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शुक्रवार, 19 मई 2017

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-08

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक 08 जून सन् 1980ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-आट्ठवां-
(प्रश्न-सार)

01—मीरा मेरी प्रेरणा-स्रोत रही है और कृष्ण मेरे इष्टदेव। शांत क्षणों में मैंने भी मीरा जैसे भक्ति-भाव की कल्पना तथा चाह की है और उसी के अनुरूप कुछ प्रयास भी किया। मगर प्राणों में उतनी पुलक नहीं उठी कि मैं नाच सकूं। फिर मैं आपके संपर्क में आया; आपका शिष्य हुआ। मैं तरंगित हुआ; मैं रोया; मैं हंसा। मगर कृष्ण से अब कुछ लगाव नहीं रहा। अब तो उस छवि के पास आते और आंखें मिलाते भी संकोच लगता है, जिसे मैंने वर्षों पूजा, जिसकी अर्चना की। यह क्या है भगवान?
02—उज्जैन के सिंहस्थ मेले में उस स्थान पर काफी भीड़ होती थी जहां नागा साधु लैंगिक प्रदर्शन करते थे। जैसे लिंग से बांध कर जीप गाड़ी को खींचना, आदि। क्यों नग्न प्रदर्शन करने व देखने में लोग उत्सुक होते हैं और उनकी तारीफ करते हैं? और जब आपके आश्रम में ऐसा कोई कृत्य नहीं होता, फिर भी लोग क्यों आप पर और आपके आश्रम पर नाराज हैं?
03—मैं जल्दी से जल्दी दुख से मुक्ति चाहता हूं और मोक्ष का आनंद भी। कोई मार्ग बतावें।

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-07

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक 07 जून सन् 1980ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-सातवां-
(प्रश्न-सार)

1--आप सत्य को जैसा है वैसा ही कह देते हैं--दो टूक। इसीलिए आपके शत्रु पैदा हो जाते हैं। जैसे आपने कल दयानंद के संबंध में कहा। बात सच है पर चुभती है। क्या आप ऐसे संबंधों में चुप ही रहें तो ठीक न हो?
2—आपने कहा कि आप भारत-रत्न होना पसंद नहीं करेंगे। कृपया बताएं कि क्या आप विश्व-रत्न होना पसंद करेंगे?
3—आप किसी प्रश्न का उत्तर लंबा और किसी का अति संक्षिप्त क्यों देते हैं?
4—पंद्रह साल बीत चुके पर आपका कोई शिष्य बुद्धत्व को उपलब्ध नहीं हुआ। कृपा करके समझाइए।
5—मेरा मन कहता है कि संन्यास मत लो पर भीतर और कुछ कह रहा है--यह मौका बार-बार नहीं आएगा।
6—आपके प्रवचनों से यह लगता है कि आप ब्रह्मचारियों के विरोध में हैं, नीति-नियमों और आदर्शों के विरोध में हैं। ऋषि-मुनियों और साधु-संतों की आलोचना भी आप निरंतर करते रहते हैं। शास्त्रों से भी मुक्त होने को आप कहते हैं। आखिर आपका अभिप्राय क्या है? आपका धर्म क्या है? समाज के लिए कुछ नीति-नियमों का आप विधान करेंगे?

गुरुवार, 18 मई 2017

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-06

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक 06 जून सन् 1980,
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-छट्ठवां-
(प्रश्न-सार)

1--प्रवचन में फल के बारे में आपने कहा कि मैं चुप रह गया और कुछ नहीं बोला। भगवान, इतने सालों से आपने इतने फल खिलाए हैं कि अब न तो कुछ बोलने को रहा है, न कुछ पूछने को। सब कुछ मिल गया है। अब तो बस आपकी अनुकंपा मात्र रह गई है। आपका लाखों, करोड़ों, अरबों बार अनुग्रह, उपकार!

2--मैं नहीं जानता कि यहां क्या पाने आया हूं, लेकिन कुछ पाने की इच्छा है। क्या मिलेगा? कृपया बताएं।

3--मैं ध्यान करने की अथक चेष्टा कर रहा हूं, पर सफलता हाथ नहीं लगती है। क्या करूं?

4--आप कहते हैं कि इस सदी का मनुष्य सबसे ज्यादा प्रौढ़ है। तो यह मनुष्य आपको क्यों नहीं समझ पा रहा है? कृपया समझाने की अनुकंपा करें।

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-05

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक 05 जून सन् 1980,
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-पांचवा-(प्रश्नसार)

पहला प्रश्न: भगवान!
आपको सुनते-सुनते रोना आ जाता है। अब सक्रिय ध्यान के उत्सव के समय पर रोना फूट पड़ता है। यह क्या है? ध्यान के बीच-बीच ऐसा भाव जगता है कि यह शरीर अब रुकावट है; यह कैसे छूटे--ऐसा भाव सघन होता जाता है। यह क्यों? समझाने की अनुकंपा करें।

अक्षय विवेक!
मनुष्य को ऐसे गलत संस्कार दिए गए हैं कि न तो वह जी भर कर कभी रोया है, न जी भर कर कभी हंसा है। जी भर कर जीया ही नहीं है। किसी पहलू से, किसी आयाम में, जी भर कर कोई काम किया ही नहीं, सब अधूरा-अधूरा है! और इसलिए भीतर बहुत सी चीजें त्रिशंकु की भांति लटकी रह जाती हैं।

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-04

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक 04 जून सन् 1980,
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-चौथा

प्रश्न-सार:

1—आप मेरी सुहागरातों के मालिक हैं। मुझे कभी वैधव्य का दुख देना ही नहीं। बस इतनी ही चाह है--जीओ हजारों साल!

2—मैं नौ वर्षों से आर्यसमाज में पुरोहित था। पांच वर्षों से आपके संपर्क में हूं। मैं पांच जून को संन्यास लेकर जा रहा हूं। मैं आर्यसमाज से घूमने के बहाने पच्चीस दिन की छुट्टी लेकर यहां आया था। अब मैं माला लेकर जाऊंगा। वे लोग मेरे दुश्मन हो जाएंगे, मुझे धक्के देकर वहां से निकाल देंगे। ऐसी अवस्था में मैं क्या करूं?

3—हम कैसे आपसे जुड़ जाएं? कृपया बतलाएं।

4—आप स्त्रियों के प्रति सामान्यतः अत्यंत करुणा भाव से सराहना करके उनको सम्मान देते हैं। मगर जब स्त्री की बात पत्नी के रूप में करते हैं, तब उसे डांटते हैं और बहुत अलग रूप में चित्रित करते हैं। ऐसा क्यों?

5मेरे पति आपके संन्यासी हैं, मुझे कोई एतराज नहीं। वे मुझे आपके प्रवचनों में, कीर्तन, ध्यान, शिविर और पूना तक के कार्यक्रमों में साथ भी लाते हैं। मैंने आपका संन्यास अभी तक नहीं लिया है, फिर भी वे लेने को मजबूर नहीं करते हैं। मगर मेरी शिकायत सिर्फ इतनी है कि वे न सिनेमा देखने जाते हैं, न साथ घूमने निकलते हैं; घर में ही चुपचाप बैठे रहते हैं; और खुले आकाश को ताकते रहते हैं। बातचीत में कोई उत्सुकता नहीं रखते। ज्यादा समय आपकी बातों में ही पड़े रहने का क्या मतलब? मैं भी उनकी पत्नी हूं, जरा मेरी भी सुनें!

बुधवार, 17 मई 2017

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-03

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो
दिनांक 03 जून सन् 1980,
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-तीसरा

प्रश्न-सार

01-आपकी हत्या करने के प्रयास की आलोचना किसी भी अखबार वाले ने नहीं की, न ही किसी उच्च दर्जे के व्यक्ति ने कुछ वक्तव्य दिया!
बुद्धिजीवी और साधारणजन, सब के सब उपेक्षा से क्यों भरे हैं?
02-मैं एक ज्योतिषी हूं, किंतु आपके विचार सुन कर ऐसा लगता है कि यह गलत और धोखे का धंधा छोड़ दूं। आपका आशीष चाहिए।

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-02

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो
दिनांक 02 जून सन् 1980,
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-दूसरा

प्रश्न-सार

01-आह कितना आनंद! आह कितनी पीड़ा!
02-आप कहते हैं कि दुखी व्यक्ति ज्यादा भोजन करते हैं, इसलिए मोटे हो जाते हैं। फिर महात्मागण मोटे क्यों होते हैं?
03-मैं आपका संन्यास लेने से बहुत ही डरता हूं। कृपया अपनी शराब कुछ ऐसी पिलाएं कि मैं साहस कर सकूं!
04-क्या धर्मगुरु सच ही बुद्धू होते हैं?

पहला प्रश्न: भगवान!
आह कितना आनंद! आह कितनी पीड़ा!

विनोद भारती!
जीवन की झाड़ी में जहां गुलाब के फूल खिलते हैं, वहां कांटे भी खिलते हैं। लेकिन फूल खिलें तो कांटे भी प्रीतिकर हैं, पीड़ा भी मधुर है। कांटे दुखदायी हो जाते हैं जब फूल नहीं खिलते, कांटे ही कांटे बचते हैं। कांटों में दुख नहीं है, फूलों के अभाव में दुख है। फूलों के साथ खिलें--जी भर कर खिलें--तो फूलों के सौंदर्य को बढ़ाते हैं, फूलों को पृष्ठभूमि देते हैं।

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-01

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो
दिनांक 01 जून सन् 1980,
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-पहला
प्रश्न-सार
01-नयी प्रवचनमाला का शीर्षक है: पिय को खोजन मैं चली। हमें इसका आशय समझाने की अनुकंपा करें!
02-मैं जिंदा हूं या नहीं, कुछ समझ में नहीं आता है!

पहला प्रश्न: भगवान! 
नयी प्रवचनमाला का शीर्षक है: पिय को खोजन मैं चली। हमें इसका आशय समझाने की अनुकंपा करें!

आनंद प्रतिभा!
पलटू का प्रसिद्ध वचन है:
पलटू दिवाल कहकहा, मत कोई झांकन जाय।
पिय को खोजन मैं चली, आपुई गई हिराय।।
यह कहानी तुमने सुनी होगी कि चीन की दीवाल के एक खास स्थल पर एक चमत्कारपूर्ण घटना घटती है। कहानी ही है, लेकिन अर्थपूर्ण है। दीवाल के उस खास स्थल पर जो भी चढ़ कर दूसरी तरफ झांकता है, जोर से हंसता है और कूद पड़ता है, फिर लौटता नहीं। बहुत लोग उस दीवाल पर यह कस्त करके झांकने गए कि न तो हम हंसेंगे, न हम कूदेंगे।

पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-10


पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो
दिनांक: 20 जनवरी, सन् 1981
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-दसवां-(ध्यान का दीया जलाओ)

पहला प्रश्न: भगवान,
कहते हैं कि कामनाएं मूलतः तीन ही हैं--संभोग, संपत्ति और शक्ति की कामनाएं। शेष सब इनकी ही संतान हैं। इनमें भी फ्रायड संभोग को बुनियादी बताते हैं; माक्र्स संपत्ति को; और एडलर शक्ति को। और हालांकि तीनों अपने-अपने ढंग से सही मालूम पड़ते हैं, तो भी उलझन नहीं मिटती।
भगवान, फ्रायड, माक्र्स और एडलर के इस विवाद में--विवादी नहीं रहे, पर विवाद जारी है--मैं आपको पंच चुनता हूं। क्या आप पंचायत करेंगे? यदि हां, तो आपका पंच-फैसला क्या होगा?

अखिलानंद,

पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-09

पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक: 19 जनवरी, सन् 1981
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-नौवा-(जिन डूबे तिन ऊबरे)

पहला प्रश्न: भगवान,
इधर आप भगवान की जगह भगवत्ता और धर्म की जगह धार्मिकता की बात कर रहे हैं। हमें भगवत्ता और धार्मिकता को विशद रूप से समझाने की कृपा करें।

पूर्णानंद,
भगवत्ता एक सत्य है; भगवान एक कल्पना। भगवत्ता एक अनुभव है; भगवान, एक प्रतीक, एक प्रतिमा। जैसे तुमने भारत माता की तस्वीरें देखी हों। कोई चाहे तो प्रेम की तस्वीर बना ले। लोगों ने प्रभात की तस्वीरें बनाई हैं, रात्रि की तस्वीरें बनाई हैं। प्रकृति को भी रूपायित करने की चेष्टा की है। काव्य की तरह वह सब ठीक, लेकिन सत्य की तरह उसका कोई मूल्य नहीं।

पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-08


पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक: 18 जनवरी, सन् 1981
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-आठवां-(एक अभिनव धर्म चाहिए)

पहला प्रश्न: भगवान,
आपने महाकवि रवींद्रनाथ ठाकुर के उत्तर में कहा कि सात आसमानों के पार कोई व्यक्तिवाची ईश्वर नहीं है जो तुम्हारी प्रार्थना सुने; सब प्रार्थनाएं अनसुनी रह जाती हैं।
महाकवि ने अनगिनत प्रार्थना के गीत गाए; पता नहीं, किसी ने उन्हें सुना या नहीं; लेकिन मुझे लगता है, उनकी एक प्रार्थना जरूर सुनी गई। प्रार्थना इस प्रकार है:
आमि हब ना तापस, हब ना, हब ना, येमनी बलुन यिनि।
आमि हब ना तापस निश्चय यदि ना मेले तपस्विनी।
आमि करेछि कठिन पन, यदि ना मिले बकुलवन
यदि मनेर मतन मन ना पाई जिनि
तबे हब ना तापस, हब ना, यदि ना पाइ से तपस्विनी।
आमि त्यजिब ना घर, हब ना बाहिर उदासीन संन्यासी
यदि घरेर बाहिरे ना हासे केहइ भुवन-भुलानो हासि।
यदि ना उड़े नीलांचन मधुर बातासे विचंचल,
यदि ना बाजे कांकन मन रिनिक-झिनि--
आमि हब ना तापस, हब ना, यदि ना पाइगो तपस्विनी।
आमि हब ना तापस, तोमार शपथ, यदि से तपेर बले
कोनो नूतन भुवन न पारि गड़िते नूतन हृदयत्तले
यदि जागाए वीणार तार कारो टुटिया मरम-द्वार,
कोनो नूतन आंखिर ठार ना लइ चिनि
आमि हब ना तापस, हब ना, हब ना, ना पेले तपस्विनी।

पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-07

पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक: 17 जनवरी, सन् 1981
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-सातवां-(प्रार्थना नहीं—ध्यान)

पहला प्रश्न: भगवान,
महाकवि रवींद्रनाथ ने अपने अंतिम दिनों में एक प्रश्नवाचक कविता लिखी जो इस प्रकार है:
भगवान तुमि युगे युगे
दूत पठायेछ बारे बारे
दयाहीन संसारे
तारा बले गेल, क्षमा करो सबे,
बले गेल, भालोबासो, अंतर हते
विद्वेषविष नाशो।
वरणीया तारा स्मरणीया तारा,
तबुओ बाहिर-द्वारे
आजि दुर्दिने फिरानु तादेर
व्यर्थ नमस्कारे।
आमि ये देखेछि, गोपनहिंसा कपट रात्रि-छाये हनेछे निःसहाए
आमि ये देखेछि, प्रतिकारहीन शक्तेर अपराधे विचारेर वाणी नीरवे निभृते कांदे
आमि ये देखेनु, तरुण बालक उन्माद हये छूटे
की यंत्रणाय मरेछे पाथरे निष्फल माथाकूटे।।
कंठ आमार रुद्ध आजिके, वांशि संगीतहारा अमावश्यार कारा
लुप्त करेछे आमार भुवन दुःस्वप्नेर तले; ताइ तो तोमाय शुधाइ अश्रुजले--
याहारा तोमार बिषाइछे वायु, निभाइछे तब आलो,
तामि कि तादेर क्षमा करियाछ, तुमि कि बेसेछ भालो?
"भगवान, इस दयाहीन संसार में तुमने युगऱ्युग में बार-बार दूत भेजे हैं। वे कह गए, सबको क्षमा करो; वे बोल गए, सबको प्रेम करो--अंतस से विद्वेष के विष का नाश करो। वे पूजनीय हैं, वे स्मरणीय हैं; तो भी आज इस अशुभ समय में बाहर के दरवाजे से एक निरर्थक नमस्कार कर उन्हें लौटा दिया है।
मैंने देखा है, हिंसा और कपट ने रात्रि की छाया में छिपकर असहायों को मारा है। मैंने देखा है, शक्तिशाली के अपराध से, जिसका प्रतिकार न किया जा सके, न्याय की वाणी निभृत एकांत में रोती है। मैंने देखा है, तरुण बालक को पागलों की तरह भागते हुए; वह पत्थर पर व्यर्थ माथा पटककर कितनी यंत्रणा सहकर मरा है।
आज मेरा कंठ बंद है, बांसुरी का संगीत सोया हुआ है; अमावस्या के कारागृह ने मेरे भुवन को दुखस्वप्न में लुप्त कर दिया है। इसलिए तो आंखों में आंसू भरकर तुमसे पूछता हूं कि ये जो लोग तुम्हारी वायु को विषाक्त कर रहे हैं, तुम्हारे प्रकाश को बुझा रहे हैं, तुमने क्या उन्हें क्षमा किया है, तुमने क्या उन्हें प्यार किया है?'
भगवान, आपका महाकवि को क्या उत्तर है?

आनंद मैत्रेय,

मंगलवार, 16 मई 2017

पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-06

पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक: 16 जनवरी, सन् 1981
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-छट्ठवां-(पीए बिना कोई मार्ग नहीं)

पहला प्रश्न: भगवान,
सजनां ने फूल मारया
सानूं पीड़ अंदरां तक होई
लोकां दे पत्थरां दी
सानूं पीड़ रता न होई
"साजन ने फूल मारा और हमें भीतर तक चोट लगी और लोगों ने पत्थर मारे और हमें रत्तीभर पीड़ा नहीं हुई।'

प्रेम संगीता,
अपेक्षा जहां है वहीं दुख की संभावना है। जहां अपेक्षा नहीं वहां विषाद का कोई उपाय नहीं। जिनसे तुम्हारी अपेक्षा है कि प्रीति मिलेगी, पत्थर नहीं; उनसे अगर फूल भी फेंका जाए तो घाव लगेगा। घाव फूल के कारण नहीं लगता, फूल तो बेचारा कैसे घाव करेगा? घाव लगता है तुम्हारी अपेक्षा के अनुपात से। जितनी बड़ी अपेक्षा उतनी गहरी चोट। हां, जिनसे तुम्हें कोई अपेक्षा नहीं है, वे पत्थर भी मारें तो भी दुख नहीं होता, तो भी पीड़ा नहीं होती।

पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-05

पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक: 15 जनवरी, सन् 1981
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-पांचवां-(बुद्धत्व आकाश-कुसुम है)

पहला प्रश्न: भगवान,
श्रुतिः विभिन्ना स्मृतयश्च भिन्ना,
न एको मुनिर्यस्य वचः प्रमाणम्।
धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायाम्
महाजनो येन गतः स पंथाः।।
"अर्थात श्रुतियां विभिन्न हैं, स्मृतियां भी भिन्न हैं और एक भी मुनि के वचन प्रमाण नहीं हैं। धर्म का तत्व तो गहन है। इसलिए उसे जानने के लिए तो महाजन जिस मार्ग पर चलते हैं, वही केवल मार्ग है।'
भगवान, महाजन की पहचान क्या है? उनके मार्ग पर चलने का अर्थ क्या है? समझाने की अनुकंपा करें।
आनंद किरण,
यह सूत्र अत्यंत सारगर्भित है। श्रुतिः विभिन्ना...। शास्त्र दो प्रकार के हैं--एक श्रुति और एक स्मृति। श्रुति का अर्थ होता है प्रबुद्ध पुरुष से सीधा-सीधा सुना गया। जिन्होंने गौतम बुद्ध के पास बैठकर सुना और उसे संकलित किया, वह श्रुति। जो महावीर के पास उठे-बैठे, जिन्होंने कबीर का सत्संग किया; जीवंत गुरु के पास जिन्होंने प्रेम के सेतु बनाए; जिन्होंने समर्पण किया--और सुना; जिन्होंने अपने को बाद दी--और सुना; जिन्होंने अपनी बुद्धि को एक तरफ रख दिया हटाकर--और सुना; जिन्होंने स्वयं के तर्क को बाधा न देने दी, स्वयं की जानकारियों को बीच में न आने दिया--और सुना; इस तरह जो शास्त्र संकलित हुए, वे हैं श्रुतियां।

पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-04

पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक: 14 जनवरी, सन् 1981
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-चौथा-(संन्यास तो आईना है)

पहला प्रश्न: भगवान,
क्या हमारा अंधकार कभी न कटेगा? क्या हम सदा-सदा मूढ़ता में ही डूबे रहेंगे?
स्वामी अक्षयानंद महाराज ने यह भी कहा है कि आचार्य रजनीश जो शिक्षा दे रहे हैं उसे वे भारतीय संस्कृति कहकर लोगों को भ्रमित कर रहे हैं। उनकी शिक्षा भारतीय संस्कृति या शास्त्रों के अनुसार नहीं है। आचार्य रजनीश कलियुगी हैं।
क्या आप इस संबंध में कुछ कहेंगे?

आनंदमूर्ति,
यूं न कहो। अंधकार है तो आलोक भी हो सकता है। अंधकार सबूत है इस बात का कि आलोक की संभावना है। मूढ़ता है तो टूट भी सकती है। जड़ता है तो मिट भी सकती है। श्रम की जरूरत है, अथक श्रम की जरूरत है। चूंकि जड़ता बहुत पुरानी है, उसकी जड़ें गहरी चली गई हैं। हमारे प्राण उस जहर से सदियों से सींचे गए हैं। हमारी हड्डी-मांस-मज्जा में उसका प्रवेश हो गया है। लेकिन फिर भी निराश होने की कोई बात नहीं, हताश होने की कोई बात नहीं। बल्कि ठीक इसके विपरीत, इसे चुनौती समझो। इसे एक निमंत्रण समझो--एक पुकार। यह संघर्ष प्यारा है। इस संघर्ष में मिट भी जाना पड़े तो भी अहोभाग्य है।

सोमवार, 15 मई 2017

पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-03

पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक: 13 जनवरी, सन् 1981
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-तीसरा-(रब्ब दा की पाना)

पहला प्रश्न: भगवान,
संत बुल्लेशाह का वचन है--
रब्ब दा की पाना,
एथों पुटिया, ते एथे लाना।
"अर्थात परमात्मा का क्या पाना, यहां से उखाड़ना और वहां लगाना।'
भगवान, क्या इतनी सी ही बात है?

  सुरेंद्र सरस्वती,
सरल है बात, यही कठिनाई है। कठिन होती तो कठिन न होती, क्योंकि कठिन बात के लिए तो अहंकार बहुत आतुर होता है। कठिनाई में अहंकार को चुनौती है, आमंत्रण है, बुलावा है। जितनी कठिन हो--असंभव हो तो और भी भला--और आदमी करने की ठान लेता है। गौरीशंकर पर चढ़ेगा। पाने को वहां कुछ भी नहीं, मगर अहंकार अद्वितीय होने का मजा लेना चाहता है। चांद पर जाएगा, कंकड़-पत्थर लाएगा। यहीं कुछ कमी है कंकड़-पत्थरों की? मंगल पर पहुंचेगा, दूर के सितारों पर भी एक दिन जाकर रहेगा; हाथ कुछ भी न लगेगा। पर यह दंभ कि मैं हूं पहला व्यक्ति जो गौरीशंकर पर चढ़ा, कि मैं हूं पहला व्यक्ति जो चांद पर चला! जीवनभर लोग न्योछावर करते थे ऐसी ही मूढ़ताओं पर।

पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-02

पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक: 12 जनवरी, सन् 1981
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-दूसरा-(मुहूर्तं ज्वलितं श्रेयः)

पहला प्रश्न: भगवान,
महाभारत का यह सूत्र बिलकुल आपके दर्शन से मिलता हुआ मालूम पड़ता है--
मुहूर्तं ज्वलितं श्रेयः,
न तु धूमायितं चिरम्।
"मुहूर्त भर जलना श्रेयस्कर है, बहुत समय तक धुआंना नहीं।'
यह कैसे संभव है, यह समझाने की अनुकंपा करें।
सहजानंद,
यह सूत्र निश्चित ही मेरी जीवन-दृष्टि को एक अत्यंत संक्षिप्त संकेत में रूपांतरित कर देता है। जीवन है त्वरा का नाम, तीव्रता का नाम, सघनता का नाम। जैसे कोई धूप की किरणों को इकट्ठा कर ले, एकाग्र कर ले तो तत्क्षण आग प्रज्वलित हो जाती है। वे ही किरणें बिखरकर पड़ती हैं तो सिर्फ कुनकुनापन देती हैं; वे ही इकट्ठी हो जाती हैं तो प्रज्वलित अग्नि पैदा हो जाती है।

पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-01

पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक: 11 जनवरी, सन् 1981
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-पहला-(धर्म का सार: खुमारी)

पहला प्रश्न: भगवान,
आपने संत-शिरोमणि कबीर साहब के पद "पीवत रामरस लगी खुमारी' को नई प्रवचन माला का शीर्षक बनाया है। क्या सच ही ब्रह्मानुभव परम मद है? यह ब्रह्मानुभव क्या है?
भगवान, ऐसा लगता है कि कबीर साहब आपको अतिशय प्रिय हैं। क्यों?

आनंद मैत्रेय,
कबीर निश्चय ही मुझे अतिप्रिय हैं। कारण बहुत हैं। बुद्ध से मुझे बहुत लगाव है, लेकिन बुद्ध राजमहल के एक उपवन हैं। सुंदर फूल खिले हैं। बड़ी सजावट है बगिया में, बड़ी रौनक है। परिष्कार है। लेकिन जंगल की जो सहजता है, स्वाभाविकता है, उसका अभाव है। बुद्ध अगर उपवन हैं तो कबीर जंगल हैं। जंगल का अपना सौंदर्य है--अछूता, कुंवारा। न तो मालियों ने संवारा है, न शिक्षा है, न संस्कार हैं, न ज्ञान है। और फिर भी परम प्रकाश का अनुभव हुआ है।

रविवार, 14 मई 2017

नहीं राम बिन ठांव-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-16

नहीं राम बिन ठांव-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

प्रवचन-सौहलवां 
दिनांक 09 जून सन् 1974
ओशो आश्रम, पूना।

नहिं राम बिन ठांव
राम की शरण जाने का अर्थ है एक मालिक। इसलिए राम से तुम यह मत समझना कि दशरथ के बेटे राम का कोई संबंध है। राम से तुम्हारे भीतर छिपे हुए ब्रह्म का संबंध है। तुम राम हो। तुम शरीर नहीं हो, तुम आत्मा हो।
प्रश्न:
भगवान श्री, आपके वचनों से संकेत मिलता है कि
आने वाले दस वर्ष मनुष्य-जाति के लिए बहुत संकटपूर्ण, सांघातिक और निर्णायक होने वाले हैं।
और आपका आगमन भी शायद इस बात से संबंधित है कि इस आसन्न विपदा से मनुष्य को
कम से कम क्षति हो तथा संस्कृति और धर्म के मूल्यों को अधिक से अधिक बचाया जाए।
इस दिशा में क्या हमारा मार्ग-दर्शन आप करेंगे?

नहीं राम बिन ठांव-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-15

नहीं राम बिन ठांव-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

प्रवचन-पंद्रहवां   
दिनांक 08 जून सन् 1974
ओशो आश्रम, पूना।

मंदिर के द्मद्वार खुले हैं
मैं तुम्हारा द्वार खटखटाता हूं, तुम्हें आश्वासन देता हूं, तुम्हें भरोसा देता हूं कि डरने का कोई भी कारण नहीं है। जो तुम छोड़ोगे, वह कचरा है। जो तुम पाओगे, वह महान संपदा है।

प्रश्न:
भगवान, आपने एक पत्र में लिखा है: असमंजस में न रहो, पीछे मत देखो। मंदिर के द्वार पूरे खुले हैं। हजारों साल के बाद ऐसा अवसर पृथ्वी पर उतरता है। और जान लो कि ये द्वार सदा खुले नहीं रहेंगे। आसानी से यह अवसर खो भी सकता है। इसलिए मैं बार-बार पुकार रहा हूं, आओ और प्रवेश करो! मैं दरवाजे पर खड़ा दस्तक पर दस्तक दे रहा हूं। और दस्तक इसलिए देता हूं कि किसी अन्य जन्म में और अन्य युग में मैंने वचन दिया था।