़ा हो जाए, तो लोग बता न पाते थे कि कौन असली है और कौन नकली है? कौन मूर्ति है और कौन मूल है?
उसे याद आया, जब उसे लगा...चिकित्सकों ने कहा, अब तेरी मौत करीब है, तो उसने कहा कि ठीक। दे लेंगे धोखा। उसने अपनी ही दस मूर्तियां बना लीं, उनमें छिपकर खड़ा हो गया।
मौत आयी। दरवाजे से घुसी, वह बड़ी घबड़ायी--इधर ग्यारह आदमी थे, ले एक जाना था। और बिलकुल एक जैसे थे। कौन असली है, पता करना मुश्किल था। उसने बड़े गौर से सबको जाकर देखा, वह श्वास साधे खड़ा रहा, खड़ा रहा। जब उसके पास से निकल गयी, तो वह निश्चिंत हुआ।
मौत तो थककर लौट गयी। उसने परमात्मा को जाकर कहा कि बड़ी मुश्किल है, वहां ग्यारह आदमी एक जैसे हैं, ऐसा कभी हुआ नहीं। तुमने कभी एक जैसे दो आदमी भी नहीं बनाए। वहां ग्यारह हैं, यह कैसी भूल-चूक हो गयी। अब मैं किसको ले आऊं? परमात्मा हंसने लगा। उसने कहा कि दस नकली हैं, एक असली है। उसने कहा, अब कैसे पहचानें? तो परमात्मा ने कहा, यह रहा सूत्र--उसके कान में एक मंत्र बोल दिया--कहा, यह मंत्र तू जाकर कमरे में बोल दे, असली अपने से बाहर आ जाएगा।
वह मौत वापस लौटी। वह आकर कमरे में खड़ी हुई, उसने चारों तरफ नजर डाली। उसने कहा, और सब तो ठीक है, एक भूल रह गयी। वह आदमी बोला, कौन सी? उसने कहा, यही कि तुम अभी अपने को नहीं भूले। चलो, बाहर निकलो।
अगर तुम मिट जाओ, फिर तुम्हें मौत नहीं ले जा सकती है। फिर वह लाख कहे कि बड़ी भूल हो गयी, एक भूल रह गयी, लाख भूल रह गयी, तुम खड़े हो। तुम खड़े हो सो खड़े हो। शायद बहुत सिर मारे, तो कोई नकली मूर्ति बोल उठे कि अब हो गयी बहुत बकवास, तो वह उसी को ले जाए, लेकिन तुमको न पकड़ पाएगी। तुम हो ही नहीं, पकड़ेगी कैसे? पकड़े जाने के लिए होना जरूरी है। वह आदमी भूल गया एक क्षण को, भूल ही जाओगे, धोखा दिए न चलेगा। श्वास साधने से न होगा काम, अहंकार गिराने से होगा। खूब साधो प्राणायाम और खूब करो योगासन, कुछ भी न होगा। जब तक कि समर्र्पण न सधे। जब तक कि मौत स्वीकार न कर लो।

एवं लोकं अवेक्खन्तं मच्चुराजा न पस्सति।

वह मृत्यु का जो राजा है, फिर तुझे देख न सकेगा। बस तू मौत को चारों तरफ देख ले। तू उसे पहचान ले, तो तू उसके हाथ के बाहर हुआ। और जब तक तू उसे नहीं पहचानता है, तब तक तू उसके हाथ के भीतर है। लाख उपाय कर, मौत आज नहीं कल पकड़ ही लेगी।
'आओ...।'
आज का आखिरी सूत्र--
'आओ, चित्रित राजरथ के समान इस संसार को देखो, जिसमें मूढ़ आसक्त होते हैं, परंतु ज्ञानी आसक्त नहीं होते।'
एस पस्सथिमं लोकं चित्त राजरथूपमं।
यत्थ बाला विसीदन्ति नत्थि संगो विजानतं।।

आओ, बुद्ध कहते हैं, देखो इस संसार को, कैसा सजा-बजा है! कैसा राग-रंग है! कैसी होली चल रही है! कैसी धूल, गुलाल, रंग उड़ाए जा रहे हैं! जरा देखो, गौर से देखो। यह सब सपना है। और ऐसे सजा है जैसे राजा का रथ सजा हो। जल्दी ही ये रंग उड़ जाएंगे। जल्दी ही सब बेरंग हो जाएगा।
'आओ, इस चित्रित राजरथ के समान संसार को देखो, जिसमें मूढ़ आसक्त हो गए हैं, परंतु ज्ञानी आसक्त नहीं होते।'
तो ज्ञानी की कसौटी यह है। इतना जागे हुए हो तुम कि आसक्ति दांव-पेंच नहीं चला पाती। इतने जागे हुए हो तुम कि आसक्ति घुस-पेठ नहीं कर पाती। इतने जागे हुए हो तुम, दीया ऐसा जला है कि अंधेरा कहां से भीतर आए। अंधेरे को आने की जगह नहीं मिलती।
यह बुद्ध का निमंत्रण है कि संसार को ठीक से देख लो। रंगीन मालूम होता है, है नहीं। रंगीन होने का केवल धोखा है।
क्या बताऊं कि खुदा जाने जवानी क्या थी
जागते-जागते एक ख्वाब मगर देखा था
लौटकर जब पीछे देखोगे, तो सारी जिंदगी ख्वाब से ज्यादा न मालूम पड़ेगी।
बर्ट्रेंड रसल ने किसी मित्र को एक पत्र में लिखा है कि बहुत बार मुझे ऐसा होने लगता है कि जो अतीत मैं गुजार आया हूं, वह वस्तुतः था भी या नहीं? कहीं ऐसा तो न हो कि एक सपना देखा था!
तुम भी जरा सोचना। क्या तुम्हारे पास पक्का सबूत है कि था। रात को जब तुम सपना देखते हो, तब वह भी लगता है सच्चा है। सुबह जागकर पता चलता है, अरे, सपना था! जरा पीछे लौटकर देखो, कल जो बीत गया, था? आज कैसे फर्र्क करोगे, सपना था कि सही था? आज कैसे निर्णय करोगे? सपना भी हो सकता है। सभी सपने जब देखे जाते हैं, सच मालूम होते हैं।
च्वांगत्सू की प्रसिद्ध कथा है, बहुत बार मैंने कही है। रात उसने सपना देखा कि तितली हो गया है। सुबह बैठा था उदास। शिष्यों ने पूछा, क्या हुआ? उसने कहा, अब मैं कभी प्रसन्न न हो सकूंगा। बड़ी मुश्किल हो गयी। रात सपना देखा कि मैं तितली हो गया हूं। शिष्य हंसने लगे। उन्होंने कहा, हद्द हो गयी। ऐसे सपने तो हम सभी देखते हैं, इससे क्या परेशानी है?
उसने कहा, परेशानी सपने से नहीं है। परेशानी जागकर हो रही है। अब मुझे यह शक हो रहा है कि अगर च्वांगत्सू सपना देख सकता है कि तितली हो गया, तो हो सकता है अब तितली सो गयी हो और सपना देखती हो, च्वांगत्सू हो गयी है। क्या पक्का? कौन सच्चा? कैसे निर्णय करूं? जब तितली था, तो बिलकुल तितली था रात, उड़ता फिरता था फूल-फूल, पत्ती-पत्ती। एक क्षण को भी संदेह न आया सपने में कि मैं च्वांगत्सू और तितली! अब जाग गया हूं। यह च्वांगत्सू कह रहा है, वह कहता है, कि जाग गया हूं। कौन जाने तितली सो गयी हो! मेरा जागना तितली का सोना हो सकता है। क्योंकि मेरा सोना तितली का जागना हुआ था और तितली उड़ती फिरती थी। अब हो सकता है, तितली बैठ गयी हो किसी वृक्ष पर, पर सम्हाल कर, ढांक कर, सो गयी हो गहरी नींद में और सपना देखती हो कि च्वांगत्सू हो गयी। अभी यह जो मैं बैठा हूं, यह वस्तुतः मैं बैठा हूं कि तितली सपना देख रही है? तुम कुछ मेरी सहायता करो। मगर क्या उपाय है?
फिर तो झेन फकीरों ने च्वांगत्सू के इस वक्तव्य को एक कोआन बना लिया। तो शिष्यों को देते हैं कि इस पर ध्यान करो। ध्यान करते-करते इस पर एक ऐसी घड़ी आती है कि जिसको तुम सपना कहते हो वह, और जिसको तुम सच कहते हो वह, दोनों एक ही गुणधर्म के मालूम होने लगते हैं। हैं भी। कोई रात आंख बंद का सपना है, कोई दिन आंख खुले का सपना है, पर सब सपने हैं।
क्या बताऊं कि खुदा जाने जवानी क्या थी
जागते-जागते एक ख्वाब मगर देखा था
कुछ ख्वाब तुम जागते-जागते देखते हो, कुछ सोते-सोते देखते हो। बाकी सब ख्वाब है। माया का इतना ही अर्थ है। माया के सिद्धांत की इतनी ही बात है।
'आओ, चित्रित राजरथ के समान इस संसार को देखो, जिसमें मूढ़ आसक्त होते हैं।'
मूढ़ कौन है? मूढ़ वही है, जो बार-बार के अनुभव से नहीं सीखता। कितनी बार तुमने सोचा, यह मिल जाएगा तो सब मिल जाएगा। फिर मिल भी गया। फिर हाथ मसोसकर रह गए। मगर एक अनुभव न लिया कि अब दुबारा ऐसा न सोचेंगे।
एक युवक मेरे पास आया--कोई डेढ़ वर्ष पहले। उसने कहा कि तीन विवाह और तीन तलाक कर चुका हूं। अभी कोई ज्यादा उम्र नहीं, जल्दी-जल्दी, पश्चिम में बहुत जल्दी काम हो रहे हैं। सब चीजों में गति आ गयी है। कोई हवाई जहाज ही तेजी से नहीं उड़ रहे हैं, आदमी भी तेजी से उड़ रहे हैं। उसने कहा कि तीन तलाक कर चुका हूं। और अब आशीर्वाद लेने आया हूं, एक चौथी लड़की के प्रेम में पड़ गया हूं। मैंने कहा, चौथी की बात बाद में करेंगे, पहले तीन की तो करें। उसने कहा, क्या मतलब? मैंने कहा, पहली से तुम्हें क्या अनुभव हुआ? उसने कहा, वे बातें जाने भी दें, बड़ा दुखद अनुभव हुआ। पर मैंने कहा, वे अनुभव के पहले तो तुमने बड़े सुख की उम्मीदें बांधी थीं। उसने कहा, जरूर, अन्यथा विवाह ही क्यों करता। कोई फंसता ही क्यों?
फिर दूसरे में क्या हुआ? पहले वे ही उम्मीदें फिर बांधी थीं? वह थोड़ा हैरान हुआ। उसने कहा, बांधी तो वे ही उम्मीदें थीं। फिर टूटीं? उसने कहा, फिर टूटीं। फिर मैंने कहा, तीसरे में कैसे उलझे?
वह थोड़ा उदास होने लगा, उसने कहा, क्या आप मुझे आशीर्वाद न देंगे। मैंने कहा, मेरी क्या तकलीफ है? आशीर्वाद! आशीर्वाद से ज्यादा सरल और क्या है? इसलिए तो जिनके पास कुछ नहीं है, वे भी आशीर्वाद देते हैं। आशीरर्‌वाद मैं दे दूंगा, लेकिन मेरे आशीर्वाद से जीवन का ढांचा नहीं बदलेगा, जीवन का रंग न बदलेगा। फिर पछताओगे। अब तुम मुझे भी गाली दोगे कि मैंने आशीर्वाद दिया। जैसे कि मेरा आशीर्वाद असफल हुआ। तुम मुझे क्यों असफल करने के पीछे पड़े हो। तुम्हीं भोगो। जल्दी ही मेरा आशीर्वाद अभिशाप मालूम पड़ने लगेगा, फिर क्या करोगे?
उसने कहा कि जो तीन बार हुआ, क्या जरूरी है कि चौथी बार भी हो? जो अब तक हुआ, जरूरी है कि फिर हो? मैंने कहा, यही भ्रांति आदमी को भटकाए लिए जाती है। यही भ्रांति उसे कभी नहीं जागने देती। वह हजार बार गिरता है गङ्ढे में, वह कहता है, एक हजार एकवीं बार यह हो सकता है न गिरें, निकल ही जाएं। हजार बार जो सेतु टूट जाता है बीच में, वह फिर भी हजारवीं बार सोचता है, क्या पता एक हजार एकवीं बार सफल हो जाएं। और ऐसे आदमियों ने कहानियां गढ़ रखी हैं।
तुमने गजनी के महमूद की कहानी सुनी होगी। वह हार गया। वह भागा, पहाड़ पर। वह बड़ा परेशान हो चुका था। वह कई बार हार चुका था। उसने आत्महत्या की तय कर ली थी। वह जाकर एक गुफा में छिप रहा था। दुश्मन पीछा कर रहे थे।
कहानी है कि उसने देखा कि एक मकड़ी जाला बना रही है, जाला उखड़-उखड़ जाता है, वह गिर-गिर पड़ती है। कोई काम न था, बैठा देखता रहा। गिनती करता रहा, कितनी दफा? अठारह बार वह गिरी, और उन्नीसवीं बार जाला लग गया। वह भी अठारह बार हार चुका था। वह भागा निकल कर। उसने कहा कि अरे, अगर मकड़ी उन्नीसवीं बार जीत जाती है, मैं भी जीत जाऊंगा। और बच्चों को ये कहानियां पढ़ायी जाती हैं। उनसे यह समझाया जा रहा है कि घबड़ाना मत, अनुभव से सीखना मत, उन्नीसवीं बार जीत जाओगे। उस उन्नीसवीं के चक्कर में सभी फंसे हैं।
जीवन कुछ ऐसा है कि यहां जीत होती ही नहीं। यहां जीत होकर भी हार ही होती है। महमूद जीत भी जाए, तो भी क्या हाथ लगता है?
जो व्यक्ति अनुभव से सीखता है, वह ज्ञानी है। जो अनुभव से सीखता नहीं, वह मूढ़ है। वह अपनी आसक्ति को बसाए चला जाता है। और जिसने सीख लिया; जिसने अपने जीवन से इतनी सीख ले ली कि यहां सपने ही सपने हैं, इंद्रधनुष हैं--दूर से बड़े सुंदर रंगीन हैं, पास जाने पर कुछ भी नहीं है--जिसको यह समझ में आ गया, उसके लिए एक नयी यात्रा शुरू हुई, उस यात्रा का नाम ही धर्म है। एस धम्मो सनंतनो।
तीर पर कैसे रुकूं मैं
आज लहरों में निमंत्रण
रात का अंतिम प्रहर है
झिलमिलाते हैं सितारे
वक्ष पर युग-बाहु बांधे
मैं खड़ा सागर किनारे
वेग में बहता प्रभंजन
केश-पट मेरे उड़ाता
शून्य में भरता उदधि
उर की रहस्यमयी पुकारें
इन पुकारों की प्रतिध्वनि
हो रही मेरे हृदय में
है प्रतिच्छायित जहां पर
सिंधु का हिल्लोल-कंपन
तीर पर कैसे रुकूं मैं
आज लहरों में निमंत्रण
जिसने यहां संसार को सपना जाना, उसे दूर का निमंत्रण मिला। दूर के सागर का। फिर वह रुक नहीं सकता।
तीर पर कैसे रुकूं मैं
आज लहरों में निमंत्रण
इधर सपना टूटा, नाव बंधी तैयार है। आदमी चला दूसरी यात्रा की खोज में। धर्म व्यर्थ हुआ, तो आदमी संसार में उलझा। संसार व्यर्र्थ हुआ, तो आदमी धर्म की यात्रा पर चला। तुम जरा जागकर देखो।
'उठे, प्रमाद न करे--उत्तिट्ठे।'
जागो, देखो!
'आओ, चित्रित राजरथ के समान इस संसार को देखें। मूढ़ इसमें आसक्त होता, ज्ञानी इससे मुक्त हो जाता है।'
सुनो उस दूर की प्रतिध्वनि को, दूर की पुकार को, दूर पार से जो आ रही है, उस किनारे से जो आ रही है। मगर यह किनारा अगर तुम्हें बहुत पकड़े हुए है, इस किनारे के खिलौनों ने अगर तुम्हें बहुत उलझाया है, तो तुम न सुन सकोगे। इस किनारे के खिलौने व्यर्थ हों, हाथ से छूटें, तुम जरा खाली होओ, तो निश्चित ही--
तीर पर कैसे रुकूं मैं
आज लहरों में निमंत्रण
तो निमंत्रण तुम सुनोगे। तीर पर रुक न सकोगे।
संसार यानी तीर। सागर यानी सत्य। और जब तक तुम्हें सनातन की, शाश्वत की पुकार न पकड़ ले, तब तक तुम रेत के किनारे बैठे घर-घूले बनाते रहोगे, हवाएं उन्हें मिटाती रहेंगी, तुम फिर-फिर बनाते रहोगे।
बुद्ध ने कहा है, एक गांव से मैं गुजरता था। नदी के किनारे बहुत से बच्चे रेत के घर बना रहे थे। बुद्ध रुक गए। वे देखते रहे। बड़ी लड़ाई-झगड़ा। बड़ा तूलत्तबाद। क्योंकि किसी का घर किसी के पैर की चोट से गिर जाता। घर ही! या कोई जानकर भी किसी के घर को धक्का मार देता और तोड़ने का मजा ले लेता। अकड़, अहंकार! और बच्चे लड़ते और जूझ जाते। एक-दूसरे के कपड़े फाड़ दिए, मार-पीट हो गयी। रेत के घर! पर जब आदमी खेल खेलता है तो रेत के घर भी असली हो जाते हैं। शतरंज के हाथी-घोड़े असली हो जाते हैं। तलवारें खिंच जाती हैं। बड़े-बूढ़ों में खिंच जाती हैं। तो ये तो छोटे-छोटे बच्चे थे।
फिर बुद्ध ने कहा, मैंने देखा कि कोई स्त्री किनारे पर आयी, उसने जोर से आवाज दी और कहा कि बच्चो, तुम्हारी मां घर पर राह देख रही हैं, जाओ, सांझ होने लगी, सूरज ढल गया। बच्चों ने देखा, सूरज ढल गया है, रात होने लगी, भागने लगे--अपने ही घरों को अपने ही पैरों से रौंदते हुए। फिर न कोई झगड़ा, फिर न कोई फसाद। घर का आमंत्रण आ गया। और फिर सांझ हो गयी, सूरज ढलने लगा, रात उतरने लगी। यही घर क्षणभर पहले झगड़े का कारण बने थे। कोर्ट-कचहरी हो रही थी। यही घर क्षणभर बाद अपने ही पैरों से रौंद दिए गए।
एक बार तुम्हें जगत माया है, ऐसा दिखायी पड़ जाए, तो फिर जो सत्य है, जो ब्रह्म है, उसकी संभावना का द्वार खुलता है। एस धम्मो सनंतनो।

आज इतना ही।