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मंगलवार, 4 जुलाई 2017

राम नाम जान्यो नहीं-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-06

राम नाम जान्यो नहीं-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

मेरा एकमात्र प्रयोजन : तुम जागो-प्रवचन-छटवां
प्रश्न-सार:

1—यजुर्वेद का सूत्र है: व्रत से दीक्षा, दीक्षा से दक्षिणा, दक्षिणा से श्रद्धा और श्रद्धा से सत्य की प्राप्ति होती है।
सत्य-प्राप्ति के ये चार चरण समझाने की अनुकंपा करें।

2—बुद्ध, महावीर और कृष्ण की प्रतिमाओं में आपने मनोहारी रंग भरे थे। और अब आप उन्हीं प्रतिमाओं का बड़ी बेरहमी से खंडन कर रहे हैं। क्या इन मूर्तियों द्वारा अमूर्त की यात्रा अब असंभव हो गई है या कि आप हमें अपने आप के प्रति लौटने पर मजबूर कर रहे हैं?

सोमवार, 3 जुलाई 2017

राम नाम जान्यो नहीं-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-05

राम नाम जान्यो नहीं-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

मैं धर्म नहीं, धार्मिकता दे रहा हूं—प्रवचन-पांचवां
प्रश्न-सार:

1—जो इतनी नींद में हैं कि उन्हें अपनी प्यास का पता ही नहीं या स्वप्न के पानी को पीकर ही वे जागने का आभास पा रहे हैं, वे कैसे वास्तविक प्यास का अनुभव कर सकेंगे? क्या आपका आनंद का झरना उनकी प्यास को जगा कर उन्हें तृप्त नहीं कर देगा?
क्या आपका सामर्थ्यवान प्रकाश उन अंधेरे कमरों को भी प्रकाशित नहीं कर देगा जिनके कि दरवाजे बंद हैं?

रविवार, 2 जुलाई 2017

राम नाम जान्यो नहीं-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-04

राम नाम जान्यो नहीं-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

मौलिक क्रांति: ध्यान-प्रवचन-चौथा
प्रश्न-सार

1—क्या मेरी हस्ती को मिटाने की अनुकंपा करेंगे, ताकि मेरा अंतर्बीज प्रस्फुटित होकर पुष्पित एवं फलित हो सके।

2—कृष्ण की हिंसा को आपने हिटलर की हिंसा से भी ज्यादा खतरनाक बताया। दूसरी ओर कृष्ण के बहुत से वचनों को आप अदभुत कहते हैं। क्या हिंसा का इतना अनुमोदन करने वाला भी अदभुत सत्य-वचन कह सकता है?

शनिवार, 1 जुलाई 2017

राम नाम जान्यो नहीं-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-03

राम नाम जान्यो नहीं-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

प्रेम: समाधि की छाया—(प्रवचन-तीसरा)

प्रश्न-सार

1—क्या आप इस संत-वाणी को बोधगम्य बनाने की अनुकंपा करेंगे--सेवा से पवित्रता, तप से शक्ति, त्याग से शांति तथा अपनत्व से प्रीति स्वतः हो जाती है।

पहला प्रश्न: भगवान,
आपके प्रश्नों के उत्तर बहुत ही तर्कपूर्ण तथा कमाल के हैं। आपकी व्याख्या व्यावहारिक तथा जीवन-उपयोगी है। मैं विश्वास करता हूं कि अपनी आंखों से देखो तथा अपने पैरों चलो।
क्या आप इस संत-वाणी को बोधगम्य बनाने की अनुकंपा करेंगे--सेवा से पवित्रता, तप से शक्ति, त्याग से शांति तथा अपनत्व से प्रीति स्वतः हो जाती है।

राम नाम जान्यो नहीं-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-02

राम नाम जान्यो नहीं-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

मैं जीवन सिखाता हूं—प्रवचन-दूसरा

प्रश्न-सार

1—आपके पास कोई नया विचार या जीवन-दर्शन नहीं है। और एक ओर आप स्वयं गीता, बाइबिल, कुरान आदि धर्मग्रंथों द्वारा प्रतिपादित धर्मों को नहीं मानते, फिर आप उनके विचारों की चोरी क्यों करते हैं?

पहला प्रश्न: भगवान,
आप पर यह आरोप लगाया जाता है कि आपके पास कोई नया विचार या जीवन-दर्शन नहीं है। और यह भी आलोचना की जाती है कि एक ओर आप स्वयं गीता, बाइबिल, कुरान आदि धर्मग्रंथों द्वारा प्रतिपादित धर्मों को नहीं मानते, फिर आप उनके विचारों की चोरी क्यों करते हैं?
भगवान, निवेदन है कि इस विषय में कुछ कहने की अनुकंपा करें।

शुक्रवार, 30 जून 2017

राम नाम जान्यो नहीं-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-01

राम नाम जान्यो नहीं-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

भीतर के राम से पहचान-प्रवचन पहला

प्रश्न-सार

1—आपने आज प्रारंभ होने वाली प्रवचनमाला को नाम दिया है: रामनाम जान्यो नहीं।
क्या सच ही मृत्यु सिर्फ उनके लिए है जो राम को नहीं जानते हैं? इस राम को कैसे जाना जाता है? और पूजा क्या है?

2—आपको पांच वर्ष से पढ़ता-सुनता हूं और शिविर में भी भाग लेता हूं, लेकिन संन्यास नहीं ले पाया। मैं विचित्तरसिंह खानदान से हूं, लेकिन बहुत ही डरपोक हूं। मेरी समझ में कुछ नहीं आता। कृपा करके मार्ग-दर्शन करें।

गुरुवार, 29 जून 2017

रहिमन धागा प्रेम का-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन--12

रहिमन धागा प्रेम का-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रार्थना की गूंज—बारहवां प्रवचन
दिनांक १० अप्रैल १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्नसार:

1—क्या लिखूं, कुछ समझ में नहीं आता। बस प्रणाम उठता है। कैसे करूं; करना भी नहीं आता! इतना संवारा आपने, आप ही आप रह गए हैं। अहंकार आपसे ही गलेगा। गलाएं और इस पीड़ा से छुड़ाएं, यही मेरी प्रार्थना है। मेरी प्रार्थना गूंजती है, आगे भी गूंजेगी--क्या ऐसी आशा रख सकता हूं।

1—तुसी सानूं परमात्मा दे दरसन करा देओ। तुहाडी बड़ी मेहरबानी होगी!

3—मेरे पतिदेव ऐसे तो बस देवता ही हैं, बस एक ही खराब लत है कि शराब पीते हैं। उनसे शराब कैसे छुड़वाऊं

बुधवार, 28 जून 2017

रहिमन धागा प्रेम का-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-11

रहिमन धागा प्रेम का-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

समाधि के फूलग्यारहवां प्रवचन
दिनांक ९ अप्रैल; श्री रजनीश आश्रम, पूना।
प्रश्नसार:

1—इसका रोना नहीं कि तुमने क्यों किया दिल बरबाद,
इसका गम है कि बहुत देर में बरबाद किया।
मुझको तो नहीं होश तुमको तो खबर हो शायद,
लोग कहते हैं कि तुमने मुझे बरबाद किया।।

2—जीवन में तो कुछ मिला नहीं और अब मृत्यु द्वार पर खड़ी है। क्या मृत्यु में कुछ मिलेगा?

3—क्या परमात्मा तक पहुंचने के लिए दर्शन-शास्त्र पर्याप्त नहीं है?

4—मैं अपनी पत्नी का भरोसा नहीं कर पाता हूं। वह मेरी न सुनती है, न मानती है। उसके चरित्र पर भी मुझे संदेह है। इससे चित्त उद्विग्न रहता है। क्या करूं?

सोमवार, 26 जून 2017

रहिमन धागा प्रेम का-द्रप्रश्नोत्तर)-प्रवचन-10

रहिमन धागा प्रेम का-द्रप्रश्नोत्तर)-ओशो

कस्तूरी कुंडल बसै—दसवां प्रवचन
दिनांक ८ अप्रैल, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्नसार:

1—मैं कौन हूं, कहां से आया हूं और क्या मेरी नियति है?

2—आदर और श्रद्धा में क्या फर्क है?

3—मैं राजनीति में हूं। क्या आप मुझे भी बदलेंगे नहीं? क्या मुझ पर कृपा न करेंगे?

4—मोहम्मद ने चार शादियों की आज्ञा दी थी। आप कितनी शादियों की आज्ञा देंगे?

रविवार, 25 जून 2017

रहिमन धागा प्रेम का-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-09

रहिमन धागा प्रेम का-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

अज्ञात का वरण करोनौवां प्रवचन
दिनांक ७ अप्रैल, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्नसार:

1—संन्यास का मार्ग अपरिचित है और भयभीत हूं। क्या करूं?

2—आप कहते हैं, अनुभव से सीखो। लेकिन हम सोए-सोए बेहोश आदमियों के अनुभव का कितना मूल्य! क्या झूठे आश्वासन दे रहे हैं? हम तो ऐसे गधे हैं जो बार-बार उसी गङ्ढे में गिरते चले जाते हैं। कृपा करके कुछ सीधा मार्ग-दर्शन दें!

शनिवार, 24 जून 2017

रहिमन धागा प्रेम का-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-08

रहिमन धागा प्रेम का-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

स्वानुभव ही मुक्ति का द्वार है—आठवां प्रवचन
दिनांक ६ अप्रैल; श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्नसार:

1—आप अतीत-विरोधी हैं। क्या इससे युवकों में अराजकता पैदा होने का डर नहीं है?

2—रहिमन बिआह व्याधि है, सकहु तो लेहु बचाय।
पांयन बेड़ी परत है, ढोल बजाया-बजाय।।
रहीम के इस दोहे से क्या आप सहमत हैं?

शुक्रवार, 23 जून 2017

रहिमन धागा प्रेम का-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-07

रहिमन धागा प्रेम का-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

मैं मधुशाला हूंसातवां प्रवचन
दिनांक ५ अप्रैल १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्नसार:

1—जार्ज गुरजिएफ अपने शिशयों का अंतरतम जाने के लिए उन्हें भरपूर शराब पिलाया करता था। और जब वे मदहोश हो जाते थे तो उनकी बातों को ध्यान से सुनता था। आप भी ऐसा क्यों नहीं करते हैं?

2—एकटक आपकी ओर देखते हुए, अपलक आपके रूप को निहारते हुए, जब आपके मुख से झरते हुए पुशपों को आंचल में भरती हूं, तब एक प्रकार का नशा। जब नशे से बोझिल होती बंद आंखों में आपकी मधुर वाणी के स्वर कानों में गुंजित होते हैं तो एक प्रकार का नशा! आप जो रस पिला रहे हैं, उसको क्या नाम दूं?

3—आप क्या कर रहे हैं? क्या मुझे पागल बनाए दे रहे हैं? अकारण हंसती हूं, अकारण रोती हूं। हंसने में भी सजा है, रोने में भी सजा है। क्या कुक्कू ही बना कर छोड़ेंगे?

4—इक्कीस मार्च उन्नीस सौ अस्सी को शाम करीब आठ बजे, बंबई में ही था। ध्यान के समय शरीर गिर पड़ा, चश्मा और माला टूट गए। और जब होश आया तो नौ बज रहे थे। इस बीच क्या हुआ, कैसे हुआ, कुछ पता नहीं। प्रभु, मेरे मार्ग-दर्शन के लिए कुछ कहने की अनुकंपा करें!

5—आपको लोग कब समझेंगे? आप गीत देते हैं और लोग गालियां लौटाते हैं!

रहिमन धागा प्रेम का-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-06

रहिमन धागा प्रेम का-(प्रश्नोत्तर)-ओशो
प्रेम का मार्ग अनूठाछठवां प्रवचन
दिनांक १ अप्रैल, १९८०; श्री रजनीश आश्रम पूना,
प्रश्नसार:

ऐ री मैं तो प्रेम दीवानी, मेरा दरद न जाने कोय।
न मैं जानूं आरती-वंदन, न पूजा की रीत,
लिए री मैंने दो नयनों के दीपक लिए संजोय।
ऐ री मैं तो प्रेम दीवानी, मेरा दरद न जाने कोय!
आंसुओं के सिवाय कुछ नहीं है। मैं आपको क्या चढ़ाऊं?

आपका युवकों के लिए क्या संदेश है?

शिशय और अनुयायी में क्या फर्क है?

क्या काव्य में भी उतना ही सत्तय नहीं होता है जितना कि बुद्धपुरुषों के वचनों में?

आपने कहा था कि पूंछ भी जाएगी। आपके चरणों की कृपा से वह भी गई। संतत्तव कब घटेगा, मेरे मालिक? अब देरी क्यों?

अप्रैल फूल के इस महान धार्मिक दिवस पर कुछ कहें।

बुधवार, 21 जून 2017

रहिमन धागा प्रेम का-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-05

रहिमन धागा प्रेम का-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रार्थना और प्रतीक्षापांचवां प्रवचन
दिनांक ३१ मार्च, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्नसार:

1—और कितनी प्रतीक्षा करूं? और कितनी देर है? प्रभु-मिलन के लिए आतुर हूं और अब और विरह नहीं सहा जाता है!

2—किन अज्ञात हाथों से पैरों में घुंघरू बांध दिए हैं कि अब मैं छम-छम नचंदी फिरां!

3—आपने कहा: कमा लिटिला नियर, सिप्पा कोल्डा बियर। मैं आपसे कहता हूं: आई एम हियर, व्हेयर इज़ दि बियर?

4—बंधी परंपराओं के विरुद्ध आपके विचार बहुत अच्छे व प्रेरणादायी लगते हैं, किंतु माला और भगवे कपड़े में बांधने के आपके प्रयास में हमें परंपरा की बू मालूम पड़ती है। हमें लगता है भगवान का संबोधन स्वीकार करने और माला तथा भगवे रंग के कपड़ों को देने के पीछे आपकी एक पीर-पैगंबर या अवतारी पुरुष होने की वासना छिपी हुई है। यह मेरा नितांत भ्रम भी हो सकता है। कृपा करके इसका निवारण करें।

मंगलवार, 20 जून 2017

रहिमन धागा प्रेम का-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-04

रहिमन धागा प्रेम का-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

श्रद्धा की अनिवार्य सीढ़ी: संदेहचौथा प्रवचन
दिनांक ३० मार्च, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्नसार:

1—क सिवाय ध्यान के आपकी हर बात को मैंने सहजता से स्वीकार नहीं किया--संन्यास भी, कपड़े भी और माला भी। हर बात पर मैंने विरोध किया, विद्रोह किया और अवज्ञा भी। बार-बार भागने को चाहा, और हर बार और ज्यादा खिंचता चला आया। फिर भी मुझ अपात्र को आपने स्वीकार किया। आज आपके प्रेम में डूबा जा रहा हूं। भीतर न कोई विरोध है, न विद्रोह; सब शांत और मौन है। फिर भी एक अपराध-भाव सताता है। प्रभु, आप जीते, मैं हारा। मुझे माफ कर दें। आपकी असीम अनुकंपा के लिए अनुगृहीत हूं। मेरे प्रणाम स्वीकार करें!

2—मैं संन्यास लेने के पहले आश्वस्त होना चाहता हूं कि मुझे निर्वाण पाने में सफलता मिलेगी या नहीं?

सोमवार, 19 जून 2017

रहिमन धागा प्रेम का-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-03

रहिमन धागा प्रेम का-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

रसो वै सः—तीसरा प्रवचन
दिनांक 29 मार्च, 1980; श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्नसार:

1—ईश्वर को खोजना है। कहां खोजें?

2—आप कहते हैं, संन्यासी को सृजनात्मक होना चाहिए। सो मैंने काव्य-सृजन शुरू कर दिया है। मगर कोई मेरी कविताएं सुनने को राजी नहीं है। आपका आशीष चाहिए।

3—आपकी "नारी के समान अधिकार' की बातें बहुत अच्छी लगीं। इसके अतिरिक्त जो आप इच्छाओं को न दबाने और उनसे न लड़ने की बात कहते हैं, वह भी हृदय को स्पर्श करती है। किन्तु इसके साथ-साथ जब आद्य शंकराचार्य, पतंजलि और तुलसी वगैरह की बातें याद आ जाती हैं तो द्वंद्व खड़ा होता है। शंकराचार्य ने नारी की निंदा किस दृशिट से की है? अद्वय ब्रह्म का अनुभवी क्या ऐसी निंदा कर सकता है? क्या वे भी केवल एक विद्वान मात्र थे, अनुभवी नहीं? पतंजलि समाधि के लिए यम-नियम पर विशेष जोर देते हैं, आप नहीं। इसका क्या कारण हैं?

4—जब भी मैं भारतीयों को आश्रम दिखाने ले जाता हूं तो विदेशी स्त्रियों को देख कर, संन्यासिनियों को देख कर वे एकदम ठगे खड़े रह जाते हैं, एकदम उनके मुंह से लार टपकने लगती है। ऐसा क्यों?

5—क्या सच ही मारवाड़ियों को शैतान भी धोखा नहीं दे सकता?

रविवार, 18 जून 2017

रहिमन धागा प्रेम का-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-02

ध्यान ही मार्ग है-(दूसरा प्रवचन)
दिनांक 28 मार्च; 1980; श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्नसार:
1—यह संसार माया है। यहां सब झूठ है। मुझे इसमें डूबने से बचाएं!

2—मैं अज्ञान में बच्चे पैदा करता चला गया। दस बच्चे हैं मेरे, अब क्या करूं?

3—वह पांचवां क क्या है? बहुत सोचा लेकिन नहीं सोच पाया। किसी और से पूछूं, हो सकता था कोई बता देता। लेकिन फिर सोचा आप से ही क्यों न पूछूं?


पहला प्रश्न: यह संसार माया है। यहां सब झूठ है। मुझे इसमें डूबने से बचाएं।

राधिका प्रसाद! माया में कोई डूब कैसे सकता है? झूठ में डूबने का कोई उपाय है? जो नहीं है, उसमें डूब सकोगे? चाहोगे तो भी नहीं डूब सकोगे। ऐसी नदी में डूबो, जो है ही नहीं; ऐसे जाल में फंसो, जो है ही नहीं--यह कैसे संभव हो सकता है?

शनिवार, 17 जून 2017

रहिमन धागा प्रेम का-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-01

आंसू: चैतन्य के फूल—(पहला प्रवचन)
दिनांक २७ मार्च, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना

प्रशनसार:
1--आपकी पहली मुलाकात आंसुओं से हुई थी। इतने साल बीत गए हैं, आंसू अभी मिटते नहीं, मिटने की संभावना लगती नहीं। चाहती हूं इसी तरह मिट जाऊं!
जीवन व्यर्थ लगता है। मैं क्या करूं?
2--आप हमेशा "लिवा लिटिल हॉट, सिप्पा गोल्ड स्पॉट' कहते हैं। आप इसके स्थान पर कभी ऐसा क्यों नहीं कहते--"लिव ए लिटिल हॉट, सिप ए कोल्ड बियर'? आखिर बियर में बहुत प्रोटीन रहता है।
3--कल एक सरदार जी आश्रम देखने आए। उन्होंने कहा: भगवान जी दे दर्शन सानूं अभी करा दो। हमने उत्तर दिया कि आपके दर्शन सुबह प्रवचन में ही होंगे, तो वे मानें ही न। वे बोले: दर्शन तो सानूं अभी ही करा दो। असी ऐनी दूर अमृतसर तो आए हां। साडी गड्डी अभी छूटण वाली है। वे मानें ही न। फिर मैंने अचानक घड़ी देखी, तो देखा बारह बजे हैं।
क्या बारह बजे का कोई विशेष रहस्य है?

शुक्रवार, 16 जून 2017

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-15

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—बारहवां  
दिनांक 10 अप्रेल सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।
प्रश्न-सार

1—परमात्मा मुझे कहीं भी दिखाई नहीं पड़ता है। मैं क्या करूं?
2--मैं संन्यास के लिए तैयार हूं। लेकिन यह कैसे जानूं कि परमात्मा ने मुझे पुकारा ही है?
यह मेरा भ्रम भी तो हो सकता है!
3—कल आपने प्रवचन में नसरुद्दीन की कहानी कही--कड़ाही के बच्चे होने वाली।
मैंने संजय को तपेली दी थी। तपेली मर गई, और बाद में छोटी-मोटी तपेलियां भी मर गईं। और अब फिर दिख रहा है कि कड़ाहियों के बच्चे हो रहे हैं।
दो वर्ष पहले आपसे प्रश्न पूछा था, काफी दुख की छाया में था, आपने सूफी कहानी का संदेश दिया था--यह भी गुजर जाएगा। बिलकुल वैसा ही हुआ है।
आपके अमूल्य सूत्र--वर्तमान में होने का और होश को जीवन में उतारने का प्रयत्न करता रहता हूं। प्रश्न कुछ भी नहीं है, फिर भी आपसे कुछ सुनने की प्यास जरूर है!

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-14

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—चौदहवां  
दिनांक 09 अप्रेल सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।
प्रश्न-सार:

1—क्या मेरे सूखे हृदय में भी उस परम प्यारे की अभीप्सा का जन्म होगा?
2—आप वर्षों से बोल रहे हैं। फिर भी आप जो कहते हैं वह सदा नया लगता है।
इसका राज क्या है?
3—मैं संसार को रोशनी दिखाना चाहता हूं। मैं इस महत कार्य को प्रारंभ कैसे करूं?
सज्दों से अब तिश्नगी नहीं बुझती
4—जज्ब हो जाऊं रजनीश तेरे आस्ताने में।