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रविवार, 19 मार्च 2017

प्रेम-रंग-रस ओढ़ चुंदरिया-(दूल्‍हन)-प्रवचन-04



प्रेम-रंग-रस ओढ़ चुंदरिया-(दूल्‍हन) 
प्रवचन-चौथा
दिनांक : 04-फरवरी, सन् 1979;
श्री ओशो  आश्रम, पूना।
प्रश्‍नसार:


1—भगवान! आपकी बातें सुनता हूं तो लगता है कि अब आप कहते हैं तो परमात्मा होगा ही। फिर भी मन प्रमाण मांगता है। परमात्मा का क्या प्रमाण है?
2—भगवान! कल आपने बताया कि प्रेम नीचे गिरे तो वासना बन जाता है और ऊपर उठे तो प्रार्थना।
भगवान, मेरे लिए वासना कई अर्थो में स्पष्ट है, और प्रार्थना का विषय अपने-आप में स्पष्ट है। लेकिन इन दोनों के बीच में एक धुंधलापन और अस्पष्टता पाता हूं। भगवान, कृपा करके कहें कि मुझमें प्रेम का यह धुंधलापन क्या है और क्यों है?
3—भगवान! अकेलापन इतना महसूस हो रहा है कि घबड़ा जाती हूं और उदासी घेर लेती है। क्या करूं? प्रभु, मार्ग-दर्शन करें!
4—भगवान! आनंद और अनुग्रह से हृदय भर गया है। क्या करूं, क्या न करूं? कैसे धन्यवाद दूं?


पहला प्रश्नः भगवान, आपकी बातें सुनता हूं तो लगता है कि जब आप कहते हैं तो परमात्मा होगा ही। फिर भी मन प्रमाण मांगता है। परमात्मा का प्रमाण क्या है?

परमात्मा का कोई प्रमाण नहीं है और न परमात्मा का कोई प्रमाण हो सकता है; क्योंकि परमात्मा के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं, जो उसका प्रमाण बन सके। परमात्मा ही है, रत्ती-भर भी स्थान शेष नहीं है, जहां परमात्मा का प्रमाण अपना आवास बना सके। जो है वह परमात्मा है। प्रमाण भी होगा तो वह भी परमात्मा ही होगा।
परमात्मा का प्रमाण मन जरूर मांगता है और मन के प्रमाण मांगने के गहरे कारण हैं। प्रमाण मांगने में ही परमात्मा नहीं है, ऐसा मन को आभास मिलना शुरू हो जाता है। क्योंकि प्रमाण तो परमात्मा का कोई है नहीं, दिया नहीं जा सकता, कभी दिया नहीं गया, कभी दिया भी नहीं जाएगा। और जिन्होंने दिए हैं, सब झूठे प्रमाण हैं। बच्चों को समझाने की बातें हैं। उनसे कुछ मन की तृप्ति नहीं होती।
आस्तिक के पास प्रमाण नहीं होता, प्रेम होता है। नास्तिक के पास तर्क होता है। इतना भेद है आस्तिक और नास्तिक में। ऐसा मत सोचना कि आस्तिक के पास प्रमाण हैं और नास्तिक के पास प्रमाण नहीं हैं। आस्तिक के पास प्रेम है, कोई प्रमाण नहीं है। प्रेम चिंता भी नहीं करता प्रमाणों की, प्रमाण प्रेम की भाषा में भी नहीं आते। नास्तिक के पास तर्क है, प्रमाण उसके पास भी कोई नहीं है--पक्ष में या विपक्ष में। प्रमाण तो हो ही नहीं सकता। लेकिन तर्क की एक सुविधा हैः अगर परमात्मा सिद्ध न हो सके तो मन की बचे रहने कि लिए उपाय मिल जाता है। अगर प्रकाश नहीं है तो अंधेरा बच सकता है और अगर प्रकाश है तो अंधेरे को मिटना होगा।
आस्तिक वही है जिसका मन मिट गया। नास्तिक वही है, जो कहता हैः पहले प्रमाण चाहिए। और प्रमाण मिलेंगे नहीं, मन को मिटने का कारण न आएगा। परमात्मा के संबंध में प्रमाण मांगना मन की बड़ी गहरी चालबाजी है।
तुम, सौंदर्य है फूल में, इसका प्रमाण मांगो; प्रमाण नहीं मिलेगा, सौंदर्य है! तुम भी जानते हो सौंदर्य है। किसी सुबह सूरज की ताजीत्ताजी किरणों में तुमने कमल के फूल को खिलते देखा? क्या कह सकोगे कि सौंदर्य नहीं है? नहीं अभिभूत हो गए हो? नहीं हृदय में कुछ आंदोलित हो उठा है? रात तारों से भरी है और तुम अछूते रह गए हो! और आकाश अनंत रहस्यों से परिपूर्ण और तुम्हारा हृदय नाचा नहीं है? लेकिन प्रमाण क्या है! तारे सुंदर हैं, इसका प्रमाण क्या है? और कमल सुंदर है, इसका प्रमाण क्या है?
क्या किसी स्त्री, किसी पुरुष, किसी मित्र के प्रेम में नहीं पड़े हो? और आंखें जादू से नहीं भर गई हैं? और रूप में कुछ अरूप की झलक नहीं मिली है। आकार में कहीं-कहीं निराकार की पगध्वनि नहीं सुनाई पड़ी है? कभी किन्हीं आंखों में झांककर जीवन की अतिरहस्यमयता का बोध नहीं हुआ है? हुआ है। इतना अभागा कौन है कि जिसे जीवन में कभी भी ऐसा कोई अनुभव न हुआ हो जो प्रमाणातीत है? लेकिन तुमने प्रमाण नहीं मांगा।
प्रमाण मांगते तो कमल तो रह जाता, कमल क्या कीचड़ ही रह जाती, सौंदर्य विलीन हो जाता। प्रमाण मांगते, आकाश तारों से भरा रह जाता, लेकिन रात्रि का काव्य और रात्री का रहस्य और रात्रि का संगीत सब विलीन हो गया होता। प्रमाण मांगते तो स्त्री तो रह जाती हड्डी-मांस-मज्जा की देह, लेकिन उसमें छलक आया अज्ञात तत्क्षण तिरोहित हो जाता। लेकिन तुमने वहां प्रमाण नहीं मांगे या जिन्होंने मांगे हैं उनके लिए सौंदर्य भी नहीं है, सत्य भी नहीं है, परमात्मा भी नहीं है, प्रेम भी नहीं है, शुभ भी नहीं है, आनंद भी नहीं है। उनके लिए बचता क्या है? उनके लिए कुछ भी जीवन-योग्य नहीं बचता। खाते-बही करो, रुपए-पैसे का हिसाब लगाओ, धन-दौलत जोड़ो। फिर उनके पास व्यर्थ कूड़ा-करकट इकट्ठा करने के लिए ही उपाय बचता है। क्योंकि जीवन में जो भी महिमावान है वह उनके हाथों के बाहर हो जाता है। जिसे तुमने इनकार कर दिया, उसके द्वार तुम्हारे लिए बंद हो गए। जिस मंदिर को तुमने नकार दिया वह मंदिर तुम्हारे लिए न रहा।
जीवन में प्रमाण हैं--क्षुद्र बातों के, व्यर्थ बातों के। जीवन में प्रमाण नहीं हैं--विराट के, अनंत के, शाश्वत के।
अगर तुम मुझसे पूछो तो मैं तो यह कहूंगाः अच्छा है कि परमात्मा का कोई प्रमाण नहीं है, नहीं तो कैसे करते उसे प्रेम? कोई गणित को प्रेम करता है? दो और दो चार होते हैं, यह बात पक्की है; मगर इसको प्रेम करोगे? दो और दो चार होते हैं, यह बात बिल्कुल सुनिश्चित है, इसे सिर पर लेकर नाचोगे?
कहते हैं, शापेनहार, पश्चिम का एक बड़ा विचारक जब पहली बार उपनिषद पढ़ा तो उपनिषदों को सिर पर लेकर नाचने लगा। मित्रों ने पूछाः पागल हो गए हो! कोई किताबों को लेकर सिर पर नाचता है! लेकिन शापेनहार ने कहाः ये किताबें होतीं तो मैं भी नहीं नाचता। ये किताबें नहीं हैं। किताबें तो मैंने भी बहुत देखी। इनमें कुछ है जो किताबें में होता ही नहीं इनमें किसी दूर की भनक है; किसी बहुत सुदूर के तारे की झलक है। इन किताबों के कारण मुझे पहली दफे जीवन में महिमा मालूम हुई है।
लेकिन क्या शापेनहार के नृत्य के लिए कोई प्रमाण है? गणित की किताब लेकर नाच सकता था शापेनहार? अलबर्ट आइंस्टीन की सापेक्षवाद की सिद्धांत की किताब लेकर नाच सकता था शापेनहार? नहीं, नाच कहां पैदा होगा गणित में! गाणित का आंगन बहुत छोटा, नाच कैसे पैदा होगा? गीत कैसे जन्मेगा? गणित में गीत के पैदा होने के लिए अवकाश कहां है? गीत के लिए थोड़ा रहस्यपूर्ण कुछ चाहिए, जो पकड़ में आता भी हो और न भी आता हो; जो हाथ में छूता भी हो और मुट्ठी में बंधता भी न हो। कुछ ऐसा जिसकी झलक तो मिलती हो, लेकिन स्पष्टता न होती हो। कुछ रहस्यमय की प्रतीति हो तो गीत जन्मे, तो नृत्य उठे, तो भजन हो, तो प्रार्थना हो और तो ही परमात्मा है।
तुम कहते होः "आपकी बातें सुनता हूं तो लगता है कि जब आप कहते हैं तो परमात्मा होगा ही।' ऐसे लगने से कुछ सार नहीं। मेरी बातें सुनकर लगेगा तो किसी और की बातें सुनकर खो भी जाएगा। बातों का कोई भरोसा है? मेरी बातें सुनकर लगेगा, तुम्हारा मन उनके विपरीत बातें खोज लेगा। हर बात के विपरीत बात खोजी जा सकती है। ऐसी कोई बात ही नहीं होती, जिसका खंडन किया जा सके। हर शब्द के विपरीत शब्द होता है। शब्द बनते ही विपरीतता से हैं। प्रेम है क्योंकि घृणा है। करुणा है क्योंकि क्रोध है। दिन है क्योंकि रात है। जन्म है क्योंकि मृत्यु है। शब्द तो बनते ही द्वंद्व से हैं। और जिससे एक सिद्ध होता है उसी से दूसरा सिद्ध हो जाता है।
जन्म से ही तो मृत्यु सिद्ध होती है न! अगर जन्म न होता तो मृत्यु भी न होती। अगर जन्म सिद्ध हो गया तो मृत्यु भी सिद्ध हो गई। मित्र ही तो शत्रु बन जाते हैं न! अगर कोई मित्र ही न बनता तो दुनिया में शत्रु भी न होते। अपने ही तो पराए हो जाते हैं। इसीलिए तो पराए हो जाते हैं कि अपने हो सके थे। अपने होने की संभावना पराए होने की संभावना है।
तो जो तर्क पक्ष में हो सकता है वही विपक्ष में हो सकता है। तर्क तो वेश्या जैसे होते हैं; उनकी कोई निष्ठा नहीं होती। तर्क तो वकील हैं; जो उनके दाम चुका दे उनके साथ हो जाते हैं।
मैंने सुना है, मुल्ला नसरुद्दीन अपने वकील के पास गया। अपने वकील को उसने अपना पूरा मामला समझाया और जैसा कि वकील कहता, जैसा कि कोई भी वकील कहता, कहना ही चाहिए, नहीं तो वकील चले कैसे, जिए कैसे? वकील ने कहाः बिल्कुल मत घबड़ाओ। तुम्हारी जीत सुनिश्चित है। सब तर्क तुम्हारे पक्ष में हैं, सब कानून तुम्हारे पक्ष में हैं। विपरीत आदमी की हार में कोई शक ही नहीं, सौ प्रतिशत तुम जीतोगे।
मुल्ला उठ खड़ा हुआ। उसने कहाः नमस्कार, तो चलते हैं। उसने कहाः लेकिन जाते कहां हो? उसने कहाः यह तो मैंने अपने विपरीत आदमी के तरफ से जो तर्क थे वे दिए थे। अगर हार मेरी निश्चित है तो नमस्कार, फिर काहे की फीस चुकानी और काहे की झंझट में पड़ना?
लेकिन तुम अपने तर्क कहते तो भी वकील यही कहता। तुमने अपना मामला समझाया होता तो भी वकील यही कहता। उसे कहना ही चाहिए, उसका काम ही यही है। उसे इससे प्रयोजन नहीं है; कि सत्य क्या है उसे प्रयोजन इससे है कि तार्किक रूप से किस चीज का समर्थन किया जा सकता है। और हर चीज का समर्थन किया जा सकता है तार्किक रूप से। ऐसा अब तक कोई भी विचार नहीं है जगत् में, जिसके लिए तार्किक समर्थन न खोजा जा सके और तार्किक विरोध न खोजा जा सके। और मजा ऐसा कि तर्क का समर्थन और तर्क का विरोध दोनों समतुल होते हैं।
इसलिए जो बुद्धिमान हैं वे तर्क में नहीं पड़ते, क्योंकि वे जानते हैं कि दोनों समतुल हो जाते हैं, एक-दूसरे को काट देते हैं। अगर पचास प्रतिशत तर्क पक्ष में हैं तो पचास प्रतिशत विपक्ष में होता है। जिनके पास आंखें हैं वे इस सत्य को देखकर तर्क को गिरा ही देते हैं। वे कहते हैंः तर्क से निर्णय होगा ही नहीं।
फिर निर्णय कैसे होगा? जब तर्क से निर्णय नहीं होता तब प्रेम से निर्णय होता है। जब बुद्धि से निर्णय नहीं होता तब हृदय से निर्णय होता है। जब विचार से निर्णय नहीं होता तब अनुभव-अनुभूति से निर्णय होता है।
मेरी बातें सुनकर अगर तुमको लगा कि ईश्वर है तो आश्रम के बाहर जाते-जाते खो जाएगा, घर पहुंचते-पहुंचते भूल जाएगा। बात का कोई भी मूल्य नहीं है। कितनी ही प्यारी बात हो, बात तो बात ही बात है। बातों के भरोसे मत रुकना। बातों के भरोसे ही लाखों-करोड़ों लोग रुके हैं और परमात्मा से वंचित रह गए हैं। किसी को आस्तिक की बात अच्छी लग गई है; वह भी वंचित रह गया। और किसी को नास्तिक की बात अच्छी लग गई है; वह भी वंचित रह गया। जो काबा में बैठा है, वह भी वंचित रह गया है और जो क्रेमलिन में बैठा है वह भी वंचित रह गया है। क्योंकि बात अच्छी लगी। और परमात्मा से संबंध बात से नहीं जुड़ता, जहां बातें गिर जाती हैं वहां संबंध जुड़ता है।
इसे मैं तुम से फिर से कह दूंः विचार से नाता नहीं जुड़ता परमात्मा से, निर्विचार से जुड़ता है। मेरी बात भी तो एक विचार देगी, एक तरंग पैदा करेगी, एक ऊहापोह उठाएगी! तुम चिंतनमग्न हो जाओगे। और परमात्मा का संबंध चिंतन से नहीं होता, मनन से नहीं होता। जहां मनन और चिंतन दोनों ठहर जाते हैं, जहां दोनों थिर हो जाते हैं, जहां विराम आ जाता है, जहां न सोच है न विचार है, जहां केवल शुद्ध अस्तित्व है--बस वहीं परमात्मा से संबंध है। और फिर प्रमाण नहीं पूछे जाते। फिर तो प्रमाणों का प्रमाण हाथ लग गया। स्वाद लग गया!
जिस आदमी ने स्वाद लिया है मिठास का, तुम उससे लाख कहो कि प्रमाण क्या है; वह कहेगा प्रमाण हो या न हो, लेकिन स्वाद मैंने लिया है। लाख प्रमाण विपरीत हों तो भी मेरे स्वाद को खंडित नहीं कर सकते। और जिस आदमी ने नीम की कड़वाहट चखी है, तुम लाख प्रमाण इकट्ठे करो कि नीम मीठी है; वह कहेगा, होंगे तुम्हारे प्रमाण ठीक, प्रमाणों की तुम जानो, मगर मैं नीम को जानता हूं, मैंने अनुभव किया है, नीम मीठी नहीं है।
अनुभव के अतिरिक्त और कोई बात निर्णायक नहीं है। और अनुभव आसान हैं, विचार कठिन है। क्योंकि विचार के सिलसिले का कोई अंत नहीं होता, चलता ही जाता है। एक विचार से दूसरे विचार की शाखाएं निकलती रहती हैं, शाखाओं में से प्रशाखाएं और विचार का जाल फैलता चला जाता है। और फिर एक दिन तो तुम इसकी इतनी मुश्किल में पड़ जाओगे कि विचार का निष्कर्ष लेना तो दूर, अब इस विचार के उपद्रव से वापिस कैसे लौटें? इतना जाल फैला लिया, अब इसे कैसे सिकोड़े?
नहीं, मेरी बातें सुनकर परमात्मा लगे, इसका कोई मूल्य नहीं है। मुझे अनुभव करो, मेरी उपस्थिति को अनुभव करो। यहां बैठे लोगों के आनंद, शांति को, प्रीति को अनुभव करो। यहां नाचते हुए लोगों के नाच को अपने भीतर उतरने दो। यहां गीत गाते लोगों का गीत तुम्हारे कानों पर पड़े, तुम्हारे हृदय पर चोट करे, तो शायद।
इन वृक्षों से पूछो। ये चुपचाप धूप में खड़े हुए वृक्ष! आकाश से पूछो सूरज से पूछो। सूरज निकला है और तुम पूछते हो कि सूरज का प्रमाण क्या है! तो हम यही कहेंगे कि आंख खोलो और देखो, और कोई प्रमाण नहीं है। सूरज निकला है और तुम पूछते हो कि सूरज का प्रमाण क्या है? इससे सिर्फ एक ही बात सिद्ध होती है कि या तो तुम अंधे हो और या फिर तुमने आंख बंद कर रखी है। और दूसरी ही बात सच है। अंधा कोई पैदा ही नहीं होता। आध्यात्मिक अर्थो में कोई अंधा पैदा नहीं होता। आध्यात्मिक अर्थो में हम केवल बंद किए हैं आंख और अपने-आप को अंधा मान बैठे हैं।

दहके हैं डाल पर

अंगार या सुमन

सुलगा पलाशवन

पीला रूमाल बांध गेंदा तो छैला है

सरसों को छेड़ रहा अलसी तक फैला है

गेहूं की बाल पर

कसता प्रणय-वचन

मन मथ रहा मदन


मौसम का आम्र-मुकुट कलगी है मौरों की

कोयल का सौहर है, शहनाई भौरों की

मन की चौपाल पर

यह रूप की दुल्हन--

--का प्यार से वरण


कमल-कुंज या अफीम के खिलते फूलों पर

किसको आपत्ति हुई मनपसंद भूलों पर

गदराए गाल पर

ये फागुनी फबन

सब सुनहरे सपन


रंगों में सब भीगे तू ही क्यों कोरा है

जो न छुए भीतर तक फाग वह छिछोरा है

शिकनें क्यों भाल पर

हैं क्यों भरे नयन

मेरे उदास मन
इतना ही पूछो। तुम्हारा चित्त बड़ा उदास होगा। तुम्हारा चित्त बड़ा दुविधाग्रस्त होगा। तुम्हारा चित्त विक्षिप्त होगा, जो परमात्मा का प्रमाण मांगने चला है। यह रोग का लक्षण है। स्वस्थ चित्त को तो प्रमाण दिखाई पड़ता ही है! परमात्मा ही दिखाई पड़ता है और कोई दिखाई नहीं पड़ता! दहके हैं डाल पर अंगार या सुमन! ज़रा पूछो तो, फूलों से पूछो! सुलगा है पलाशवन! सारा जंगल पलाश के फूलों से लदा हुआ है--और तुम पूछते हो, सौंदर्य कहां! पीला रुमाल बांध गेंदा तो छैला है! ज़रा छैले से पूछो, इस गेंदे से पूछो!

पीला रुमाल बांध गेंदा तो छैला है

सरसों के छेड़ रहा अलसी तक फैला है

गेहूं की बाल पर

कसता प्रणय-वचन

मन मथ रहा मदन
चारों तरफ प्रेम का एक अपूर्व रास रचा हुआ है! सब तरफ तीर छोड़े जा रहे हैं प्रेम के! फूलों से फूलों पर, पक्षियों से पक्षियों पर, पशुओं से पशुओं पर, तारों से तारों पर! इन तीरों को अनुभव करो, इन तीरों की प्यारी चुभन को अनुभव करो!

मौसम का आम्र-मुकुट कलगी है मौरों की

कोयल का सौहर है शहनाई भौरों की

मन की चौपाल पर

यह रूप की दुल्हन--

--का प्यार से वरण!
यह चारों तरफ. . . ये रूपायित लोग, यह रूपमग्न अस्तित्व, यह मस्त प्रकृति . . . ! और तुम पूछते हो परमात्मा का प्रमाण क्या है!
जीसस से किसी ने पूछाः हम क्या करें? तो जीसस ने कहाः पूछ लो मछलियों से। खड़े होंगे झील पर। कहाः पूछ लो लोमड़ियों से। भागती होंगी लोमड़ियां झील के तट पर।. . . कि पूछ लो फूलों से। मुझसे क्यों पूछते हो?
फूल क्या कर रहे हैं? प्रतिपल आराधना में लीन हैं। प्रतिपल अर्चना में डूबे हैं। मछलियां क्या कर रही हैं? मार रही हैं डुबकी सागर में, डुबकी पर डुबकी! और हम भी परमात्मा के सागर की मछली हैं, उसके तट पर खिले फूल हैं। हमारे भीतर भी वही मुनष्य का रूप लिया है। जो गुलाब में गुलाब है और गेंदे में गेंदा है वही हम में मनुष्य है। वह जो गेंदे में पीला है और गुलाब में लाल है, वही तो हममें खिला है, हम भी तो उसी के फूल हैं!

पीला रुमाल बांध गेंदा तो छैला है

सरसों को छेड़ रहा अलसी तक फैला है

गेहूं की बाल पर

कसता प्रणय-वचन

मन मथ रहा मदन


मौसम का आम्र-मुकुट कलगी है मौरों की

कोयल का सौहर है, शहनाई भौरों की

मन की चौपाल पर

यह रूप की दुल्हन--

--का प्यार से वरण

सुनो शहनाई चारों तरफ बज रही है उसी की!


कमल-कुंज या अफीम के खिलते फूलों पर

किसको आपत्ति हुई मनपसंद भूलों पर

गदराए गाल पर

ये फागुनी फबन

सब सुनहरे सपन

रंगों में सब भीगे, तू ही क्यों कोरा है

मैं तुमसे यही पूछता हूं। तुम तर्क पूछते, प्रमाण पूछते! होली आ गई, फाग आ गई, लोगों ने पिचकारियों में रंग भर लिए--और तुम अभी प्रमाण पूछ रहे हो कि रंग होते हैं या नहीं! भरो पिचकारी, खेलो फाग!

रंगों में सब भीगे तू ही क्यों कोरा है

जो न छुए भीतर तक फाग वह छिछोरा है

शिकनें क्यों भाल पर

हैं क्यों भरे नयन

मेरे उदास मन
तर्क की आकांक्षा उदास चित्त से उठती है, रुग्ण चित्त से उठती है। प्रमाण मांगता ही वही है जिसने आंख बंद कर रखी है; जिसने चित्त के ऊपर चट्टानें रख छोड़ी हैं; जो चित्त के रस-झरने को बहने नहीं देता है। नहीं तो परमात्मा ही परमात्मा है। तुम ऐसा नहीं पूछोगे कि परमात्मा के लिए क्या प्रमाण है। तुम उल्टी ही बात पूछोगे। तुम पूछोगे कि प्रमाण तो इतने हैं, परमात्मा कहां है? अभी तुम पूछते हो कि प्रमाण बिल्कुल नहीं है? परमात्मा कहां है? जो आंख खोलकर देखोगे तो पूछोगेः प्रमाण ही प्रमाण हैं, द्वार-द्वार प्रमाण ही प्रमाण हैं, परमात्मा कहां है? जिसके इतने प्रमाण हैं, वह छिपा कहां है? कैसे छिपा होगा?

लो खिले उमर के फूल

समर्पित होने का उल्लास


महक उठा है मन का महुआ

मैं अपनी सौरभ से पागल

पंख रेशमी फूटे तन को

अंगों में बिखरा पराग-दल

टेसू-सी दहकी देह

यही पहला यौवन मुधमास


केश गूंथ देती है मावस

पूनम मल जाती है उबटन

शाम सुबह मेहंदी रच देती

मलयानिल सांसों में चंदन

घन देते काजल आंज

नयन में सिमटा है आकाश

मौन समर्पण का सुख पावन

उत्सर्गो का मधुरिम उत्सव

आग्रह भरा निवेदन मन का

बरसे आज प्रणय का आसव

अब सपनों का नैपथ्य

दे रहा प्रियतम का आभास
तुम ज़रा सजग हो जाओ। तर्क मत मांगो, थोड़ा चैतन्य मांगो! तुम ज़रा होश से भर जाओ।

अब सपनों का नैपथ्य

दे रहा प्रियतम का आभास!
और तुम्हें जगह-जगह से उसी के चरण-चिह्न सुनाई पड़ने लगेंगे। हर चरण-चिह्न में उसी का चरण-चिह्न दिखाई पड़ने लगेगा।
नहीं, तर्क नहीं है; ज़रा और अमूर्च्छा चाहिए, होश चाहिए। ध्यान चाहिए, तर्क नहीं। ध्यान चाहिए, प्रमाण नहीं। थोड़ी और प्रीति चाहिए। और सघन प्रीति चाहिए। रंगों में सब भीगे, तू ही क्यों कोरा है!
तुम पूछते होः फिर भी मन प्रमाण मांगता है। परमात्मा का प्रमाण क्या है? परमात्मा है, प्रमाण कोई भी नहीं है। मैं कोई दर्शनशास्त्री नहीं हूं, न कोई धर्मशास्त्री हूं, न ही मैं परमात्मा के लिए प्रमाण जुटाता हूं। मैं तो परमात्मा को ही तुम्हारे लिए उपलब्ध कराता हूं। सीधे-सीधे। ऐसे उधार-उधार क्यों, बासे-बासे क्यों, ऐसे उल्टी तरफ से कान को क्यों पकड़ना! यूं पीछे के दरवाजों से क्यों घुसना, जबकि मंदिर ने मुख्य द्वार पर स्वागत के तोरण बांधे हैं, बंदनवार सजाई है, शहनाई बजाई है। जबकि निमंत्रण मिला है तो चोरों की तरह प्रवेश क्यों?
नहीं, मैं कोई प्रमाण नहीं देता। लेकिन एक ऊर्जा का क्षेत्र जरूर यहां निर्मित हो रहा है, जिसमें डूबोगे तो प्रमाण ही प्रमाण मिल जाएंगे--इतने की इकट्ठे भी करना चाहोगे तो कर न पाओगे।
जो यहां प्रमाण मांगने आया है, खाली लौट जाएगा। हां, हो सकता है उसे मेरी बातें अच्छी लगें, मगर अच्छी बातों का क्या मूल्य? अच्छी बातों का उतना ही मूल्य है जैसे पाकशास्त्र में लिखे हुए सुस्वादु भोजनों के संबंध में कोई पढ़े, खूब पढ़े; मगर भूख न भरेगी ऐसे। कि जल के सरोवर की तस्वीर को खूब ध्यान मग्न होकर देखे, प्यास न बुझेगी ऐसे। जीवंत संस्पर्श चाहिए।
सुनते हो इन पक्षियों की आवाजों को! इनमें है प्रमाण। आंख खोलो, प्रकृति को निहारो और तुम रत्ती-रत्ती पर, कण-कण पर उसी के हस्ताक्षर पाओगे। उसके ही हस्ताक्षर हैं!
परमात्मा सृजन की अनंत ऊर्जा है। जो है उससे है। जो है उसके द्वारा है। जो है उसमें है।

दूसरा प्रश्नः भगवान! कल आपने बताया कि प्रेम नीचे गिरे तो वासना बन जाता है और ऊपर उठे तो प्रार्थना।
भगवान, मेरे लिए वासना कई अर्थो में स्पष्ट है, और प्रार्थना का विषय भी अपने-आप में स्पष्ट है। लेकिन इन दोनों के बीज प्रेम में मैं एक धुंधलापन और अस्पष्टता पाता हूं।
भगवान, कृपा करके कहें कि मुझमें प्रेम का यह धुंधलापन क्या है और क्यों है?

योग चिन्मय! प्रेम तो धुंधला होगा ही, क्योंकि प्रेम रहस्य है। वासना स्पष्ट होगी और प्रार्थना भी स्पष्ट होगी। प्रेम तो दोनों का मध्य है। प्रेम तो तरल अवस्था है। न तो प्रेम वासना है और न प्रेम प्रार्थना है, प्रेम दोनों के मध्य की कड़ी है; संक्रमण का काल है। संक्रमण का काल तो धुंधला होगा ही, अनिवार्यतया धुंधला होगा। तुम्हारे लिए ही ऐसा है, ऐसा नहीं; सभी के लिए ऐसा है।
वासना तो साफ है। मिट्टी की पकड़ है। पर के ऊपर शिकंजा है। प्रकृति की दौड़ है। जीव-विज्ञान की तुम्हारे ऊपर अंधी जकड़ है। सब साफ-साफ है। वासना में कुछ उलझा हुआ नहीं है। वासना गणित जैसी साफ है।
और प्रार्थना भी साफ है। क्योंकि वासना है पदार्थ के लिए, प्रार्थना है परमात्मा के लिए; दोनों का विषय स्पष्ट है। एक तीर जा रहा पदार्थ की तरफ; उसका लक्ष्य भी साफ है। एक तीर जा रहा है परमात्मा की तरफ; उसका भी लक्ष्य साफ है। लेकिन प्रेम का तीर कहीं भी नहीं जा रहा--न पदार्थ की तरफ, न परमात्मा की तरफ। प्रेम का तीर अभी तूणीर में है। इसलिए अड़चन होती है कि यह प्रेम के तीर का प्रयोजन क्या है? इसका लक्ष्य क्या है? और लक्ष्य साफ न हो तो प्रेम अस्पष्ट रह जाता है, धुंधला-धुंधला रह जाता है। लगता तो है कुछ है, मगर क्या है, ठीक-ठीक मुट्ठी नहीं बंधती, तराजू पर नहीं तुलता, नाप-जोख में नहीं आता। वासना भी नाप-जोख में आ जाती है।
इसलिए इस जगत् में भोगी भी स्पष्ट है और त्यागी भी स्पष्ट है। दोनों के गणित बिल्कुल सुसंबद्धित, सुरेखाबद्ध हैं। कवि अस्पष्ट है। कवि तरल है, कवि ठोस नहीं है। कवि दोनों के मध्य है।
अगर विज्ञान वासना है तो धर्म प्रार्थना है और काव्य प्रेम है। लेकिन जिसे भी वासना से प्रार्थना तक जाना हो उसे प्रेम की घड़ी से गुजरना ही होगा।
एक स्त्री अभी गर्भवती नहीं है, सब स्पष्ट है। फिर एक दिन उसको बच्चा पैदा हो जाएगा, मां बन गई, तब भी सब स्पष्ट हो जाएगा। लेकिन दोनों के मध्य में वह जो नौ महीने का गर्भ है, सब अस्पष्ट रहेगा, धुंधला-धुंधला रहेगा। कुछ-कुछ एहसास भी होगा कि है, मगर कौन है? बेटा होनेवाला है कि बेटी होनेवाली है? सुंदर होगा, असुंदर होगा? बुद्धू होगा, बुद्धिमान होगा? काला होगा, गोरा होगा? सब अस्पष्ट है? कुछ पकड़ में नहीं आता।
प्रेम की अवस्था गर्भ की अवस्था है। वासना प्रार्थना बनने के मार्ग पर जब चलती है तो यह पड़ाव आता है। यह पड़ाव शुभ है। घबड़ाओ मत।
और हर चीज को स्पष्ट करने की जरूरत भी क्या है? कुछ तो अस्पष्ट रहने दो! यह हमें कैसा पागलपन पकड़ा है. . .सारी दुनिया का पकड़ा है, कि हर चीज स्पष्ट होनी चाहिए! एक महान रोग आदमी को सता रहा है कि हर चीज को स्पष्ट करो। और जो चीज स्पष्ट न होती हो वह हमको इतनी बेचैनी देती है कि बजाए इसके हम स्वीकार करने के कि वह अस्पष्ट है, यही स्वीकार करना पसंद करेंगे कि वह है ही नहीं।
इसलिए बहुत-से तथ्यों को विज्ञान ठुकराता है। ठुकराने का कारण यह नहीं है कि वे तथ्य नहीं हैं और कारण यह भी नहीं है कि उन तथ्यों की प्रतीति नहीं होती विज्ञान को। मगर मजबूरी यह है कि वे स्पष्ट नहीं होते; धुंधले-धुंधले हैं। और विज्ञान जब तक स्पष्ट न हो जाए, कोई चीज पकड़ेगा नहीं। स्पष्टता के लिए उसने कसम खा रखी है। उसने एक आबद्धता मान रखी है, एक कमिटमेंट, प्रतिबद्ध हो गया है--कि स्पष्ट तो होना ही चाहिए। उसने स्पष्टता की बलिवेदी पर सब कुछ चढ़ा दिया है। तो जो स्पष्ट नहीं है, वह इंकार कर देना है।
प्रेम बड़ी अस्पष्ट घटना है--रहस्यपूर्ण, धुंधली-धुंधली, तरल। रूप उसके बदलते हैं, रोज-रोज बदलते हैं, प्रतिपल बदलते हैं। सिर्फ आभास ही अनुभव होता है। एक छाया मात्र अनुभव होती है।
योग चिन्मय! यह तुम्हारी ही कठिनाई नहीं है, यह उन सभी साधकों की कठिनाई है जो वासना से प्रार्थना की तरफ चलेंगे। और सभी को चलना है, क्योंकि सभी वासना में पैदा हुए हैं और सभी को प्रार्थना पर पहुंचना है। बीच में यह पड़ाव आएगा--जब वासना छूट गई और प्रार्थना अभी आई नहीं। वह जो बीच का रिक्त स्थान है, उस रिक्त स्थान को सहने का नाम ही तपश्चर्या है। उस रिक्त स्थान में धैर्य रखना ही तपश्चर्या है।
उस रिक्त स्थान में भी शांत बने रहना, अनुद्विग्न, अति आकांक्षा न करना स्पष्टता की, क्योंकि अगर अति आकांक्षा करोगे स्पष्टता की, तो संभव है, वापिस लौट जाओगे। वासना में वापिस गिर जाओगे। क्योंकि वासना ही परिचित है। फिर स्पष्ट हो जाएंगी सब बातें। प्रार्थना तो बिल्कुल अपरिचित है, अज्ञात लोक है। लेकिन अगर कोई धैर्यपूर्वक प्रेम के गर्भ में नौ महीने रह जाए तो उसका एक नया जन्म होता है, प्रार्थना का जन्म होता है, भक्त का आविर्भाव होता है।
और प्रार्थना फिर स्पष्ट है, सब स्पष्ट है; खुली सूरज की धूप में, जैसे सब स्पष्ट है, ऐसा सब स्पष्ट है। कुछ भी छिपा नहीं, कुछ भी अस्पष्ट नहीं। हालांकि तुम कह न पाओगे, इतना भेद है। वासना की स्पष्टता ऐसी है कि कही जा सकती है; प्रार्थना की स्पष्टता ऐसी है कि तुमसे इतनी बड़ी है कि तुम न कह पाओगे। यह मत सोचना कि बुद्ध ने नहीं कहा, इसलिए उन्होंने नहीं जाना। जाना तो जरूर, लेकिन कहा नहीं। क्योंकि जानना जाननेवाले से बड़ा था। इसलिए चुप रह गए।
वासना को बड़े मजे से कहा जा सकता है, कोई भी कह सकता है। पशु -पक्षी भी निवेदन कर देते हैं, आदमी की तो बात ही छोड़ दो। वासना के निवेदन में लगता ही क्या है; कोई बड़ी कला, कोई बड़ी कुशलता, कोई प्रतिभा, कोई बहुत बुद्धिमान होना आवश्यक नहीं है। बुद्धू भी अपनी वासना प्रकट कर देते हैं। वासना बड़ी छोटी है, क्षुद्र है। प्रार्थना विराट है, आकाश जैसी है। प्रकट न कर सकोगे, लेकिन यह ध्यान रखना कि प्रार्थना स्पष्ट पूरी हो जाती है।
जब तुम आकाश की तरफ देखते हो तो क्या तुम सोचते हो आकाश स्पष्ट नहीं है? स्पष्ट है, लेकिन किस शब्द में समाओ इसे? जब करोड़-करोड़ तारों के सौंदर्य को तुम देखते हो तो क्या कुछ अस्पष्ट है? सब स्पष्ट है। और स्पष्ट ज्यादा क्या होगा? मगर कैसे बांधो इसे, कैसे कहो? इसका निर्वाचन कैसे हो, व्याख्या कैसे हो? जबान लड़खड़ा जाती है। स्वाद इतना बड़ा है कि जबान लड़खड़ा जाती है। वासना भी स्पष्ट, क्षुद्र; प्रार्थना भी स्पष्ट, विराट। प्रेम अस्पष्ट है। प्रेम मध्य में है--न इधर न उधर।
इसलिए योग चिन्मय, ऐसा मत सोचना कि यह धुंधलापन तुम्हें ही अनुभव हो रहा है। इसको अकारण ही अपनी समस्या मत बना लेना। यह सबकी समस्या है। और धन्यभागी हैं वे जिन्हें यह समस्या अनुभव होती है। अधिक को तो यही लगता है कि वासना सब कुछ है। और ऐसा भी नहीं है कि ये वासना से ग्रस्त लोग प्रार्थना न करते हों; मगर इनकी प्रार्थना झूठी है, इनका मंदिर औपचारिक है। ये कभी-कभी प्रार्थना भी कर आते हैं, मगर इनकी प्रार्थना भी वासना का ही एक नाम है। प्रार्थना के बहाने भी परमात्मा से कुछ मांग आते हैं--कि यह दे देना, वह दे देना, कि नौकरी मिल जाए कि धन मिले कि पद मिले कि प्रतिष्ठा मिले। इनकी प्रार्थना भी वासना का ही प्रच्छन्न रूप है। इनको कुछ पता नहीं है। ये अभागे हैं।
इस संसार में जिसने वासना को ही जाना, मांगना ही मांगना जाना, उससे बड़ा अभागा कोई भी नहीं, क्योंकि वह भिखमंगा है। उसकी स्थिति बड़ी दयनीय है। उसे कभी अपने सम्राट होने का अनुभव नहीं हो पाता। सम्राट होने का अनुभव तो प्रार्थना में होता है, क्योंकि प्रार्थना में भक्त भगवान से भिन्न नहीं रह जाता, एक हो जाता है।
वासना में प्रेमी और प्रेयसी क्षण-भर को मिलते हैं, क्षुद्र है मिलन और फिर लंबा बिछोह है, फिर विषाद है। प्रार्थना में मिलन हुआ सो हुआ--महामिलन है! फिर कोई विरह नहीं, फिर कोई भेद नहीं; अभिन्नता सध जाती है, एकता सध जाती है। अहं ब्रह्मास्मि! तभी कोई घोषणा कर पाता हैः अनलहक! मैं ही परमात्मा हूं!
दोनों के बीच में प्रेम है। प्रेम ऐसा तीर है, जो कहीं भी नहीं जा रहा--न वासना की दिशा में, न प्रार्थना की दिशा में। ठहरा हुआ तीर है। और निश्चित ही ठहरे हुए तीर को देखकर तुम्हारे मन में सवाल उठेगाः यह कहां जाना चाहता है, क्या है इसका स्वभाव क्या है? इसका लक्ष्य है, गंतव्य क्या है? हजार प्रश्न उठेंगे और कोई उत्तर न आएगा। इस तीर को चलाना मत, क्योंकि चलाया कि तुम वासना में ही चला लोगे। इस तीर को रुके रहने देना। घबड़ाहट क्या है, जल्दी क्या है? थोड़ा धीरज सीखो।
इस सदी में एक चीज खो गई है, सबसे बड़ा गुण अगर खो गया है आदमी का तो वह है धीरज। एक बड़ी आतुरता है; सब चीजें जल्दी-जल्दी हो जानी चाहिएं, अभी हो जानी चाहिए।
लोग ध्यान भी करने आते हैं तो कहते हैंः एक सप्ताह में हो जाएगा कि दो सप्ताह रुकना पड़ेगा? जैसे दो सप्ताह रुककर वे मेरे ऊपर कोई अनुकंपा कर रहे हों! ध्यान और तुम दिनों में पूछते हो! हिम्मतवर लोग रहे होंगे पुराने दिनों के, वे जन्मों की भाषा में पूछते थे--कितने जन्मों में होगा? एक जन्म का तो काई सवाल ही न था--कितने जन्मों में होगा ध्यान? हिम्मतवर लोग रहे होंगे। बड़ी छाती रही होगी उनकी।
आज के आदमी के पास छाती तो है ही नहीं। वह तो जैसे इंसटेंट काफी है, अभी बन जाए--ऐसा ही सोचता है, कुछ इंसटेंट ध्यान हो अभी हो जाए। कोई हाथ में ऐसी तरकीब लगे कि बस बिना कुछ किए हो जाए। समय न लगे, शक्ति न लगे। और सबसे बड़ी कठिनाई है कि प्रतीक्षा न करनी पड़े।
प्रतीक्षा खो गई है। और जिस दिन प्रतीक्षा खो जाती है उस दिन परमात्मा खो जाता है। क्योंकि प्रतीक्षा के ही पात्र में परमात्मा उतरता है।
तो योग चिन्मय! प्रार्थना को प्रतीक्षा का अवसर दो। प्रेम उठ रहा है, जल्दी न करो समझने की। समझने की जरूरत ही क्या है? चिन्मय की आदत है, खराब आदत है--हर चीज को व्यवस्थित कर लेने की आदत है। अगर दस पैसे भी खर्च करते हैं तो उसको डायरी में लिखते हैं। बिना लिखे नहीं मानते। लिखते ही रहते हैं। ज्यादा समय इसी में जाता है उनका। फिजूल की बातें लिखते रहते हैं। अच्छे शोधकर्ता हो सकते थे, किसी विश्वविद्यालय में पी-एच० डी० और डी० लिट० मिलता उनको। वे बिल्कुल गलत जगह में आकर पड़ गए हैं यहां। इसी तरह के लोग पी-एच० डी० और डी० लिट० होते हैं--जो लिखते ही रहते हैं, कुछ भी लिखते रहते हैं। वे कोई किताब पढ़ते हैं तो पढ़ते कम हैं, ऐसा मालूम पड़ता है, लेकिन नोट्स ज्यादा लेते हैं। पीछे कभी काम पड़ेंगे। टिप्पणियां लिखते रहते हैं। छोटी-मोटी बात की भी!
ऐसे भूल-चक्र से कुछ कागज एक बार मेरे हाथ में लग गए तो मैं भी चकित हुआ कि ये चिन्मय यह कौन-सा काम कर रहे हैं! अब दस पैसे खर्च ही हो गए, इसमें लिखना क्या है? मगर एक वृत्ति है। और कई जगह ऐसी वृत्ति का बड़ा उपयोग होता है--दुकानदारी में बड़ा उपयोग होता है! हिसाब-किताब की दुनिया में शोधकर्ताओं की दुनिया में इसका बड़ा उपयोग होता है। वहां काम ही यही है कि बस लिखते रहो, इस तरह की कुछ भी छोटी-छोटी बातें इकट्ठी करते रहो, फिर इतनी इकट्ठी कर लो कि कोई पढ़ न सके, तो उस पर डी० लिट० मिलती है। क्योंकि पढ़ने की कौन झंझट करे, तुम डी० लिट० लो! विश्वविद्यालयों में जो शोध पर ग्रंथ लिखे जाते हैं, उनको कोई पढ़ता है? कोई भी नहीं पढ़ता, किसको फुर्सत है, किसको प्रयोजन है?
तो प्रेम से उनको अड़चन हो रही होगी, चिन्मय को, कि यह जो प्रेम है इसको साफ-साफ कैसे नोट करें? किस ढंग से लिखें? इसकी ठीक-ठीक व्याख्या और निर्वचन होना चाहिए।
यह तुम न कर पाओगे। यह होता ही नहीं। यह हो ही नहीं सकता। इस प्रेम को अनुभव करो। इसमें नाचो, इसमें डोलो। इसको तुम्हारे भीतर गुनगुनाने दो। जैसे भौंरा गुनगुन करे, ऐसा इसे गुनगुनाने दो। जल्दी मत करो। पूछो भी मत--कहां जा रहे हो, क्या लक्ष्य है, क्या गंतव्य है, क्या पाओगे, क्या नहीं पाओगे? कुछ भी मत पूछो। इस भौंरे को गुनगुन करने दो। कहीं भी मत जाने दो। एक घड़ी ऐसी है जब यह बिल्कुल ऐसा ही गुनगुन करता रहेगा बिना किसी कारण के। एक सुनिश्चित शक्ति इकट्ठी हो जाएगी जब, तब यह उड़ान भरेगा।
जैसे हवाई जहाज उड़ता है न, आकाश में तो पहले तो जमीन पर चलता है, एकदम से आकाश में नहीं उड़ जाता। तेजी से चलता है, रन-वे पर तेजी से भागता है। फिर एक जगह जाकर रुक जाता है। वही रुकने की घड़ी बड़ी महत्त्वपूर्ण है। फिर रुककर उसका इंजिन और जोर-जोर से गति करने लगता है। उस वक्त अगर तुम पायलेट से पूछो कहां जा रहे हैं हम, तो वह कहेगाः अभी कहीं नहीं जा रहे हैं, अभी जमीन पर हैं। कुछ लोग घबड़ाहट में उसी वक्त समझते हैं कि बस उड़ गए आकाश में।
मुल्ला नसरुद्दीन गया था यात्रा को। जब काफी इंजिन जोर-जोर से भर्र-भर्र भर्र-भर्र करने लगा, तो उसने सोचाः पहुंच गए! घबड़ाहट की वजह से आंख बंद रखे था। आंख खोलकर उसने नीचे देखा, तीन बड़ी छोटी-छोटी चीजें चींटियां मालूम पड़ती थीं। तो उसने अपने पड़ोसी से कहाः मालूम होता है, बहुत ऊपर उड़ आए, आदमी चींटियों जैसे मालूम हो रहे हैं!
उस आदमी ने कहाः ये आदमी नहीं, चींटियां ही हैं! अभी कहीं उड़े-करे नहीं हैं। फिर यह इंजिन इतने जोर से क्यों चल रहा है? वह पूछने लगा।
एक त्वरा लेनी पड़ती है। एक मूमेंटम चाहिए। एक खास गति पर आकर, जैसे सौ डिग्री पर पानी भाप बन जाता है, ऐसे इंजिन एक खास त्वरा लेता है और उस त्वरा पर ही छलांग मार सकता है।
ऐसे ही प्रेम एक त्वरा लेता है प्रतीक्षा में। भनभन होगी, गुनगुन होगी। ऊर्जा इकट्ठी होती रहेगी। वासना में ऊर्जा का क्षय है। इसलिए वासना से जब तुम मुक्त होओगे तो ऊर्जा को इकट्ठा करने के लिए थोड़ा समय देना होगा। वासना में ऊर्जा का अधोगमन है। इसके पहले कि ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन शुरू हो, तुम्हें बीच में एक अवसर देना होगा, जब ऊर्जा संगृहीत हो जाए, एक सरोवर बन जाए। और ऊर्जा उठती जाए, उठती जाए, उठती जाए, एक घड़ी आएगी ऐसी जब तुम अचानक पाओगे कि वायुयान आकाश में उठ गया! वासना की पृथ्वी से छूट गए, प्रार्थना का आकाश मिल गया। मगर मध्य में एक प्रतीक्षा थी। उस प्रतीक्षा से बचना मत। और उस प्रतीक्षा को जल्दी ही समझने का भी उपाय मत करना, अन्यथा भूल हो जाएगी।
यह शुभ घड़ी है कि तुम प्रेम के अनिर्वचनीय रहस्य को अनुभव कर रहे हो। होने दो संगृहीत, शीघ्र ही प्रार्थना का भी जन्म सुनिश्चित है।

तीसरा प्रश्नः भगवान! अकेलापन इतना महसूस हो रहा है कि घबड़ा जाती हूं और उदासी घेर लेती है। क्या करूं? प्रभु, मार्ग-दर्शन करें!

धर्म भारती! अकेलापन हमारी आत्यंतिक नियति है, उससे बचने का कोई उपाय नहीं है। अकेले हम हैं और बचने की जितनी हम चेष्टाएं करते हैं, वही तो संसार है। और बचने की चेष्टाएं सब व्यर्थ हो जाती हैं, वही तो वैराग्य है। और जब हम बचने की सारी चेष्टाएं छोड़ देते हैं, वही तो ध्यान है!
अकेले हम हैं और चाहते हैं कि अकेले न हों, यहीं से भूल शुरू होती है। क्यों? अकेले होने में क्या कठिनाई है? अकेले होने में बेचैनी क्या है?अकेले होने में भय क्या है? अकेले होने में बुराई क्या है? अकेले होने में दुःख तुमसे किसने कहा है? जाननेवाले तो कुछ और कहते हैं। पूछो नानक से, कबीर से, मलूक से। पूछो दूलनदास से। जाननेवाले तो कुछ और कहते हैं। जाननेवाले तो कहते हैं कि उस परम एकांत में ही आनंद की वर्षा होती है! अमृत के मेघ झरते हैं! हजार-हजार सूरज निकलते हैं! उस परम एकांत में ही!
लेकिन आदमी भाग रहा है, भाग रहा है; अकेले से डर रहा है। हमें बचपन से ही अकेले होने का भय पकड़ा दिया गया है। किसी बच्चे को मां-बाप अकेला नहीं छोड़ते; कोई-न-कोई मौजूद होना चाहिए। और मां बाप को ज़रा भी खयाल नहीं कि बच्चा नौ महीने तक पेट में बिल्कुल अकेला था, एक बार भी नहीं रोया! एक बार भी चीख-पुकार नहीं मचाई। एक बार भी नहीं कहा कि मुझे बहुत डर लगता है। नौ महीने बिल्कुल अकेला था; अकेला ही नहीं था, गहन अंधकार में था; वहां सूरज की एक किरण भी नहीं जाती।
मगर मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि वे नौ महीने ही बच्चे के जीवन में सर्वाधिक आनंद के दिन थे और उन्हीं की याद के कारण आदमी मोक्ष की तलाश करता है। मनोविज्ञान की तो यह व्याख्या है मोक्ष की तलाश की--कि वे जो नौ महीने बच्चे ने जाने हैं--परम एकांत, शांति के और विराम के--उनकी स्मृति उसका पीछा करती है। उसके अचेतन में अब भी वह याद सरकती है। वे सुखद क्षण अब भी उसकी स्मृति में डोलते हैं। वह सुवास अभी भी उसको घेरे रहती है। और वह उसी की तलाश कर रहा है।
मनोवैज्ञानिकों के हिसाब से तो मोक्ष की खोज गर्भ के एकांत, शून्य, शांत, विराम की खोज है। मनोवैज्ञानिक यह भी कहते हैं, कि आदमी जो सुंदर-सुंदर घर बनाता है वे भी उसी गर्भ की आकांक्षा में बनाए जाते हैं। अच्छा मकान बनाते हैं। अच्छा कमरा बनाते हैं। उसमें खूब फर्नीचर सजाते हैं, गद्दे-गद्दियां लगाते हैं। जितना भी स्वागत करता हुआ मालूम पड़े, जितना ही विश्रामपूर्ण हो, उतना ही अच्छा लगता है।
अमरीका में तो एक नया प्रयोग चल रहा है, जिसमें एक जो प्रयोग महत्त्वपूर्ण है. . .मशीनें अगले महीने तक यहां भी आ जाएंगी और यहां भी ध्यानी उसको शुरू करेंगे। महत्त्वपूर्ण प्रयोग है! इस सदी में जो ध्यान की नई से नई प्रक्रियाएं खोजी गई हैं, उनमें से एक है। एक टैंक बनाया है। वैज्ञानिकों ने--ठीक गर्भ के आधार पर। उसको जमीन के नीचे गड़ा देते हैं। गहन अंधकार होता है उसमें। साउंड-प्रूफ होता है। उसमें कोई आवाज बाहर से भीतर नहीं आती। उसमें जो जल होता है वह ठीक वैसा ही रासायनिक होता है जैसा मां के पेट में जो जल होता है जिसमें बच्चा तैरता है। मां के पेट में जो जल होता है उसमें इप्सम साल्ट की इतनी मात्रा होती है कि बच्चा डूब नहीं सकता।
जैसे तुमने सुना होगा यूरोप में "डेड सी' सागर है। उसको इसलिए मुर्दा सागर कहते हैं कि उसमें कोई डूब नहीं सकता। उसमें मछली भी नहीं होती, क्योंकि मछली भी डूब नहीं सकती उसमें। मछली को होने के लिए डूबना तो जरूरी है, वह पानी के भीतर रहेगी। उसमें कोई डूब ही नहीं सकता। उसमें इप्सम साल्ट की इतनी मात्रा है कि तुम बिना तैरनेवाले को फेंक दो तो भी उसके ऊपर ही उतराता रहेगा। शरीर से पानी का वजन ज्यादा है। शरीर हल्का पड़ जाता है।
मां के पेट में इप्सम साल्ट की इतनी मात्रा होती है कि छोटा-सा बच्चा नहीं तो कभी का डुबकी खा जाए। पेट में पानी ही पानी भरा रहता है। वह जो मां का पेट इतना बड़ा दिखाई पड़ता है, उसमें तुम यह मत सोचना कि इतना बड़ा बच्चे की वजह से दिखाई पड़ता है। उसमें बड़ा कारण तो पानी का भरा होना है।
और तुमने देखा, जब स्त्रियां गर्भवती होती हैं तो नमक ज्यादा खाने लगती हैं! उनको नमकीन चीजें पसंद आने लगती हैं। उसका कुल कारण इतना है कि वह पानी जो भीतर पेट में भरा है उसको नमक ही नमक चाहिए। जितना नमक मिल सके उतना अच्छा। यहां तक हालतें हो जाती हैं कि स्त्रियां दीवालों का चूना निकालकर खाने लगती हैं, मिट्टी खाने लगती हैं--सौंधी मिट्टी जिसमें थोड़ा-नमकीन स्वाद होता है। गांव की स्त्रियां तो अकसर खेत की मिट्टी खा लेती हैं।
उस टैंक में ठीक उतनी ही मात्रा में रासायनिक द्रव्य होते हैं जितने मां के पेट में होते हैं। उस टैंक में आदमी को छोड़ देते हैं। उसमें तुम डूब नहीं सकते। तुम लाख उपाय करो तो नहीं डूब सकते। उसमें तुम तैरते ही रहते हो। और गहन अंधकार और तुम्हारी नाक से बस एक नली जुड़ी रहती है, जैसे मां के पेट में तुम मां से जुड़े रहते हो श्वास लेने के लिए। ऐसे ही बस एक नली जुड़ी रहती है, जिससे आक्सीजन आता रहता है। इस टैंक में घंटे दो घंटे रहने पर अपूर्व अनुभव होते हैं--शांति के, शून्य के, देह-रहितता के। उस टैंक का नाम ही उन्होंने रखा है--समाधि टैंक। उसके लिए कोई और अच्छा नाम मिला भी नहीं, पश्चिम की भाषा में है भी नहीं कोई और अच्छा नाम। उस टैंक में कुछ अर्थ तो है--वैज्ञानिक अर्थ है। उसमें जो दोत्तीन घंटे रह जाता है, उसको पहली दफा फिर से पुनः याद आ जाती है मां के गर्भ में रहने की--और उस शांति की, उस आनंद की।
वैज्ञानिक तो यही कहते हैं कि ध्यान की प्रक्रियाएं भी उसी अवस्था में ले जाती हैं--बिना बाहरी उपकरणों के। ध्यान की प्रक्रिया भी उसी अवस्था में ले जाती है। मोक्ष की स्वर्ग की खोज भी उसी की खोज है। घरों में भी हम जो अपने कमरों को बनाते हैं वे इस ढंग से बनाते हैं कि वे सब तरह से हमें उत्तप्त रखें, प्रसन्न रखें, प्रफुल्ल रखें, शांत रखें। मगर अब तक ठीक-ठीक मां के पेट का अनुभव कोई भी चीज पूरी-पूरी तरह नहीं दे पायी है।
लेकिन मां के पेट में नौ महीने बच्चा अकेला रहता है, न भयभीत होता, न चिंतित होता, न सोचता कि क्लब चले जाएं, कि रोटरी के मेम्बर बन जाएं, कि होटल हो आएं, कि ताश ही खेल लें, कुछ नहीं तो समय काटें, कि चलो फिल्म देख आएं, चलो गपशप करें पड़ोसियों से। कुछ भी नहीं! नौ महीने बिल्कुल सन्नाटा है।
तो एक बात तो निश्चित है कि तुम स्वभाव से एकांत में रहने को बने हो और स्वभाव से एकांत में तुम्हें रस है, कोई दुःख नहीं है। मगर पैदा होते से ही उपद्रव शुरू होता है। जैसे ही बच्चा पैदा होता है वैसे ही उसे दूसरे की जरूरत मालूम होने लगती है। मां के बिना भूखा हो जाता है। मां की जरूरत, मां के स्तन की जरूरत। इसलिए लोगों के मन में मां के स्तन की प्रतीक्षा जीवन-भर बनी रहती है। चित्रकार स्तन बनाते हैं, मूर्तिकार स्तन बनाते हैं; खजुराहो हो कि कोणार्क हो, बस स्तन ही स्तन। और ऐसे स्तन जो कि होते भी नहीं! इतने बड़े-बड़े स्तन कि स्त्रियां चल भी न सकें, चलें तो गिर जाएं! कविताएं स्तन की। हर चीज स्तन के आस-पास घूमती है। कुछ कारण होना चाहिए, गहरा कारण होना चाहिए।
कारण यही है कि बच्चे का पहला अनुभव इस जगत् का स्तन का अनुभव है। और पहला अनुभव महत्त्वपूर्ण अनुभव है। और इस पहले अनुभव की छाप जिंदगी-भर पीछे रहती है।
मैं एक बूढ़े आदमी को देखने गया था। वे मर रहे थे। उनकी उम्र कोई अठहत्तर वर्ष थी। कमरे में कोई भी न था, सिर्फ उनकी पत्नी थी। उन्होंने पत्नी से कहा कि तू बाहर जा मुझे कुछ निजी बात करनी है। उनकी पत्नी बाहर चली गई, मैं भी थोड़ा हैरान हुआ कि निजी बात शायद वे कुछ ध्यान, समाधि। उन्होंने मुझसे कहा कि सिर्फ एक बात पूछनी है कि मैं मरने के करीब आ गया, मौत करीब है, मगर स्त्री के स्तनों में मेरा रस नहीं जाता है! मर रहा हूं, लेकिन वह जो मेरी महिला डाक्टर है, वह देखने आती है तो मौत की भूल जाता हूं, उसके स्तन देखने लगता हूं। तो मैं तुमसे यह पूछता हूं कि मेरे अठहत्तर वर्ष की उम्र, सब जिंदगी देख ली, मगर यह स्तन से मेरा रस क्यों नहीं जाता? इसका कारण क्या होगा? और मैं किसी से पूछ भी नहीं सकता। ऐसे तो मुनि महाराज भी आते हैं, मगर उनसे मैं पूछूं तो वे बहुत नाराज हो जाएंगे। आपसे ही पूछ सकता हूं।
मैंने कहाः यह बात सीधी-सादी है। सच तो यह है कि जैसे जन्म के समय पहली याद स्तन की आती है वैसे अकसर मरते वक्त भी आखिरी याद स्तन की आती है। जिन्होंने इस पर खोजबीन की है पूरब के देशों में, उनका कहना है कि मरते वक्त आदमी आखिरी क्षण में स्तन की याद करते ही मरता है। वही उसकी नए गर्भ में प्रवेश की यात्रा है। वर्तुल पूरा हो गया।
लेकिन बच्चे को स्तन की जरूरत है, बहुत जरूरत है। भोजन भी वही, उष्णता भी वही, प्रेम भी वही। दूसरा मुझे आदर करता है, प्रेम करता है, फिकिर करता है--इसका प्रमाण भी वही। बस धीरे-धीरे शुरू हुआ, दूसरा महत्त्वपूर्ण होने लगा। मां थोड़ी देर को नहीं आती, बच्चा पानी में पड़ गया है या पेशाब कर ली है और गीला कपड़ा हो गया है, तो परेशान हो रहा है; दूसरे की जरूरत है। असहाय बच्चा दूसरे की जरूरत अनुभव करने लगता है।
और मां-बाप भी इसमें मजा लेते हैं कि बच्चा निर्भर हो। कोई जब आप पर निर्भर होता है तो अच्छा लगता है कि आपकी भी दुनिया में कुछ जरूरत है। जब बच्चे अपने पैर पर खड़े हो जाते हैं तो मां-बाप को सच में अच्छा नहीं लगता। ऊपर से तो कहते हैं कि हम बड़े प्रसन्न हैं कि अब तुम अपने पैर पर खड़े हो गए; मगर उनका चेहरा ज़रा गौर से देखो। वे यह कह रहे हैं कि ठीक है; मतलब अब हमारी तुम्हें कोई जरूरत न रही! ऐसे तो ऊपर से बच्चों को शादी-विवाह कर देते हैं, मगर भीतर से विरोध पैदा हो जाता है। इसलिए सास-बहू झगड़ते ही रहते हैं, झगड़ते ही रहते हैं। सास यह बरदाश्त कर ही नहीं सकती कि मेरा बेटा जो सदा मुझ पर निर्भर था आज किसी और स्त्री पर निर्भर हो गया; जिसको बुद्धिमान बनाने में मुझे पच्चीस साल लगे, एक औरत ने पांच मिनिट में बुद्धू बना दिया! इसको सास बरदाश्त करे भी तो कैसे करे! आग जलती है! यह बिल्कुल स्वाभाविक है। कहते हैं कि प्रसन्न रहो, अब अपने पैर पर खड़े हो गए। मगर ज़रा गौर करना उनके चेहरे पर, उनकी भाषा पर, बड़ी मजबूरी में जैसे बात कही जा रही है! चाहेंगे तो अब भी मां-बाप कि बच्चे उन पर निर्भर रहें। चाहेंगे तो वे सदा निर्भर रहें, क्योंकि उनकी निर्भरता में अहंकार की तृप्ति है।
तो मां-बाप पूरी चेष्टा करते हैं कि बच्चा निर्भर हो, हर चीज पर निर्भर हो। बच्चे ही निर्भर नहीं कर लेते हम, हम बड़ों को भी निर्भर करते हैं। स्त्रियां पतियों को बिल्कुल निर्भर कर लेती हैं। ऐसे ऊपर से तो खयाल यही होता है और दिखावा भी यही होता है और शायद पत्नियों को भरोसा भी यही होता है कि हम सेवा कर रहे हैं। वे पति को माचिस भी न उठाने देंगी, पति को सिगरेट भी न उठाने देंगी; वे खुद उठाकर सिगरेट लाएंगी, माचिस जला देंगी। वे इतना निर्भर कर लेंगी पति को कि दो दिन के लिए पत्नी मायके चली जाए तो पति बिल्कुल असहाय है। उसको पता नहीं है कि सिगरेट कहां है कि माचिस कहां है।
मुल्ला नसरुद्दीन एक दिन खोज रहा है चौके में। पत्नी चिल्ला रही है कि बड़ी देर हो गई, तुम्हें नमक भी नहीं मिल रहा! उसने कहाः मैंने करीब-करीब सब डब्बे खोल डाले हैं, नमक का कुछ पता नहीं चल रहा। पत्नी ने कहाः तुम अंधे हो बिल्कुल, आंख के अंधे हो! उम्र तुम्हारी हो गई है मगर मेरे बिना तुम एक इंच नहीं चल सकते हो। अरे सामने ही, जिस डब्बे पर लिखा है मिर्ची, उसी में नमक है।
स्त्रियों के अब अपने ढंग होते हैं कि लिखा है मिर्ची और रखा है नमक। यह उनका सीक्रेट-कोड है। ये पति लाख सिर मारकर मर जाएं, कितने ही शब्दकोशों में देखें, मिर्ची कहीं भी नमक नहीं है।
पति को बिल्कुल निर्भर कर देना जरूरी है। पति भी पत्नी को निर्भर कर लेता है अपने ढंग से--गहने लाकर, नई साड़ियां लाकर। यह एक-दूसरे की निर्भरता पर जी रहा जगत् है। यहां हम एक-दूसरे को निर्भर करते हैं, क्योंकि अच्छा लगता है कि हम पर इतने लोग निर्भर हैं। जितने ज्यादा लोग तुम पर निर्भर हैं तुम उतने बड़े मालूम पड़ते हो। मगर ध्यान रखना, जब तुम दूसरों को निर्भर करोगे तो दूसरे तुम्हें निर्भर करेंगे। यहां गुलामी पारस्परिक होती है। स्वतंत्र होना हो तो किसी को निर्भर मत करना और किसी के निर्भर मत होना। मगर यह जिंदगी का ढांचा ऐसा है कि यहां सब एक-दूसरे के निर्भर हैं और सब चाहते हैं कि एक-दूसरे के निर्भर रहें।
इसलिए धर्म भारती, तुझे अड़चन होती है . . ."अकेलापन इतना महसूस होता है कि घबड़ा जाती हूं।' घबड़ाने का कोई कारण नहीं है। और मैं यह भी नहीं कह रहा हूं कि जंगल जाकर अकेले हो जाओ। मैं तो यह कह रहा हूं कि संसार में ही रहो, मगर अकेले होने से घबड़ाओ मत, अकेले होने का मजा लो। और जब कभी मौका मिल जाए और पतिदेव मछली मारने चले जाएं तो बहुत अच्छा हुआ कि गए। कि पत्नी जाकर पड़ोस में गपशप करने लगे तो बहुत अच्छा हुआ, थोड़ी देर तो अकेले बैठो। थोड़ी देर तो बिल्कुल चुप हो जाओ। बिल्कुल अकेले रह जाओ, जैसे दुनिया में कोई भी नहीं है, तुम्हीं हो बस! तुम्हारा ही अकेला होना है!
और तुम चकित हो जाओगेः उसी चुप बैठने में धीरे-धीरे तुम्हें रस का अनुभव होगा--आत्मरस का! स्वयं की अनुभूति होगी, जो बड़ी प्रीतिकर है, बड़ी सुखदायी है, बड़ी मुक्तिदायी है! फिर तुम्हें उदासी नहीं घेरेगी। फिर अकेलेपन में तुम्हारे भीतर ऐसी प्रफुल्लता होगी, जैसी संग-साथ में भी न होगी। फिर तुम भीड़ में जाओगे तो ऐसा लगेगा कि कब छुटकारा हो। क्योंकि भीड़ है क्या, सिवाय उपद्रव के? शोरगुल के अतिरिक्त और है क्या तुम्हारी भीड़? तुम्हारी पार्टियां और तुम्हारे भोज और तुम्हारे विवाह और तुम्हारे सभा-मंडप सिवाय उपद्रव और शोरगुल के और क्या हैं? उत्सव कहां है? अजीब हालत हो जाती है!
अभी कुछ दिन पहले, दो-चार दिन पहले किसी को पड़ोस में उत्सव मानना है, बेटा पैदा हो गया। बस लगा दिया, जोर से माइक बजाने लगे, फिल्म की बेहूदी धुनें--न जिनमें कोई तुक है न कोई अर्थ है। उछल-कूद! अभी भारतीय फिल्मों में आदमी तो पैदा ही नहीं हुआ है, अभी डार्विन के पहले की ही चल रही हैं फिल्में! उछल-कूद! और जितना उछल-कूद हो उतनी ही ऊंची फिल्म, उतनी ही चलती है। मार-धाड़, उछल-कूद, शोरगुल, शोर-सरापा. . .इसको तुम गीत कहते हो, संगीत कहते हो, उत्सव कहते हो? तो उपद्रव क्या है फिर? फिर उपद्रव किसको कहोगे? फिर तो कोई आदमी शांत बैठा हो तो उसको उपद्रव कहना चाहिए, कि देखो उपद्रवी बैठा है बिल्कुल शांत!
हमें उत्सव मनाना भी नहीं आता, क्योंकि हमें अकेला होना ही नहीं आता है। हमें एकांत में ही रस नहीं है तो हमें रस क्या होगा? उत्सव में भी रस हो सकता है। जहां कुछ ऐसे लोग मिल बैठें जिन सबको एकांत होने का मजा है, तो उत्सव में भी रस होता है। तो दस लोग चुप बैठकर भी ऐसे गहन आनंद के सागर में डूब सकते हैं जिसकी तुम कल्पना भी नहीं कर सकते।
उदासी घेर लेती होगी, क्योंकि उपद्रव को तुमने अब तक उत्सव समझा है। एकांत का गणित सीखो। एकांत की भाषा सीखो।
जिंदगी एक बड़ी अबूझ पहेली है। सबसे बड़ी अबूझ बात यह है कि इस दुनिया में सर्वाधिक आनंद को वे लोग उपलब्ध होते हैं, जो अकेले होने की कला सीख जाते हैं। यहां सर्वाधिक दुःख उनको मिलता है जो अकेले होने की कला नहीं जानते। संन्यास है अकेले होने की कला।
और फिर मैं तुम्हें याद दिला दूं कि अकेले होने से मेरा मतलब भौतिक नहीं होता, बाहरी नहीं होता--कि चले गए पहाड़ पर और अकेले बैठ गए, उससे कुछ भी न होगा। पहाड़ पर बैठकर करोगे क्या? बैठकर गुफा में यही सोचोगे कि पता नहीं, बंबई में कौन-कौन-सी फिल्म लग गई, कि पता नहीं धंधे की क्या हालत है, कि पता नहीं लड़का दुकान ठीक से चला रहा है कि नहीं सोचोगे क्या बैठकर गुफा में, ज़रा मुझे कहो! ज़रा अपने भीतर ही बैठकर, घर में ही आज बैठकर, दरवाजा बंद करके सोचना कि चलो पहुंच गए हिमालय की गुफा में, अब क्या सोचेंगे? तुम बड़े चकित होओगे। तुम सोचोगे तो यही बाजार की बातें। तुम्हारे पास बाजारू मन है, हिमालय पर ले जाकर क्या करोगे? मैं तुमसे कहता हूंः हिमालय वाला मन पैदा करो, फिर बाजार में भी हिमालय होता है। हिमालय भीतर पैदा करो।

प्रिय! मैं हूं एक पहेली भी।

जितना मधु, जितना मधुर हास,

जितना मद तेरी चितवन में,

जितना क्रंदन, जितना विषाद,

जितना विष जग के स्पंदन में,

पी-पी मैं चिर-दुःख-प्यास बनी सुख-सरिता की रंगरेली भी!

मेरे प्रतिरोमों से अवरित

झरते हैं निर्झर और आग,

करतीं विरक्ति-आसक्ति प्यार,

मेरे श्वासों में जाग-जाग;

प्रिय मैं सीमा की गोद पली, पर हूं असीम से खेली भी
तुम सीमा की गोद में हो, लेकिन असीम के हकदार हो। प्रिय मैं सीमा की गोद पली, पर हूं असीम से खेली भी! तुम पृथ्वी पर हो, लेकिन आकाश के मालिक हो। तुम भीड़ में हो, लेकिन अकेले की तुम्हारी संपदा खो मत देना नहीं तो उदासी होगी। नहीं तो बड़ी बेचैनी होगी। और अगर भीड़ में ही रहे और भीड़ में ही जिए और भीड़ में ही मरे, तो तुम्हारी जिंदगी एक लंबी व्यथा होगी। तुम रोते ही रहोगे और रोते ही जाओगे. . .

मैं नीर-भरी दुःख की बदली!

स्पंदन में चिर-निस्पंद बसा,

क्रंदन में आहत विश्व हंसा,

नयनों में दीपक-से जलते

पलकों में निर्झरिणी मचली


मेरा पग-पग संगीत-भरा,

श्वासों से स्वप्न-पराग झरा,

नभ के नव रंग बुनते दुकूल,

छाया में मलय-बयार पली!


मैं क्षितिज-भृकुटि पर घिर धूमिल,

चिंता का भार बनी अविरल,

रज-कण पर जल-कण हो बरसी

नवजीवन-अंकुर बन निकली


पथ को न मलिन करता आना,

पद-चिह्न न दे जाता जाना,

सुधि मेरे आगम की जग में

सुख की सिरहन हो अंत खिली!

विस्तृत नभ का कोई कोना,

मेरा न कभी अपना होना,

परिचय इतना इतिहास यही

उमड़ी कल थी मिट आज चली!
अगर जीवन तुमने यूं ही भीड़-भाड़ में गुजार दिया तो एक दिन तुम इतना ही पाओगे. . . .

परिचय इतना इतिहास यही

उमड़ी कल थी मिट आज चली!

मैं नीर-भरी दुःख की बदली!

लेकिन यह तुम्हारी नियति नहीं है; यह तुम्हारा दुर्भाग्य होगा, दुर्घटना होगी। ऐसा होना नहीं था, होने की कोई अनिवार्यता नहीं थी। तुम चाहते तो जीवन एक आनंद मग्न उत्सव हो सकता था और तुम क्षुद्र विराट की तरफ बढ़ते, सीमा से असीम की तरफ बढ़ते, मर्त्य से अमृत की तरफ बढ़ते। तुम हो इतने विराट! प्रिय में सीमा की गोद पली हूं असीम से खेली भी!
लेकिन एक कुंजी सीखनी ही पड़ेगी, उसी कुंजी से ताले खुलते हैं जीवन के रहस्य के। वह कुंजी हैः एकांत, अंतर एकांत!
चौबीस घंटे में थोड़ा समय निकालो, धर्म भारती! शुरू-शुरू में उदासी लगेगी, लगने देना। पुराना अभ्यास है। शुरू-शुरू में परेशानी लगेगी, लगने देना। लेकिन एक घड़ी चौबीस घंटे में चुपचाप बैठ जाओ, न कुछ करो, न कुछ गुनो, न माला फेरो, न मंत्र जपो, न प्रार्थना करो, कुछ भी न करो। चुपचाप। हां, फिर भी विचार चलेंगे, चलने दो। देखते रहना निरपेक्ष भाव से, जैसे कोई राह चलते लोगों को देखता है, कि आकाश में उड़ती बदलियों को देखता है। निष्प्रयोजन देखते रहना, तटस्थ देखते रहना--बिना किसी सभी लगाव के, बिना निर्णय के, न अच्छा न बुरा। चुपचाप देखते रहना। गुजरने देना विचारों को। आएं तो आएं, न आएं तो न आएं। न उत्सुकता लेना आने में न उत्सुकता लेना जाने में। और तब धीरे-धीरे एक दिन वह घड़ी आएगी कि विचार विदा हो गए होंगे, सन्नाटा रह जाएगा।
सन्नाटा जब पहली दफा आता है तो जैसे बिजली का धक्का लगे, ऐसा रोआं-रोआं कंप जाएगा। क्योंकि तुम प्रवेश करने लगे फिर उस अंतर-अवस्था में, जहां गर्भ के दिनों में थे। यह गहरा झटका लगेगा। तुम्हारा संबंध टूटने लगा संसार से, तुम्हारा संबंध छिन्न-भिन्न होने लगा भीड़-भाड़ से। तुम संबंधों के पार उड़ने लगे। झटका तो भारी लगेगा। जैसा हवाई जहाज उठेगा जब पहली दफा पृथ्वी से तो जोर का झटका लगेगा, ऐसा ही झटका लगेगा। घबड़ाना मत। एक बार पंख खुल गए आकाश में, एक बार उड़ चले, तो अपूर्व अनुभव है, अपूर्व आनंद है!
फिर एकांत कभी दुःख न देगा। एकांत तो क्या, फिर भीड़ भी दुःख न देगी क्योंकि तब भीड़ में भी एकांत बना रहता है। जिसको भीतर सधने की कला आ गई, वह बीच बाजार में खड़े होकर भी ध्यान में हो सकता है। दुकान पर बैठे-बैठे काम करते-करते और भीतर धुन बजती रहेगी निस-बासर! रात-दिन! नींद में भी उसकी धुन बजती रहेगी।
लेकिन अभी मैं समझता हूं, उदासी लगती होगी, घबड़ाहट होती होगी, अकेलापन डराता होगा। ये स्वाभाविक लक्षण हैं। प्रत्येक मनुष्य को इस जगत् की गलत शिक्षणा दी गई है। सम्यक् शिक्षा होगी अगर कभी, तो हम प्रत्येक बच्चे को अकेला होना भी सिखाएंगे। साथ होना भी सिखाएंगे, अकेला होना भी सिखाएंगे। साथ होना इस तरह सिखाएंगे कि अकेलापन मिटे ही नहीं और साथ भी हो जाएं। जैसे जल में कमल होता है और जल छूता नहीं--ऐसे भीड़ में भी रहना और भीड़ को छूने भी मत देना! भीड़ में जाना भी और बचकर निकल भी आना। अपने दामन को बचाकर चले आना। तब एक जीवन की और ही दूसरी अनुभूति है--कबीर ने कहा है--ज्यों कि त्यों धर दीन्ही चदरिया, खूब जतन से ओढ़ी रे चदरिया! फिर दामन पर दाग नहीं लगते। फिर तुम भीड़ में भी रहो तो भी तुम्हारी चादर पर दाग नहीं लगते। जैसी की तैसी परमात्मा के हाथ में लौटा दी जाती है, कि यह लो रखो अपनी चादर, दी थी तुमने, हमने जतन से ओढ़ी, जतन से उपयोग की, मगर कोई दाग नहीं लगे।
किस चादर की बात कबीर कर रहे हैं? यही भीतर के एकांत, यह भीतर के शून्य, यह भीतर के मौन, भीतर के ध्यान. . . .। ध्यान की चादर तुम्हारे पास हो तो तुम्हारे जीवन में वास्तविक जीवन का पहला संस्पर्श होगा। यह हो सकता है।
और धर्म भारती, मेरे पास होकर अगर यह न हो तो समझना कि तुम बहुत बाधाएं डाल रही होओगी इसके होने में। बाधाएं हटा लो। अड़चनें विदा कर दो। यह तो नाव चली ही है, इस पर सवार हो जाओ। पाल खोल दिए गए हैं, हवाएं ले चली हैं इसे। पतवार भी हम नहीं चलाते। पतवार भी कौन चलाए, जब परमात्मा ही हवाओं में बांधकर पालों को और ले जाता है अपने सागर तट पर, तो कौन चिंता करे पतवारों की!
और मैं तुमसे यह नहीं कह रहा हूं, जब मैं परलोक, उस पार, उस गंतव्य की बातें करता हूं तो तुमसे यह नहीं कह रहा हूं कि कल होगा कि परसों होगा कि अगले जन्म में होगा। मैं तुमसे यह कह रहा हूंः यह चाहो तो अभी हो सकता है! यहां हो सकता है। होना ही चाहिए। अपने को संगठित करो अपने को एकजूट करो।

बस मत कर देना अरे पिलाने वाले!

हम नहीं विमुख हो वापस जाने वाले!

अपनी असीम तृष्णा है--तेरा वैभव

अक्षय है अक्षय--अरे लुटाने वाले!

उसके मंदिर पर बैठो तो फिर लौटने की बात ही मत करना। उदासी आए, बेचैनी आए, पीड़ा आए, पुरानी आदतें बल मारें--फिकर मत करना।

बस मत कर देना अरे पिलाने वाले!

हम नहीं विमुख हो वापस जाने वाले!

अपनी असीम तृष्णा है--तेरा वैभव

अक्षय है अक्षय--अरे लुटाने वाले!


हम अलख जगाने आए तेरे दर पै!

हम मिट-मिट जाने आए तेरे दर पै!


इस रिक्त पात्र को भर दे, भर दे, भर दे!

मदहोश हमें तू कर दे, कर दे, करे दे!

हम खड़े द्वार पर हाथ पसारे कब के!

हो जाएं अमर--ऐ अमर हमें तू वर दे!


है एक बिंदु में सिंधु भरा जीवन का;

परिपूरित कर दे मानस सूनेपन का!


फिर और यहां पर पाना ही है खोना,

हंसकर पीने में छिपा प्यास का रोना,

चलने दे, सुख के दौर अरे चलने दे!

भर जाए दुःख से उर का कोना-कोना!

अपना असीम अस्तित्व दिखा दे हमको!

बस लय हो जाना अरे सिखा दे हमको!


तेरी मदिरा का बूंद-बूंद दीवाना!

हम नहीं जानते अपना हाथ हटाना!

इस पथ का अथ है नहीं, न इसकी इति है,


गति है, गति है, गति है बस बढ़ते जाना!


किस ओर चले, है हुआ कहां से आना?

किसने जाना, निजको किसने पहचाना?


माना कि कल्पना और ज्ञान है--माना!

पर अविश्वास का, भ्रम का यहीं ठिकाना!

है एक आवरण, बुना हुआ है जिसमें

दिन-रात और सुख-दुःख का ताना-बाना!


उस ओर? व्यर्थ का यह प्रयास--जाने दे!

पाने दे, हम को मुक्ति यहीं पाने दे!

मैं तुमसे कह रहा हूंः हो सकता है अभी और यहीं! चाहिए कि तुम एकजुट होओ। चाहिए कि तुम्हारे भीतर ऐसी त्वरा हो कि रोआं-रोआं प्यास से भर जाए, कि रोआं-रोआं पुकार से भर जाए। उठना ही मत उसके मंदिर पर बैठ गए तो। इस न उठने के संकल्प को ही मैं संन्यास कहता हूं।


बस मत कर देना अरे पिलाने वाले!

हम नहीं विमुख हो वापस जाने वाले!

अपनी असीम तृष्णा है--तेरा वैभव

अक्षय है अक्षय--अरे लुटाने वाले!


हम अलख जगाने आए तेरे दर पै!

हम मिट-मिट जाने आए तेरे दर पै!

हम आ ही गए तेरे द्वार पर, मिटना हो तो मिटेंगे, लौटेंगे नहीं। इस संकल्प से जो ध्यान में बैठेगा उसका ध्यान सुनिश्चित पूर्ण होना है। आश्वासन है। उसका ध्यान सदा पूरा होता है। उसके ध्यान में कोई बाधा नहीं पड़ती।
परमात्मा चाहता है कि तुम पर ध्यान की वर्षा हो। परमात्मा कंजूस नहीं है, कृपण नहीं है। परमात्मा तो अपात्र को भी देने को तैयार है, मगर हम ऐसे अपात्र हैं कि अपात्र को भी उल्टा रखकर बैठे हैं। अपात्र को तो कम-से-कम सीधा करो।

तेरी मदिरा का बूंद-बूंद दीवाना!

हम नहीं जानते अपना हाथ हटाना!

इस पथ का अथ है नहीं, न इसकी इति है,

गति है, गति है, गति है बस बढ़ते जाना!
ध्यान में बढ़े चलो। न इसका कोई प्रारंभ है और न कोई अंत है। ध्यान की इस अनंत यात्रा पर अपने को गंवा दो, खो जाओ। ध्यान करते-करते ध्यानी न बचे, ध्यान ही बचे। गीत गाते-गाते गीत ही बचे, गायक न बचे। नाचते-नाचते नृत्य ही बचे, नर्तक न बचे। और उसी क्षण मिलन हो जाएगा। भर जाएगा तुम्हारा रिक्त पात्र!


इस रिक्त पात्र को भर दे, भर दे, भर दे!

मदहोश हमें तू कर दे, कर दे, कर दे!

हम खड़े द्वार पर हाथ पसारे कब के,

हो जाएं अमर--ऐ अमर हमें तू वर दे!


है एक बिंदु में सिंधु भरा जीवन का,

परिपूरित कर दे मानस सूनेपन का!

एक क्षण में बरस सकता है सागर, एक क्षण में बूंद सागर हो सकती है; मगर सब तुम पर निर्भर है। अधूरे-अधूरे उपक्रम मत करना, कुनकुने-कुनकुने प्रयास मत करना। जलो तो ऐसे जैसे मशाल दोनों तरफ से जले, एक साथ जले। एक क्षण को भी जलो, मगर पूरे जलो। और उसी क्षण में घटना घट जाती है।


उस ओर? व्यर्थ का यह प्रयास--जाने दे!

पाने दे, हम को मुक्ति यहीं पाने दे!

मैं तुमसे कहता हूंः यहीं मुक्ति है, यहीं मोक्ष है। मोक्ष एक मनोविज्ञान है। मुक्ति मन की एक अपूर्व दशा है। नरक भी यहीं है; वह है तुम्हारे गलत जीने का ढंग। स्वर्ग भी यहीं है; वह है तुम्हारे ठीक जीने का ढंग और मोक्ष भी यहीं है, वह है तुम्हारे परमात्मा में जीने का ढंग। अपने को खोकर जो परमात्मा में जीता है वह मुक्त है।

अंतिम प्रश्नः भगवान! आनंद और अनुग्रह से हृदय भर गया है। क्या करूं, क्या न करूं? कैसे धन्यवाद दूं?

गाओ, गुनगुनाओ, नाचो, रोओ।


ओ विभावरी!

चांदनी का अंगराग,

मांग में सजा पराग,

रश्मित्तार बांध मृदुल चिकुर-भार री!

ओ विभावरी!

अनिल घूम देश-देश,

लाया प्रिय का संदेश,

मोतियों के सुमन कोष वार-वार री!

ओ विभावरी!

लेकर मृदु ऊर्म्मबीन,

कुछ मधुर करुण नवीन,

प्रिय की पदचाप-मदिर गा मलार री!

ओ विभावरी!

बहने दे तिमिर भार

बुझने दे यह अंगार,

पहिन सुरभि का दुकूल वकुलहार री!

ओ विभावरी!
आनंद उठा, अनुग्रह उठा, तो गाओ, छेड़ो इकतारा। फिकिर भी मत करना छंद की, मात्राओं की। मस्ती हो तो काफी है। गाओ तो इसकी चिंता मत करना कि कंठ है या नहीं कोकिल का। भाव हो तो काफी। नाचो तो मत फिकर करना कि नाच आता है या नहीं। अलमस्ती हो तो काफी।
फिर, धन्यवाद जिसे हम देने चले हैं वह कोई पराया नहीं है--तुम्हारा ही अंतर्भाव है। परमात्मा तुममें विराजमान है।

तुम मुझ में प्रिय! फिर परिचय क्या!

तारक में छबि प्राणों में स्मृति,

पलकों में नीरव पद की गति,

लघु उर में पुलकों की संसृति,

भर लायी हूं तेरी चंचल

और करूं जग में संचय क्या?


तेरा मुख सहास अरुणोदय,

परछाईं रजनी विषादमय,

यह जागृति वह नींद स्वप्नमय,

खेल-खेल थक-थक सोने दो,

मैं समझूंगी सृष्टि-प्रलय क्या!


तेरा अधर-विंचुम्बित प्याला,

तेरी ही स्मित मिश्रित हाला,

तेरा ही मानस मधुशाला,

फिर पूछूं क्या मेरे साकी!

देते हो मधुमय-विषमय क्या?


रोम-रोम में नंदन पुलकित,

सांस-सांस में जीवन शत-शत,

स्वप्न-स्वप्न में विश्व अपरिचित,

मुझ में नित बनते-मिटते प्रिय!

स्वर्ग मुझे क्या निष्क्रिय लय क्या?


हारूं तो खोऊं अपनापन,

पाऊं प्रियतम में निर्वासन,

जीत बनूं तेरा ही बंधन,

भर लाऊं सीपी में सागर

प्रिय! मेरी अब हार-विजय क्या?


चित्रित तू मैं हूं रेखा-क्रम,

मधुर राग तू मैं स्वर-संगम,

तू असीम मैं सीमा का भ्रम,

काया-छाया में रहस्यमय!

प्रेयसि-प्रियतम का अभिनव क्या?
वही प्यारा है, वही प्रेयसी है! वही है गायक, वही है गीत! तुम मुझ में प्रिय! फिर परिचय क्या! किसको निवेदन करें? किसके चरणों में फूल चढ़ाएं? चरण भी उसके, फूल भी उसके, चढ़ानेवाला भी उसका। लेकिन फिर भी, जब अहोभाव उठता है तो अहोभाव प्रगट होना चाहता है। तो गाओ, नाचो, गुनगुनाओ. . .।


ओ विभावरी!

चांदनी का अंगराग,

मांग में सजा पराग,

रश्मित्तार बांध मृदुल चिकुर-भार री!

ओ विभावरी!


अनिल घूम देश-देश,

लाया प्रिय का संदेश,

मोतियों के सुमन-कोष वार-वार री!

ओ विभावरी!


लेकर मृदु ऊर्म्मबीन,

कुछ मधुर करुण नवीन,

प्रिय की पदचाप-मदिर गा मलार री!

ओ विभावरी!


बहने दे तिमिर भार,

बुझने दे यह अंगार,

पहिन सुरभि का दुकूल वकुलहार री!

ओ विभावरी!


आज इतना ही।