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मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

रोम रोम रस पीजिए-(साधाना-शिविर)-प्रवचन-09

रोम रोम रस पीजिए-(साधना-शिविर)

ओशो
नौवां प्रवचन
मन के मंदिर में ध्यान का दीया

आज अंतिम चर्चा है। बहुत से प्रश्न मेरे पास इकट्ठे रह गए हैं। बहुत से आज व्यक्तिगत मिलन में पूछे गए हैं। उन सभी प्रश्नों के उत्तर देना संभव नहीं होगा और जरूरी भी नहीं है। जरूरी इसलिए नहीं है कि मैंने इन तीन दिनों में जो थोड़ी सी बातें आपसे की हैं, जिसको वे बातें समझ में पड़ी होंगी, उसे मेरा जीवन को देखने का कोण, जीवन को देखने की दृष्टि समझ में आ गई होगी। जो प्रश्न नहीं मैं उत्तर दे पाऊंगा समय के अभाव के कारण, अगर मेरी दृष्टि खयाल में आ गई है, तो उन प्रश्नों के उत्तर खुद भी समझे जा सकते हैं। इसलिए जरूरी नहीं है। और इसलिए भी सभी प्रश्नों के उत्तर देना जरूरी नहीं है कि प्रश्न है आपका, मेरे उत्तर क्या करेंगे? मेरे उत्तर चिंतन की एक दिशा की ओर इंगित कर सकते हैं। लेकिन मेरे उत्तर आपके प्रश्नों के उत्तर नहीं बन सकते। अपना उत्तर तो आपको खोजना पड़ेगा। इसलिए जरूरी नहीं है। किस दिशा में चिंतन करें? चिंतन की प्रक्रिया क्या हो?

रोम रोम रस पीजिए-(साधाना-शिविर)-प्रवचन-08

रोम रोम रस पीजिए-(साधना-शिविर)

ओशो
आठवां-प्रवचन
आदमी की एकमात्र कमजोरी--अहंकार

सत्य की खोज या स्वयं की खोज या परमात्मा की खोज न तो ज्ञान से होती है, न भक्ति से; क्योंकि ज्ञान भी हमारे अहंकार के केंद्र पर इकट्ठा हो जाता है और भक्ति भी। मनुष्य का अहंकार जहां है, वहां कोई संभावना सत्य के द्वार खुलने की नहीं है। और मनुष्य जो कुछ भी करेगा, वह सभी उसके अहंकार का पोषण बन जाता है। मनुष्य जो कुछ भी करेगा उस सबके पीछे, मैं कर रहा हूं, इस भावना को छोड़ना असंभव है। वह चाहे समर्पण कर दे, तो भी मैंने किया है समर्पण, यह बोध पीछे खड़ा रह जाएगा। वह चाहे सेवा करे, वह चाहे प्रेम करे, वह चाहे प्रार्थना करे, वह चाहे शास्त्रों से ज्ञान को अर्जित करे, लेकिन मैं का भाव, ईगो, अहंकार पीछे खड़ा रहेगा। और जो कुछ भी किया जाएगा उस सबसे वह अहंकार और भी बलिष्ठ हो जाता है।

रोम रोम रस पीजिए-(साधाना-शिविर)-प्रवचन-07

रोम रोम रस पीजिए-(साधना-शिविर)
ओशो
सातवां-प्रवचन
दूसरे पर श्रद्धा आत्म-अश्रद्धा की घोषणा है

एक मित्र ने पूछा है: सत्संग क्या है? कैसे किया जाए?

अब तक सत्संग के केंद्र में सदगुरु, कोई संत, कोई महात्मा रहा है; सत्संग के केंद्र में गुरु रहा है; कहीं जहां सत्य मिल सके वहां जाना चाहिए, ऐसा भाव रहा है। लेकिन मेरी दृष्टि में, सत्संग के केंद्र में गुरु नहीं, वरन शिष्य ही है। यह सवाल नहीं है कि किससे आप सीखने जाएं, सवाल यही है कि क्या आपमें सीखने की क्षमता विकसित हुई? यह बहुत महत्वपूर्ण नहीं है कि आप कहां जाएं, यह महत्वपूर्ण है कि आपके भीतर सीखने का दृष्टिकोण, एटिटयूड ऑफ लघनग है या नहीं?

रोम रोम रस पीजिए-(साधाना-शिविर)-प्रवचन-06

रोम-रोम रस पीजिए-(साधना-शिविर)
ओशो
छठवां-प्रवचन
धर्म है आत्म-स्मरण

ज्ञान मार्ग नहीं है। ज्ञान ही रोक लेता है, अटका लेता है। ज्ञान का बोझ मन को इतना भारी कर देता है कि फिर सत्य तक की यात्रा करनी कठिन हो जाती है। ज्ञान के तट से जिनकी नाव बंधी है, वे सत्य के सागर में यात्रा नहीं कर सकेंगे। इस संबंध में थोड़ी सी बातें कल सुबह मैंने आपसे कही थीं।
स्वभावतः, यदि ज्ञान मार्ग नहीं है, तो एक दूसरा विकल्प है जो सदियों से प्रस्तुत किया गया है। वह दूसरा विकल्प है: भक्ति का, कल्पना का। यदि ज्ञान नहीं है द्वार सत्य के लिए, तो फिर भक्ति है, समर्पण है, भावना है, कल्पना है। दूसरा विकल्प, दूसरा ऑल्टरनेटिव, ज्ञान के विरोध में मनुष्य के सामने प्रस्तुत किया गया है, वह है भक्ति का।

रोम रोम रस पीजिए-(साधाना-शिविर)-प्रवचन-05

रोम रोम रस पीजिए-(साधना-शिविर)
ओशो
पांचवां प्रवचन
आध्यात्मिक विकास में चरित्र का स्थान

किसी मित्र ने पूछा है: वैयक्तिक आध्यात्मिक विकास में चरित्र का कोई स्थान है या नहीं?
किसी और ने भी पूछा है कि ज्ञान छोड़ देना पड़ेगा, भक्ति छोड़ देनी पड़ेगी, तब भी नैतिकता को तो पकड़ना होगा, आचरण को तो पकड़ना होगा!

एक और मित्र ने भी, नीति और धर्म का क्या संबंध है, इस संबंध में पूछा है।

सबसे पहले इसी प्रश्न को मैं ले लेता हूं। अब तक ऐसी ही धारणा रही है कि नैतिक हुए बिना धार्मिक नहीं हुआ जा सकता है। नैतिक जीवन को साधा जाए, मॉरेलिटी को, तो ही कोई धार्मिक हो सकता है। नीति धर्म की पहली सीढ़ी है, ऐसी धारणा रही है।
मेरे देखे, बात बिलकुल उलटी है। नैतिक होने से तो कोई धार्मिक नहीं होता, लेकिन जो धार्मिक हो जाता है वह जरूर नैतिक हो जाता है। आचरण केंद्र नहीं है जीवन का, केंद्र तो है अंतरात्मा, अंतस। तो जिसका अंतःकरण परिवर्तित हो जाता है, उसका आचरण तो निश्चित ही बदल जाता है। लेकिन आचरण कोई बदल ले और सोचे कि इससे अंतःकरण बदल जाएगा, तो भूल हो जाती है।

मराैै है जोगी मरौ-(प्रवचन-10)


ध्‍यान का सुगमतम उपाय : संगीत—प्रवचन—दसवां

दिनांक: 10 अक्टूबर, 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍न सार:

1—शिष्य गुरु के साथ गद्दारी क्यों करते हैं? विजयानंद और महेश अभी आपके विरोध में कहते हैं। और एक संन्यासी चिन्मय ने करंट में लिखा है कि जब मेरे गुरु राजनीति के विरुद्ध बोलते हैं, तब वे धर्म से नीचे गिरते हैं; और साथ—साथ कि मैं जीवित शिष्य हूं इसलिए अपने गुरु के विरुद्ध कह सकता हूं।

2—श्रद्धा क्या है?

3—प्रेम की अग्नि—परीक्षा क्यों ली जाती है?

4—मैं शास्त्रीय संगीत का शौक रखता हूं। यह न तो मेरे पड़ोसियों को पसंद है, ,. न मेरे पत्नी—बच्चों को, न परिवार के अन्य लोगों को ही। मैं क्या करूं?

5—मैं हर चीज से असंतुष्ट हूं। क्या पाऊं जिससे कि संतोष मिले?

मराैै है जोगी मरौ-(प्रवचन-14)

एक नया आकाश चाहिएप्रवचनचौदहवां

दिनांक: 14 नवंबर, 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍न सार:

1—मैं वर्षों से पूजा कर रहा हूं मगर हाथ कुछ नहीं आया। तीर्थ, व्रत, यात्रा सब ऊर चुका हूं पर निष्फल। क्या मैं ऐसे ही अकारण जीऊंगा और अकारण मर जाऊंगा?

2—संसार में सब क्षणभंगुर है, इसलिए पकड़े तो क्या पकड़े?

3—बंबई की किसी होटल के प्रांगण में स्थापित जैन तीर्थंकर की नग्न प्रतिमा को चड्डी पहनायी गई, ऐसा आपने बताया। मैं जानना चाहता हूं कि चड्डी पहनाने का कार्य किसने किया?

4—भगवान! आपके इस संन्यासी के जीवन में आपका प्रसाद हमेशा मिलता रहता है, जिसका अनुभव बयान नहीं कर सकता। और पहले—पहले घबड़ाहट भी होती थी। भगवान, यह मेरा भरम तो नहीं है, कृपया समझाएं।

5—भगवान! दिल्ली में जो चल रहा है, उसके संबंध में कुछ कहें।

रविवार, 9 अप्रैल 2017

रोम रोम रस पीजिए-(साधना-शिविर)-प्रवचन-04

रोम रोम रस पीजिए-(साधना-शिविर)
ओशो
चौथा प्रवचन

झूठे धर्मों की विदाई--सच्चे धर्म का जन्म

एक मित्र ने पूछा है कि क्या सभी धर्मों के समन्वय से वास्तविक धर्म का जन्म नहीं हो सकता है? क्या हिंदू, मुसलमान, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी, सिक्ख, और सभी धर्म इकट्ठे हो जाएं और इन सब धर्मों के बीच कोई समन्वय, कोई सिंथीसिस खोजी जा सके? तो क्या वह सच्चा धर्म नहीं होगा?

एक छोटी सी कहानी कहूं और फिर इस संबंध में कुछ कहूंगा।
डार्विन का नाम तो सुना ही होगा। डार्विन ने पशुओं-पक्षियों, कीड़ों-मकोड़ों के बाबत सारे जीवन अध्ययन किया था। और उसी अध्ययन से वह इस नतीजे पर भी पहुंच गया था कि मनुष्य भी पशुओं की ही एक जाति है और पशुओं से ही विकसित हुई है। उसकी जानकारी इतनी अदभुत थी कीड़े-मकोड़ों, पशुओं और पक्षियों के संबंध में कि वह किसी भी कीड़े और मकोड़े की जाति बता सकता था, उसके संबंध में सब कुछ बता सकता था।

रोम रोम रस पीजिए-(साधना-शिविर)-प्रवचन-03

रोम रोम रस पीजिए-(साधना-शिविर)
ओशो
तीसरा प्रवचन

बच्चों को विश्वास नहीं, जिज्ञासा सिखाएं

मेरे प्रिय आत्मन्!
क्या बच्चों को न बताएं कि ईश्वर है? क्या धर्म के संबंध में उन्हें कुछ भी न कहें? आत्मा के लिए कोई उन्हें विश्वास न दें? ऐसे कुछ प्रश्न पूछे हैं।

जिसे हम नहीं जानते हैं, उसे हम देना भी चाहेंगे तो क्या दे सकेंगे? और जो हमें ही ज्ञात नहीं है, क्या उस बात की शिक्षा, हमारे संबंध में, बच्चे के मन में आदर पैदा करेगी? क्या यह असत्य की शुरुआत न होगी? और क्या असत्य पर भी ईश्वर का ज्ञान कभी खड़ा हो सकता है? और क्या असत्य के ऊपर हम सोच सकते हैं कि बच्चा कभी धार्मिक हो जाएगा?

रोम रोम रस पीजिए-(साधना-शिविर)-प्रवचन-02

रोम रोम रस पीजिए-(साधना-शिविर)
ओशो
दूसरा प्रवचन
अज्ञान का बोध


एक बड़ी राजधानी में राजा की चोरी हो गई थी। सिपाही खोज-खोज कर थक गए थे और चोरी न पकड़ी जा सकी थी। जैसा कि अक्सर ही होता है, चोर हमेशा सिपाही से ज्यादा होशियार साबित होते हैं, वह चोर भी ज्यादा होशियार साबित हुआ। राजा परेशान हो गया, कुछ जरूरी चीज चोरी में चली गई थी, उसका वापस लौटना आवश्यक था। किसी वृद्ध ने कहा कि गांव में एक आदमी है, जो सभी कुछ जानता है।
गांव में एक शेखचिल्ली था, जो सब कुछ जानता था। शेखचिल्ली हमेशा ही सर्वज्ञ होते हैं। वह भी सर्वज्ञ था। ऐसी कोई बात न थी जो वह न जानता हो, ऐसा कोई प्रश्न न था जिसका उत्तर उसके पास न हो।

रोम रोम रस पीजिए-(साधना-शिविर)-प्रवचन-01

रोम रोम रस पीजिए-(साधना-शिविर)
ओशो
पहला प्रवचन


मेरे प्रिय आत्मन्!
एक छोटी सी घटना से आज की बात मैं आपसे कहना चाहूंगा।
एक बहुत बड़े सम्राट की मृत्यु हो गई थी। उसकी अरथी निकाली जा रही थी। लाखों लोग उस अरथी को देखने रास्तों पर इकट्ठे हुए थे। एक बड़ी अजीब बात थी, अरथी के बाहर दोनों हाथ बाहर निकले हुए थे। जो भी देखा उसी के मन में प्रश्न उठा, ऐसी अरथी तो कभी देखी नहीं गई जिसमें लाश के हाथ दोनों बाहर हों। और कोई साधारण आदमी भी नहीं मरा था, एक सम्राट की मृत्यु हो गई थी। हर कोई पूछने लगा, क्या बात है? अरथी के बाहर हाथ क्यों निकले हुए हैं?
और तब धीरे-धीरे पता चला, मरते वक्त उस सम्राट ने...उसका नाम सभी ने सुना होगा: अलेक्जेंडर महान, सिकंदर! मरते वक्त सिकंदर ने कहा था, मेरे हाथ अरथी के बाहर रखे जाएं, ताकि हर कोई यह देख ले कि मेरी मुट्ठियां भी खाली हैं।

शनिवार, 8 अप्रैल 2017

एस धम्मो सनंतनो-(भाग-07)- ओशो



                    एस धम्मो सनंतनो (भाग—7)
ओशो
  (ओशो द्वारा भगवान बुद्ध की सुललित वाणी धम्मपद पर दिए गए
                        दस अमृत प्रवचनों का संकलन)

तुम जिद्द करते हो कि हम अज्ञानी हैं। और बुद्धों का सारा प्रयास यही है समझाना कि तुम नहीं हो; तुम्हारी भ्रांति तोड़नी है। तुम मालिक हो, तुमने गुलाम समझा हुआ है। तुम विराट हो, तुमने छोटे के साथ अपना संबंध बना लिया। आंखें आकाश की तरफ उठाओ, सारा आकाश तुम्हारा है, तुम आंखें जमीन पर गड़ाए खड़े हो। इससे यह नहीं होता कि आकाश तुम्हारा नहीं रहा, सिर्फ तुम्हारी आंखें छोटे में उलझ गयी हैं। मगर आंखों  की क्षमता आकाश को भी समा लेने की है। कितने ही छोटे में उलझे रहो, जिस दिन आंख उठाओगे र उस दिन पूरा आकाश तुम्हारी आंखों में प्रतिबिंबित हो उठेगा।

ओशो
एस धम्‍मो सनंतनो

एस धम्मो सनंतनो-(प्रवचन-060)

एस धम्मो सनंतनो-(भाग-06)--ओशो
जीवित धर्म का उद्गम केंद्र: सदगुरु-(प्रवचन-साठवां) 
सारसूत्र:

हीनं धम्मं न सेवेय्य पमादेन न संवसे।
मिच्छदिट्ठिं न सेवेय्य न सिया लोकवङ्ढनो।।१४६।।

उत्तिट्ठे नप्पमज्जेय्य धम्मं सुचरितं चरे।
धम्मचारी सुखं सेति अस्मिं लोके परम्हि च।।१४७।।

यथा बुब्बुलकं पस्से यथा पस्से मरीचिकं।
एवं लोकं अवेक्खन्तं मच्चुराजा न पस्सति।।१४८।।

एस पस्सथिमं लोकं चित्त राजरथूपमं।
यत्थ बाला विसीदन्ति नत्थि संगो विजानतं।।१४९।।

एस धम्मो सनंतनो-(प्रवचन-059)

एस धम्मो सनंतनो-(भाग-06)-ओशो
प्रवचन-उन्नसठवां  (गुरु को द्वार बनाना दीवार नहीं)


पहला प्रश्न:

आपको मैं क्या कहूं--प्रभु कहूं, विभु कहूं या शंभु कहूं? यह भी इसलिए कि सतत मैं आपके चरणों में नमूं। बस वहां ही मैं त्रिकाल तक नमूं। अब तो मेरी प्रार्थना सुनें!

कहने की बहुत बात नहीं है। क्या तुम मुझे कहते हो, अप्रासंगिक है। मेरे निकट क्या तुम स्वयं को समझ लेते हो, वही महत्वपूर्ण है।
तुम मुझे अच्छे-अच्छे नाम दो, उससे कुछ लाभ न होगा। तुम स्वयं को पहचानो, उससे ही कुछ होने वाला है। मेरी स्तुति से नहीं कुछ, आत्मस्मरण से कुछ होगा। स्तुति में समय खराब मत करो। कितनी तो तुम स्तुति कर चुके, कितने द्वारों पर! कितने मंदिर-मस्जिदों में तुमने प्रार्थना नहीं की, नमाज नहीं पढ़े, झुके नहीं! क्या पाया? हाथ खाली के खाली हैं। अब भीतर झुको। अब जो तुम्हारे भीतर सोया है, उसे जगाओ। अब असली मंदिर में प्रवेश करो। मुझे क्या कहो, इसकी क्या चिंता करनी! कुछ भी कह लो। बिना नाम के भी चल जाएगा।

एस धम्मो सनंतनो-(प्रवचन-058)

एस धम्मो सनंतनो-(भाग-06)
प्रवचन-अट्ठठावनवांं--स्व से होकर राह सर्व को
सारसूत्र:
 
अत्तना' व कतं पापं अत्तजं अत्तसंभवं।
अभिमन्थति दुम्मेधं वजिरं व' स्ममयं मणिं।।१४०।।

यस्सच्चन्तदुस्सल्यिं मालुवा सोलमिवोततं।
करोति सो तथत्तानं यथा' नं इच्छति दिसो।।१४१।।

सुकरानि असाधूनि अत्तनो अहितानि च।
यं वे हितग्च साधुग्च तं वे परमदुक्करं।।१४२।।

यो सासनं अरहतं अरियानं धम्मजीविनं।
पटिक्कोसति दुम्मेधो दिट्ठिं निस्साय पापिकं।
फलानि कट्ठकस्सेव अत्तघग्भय फल्लति।।१४३।।


अत्तना' व कतं पापं अत्तना संकिलिस्सति।
अत्तना अकतं पापं अत्तता' व विसुज्झति।
सुद्धि असुद्धि पच्चतं नाग्भे अग्भ् विसोधये।।१४४।।

अत्तदत्थं परत्थेन बहुनापि न हापये।
अत्तदत्थमभिग्भय सदत्थ पसुतो सिया।।१४५।।

एस धम्मो सनंतनो-(प्रवचन-057)

एस धम्मो सनंतनो-(भाग-06)
न-होना' है जीवन-प्रवचन-सत्तावनवांं 

 पहला प्रशन: 
कल आपने कहा कि ईश्वर को अस्वीकार कर भगवान बुद्ध ने मनुष्य को बड़ी से बड़ी गरिमा से मंडित किया। यही दलील तो नास्तिक भी ईश्वर के खिलाफ पेश करते हैं। फिर दोनों में फर्क क्या है? और क्या ईश्वर को अस्वीकार कर मनुष्य का अहंकार और भी अंधा नहीं होगा?

फर्क बारीक है। समझना चाहोगे, तो ही समझ सकोगे। सहानुभूतिपूर्वक समझोगे, तो ही समझ सकोगे। फर्क मोटा और स्थूल नहीं है।
इसीलिए तो हिंदुओं ने बुद्ध को भी नास्तिक कहा। नास्तिक कहकर भी बुद्ध की महिमा को अस्वीकार करना कठिन था। इसलिए अवतार भी स्वीकार किया। फर्क बड़ा बारीक है। मान भी न सके, इंकार भी न कर सके। बुद्ध को स्वीकार भी न कर सके, क्योंकि बात प्रगट ही नास्तिकता की मालूम होती है। लेकिन बुद्ध की महिमा को, प्रतिभा को, उनकी गरिमा को, उनके प्रकाश को अस्वीकार भी कैसे करें! हिंदू इतने अंधे भी न थे। तो अवतार भी स्वीकार किया।

एस धम्मो सनंतनो-(प्रवचन-056)

एस धम्मो सनंतनो-(भाग-06)
अत्ताहि अत्तनो नाथो--प्रवचन-छप्पपनवां 
सारसूूत्र:
अत्तानं चे पियं अग्भ रक्खेय्य तं सुरक्खितं।
तिण्णमंग्भ्तरं यामं पटिजग्गेय्य पण्डितो।।१३६।।

अत्तानेमेव पठमं पतिरूपे निवेसये।
अथग्भ्मनुसासेय्य न किलिस्सेय्य पण्डितो।।१३७।।

अत्तानग्चे तथा कयिरा यथग्भ्मनुसासति।
सुदन्तो वत दम्मेथ अत्ताहि किर दुद्दमो।।१३८।।

अत्ताहि अत्तनो नाथो कोहि नाथो परो सिया।
अत्तना' व सुदन्तेन नाथं लभति दुल्लभं।।१३९।।

जो घर बारे आपना-(साधना-शिविर)-प्रवचन-08

जो घर बारे आपना-(साधना-शिविर)--ओशो
प्रवचन-आठवां-(योग: कर्म की कुशलता)


प्रश्न: क्या ध्यान का परिणाम केवल धर्म-जीवन के लिए ही उपयोगी है अथवा उसका परिणाम रोज के व्यावहारिक जीवन में भी उपयोगी है? कृपया यह समझाएं।

मूलतः तो धर्म के लिए ही उपयोगी है। लेकिन धर्म व्यक्ति की आत्मा है। और उस आत्मा में परिवर्तन हो, तो व्यवहार अपने आप बदलता ही है। भीतर बदले, तो बाहर बदलाहट आती है। वह बदलाहट लेकिन छाया की भांति है, परिणाम की भांति है। वह पीछे चलती है। जैसे हम किसी से पूछें कि कोई आदमी दौड़े, तो आदमी ही दौड़ेगा या उसकी छाया भी दौड़ेगी? ऐसा ही यह सवाल है। आदमी दौड़ेगा तो छाया तो दौड़ेगी ही। हां, इससे उलटा नहीं हो सकता कि छाया दौड़े तो आदमी दौड़ेगा क्या? पहली तो बात छाया दौड़ नहीं सकती। और अगर दौड़े भी, तो भी आदमी के उसके पीछे दौड़ने का उपाय नहीं है।

जो घर बारे आपना-(साधना-शिविर)-प्रवचन-07

जो घर बारे आपना-(साधना-शिविर)--ओशो
प्रवचन-सातवां-(शक्ति के साथ आनंद भी)


इसके पहले कि हम आज की आखिरी बैठक में प्रवेश करें, ध्यान के संबंध में दो-चार बातें पूछी गई हैं, वह समझ लेना उचित होगा।

एक मित्र ने पूछा है कि घर जाकर हम कैसे इस विधि का उपयोग कर सकेंगे? पास-पड़ोस के लोगों को आवाज, चिल्लाना अजीब सा मालूम होगा। घर के लोगों को भी अजीब सा मालूम होगा।

होगा ही। लेकिन घर के लोगों से भी प्रार्थना कर लें, पास-पड़ोस के लोगों से भी प्रार्थना कर आएं कि एक घंटा मैं ऐसी विधि कर रहा हूं। इस विधि से चिल्लाना, रोना, हंसना, नाचना होगा। आपको तकलीफ हो तो माफ करेंगे। और घर के लोगों को भी निवेदन कर दें। तो ज्यादा अड़चन नहीं होगी।
और एक-दो दिन में लोग परिचित हो जाते हैं, फिर कठिनाई नहीं होती।

जो घर बारे आपना-(साधना-शिविर)-प्रवचन-06

जो घर बारे आपना-(साधना-शिविर)--ओशो
प्रवचन-छट्ठवां-(यही है मार्ग प्रभु का)


मेरे प्रिय आत्मन्!
इसके पहले कि हम ध्यान के प्रयोग में संलग्न हों, एक-दो बातें आपसे कह देनी उचित हैं। आज शिविर का आखिरी दिन है। दो दिनों में बहुत से मित्रों ने पर्याप्त संकल्प का प्रमाण दिया है। शायद थोड़े से ही लोग हैं जो पीछे रह गए हैं। आशा करता हूं कि आज वे भी पीछे नहीं रह जाएंगे। एक-दो मित्र ऐसी स्थिति में आ गए हैं कि आपको परेशानी मालूम पड़ी होगी। लेकिन उससे परेशान न हों। मनुष्य के भीतर नई शक्तियों का जन्म होता है तो सब अस्तव्यस्त और अराजक हो जाता है। इसके पहले कि नई व्यवस्था उपलब्ध हो, बीच में एक संक्रमण का समय होता है, तब करीब-करीब उन्माद की अवस्था जैसी मालूम पड़ती है। लेकिन वह उन्माद नहीं है, वह शिविर के साथ ही विदा हो जाएगा। उससे कोई चिंता न लें।