शिक्षा में क्रांति-ओशो
प्रवचन-अट्ठाईसवां
कम्यून जीवन
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
यह सवाल हिंदू-मुस्लिम का नहीं है। असल में बड़ा
सवाल सदा यही है कि जो ऊपर से लक्षण दिखाई पड़ता है उसे हम बीमारी समझे हुए हैं।
लक्षण को बदलने में बड़ी मेहनत उठानी पड़ती है। जब तक लक्षण को बदल पाते हैं तब तक
बीमारी नया लक्षण दे जाती है। सवाल हिंदू-मुसलमान का नहीं है और न सवाल गुजराती और
मराठी का है, और न सवाल उत्तर और दक्षिण का है। सवाल यह है कि आदमी बिना लड़े नहीं रह
सकता है। इसलिए जब तक हम, जो-जो लड़ाइयां वह लड़ता है उनको हल
करने में लगे रहेंगे, तब तक जारी रहेगा। सवाल बदलेंगे,
नाम बदलेंगे, खूंटी बदलेगी, लेकिन जो हमें टांगना है वह हम टांगे चले जाएंगे।
आदमी बिना लड़े नहीं रह सकता है। इसको अगर हम
बीमारी समझें तो कोई हल हो सकता है। यह है बीमारी। मगर हमेशा भूल हो जाती है।
बुखार चढ़ आया है किसी को, तो हम समझते हैं शरीर का गर्म हो जाना बीमारी है।



