कुल पेज दृश्य

बुधवार, 22 मार्च 2017

प्रेम-रंग-रस ओढ़ चुंदरिया-(दूल्‍हन)-प्रवचन-08

प्रेम-रंग-रस ओढ़ चुंदरिया-(दूल्‍हन) 
प्रवचन-आठवां   
दिनांक : 08-फरवरी, सन् 1979;
श्री ओशो  आश्रम, पूना।
प्रश्‍नसार: 

1—भगवान! मनुष्य इस संसार में रह कर परमात्मा को कभी नहीं पा
सकता है, यह मेरा कथन है। क्या यह सच है?

2—भगवान! क्या आप सामाजिक क्रांति के विरोधी हैं?

3—मेरे, मेरे, हां मेरे भगवान!
अधरों से या नजरों से हो वह बात, भला क्या बात हुई!
तू कर जो भी तेरा जी चाहे।

4—भगवान! आप मेरे अंतर्यामी हैं। क्या मेरे हृदय में मीरां और चैतन्य
के से प्रेम के गीत फूटेंगे? क्या उनकी तरह मैं पागल हो कर नाच सकूंगा?

5—भगवान! संतन की सेवा का इतना महत्त्व क्यों है?

प्रेम-रंग-रस ओढ़ चुंदरिया-(दूल्‍हन)-प्रवचन-07

प्रेम-रंग-रस ओढ़ चुंदरिया-(दूल्‍हन) 
प्रवचन-सातवां
दिनांक : 07-फरवरी, सन् 1979;
श्री ओशो  आश्रम, पूना।
सारसूत्र-

गुरु ब्रह्मा गुरु बिस्नु है, गुरु संकर गुरु साध।
दूलन गुरु गोविंद भजु, गुरूमत अगम अगाध।।
श्री सतगुरु-मुखचंद्र तें, सबद-सुधा-झरि लागि।
हृदय-सरोवर राखु भरि, दूलन जागे भागि।।

दूलन गुरु तें विषै-बस, कपट करहिं जे लोग।
निर्पल तिनकी सेव है, निर्पल तिनका जोग।।

दूलन यहि जग जनमिकै, हरदम रटना नाम।
केवल राम-सनेह बिनु, जन्म-समूह हराम।।

सुनत चिकार पिपील की, ताहि रटहु मन माहिं।
दूनलदास बिस्वास भजु, साहिब बहिरा नाहिं।।

चितवन नीची, ऊंच मन, नामहि जिकिर लगाय।
दूलन सूझै परम-पद, अंधकार मिटि जाय।।

रविवार, 19 मार्च 2017

प्रेम-रंग-रस ओढ़ चुंदरिया-(दूल्‍हन)-प्रवचन-06

प्रेम-रंग-रस ओढ़ चुंदरिया-(दूल्‍हन) 
प्रवचन-छठवां
दिनांक : 06-फरवरी, सन् 1979;
श्री ओशो  आश्रम, पूना।
प्रश्‍नसार:
1—भगवान! दूलनदास एक ओर तो जीवन की क्षणभंगुरता का राग अलापते हैं और दूसरी ओर प्रेम-रस पी कर अल्हड़ मस्ती में डूब जाते हैं, जहां समय अनंत हो जाता है। कृपा करके उनके विपर्यास को समझाएं।
2—भगवान! कृष्णमूर्ति ने गुरु और शिष्य का नाता न बनाकर अपनेलिए कोई मुसीबत खड़ी नहीं की; जबकि यहां आपको गुरु और शिष्य का नाता बनाकर अपने लिए मुसीबतों के अतिरिक्त कुछ भी नहींमिल रहा है। क्या बुद्धपुरुषों की करुणा में भेद है?

3--धर्म के वास्तविक स्वरूप के संबंध में कुछ कहें।

प्रेम-रंग-रस ओढ़ चुंदरिया-(दूल्‍हन)-प्रवचन-05

प्रेम-रंग-रस ओढ़ चुंदरिया-(दूल्‍हन) 
प्रवचन-पांचवां   
दिनांक : 05-फरवरी, सन् 1979;
श्री ओशो  आश्रम, पूना।
सारसूत्र:

पिया मिलन कब होइ, अंदेसवा लागि रही।।
जबलग तेल दिया में बाती, सूझ परै सब कोइ।
जरिगा तेल निपटि गइ बाती, लै चलु होइ।।
बिन गुरु मारग कौन बतावै, करिए कौन उपाय।
बिना गुरु के माला फेरै, जनम अकारथ जाए।।
सब संतन मिलि इकमत कीजै, चलिए पिय के देस।
पिया मिलैं तो बड़े भाग से, नहिं तो कठिन कलेस।।
या जग ढूढूं वा जग ढूढूं, पाऊं अपने पास।
सब संतन के चरन-बंदगी, गावै दूलनदास।।

जोगी जोग जुगत नहिं जाना।।
गेरू घोरि रंगे कपरा जोगी, मन न रंगे गुरु-ग्याना।
पढ़ेहु न सत्तनाम दुइ अच्छर, सीखहु सो सकल सयाना।।
सांची प्रीति हृदय बिलु उपजे, कहुं, रीझत भगवाना?
दूलनदास के साईं जगजीवन, मो मन दरस दिवाना।
पिया मिलन कब होइ, अंदेसवा लागि रही।

प्रेम-रंग-रस ओढ़ चुंदरिया-(दूल्‍हन)-प्रवचन-04

प्रेम-रंग-रस ओढ़ चुंदरिया-(दूल्‍हन) 
प्रवचन-चौथा
दिनांक : 04-फरवरी, सन् 1979;
श्री ओशो  आश्रम, पूना।
प्रश्‍नसार:


1—भगवान! आपकी बातें सुनता हूं तो लगता है कि अब आप कहते हैं तो परमात्मा होगा ही। फिर भी मन प्रमाण मांगता है। परमात्मा का क्या प्रमाण है?
2—भगवान! कल आपने बताया कि प्रेम नीचे गिरे तो वासना बन जाता है और ऊपर उठे तो प्रार्थना।
भगवान, मेरे लिए वासना कई अर्थो में स्पष्ट है, और प्रार्थना का विषय अपने-आप में स्पष्ट है। लेकिन इन दोनों के बीच में एक धुंधलापन और अस्पष्टता पाता हूं। भगवान, कृपा करके कहें कि मुझमें प्रेम का यह धुंधलापन क्या है और क्यों है?
3—भगवान! अकेलापन इतना महसूस हो रहा है कि घबड़ा जाती हूं और उदासी घेर लेती है। क्या करूं? प्रभु, मार्ग-दर्शन करें!
4—भगवान! आनंद और अनुग्रह से हृदय भर गया है। क्या करूं, क्या न करूं? कैसे धन्यवाद दूं?

शुक्रवार, 17 मार्च 2017

प्रेम-रस-रंग ओढ़ चदरिया-(दूलन)-प्रवचन-03

प्रेम-रस-रंग ओढ़ चदरिया-(दूलन)
प्रवचन-तीसरा
दिनांक: 03 फरवरी सन् 1979 ,
श्री  ओशो आश्रम , पूना।
सारसूत्र:

साईं, तेरे कारन नैना भए बैरागी।           
तेरा सत दरसन चहौं, कछु और न मांगी।।
निसबासर तेरे नाम की अंतर धुनि जागी।
फेरत हौं माला मनौं, अंसुवनि झरि लागी।।
पलक तजि इत उक्ति तें, मन माया त्यागी।
दृष्टि सदा सत सनमुखी, दरसन अनुरागी।।
मदमाते रातें मनौं दाधें विरह-आगी।
मिलु प्रभु दूलनदास के, करू परमसुभागी।।

धन मोरि आज सुहागिन-घड़िया।
आज मोरे आंगन संत चलि आए, कौन करों मिहमानिया।
निहुरी-निहुरि मैं अंगना बुहारौं, मातौं मैं प्रेम-लहरिया।।
भाव कै भात, प्रेम कै फुलका, ज्ञान की दाल उतरिया।
दूलनदास के साईं जगजीवन, गुरु के चरन बलिहरिया।।

प्रेम-रस-रंग ओढ़ चदरिया-(दूलन)-प्रवचन-02



प्रेम-रस-रंग ओढ़ चदरिया-(दूलन)
प्रवचन-दूसरा
दिनांक: 02 फरवरी सन् 1979 ,

श्री  ओशो आश्रम , पूना।
प्रश्‍नसार:
1—जब भी आकाश की तरफ देखता हूं तो करोड़ों तारों को देखकर चकित हो जाता हूं। और ऐसा घंटों तक होता है। सोचता हूं ये करोड़ों तारे, जो हमारे सूरज से बड़े हैं, यह सब कैसे हुआ, किसलिए हुआ?क्या ब्रह्मांड में हम अकेले पृथ्वीवासी हैं। कृपया समझाएं।



2—प्रभु! तुम्हें रिझाऊं कैसे



मीरा जैसा नृत्य न आया



कोयल जैसा कंठ न पाया



जम्बू जैसा ध्यान न ध्याया



तेरी महिमा इस जड़ वाणी से



समझाऊं कैसे



प्रभु तुम्हें रिझाऊं कैसे?



3—भगवान!



बुझे दिल में दीया जलता नहीं, हम क्या करें?



तुम्हीं कह दो कि अब ऐ जाने-वफा, हम क्या करें?



4—भगवान! भजन, प्रार्थना और ध्यान में क्या भेद है?

प्रेम-रस-रंग ओढ़ चदरिया-(दूलन)-प्रवचन-01

प्रेम-रस-रंग ओढ़ चदरिया-(दूलन)
ओशो
दिनांक: 01 फरवरी सन् 1979 ,
श्री  ओशो आश्रम , पूना।
सारसूत्र:

जग में जै दिन है जिंदगानी।
लाइ लेव चित गुरु के चरनन, आलस करहु न प्रानी।।
या देही का कौन भरोसा, उभसा भाठा पानी।।
उपजत मिटत बार नहिं लागत, क्या मगरूर गुमानी।।
यह तो है करता की कुदरत, नाम तू ले पहिचानी।।
आज भलो भजने को औसर, काल की काहु न जानी।।
काहु के हाथ साथ कछु नाहीं, दुनिया है हैरानी।।
दूलनदास बिस्वास भजन करू, यहि है नाम निसानी।।

गुरुवार, 16 मार्च 2017

पिव पिव लागी प्‍यास-(दादू दयाल)-प्रवचन-10

जिज्ञासा-पूर्ति:पांच--प्रवचन दसवां ,

दिनांक २०.७.१९७५, प्रातःकाल,
श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्‍नसार:
1— दादू और कबीर जिस गुरु-महिमा की चर्चा करते हैं, उसे हम आप में पा लिए हैं।
2— सदगुरु भी मिल गए, फिर भी अगला कदम अस्पष्ट क्यों है?
3— जिस शोले को आपने मेरे भीतर से कुरेदकर जला दिया....
4— भय से किया गया समर्पण निर्भयता को कैसे उपलब्ध होगा?
5— प्रवचन के समय आपकी कोई कोई ध्वनि सुनकर मैं कांप जाता हूं, डर जाता हूं।
6— अभी हम हैं आपके सामने, वह क्या एक लंबा सपना है?

पिव--पिव लागी प्‍यास-(दादू दयाल)-प्रवचन-09



मन चित चातक ज्यूं रटै-प्रवचन नौवां :

दिनांक १९.७.१९७५, प्रातःकाल,
श्री रजनीश आश्रम, पूना।
सारसूत्र-

भगवान श्री, सदगुरु दादू के वचन हैं--

मन चित चातक ज्यूं रटै, पिव पिव लागी प्यास।
दादू दरसन कारने पुरवहु मेरी आस।।
विरहित दुख कासनि कहै, कासनि देह संदेस।
पंथ निहारत पीव का, विरहिन पलटे केस।।
ना वहु मिलै न मैं सुखी कहु क्यूं जीवन होइ।
जिन मुझको घायल किया मेरी दारू सोइ।।
कर बिन सर बिन कमान बिना सा मरै खेंचि कसीस।
बागी चोट सरीर में रख सिख सालै सीस।।
विरह जगावे दरद को दरद जगावै जी।
जीव जगावै सुरति को पंच पुकारै पीव।

मंगलवार, 14 मार्च 2017

पिव पिव लागी प्‍यास-(दादू दयाल)--प्रवचन-07

ल्यौ लागी तब जाणिये--प्रवचन—सातवां ,
दिनांक १७.७.१९७५, प्रातःकाल
श्री रजनीश आश्रम, पूना,
सारसूत्र:

भगवान श्री, संत श्रेष्ठ दादूदयालजी की वाणी हैं--

जोग समाधि सुख सुरति, सों, सहजै सहजै आव।
मुक्ता द्वारा महल का, इहै भगति का भाव।।
ल्यौ लागी तब जाणिए, जेवा कबहूं छूटि न जाइ।
जीवन यौं लागी रहे मूवा मंझि समाइ।।
मन ताजी चेतन चेढै, ल्यौ की करे लगान।
सबद गुरु का ताजना, कोई पहुंचे साधु सुजान।।
आदि अंत मध एक रस, टूटे नहिं धागा।
दादू एकै रहि गया, जब जाणै जागा।
अर्थ अनूपम आप है, और अनरथ भाई।
दादू ऐसी जानि करि, तासौं ल्यो लाई।।

पिव पिव लागी प्‍यास-(दादू दयाल)--प्रवचन-06

जिज्ञासा-पूर्ति: तीन –(प्रवचन—छट्ठवां)  
दिनांक १६.७.१९७५, प्रातःकाल,
श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्‍नसार:
1— क्या भय नकारात्मक होते हुए भी सोए को जगाने या होश को बढ़ाने में सहायक है?
2— क्या एक कवि काव्य-सर्जना के साथ-साथ ध्यान की साधना भी आवश्यक है?
3—धैर्य भी असीम हो; क्या ये दोनों स्थितियां असंगत नहीं हैं?
4— सब मन के रोग प्रेम की कमी से पैदा होते हैं।
5— नचिकेता की तरह जीवन के द्वार पर दृढ़ होकर बैठ जाना है।

पिव पिव लागी प्‍यास-(दादू दयाल)--प्रवचन-05

पिव पिव लागी प्‍यास-(दादू दयाल)
सबदै ही सब उपजै
प्रवचन—पांचवां  
दिनांक १५. ७. १९७५, प्रातःकाल,
श्री रजनीश आश्रम, पूना
सारसूत्र-

भगवान श्री, संत श्रेष्ठ दादू की कुछ साखियां हैं--

सबद बंध्या सब रहै, सबदै सब ही जाए।
सबदै ही सब उपजै, सबदै सबै समाय।।
दादू सबदै ही सचु पाइये, सबदै ही संतोष।
सबदै ही स्थिर भया, सबदै ही भागा सोक।।
दादू सबदै ही मुक्ता भया, सबदै समझै प्राण।
सबदै ही सूझै सबै, सबदै सुरझै जाण।।
पहली किया आप थैं उतपत्ती ओंकार।
ओंकार थैं उपजैं, पंच तत्त आकार।।
दादू सब बाण गुरु साध के, दूरि दिसंतर जाइ।
जेहि लागै सो ऊबरै, सूते लिए जगाइ।।
सबद सरोवर सूभर भरया, हरिजल निर्मल नीर।
दादू पीधै प्रीति सौं, तिनकै अखिल सरीर।।

पिव पिव लागी प्‍यास—(दादू दयाल)-प्रवचन-04




जिज्ञासा-पूर्ति: दो--प्रवचन—चौथा
दिनांक १४. ७. १९७५,
प्रातःकाल श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्‍नसार:
1— आप बार-बार गुरु की महिमा बतलाकर क्या हमें पंगु नहीं बना रहे हैं?
2— जीवन-ऊर्जा के शीघ्र से शीघ्र रूपांतरण के लिए कौन सी ध्यान की विधि उपयोगी होगी?
3— ध्यान का फल आत्म-दर्शन है क्या? और श्रद्धा को कैसे उपलब्ध हुआ जाए?
4— सक्रिय ध्यान में अंतिम चरण में एक शांति किंतु उदासी सी घेर लेती है?
5— आपने अनेक बार कहा है कि सदगुरु शिष्य को पास भी बुलाता है, फिर दूर भी करता है।
6आने वाला युग आपको कृष्ण से भी ऊपर रखेगा। क्या इस पर आप कुछ प्रकाश डालेंगे?
7— दूसरों के सामने: विशेषकर प्रियजनों के सामने, उसे प्रतिपादित करने की इतनी आतुरता मुझमें क्यों है?
8— आपने पहले कहा, कि मेरा सारा बोलना मात्र बहाना है। फिर आपका होना क्या है?

पिव पिव लागी प्‍यास-(दादू दयाल)-प्रवचन--03

राम नाम निज औषधि
प्रवचन-तीसरा
दिनांक १३. ७. १९७५ प्रातःकाल श्री रजनीश आश्रम, पूना
सारसूत्र:

संत शिरोमणि दादू की कुछ साखियां इस प्रकार हैं:

मेरा संसा को नहीं, जीवन मरन का राम।।
सुपनैं ही जनि वीसरैं--मुख हिरदै हरि नाम।।

हरि भजि साफल जीवना, पर उपगार समाई।
दादू मरण तहं भला, जहं पसु-पंखी खाइ।।

राम-नाम निज औषधि, काटै कोटि विकार।
विषम व्याधिजे ऊबरै, काया-कंचन सार।।

कौन पटंतर दीजिए, दूजा नाहीं कोइ।
राम सरीखा राम है, सुमरियां ही सुख होइ।।

नांव लिया तब जानिए, जे तन-मन रहे समाइ।
आदि, अंत, मध, एक रस, कबहूं भूलि न जाइ।।

भगवान, कृपापूर्वक हमें इनका अभिप्राय समझाएं।